26.7.15

निर्णय

समय के सोपान पर जब, एक निश्चित जगह आकर,
बुद्धि विकसित, तथ्य दर्शित स्वयं ही होने लगे ।
निज करों में जीवनी की बागडोरें, मैं सम्हाले,
बढ़ चला, जब लोग मुझ पर नियन्त्रण खोने लगे ।।१।।

एक पुस्तक सी खुली थी, कभी जो दुनिया छिपी थी,
जहाँ व्यक्तित्वों भरे अध्याय बाँटे जोहते थे ।
खोल आँखें, सामने तो, दीखती राहें अनेकों,
दृश्य मुझको रोकते थे, खींचते थे, सोहते थे ।।२।।

मनस में आनन्द की मदमस्त कोयल कूजती थी,
सकल जीवन के सुहाने स्वप्न दिन में दीखते थे ।
खड़ा मैं स्वच्छन्दता के भाव में कुछ और गर्वित,
हर तरफ अधिकार के विस्तार ही दिखने लगे थे ।।३।।

अनुभवों के कोष को मैं व्यग्र हो भरने लगा था ।
और अपने निर्णयों को स्वयं ही करने लगा था ।।

(वर्षों पहले लिखी थी, वह भाव पता नहीं, कहाँ चला गया?)

8 comments:

  1. दिनांक 27/07/2015 को आप की इस रचना का लिंक होगा...
    चर्चा मंच[कुलदीप ठाकुर द्वारा प्रस्तुत चर्चा] पर...
    आप भी आयेगा....

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  2. बहुत बढ़िया ! आपका नया आर्टिकल बहुत अच्छा लगा www.gyanipandit.com की और से शुभकामनाये !

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  3. बढिया है...आज भी सामयिक है सो भाव यथावत हैं.

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  4. आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन कारगिल विजय दिवस और ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है। कृपया एक बार आकर हमारा मान ज़रूर बढ़ाएं,,, सादर .... आभार।।

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  5. सही कहा आपने स्वयं ही पांडे जी -- भाव अस्पष्ट एवं अति-दूरस्थ हैं ----और बाँटे जोहते थे , ये बाँटें...क्या है ।

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  6. "जहाँ व्यक्तित्वों भरे अध्याय बाँटे जोहते थे ।" बाँटे से क्या अभिप्राय है? यदि अभिप्राय मार्ग से है तो सिर्फ वाट शब्द का प्रय़ोग और अध्याय के बाद (,) अर्द्धविराम की आवश्यकता होगी।

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  7. भावों से भरी, आज के संदर्भ में भी सही है

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  8. सामयिक / सुन्दर

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