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4.9.21

जो दिखता हूँ, वह लिखता हूँ

 

मैंने कविता के शब्दों से व्यक्तित्वों को पढ़ कर समझा ।

छन्दों के तारतम्य, गति, लय से जीवन को गढ़ कर समझा ।

यदि दूर दूर रह कर चलती, शब्दों और भावों की भाषा,

यदि नहीं प्रभावी हो पाती जीवन में कविता की आशा ।

तो कविता मेरा हित करती या मैं कविता के हित का हूँ ?

जो दिखता हूँ, वह लिखता हूँ ।

 

सच नहीं बता पाती, झुठलाती, जब भी कविता डोली है,

शब्दों का बस आना जाना, बन बीती व्यर्थ ठिठोली है ।

फिर भी प्रयत्न रहता मेरा, मन मेरा शब्दों में उतरे,

जब भी कविता पढ़ूँ हृदय में भावों की आकृति उभरे ।

भाव सरल हों फिर भी बहुधा, शब्द-पाश में बँधता हूँ ।

जो दिखता हूँ, वह लिखता हूँ ।

 

यह हो सकता है कूद पड़ूँ, मैं चित्र बनाने पहले ही,

हों रंग नहीं, हों चित्र कठिन, हों आकृति कुछ कुछ धुंधली सी ।

फिर भी धीरे धीरे जितना सम्भव होता है, बढ़ता हूँ,

भाव परिष्कृत हो आते हैं, जब भी उनसे लड़ता हूँ ।

यदि कहीं भटकता राहों में, मैं समय रोक कर रुकता हूँ,

जो दिखता हूँ, वह लिखता हूँ ।

 

मन में जो भी तूफान उठे, भावों के व्यग्र उफान उठे,

पीड़ा को पीकर शब्दों ने ही साध लिये सब भाव कहे ।

ना कभी कृत्रिम मन-भाव मनोहारी कर पाया जीवित मैं,

जो दिखा लिखा निस्पृह होकर, कर नहीं सका कुछ सीमित मैं ।

अपनी शर्तों पर व्यक्त हुआ, अपनी शर्तों पर छिपता हूँ

जो दिखता हूँ, वह लिखता हूँ ।

22.5.21

दायित्वबोध

 

निभाने थे दायित्व, सर पर खड़े हो,

हर पल मुझे क्यों धिक्कारते हो ।

कटुता की बेड़ी में मुझको जकड़ कर,

संशय की कारा में क्यों डालते हो ।।१।।

 

विवादों के घेरे में जीवन खड़ा कर,

विषादों के रथ पर चला जा रहा हूँ ।

है निष्फल अभी पूछना प्रश्न मुझसे,

हूँ निष्क्रिय, स्वयं से छिपा जा रहा हूँ ।।२।।


रहे अन्य कारण, विवशता प्रखर थी

नहीं कर सका, जो संजोया हृदय ने।

बड़ी चाह, ऊर्जा प्रयासों में ढाली,

नहीं स्वप्न वैसा पिरोया समय ने ।।३।।


नहीं आज वैसा जो चाहा कभी था,

नहीं आज मन में अथक तीक्ष्णता है।

प्रस्तर बड़े और जूझी विकट पर,

धारा विपथगा, अपरिचित कथा है ।।४।।


रहूँ भुक्त कब तक, मुझे मुक्त होना,

खड़ा बद्ध कब से, स्वयं पाश डाले।

पुनः ऊर्ध्व आता, पुनः डूबता हूँ,

मुझे इस भँवर से कोई तो निकाले ।।५।।


24.12.17

शक्ति बिना उत्सव सब फीके

रस की चाह प्रबल, घट रीते,
शक्ति बिना उत्सव सब फीके।

सबने चाहा, एक व्यवस्था, सुदृढ़ अवस्था, संस्थापित हो,
सबने चाहा, स्वार्थ मुक्त जन, संवेदित मन, अनुनादित हो,
सबने चाहा, जी लें जी भर, हृदय पूर्ण भर, अह्लादित हों,
सबने चाहा, सर्व सुरक्षा,  शुभतर इच्छा, आच्छादित हो।

चाह सभी की फलित नहीं क्यों,
रचित कल्पना छलित रही क्यों,
सबका सुख बिसराया किसने,
दर्शन निम्न सुझाया किसने,
दर्शक मूढ़ित, मूक रहे क्यों,
जगचित्रण विद्रूप सहे क्यों,
क्यों प्रत्युत्तर भय में बीते,
शक्ति बिना उत्सव सब फीके।

मदमत गज, रज पथ उड़ती है, 
अंधड़ गढ़ लघुता बढ़ती है,
दिनकर प्रखर, धरा वंचित है,
रक्त लालिमा नभ रंजित है,
जब तक न स्थापित बलवत,
तब तक न्याय रहेगा तमवत,
सत्य त्यक्त, असमंजस जीते,
शक्ति बिना उत्सव सब फीके।

शक्ति शान्ति स्थापित कर दे,
और व्यवस्था में बल भर दे,
किन्तु स्वयं स्वच्छन्द बनी पर,
न बिखेर दे संयोजित घर,
शक्ति साधनी आवश्यक हो,
तड़ित तरंगा बाँध सके जो,
तब सम्हले आकार मही के,
शक्ति बिना उत्सव सब फीके।

एक शक्ति पसरी शासन की,
एक शक्ति संचित जनमन की,
एक क्षरित, दूजी उच्श्रंखल,
डटी नहीं यदि, दोनों निष्फल,
निष्कंटकता पनप न पाये,
साझा प्रायोजन बन जाये,
साम्य प्रयुक्ता सृजन सभी के,
शक्ति बिना उत्सव सब फीके।

शक्तिदत्त अधिकार अभीप्सित,
जन प्रबद्ध आकार प्रतीक्षित, 
जीवन धारा सतत प्रवाहित,
एक व्यवस्था, सर्व समाहित,
बन ऊर्जा जन-तन-मन भरती,
सूर्य सभी का, सबकी धरती,
रस वांछित पायें सब हिय के,
शक्ति बिना उत्सव सब फीके।

28.1.17

सबके अपने युद्ध अकेले

सबके अपने युद्ध अकेले,
और स्वयं ही 
लड़ने पड़ते, 
सहने पड़ते, 
कहने पड़ते,
करने पड़ते,
वह सब कुछ भी,
जो न चाहे कभी अन्यथा।

कल कल जल भी जीवट होकर,
ठेल ठेल कर, काट काट कर,
पाषाणों को सतत, निरन्तर,
तटबन्धों को तार तार कर,
अपनी गति में, अपनी मति में,
जूझा भिड़ता,  निर्मम क्षति में,
लय अपनी वह पा लेता है, मार्ग हुये जब रूद्ध अकेले,
सबके अपने युद्ध अकेले।

प्रस्तुत सब सुविधायें सम्मुख, 
प्राप्य परिधिगत, आकंठित सुख,
फिर भी लगता छूटा छूटा,
नहीं व्यवस्थित, टूटा टूटा,
प्रश्नों के निर्बाध सृजन में
भीतर बाहर बीहड़ वन में,
उत्तर के उत्कर्ष ढूँढते, फिरते रहते बुद्ध अकेले।
सबके अपने युद्ध अकेले।

क्या जाने, क्या चुभ जाये मन,
किन अंगों से फूटे क्रंदन,
चित्त धरा क्या, मन की ठानी,
रिस रिस बहती कौन कहानी,
सामर्थ्यों को लाँघे जाता,
लघुता को अभिमान दिलाता,
बीस बरस तक पत्थर तोड़े, दशरथ माँझी क्रुद्ध अकेले।
सबके अपने युद्ध अकेले।

कहने को तो जगत वृहद है,
परिचित पंथी, साथ सुखद है,
दिन ढलता जब, रात अवतरित,
भाषा निर्बल, शब्द संकुचित,
मन के संग रहना पड़ता है,
अपने को सहना पड़ता है,
काम क्रोध ईर्ष्या मद नद में , होना सबको शुद्ध अकेले।
सबके अपने युद्ध अकेले।

21.12.16

मित्र हो मन

कब बनोगे मित्र, कह दो, शत्रुवत हो आज मन,
काम का अनुराग तजकर, क्रोध को कर त्याग मन,
दूर कब तक कर सकोगे, लोभ-अर्जित पाप मन,
और कब दोगे तिलांजलि, मोह-ऊर्जित ताप मन,
अभी भी निष्कंट घूमो, भाग्य, यश विकराल-मद में,
प्रेमजल कब लुटाओगे, तोड़ ईर्ष्या-श्राप मन ।

कब तृषा के पन्थ में विश्राम होगा,
कब हृदय की टीस का क्रम शान्त होगा,
कब रुकेंगी स्वप्न की अविराम लहरें,
और कब यह दूर मिथ्या-मान होगा ।

शत्रुवत उन्मत्त मन की, यातना न सही जाती ।
आँख में छलकी, करुण सी याचना है, बही जाती ।।

18.12.16

भान मुझको, सत्य क्या है

भान मुझको सत्य क्या है ?
सतत सुख का तत्व क्या है ?

किन्तु सुखक्रम से रहित हूँ,
काल के भ्रम से छलित हूँ,
मुक्ति की इच्छा समेटे,
भुक्ति को विधिवत लपेटे,
क्षुब्धता से तीक्ष्ण पीड़ित,
क्यों बँधा हूँ, क्यों दुखी हूँ ?

डगमगाते पैर क्यों हैं,
डबडबाती दृष्टि क्यों है,
राह सामने दीखती है,
क्रुद्ध होकर चीखती है,
बुद्धि का मत छोड़कर क्यों,
अंध मन-पथ जा रहा हूँ ।।

कठिन है यूँ रुद्ध जीना,
बद्ध पीड़ा, पर कही ना,
सौम्यता के आवरण में,
नित प्रवर्धित जाल मन में,
शब्द कैसे सी सकूँगा,
शान्त कैसे जी सकूँगा ।।

व्यक्त मुख पर कृत्रिमता है,
स्वार्थपूरित मृगतृषा है,
मैं अकेला भटकता हूँ,
प्रेम क्षण-कण ढूँढ़ता हूँ ।
कौन जाने, और कब तक,
सहज होगा चित्त मेरा ।।

नहीं वश में, व्यक्त क्या है ?
भान फिर भी, सत्य क्या है ?

30.11.16

लिली पाण्डेय

लिली रेलवे बोर्ड में वरिष्ठ अधिकारी हैं और कार्मिक विभाग का उत्तरदायित्व वहन कर रही हैं।बंगलुरु में उनके साथ कार्य करने का सौभाग्य मिला है। कला और साहित्य में रुचि है। रेलवे में कला के विषय पर ‘सफर” नाम की पुस्तिका की सहलेखिका भी रही हैं। उसी के आगामी अंक के लिये लिली ने एक कविता लिखी थी। पढ़ने को दी, बहुत अच्छी लगी, गुनगुनायी और हिन्दी में अनुवाद कर दी। शाब्दिक के स्थान पर भावानुवाद किया है। आप भी पढ़ें।

Whirl of wheels
Setting in motion the celestial machinery
Turning to infinity, to eternity
An epic adventure beyond 
Beginnings & denouement 
Spinning a universe of words, forms and shapes
A cadence of dervishes
The dance of Shiva
Spasm of creation ..

~ Lily Pandeya

अथ कालचक्र निःश्वास नाद,
बढ़ता गतिमय वैश्विक प्रमाद,
शाश्वत, अनंत, 
निर्बन्ध छन्द,
आगत स्वागत, सब मार्ग सुप्त,
यात्रा अनादि, संहारमुक्त
शब्दों, आकृति आकारों में 
जग घूर्ण पूर्ण विस्तारों में
दरवेशी तालों पर विशेष
नर्तन नवनूतन शिवप्रवेश
घनघुमड़ उमड़ती सृष्टिशेष


भावानुवाद - प्रवीण पाण्डेय

लिली के साथ, बीजिंग में

12.6.16

कविता का कालबन्ध

पिछले दो वर्षों में मुख्यतः कविता ही लिखीं, वह भी परस्पर असंबद्ध विषयों पर। कभी उत्साह की आस, कभी दर्शन की नीरवता, कभी तथ्यों की चोट, कभी बिखरे भावों को समेटने का प्रयास, कभी कुछ न कह सकने की टीस और कभी अभिव्यक्ति को ढूँढ़ लाने का उपक्रम। जब स्वयं से बात करने का समय घट जाता है तो ऐसे ही फुटकर बातें होती हैं। शब्द भी नहीं मिलते हैं, वाक्य पूरा करने के लिये। भाव अपना सत्य आधा व्यक्त करते हैं और आधा छिपा ले जाते हैं, संभवतः यह सोचकर कि पाठक उसे बीज रूप में समेट कर भाषा का समुचित विस्तार दे देगा और ठीक वैसा ही समझ लेगा जैसा भाव मन में प्रस्फुटित हुआ है।

किन्तु वैसा होता नहीं है, जैसा सोचा होता है। कवितायें अपनी ही कह जाती हैं, जो मन में आता है, वह लिखवा जाती हैं। पढ़ने वाले से संवाद होना या आंशिक होना या न होना, सब इस बात पर निर्भर करता है कि पाठक भी व्यक्त मनस्थिति से कितना परिचित है। यदि ऐसा नहीं है तो कविता असंप्रेषणीय शब्दों का एक समुच्चय बनी अपनी लघुता में भी ऐंठती रहती है।

जब कार्य कम शब्दों में होने लगता है तो मन भी आलस्य में उतरा जाता है। हमारे पूर्वजों और महान ऋषियों ने ज्ञान को संजोने के लिये सूत्र की विधा विकसित की थी। जब एक शब्द भी अतिरिक्त न हो और सारी बात कह भी दी जाये तो अभिव्यक्ति जिस रूप में निकलती है, उसे सूत्र कहते हैं। योगसूत्र, ब्रह्मसूत्र आदि इसी उत्कृष्टता के साक्षात प्रमाण हैं। उनके इस प्रयास में आलस्य नहीं वरन गहन विस्तार को संश्लेषित किये जाने में लगा परिश्रम था, चिन्तन का गहराव और विषय की पूर्ण समझ थी। यदि पतंजलि योगसूत्र के प्रथम चार सूत्रों में विषय को पूर्ण स्पष्ट करने की क्षमता रखते हैं तो वह उनकी अद्भुत मेधा का परिचायक है। मेरे द्वारा अभिव्यक्त कविता की चार पंक्तियाँ मेरे गहराये आलस्य और मन में उमड़ते समग्रभाव के शतांश से अधिक कुछ भी नहीं  है।

समय न मिल पाना, किसी एक विषय में चित्त को ध्यानस्थ न कर पाना और आलस्य की इसी स्थिति ने कविता को प्रधानता दे दी। पहले अध्ययन किये हुये विषयों पर लिखना अच्छा लगता था, मन को संतुष्टि मिलती थी। धीरे धीरे गद्य के स्थान पर कविता आती गयी, नयी कविताओं के सृजन के स्थान पर संचित कवितायें जाने लगीं, सप्ताह में दो ब्लाग के स्थान पर एक ही पर संतोष करना पड़ा और धीरे धीरे नियत समय में कुछ न लिख पाने के कारण उस पर भी २-३ दिन का विलम्ब होने लगा।

यदि सृजनशीलता शान्ति से लिखना जानती है तो वह अन्तःकरण को इस आलस्य के लिये झकझोरना भी जानती है। झकझोरना और भी तीव्रता से होता है जब समयाभाव का कारण भी समाप्त हो गया हो। अब तो मन अस्थिरता और आलस्य ही कारण बचे, समुचित न लिख पाने के। लिखने के लिये पढ़ना पड़ता था, तथ्यों और विचारों को समझना पड़ता है। न लिखने से आत्मोन्नति का प्रवाह रुद्ध सा हो गया, इस कालखण्ड में। 

मन से जूझने का कौन सा उपाय है जो मानव न अपनाता हो। कार्य को न कर सकने के ढेरों कारण लाकर रख देगा आपका मन आपके सामने। आपका मन आपको ही भ्रम में डालने के लिये तत्पर है।

अन्तः कुछ कहने को आतुर है। न जाने कितने ऐसे विषय हैं जिन पर विचारों ने परिश्रम किया है,  न जाने कितनी उलझने सुलझी हैं, सरलता के न जाने कितने समतल देखे हैं, जीवन में कितना कुछ घटा है पिछले दो वर्षों में। संवादहीनता निश्चय ही नहीं रही है पर मन के बादल जमकर नहीं बरसे हैं। दो वर्ष की प्रतीक्षा के पश्चात, इस वर्ष का मानसून भी आशा से अधिक आने की संभावना है। प्लावित मन निश्चय ही कविता के कालबन्ध से बाहर निकलेगा।

5.6.16

समय-यज्ञ

वचन है यह सत्यता को,
जिस दिशा में सोचता हूँ,
उन पथों को छोड़कर मैं,
एक पग भी ना चलूँगा ।।१।।

बहुत सोचा और विचारा,
एक बस निष्कर्ष लक्षित,
उस दिशा में दृष्टिगत हो,
पंथ मेरे चल पड़ेंगे ।।२।।

अब समय के यज्ञ में,
आहुति चढ़ाता जाऊँगा मैं,
अब विगत-उपयोगिता,
चिन्तन भी करना व्यर्थ है ।।३।।

29.5.16

चक्रव्यूह अनुकूल नहीं अब

भौतिकता में क्यों अटका है?
मार्ग जटिल ही क्यों तकता है?
स्वप्निल मनवा जागेगा कब?
चक्रव्यूह अनुकूल नहीं अब,

झेल चुका, अब बहुत हो गया,
जागृत संचितधर्म सो गया ।
जीवन के हर द्वारे द्वारे,
जयद्रथ जैसे शत्रु आज सब ।
चक्रव्यूह अनुकूल नहीं अब ।।

पार्थ-पुत्र तू नहीं प्रलयंकर,
प्राप्त नहीं हैं तुझे विजयशर ।
अस्तित्वों के युद्ध निरन्तर,
खीखें व्यूह भेदना हम कब ।
चक्रव्यूह अनुकूल नहीं अब ।।

अन्दर सुख है शेष व्यर्थ है,
अन्तरतम की बलि निरर्थ है ।
चक्रव्यूह के अग्निकुण्ड में,
भौतिकता ही दान करो अब ।
स्वप्निल मनवा जागेगा कब?

22.5.16

विचारों में दावानल

कह दूँ यदि मन की अभिलाषा,
मन मेरा अब तक क्यों प्यासा,
अर्धनग्न कई सत्य छिपाये, हृद आक्रोशित रहता था ।
होठों पर थी हँसी, विचारों में दावानल बहता था । १।

कह दूँ क्यों अकुलाता था मैं,
शब्दों को पी जाता था मैं,
संयम के वश, मन के जलते भाव छिपाये रहता था ।
होठों पर थी हँसी, विचारों में दावानल बहता था । २।

देख रहा हूँ शान्त, अकेला,
व्यक्तित्वों का जड़वत मेला,
इसी काष्ठ से, जीवन भर की आस लगाये रहता था ।
होठों पर थी हँसी, विचारों में दावानल बहता था । ३।


15.5.16

एकान्त-मन

आज  एकान्त में बढ़ती विवशता,
सदा खालीपन सताता है समय का ।

मन अभी भी बाल्य मेरा,
व्यस्तता का पा खिलौना ।
विषय की भी रिक्तता में,
खेलता रहता मगन हो ।।

नहीं आवश्यक इसे आधार चिन्तन का,
और न सूझे इसे व्यवहार जीवन का ।
यह बढ़ा देता कदम, बस सहजता का सार पाकर,
जिस दिशा में इसे केवल भीड़ का विस्तार दिखता ।।

किन्तु जब होता अकेला,
नहीं कोई राह दिखती ।
शान्ति में है छटपटाता,
भीड़ की आदत पड़ी है ।।

वाह्य निर्भरता भुलाने,
आत्मगत मन चाहता हूँ ।
आश्रय पथ छोड़ सब मैं,
स्वयं जीना चाहता हूँ ।।

8.5.16

सौन्दर्य तेरा

जब खड़ा सौन्दर्य तेरा, मुस्करा करता इशारे,
कल्पनायें रूप की टिकती नहीं हैं, हार जातीं ।
रूप से तेरे सुनयना, विकल होकर प्राण सारे,
हैं तड़पते, काश अब तो प्यार की बरसात आती ।।१।।

दृष्टि से छूकर मुझे, जब नयन दो तेरे निकलते,
छूटते दो बाण मानो प्रेम के गाण्डीव से ।
बिद्ध होकर प्राण मेरे, हर समय रहते तड़पते,
हो सके उपचार अब तो तेरे ही स्पर्श से ।।२।।

रूप का यूँ खिलखिलाना प्रेम की भोली दशा पे,
उठ रही शाश्वत तरंगें अब हृदय में प्रेम की ।
बज उठा संगीत मन में, प्रेम की नव आस से,
गूँजती हैं धुनें अब तो, अनवरत ही प्यार की ।।३।।


1.5.16

उद्वेग

अकेले बैठता हूँ, तो विचारों के बवंडर, शान्त मन को घेर लेते हैं ।
मैं कितना जूझता हूँ, किन्तु फिर डूबता हूँ, मैं निराशा की नदी में ।
अगर मैं छोड़ता हूँ, स्वयं को मन के सहारे, आत्म का अस्तित्व खोता हूँ ।
कभी कुछ सोचता हूँ, शीघ्र छिप जाती समस्या, पर विवादों के प्रवाहों में ।।

करूँ क्या मैं, कहूँ कैसे, और किसको ही बता दूँ ।
और कैसे हृदय के उद्वेग को निश्चित दिशा दूँ ।।

न जाने क्यों जो स्थिर था, वही विश्वास हिलता है ।
मुझे क्यों हर तरफ ही विरह का विस्तार दिखता है ।।


24.4.16

मातृ-श्रृंगार

टूटने पाये न संस्कृति,
टूटने पाये न गरिमा ।
काल है यह संक्रमण का,
प्रिय सदा यह याद रखना ।।

वृहद था आधार जिसका,
वृक्ष अब वह कट रहा है ।
प्रेम का विस्तार भी अब,
स्वार्थरत हो बट रहा है ।।

चमकती थी कान्ति की 
आभा सतत माँ के नयन से ।
आज फिर वह चमक सारी,
विमुख क्यों है उन्नयन से ।।

आओ माँ का रूप मित्रों,
करें गौरव से सुसज्जित।
नियम माँ के, जो सनातन,
काल चरणों में समर्पित ।।

शत्रुता अपनी भुलाकर,
रक्त का रंग संघनित हो ।
पूर्व की अवहेलना अब,
अडिग अनुशासन जनित हो ।।

आज मिल आग्रह करें, 
यह चाह जीवन की बता दें,
मातृ का श्रृंगार करके,
सार्थक जीवन बिता दें ।

17.4.16

गन्तव्य

जीवन की अनचीन्ही राहें,
पार किये कितने चौराहे ।
फिर भी जाने क्यों उलझन में,
मैं पंछी अनभिज्ञ दिशा से ।।१।।

रोचक है, हर राह नयी जो,
उत्सुकता की बहती धारा ।
किन्तु सदा ही मौन प्रश्न पर,
पूछो क्या गन्तव्य हमारा ।।२।।


10.4.16

मन-राक्षस

दुनिया,
कुछ अधखुली मस्तिष्क-पटल पर,
करती है हर काम अपनी धुन पर ।
कुछ भी हो,
मैं भी हूँ दुनिया,
और प्राप्त हैं सारे अधिकार,
मानवीय, दैवीय, राक्षसीय आदि ।
आखिर हों भी क्यों न,
मैं भी उस धरती का पुत्र,
जिसने जन्म दिया कुछ राक्षसों को,
उनके लिये अवतरित किया,
भगवान को ।
लड़ाई हुयी और विजय मिली,
सत्य को ।

शायद कभी कभी ऐसा ही युद्ध होता है,
मेरे मन की पर्तों में ।
शायद बाहरी राक्षस,
विजय पाना चाहते हों,
मन के देवता पर,
क्योंकि मन तो निर्मल है ।
और यदि होती है हार,
तो विजय पाकर राक्षस,
मन को करता दूषित, बेकार,
और इस तरह,
निर्माण होता है, एक नये राक्षस का ।
वह भी अपनी धुन में सवार,
आक्रमण हेतु खोजता है शिकार ।

3.4.16

संस्कृति

गूँजतीं हैं प्रतिध्वनियाँ,
वेद की शाश्वत ऋचायें,
अनवरत बहती रहेंगी,
वृहद संस्कृति की विधायें ।।

आज कुछ राक्षस घिनौने,
भ्रमों के आधार लेकर,
युगों के निर्मित भवन को,
ध्वस्त करना चाहते हैं ।।

यदि विचारा, यह धरातल तोड़ दोगे,
सत्य मानो कल्पना छलती तुम्हें है ।
ध्वंस का विश्वास मरकर ही रहा है,
वह जिया यदि, मात्र स्वप्नों के भवन में ।।

व्यर्थ की हठधर्मिता को,
कहीं जीवन में उतारा,
लिये हमने मातृ रक्षा के वचन हैं,
रही संचित वीरता की पूर्व गरिमा ।

रक्त का आवेश अन्दर से उठेगा,
और फूटेगा हृदय से अनल जीवट,
प्रबल विष में उफनते आघात होंगे,
जो करेंगे भस्म अनुचित गर्व तेरा ।

काल के विस्तृत पटल पर,
हैं विजय के शब्द अंकित ।

27.3.16

तेरा जीवन

तूने अपना जीवन यदि,
शब्दों में डाला, निष्फल है ।
जीवन तो तेरा वह होगा,
जो शब्दों की उत्पत्ति बने ।।१।।

आदर्शों की राह पकड़ कर,
चलते जाना कठिन नहीं है ।
लेकिन तेरे पदचिन्हों से,
यदि राह बने तो बात बने ।।२।।

प्राणार्पण भी श्रेयस्कर है,
निर्भरता यदि आधार बने ।
तेजयुक्त जीवन तेरा,
अर्जित सुख का आधार बने ।।३।।

20.3.16

चकित हूँ

घिर रहे आनन्द के कुछ मेघ नूतन,
सकल वातावरण शीतल हो रहा था ।
पक्षियों के कलरवों का मधुर गुञ्जन,
अत्यधिक उत्साह उत्सुक हो रहा था ।।

खिल रही थीं आस की नव-कोपलें,
वायु में स्नेह मधुरिम बह रहा था ।
प्रकृति में मेरी समाया अनवरत जो,
हृदय का आनन्द मुख पर खिल रहा था ।।

किन्तु

काल का झोंका कुटिल हा ! पुन आया,
ले गया सब बादलों को संग अपने ।
दुखों का सर्वत्र भीषण अनल छाया,
भूत संचित हृदय में बन व्यग्र सपने ।।

किन्तु सोते मनुज को यह ज्ञान भी है ?
काल का आवेग, ताण्डव नृत्य क्या है ?
बँधा है, असहाय जीवन जी रहा है,
काटने का बन्धनों को कृत्य क्या है ।।

दुख भीषण है, जगत में क्षणिक सुख है,
चकित हूँ, क्योंकि, 
मनुज तो बँधा रहना चाहता है ।।