27.12.15

जीवन-इच्छा

बहुधा मैं असहाय पाता हूँ स्वयं को,
खोखले दिखते मुझे उद्देश्य मेरे
विवश हो मैं चाहता हूँ गोद ऐसी,
तुष्ट हूँ मैं, सान्त्वना भी मिले मुझको ।।१।।

व्यथित मन में चीखता तम रिक्तता का,
जानता हूँ पर स्वयं से भागता हूँ
स्वयं के धोखे विकट हो काटते हैं,
प्राप्त जल पर तृप्त मैं हो सका हूँ ।।२।।

विकल अन्तरमन उलसना चाहता है,
हर्ष का जीवन बिताना चाहता
व्यर्थ का दुख पा बहुत यह रो चुका है,
प्रेम का अभिराम पाना चाहता ।।३।।

20.12.15

राधा-माधव

देहभान में प्राण तिरोहित,
अन्तर आत्मा दुखी बेचारी ।
प्रेम भक्ति की सुधा चखा दो,
राधा माधव, कृष्ण मुरारी ।।१।।

भ्रम टूटा, मैं मुझसे छूटा,
नित माया की चोट करारी ।
मुझको अपनी गोद छुपा लो,
गोपी रक्षक, हे गिरिधारी ।।२।।

जग की जगमग रास न आये,
कैसे रह जाऊँ संसारी ।
मुझमें अपना रंग चढ़ा दो,
मेरे जीवन के अधिकारी ।।३।।

जीवन की अक्षय अभिलाषा,
मनमोहन, हे वंशीधारी ।
वृन्दावन मम हृदय उतारो,
प्रेम सरोवर, कुंज बिहारी ।।४।।

आनन्दित मन भरे कुलाँछे,
तेरी लीलायें अति प्यारी ।
बिन तेरे सब शान्त शुष्क है,
गोविन्दा, हे गोकुलचारी ।।५।।

हे शब्दों के उद्भवकर्ता,
तुम्हें समर्पित कृतियाँ सारी ।
छंदों के इस तुच्छ भोग को,
स्वीकारो हे रास बिहारी ।।६।।

13.12.15

और तुम

मन की तहों में क्या हलचल मची है ।
न बोलूँ अगर, पर ये आँखें बतातीं ।।१।।

अगर पूछ सकते तो धड़कन से पूछो ।
किसे कष्ट कितना, वह कहकर सुनाती ।।२।।

तुम्हारे लिये मात्र सो के है उठना ।
तड़प कितनी होती, जो रातें सताती ।।३।।

वचन था, हृदय को हृदय में रखेंगे ।
भूले नहीं, बात तुमने भुला दी ।।४।।

कहा, तुम नहीं तो, नहीं चैन आता ।
सुनी बात, सुनकर हँसी में उड़ा दी ।।५।।

है मन को मनाने के औरों तरीके ।
नहीं बोलते बात, तुमपर जो आती ।।६।।

तुममें बसा मन, तुम्हे मन में ढूढ़ूँ ।
यही कर्म औ चाह मन में बसा ली ।।७।।

मेरी जीवनी को, समझती है दुनिया ।
नहीं कुछ किया और यूँ ही बिता दी ।।८।।


6.12.15

परिचय

अतुलित रूप सम्पदा तेरी,
मादकता मधु का निर्झर ।
नयनों में अप्रतिमाकर्षण,
चेहरे का सौन्दर्य प्रखर ।।१।। 

नयन तुम्हारे कान्ति-सरोवर,
चेहरे पर अभिराम ज्योत्सना ।
परिचय तेरा शब्द रहित है,
तुम पृथ्वी पर अमर-अंगना ।।२।।

मधुरस के इस महासिन्धु में,
मन नैया चुपचाप बढ़ रही ।
मेरी सृजना, चुपके चुपके,
तेरा यह आकार गढ़ रही ।।३।।

पर यथार्थ में मिली नहीं तुम,
स्वप्नों में आ जाती प्रतिदिन ।
राग सभी अनसुने हैं अभी,
जो आकर गा जाती हर दिन ।।४।।

ना जानूँ, तुम कौन स्वप्न में,
मनस पिपासा जगा रही हो ।
ना जाने क्यों आशाआें के,
पुष्प सुनहरे खिला रही हो ।।५।।

अनुभूतित सौन्दर्य अतुल है,
पर अन्तः उत्सुक अतीव है ।
मैं जीवन की प्रथम संगिनी,
में तेरी आकृति चाहूँगा ।।६।।


29.11.15

क्यों

सकल, नित, नूतन विधा में,
दोष प्रस्तुत हो रहे क्यों
क्यों विचारों में उमड़ता,
रोष जो एकत्र बरसों ।।१।।

क्यों प्रदूषित भावना-नद,
तीक्ष्ण होकर उमड़ती है
ईर्ष्या क्यों मूर्त बनकर,
मन-पटल पर उभरती हैं ।।२।।

क्यों अभी निष्काम आशा,
लोभ निर्मित कुण्ड बनती
मोह में क्यों बुद्धि निर्मम,
सत्य-पथ से दूर हटती ।।३।।

और अब क्यों काम का,
उन्माद मन को भा रहा है
कौन है, क्यों जीवनी को,
राह से भटका रहा है ।।४।।

22.11.15

हृदय-कक्ष

हृदय के विस्तृत भवन में, अनुभवों से,
किये निर्मित काल्पनिक कुछ कक्ष मैंने ।

सजा उनको आचरण की सहजता से,
तृप्त करने कल्पना की प्यास मैंने ।

किया शब्दित अनुभवों को जटिलता से,
ग्रहण करके लुप्त होते स्वप्न मैंने ।

और आँसू अनवरत बहते नयन से,
कभी पाये रिक्त हृद के कक्ष मैंने ।

15.11.15

आभार

अति प्रसन्न हूँ, इस पथ पर, तेरा ढाढ़स और प्यार मिला है,
पृथक विचारों को तेरे ही, भावों का आधार मिला है,
अन्तः पीड़ा को तेरे कोमल मन का संसार मिला है,
सच कहता हूँ, बड़े भाग्य से, तेरे सा उपहार मिला है ।

कविता बनकर आज हृदय से प्यार बहे तो मत रोको,
इस बन्धन को प्रथम बार ही, शब्दों का आकार मिला है ।।

8.11.15

अश्रु नहीं बन पाती पीड़ा

लिये समय का बोझ हृदय में, संवेदित जीता रहता हूँ ।
अश्रु नहीं बन पाती पीड़ा, मन ही मन पीता रहता हूँ ।।

नेह नियन्त्रित नहीं, शीघ्र ही आँखों को सरसा जाता है ।
भावों से परिपूर्ण, अपेक्षित सुख-फुहार बरसा जाता है ।।
नहीं बिखरने पाये जग में,
पर दुख जो भी आये मन में,
कोमल मन है, कष्ट बड़े घनघोर, सहज जीता रहता हूँ ।
अश्रु नहीं बन पाती पीड़ा, मन ही मन पीता रहता हूँ ।। १ ।।

कुटिल जगत की रीति, छिला था हृदय, अनेकों आघातों से ।
कब तक सहती, बहुधा आत्मा, चीखी भी थी संतापों से ।।
सोचा तब हुंकार कर उठूँ,
चालों का प्रत्युत्तर भी दूँ,
किन्तु स्वयं को समझाता हूँ, होठों को सीता रहता हूँ ।
अश्रु नहीं बन पाती पीड़ा, मन ही मन पीता रहता हूँ ।। २ ।।

था निरीह, पाशित बन्धों में, कहता क्या, अपने जो थे ।
कई बार इच्छा होती थी, तन्तु तोड़ दूँ सम्बन्धों के ।।
नहीं किसी से कुछ भी कहता,
शान्त खड़ा शापित सा सहता,
सम्बन्धों को मधुर बनाये, दुविधा में जीता रहता हूँ ।
अश्रु नहीं बन पाती पीड़ा, मन ही मन पीता रहता हूँ ।। ३ ।।

कैसे लब्ध आचरण छोड़ूँ, कैसे इतना गिर जाऊँ मैं ।
कैसे मान प्रतिष्ठा प्रेरित, अपने से ही फिर जाऊँ मैं ।।
नहीं ढूढ़ता हूँ अब कारण,
त्याग, तपस बन गये उदाहरण,
वही तर्क प्रस्तुत करता हूँ, वही कृष्ण-गीता कहता हूँ ।
अश्रु नहीं बन पाती पीड़ा, मन ही मन पीता रहता हूँ ।। ४ ।।

1.11.15

दावानल सा

कैसे सहज, मधुर हो बोलूँ,
सौम्य आत्म कोई छलता है ।
वाणी से कुछ दूर दृष्टि में,
दावानल सा जलता है ।।

नहीं विवादों में उलझा, बस हाँ की,
छलित वहीं पर, जहाँ नहीं शंका की ।
आज विरोधों से पूरित स्वर, बढ़ता और बदलता है ।
वाणी से कुछ दूर दृष्टि में, दानावल सा जलता है ।। १।।

नहीं कृष्ण हूँ, ना ही कोई शपथ धरी है ,
शस्त्र उठाने की इच्छा फिर हो सकती है ।
प्रत्युत्तर का अंकुर मन में, फलता और मचलता है ।
वाणी से कुछ दूर दृष्टि में, दावानल सा जलता है ।। २।।

रुका हुआ था, स्वयं बनाये अवरोधों से,
नहीं कभी भी क्रोध लुप्त, था हुआ रगों से,
आज धैर्य का सूर्य, हृदय से दूर कहीं पर ढलता है ।
वाणी से कुछ दूर दृष्टि में,दानावल सा जलता है ।। ३।।

नहीं कंठ रुकता, केवल यह कह कर,
अन्तः का आवेश उमड़ता रह कर,
नहीं गूँज यह नयी, हृदय में कोलाहल यह कल का है ।
वाणी से कुछ दूर दृष्टि में,दानावल सा जलता है ।। ४।।

25.10.15

उलझन

जीवन के इस समय सिन्धु में,  कुछ पल ऐसे आते होंगे,
जब मन-वीणा के तारों में,  एक अनसुलझी उलझन होगी ।
कर्कश स्वर तब इस वीणा के, वाणी से जा मिलते होंगे,
तब सकल अतल मन सागर में, तूफानों सी हलचल होगी ।।

मानव शरीर के यन्त्र सभी, तब भलीभाँति चलते होंगे,
यन्त्रों की कार्यिक क्षमता भी, संदेह रहित उत्तम होगी ।
मानव जीवन की प्रगति हेतु, निर्मित मानक तत्पर होंगे,
लेकिन भीषण मनवेगों से, अध्यात्म प्रगति स्थिर होगी ।।

मत हो अशान्त, एकात्म रहो,
निज धारा में चुपचाप बहो,
इस कालकर्म को शान्त सहो,
बस शान्ति तत्व के साथ रहो ।

जीवन जितना ही सादा हो,
सुलझाव भी उतना होता है,
उलझन का कोई प्रश्न नहीं,
मन विचरण सीमित होता है ।

यदि मानव फिर भी उलझ गये, तो तोड़ व्यथा के तारों को,
जो पीड़ा है वह सत्य नहीं, तू छोड़ असत्‌ व्यवहारों को ।
बढ़ स्वयं विचारों के पथ पर, मुख मोड़ वाह्य संसारों से,
तू दिगदिगन्त को गुञ्जित कर, ब्रह्मास्मि अहम्‌ ललकारों से ।।

18.10.15

तुम समर्थ हो

यदि कष्टों की धार बहे अनियन्त्रित,
नष्ट करो तुम उस कारण का स्रोतस्थल ।
व्यर्थ कष्ट क्यों सहो,मनुज तुम श्रेष्ठ सबल हो,
प्रभुसत्ता स्थापित कर दो तुम विरोध में ।।

डरा कोई हो, पुरुष नहीं था,
पौरुष तो निर्भयता में है ।
मृत्यु कभी भी अन्त नहीं है,
भय जीवन का सतत व्यर्थ है ।।

हो कोई बलशाली, तुम भी आत्मबली हो,
हों नियमों के शास्त्र, तुम्हे लभ ज्ञानशस्त्र हैं ।
यदि समाज जीवन तेरा कुंठित करता हो,
तुम अपने ही नियम बनाओ, तुम समर्थ हो ।।

नहीं दीखती राह, बढ़ो तुम,
प्रथम कदम में झलके दृढ़ता ।
भाग्य तुम्हारा मित्र बनेगा,
शेष राह भी आप खुलेगी ।।

11.10.15

संवाद

पूछती थी प्रश्न यदि, उत्तर नहीं मैं दे सका तो,
भूलती थी प्रश्न दुष्कर, नयी बातें बोलती थी ।
किन्तु अब तुम पूछती हो प्रश्न जो उत्तर रहित हैं,
शान्त हूँ मैं और तुमको उत्तरों की है प्रतीक्षा ।
राह जिसमें चल रहा मैं, नहीं दर्शन दे सकेगी,
तुम्हे पर राहें अनेकों, आत्म के आलोक से रत ।
किन्तु हृद के स्वार्थ से उपजी हुयी एक प्रार्थना है,
नहीं उत्तर दे सकूँ पर, पूछती तुम प्रश्न रहना ।
कृपा करना, प्रेम का संवाद न अवसान पाये,
रहे उत्तर की प्रतीक्षा, जीवनी यदि बीत जाये ।

4.10.15

नयन प्यारे

होंठ कपते लाज मारे, किन्तु आँखों के सहारे,
पूछती कुछ प्रश्न और अध्याय कहती प्रेम के ।।१।।

हठी मन के भाव सारे, सौंप बैठे बिन विचारे,
हृदय के सब स्वप्न तेरी झील आँखों में दिखें ।।२।।

समूचा अस्तित्व हारे, पा तुम्हारे नयन प्यारे,
द्रवित हूँ, उन्माद में मन, बहा जाता बिन रुके ।।३।।

27.9.15

वाक्य गूँजता

हर रात के बाद,
बरसात के बाद,
दिन उभरेगा,
तिमिर छटेगा,
फूल रंग में इठलायेंगे,
कर्षण पूरा, मन भायेंगे,
पैर बँधे ढेरों झंझावत,
पग टूटेंगे, रहे रुद्ध पथ,
बरसायेंगे शब्द क्रूरतम,
बहुविधि उखड़ेगा जीवनक्रम,
दिन की भेंट निगल जाने को,
संभावित गति हथियाने को,
यत्न पूर्णतः कर डालेंगे,
संशय भरसक भर डालेंगे,
खींच खींच कर उन बातों में,
अँधियारी काली रातों में,
ले जाने को फिर आयेंगे,
रह रह तुमको उकसायेंगे।

निर्मम हो एक साँस पूर्ण सी भर लो मन में,
जीवन का आवेश चढ़ाकर, भर लो तन में,
गूँजे भर भर, सतत एक स्वर दिग दिगन्त में,
नहीं दैन्यता और पलायन, इस जीवन में ।

20.9.15

जीना ही होगा

तुझे जीना ही होगा

अनुकूल बात, हो न हो,
कार्यान्त रात, हो न हो,
न्यूनतम व्याप्त, विषयगत आस , हो न हो।

हृदय-तम अब हटाना है,
उन्हें यह सच बताना है,
नहीं उनसे विश्व पालित,
यहाँ सबका ठिकाना है।

नहीं अमृत का कलश है,
प्राप्ति में श्वेदान्त रस है,
उपेक्षा का अर्क, पीना ही होगा,
तुझे जीना ही होगा।

13.9.15

पंथ प्रथम है

आँखों से क्यों खींच रही हो,
आकर्षण-तरु सींच रही हो,
नहीं शक्ति, आमन्त्रण तज दूँ,
उद्वेलित हूँ, नहीं सहज हूँ,
साँसों का आवेग विषम है,
आशंकित हूँ, पंथ प्रथम है ।

प्रेम तुम्हारा, आधी रचना,
आधा जगना, आधा सपना,
नहीं सूझता है कुछ मन को,
कैसे रोकूँ आज समय को,
सुख, व्याकुलता मिश्रित क्रम है,
आशंकित हूँ, पंथ प्रथम है ।

6.9.15

लोग हमारे जीवन का

लोग हमारे जीवन का आकार बनाने बैठे हैं ।
अरबी घोड़ों को टट्टू की चाल सिखाने बैठे हैं ।

जिनके अपने जीवन बीते छिछले जल के पोखर में,
सागर की गहराई का अनुमान लगाने बैठे हैं ।

मना किया किसने, अनुभव का लाभ प्राप्त हो आगत को,
जूझ रही जो लौ, उसका उपहास उड़ाने बैठे हैं ।

स्वप्न-उड़ानों हेतु तुम्हे प्रस्तुत करना था मुक्त गगन,
उड़ ना पायें पञ्छी, इस पर दाँव लगाने बैठे हैं ।

बहुधा बाधा बने राह की, अहं अधिक था, गति कम थी,
उस पर भी खुद को महती उपमान बनाने बैठे हैं ।

है साहस जिनको लड़ने का, पर विडम्बना, उनको भी,
कर्मक्षेत्र से भागे, गीता ज्ञान बताने बैठे हैं ।

चिन्तन जिनका चाटुकारिता, टिके रहो का मूल मन्त्र ले,
नयी पौध को आज लोक व्यवहार सिखाने बैठे हैं ।

सजा दिये हैं आडम्बरयुत, क्रम हैं और अधिक उपक्रम,
इसे व्यवस्था कहते, तृण को ताड़ बताने बैठे हैं ।

30.8.15

बताता हूँ सत्य गहरा

बताता हूँ सत्य गहरा,
आत्म-क्रोधित और ठहरा,
लगा है जिस पर युगों से,
वेदना का क्रूर पहरा ।

मर्म जाना तथ्य का,
जब कभी भी सत्य का,
जानता जिसको जगत भी,
व्यक्त फिर भी रिक्तता,
नित्य सुनता किन्तु अब तक रहा बहरा,
बताता हूँ सत्य गहरा ।

मैं उसे यदि छोड़ता हूँ,
आत्म-गरिमा तोड़ता हूँ,
काल से अपने हृदय का,
क्षुब्ध नाता जोड़ता हूँ ।
स्याह संग जीवन लगे कैसे सुनहरा,
बताता हूँ सत्य गहरा ।

ध्यान सारा बाँटते हैं,
झूँठ मुझको काटते हैं,
आत्म की अवहेलना के,
तथ्य रह रह डाँटते हैं,
नहीं रखना संग अपने छद्म पहरा,
बताता हूँ सत्य गहरा ।

23.8.15

जीवन को जब कहा, ठहर जा

जीवन को जब कहा, ठहर जा, नहीं उसे रुकना भाता है,
और हृदय जब भरे उलाछें, सन्नाटा पसरा जाता है ।

आलस में बीते कितने दिन, कितने अवसर व्यर्थ हुये,
शब्दों से उलझे उलझे हम, कितने वाक्य निरर्थ हुये ।

मैने कब माँगी थी गति सोपान त्वरित चढ़ जाने की,
नहीं कभी भी आकांक्षा थी उत्कर्षों को पाने की ।

जीवन को देव प्रदत्त एक उपहार मान कुछ बीते दिन,
और कभी एक ध्येय अग्नि पर अर्पित करने चाहे ऋण ।

माना प्रश्न पूछ्ने का अधिकार नहीं है अब हमको,
पर क्या उत्तर दे पायें जब समय सालता है हृद को ।

16.8.15

संशय

प्रथम दृष्टि में रहे अपरिचित,
मन में कुछ संशय थे संचित,
ना जाने वह कैसा होगा,
बहता था क्रम चिन्ताआें का,
खींचे कल्पित चित्र अनेकों,
जीवन में पाये अनुभव जो,
वही रंग बस भरते जाते,
कल्पित तेरे चित्र बनाते ।।१।।

सोचा बैठे शान्त अकेले,
प्रश्न अनवरत पूछे मन से,
तुम्ही विचारों में आगत थे,
चिन्तन में तुम छाये रहते,
सोचा मन को आश्रय देगा,
आशाआें के साथ बहेगा,
उत्तर से जो लेकर आया,
प्रतिमा में वह रंग चढ़ाया ।।२।।

आये तुम, आश्रय सब आये,
व्यर्थ कल्पना में भरमाये,
थे जितने रंग समेटे,
फीके सब तेरी तुलना में,
मन, जीवन सब तुझ पर मोहित,
संशय, चिन्ता सकल तिरोहित,
प्रेमपूर्ण, अनुराग-निहित हो,
गोद छिपा लो आशाआें को ।।३।।

9.8.15

मैनें रेखाचित्र बनाये

मैनें रेखाचित्र बनाये,
जगह जगह से कर एकत्रित, आकृतियों के ढेर सजाये ।

कहीं कहीं पर मधुर कल्पना के धुँधले आकार बिछाये,
कहीं सोचकर बड़े यत्न से, सुन्दर से कुछ चित्र बनाये ।
इतना सब कुछ पहले से है, फिर भी कुछ तो छूटा जाये ।
मैनें रेखाचित्र बनाये ।।१।।

इन रेखाचित्रों में उभरे, तेरे थे जो चित्र बनाये,
अलग व्याख्या, अलग सजावट, तेरा सब श्रृंगार सजाये ।
पर रेखाआें की यह रचना, आँखों में क्यों उतर न पाये ।
मैनें रेखाचित्र बनाये ।।२।।

कार्य यही अब इन चित्रों के तीखेपन को सरल बनाना,
कहीं वेदना के दृश्यों का, थोड़ा सा आकार घटाना ।
पर गन्तव्य पहुँचने पर, अनुभव की नद विस्तार बढ़ाये ।
मैनें रेखाचित्र बनाये ।।३।।

2.8.15

आकांक्षा से भरे नयन हैं

आकांक्षा से भरे नयन हैं और असुँअन की धार बहे,
सक्षम खाली हाथ, उठे हैं सम्मुख, अपनी बात कहे,
सूचक हैं ये, प्रश्न उठाते, आज आपके बारे में,
आप समझते, अश्रु खुशी के, हाथ उठे जयकारे में ।

हम थे भ्रम में, शायद हमने, लोकतन्त्र-रण जीता है,
पाँच वर्ष अज्ञातवास, पर समय आपका बीता है,
आये पुनः बिछाने चोपड़, आशाओं की, स्वप्नों की,
पाँसे फेंके, खेल रहे हैं, राजनीति फिर अपनों की,

अब होगा सब ठीक, समस्यायें जो थी, मिट जायेंगी,
नयी नीतियाँ देखो, उजला नवप्रभात ले आयेंगी,
व्यक्ति व्यक्ति को तोड़ रहे जो, हाथ जोड़कर खड़े हुये,
आज आपके मत पाने बन भिक्षु अकिंचन पड़े हुये,

निष्ठाओं का भवन तुम्हारा जगह जगह से टूटा है,
अपना वचन निभाना था जो, सिद्ध कर दिया झूठा है,
किस को समझाना चाहो तुम, कौन कथा तुम बाँच रहे,
मन के छल को, खड़े हुये क्यों चौराहे पर जाँच रहे,

नहीं तुम्हारे आश्वासन अब काम तुम्हारे आयेंगे,
हर हाथों को काम, और यह अश्रु सूख जब जायेंगे,
तभी समझना जनमानस-स्नेह, हृदय की धड़कन को,
अपना ही पाओगे हर क्षण, तब समाज में जन जन को।

26.7.15

निर्णय

समय के सोपान पर जब, एक निश्चित जगह आकर,
बुद्धि विकसित, तथ्य दर्शित स्वयं ही होने लगे ।
निज करों में जीवनी की बागडोरें, मैं सम्हाले,
बढ़ चला, जब लोग मुझ पर नियन्त्रण खोने लगे ।।१।।

एक पुस्तक सी खुली थी, कभी जो दुनिया छिपी थी,
जहाँ व्यक्तित्वों भरे अध्याय बाँटे जोहते थे ।
खोल आँखें, सामने तो, दीखती राहें अनेकों,
दृश्य मुझको रोकते थे, खींचते थे, सोहते थे ।।२।।

मनस में आनन्द की मदमस्त कोयल कूजती थी,
सकल जीवन के सुहाने स्वप्न दिन में दीखते थे ।
खड़ा मैं स्वच्छन्दता के भाव में कुछ और गर्वित,
हर तरफ अधिकार के विस्तार ही दिखने लगे थे ।।३।।

अनुभवों के कोष को मैं व्यग्र हो भरने लगा था ।
और अपने निर्णयों को स्वयं ही करने लगा था ।।

(वर्षों पहले लिखी थी, वह भाव पता नहीं, कहाँ चला गया?)

19.7.15

सुख-श्रृंगार

आज विचारों में उतराकर, सकल अलंकृत प्यार करूँ मैं ।
कहीं दूर एकान्त बैठकर, तेरा सुख-श्रृंगार करूँ मैं ।।

तृषा-दग्ध हर दृष्टि, मची है उथल-पुथल, तुझको डर है ।
स्वार्थ-तिक्त जग-रीति तुम्हारे पंख काटने को तत्पर है ।।

व्यर्थ तुम क्यों झेलो सब वार,
बसाकर सरस हृदय में प्यार,
सिमटकर बाहों में छिप जा,
तुम्हारे हर दुख का उपचार करूँ मैं ।

आ जा तेरे मुग्ध, सुवासित उपवन को तैयार करूँ मैं ।
तेरा सुख-श्रृंगार करूँ मैं, सकल अलंकृत प्यार करूँ मैं ।

12.7.15

कैसे कह दूँ ?

कैसे कह दूँ, यह जीवन, निर्झर, निर्मल बहता पानी है ।
कैसे कह दूँ, है खुशी बड़ी, जब सब राहें अनजानी हैं ।।

कैसे जीवन को सिंचित, शस्यित उपवन की उपमा दे दूँ ।
कैसे कह दूँ, अब शान्ति-चैन में सारी रैन बितानी है ।।

कैसे कह दूँ, कि जीवन में जो चाहा था, हर बार मिला ।
कैसे हो जाये चित्त शान्त, जब हर गुत्थी सुलझानी है ।।

निर्विकार यदि जीना हो,
निर्भय यथार्थ स्वीकार करो ।

कैसे कह दूँ, कि आज व्यवस्थित, मन का ताना बाना है ।
कैसे भी हो, पर जीवन का चिन्तन यथार्थ पर लाना है ।।

5.7.15

वर्षा

हरे रंग के शुभ्र वस्त्र से बना हुआ धरती का आँचल,
सकल मेघ हैं दिखा रहे आनन्द रूप निज बदल बदल ।
खड़े हुये सब वृक्ष शान से, देख रहे यह रूप निरन्तर,
छोटे छोटे पंख हिला खग, भ्रमण कर रहे शाख शाख पर ।।१।।

अन्तर में जीवन-दीप लिये, जा मिली बूँद सोंधी मिट्टी से,
छोटे छोटे हाथ खोल तृण, बुझा रहे हैं प्यास चैन से ।
अपने मद में नर्तन करती, नद भूल गयी सब सुध जग की,
है शान्त, धीर, गम्भीर धराधर, खुश लख क्रीड़ा प्रकृति-पुत्र की ।।२।।

स्थिर तडाग भी वर्षा में, लगता यूँ जैसे काँप रहा है,
टपटप टिपटिप कर स्वर-निनाद, जय वर्षा देवी जाप रहा है ।
कर किरण परावर्तित, छिन्नित, अपनी मस्ती में खेल रहा है,
सारे प्रतिबिम्बित अंगों को, अपने अन्तर में देख रहा है ।।३।।

बह रही शान्त शीतल समीर, पक्षी कलरव कर घूम रहें हैं,
प्रकृति अंग मानो सब मिलकर, सुख मदिरा पी झूम रहे हैं ।
बूँदों का झीना वसन ओढ़कर, प्रकृति शुभ्र सौन्दर्य दिखाती,
मानो घूंघट को ओट खड़ी, नववधू देख पति को शर्माती ।।४।।

छोटे पौधे भी उचक उचक, सब दृश्य देखने को अधीर,
हिलडुल मानो यह पूछ रहे, मौसम क्या आया हे समीर ।
बोला समीर शीतलता से, यह ऋतु अलबेली बूँदों की,
यह सकल प्रकृति के जीवन की, फल, फूस, रसों, मकरन्दों की ।।५।।

तुम इसी काल में जल पाकर, धीरे धीरे विकसित होते,
आकार ग्रहण कर यौवन में, पा जीवन रस शस्यित होते ।
आनन्द-अर्पिता है यह ऋतु, यह सकल विश्व जीवन-दात्री,
यह सर्व-रक्षिता, कर्म मार्ग पर, अखिल सृष्टि पर कृपात्री ।।६।।

28.6.15

कब तुम्हारा स्मरण हो

आज कोई दुख नहीं है, निशा सुख में डूबती है,
समय का आवेग भी निश्चिन्त बहता जा रहा है,
जब समुन्दर राग और आह्लाद के लेते हिलोरें,
सुध स्वयं की ही नहीं है, कब तुम्हारा स्मरण हो ?

इस तरह यदि सुखों का प्राधान्य चलता ही रहेगा,
पंथ व्यवधानों बिना सामान्य मिलता ही रहेगा,
जीवनी की विविधता और मदों में आसक्त होकर,
यहाँ सुविधा में पड़ा हूँ, कब तुम्हारा स्मरण हो ?

बता तेरे उपकरण से ध्यान हटता ही नहीं है,
कब तुम्हारा अनुसरण हो, कब तुम्हारा स्मरण हो ?

21.6.15

आँखों की भाषा

कितने स्वप्न सँजों रखे हैं,
कब से सोयी है अभिलाषा,
चुपके चुपके कह जाती है,
आँखों से आँखों की भाषा । १।

ज्ञात नहीं मैं कहाँ खड़ा हूँ,
आकर्षण का घना कुहासा,
मन्त्रमुग्ध पर खींच रही है,
आँखों से आँखों की भाषा । २।

जाने कब से आस लगाये,
आँखें तकता है मन प्यासा,
फिर भी प्यास बढ़ा जाती है,
आँखों से आँखों की भाषा । ३।

तुम पर निर्भर स्वप्न सलोने,
तुम पर निर्भर सारी आशा,
कब देगी पहला आमन्त्रण,
आँखों से आँखों की भाषा । ४।

14.6.15

आश्रय-हाथ बढ़ाये कौन

कौन दिशा उड़ जाये पंछी,
जाकर उसे बताये कौन,
तारे सब छिप बैठ गये हैं,
पंथहीन नभ, जाये कौन,
अंत नहीं, कुछ मंत्र नहीं है,
साधन सीमित, तन्त्र नहीं है,
जब हों सबकी, क्लांत उड़ानें,
आश्रय-हाथ बढ़ाये कौन।।१।।

तथ्यों का आकार बढ़ रहा,
अर्थ बिखरता जीवन का,
तत्व ज्ञान के द्वार संकुचित,
विश्लेषण कैसे क्रम का,
तर्कों के आधार सुप्त हैं,
प्रेरक दृष्टा, मार्ग लुप्त हैं,
निष्कर्षों की धारा वांछित,
द्वन्द्व मिटे अन्तरमन का।।२।।

कहो सूर्य से, और न डालें,
ऊष्मा तप्त व्यवस्था में,
काल निशा की शीत बिछी हो,
इस उद्विग्न अवस्था में,
प्रश्न और निर्णय स्थिर हों,
आश्वासन के अक्षर चिर हों,
संवेदित एकान्त भा रहा,
जीवन की परवशता में।।३।। 

अनुशासन क्यों घेरे जीवन,
पूर्ण मुक्त मन की लहरी,
सीमायें जब ज्ञात नहीं हैं,
आवश्यक तब क्यों प्रहरी,
वर्तमान का चित्रांकन हो,
संबंधों का मूल्यांकन हो,
जाग सके संयुक्त चेतना,
क्षुब्धमना बैठी बहरी।।४।।

ज्ञान पुरातन, गूढ़, संग्रहित,
आपाधापी, व्यर्थ हो गया,
आक्रांता का छद्म आवरण,
देखो पूर्ण समर्थ हो गया,
मूल तत्व सब धूल मिले हैं,
विषबेलों के फूल खिले हैं,
एक सतत जो जीवनक्रम था,
अस्त-व्यस्त, हत-अर्थ हो गया।।५।।

दया नहीं, है दिशा अपेक्षित,
चलने में सक्षम पग हैं,
सदियों की उपलब्धि वृहद
है हमने भी नापे जग हैं,
अवसादों से नित जूझेंगे,
उलझे मन, जीवन गूथेंगे,
और न पंथों का भ्रम, तारे,
आश्वासन से जगमग हैं।।६।।

7.6.15

सूरज ढूढ़ रहे अंधों में

स्वार्थ दृष्टिगत संबंधों में,
जीवन बीता अनुबंधों में,
ढक कर सर पर बोरे डाले,
सूरज ढूँढ़ रहे अंधों में।

मद में रत, बौराया नित मन,
गति घनघोर बिताया यौवन,
तन थकान, चहुँ दिशा बिखरती,
विधि छाया बिसराया जीवन।

तथ्य गूढ़, अनुभूत विवशता,
छिछली, बिखरी, जीवनरसता,
हर मोड़ों पर बाधित, पाशित,
मापरहित प्रतिकूल अवस्था।

मधुरिम सपने, ध्वस्त धरातल,
अनमन रचना, छिटके बादल,
संकेतों की बाट जोहती,
आशायें ढलती अस्ताचल।

दृष्टि बदलती, सृष्टि अधरगति,
अनुभव पथ पर, आन्दोलित मति,
संशोधित, पूरित शब्दों से,
सजती, रसती, अकुलायी क्षति।

द्वन्द्व चरम पर, जीवन साधे,
आधे सम्हले, बिखरे आधे,
स्थिरता की निशा विरहपथ,
अर्धचन्द्र अनुरूप बिता दे।

31.5.15

वर्तमान

रत विश्व सतत, मन चिन्तन पथ,
जुड़कर खोना या पंथ पृथक,
क्या निहित और क्या रहित, प्रश्न,
आश्रय, आशय, आग्रह शत शत ।।१।।

प्रातः प्रवेश, स्वागत विशेष,
करबद्ध खड़े, जो कार्य शेष,
प्रस्तुत प्रयासरत यथायोग्य,
अब निशा निकट, मन पुनः क्लेश ।।२।।

क्या पास धरें, क्या त्याग करें,
किस संचय से सब भय हर लें,
तन मन भारी, जग लदा व्यर्थ,
गन्तव्य रिक्त, अनुकूल ढलें ।।३।।

क्षण प्राप्त एक, निर्णय अनेक,
गतिमान समय, अनवरत वेग,
जिस दृष्टि दिशा, लगती विशिष्ट,
आगत अदृश्य, फल रहित टेक ।।४।।

आधार मुक्त, मतिद्वार लुप्त,
संकेतों के संसार सुप्त,
प्रश्नों के उत्तर बने प्रश्न,
निष्कर्ष रचयिता स्वयं भुक्त ।।५।।

क्या आयोजन, क्या संयोजन,
किसका नर्तन, किसका मोदन,
कथनी करनी में मुग्ध विश्व,
यदि नहीं प्राप्त, क्यों आरोदन ।।६।।

न आदि ज्ञात, न अन्त ज्ञात,
न अन्तरमन का द्वन्द्व ज्ञात,
यदि ज्ञात अभी, बस वर्तमान,
एक साँस उतरती रन्ध्र ज्ञात ।।७।।

24.5.15

आशा

आशा की अँगड़ाई, फैली दिगदिगन्त है ।
बीत गये दुख-पतझड़, जीवन में बसन्त है ।। 

पथ पर पग दो चार बढ़े, था मन उमंग में उत्साहित ।
भावनायें उन्मुक्त और मैं लक्ष्य-प्राप्ति को आशान्वित ।
रुक जाने का समय नहीं, घट भर लेने थे अनुभव के,
कर्म बसी भरपूर ऊर्जा, सुखद मनोहर पथ लक्षित ।।१।।

बीच राह, सब ओर स्याह, पुरजोर हवायें बहती थीं ।
काल करे भीषण ताण्डव, चुप रहे जीवनी सहती थी ।
आयी निष्ठुर प्रारब्ध-निशा, कुछ और कहानी कह डाली,
विघ्न-बवंडर उठते नभ में, आशायें नित ढहती थीं ।।२।।

दुख आते, मन अकुलाते, कुछ और स्वप्न ढल जाते हैं ।
अनचाही पर उस पीड़ा को, हम सहते हैं, बल पाते हैं ।
कुछ और अभी पल आयेंगे, कष्टों का बेड़ा लायेंगे,
फिर भी आशा है, जीवन है, हम भूधर से डट जाते हैं ।।३।।

17.5.15

प्रेम अपना

परिचयी आकाश में, हर रोज तारे टूटते हैं,
लोग थोड़ा साथ चलते और थकते, छूटते हैं,
किन्तु फिर भी मन यही कहता, तुम्हारे साथ जीवन,
प्रेम के चिरपाश में बँध, क्षितिज तक चलता रहेगा ।।१।।

विविधता से पूर्ण है जग, लोग फिर भी ऊब जाते,
काल के आवेग में आ, पंथ रह रह डगमगाते,
नहीं भरता दम्भ फिर भी, मन सतत यह कह रहा है,
आत्म-पोषित, प्रेम अपना, दुग्ध सा धवलित रहेगा ।।२।।

10.5.15

तुम्हारा साथ

आज मेधा साथ देती,
उमड़ता विश्वास भी है ।
चपल मन यदि शान्त बैठा,
यह तुम्हारा साथ ही है ।।१।।

दिख रहा स्पष्ट सब कुछ,
यदि दिशा मन की बँधी है ।
प्रेरणा अविराम बहती,
यह तुम्हारा साथ ही है ।।२।।

बढ़ रहा हूँ लक्ष्य के प्रति,
और संग आशा चली है ।
बिन सहारे चल रहा हूँ,
यह तुम्हारा साथ ही है ।।३।।

यदि सम्हलता समय का रथ,
जीवनी की लय सधी है ।
मन मुदित हो गीत गाता,
यह तुम्हारा साथ ही है ।।४।।

3.5.15

हेतु तुम्हारे

संग तुम्हारे राह पकड़ कर, 
छोड़ा सब कुछ बीते पथ पर,
मन की सारी उत्श्रंखलता, 
सुख पाने की घोर विकलता,
मुक्त उड़ाने, अपने सपने, 
भूल आया संसार विगत मैं,
स्वार्थ रूप सब स्वर्ग सिधारे, 
हेतु तुम्हारे प्रियतम प्यारे ।।१।।

बन्धन को सम्मान दिलाने, 
मन की बागडोर मैं थामे,
तज कर नयनों की चंचलता, 
नयी जीवनी प्रस्तुत करता,
निर्मित की जो निष्कर्षों से, 
अर्पित तुम पर पूर्ण रूप से,
तुम पर ही आधार हमारे, 
हेतु तुम्हारे प्रियतम प्यारे ।।२।।

नये पंथ पर लाया जीवन, 
देखो कुछ खो आया जीवन,
सहज नया एक रूप बनाकर, 
बीता सकुशल, उसे बिताकर,
स्वागत का एक थाल सजाये, 
आशाआें का दीप जलाये,
अपना सब कुछ तुम पर वारे, 
हेतु तुम्हारे प्रियतम प्यारे ।।३।।

26.4.15

आस कैसी

सोचता हूँ सहज होकर,
भावना से रहित होकर,
अपेक्षित संसार से क्या ?
हेतु किस मैं जी रहा हूँ ?

भले ही समझाऊँ कितना,
पर हृदय में प्रश्न उठता,
किन सुखों की आस में फिर,
वेदना-विष पी रहा हूँ ?

19.4.15

जीवन और मैं

समय का भण्डार जीवन,
कर्म का आगार जीवन,
व्यक्तियों की विविधता में,
बुद्धि का व्यापार जीवन ।

समय की निर्बाध तृष्णा,
काटती रहती बराबर,
शान्त होती मनस द्वारा,
कर्म का आधार पाकर ।

समय के निर्वाह का यह बोझ नित बढता गया,
मैं विकल्पों में उलझता कर्मक्रम चुनता गया,
नहीं कोई दिशा पायी, न कोई उद्देश्य लक्षित,
पथ भ्रमित एक जीवनी का जाल सा बुनता गया ।

उन प्रयत्नों का अधिक, उपयोग लेकिन कुछ नहीं था,
समय का निर्वाह केवल, सार संचित कुछ नहीं था,
इस निरर्थक सूत्र को तुम, जीवनी से व्यक्त कर दो,
व्यर्थ इस व्यापार में पर, लब्ध मुझको कुछ नहीं था ।

12.4.15

उलझी लट सुलझा दो

मन की उलझी लट सुलझा दो,
मेरे प्यारे प्रेम सरोवर ।
लुप्त दृष्टि से पथ, दिखला दो,
स्वप्नशील दर्शन झिंझोड़कर ।।१।।

ढूढ़ा था, वह लुप्त हो गया,
जागृत था, वह सुप्त हो गया ।
मार्ग विचारों को दिखला दो,
मन की उलझी लट सुलझा दो ।।२।।

कागज पर कुछ रेखायें थीं,
मूर्ति उभरने को उत्सुक थी ।
बना अधूरा चित्र बना दो,
मन की उलझी लट सुलझा दो ।।३।।

समय बिताने जीवन बीता,
कक्ष अनुभवों का था रीता ।
प्रश्नों के उत्तर बतला दो,
मन की उलझी लट सुलझा दो ।।४।।

मेरे प्यारे प्रेम सरोवर,
अनुयायी पर कृपा-हस्त धर ।
प्रेम, दया के दीप जला दो,
मन की उलझी लट सुलझा दो ।।५।।

5.4.15

रात्रि विरहणा, दिन भरमाये

जगता हूँ, मन खो जाता है,
तुम्हे ढूढ़ने को जाता है ।
सोऊँ, नींद नहीं आ पाती,
तेरे स्वप्नों में खो जाती ।
ध्यान कहीं भी लग न पाये,
रात्रि विरहणा, दिन भरमाये ।।१।।

जीवन स्थिर, आते हैं क्षण,
बह जाते, कुछ नहीं नियन्त्रण ।
जीवन निष्क्रिय, सुप्त चेतना,
उठती बारम्बार वेदना ।
कहीं कोई आश्रय पा जाये,
रात्रि विरहणा, दिन भरमाये ।।२।।

क्यों पीड़ा, यह ज्ञात मुझे है,
तेरा जाना याद मुझे है ।
किन्तु नहीं जब तक तुम आती,
दिखती नहीं ज्ञान की बाती ।
तेरी यादों में छिप जाये,
रात्रि विरहणा, दिन भरमाये ।।३।।

था स्वतन्त्र, फिर क्यों मेरा मन,
तुम पर अन्तहीन अवलम्बन ।
कैसे प्रबल प्रगाढ़ हुआ था,
तुमसे अंगीकार हुआ था ।
उत्तर तुम बिन कौन बताये,
रात्रि विरहणा, दिन भरमाये ।।४।।

29.3.15

दुख-पतझड़

जीवन पथ पर एक सुखद भोर, ले आई पवन मलयज, शीतल,
अनुभव की स्मृति छोड़ गयी, एक भाव सहज, मधुमय, चंचल ।
निश्चय ही मन के भावों में, सावन के झोंके आये हैं ।
अब तक सारे दुख के पतझड़, पर हमने कहाँ बितायें हैं ।।१।।

जीवन पाये निश्चिन्त शयन, लोरी गाकर सुख चला गया,
उद्विग्न विचारों की ज्वाला, स्पर्श किया और बुझा गया ।
निसन्देह आगन्तुक ने, कई राग सुरीले गाये हैं ।
अब तक सारे दुख के पतझड़, पर हमने कहाँ बितायें हैं ।।२।।

मन बसती अनुभूति सुखद है, क्लान्त हृदय को शान्ति मिली,
तम शासित व्यवहार पराजित, मन में सुख की धूप खिली ।
माना उत्सव की वेला है, कुछ स्वप्न सलोने भाये हैं ।
अब तक सारे दुख के पतझड़, पर हमने कहाँ बितायें हैं ।।३।।

कर्म सफल, मन में लहरों का, सुखद ज्वार उठ जाता है,
अति लघुजीवी हैं सुख समस्त, फिर भी जीवन बल पाता है ।
हम जीवन के गलियारों में, ऐसी ही आस लगायें हैं ।
क्या अन्तर, दुख के पतझड़, यदि हमने नहीं बितायें हैं ।।४।।

हम सुख पाते या दुख पाते, पर विजय काल की होती है,
सच मानो अपनी कर्म-तरी, उसके ही निर्णय ढोती है ।
हमने पर कठिन परिस्थिति में भी जीवन-दीप जलाये हैं ।
सह लेंगे सारे दुख-पतझड़, जो हमने नहीं बितायें हैं ।।५।।

22.3.15

आशान्वित मन

आशाओं से संचारित मन,
करने की कुछ चाह हृदय में ।
स्वप्नों से कुछ दूर अवस्थित,
अब जीवन को पाया हमने ।।१।।

स्थिर है मन संकल्पों में,
लगा विकल्पों का भ्रम छटने ।
वर्षों से श्रमहीन रही जो,
संचित शक्ति उमड़ती मन में ।।२।।

बुद्धि व्यवस्थित और लगा है,
चिन्तन का विस्तार सिमटने ।
विविध विचारों की लड़ियाँ भी,
आज संकलित होती क्रम में ।।३।।

आज कल्पना प्रखर, मुखर है,
रोषित हृदय लगा है रमने ।
आज व्यन्जना पूर्ण रूप से,
कह जाती जो आता मन में ।।४।।

जीवन-दर्शन ज्ञात हो गया,
बहना छूट गया मद-नद में ।
आओ प्रभु स्थान ग्रहण हो,
आमन्त्रित मन के आँगन में ।।५।।

15.3.15

आये तुम

स्वप्न देखने का जीवन में, साहस तो कर बैठे थे ।
आये तुम, पीछे पीछे, देखो स्वप्न और आ जायेंगे ।।१।।

कठिन परिस्थियों में भी, एक किरण दिखी थी आशा की ।
आये तुम, अब हम कष्टों को भी आँख दिखाते जायेंगे ।।२।।

भीड़ भरे आहातों के एक कोने में चुपचाप खड़े ।
आये तुम, मन की बात आज दीवारों से चिल्लायेंगे ।।३।।

सुन्दरतम की बाट जोहते, अब तक जगते रहते थे हम ।
आये तुम, लाये गोद सुखद, हम चुपके से सो जायेंगे ।।४।।

8.3.15

तुम ही

जहाँ देखूँ, दीखता आकार तेरा,
स्वप्न चुप है, कल्पनायें अनमनी हैं ।।१।।

पा रहा हूँ प्रेम, साराबोर होकर,
आज पुलकित रोम, मन में सनसनी है ।।२।।

खिंचा है मन और तुझ पर ही टिका है,
पूछता आकर्ष, मुझमें क्या कमी है ।।३।।

हृदय-तह तक भरा है बस प्रेम तेरा,
जीवनी अनुराग-दलदल में सनी है ।।४।।

अभी तक सुख दे रहा स्पर्श तेरा,
करूँ कुछ भी, तुम्ही में आत्मा रमी है ।।५।।

खोजता हर वाक्य में सौन्दर्य तेरा,
उमड़ती जो याद, अब कविता बनी है ।।६।।

1.3.15

जीवन-सार

नहीं पुष्प में पला, नहीं झरनों की झर झर ज्ञात मुझे,
नहीं कभी भी भाग्य रहा जो सुख सुविधायें आकर दे ।
इच्छायें थी सीमित, सिमटी, मन-दीवारों में पली बढ़ीं,
आशायें शत, आये बसन्त, अस्तित्व-अग्नि शीतल कर दे ।।१।।

शीतल, मन्द बयार हृदय में ठिठुरन लेकर आती है,
तारों की टिमटिम, धुन्धों में जा, चुपके से छिप जाती है ।
रिमझिम वर्षा की बूँदों ने, प्लावित बाँधों को तोड़ दिया,
लहरों की कलकल ना भाती, रह रहकर शोर मचाती है ।।२।।

फिर भी जीवन में कुछ तो है, हम थकने से रह जाते हैं,
भावनायें बहती, हृद धड़के, स्वप्न दिशा दे जाते हैं,
नहीं विजय यदि प्राप्त, हृदय में नीरवता सी छाये क्यों,
संग्रामों में हारे क्षण भी, हौले से थपकाते हैं ।।३ ।।

22.2.15

आज प्रियतम जीवनी में आ रहा है

अकेला उन्मुक्त उड़ना चाहता था,
मेघ सा विस्तृत उमड़ना चाहता था,
स्वतः प्रेरित, दूसरों के अनुभवों को,
स्वयं के अनुरूप गढ़ना चाहता था ।
किन्तु मन किस ओर बढ़ता जा रहा है,
आज प्रियतम जीवनी में आ रहा है । १।

नहीं निर्भरता कभी मैं चाहता था,
मुक्त था मैं, मुक्त रहना चाहता था,
शूल सा चुभता हृदय में तीव्रता से,
यदि कहीं कोई कभी भी बाँधता था।
किन्तु अब तो बँधे रहना भा रहा है,
आज प्रियतम जीवनी में आ रहा है । २।

आत्म-केन्द्रित, स्वयं को पहचानता था,
स्वयं में सीमित जगत मैं मानता था,
आत्म के अस्तित्व को सहजे समेटे,
भीड़ से मैं दूर कोसों भागता था ।
हृदय को पर्याय मिलता जा रहा है,
आज प्रियतम जीवनी में आ रहा है । ३।

व्याप्त नीरवता, किन्तु मैं जागता था,
हृदय में एक धधकता अंगार सा था,
सतत अपने लक्ष्य पर कर दिशा मन की,
मैं अकेला समय के संग भागता था ।
किन्तु अब क्या स्वप्न में बहका रहा है,
आज प्रियतम जीवनी में आ रहा है । ४।

स्वार्थ-कोलाहल निहित हर वाक्य में था,
नहीं कुछ भी व्यक्त करता क्रम हृदय का,
अचम्भी स्तब्धता मन छा गयी जब,
शब्द स्थिर, रिक्त मन अनुभाव से था ।
प्रेम अब अभिव्यक्ति बनकर गा रहा है,
आज प्रियतम जीवनी में आ रहा है । ५।

किन्तु मन में ज्योति टिमटिम जल रही थी,
शान्त श्रद्धा जीवनी में बढ़ रही थी,
चिर प्रतीक्षित भावना से तृप्त करती,
लिपटती, बन बेल हृद में चढ़ रही थी ।
नेत्र में आनन्द सा उतरा रहा है,
आज प्रियतम जीवनी में आ रहा है । ६।

थका मन अब छाँह का सुख पा रहा है,
भावना में डूबना फिर भा रहा है,
मुझे कल की वेदना से मुक्त कर दो,
आज प्रियतम जीवनी में आ रहा है । ७।

15.2.15

मन और जीवन

मैं जीवन बाँधता हूँ और मन से रोज लड़ता हूँ,
लुढ़कता ध्येय से मैं दूर, लेकिन फिर भी चढ़ता हूँ ।
बहुत कारक, विरोधों की हवा अनवरत बहती है,
बचाये स्वयं को, बन आत्मा की आग जलता हूँ ।।

विविधता में जगत की, किन्तु मन हर बार बहलाता,
भुलाता, स्वप्न दिखलाता, छिपाता रूप जीवन का ।
सुलाता नींद में, फिर भी स्वयं का भान होता है,
बढ़ाता हूँ कदम मैं, प्रात को पाने की उत्सुकता ।।

कभी मन साथ होता है,
कभी आघात होता है,
कभी आह्लाद आ जाता,
कभी संताप होता है ।
विकट इस द्वन्द्व में रहना,
सरलता चरमराती है,
हृदय में, किन्तु फिर भी आस,
रह रह टिमटिमाती है ।। 

8.2.15

शिल्पी बन आयी

मेरे मन-भावों की मिट्टी,
राह पड़ी, जाती थी कुचली ।
तेज हवायें, उड़ती, फिरती,
रहे उपेक्षित, दिन भर तपती ।
ऊँचे भवनों बीच एकाकी,
शान्त, प्रतीक्षित रात बिताती ।।१।।

जीवन बढ़ता और एक दिन,
दिया सहारा, प्रत्याशा बिन ।
हृद की छाया, जीवन सम्बल,
देकर ममता का आश्रय-जल ।
ढाली मिट्टी, मूर्ति बनायी,
जीवन में शिल्पी बन आयी ।।२।। 

1.2.15

ढाई आखर

ढाई आखर, सबके लिये ही, अपने अलग अर्थ लिये। सबके लिये जीवन के एक पड़ाव पर, एक अनिवार्य अनुभव, एक स्पष्ट अनुभव। संभवतः उस समय तो नहीं, जिस समय हम ढाई आखर में सिमटे होते हैं, परन्तु वह कालखण्ड बीतने के पश्चात ढाई आखर में डूबते उतराते जीवन की व्यग्रता समझ आती है। हो सकता है कि ढाई आखर का कालखण्ड वर्तमान परिप्रेक्ष्य में बचकाना सा लगे, हो सकता है आप वह सब सोच कर मुस्करा दें, हो सकता है कि वर्तमान पर उसका कुछ भी प्रभाव शेष न हो। पर जब कभी आप अपने आत्मीय क्षणों में बैठते और विचारते होंगे, उस कालखण्ड के भावों की पवित्रता, तीव्रता और समग्रता आपको अचम्भित करती होगी। 

बीती यादों को हृदय से चिपकाये लोग भले ही व्यवहारकुशल न माने जायें, पर भावों का मान रखना भी जीवन्तता और जीवटता के संकेत हैं। जो भाव जीवन पर छाप न छोड़ पाया, वह भाव तो निर्बल ही हार जायेगा। और जब बीते भाव हारने लगते हैं तो जीवन का वर्तमान से विश्वास उठ जाता है। जो बीत गया, उसे जाने देना, यह भाव जीवन को निश्चय ही नवीन बनाये रखता है। बीते भाव जब तक जीवन में अपनी तार्किक निष्पत्ति नहीं पाते हैं, अतृप्त रहते हैं। जब प्रकृति ने हर क्षण का मोल चुकाने की व्यवस्था कर रखी हो तो ढाई आखर का सान्ध्र समय बिना आड़ोलित किये कैसे निकल जायेगा भला?

कुछ व्यक्तित्वों में गोपनीयता का भाव बड़ा गहरा और लम्बे समय तक रहता है। पर यह भी निर्विवादित सत्य है कि गोपनीयता का भाव मन की शान्ति नहीं देता है। अच्छा ही हो कि उसे शीघ्रातिशीघ्र और सम्यक रूप से समझ कर व्यक्त कर दिया जाये। मानवेन्द्र ने इसी व्यग्रता को अपनी पुस्तक 'ढाई आखर' के रूप में व्यक्त कर दिया है।

मध्य में मानवेन्द्र
मानवेन्द्र मेरे सहकर्मी हैं, वाराणसी मंडल की संचार और सिग्नल व्यवस्था के लिये पूर्ण रूप से उत्तरदायी। तकनीकी रूप से जितने कुशल इलेक्ट्रॅानिक्स इन्जीनियर हैं, प्रशासक के रूप में उतने ही कुशल कार्य कराने वाले भी। अभिव्यक्ति की विमा भी उतनी ही विकसित मिलेगी, यह तथ्य उनकी पुस्तक पढ़ने के बाद ही पता चला। यद्यपि मानवेन्द्र इस पुस्तक को आत्मकथा नहीं मानते हैं, परन्तु जिस सहजता और गहनता से वह कथाक्रम में आगे बढ़ते हैं, ऐसा लगता है कि सब उनके भीतर छिपा हुआ था, वर्षों से बाहर आने को आतुर, शब्दों के रूप में।

कहानी साकेत की है, सीधा साधा, पढ़ने लिखने वाला साकेत, अध्ययन में श्रमरत और प्रतियोगी परीक्षाओं के कितने भी बड़े व्यवधान पार करने में सक्षम। इन्जीनियरिंग की मोटी पुस्तकों को सहज समझ सकने वाला साकेत ढाई आखर में उलझ जाता है। प्रोफेसरगण अपना सारा ज्ञान उड़ेल देने को आतुर पर साकेत का विश्व ढाई आखर में सिमटा हुआ था, या कहें कि ढाई आखर ने उसे इतना भर रखा था कि उसे कुछ और ग्रहण करने का मन ही नहीं। अपने उस भाव में सिमटा इतना कि भाव भी विधिवत व्यक्त करने में बाधित। जैसे जैसे वर्ष बीतते हैं, मन सुलझने के स्थान पर और उलझता जाता है, नित निष्कर्षों की आस में, नित भावों के संस्पर्श की प्यास में।

स्थान छूट जाता है पर ध्यान नहीं छूटता है, ढाई आखर का आधार नहीं छूटता है। अधर पड़े जीवन में व्यग्रतापूर्ण आस सतत बनी ही रहती है। व्यवहार में सहज पर मन में असहज, कुछ ऐसा ही संपर्क बना रहता है। मस्तिष्क के क्षेत्र में सब लब्ध पर हृदयक्षेत्र में स्तब्ध, साकेत को समय तौलता रहता है, हर दिन, जब भी अपने आप में उतरता है।

एकान्त का निर्वात कभी छिपता नहीं है, औरों को दिख ही जाता है। उसे छिपाने के प्रयास में साकेत उसे और विस्तारित करता रहा, कभी हास्य से, कभी कठोरता से। साकेत बाधित रहे, पर और तो बाधित नहीं हैं। आईईएस के प्रशिक्षण के समय ऐसा ही एक घटनाक्रम खुलता है। लुप्तप्राय औऱ लब्धप्राय के बीच का द्वन्द्व। तन्तु खिंचते हैं, उलझते हैं, टूटते हैं। पता नहीं साकेत क्या निर्णय लेगा और किस आधार पर लेगा?

सब साकेत जैसे हो न पायें, सोच न पायें, पर उस प्रक्रिया से सब होकर जाते हैं। एक साकेत ने अपनी कहानी सुना दी, आप पढ़िये और अपने साकेत को भी पढ़ाइये। हो सके तो उसे स्वयं को व्यक्त करने के लिये प्रेरित भी कीजिये।

(पुस्तक इस लिंक पर उपलब्ध है)

25.1.15

स्वपीड़न

कोई कष्ट देता, सहजता से सहते,
पीड़ा तो होती, पर आँसू न बहते ।

कर्कश स्वरों में भी, सुनते थे सरगम,
मन की उमंगों में चलते रहे हम ।

कभी, किन्तु जीवन को प्रतिकूल पाया,
स्वयं पर प्रथम प्रश्न मैंने लगाया,
द्वन्द्वों के कइयों पाले बना कर,
तर्कों, विवादों में जीवन सजा कर,
लड़ता रहा और थकता रहा मैं,
स्वयं से अधिक दूर बढ़ता रहा मैं ।

बना शत्रु अपना, करूँ क्या निवारण,
स्वयं को रुलाता रहा मैं अकारण ।