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16.8.15

संशय

प्रथम दृष्टि में रहे अपरिचित,
मन में कुछ संशय थे संचित,
ना जाने वह कैसा होगा,
बहता था क्रम चिन्ताआें का,
खींचे कल्पित चित्र अनेकों,
जीवन में पाये अनुभव जो,
वही रंग बस भरते जाते,
कल्पित तेरे चित्र बनाते ।।१।।

सोचा बैठे शान्त अकेले,
प्रश्न अनवरत पूछे मन से,
तुम्ही विचारों में आगत थे,
चिन्तन में तुम छाये रहते,
सोचा मन को आश्रय देगा,
आशाआें के साथ बहेगा,
उत्तर से जो लेकर आया,
प्रतिमा में वह रंग चढ़ाया ।।२।।

आये तुम, आश्रय सब आये,
व्यर्थ कल्पना में भरमाये,
थे जितने रंग समेटे,
फीके सब तेरी तुलना में,
मन, जीवन सब तुझ पर मोहित,
संशय, चिन्ता सकल तिरोहित,
प्रेमपूर्ण, अनुराग-निहित हो,
गोद छिपा लो आशाआें को ।।३।।