31.8.21

राम का निर्णय (कैकेयी)

 

जो राम के वनगमन के निर्णय को विशुद्ध भावनात्मक मानते हैं, वे राम को पूरा नहीं जानते हैं। पिता का मान रखने के लिये सब त्याग कर वन चले जाना भावनात्मक लग सकता है पर उसके पीछे राम के तर्क, धर्म का ज्ञान, परिस्थिति की समझ, सबको साधने की कला, सब सहने का सामर्थ्य और अद्भुत औदार्य, इन पक्षों को भी विस्मृत नहीं किया जा सकता है।


काल ने राम को संभवतः सर्वाधिक कठिन निर्णय लेने के लिये चुना था। मुझे व्यक्तिगत कष्ट है कि राम वन गये पर राम ने जो मानक निर्धारित किये उससे अधिक संतुलित कुछ भी संभव नहीं था।


राम के वनगमन के निर्णय को समझना है तो उसके लिये पाँच संवाद समझने होंगे। पहला माँ कैकेयी से, दूसरा माँ कौशल्या से, तीसरा लक्ष्मण से, चौथा सीता से और पाँचवा भरत से। इसमें प्रथम चार संवाद वनगमन के पहले हुये थे, भरत के साथ संवाद चित्रकूट में हुआ था। इन पाँचों संवादों में राम के निर्णय के आधार दृष्टिगत होते हैं। इन पाँचों संवादों में राम के व्यक्तित्व के वृहद विस्तार प्रकट होते हैं।


दशरथ से राम का विशेष संवाद नहीं हुआ। पहले तो राम ने दशरथ के न बोलने पर पीड़ामिश्रित आश्चर्य व्यक्त किया पर बाद में उन्हें सान्त्वना के ही वचन कहे। जब सबसे आज्ञा लेकर राम दशरथ के पास पुनः पहुँचे तो दशरथ का शोक न रुक सका और उनकी आत्मग्लानि द्रवित होकर बह चली। उन्होंने राम से स्पष्ट कहा कि हे रघुनन्दन, मैं कैकेयी को दिये वर के कारण मोह में पड़ गया हूँ, तुम मुझे कारागार में डालकर स्वयं ही राजा बन जाओ। दशरथ नहीं चाहते थे कि राम वन जायें पर अन्त में क्या यह कहना उचित था? राम शान्त भाव से उत्तर देते हैं कि न मेरे अन्दर राज्य की इच्छा है, न सुख की, न पृथ्वी की, न भोगों की, न स्वर्ग की। मन में यदि कोई इच्छा है तो यह कि आप सत्यवादी बने रहें, आप मिथ्यावादी न होने पावें। यह मैं शपथ लेता हूँ।


राम की यह शपथ उनकी प्राथमिकताओं को स्पष्ट रूप से वर्णित करती है। सबके ऊपर उन्होंने अपने पिता का मान ही रखा। जिस राजा को उसकी प्रिय पत्नी श्रीहीन कर देती है, अनुनय विनय तक को मान नहीं देती है, उसका हृदय क्षतविक्षत कर देती है, उसको विवश कर देती है कि वह अन्यायपूर्ण निर्णय में अपनी सहमति दे, उसकी मानसिक दुर्गति कर देती है, उस राजा और अपने पिता दशरथ के वचनों को सब सुखों के ऊपर मान देने का उत्कर्ष केवल राम ही कर सकते हैं। पिता पर मिथ्याभाषी होने का लांछन न लगे, क्या मात्र इसी कारण ही राम ने वनगमन का निर्णय लिया? यह निश्चय रूप से एक आधार था पर शेष संवादों में जो भी प्रश्न उठाये गये हैं, वे सब भी नीतिगत और तर्कसंगत थे। राम के उत्तर व्यापक रूप से वनगमन के निर्णय के आधार निर्धारित करते हैं।


कैकेयी से संवाद के बाद ही राम वनगमन का निर्णय ले चुके थे। माँ कौशल्या, भाई लक्ष्मण और पत्नी सीता के साथ हुये संवादों में राम ने अपने निर्णय को स्पष्ट किया है। कई ऐसे पक्ष जो विषय के विश्लेषण में प्रायः अनुत्तरित रह जाते हैं, राम के व्यक्तित्व के कई आयाम जो अन्यथा प्रकट नहीं हो पाते हैं, इन संवादों के माध्यम से समझे जा सकते हैं।


माँ कैकेयी से राम का संवाद स्पष्ट और सीधा था। पिता मुझसे बोलते क्यों नहीं? पिता तो सदा ही मुझे देखकर प्रसन्न होते थे, क्या कुछ अमंगल हुआ है या आपने कोई कठोर वचन बोला है? कैकेयी ने जब कहा कि राजा को सत्यपालन में बाधा आ रही है और उसका कारण तुम हो। तो राम ने लगभग झिड़कते हुये कहा कि देवी तुम्हें धिक्कार है, पिता की प्रतिज्ञा के लिये कौन सा ऐसा कार्य है जो राम नहीं कर सकता? रामो द्विर्नाभिभाषते। राम दो तरह की बात नहीं करता है।


दोनों वरों के बारे में जानकर और समुचित समय लेकर निर्णय ले चुके राम ने बड़े ही सहज स्वर में माँ कैकेयी से कहा। मैं पिता की प्रतिज्ञा के लिये वन जाने को प्रस्तुत हूँ पर यह जानना अवश्य चाहता हूँ कि फिर भी पिता के दुखी होने का क्या कारण है? मुझे प्रसन्नता है और मैं सौभाग्यशाली हूँ कि मेरे लिये मेरी माँ और पिता ने मिलकर एक भविष्य सुनिश्चित किया है। इसमें मेरा हित है। वन में ऋषि मुनियों के सानिध्य में राम का उत्थान ही होगा। मुझे तो अभी भी गुरुवृन्द के साथ धर्मचर्चा सर्वाधिक सुखकारी और हितकारी लगती है। वन जाने में अब तो यह सुख निर्बाध मिलेगा। जब मुझे वनगमन में लेशमात्र भी दुख नहीं दीखता तब पिता के शोक का कारण क्या है, यह मैं समझ नहीं पा रहा हूँ। पिता मुझपर प्रसन्न हो और मुझसे कुछ बोलें। पिता के न बोलने और दुखनिमग्न शिथिल बैठे रहने के क्षण राम को असह्य थे।


राम के इन वचनों ने दशरथ के मन में ग्लानि के असंख्य भाव प्रस्फुटित कर दिये। हे ईश्वर, कहाँ मैं अपने पुत्र को सामान्य नागरिक सा न्याय नहीं दिला पा रहा हूँ और कहाँ राम मेरी प्रतिज्ञा को अपने माथे पर शिरोधार्य कर वन जाने को प्रस्तुत है। दशरथ के मुख से कुछ भी न निकल सका, क्या बोलूँ में राम से? कंठ रुद्ध हो गया, नेत्रों से अश्रुधार और मोटी हो बह चली, सब दृश्य धुँधला गये, सामने बस राम के प्रसन्न मुख के सैकड़ों स्मृतियाँ चलचित्र के समान आने लगे। सहसा वन के भीषण चित्र भी उभर आये, पीड़ा दशरथ के लिये पुनः असहनीय हो गयी। हे राम, हे राम कह कर दशरथ पुनः अर्धचेत हो गये। 


राम ने पिता को आदर के भाव से निहारा और कैकेयी से कहने लगे। पिता मुझसे कम से कम भरत के अभिषेक की बात तो कह सकते थे, वह बात भी पिता ने मुझसे क्यों नहीं कही? मैं भरत के लिये सब छोड़ने को तैयार हूँ। भरत योग्य हैं, धर्मनिष्ठ हैं, नीतिनिपुण है, सबका सम्मान करते हैं, माताओं के प्रति स्नेह रखते हैं, उनके जैसा राजा पाकर अयोध्या धन्य हो जायेगी, रघुकुल गौरवान्वित हो जायेगा। माँ कैकेयी के कुटिल षड्यन्त्र के बाद भी भरत के प्रति राम के स्नेहिल भाव में किञ्चित भी विकार नहीं था। जैसे बचपन की क्रीड़ाओं में राम अपने छोटे भाईयों का मान रखने के लिये जानबूझ कर हार जाते थे, आज राम अपने मुख से भरत की श्रेष्ठता वर्णित कर स्वयं हार रहे थे। दशरथ के अश्रु अब भी रुक नहीं रहे थे।


भ्राता भरत के प्रति अपने प्रेमपूरित भाव व्यक्त कर राम माँ कैकेयी को षड्यन्त्रकारी कुटिला के भाव से उबार कर उन्हें पुनः माँ के आसन में बिठाने के लिये कहते हैं। जैसे मैं पिता का पुत्र हूँ, वैसे आपका भी हूँ। आपको अपने पुत्र पर इतना तो अधिकार था कि आप अपने मन की बात मुझे बुलाकर कह देतीं। मुझे यह बात पीड़ा देती है कि आपने इतनी छोटी सी बात के लिये अपने वर व्यर्थ किये, आपने इतनी छोटी सी बात के लिये पिता को अकारण कष्ट दिया। पिता न जाने शोक के किस भँवर में डूबे हैं। आपको तो आदेश देने का अधिकार था पर आपने यदि इंगित भी कर दिया होता तो मैं स्वयं ही भरत को सिंहासन पर बैठाकर स्वेच्छा से वन चला जाता। 


कैकेयी को राम से इस उत्तर की आशा नहीं थी। पितृभक्ति पर संशय करने पर क्षणिक क्रोध में आये राम इतने संयत हो सब स्वीकार कर लेंगे, इसका लेशमात्र भी अनुमान नहीं था कैकेयी को। राम के संवाद ने सबको मान दिया था। दशरथ को पिता का मान, भरत को भाई का मान और मुझे अपनी माँ से भी बढ़कर मान। राम के औदार्य और आर्जव व्यक्तित्व की वृहदता के सम्मुख वह भीतर से पूरी तरह से लज्जित हो चुकी थी। मनसपटल पर आत्मग्लानि का स्पर्श होते ही सहसा उसे मन्थरा के शब्द याद आ गये। कैकेयी की मुख कठोर हो गया। कैकेयी पुनः कुटिल आग्रह करती है कि राम, जब तक तुम वन चले नहीं जाते पिता प्रतिज्ञा पूरी न होने के कारण ऐसे ही शोकमग्न बैठे रहेंगे। दशरथ हतप्रभ हो कभी वितृष्णा से कैकेयी को देख रहे थे, कभी करुणा से राम के देख रहे थे। हे ईश्वर, इन दो विपरीत ध्रुवों में मैं अनन्त तक खिंचा जा रहा हूँ, मेरे प्राण ही क्यों नहीं निकल जाते।


राम ने माँ कैकेयी की निर्मम और तर्कजनित कुटिलता का संज्ञान न लेते हुये कहा। माँ, आप निश्चिन्त रहें, माँ कौशल्या से आज्ञा लेकर और सीता को समझाबुझा कर मैं आज ही वन चला जाऊँगा।


इस प्रकार पिता और माता की परिक्रमा कर राम कक्ष से निकल गये। वह अपना मन बना चुके थे।

28.8.21

आशा के शत दीप जले

 

न जाने किस राह चला जग, कातरता व्यापी चहुँ ओर,

अब मानवता रहे संशकित, अब पशुता का चलता जोर ।


शील, धैर्य, सज्जनता, श्रम, सब आदर्शों की गाली हैं,

जिनके पेड़ों पर रुपया है, बस वही आज वनमाली हैं ।


मानवता सिमटी क्षुब्धमना, नित दानवता उत्पातों से,

जन थकता छिपता दीन हीन, नित निशाचरी आघातों से ।


जो हैं समाज के शीर्षबिन्दु, जो मानवता के त्राता हैं,

बिन पिये चढ़े गर्वित मद में, बन बैठे वंद्य विधाता हैं ।


आश्रित तुम पर दुखियारे जो, उनके घर में देखो जाकर,

जो बिता रहे पूरा जीवन, तन ढकने का कपड़ा पाकर ।


तुम उसी राजसी सूट-बूट में, मद-मतवाले फिरते हो,

मानवता का दायित्व लिये, कुत्सित कर्मों में गिरते हो ।


भोली जनता को बहलाते, बस अपना स्वार्थ निभाते हो,

कब आकर इनकी सुध लेते, कब आकर इन्हें बचाते हो?


ये तेरे है, तुम इनके हो, इनमें तुममें कोई भेद नहीं,

बस राह मिलेगी अन्तहीन, हो गया किन्तु विच्छेद कहीं ।


सब यही चाहते देश बढ़े, उन्नति के विकसित पंथ चले,

यदि निशा पसारे तम अपार, तब आशा के शत दीप जले।


26.8.21

वनगमन, पर दोष किसका?


मेरे लिये राम का वनगमन विश्व इतिहास में सर्वाधिक उद्वेलित कर देने वाली घटना है, सर्वाधिक हृदयविदारक क्षण है, सर्वाधिक अन्यायपूर्ण निर्णय है।


पता नहीं मैं कहाँ स्थित हूँ? आराध्य राम के निर्णय पर प्रश्न उठाने की धृष्टता कर रहा हूँ। क्या मैं आँख बन्द कर स्वीकार कर लूँ कि राम ने जो निर्णय लिया वह उचित था, वह भी मात्र इसलिये कि राम मेरे पूजनीय हैं, मेरे आराध्य हैं। क्या औरों की भाँति मैं उन्हें भगवान मान लूँ और यह स्वीकार कर लूँ कि उन्होंने जो भी किया वह उनकी लीला थी। यह लीलावादी तर्क बड़ा ही निर्दयी है, अपने राम के कष्ट पर दुख व्यक्त करने का भी अधिकार आपसे छीन लेता है। तब सर्वसमर्थ राम पर दुख व्यक्त करने से राम के सामर्थ्य का अपमान जो होता है। लीलावादी कह सकते हैं कि राम तो ईश्वर थे, उन्हें कौन सा कष्ट? क्या करूँ मैं? सुनता हूँ पर इस तर्क को स्वीकार नहीं कर पाता।


राम का वन जाना मुझे असाध्य कष्ट देता है, जितनी बार प्रसंग पढ़ता हूँ, उतनी बार देता है। क्योंकि मन में राम के प्रति अगाध प्रेम और श्रद्धा है। बचपन से अभी तक हृदय यह स्वीकार नहीं कर सका कि भला मेरे राम कष्ट क्यों सहें? राम के प्रति प्रेम और श्रद्धा इसलिये और भी है कि राम पिता का मान रखने के लिये वन चले गये। विचित्र सा द्वन्द्व है यह, जिस कारण कष्ट हो रहा है उसी कारण श्रद्धा भी हो रही है, प्रेम भी उमड़ रहा है। राम ने कभी भी पिता को न तो दोषी ठहराया और न कभी दोषमुक्त ही किया। उन्होंने पिता की प्रतिज्ञाजनित आज्ञा का पालन भर किया। किस कारण छोटे भाई भरत को राज्य दिया गया और किस कारण राम को बिना अपराध के वनगमन का दण्ड मिला, इस अन्याय पर राम ने कभी कोई प्रश्न ही नहीं उठाया। हाँ, वन में एक बार राम के दुखी क्षणों में यह बात उठी अवश्य थी। उस समय राम लक्ष्मण को दशरथ के हित वापस अयोध्या लौट जाने को प्रेरित कर रहे थे। दशरथ की क्षीण मनःस्थिति और उनकी संभावित परवशता, ये प्रेरक कारण थे जो राम द्वारा लक्ष्मण को समझाये गये थे।


नियतिवादी कह सकते हैं कि यदि राम वन नहीं जाते तो रावण को कौन मारता? उनके अनुसार सब कारण श्रृंखलाबद्ध हैं, क्रमवत हैं, दैवयोग से प्रेरित हैं, देवों ने ही मन्थरा की मति पलटी। नियतिवादियों का यह सरलीकरण मुझे स्वीकार नहीं है। सीता अपहरण से रावण वध, कारण से कार्य तक का घटनाक्रम अन्तिम दो वर्ष से भी कम समय में हो गया था। तब शेष १२ वर्ष के वनभ्रमण के कष्टों का क्या कारण कहेंगे नियतिवादी? यदि राम वन नहीं जाते तो क्या समय आने पर रावण के विरुद्ध नहीं खड़े होते। यद्यपि रावण ने अयोध्या आदि से सीधी शत्रुता नहीं ली थी पर कालान्तर में उसकी महात्वाकांक्षा बढ़ती और तब राम से टकराव स्वाभाविक होता। या यह भी संभव था कि ऋषि मुनि आकर एक सक्षम राजा से सुरक्षा का आश्रय माँगते, तब भी रावणवध तो होना ही था। उनको अपने सिद्ध शस्त्र तो विश्वामित्र ने दे ही दिये थे, कालान्तर में अगस्त्य भी उन्हें अस्त्र दे ही देते। राम वनगमन के पहले ही इस युद्ध में खींचे जा चुके थे, शेष निष्कर्ष बस काल को प्रकट करने थे। सब नियत मान लेने से या राम के वनगमन को दैवयोग कह देने से क्या हमें उस निर्णय की विवेचना करना बन्द कर देना चाहिये?


वह भले ही त्रेतायुग था पर अन्याय का यह प्रकरण कलियुग का निर्लज्ज प्राकट्य था। वाल्मीकि ने दशरथ की रानियों के बीच प्रतिस्पर्धा और मानसिक वैमनस्य को बड़े ही स्पष्टरूप से व्यक्त किया है। कौशल्या ने राम को वन न जाने के लिये यह भी कारण दिया था कि राजा कैकेयी को अधिक मान देते रहे हैं और राम के राजा बनने से उनका भी मान वापस आयेगा। राम के वन जाने की स्थिति में कैकेयी और भी मदित, क्रूर और निष्कंटक हो सकती है। राजा की सर्वाधिक प्रिय रानी की दासियों में यह अभिमान आना सहज ही तो है। दासियों की राजपरिसर में महत्ता उनकी रानी के मान पर निर्भर थी। कोई भी ऐसी घटना जिससे उनकी रानी का प्रभावक्षेत्र सिकुड़े, उस पर दासियों का सतर्क होना स्वाभाविक था। मन्थरा का व्यवहार और षड्यन्त्रशीलता परिस्थितियों और व्याप्त मानसिकता का एक स्वाभाविक कर्म था, उस प्रतिस्पर्धात्मक वातावरण का सहज सा निष्कर्ष।


राम के वनगमन का पूरा दोष मन्थरा पर मढ़कर निकल जाना उस अन्यायपूर्ण घटना के साथ भी अन्याय होगा। क्या कैकेयी की भी मति पलट गयी थी, क्या दशरथ को भी न्याय के बारे में विभ्रम हो गया था? क्या दशरथ अपनी सामान्य प्रजा पर यह अन्याय कर पाते जो उन्होंने अपने पुत्र राम पर हो जाने दिया और मौन बैठे रहे। राजकीय उत्तरदायित्वों में भला व्यक्तिगत वरों का क्या मोल? कोई प्रजाजन यदि दशरथ से यह प्रश्न भर पूछ देता तो दशरथ क्या उत्तर देते? जो न्याय दशरथ के लिये अपनी प्रजा के प्रति करना असंभव था वह निर्दयी अन्यायपूर्ण निर्णय राम जैसे गुणी, सौम्य, सर्वप्रिय और आज्ञाकारी पुत्र पर किया गया।


राम के वनगमन में मन्थरा से अधिक कैकेयी का दोष था और सर्वाधिक दोष दशरथ का था। मन्थरा की जिह्वा में सरस्वती बैठ गयी थी? कैकेयी की बु्द्धि पलट गयी थी? यह मतिभ्रम नहीं वरन रानियों की परस्पर प्रतिस्पर्धा में श्रेष्ठ बनने का भाव बुद्धि में बसा बैठा था। सब एक दूसरे से भय भी खातीं थी, सशंकित थीं। कैकेयी युवा थी और दशरथ की प्रिय भी, दशरथ उन पर कामानुरक्त थे। इस पर मन्थरा को खलनायक बनाने का क्या अर्थ? यदि किसी का निर्णय इसमें प्रबलता रखता था, वह दशरथ का था। दशरथ ने राम को न जाने के लिये कहा और न ही रुकने के लिये, बस मौन बने बैठे रहे। मौनं स्वीकृति लक्षणम्।


यद्यपि कैकेयी से दशरथ ने यथासंभव अनुनय विनय और याचना की, पर वह राजा का स्वरूप नहीं दिखा पाये और न ही पिता बन अपने पुत्र की रक्षा कर पाये। क्या वचन न मानने का सामाजिक अपयश राम को अन्यायपूर्ण वन भेजने से अधिक होता? यहाँ तो सर्वथा विपरीत ही हुआ। राम ने पिता की प्रतिज्ञा की रक्षा की, उनके अपयश में बाधा बन कर खड़े हो गये। बिना युवराज बने, रघुकुल और राजा के गुरुतर दायित्वों के निर्वहन का मान रखते हुये स्वयं ही वनगमन का निर्णय ले लिया।


यद्यपि घटनाक्रम अन्यायपूर्ण था, राम ने सबका ध्यान रखते हुये, माँ, पिता और कुल का सम्मान रखते हुये स्वयं ही वनगमन चुना।


राम के निर्णय के आधार क्या थे, विस्तृत विवेचना अगले ब्लाग में।

24.8.21

निर्णय के क्षण


दशरथ को जब पुनः चेतना आती है, कैकेयी राम को दो वरों के बारे में बता रही थी। हा! कितनी निर्दयी हो गयी है कैकेयी।


दशरथ स्वयं ही शान्त रहने का निर्णय ले चुके थे। अब जो भी होना है वह कैकेयी अथवा राम के निर्णय पर होना है। कैकेयी निर्लज्जता से अपना स्वार्थ व्यक्त किये जा रही है। अपने पुत्र से तो सबको प्रेम होता है इसलिये भरत को राज्य की बात तो समझी जा सकती थी पर राम को १४ वर्ष का वनवास दशरथ से न समझा जा रहा था और न ही सहा जा रहा था। 


क्या कैकेयी को राम से भय है? यदि राम यहाँ रहे तो कालान्तर में राम राज्य पर अधिकार का प्रयास करेंगे, क्या यह चिन्तन है कैकेयी का? कैकेयी की राजनीति मति दशरथ की समझ से परे थी। यदि भरत के लिये ही राज्य माँग लेती तो वह सदा के लिये हो जाता। राम यदि चौदह वर्ष बाद लौटे और राज्य पर अपना अधिकार जताया तब क्या स्थिति होगी? यह चौदह वर्ष क्या इसलिये माँगे हैं कि इतने वर्षों में भरत राज्य और सेना पर अपना नियन्त्रण स्थापित कर लेंगे। राम क्या जीवनपर्यन्त शक्तिहीन ही रहेंगे? कैकेयी की इस अतार्किक बुद्धि से हताश थे दशरथ।


क्या कैकेयी को नगरवासियों से भय है? राम सबके प्रिय हैं। राम बचपन से ही उदारमना रहे हैं, पहले अपने भ्राताओं के प्रति, महल के परिचारकों और परिचारिकाओं के प्रति और बड़े होने पर सारे नगरवासियों के प्रति। कल ही प्रबुद्ध नगरवासी बता रहे थे कि राम मिलने पर सबकी कुशलक्षेम पूछते हैं। यही नहीं उनके परिजनों और परिचितों के बारे में ज्ञान रखते हैं। जब से नगरवासियों को पता चला है कि राम युवराज बनने वाले हैं और राजकीय कार्यों में उनका दायित्व गुरुतर होगा, तब से नगर में उत्सव का वातावरण बना हुआ है। सब अपने सर्वश्रेष्ठ वस्त्र पहन कर राम के दर्शन को लालायित हैं। जब उनको पता चलेगा कि राम को वन भेजने का षड्यन्त्र चल रहा है, क्या प्रजा विद्रोह कर देगी?


क्या कैकेयी को भरत की क्षमताओं पर विश्वास नहीं है? भरत अपने ज्येष्ठ के समक्ष क्या शासन में समर्थ नहीं रह पायेंगे या राम के रहते वह सिंहासन पर बैठने से मना कर देंगे? भरत क्या राम के भय से निष्कंटक नहीं रह पायेंगे? भरत का राम के प्रति आदर और स्नेह कहाँ कहीं किसी से छिपा है। राम का भी तो प्रेम भरत के प्रति अप्रतिम है। कैकेयी को संभवतः इसी का भय मुख्य हो कि राम के अयोध्या में रहते भरत सहज नहीं रह पायेंगे।


जब तक दशरथ इन विकल्पों में उतरा रहे थे, कैकेयी अपना वक्तव्य दे चुकी थी, दोनों वर बड़े ही रुक्ष स्वर में व्यक्त कर चुकी थी। कैकेयी की आँखों में अब एक स्पष्ट सा प्रश्नवाचक चिन्ह था। राम का मुख शान्त और भावहीन था। जिन शब्दों ने पिता को असहनीय पीड़ा पहुँचायी है, उन शब्दों को वह अपने कानों से सुनना चाहते थे। पिता की पीड़ा समझ सकें, माँ का मन्तव्य समझ सकें, इसके लिये आवश्यक था वह सब शान्त भाव से सुनें।


सब सुनने के पश्चात राम समय लेते हैं। इसलिये नहीं कि वह दुखी है, इसलिये नहीं कि वह क्षुब्ध हैं। बिना किसी पर दृष्टि पहुँचाये वह कक्ष में उपस्थित सभी जनों के मुख की कल्पना कर सकते हैं। पिता शोकमग्न और आर्त मुख लिये, माँ प्रश्नवाचक और आन्दोलित मुख लिये, लक्ष्मण आग्नेय और उद्वेलित मुख लिये, सुमन्त हतप्रभ और वितृष्णा भाव लिये। सबके मन में अपने भाव गाढ़े हैं पर साथ में एक उत्सुकता और स्तब्धता है कि राम क्या कहेंगे? राम पर सबकी दृष्टि टिकी है। सबको साधने का क्रम कठिन है पर राम का उत्तर सबको संतुष्ट करने वाला होना चाहिये।


सब सुनने के पश्चात राम समय लेते हैं। वह अपने निर्णयों के विकल्पों पर विचार करते हैं। प्रत्येक विकल्प के क्या दूरगामी परिणाम होंगे उनके पक्षों पर सोचते हैं। अनवगत प्रिय भरत जो इस चक्र में पिसेगा, कोई भी निर्णय हो पिता दशरथ मन से रुग्ण हो जायेंगे, माँ कौशल्या का क्या होगा, लक्ष्मण क्या करेगा? सीता, उसकी तो कोई सोच भी नहीं रहा है? गुरु, प्रजा, कुल, नीति और स्वयं राम की एक छवि। धर्म का प्रायोगिक क्षण था यह। संस्कार, विद्या, सम्बन्ध, सबके निष्कर्षों की परीक्षा लेनी थी इस निर्णय को।  


सब सुनने के पश्चात राम समय लेते हैं। युवराज बनने के पहले ही उन पर निर्णय का महादायित्व आ गया था। यह निर्णय कोई लघु निर्णय नहीं था। पूरे राजपरिवार में संभावित उथलपुथल का अनुमान राम को हो गया था। एक महाअंधड़ उठ चुका था, रघुकुल की क्षति निश्चित दिख रही थी। राम को अपने निर्णय से यह सुनिश्चित करना है कि किस तरह यह क्षति न्यूनतम हो।


सब सुनने के पश्चात राम समय लेते हैं। राजा और पिता शान्त हैं, कुछ कहते नहीं। माँ कैकेयी की वाणी रुक्ष अवश्य थी पर वह आदेश नहीं दे रही थी। वह सशंकित सी राम के माध्यम से पिता दशरथ से अपने वरों की माँग कर रही थी। राम को यहीं निर्णय लेना था। गुरु या माँ कौशल्या से मंत्रणा का न अवसर था और न ही समय। 


सब सुनने के पश्चात राम समय लेते हैं। उस क्षण का पूरा भार राम के युवा हृदय में संघनित था। सबके व्यवहार ने अनायास ही राम को कितना वयस्क कर दिया था। राम के निर्णय की प्रतीक्षा कक्ष में उपस्थित सब कर रहे थे, राम के निर्णय पर प्रश्न सभी सम्बन्धी करने वाले हैं, राम के निर्णय की परीक्षा कल प्रजा करेगी, राम के निर्णय की समीक्षा आने वाली पीढियाँ करेंगी।


राम क्या निर्णय लेंगे? 

21.8.21

व्यक्त कर उद्गार मन के


व्यक्त कर उद्गार मन के,

क्यों खड़ा है मूक बन के ।

 

व्यथा के आगार हों जब,

सुखों के आलाप क्यों तब,

नहीं जीवन की मधुरता को विकट विषधर बना ले ।

व्यक्त कर उद्गार मन के ।।१।।

 

चलो कुछ पल चल सको पर,

घिसटना तुम नहीं पल भर,

समय की स्पष्ट थापों को अमिट दर्शन बना ले ।

व्यक्त कर उद्गार मन के ।।२।।

 

तोड़ दे तू बन्धनों को,

छोड़ दे आश्रित क्षणों को,

खींचने से टूटते हैं तार, उनको टूटने दे ।

व्यक्त कर उद्गार मन के ।।३।।

 

यहाँ दुविधा जी रही है,

व्यर्थ की ऊष्मा भरी है,

अगर अन्तः चाहता है, उसे खुल कर चीखने दे ।

व्यक्त कर उद्गार मन के ।।४।।

19.8.21

निर्णय की कालरात्रि


कैकेयी प्रतीक्षा में थी कि कब राम अपने पिता की प्रतिज्ञा का पालन करने का वचन दें। जब राम ने तनिक रुक्ष व स्पष्ट स्वर में कहा तब कहीं जाकर कैकेयी को संतोष हुआ कि उसका षड्यन्त्र सफल हो जायेगा। 


मन्थरा द्वारा समझायी हर बात का कैकेयी ने अक्षरशः अनुपालन किया था। पहले कोपभवन में जाना, राजा के पूछने पर उन्हें वर की याद दिलाना, राजा को इस बात के लिये चढ़ाना कि रघुवंशियों के लिये उनकी प्रतिज्ञा ही सर्वोपरि है और तब कहीं दो वर माँगना। मन्थरा को यह भी ज्ञात था कि राजा क्रोध कर सकते हैं या मना कर सकते हैं, उसके लिये कैकेयी को विष पी लेने या अग्नि में कूद जाने की धमकी देने की सीख दी। यदि राजा दयनीय होकर अनुनय विनय करते हैं तब भी टस से मस न होने की अत्यन्त स्पष्ट चेतावनी भी दी थी मन्थरा ने।


कैकेयी को विश्वास था कि एक बार वर देने के पश्चात राजा स्वतः ही अपना निर्णय राम को सुना देंगे। राजा के शोकनिमग्न हो अचेत हो जाने से उसे समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या करे? हर बार उठते और “हा राम” कह कर पुनः अचेत हो जाते। उसे तो अब यह भी समझ नहीं आ रहा था कि राजा ने वर दिये हैं कि नहीं? या केवल विलम्ब करना चाह रहे हैं राजा?


राजा ने कितना धिक्कारा था, बुरा भला कहा था पर मना नहीं किया था। रघुवंशियों की इसी मति पर ही कैकेयी का पूरा छलतन्त्र टिका था। स्पष्ट मना कर देना प्रतिज्ञा का उल्लंघन था। यदि राजा ऐसा करते तो उसे भी रघुकुल के बारे में आक्षेप लगाने का अवसर मिल जाता।


राजा अधर में थे, न मना कर रहे थे और न ही हाँ कर रहे थे। जैसे ही राजा ने अनुनय विनय करना प्रारम्भ किया कैकेयी समझ गयी थी कि राजा अब मना नहीं कर सकते हैं। उस ओर से निश्चिन्त हो बैठी कैकेयी को पर यह समझ में नहीं आ रहा था कि राजा को कैसे प्रेरित करे कि वह अपना निर्णय राम को सुनायें। सारे अस्त्र उपयोग में लाने के बाद उसके पास बस एक ही अस्त्र बचा था जिसका वह रात में कई बार उपयोग कर चुकी थी, और वह थी उसकी कठोर वाणी। कठोर वाणी में उलाहना देने से राजा हर बार पीड़ा में उतर जाते और हा राम कह कर अचेत हो जाते। कैकेयी को लग रहा था कि यदि यह अस्त्र अधिक बार प्रयोग किया तो संभव हो राजा इस पीड़ा को सहन न कर पायें और स्वर्ग सिधार जायें। तब तो कोई वर भी नहीं मिलेगा। वैसे भी राजा पहला वर तो मान ही चुके थे। अब राजा का सारा दुख और प्रयत्न दूसरे वर पर था। इसी कारण उसने चुपचाप रात्रि बिताने का निर्णय लिया।


इधर दशरथ की पीड़ा मर्मान्तक थी। उनके मन में सतत ही उहापोह चल रही थी कि कैकेयी को किस प्रकार समझाया जाये, दूसरे वर के लिये आग्रह न करने के लिये किस तरह मनाया जाये। शोकमग्न हो दशरथ शिथिल अवश्य थे पर मन गतिमान था, ईश्वर से प्रेरणा देने की प्रार्थना कर रहे थे कि किसी तरह प्रातः होने तक कैकेयी को मुझपर कुछ दया आ जाये, उसका हठ कुछ कम हो जाये। जब भरत को राजा बनाने का उसका मन्तव्य सिद्ध हो चुका है तो राम को अकारण कष्ट क्यों दे रही है कैकेयी? यह सब क्यों हो रहा है, दशरथ अभी कुछ नहीं समझना चाह रहे थे। इस समय तो वह समस्त देवों का आह्वान कर रहे थे कि कैकेयी के भीतर तनिक ममत्व जग जाये, या तो राम के लिये या अपने पति के लिये।


दशरथ कैकेयी को समझ तो कभी नहीं सके थे। एक अद्भुत आकर्षण था उसमें, बस खिंचते चले गये और वहाँ निश्चेष्ट हो पड़े रहे, जीवन भर। एक अद्भुत ऊर्जा, जीवन जीने की एक अद्भुत शैली। अपरिमित सौन्दर्य और उस पर अपरिमित शूरता, एक बार बँधे तो जीवन भर बद्ध ही पड़े रहे। युद्धकौशल का ज्ञान तो बहुतों को होता है पर भला कौन नारी घनघोर युद्धक्षेत्र में अपने पति के साथ जाती है। कौतूहलवश नहीं वरन एक सहयोगी बन कर। स्पष्ट याद है वह क्षण जब लगा कि बाणों से बिद्ध पीड़ा अब प्राण हर लेगी तब कैकेयी ने कुशल सारथी बन कर उनके प्राण बचाये थे। प्राणरक्षा के इस उपकार के प्रति कृतज्ञ राजा के लिये दो वर भला कौन सी बड़ी बात थी। तब भी कैकेयी की विनम्रता से उनका हृदय गदगद हो उठा था। “बस आपके प्राण बच गये महाराज, यही मेरा वर है” कैकेयी के इस उत्तर पर जब उन्होंने अधिक आग्रह किया तो समय आने पर माँग लेने के लिये कह कर बात टाल दी थी।


पीड़ा के घोर क्षणों में दशरथ विचार में डूबे थे, उन्हें सच में समझ नहीं आ रहा था कि उनसे भूल कहाँ हुयी। युवा, सुगढ़, सुवाक, सुन्दरी और वीर कैकेयी से अधिक स्नेह तो परिस्थितियों की एक स्वाभाविक सी ही परिणिति थी। कौशल्या और सुमित्रा को यह अखरता अवश्य था पर उनके संस्कारों ने अपने पति की इस एकप्रियता को स्वीकार ही कर लिया था। उन्होनें भी सदा राजकीय और सामाजिक कार्यों में दोनों रानियों को समुचित सम्मान दिया। क्या करें पर व्यक्तिगत क्षणों में उन्हें कैकेयी का सानिध्य ही भाता था।


दशरथ अपने जीवन में कैकेयी के व्यवहार के विश्लेषण में लगे थे कि संभवतः कोई सूत्र मिल जाये जिससे यह अनर्थ होने से बच जाये। अपने पति और राजा पर इतना अधिकार पाकर कैकेयी का व्यवहार और भी उदार हो चला था। एक पुत्र की इच्छा थी और वह भी यज्ञ द्वारा पूरी हो गयी थी। एक नहीं, वरन चार पुत्रों पर कैकेयी का स्नेह देखते ही बनता था, विशेषकर राम उसे अत्यन्त प्रिय थे। वहीं राम थे जो अपनी माँ से अधिक आदर माँ कैकेयी को देते थे। सब कुछ तो ठीक चल रहा था, फिर मुझसे भूल कहाँ हुयी, दशरथ पुनः अचेत हो गये।


मैंने बिना कैकेयी से परामर्श लिये राम को सिंहासन देने का निर्णय ले लिया, कहीं उससे तो कैकेयी आहत नहीं हुयी है? यदि ऐसा होता तो सारा क्रोध मुझ पर होता पर कैकेयी के वरों में लक्ष्य तो राम हैं। इतना आदर और प्रेम पाने के बाद भी कैकेयी राम के प्रति इतनी निर्दयी क्यों बनी हुयी है, यह दशरथ की बुद्धि से परे था। क्या किसी ने कैकेयी को भरा है? वैसे तो कैकेयी स्वतन्त्र विचारधारा रखती है और उसे प्रभावित कर पाना सबके बस की बात नहीं है। शोक और सोच से दशरथ का हृदय फटा जा रहा था।


सुमन्त्र आते हैं, कैकेयी उन्हें राजा की ओर लक्ष्य कर कुछ आदेशित करती हैं, सुमन्त्र वहीं खड़े रहते हैं। हा, पुनः कठोर वचन! हा, कैकेयी को क्या हो गया हैं ईश्वर? राम को बुलाने के लिये इतनी व्यग्रता, इतना क्रोध। दशरथ सुमन्त्र को अनमने हो संस्तुति देते हैं। सहसा राजा कैकेयी के बारे में सोचना बन्द कर देते हैं और इस असमंजस में पड़ जाते हैं कि राम का सामना कैसे कर पायेंगे वह? क्या कहेंगे राम से? किस अपराध के लिये वन भेजेंगे उन्हें? दशरथ निर्णय ले चुके थे, वह शान्त ही रहेंगे। संभवतः राम की विनम्रता या वीरता इस अपार भीषण निर्णय को बदल सके।


राम आते हैं, सारा वार्तालाप सुन कर और राम की निश्छल पितृभक्ति देखकर दशरथ का दुख और भी गाढ़ा हो जाता है, वह पुनः अचेत हो जाते हैं।

17.8.21

रामो द्विर्नाभिभाषते


“राम दो प्रकार से बात नहीं करता है” तनिक व्यथित और खिन्न स्वर में राम माँ कैकेयी से बोले।


शब्द कठोर अवश्य थे पर आवश्यक भी। स्थिति को निष्कर्ष तक लाने के लिये और व्यग्रता के क्षणों को विराम देने के लिये। सुमन्त्र को कुछ ज्ञात नहीं, पिता कुछ बोलते नहीं और माँ कैकेयी हैं, वह जानबूझ कर नीति की बातें लेकर बैठी है कि पुत्र को पिता की बात माननी चाहिये। पर यह नहीं बता रही हैं कि क्या बात है जो माननी है। वह वचन लेना चाह रही हैं, कुछ भी बताने के पहले।


कक्ष में ५ लोग थे। शोकनिमग्न और मौन धरे पिता राजा दशरथ, विजय के प्रति अभी भी अर्धशंकित खड़ी माँ कैकेयी, अनर्थ की आशंका से उद्वेलित और आवेशित लक्ष्मण, अनभिज्ञ पर राजा के लिये दुखी सुमन्त्र और कक्ष के मध्य में राम। दशरथ और कैकेयी के अतिरिक्त किसी को कुछ भी ज्ञात नहीं था कि विगत रात्रि किस प्रकार के क्रूर वचन इस कक्ष में बोले गये थे। किसी को भी यह ज्ञात नहीं था कि किस प्रकार राजा ने कैकेयी को समझाने का प्रयास किया था। राजा द्वारा कितनी अनुनय विनय उस कक्ष में की जा चुकी थी, बस एक वर को वापस लेने के लिये। भरत को राज्य देने में राजा दशरथ मानसिक रूप से तैयार थे पर अकारण ही आज्ञाकारी और सबके प्यारे पुुत्र राम को वनवास जाने से रोकने के लिये दशरथ ने करुणा के न जाने कितने आँसू बहाये थे।


जब प्रातः सुमन्त्र राम को लेने आये थे, लक्ष्मण राम के महल में पहुँच चुके थे और उन्हें नगर में व्याप्त उत्साह के बारे में बता रहे थे। सुमन्त्र ने राम को सूचित किया कि राजा दशरथ ने उन्हें स्मरण किया है। कल से दो बार राजा दशरथ ने और एक बार वशिष्ठ उनसे मन्त्रणा की थी। राज्याभिषेक के निर्णय के बारे में सूचना, उत्तरदायित्व के बारे में दिशा निर्देश, कर्तव्य के प्रति उपदेश और सपत्नीक विशेष व्रत के पालन के आदेश उन्हें प्राप्त हो चुके थे। सुमन्त्र ने कोई कारण विशेष नहीं बताया क्योंकि यदि उनसे पूछा जाता तो संभवतः वह असत्य न कह पाते।  राजकीय कार्यों में प्रयुक्त “आवश्यक सम्भाषण” के सूत्र को सदा ही निभाते थे सुमन्त्र। अनावश्यक सम्भाषण और तज्जनित मर्यादा के अतिक्रमण की किसी भी संभावना से दूर ही रहने का व्यक्तित्व विकसित किया था सुमन्त्र ने। तभी संभवतः वह राजा के अत्यन्त प्रिय और विश्वासप्राप्त भी थे।


राजा दशरथ नियम से सूर्योदय के दो मुहूर्त पहले ही उठ जाते थे और सुमन्त्र से प्राप्त सूचना और दिये निर्देशों से उनके शेष दिन का प्रारम्भ होता था। तब महल के सारे तन्त्र तदानुसार चल पड़ते थे। यही कारण था कि सुमन्त्र को कभी भी और कहीं भी राजा दशरथ तक पहुँचने के अधिकार प्राप्त थे। आज जब प्रातः कोई सूचना नहीं आयी, वन्दीजनों की स्तुतियाँ अनुत्तरित रहीं और राजा ने दर्शन नहीं दिये, तब सुमन्त्र को कर्तव्यवश स्वयं ही जाना पड़ा। जाने पर पता चला कि राजा कैकेयी के महल में हैं। अन्तःपुर तक उनको किसी ने रोका नहीं अपितु द्वारपालों और परिचारिकाओं ने उन्हें उस कक्ष की ओर इंगित किया जहाँ पर राजा दशरथ कल रात्रि गये थे और अभी तक निकले नहीं थे।


कुल की महिमा कहकर, राजा के अभिवादन और अपने आगमन का संकेत देने की परम्परा थी राजवंश में। स्वस्थ परम्परा थी, जो सदा ही राजकीय कार्यों में आवश्यक गाम्भीर्य और गुरुता का वातावरण उत्पन्न कर देती थी। कुल की परम्परायें पथ प्रदर्शित करने वाले दीपों की भाँति होती हैं जो भटकने से रोकती हैं। कभी कभी राजा दशरथ को व्यक्तिगत संवादों में यह अतिरिक्त और अनावश्यक लगता था पर सुुमन्त्र ने कभी इसका अनियमन नहीं किया था। जब राजा दशरथ ने कोई उत्तर नहीं दिया तब सुमन्त्र ने कक्ष में प्रवेश किया और परिस्थिति समझने का प्रयत्न किया। राजा को उन्होंने इतना शोकनिमग्न कभी नहीं देखा था। राजा के कुछ न कहने पर कैकेयी ने स्वतः ही सुमन्त्र को राम को बुला लाने के लिये कहा। राजा की उपस्थिति में किसी और के आदेश स्वीकार करना सुमन्त्र को तभी स्वीकार होता था तब राजा अपने नेत्रों से उसका अनुमोदन करते। सुमन्त्र राजा की ओर देखते रहे, न राजा ने कुछ कहा, न सुमन्त्र कक्ष से बाहर गये।


अपने माँगे वरों को राजकीय आदेश के रूप में थोपने को आतुर कैकेयी ने राजा को पुनः कठोर वचन कहे।  सुमन्त्र को अनुमोदन देने में विलम्ब का अर्थ जब कैकेयी ने उनकी प्रतिज्ञा से जोड़ कर कहा तब राजा दशरथ क्षोभ से व्याकुल हो उठे और अपना मस्तक हिला सुमन्त्र को जाने को कहा।


शीघ्र ही राम लक्ष्मण और सुमन्त्र के साथ कक्ष में उपस्थित थे। पिता शोकमग्न सर झुकाये बैठे थे, न राम को देखकर कुछ कहा, न कोई प्रतिक्रिया की। राम को अनर्थ का पूर्वाभास हो चुका था। पीछे लक्ष्मण सशंकित खड़े थे। पिता से राम ने सीधे पूछा कि आप मुझे देखकर सदा की भाँति प्रसन्न क्यों नहीं हैं, आप कुछ कहते क्यों नहीं? क्या मेरा कोई अपराध है? भरत, शत्रुघ्न, मातायें आदि तो सब सकुशल हैं? किसी ने आपको कुछ कहा है? तब माता कैकेयी को ओर मुख कर राम ने पूछा कि माँ क्या आपने पिता को कोई कठोर वचन कहे हैं?


तुरन्त उत्तर न पाकर राम समझ गये थे कि माँ कैकेयी ही पिता के शोक का कारण है। राम को इस प्रकार अपनी ओर आक्रोशित देखकर कैकेयी असहज हो गयी और बोली कि शोक का कारण तो तुम हो राम। राजा तुमसे कुछ कहने का साहस नहीं कर पा रहे हैं। मुझे दो वर देने की प्रतिज्ञा करते समय तो शूरवीर बन रहे थे पर तुम्हारे कारण शिथिल पड़ गये हैं। वैसे तो पुत्र को पिता की प्रतिज्ञा को आज्ञा के रूप में पालन करना चाहिये पर पता नहीं कि तुम उनकी प्रतिज्ञा पालन में सहायता करोगे कि नहीं? इसी संशय में राजा शोकनिमग्न हैं।


पिता दशरथ के हृदय को दुख से जीर्णशीर्ण कर देने के बाद माँ कैकेयी राम की पितृभक्ति पर भी आक्षेप लगा रही थी। राम यह स्वीकार नहीं कर पाये क्योंकि वह जानते थे कि वह अपने पिता के लिये कुछ भी कर सकते हैं। राम पिता के इस प्रकार किये गये अपमान को सहन नहीं कर पाये और बोले।


“देवी आपको धिक्कार है। मेरे प्रति ऐसी बात आपको नहीं कहनी चाहिये। राम पिता के लिये प्राण भी दे सकता है। जो राजा को अभीष्ट हो, स्पष्ट कहो। राम दो प्रकार से बात नहीं करता। रामो द्विर्नाभिभाषते।”

14.8.21

मन मेरा फिर डोल रहा है

  

शान्ति धरो स्थान, व्यक्त जीवन में तेरा मोल रहा है ।

देखो अभी कहीं मत जाना, मन मेरा फिर डोल रहा है ।।

 

शान्ति, सुधा का रस बरसाती,

जीवन के मनभावों में ।

नयन ज्योत्सना, धैर्य दिलाती,

अति से अधिक विषादों में ।।

शान्ति, क्रिया का अन्त शब्द, 

पर मन कर्कशता बोल रहा है ।

मन मेरा फिर डोल रहा है ।।१।।

 

क्यों अशान्ति अपनायी मैंने,

सुख-निकेत से किया प्रयाण ।

कालचक्र के दूतों से,

मिल गया मुझे साक्षात प्रमाण ।।

क्यों अशान्ति का शब्द हृदय में, 

गरल भयंकर घोल रहा है ।

मन मेरा फिर डोल रहा है ।।२।।


कर्म विरत हो नहीं सहज,

मन घोर मचाये हाहाकार,

कैसे जीवन तब तटस्थ,

मन चाह रहा उद्धत व्यापार,

त्यक्त रहूँ या व्यक्त करूँ,

मन असमंजस नित खोल रहा है,

मन मेरा फिर डोल रहा है ।।३।।


बढ़ता जीवन का कर्मचक्र,

बढ़ता जाता है नवल नाद,

है नहीं अपेक्षित, आवश्यक, 

बिन चाहे बढ़ जाता विषाद,

क्या प्राप्त रहे, क्या छोड़ सकूँ,

सब लाभहानि में तोल रहा है,

मन मेरा फिर डोल रहा है ।।४।।


नहीं कभी भी मुुड़ पाता मन,

एक विशिष्ट आकर्ष भरा,

रागयुक्त यह कोलाहल है,

जो जीवन बनकर पसरा।

कितना चाहूँ, उसी परिधि पर,

घूम रहा मन, गोल रहा है,

मन मेरा फिर डोल रहा है ।।५।।

12.8.21

ब्लाग यात्रा - ४ (प्रवृति निवृत्ति)


बारह वर्ष की ब्लागयात्रा के कई अध्याय रहे। “गाय” से लेकर “मधुगिरि” तक लगभग ४० साप्ताहिक ब्लाग ज्ञानदत्तजी के अतिथि रूप में लिखने के बाद तनिक साहस आया कि स्वयं अपना ब्लाग प्रारम्भ कर सकूँ। यद्यपि अपना ब्लाग प्रारम्भ करने की इच्छा प्रारम्भ से ही थी पर अतिथि की सुविधाभोगिता मन में आलस्य उत्पन्न करने लगी थी। एक तो ज्ञानदत्तजी के पाठकों की संख्या बहुत अधिक थी, उसका लोभ बना रहा। दूसरी थी उनकी सदाशयता कि हर टेढ़ी मेढ़ी पोस्ट को ठीक से सजा कर और संपादन कर के वह परिमार्जित करते रहे। तीसरा था मेरे द्वारा लिखित विषय पर उनका दृष्टिकोण और विशेष संवादक्रम। इन तीन सुखों में भला कहाँ भविष्य की सुध संभव थी? अपने पैरों पर सुदृढ़ खड़ा हो सकूँ, इस हेतु उनके विशेष आग्रह ने ही “न दैन्यं न पलायनम्” के उद्घोष से ब्लाग प्रारम्भ करने के लिये प्रेरित किया।


“न दैन्यं न पलायनम्” के उद्घोष ने सदा ही प्रभावित किया है। यह उद्घोष अर्जुन ने भगवद्गीता के संवाद के बाद और युद्ध प्रारम्भ होने के पहले किया था। राजपुत्र होकर भी सदा ही छले जाने के बाद, वीर होकर भी जंगल जंगल फिरने के बाद, न्यायोचित न होने पर भी पाँच गाँव का विनम्रतम प्रस्ताव नकार दिये जाने के बाद और अन्ततः परिवार के मोह में युद्ध न कर सकने की स्थिति में कृष्ण से फटकार सुनने के बाद, अर्जुन का यह उद्घोष अत्यन्त अर्थमय हो जाता है। बहुधा अपना व्यक्तित्व अर्जुन की तरह ही लगता रहा। अर्जुन के समान ही, सामर्थ्य होने के बाद भी सामान्य सा जीवन व्यतीत करने के कई आक्षेप मैंने स्वयं पर लगाये हैं। लगा कि यह वाक्य मेरे जीवन में समय की स्पष्ट थाप बनेगा। पता नहीं कि इस प्रारम्भिक ध्येय को कितना चरित्रार्थ कर पाया मैं?


अपने ब्लाग पर पहली पोस्ट “स्वर्ग” लिखी, पारिवारिक विनोदमयी परिस्थितियों पर। आने वाले कई माह तक ज्ञानदत्त जी मेरी सारी पोस्टों को अपने ब्लाग से प्रचारित करते रहे और यह स्तुत्य कृत्य उन्होंने तब तक निभाया जब तक उन्हें लगा नहीं कि मैं अपने पैरों पर खड़ा हो गया हूँ। पता नहीं और ब्लागरों को इतना सुदृढ़ आधार मिला कि नहीं पर यदि मुझे नहीं मिलता तो न इतना लिख पाता और न इतने आत्मविश्वास से लिख पाता।


एक बार लिखने का क्रम चल पड़ा तो उन्मुक्त भाव से लिखा। परिवेश पर लिखा, परिवार पर लिखा, तकनीक पर लिखा, ब्लागिंग पर लिखा, कविता लिखी, विनोद लिखा, गाम्भीर्य लिखा। लगभग ५ वर्षों तक सप्ताह में दो बार लिखा। व्यस्तता आयी तो सहसा लिखना कम हो गया। लगभग दो वर्ष के लिये सप्ताह में बस एक बार ही लिख सका और बहुधा कविता ही लिख सका। लगभग ३ वर्ष ऐसे बीते जिसमें कुछ भी नहीं लिखा। उस समय कई बार ऐसा लगा कि संभवतः कभी लिख सकूँगा कि नहीं? एक वर्ष कुछ विषय विशेष ऐसे मिले कि औसतन दो सप्ताह में एक बार लिख सका। इस वर्ष के प्रारम्भ में भी शिथिलता और आलस्य घेरे था पर तलहटी स्पर्श होने के बाद जिस वेग से ऊपर आना चाहिये उस प्रवाह से लिख रहा हूँ, एक सप्ताह में लगभग ३ पोस्ट। यही नहीं, यथासंभव पाडकास्ट भी कर पा रहा हूँ।


प्रवृत्ति और निवृत्ति के कालखण्ड बहुधा प्रकृति के गुणों से मेल खाते हैं। सर्वाधिक ऊर्जा का कालखण्ड रजस का होता है। तमस में आलस्यजनित ऊर्जा कम होती है और सत्व में ऊर्जा व्यक्त होने के क्षेत्र ही सिमट जाते हैं। ऐसा ही कुछ लेखन में भी हुआ। जब सृजनात्मकता का उछाह आया तब बहुत से कारक थे और उनका वर्णन और विश्लेषण एक कठिन विषय हो जायेगा। किन्तु जब जीवन में लेखनीय निष्क्रियता पसरी रही तब के दो कारण स्पष्ट रहे।


पहला कारण कार्यक्षेत्र की अतिव्यस्तता रही। व्यस्तता उत्पादक होती है जब तन्त्र व्यवस्थित होता है। जब परिवेशीय अव्यवस्थित हो और सारी ऊर्जा तन्त्र को सुधारने में लगे तो उस प्रयत्न को जूझना कहते हैं। प्रकृति के गुणों के आधार पर देखा जाये तो यह तमस और रजस के बीच की स्थिति है। परिवेश तामसिक और उससे जूझना राजसिक। आप जब परवेशीय तमस में स्वयं ही तमस में जीते हैं तब एक साम्य आ जाता है, मन उतना खट्टा नहीं होता है। आपको भान ही नहीं होता है कि आप क्या कर रहे हैं, आप तो बहने लगते हैं सामाजिक प्रवाह में। किन्तु जब प्रवृत्तियाँ सात्विक हों तो तम से जूझने के लिये रजस में उतरना पड़ता है क्योंकि सीधे सत्व से तम को नहीं जीता जा सकता। बुद्धि के स्तर पर भले ही सत्व रहे पर व्यवहार और विस्तार में बिना रजस आये तम अपराजित ही रहता है। इस नितयु्द्ध सी स्थिति में सृजन असंभव होता है, मन अशान्त सा रहता है, नित नीति और कार्यवृत्त में रत रहना पड़ता है। ऐसे ही कुछ कालखण्ड रहे जिसमें लेखन नहीं हो सका, हाँ, अनुभव अपार जुड़ा।


दूसरा कारण अतिबौद्धिकता का रहा, शु्द्ध सात्विकता का रहा। अच्छे लेखन के लिये आवश्यक है कि आप उत्कृष्ट पढ़ते भी रहें। सामान्य अध्ययन और अवलोकन तो वैसे भी चलता रहता है और उसमें से ही न जाने कितने लेखनीय विषय निकल आते हैं। पिछले ७ वर्षों में पर कई ऐसे कालखण्ड आये जब बौद्धिक और आध्यात्मिक चेतना उछाह पर रही। संस्कृत, दर्शन, आयुर्वेद, मानस, गीता, रामायण और न जाने संस्कृति के कितने पक्ष आये जिनसे साक्षात्कार होता गया। सामर्थ्यानुसार जितना पढ़ सका, अभिभूत रहा। पूर्वजों का बौद्धिक विस्तार, तार्किक तीक्ष्णता, सूत्रबद्ध संक्षिप्तता और सर्वोपकार की भावना में उतराकर यह लगने लगा कि इनकी तुलना में मैं जो सृजन कर पा रहा हूँ वह महावट के सम्मुख तृणमात्र सा है। तुच्छता के उस सतत अनुभव ने भी सृजन के क्रम में बाधा पहुँचायी। पूर्वजों का मन जानना आवश्यक था। यदि नहीं जाना होता तो अपनी क्षुद्रता पर इतराये बैठा होता। इस कालखण्ड में लिख नहीं पाया पर सीखा बहुत।


यह निवृत्ति के कालखण्डों का प्रभाव था या कोई अन्य कारण, यह तो पता नहीं पर पहले की अपेक्षा विषय अब श्रृंखलाओं में अधिक व्यक्त होते हैं। पहले विविध विषयों पर लिखता था, हर एक विषय दूसरों से भिन्न रहता था और कार्यक्षेत्र या परिवेश से जुड़ा रहता था। समय के साथ अब श्रृंखलायें लिखने लगा हूँ। प्रश्न उठ सकता है कि यदि लम्बा ही लिखना है तो पुस्तक क्यों नहीं? अब अधिक सोचने को विवश नहीं करता है यह प्रश्न। उत्तर यही है कि जब ब्लाग में आनन्द आ रहा है तो पुस्तक क्यों? 


प्रवृत्ति और निवृत्ति की धूप छाँव में सृजन गतिमान है।

10.8.21

ब्लाग यात्रा - ३ (टिप्पणी)


जो लोग ब्लाग लिखते हैं और उसमें रुचि लेते हैं, वे टिप्पणियों के महत्व को भी समझते हैं। उत्साह बढ़ाने में, सृजनात्मकता बनाये रखने में टिप्पणियाँ अमृत सा कार्य करती हैं। यह इस विधा का ही वैशिष्ट्य है कि पाठकों को लेखक से संवाद का अवसर मिलता है।


जब लगभग एक पृष्ठ पर आपने कोई विषय, घटना या कविता रखी हो तो यह स्वाभाविक ही है कि उस पर कहने को बहुत कुछ होगा। कई पक्ष छूटे होंगे, कई पर असहमति होगी, कई पर दृष्टिकोण भिन्न होंगे, कई पर आत्मिक अनुभव भी होंगे। ब्लाग का प्रारूप इन सब पर प्रतिक्रियाओं का अवसर देता है। ब्लाग में संवाद का जो स्वरूप पल्लवित होता है वह बहुधा मूल से कहीं अधिक रोचक और पठनीय होता है।


एक सिंहावलोकन करता हूँ तो लगता है कि यदि पाठक अपना योगदान टिप्पणियों में न देते तो संभवतः ब्लाग का स्तर अतिसामान्य ही रह गया होता।


जब २००९ में ब्लाग से जुड़ा, उस समय पढ़ना और विषय से सम्बद्ध टिप्पणी करना अच्छा लगता था। यह क्रम कुछ माह चला होगा। यद्यपि हिन्दी में गतिमय टाइप कर पाना अपने आप में संघर्ष था पर ब्लाग जगत का एक सामूहिक महाप्रयत्न रहा कि सबने उस बाधा को पार किया। जिनको तनिक भी तकनीक की सहजता थी उन्होंने सबकी सहायता की। दो तीन वर्ष का वह काल टाइप करने की विधियों का संक्रमणकाल कहा जायेगा। अभी तो फिर भी एक स्थायित्व आ गया है। उसके तकनीकी और व्यवहारिक पक्ष पर विस्तृत चर्चा फिर कभी। 


उस समय ब्लाग बहुत अधिक नहीं थे और समय मिल जाता था कि सबको पढ़ सकें। सबको पढ़ना अपने आप में एक संतोष देता था और लगभग सभी पढ़े ब्लागों पर टिप्पणी हो ही जाती थी। लगभग सौ ब्लागों को पढ़ने के क्रम में एक दिन में तीस टिप्पणियाँ तक हो ही जाती थीं। लगभग सब यही करते थे, सब सबका उत्साह बढ़ाते थे। एक अद्भुत सी ऊर्जा व्यापी थी उस समय ब्लागजगत में। किसी ब्लाग पर की हुयी टिप्पणी को भी सहेज कर रखने के क्रम में असम्बद्ध रूप में विचारों के न जाने कितनी लड़ियाँ रखे बैठे हैं हम। कभी समय मिला तो उनको भी ब्लाग का आकार दिया जायेगा।


एक बार लय आने पर पाठक टिप्पणियों से अपने मन की कहने लगे और ब्लाग व्यापकता पाने लगे। अभी तो उतनी लम्बी टिप्पणी नहीं लिख पाता हूँ पर प्रारम्भिक काल में  टिप्पणी बहुधा पर्याप्त लम्बी हो जाती थीं, बड़ी विस्तृत हो जाती थीं। यह देख कर ज्ञानदत्तजी ने कहा कि इस तरह की तीन चार टिप्पणियाँ जोड़कर, संदर्भ, उपसंहार बताकर या एक प्रश्न उठाकर ब्लागपोस्ट बनायी जा सकती है। केवल उत्साहित ही नहीं, उन्होंने आमंत्रित भी किया अपने ब्लाग मानसिक हलचल पर सप्ताह में एक अतिथि पोस्ट लिखने के लिये।


सितम्बर २००९ को पहली पोस्ट लिखी ‘गाय’। पहली पोस्ट का आनन्द व्यक्त नहीं किया जा सकता था। पोस्ट का विषय गायों की मार्मिक स्थिति पर था कि किस प्रकार हम गायों का दूध महत्वपूर्ण तो मानते हैं पर गायों को नहीं। पता नहीं पर इस विषय की गम्भीरता में सृजन के आनन्द की रेख चमक जाती थी। एक विचित्र सी स्थिति थी मन की। यह एक शोध का विषय हो सकता है कि एक पीड़ाजनित विषय पर किये सृजन की संतुष्टि और प्रशंसा का आनन्द क्या विषयगत पीड़ा से अधिक हो सकता है? या तीनों ही साथ साथ रह सकते हैं? जब कविता या लेख पढ़ें तो मन दुखी हो, उसके बाद यह ध्यान आते ही कि यह आपके द्वारा रचित है तब एक संतुष्टि का भाव और जब उसी पर किसी पाठक की टिप्पणी के रूप में प्रशंसा मिले तो आत्मिक आनन्द। औरों की तो कह नहीं सकता पर मेरे लिये नीरवता के परिवेश में तीनों भाव एक साथ रह सकते हैं।


ज्ञानदत्तजी का ब्लाग अत्यन्त पठित और चर्चित था अतः मेरी पोस्ट भी उसी उत्साह से पढ़ी गयी। आशीर्वादात्मक टिप्पणियाँ आयीं जिन्होनें ब्लागजगत में मेरा स्वागत किया पर मुख्यतः टिप्पणियाँ गायों की उस दयनीय दशा पर आयीं जिसे विषय में वर्णित किया गया था। कुछ ने अपने अनुभव  लिखे, कुछ ने समाधान बताये, कुछ ने धर्म को अधिक उत्तरदायी ठहराया, कुछ ने समाज को कोसा। संवाद के जिस स्तर पर सामान्य से विषय को पहुँचना था, ब्लाग और टिप्पणियों के माध्यम से वह वहाँ पहुँच सका। यदि टिप्पणियों में ढूढ़ेगें तो आपको ब्लागजगत के सारे आधारभूत और चर्चित नाम मिल जायेंगें। न केवल वे स्वयं ही बहुत अच्छा लिखते थे अपितु औरों के लिखे को भी संवाद की स्थिति तक पहुँचाते थे।


ब्लाग की प्रारम्भिक स्थिति प्रतिस्पर्धात्मक नहीं थी। जब पाठक बहुत हों, विषय पर्याप्त हों, टिप्पणियों के माध्यम से संवाद सतत हो, तो प्रतिस्पर्धा कैसी? ब्लागजगत एक खुला विस्तृत नभ था जिसके नीचे सबको आश्रय मिला था। सबकी अपनी विशेषसिद्धता थी, सभी महारथी थे। एक नयी विधा के क्षेत्र में वही आया था जिसकी पठन पाठन में रुचि थी, अभिव्यक्ति के लिये जिसके शब्द उत्कण्ठित थे पर पारम्परिक विधाओं को वे इसके लिये अपर्याप्त मानते थे। 


यद्यपि टिप्पणियों का अपना महत्व था। उत्साह, विषय विस्तार और संवाद, तीनों ही इसके माध्यम से बल पाते थे। कुछ समय पश्चात टिप्पणियों की संख्या एक अनकही प्रतिस्पर्धा के प्रतीक रूप में स्थान पाने लगी। ब्लाग बढ़ने लगे और सब पढ़ पाना संभव नहीं हुआ तो टिप्पणियों का पारस्परिक आदान प्रदान प्रारम्भ हुआ। अधिक ब्लाग पढ़ने के प्रयास में और की गयी टिप्पणियों की अधिक संख्या होने से उनकी गुणवत्ता प्रभावित होने लगी। कालान्तर में कई स्थानों पर टिप्पणी उपस्थिति दर्शाने का माध्यम सा बन गयी। अपने इस अर्थोपकर्ष में भले ही टिप्पणी अपना व्यापक पूर्वप्रभाव न लिये हो पर संवाद का माध्यम अवश्य है। आशा है कि सोशल मीडिया के कई नवमाध्यमों के बीच भविष्य में ब्लाग अपना स्थान पुनः पायेगा और वह भी टिप्पणीतन्त्र के प्रभावी होने से।