30.3.21

मित्र - २१

अमिताभ बहुत अच्छा गाते थे और अभी भी नियमित रूप से किसी एप्प में अपने सुरों की शीतलता बिखेरते रहते हैं। छात्रावास में उनका आना तीन वर्ष बाद हुआ था। संभवतः यह कारण रहा होगा कि उनके अन्दर स्वातन्त्र्य भाव कूट कूट कर भरा था। उनका आत्मविश्वास और साहस संक्रामक था। उनके साथ कई बार बिना अनुमति लेकर बाहर जाने की योजना बनी और उन पर क्रियान्वयन भी हुआ। सारा कुछ तो स्मृति में नहीं रहा पर दो घटनायें जो आचार्यों से संबद्ध थीं, वे स्थायी बस गयी हैं।


संभवतः प्रातः ४३० का समय होगा, जागरण में आधा घंटा शेष था। प्रधानाचार्य के दूत आते हैं और अमिताभ को जगा कर कहते हैं कि प्रधानाचार्य जी बुला रहे हैं। ब्रह्मकाल की सात्विकता पूरे परिसर में फैली थी। गम्भीर विषयों के लिये यही समय सर्वाधिक उपयुक्त होता था। किसी भी दृष्टि से यह प्रताड़ित या दण्डित करने का समय नहीं हो सकता था, उसका समय बहुधा सायं होता था। यह समय संभावनाओं का था। जिनमें कुछ भी समझ सकने की संभावना शेष रहती थी, उन्हें इस समय बुला कर प्रेरित किया जाता था, भावनाओं के उच्च बिन्दुओं पर ठहराया जाता था। जहाँ तक मुझे याद है, पूरे सात वर्षों में केवल एक बार ही मुझे यह सौभाग्य मिला था, संभवतः ११वीं कक्षा में।


प्रधानाचार्यजी के द्वारा बुलाया जाना सम्मान का विषय था। शारीरिक और मानसिक स्तर से सीधे बौद्धिक और आध्यात्मिक स्तर में पहुँच जाने की योग्यता का द्योतक। उनकी चिन्ता का विषय होना और तदोपरान्त उनके चिन्तन में आपके सुधार का उपाय आना, यह दोनों ही पक्ष रहते थे आपको प्रातःकालीन वेला में बुलाने के। शेष समाज की तुलना में आपका स्तर सहसा बढ़ जाता था, आप सामान्य से विशेष हो जाते थे। कभी कभी आपको प्रधानाचार्यजी के स्थान पर जागरण कराने का विशेष कार्य भी मिलता था। वापस लौटकर आपके शब्दों को आदेशों और उपदेशों सा मान मिलता था। दिन भर यह चर्चा का विषय रहता था कि आज किसको बुलाया गया और प्रेरित किया गया। 


अमिताभ को प्रातः बुलाया गया है, समाचार मिलते ही संशय के बादल मन में घुमड़ने लगे। कभी आपके विशेष मित्र को इस प्रकार बुलाया जाये तो करुणा, भय और क्रोध के मिश्रित भाव उमड़ते हैं। करुणा इस बात की कि कहीं आपके मित्र का नाम किसी काण्ड में उद्घाटित तो नहीं हो गया। कहीं उसको इस बात की उलाहना तो नहीं दी जायेगी कि अमिताभ आपसे तो यह अपेक्षित नहीं था। दण्ड का व्यापार तो दण्ड देने के बाद बराबर हो जाता है, सम हो जाता है, पूरा हो जाता है, कुछ शेष नहीं रहता है। उलाहना आदर्श बन कर लटक जाती है। पहले आपको यह विश्वास दिलाया जाता है कि आपको उत्पात नहीं करना था, इस प्रकार आपको सहसा आपके मित्र समूह से च्युत कर दिया जाता है। दूसरा आपको भविष्य में अच्छा करने को प्रेरित किया जाता है। यह प्रेरणा ही बहुत गुरु होकर व्यक्तित्व से लटक जाती है। तब आप न इस विश्व के रहते हो और न ही उस विश्व के, त्रिशंकु से, अधर पर।


भय इस बात का होता है कि कहीं भावावेश में आकर अमिताभ सरकारी गवाह न बन जाये, हमारा नाम भी उजागर न कर दे। सात्विकता में यह अद्भुत गुण होता है कि वह अंगुलिमाल जैसे पापी का मन द्रवित कर सकती है तो अमिताभ हमारी भाँति ही साधारण से उत्पाती भर हैं। क्रोध इस बात के लिये होता है कि कहीं यह सुधर कर वाल्मीकि का पंथ न अपना ले और हम जैसों को अपनी मित्रता से वंचित न कर दे। मित्रों की ऐसी ही स्वार्थपूरित और स्वार्थप्रेरित प्रार्थनायें मित्रों को सुधरने नहीं देती हैं।


आधे घंटे में आशंकाओं के समुन्दर में हम कई बार उतरा चुके थे। मित्र सुधारगृह में गया था, आकर क्या बोलेगा, क्या बतायेगा, सब अनिश्चित था। कहीं ऐसा न हो कि पहचानने से मना कर दे या तुच्छ समझ कर मित्रता तोड़ बैठे। हृदय में संतोष तब हुआ जब अमिताभ वापस आने पर मुस्कुराते हुये मिले और सारा वृत्तान्त सुनाया।


प्रातः सात्विकता के आधिक्य में प्रधानाचार्यजी को संगीत सुनने की प्रेरणा हुयी थी। आजकल हम बहुधा यह सुखद प्रयोग करते हैं पर उस समय मोबाइल या इण्टरनेट का युग नहीं था। छात्रावास में सबसे अच्छा गाने वाले अमिताभ थे, संगीतज्ञों के परिवार से थे और शास्त्रीय संगीत की शिक्षा पा चुके थे। यही कारण रहा होगा कि उन्हें प्रातः स्मरण किया गया। अर्धनिद्रा में और आँख मलते हुये पहुँचने पर जब उनसे यह आग्रह किया गया कि कोई गीत सुनाइये तो उन्हें भी अटपटा लगा होगा। जहाँ तक गायकों के बारे में ज्ञात है, उन्हें एक सहज परिवेश भाता है, प्रतिभा स्वातन्त्र्य से सहज प्रस्फुटित होती है। आग्रह का समय अरुचिकर लगा हो या आग्रह ही आदेशवत लगा हो, उन्होने गीत तो सुनाया पर वह न ब्रह्मकाल के योग्य था, न ही सात्विकता से प्रेरित था और न ही प्रधानाचार्यजी के गाम्भीर्य भाव के साथ सहज बैठता था। गीत था “धूप में निकला न करो रूप की रानी…”। आश्चर्यवत मैने जब पुनः पूछा तब भी अमिताभ ने यही बताया। बस उनको यही कह पाया कि अभिताभ भाई, आप गीत सुना रहे थे कि संदेश दे रहे थे?


अभिताभ के साथ एक और घटना अगले ब्लाग में।

27.3.21

मित्र - २०

कहते हैं कि किसी दीर्घकालिक संघर्ष को समझना हो तो शतरंज खेलना सीखना चाहिये। अपने पास उपलब्ध शक्ति के अनुसार किस प्रकार आक्रमण और रक्षा की जाती है, यह शतरंज सिखाता है। हर मोहरा अपनी तरह से चलता और मारता है और अन्तिम प्रयास यही रहता है कि अपने राजा को बचाते हुये सामने वाले को मात दी जा सके। यही कारण रहा होगा कि शतरंज जैसा खेल मनोरंजन के साथ साथ राजकुमारों का युद्धकला में प्रशिक्षण भी कराता होगा। गूगल महाराज को पता नहीं कैसे ज्ञात हो गया कि शतरंज हमें भी बड़ा प्रिय है, गाहे बगाहे शतरंज के चर्चित खेल और जटिल चालें हमारे स्क्रीन में ठेलते रहते हैं। शतरंज का कभी गम्भीर प्रशिक्षण लिया नहीं, जो भी सीखा है वह देख देख कर ही सीखा है। 


शतरंज की चालों की समझ तीन स्तरों पर होती है। प्रारम्भिक चालें, मध्यम चालें और अन्तिम चालें। प्रारम्भ में अपना दुर्ग सुरक्षित किया जाता है और सामने वाले की रक्षानीति के अनुसार अपने आक्रमक मोहरे व्यवस्थित किये जाते हैं। मध्य में यह प्रयास रहता है कि किसी तरह बीच के खानों पर अधिकार जमाया जाये, दुर्बल पक्ष पर आक्रमण किया जाये और एक आध मोहरा अधिक मारकर बढ़त ले ली जाये। अन्तिम खेल में बहुत कम मोहरे रहते हैं और खेल की तकनीक पूर्णतया बदल जाती है। तब सामने वाले के पैदल भी वजीर बनने की क्षमता रखते हैं। यदि मध्य खेल में आपको किसी मोहरे की हानि हो गयी तो अन्तिम खेल में उसकी कमी पूरी कर पाना दुष्कर हो जाता है और हार सुनिश्चित हो जाती है।


शतरंज के खिलाड़ियों की क्षमता भिन्न स्तरों पर भिन्न होती है। कोई अन्तिम खेल में अच्छा है तो कोई मध्य खेल में। कोई प्रारम्भ में ही सुरक्षा कर खेल बराबर कराने की सोचता है तो कोई अपनी शक्ति के अनुसार अपने सुदृढ़ स्तर तक ले जाना चाहता है। हर चाल के बाद स्थिति बदलती है, कोई कूटचाल कई चालों के क्रम में अपने आप को खोलती है और कई बार अपने एक मोहरे का बलिदान कर दूसरे पर घातक प्रहार किये जाते हैं। घात प्रतिघात के अनुभव से भरा संघर्ष बड़ा रोचक हो जाता है। इसीलिये संघर्ष की समझ बढ़ाने के लिये शतरंज खेलने की सलाह दी जाती है।


यदि शतरंज से तुलना की जाये तो हमारा भी संघर्ष लम्बा था। निर्णय एक या दो चालों से नहीं वरन कई वर्षों में होना था। हम सब अपनी प्रारम्भिक चालें चल चुके थे। हमारी रणनीति उजागर हो चुकी थी। पिछले प्रशासन को शिथिल समझकर हमने जिस प्रकार अपना दुर्ग खुला छोड़ दिया था वह कई प्रकार से दुर्बल पक्षों से भरा था। उसे पुनः सुरक्षित कर लेना विकल्प नहीं रह गया था, खेल मध्य चालों पर पहुँच चुका था। अब सर्वाधिक प्रभावी रणनीति मध्य खेल में बने रहने की थी और वह भी बिना अधिक मोहरे खोये, जिससे हमको चालें चलने का अवसर मिलता रहे। 


अन्तिम खेल हमारा विकल्प नहीं था, यह समझ हमें कई घटनाओं के बाद आ चुकी थी। छात्रावासियों के लिये अन्तिम खेल अपनी अधिकांश मोहरे और चालों को गँवाकर पकड़े जाना था। इस अन्तिम खेल में हम अत्यन्त दुर्बल थे। इसका एक कारण था। अन्तिम खेल में या तो हम अपनी हार स्वीकार कर अनुशासित हो जायें या न सुधरते हुये उत्पात करते रहें। नहीं सुधरने की स्थिति में उसकी सूचना छात्रावास अधीक्षक घर पर पहुँचा देते थे। हमारे अभिभावकों को छात्रावास अधीक्षक पर हमसे अधिक विश्वास था। इस तथ्य के प्रमाण एक नहीं कई साक्ष्य हैं। कब वह हमारे घर पहुँच जायें या कब फोन कर सत्य बता दें, इस बात का तनिक भी भरोसा नहीं था।


इस संदर्भ में एक कनिष्ठ पुष्पेश के साथ बड़ी ही रोचक घटना घटी। उनके अत्यन्त लघु उत्पातों की सूचना उनके घर पहुँचा दी जाती थी। जब छुट्टी में वह घर जाते थे तो उनको अपने अभिभावकों से सुनना पड़ता था। एक बार लौटकर और खिन्नमना हो उन्होंने छात्रावास अधीक्षक आचार्यजी को यह कह भर दिया कि आप छोटी छोटी बातें तो न बताया करें, माता पिता व्यर्थ ही व्याकुल हो जाते हैं कि लड़का वहाँ पढ़ रहा है कि उत्पात कर रहा है? घर में यह बात भी पहुँचा दी गयी और अगली बार घर में डाँट के साथ कुटाई भी हुयी। इस अन्तिम खेल में निरीह से हमारे कनिष्ठ ने कुछ भी कहना छोड़ दिया और अनुशासित हो चले। हमारे न पढ़ने की, अधिक खेलने की, समय व्यर्थ करने की, झगड़ने की सभी छोटी बड़ी बातें हमारे परिवार को यथासमय और यथामहत्व के साथ पता चलती रहती थीं। 


पकड़े जाना अन्तिम खेल में प्रवेश करने सा था पर वह अन्त नहीं था। क्षमा माँग लेने से या यह विश्वास दिलाने से कि आगे नहीं करेंगे, बात घर तक नहीं पहुँचती थी। ऐसा करने के बाद हम नैतिक और राजनैतिक रूप से दुर्बल हो जाते थे। जब पकड़ लिये गये तो उस प्रकार का काण्ड पुनः करना निर्भीकता की पराकाष्ठा थी, हम पर दृष्टि अधिक तीक्ष्ण हो जाती थी। तब घर पर बात पहुँचना अत्यन्त भावनात्मक विषय हो जाता हम सबके लिये। अन्तिम खेल का यही पक्ष पीड़ा देता था कि जब घर की बात आती थी तो छोटे छोटे अनुशासन के प्यादे वजीर बनने की सामर्थ्य रखते थे। वहीं पर हमारी सारी ऊर्जा अवसान पा जाती थी, हम असहाय हो जाते थे। अतः पकड़े जाना किसी भी रूप में हमारा विकल्प नहीं था। 


मध्य खेल में बने रहने में ही सारा रोमांच था, जिसमें पक्ष प्रतिपक्ष अपनी चालें चलता है, बिना मोहरे गँवाये। यदा कदा हम पकड़े भी गये पर यथासंभव मध्य में बने रहे और खेल पूरे ७ वर्ष चला।

23.3.21

मित्र - १९

अनुमति न मिलना, मिलना तो भी कम समय के लिये, यदि कुछ अन्यथा करने का प्रयास तो पकड़े जाना, इस अनुशासनिक कसाव ने हम सबको अनियमित करने के लिये बाध्य किया। एक द्वार बन्द हो जाये तो कई और खुल जाते हैं। जब बालमन ऊर्जा, उत्साह और जिजीविषा से भरा हो तो अवरोध संभावनाओं को जन्म देता है। वह तब जल सा न केवल अवरोध पर सतत प्रहार करता है वरन प्रवाह बदल कर आगे बढ़ जाता है। कठोरता का संदेश स्पष्ट था और प्रत्युत्तर में नये प्रयोगों को आकार लेना था।


पहला प्रयोग था धैर्य की परीक्षा। आक्रमक बने रहने से युद्ध में पहल तो मिलती है पर यदि प्रतिपक्ष बचाव कर ले जाये तो आक्रमण में ऊर्जा क्षय हो जाती है। हमारी क्षुद्र विकल्प पकड़े जा चुके थे, उन पर पुनः दाँव लगाना मूर्खता थी। यदि प्रतिपक्षी हमारे स्तर पर सोच कर बचाव की रणनीति बना सकता है तो हम वैसा ही क्यों नहीं कर सकते थे। यह एक यक्ष प्रश्न था और उसका उत्तर ढूढ़ना प्रतिष्ठा का विषय बन चुका था।


अनुमति माँग कर आप अपना मन्तव्य प्रकट कर देते हैं। मना होने पर यह स्वाभाविक हो जाता है कि आप क्षुब्धमना हो कुछ ऐसा करेंगे जो विद्रोह की श्रेणी में आयेगा, नियमविरुद्ध होगा। आपकी यही मनोदशा आपके आने वाले कृत्यों के बारे में प्रतिपक्षी को एक आभास दे जाती है। यदि आपका व्यवहार इतनी स्पष्टता से व्यक्त हो तो केवल आप पर दृष्टि बनाये रखने ही प्रतिपक्षी का काम चल जाता है। रणनीति और कूटनीति के इस सिद्धान्त को हम सबने समझा और निश्चय किया कि जो भी करना है, बिना अनुमति के ही करना होगा, चुपचाप करना होगा। यदि आप पर संशय नहीं होगा तो आप पर दृष्टि भी नहीं रखी जायेगी। 


एक छात्रावास अधीक्षक के पास कितनी भी तीक्ष्ण बुद्धि हो या अपार ऊर्जा हो, संख्याबल के सामने सब क्षीण हो जाती है। सौ बालकों के ऊपर दृष्टि रखना संभव नहीं है। यदि आप स्वयं दृष्टि में नहीं आना चाहें तो आपके लिये गुप्त रूप से बाहर सरक लेना सरल हो जाता है। कभी कभी सामने वाले को दिग्भ्रमित करने के उत्साह में एक भूल हम कर जाते हैं। संशय न हो, यह दिखाने के प्रयास में हम सहसा अधिक नियमबद्ध हो जाते हैं। सज्जन, सौम्य, मृदुल और अनुशासित छवि उभारने के प्रयास में अभिनय की अति कर जाते हैं। संशय न होने देने का उपक्रम ही संशय उत्पन्न कर देता है। जगजीत सिंह की चर्चित पंक्तियों की तरह “तुम इतना जो मुस्करा रहे हो…”।


काण्ड करने के पहले अज्ञातवास में जाना आवश्यक था, भीड़ में रह कर सामान्य दिखना आवश्यक था, एक दिन का अभिनय नहीं वरन सप्ताहों की सहजता आवश्यक थी। धैर्य यहीं तक पर्याप्त नहीं था, मुख्य कार्य में और अधिक धैर्य रखना होता था। छात्रावास अधीक्षक सामाजिक रूप से भी व्यस्त रहते थे। इस कारण से कई बार उनका परिसर से बाहर जाना होता था। हम इसी प्रतीक्षा में रहते थे कि कब यह अवसर आये और हम अपने काण्ड क्रियान्वित करें। वही समय रहता था छात्रावास की पिछली दीवार लाँघ कर बाहर सरक लेने का।


बड़ी सफलता के लिये छोटी छोटी कई सफलतायें सोपान का कार्य करती हैं। बड़े प्रयोगों को पहले लघु अनुपात में किया जाता है। बड़े प्रयोग असफल न हो जायें, हानि अधिक न हो जाये, इस हेतु त्रुटियों को समूल हटाना होता है। एक छोटी त्रुटि पूरे प्रयास को धाराशायी करने में सक्षम है। यदि तीन चार घंटे बाहर रहने का लक्ष्य पाना था तो लघु प्रयोग एक घंटे से प्रारम्भ करने थे। सूचना तन्त्र, वैकल्पिक उपस्थिति, साक्षी मित्र, काण्ड निष्पादन हेतु सभी का पूर्व उपाय और अभ्यास करना होता था। उस समय मोबाइल का युग नहीं था अतः तात्कालिक सूचना और निर्णय संभव नहीं थे। जो भी योजना होनी थी, पूर्वनियोजित और विस्तृत होनी थी। विकल्पों की श्रेणियाँ, स्तर, किस दशा में क्या करना है, इस सबकी तैयारी करके ही जाना होता था। सबको सम्मिलित नहीं किया जा सकता था, विश्वास एक दो पर ही करना होता था। एक सूत्रधार जो आपकी अनुपस्थिति में आपके हित में कार्य कर सके, एक सहायक जो आकस्मिकता की स्थिति में सब कुछ सम्हाल सके।


कुछ साहसी मित्र थे जो प्रायिकता के सिद्धान्त पर चलते थे, वे अत्यन्त आशावादी थे। उनको लगता था कि योजना और बुद्धि लगाने से कुछ नहीं होगा, यदि करना हो तो निकल जाओ। ऐसे व्यक्ति स्वयं तो भ्रम में रहते हैं और प्रकृति भी उन्हें भ्रम में रखती है, मूर्खता के दलदल में आमन्त्रित करती हुयी। किसी भी नये प्रयास में आशातीत सफलता मिल जाती है, इसे “प्रारम्भिक भाग्य” का सिद्धान्त कहते हैं, प्रकृति आपका उत्साह बढ़ाने का कार्य करती है। बस आपको यह समझना होता है कि आप मेधा के पथ पर बढ़ रहे हैं या मूर्खता के पथ पर। मेरा तब भी यह सिद्धान्त था और अब भी यह सिद्धान्त है कि बिना विधिवत पूर्वयोजना के प्रायिकता भी क्षीण होने लगती है। बिना अभ्यास के कुछ भी सार्थक टिकता नहीं है।


एक दूसरा सिद्धान्त यह था कि जो करना हो करते चलो, जब पकड़े जायेंगे तो दण्ड सह लेंगे, काण्ड-प्रारम्भ से पकड़े जाने के बीच का आनन्द, दण्ड से कहीं अधिक होगा। चार्वाक के उपासकों से प्रेरित यह सिद्धान्त भी हमें स्वीकार्य नहीं था। काण्ड के उत्कृष्ट निष्पादन में जो संतुष्टि का सुख था वह भविष्य में हम सबका स्वातन्त्र्य-अमृत होने वाला था। पकड़े जाने के परिणाम हम सबके लिये भयावह थे। छात्रावास अधीक्षक के पास वह अन्तिम ब्रह्मास्त्र था जिसके आगे हम सब निरुत्तरित थे। अतः पकड़े जाना हमारा विकल्प नहीं था, भले ही योजना में कितनी भी सिद्धहस्तता अर्जित करनी पड़े।


निष्पादन, उद्धाटन और परिणामों की चर्चा अगले ब्लाग में।

20.3.21

मित्र - १८

अतृप्ति के मूल में तुलना है। सामान्य से विशेष होने की इच्छा अतृप्ति का कारण बनती है। प्रयत्नों की चेष्टा प्रक्रिया बन जाती है और हम व्यस्त हो जाते हैं। आश्चर्य तब होता है जब विशेष प्राप्त हो जाने के बाद यह रहस्योद्घाटन होता है कि यह विशेष तो उतना विशेष नहीं था। समय और ऊर्जा व्यर्थ हो जाने का दुख होता है, यदि कुछ प्राप्य रहता है तो यह ढाढ़स कि जो चाहा था, पा लिया। क्या चाहा, क्यों चाहा, ये प्रश्न आत्म के लिये अनसुने हो जाते हैं। यह तो बहुत बाद में समझ आया किस अवस्था में किसे विशेष मानना चाहिये। तुलसीदास को जब उस विशेष की समझ याद दिलायी गयी तो रामचरितमानस सा अद्भुत ग्रन्थ लिखा जा सका। हम छात्रावासियों को इसी विशेष को समझाने का प्रयास और हमें अपने ही विशेष मानकर उनको पाने की उत्सुकता, इन्हीं दो धरातलों के मिलने की प्रतीक्षा क्षितिजवत हो गयी, छायायें लम्बी हो गयीं, सूर्य उदास सा स्वयं ही अस्त हो चला, हर दिन। 

स्वातन्त्र्य के लिये हम सबके मन में एक छटपटाहट थी और वह ऐसी ही तुलना पर आधारित थी। इस तुलना में विशेष की प्राप्ति के लिये मन नहीं अकुलाता था वरन सामान्य की प्राप्ति को आत्म उद्धत होता था। जब अधिकांश के पास “वह” हो तो “वह” विशेष नहीं रह जाता है। जब सामान्य भी हाथ में न हो तो मन की पीड़ा वंचितों सी होती है। हम छात्रावासियों की दशा कुछ ऐसी ही थी। अनुराग से इस पक्ष पर विस्तृत चर्चा हुयी तब कहीं जाकर वर्षों के बाद उलझे कारण सुलझ कर सामने आ सके, हम अपने व्यवहार का कारण समझ सके। 

हमारी कक्षा में विद्यालयवासियों की संख्या कहीं अधिक थी। हमारी दृष्टि में उनके पास पर्याप्त स्वतन्त्रता थी। वे ही हमारे नित्य के सम्पर्क बिन्दु थे, वही समाचारों के वाहक थे, कहाँ क्या चल रहा है? जब भी कक्षाओं के बीच में बातचीत चलती थी, उनके द्वारा ही पता चलता था कि कौन सी फिल्म कहाँ लगी है? कई लोग देख भी आते थे और कथानक भी सुनाते थे। यह अनुभव भी कि वापस घर जाते समय कितने आनन्द उठाते हुये भिन्न जगहों पर स्वादिष्ट पकवान खाते थे। इसके बाद भी जो आनन्द शेष रह जाता होगा वह घर पहुँचकर माँ के हाथ का भोजन कर और स्नेह पाकर मिल जाता होगा। हमारे विद्यालय के मित्रों ने एक अतरंगी सा विश्व बना रखा था बाहर का, अपने अनुपात से कहीं बड़ा, कहीं अधिक मनोहर। 

सारा आनन्द केवल विद्यालयवासियों के भाग में था, ऐसा नहीं था। उनको भी लगता होगा कि छात्रावासी अधिक आनन्द में रह रहे हैं। न कोई पढ़ने के लिये पूछने वाला, न कोई विलम्ब से घर आने के लिये डाँटने वाला, मित्रों के साथ चौबीस घंटों का साथ, दिन भर गपियाने का आनन्द, एक उत्सवीय जीवन। मुझे तो कभी विचार नहीं आया पर मनीष ने बताया कि छात्रावासियों की आत्मीयता, एकता, उत्श्रृंखलता और प्रतियोगी परिवेश उनको सदा से ही प्रभावित करता रहा है। 

हमारे इस दिवा स्वप्न का सरल समाधान तो यह था कि सप्ताह में एक दिन बाहर जाकर हम वह संसार देख आते और उसका यथार्थ समझ आते या कुछ ऐसा होता कि छात्रावासी और विद्यालयवासी माह में २-३ दिन एक दूसरे के स्थान पर रह लेते। इतने सरल उपायों के स्थान पर हमें अनुशासन का पाठ पढ़ाया गया, बड़े स्वप्न देखने की प्रेरणा पकड़ायी गयी, बालसमझ के मानस में आदर्शों को ढेला गया। ये सब भी आवश्यक थे, पर समय आने पर। पतंजलि योगसूत्र में कहते भी हैं कि क्रम बदलने से कार्य बदल जाता है। समय के पहले और आवश्यकता से अधिक खाकर अपच हो गयी, जठराग्नि के अभाव में कुछ पचा ही नहीं पाये। जानने और करने की उद्भट आंकाक्षा जगती तो यही सब बुद्धिविकास और जीवनोत्थान के पोषकतत्व हो जाते। अपने विशेषों में उलझे हम विशेष की सार्थकता समझ ही नहीं पाये। साधना में मन कहाँ रमेगा जब मन स्वयं ही सुख साधन जुटाने निकल पड़ा हो। हमें तो सुख की हर परिकल्पना में बाहर के दृश्य सुहाते थे। 

इस मनोदशा का परिणाम यह होता था कि किसी प्रकार बाहर जाकर यदि कल्लू की चाट भी खा आये तो लगता था कि जगत जीतकर लौटे हैं। इसी से प्रेरित थी, किसी भी सायं को या अवकाश के दिन बाहर जाने की उत्कण्ठा। बाहर जाने की अनुमति लेनी होती थी जो कि साधारणतया नहीं मिलती थी। कारण बताने होते थे जाने के। कोई कितने कारण उत्पन्न करेगा अपनी बुद्धि से और कैसे संतुष्ट करेगा छात्रावास अधीक्षक को उसकी आवश्यकता के बारे में? बाल कटाने के लिये माह में एक बार और वह भी निश्चित नहीं, कह दें कि बाल ठीक लग रहे हैं। अनुमति मिले भी तो, वह भी एक घंटे की। सप्ताहों के देखे सपने कहाँ भला एक घंटे में आकार पा पाते हैं? दूसरा कारण था आवश्यक सामान लाने का, कोई पुस्तक या कलम या साबुन। उसमें भी एक घंटे से अधिक नहीं, पास में ही सरस्वती पुस्तक भण्डार था। मित्र से कोई प्रश्न पूछने के लिये? यह बहुत ही दुर्बल कारण था। 

सत्य बताना संभव नहीं था। कहीं खाने जा रहे हैं या फिल्म देखने जा रहे हैं, ये कारण अनुमति मिलने में आधारहीन थे, अर्थहीन थे। भोजन छात्रावास में मिलता ही था और छात्र जीवन में फिल्म से दूर रहना चाहिये, इससे मानसिक प्रदूषण होता है, इति। किसी और कारण से अनुमति लेकर कुछ और कर आने के कई प्रयास हुये भी और पकड़े भी गये। आवश्यक सामान लाने और कार्य निपटाने का समय पूर्वाह्न में होता था, उस समय न कल्लू की चाट का ठेला लगता था और न हीं फिल्म का कोई शो ही प्रारम्भ होता था। वैसे भी एक घंटे की अनुमति लेकर तीन घंटे में वापस आना संशय को उत्पन्न कर देता। इस बाध्यता के कारण कुछ छात्रावासियों ने नियमित फिल्म के पहले चलने वाली छोटी अवधि की अंग्रेजी फिल्में ही निपटा डालीं। 

बाहर का विश्व कुछ तो विद्यालय के मित्रों ने बड़ा बना दिया था, शेष अनुशासन के कठिन नियमों ने। रुद्ध जल सदा ही अवरोध से टकराकर पार पाना चाहता है और जब तक राह नहीं बना लेता उसे आगे की कोई समझ नहीं रहती। हमारी भी वही स्थिति रही, ऊर्जा और समय बस इसी पर व्यर्थ होते रहे। आज उन्हीं घटनाओं का विचार विनोद उत्पन्न कर देता है पर उस समय हम इन्हीं क्रियाओं में गम्भीरतम थे। 

हमारी चिन्तन प्रक्रिया भले ही न समझी जा सकी हो पर हमारे बुद्धिबल की थाह पायी जा चुकी थी। हमारी चालें और बाध्यतायें स्पष्ट हो चली थीं। तू डाल डाल, मैं पात पात, यह मुहावरा जीवन्त हो चला था।

16.3.21

मित्र - १७

उत्पात और दण्ड, दोनों ही अपने अपने संदेश देने का प्रयत्न करते हैं। एक नियत संदेश देने के लिये उत्पात या दण्ड की मात्रा कम रही या अधिक, इस पर सदा ही मतभेद रहा है। उत्पात और दण्ड कितने सफल रहे, यह इस पर निर्भर करता है कि संदेश का परिणाम कितना प्रभावी रहा। यदि उत्पात अपनी स्वतन्त्रता सिद्ध करने के लिये किया गया हो तब दण्ड के साथ नियमों में तनिक ढील हो जाये तो उत्पात सफल रहता है। यदि उत्पात में दण्ड के साथ नियमों में कठोरता कर दी जाये तो उत्पात पूर्ण रूप से असफल। संदेश देने में तो सफल पर प्रभाव छोड़ने में असफल। नियमों में कठोरता कर अनुशासक स्वतन्त्रता को और बद्ध कर देता है। संदेश दो रहते हैं कि उत्पात और स्वतन्त्रता में ढील, दोनों ही स्वीकार्य नहीं हैं। यदि उसके बाद शान्ति हो जाती है तो संदेश सफल रहा और यदि पुनः उत्पात होता है तो संदेशों के कई और चक्र होने शेष हैं इस रण में। किसमें कितनी ऊर्जा रही, किसमें कितना धैर्य रहा, किसमें कितना चातुर्य रहा, इस रोमांच का कथास्थल रहा है हमारा छात्रावास।


छात्रावास के ७ वर्षों में इस विषय में साम्यस्थिति कभी पहुँची ही नहीं। जिस समय छात्रावास अधीक्षक अनुमति देने में सहृदयता दिखाते रहे, उत्पात की आवृत्ति और आवेग कम रहे। जब से नियमों को कड़ा किया गया या उनका अनुपालन सुनिश्चित करने में विशेष प्रयास किया गया, उत्पातों का बुद्धि सौन्दर्य बढ़ता गया।


छात्रावास परिसर में मुख्यतः तीन आचार्य थे जो छात्रावास के दायित्वों से सीधे संबद्ध थे। एक प्रधानाचार्यजी थे जो अनुशासनप्रिय थे। प्रातः उठना हो, पूजा में पहुँचना हो या जो भी गतिविधि लेते थे, उसमें नियमों की प्रयुक्ति सुनिश्चित करते थे। दण्ड देने के लिये उत्पात की सूचना उन तक पहुँचना आवश्यक होता था। उनके सूचना तन्त्र के अवयव अधिक समय तक अपना रहस्य नहीं रख पाये। वे छात्र और सहायक धीरे धीरे उत्पात के क्रियान्वयन की परिधि से बाहर होते गये। गुप्तचर यदि गुप्त न रह पाये तो उसकी दुर्गति बहुत होती है। उनको कभी भी उत्पात में सम्मिलित नहीं किया गया। कई बार उनको नियन्त्रित सूचना पहुँचाने के उपयोग में लाया गया। फिल्म शोले जैसी नाटकीयता तो नहीं पर “सब ठीक चल रहा है का संदेश” उनके माध्यम से ही भेजा जाता था।


प्रधानाचार्यजी का विश्वास था कि शब्द अत्यन्त प्रभावी होते हैं और हम छात्रावासी शब्द सुनकर ही सुधर जायेंगे। उनके उद्बोधनों की ओजस्विता अनुकरणीय है। शब्दों पर नियन्त्रण, वाक्यों का प्रवाह और विषय पर दृष्टि, तीनों सधे हुये चलते हैं और इस सम्मोहन में कब समय निकल जाये, यह पता ही नहीं चलता है। शब्द जितने सक्षम थे, हम उतना सुधरे भी पर “मनसा वाचा कर्मणा” में केवल एक विमा ही पर्याप्त नहीं होती है। मन से और कर्म से हम सब फिर भी उत्पाती बने रहे, बस शब्दातीत हो गये। लब्ध और शब्द में जो जिस समय दिखा, वह स्वीकार कर लिया।


दूसरे आचार्य थे, प्रमुख छात्रावास अधीक्षक। सरल थे, गृहस्थ थे और छात्रावास के लिये अधिक समय नहीं निकाल पाते थे। यदा कदा उनकी उपस्थिति हमारे आदर का विषय थी। तीसरे आचार्य थे जो मुख्यतः हमारी सारी गतिविधियों पर सतत दृष्टि रखते थे और बाहर जाने के लिये या किसी अन्य कार्य को करने के लिये उनकी अनुमति आवश्यक होती थी। प्रथम तीन वर्ष उनके पास भोजनालय का भी दायित्व था। उनकी दोनों दायित्वों में व्यस्तता हमारी स्वतन्त्रता में बाधक नहीं थी। अनुमति देने में अधिक पूछताछ नहीं करते थे, हाँ कारण पुष्ट होना चाहिये। हम लोग हर बार एक नवीन कारण ढूढ़कर लाते थे। उनके समय में हमारी बौद्धिक क्षमता का समुचित विकास हुआ। अति उदारमना होने में उनका यह सिद्धान्त रहा होगा कि अधिक कसने से चूड़ियाँ टूट जाती हैं, समुचित विकास के लिये ढील आवश्यक है। इस ढील का हम सबने अन्यथा बहुत लाभ उठाया।


तीन वर्ष बाद जब परिवर्तन हुआ तो एक के स्थान पर दो आचार्यों को लगाया गया, एक भोजनालय के लिये और दूसरे छात्रावास के लिये। यह वह समय था जब दोनों ही क्षेत्रों में और दोनों ही पक्षों में घर्षण हुआ। भोजन की कथा के बारे में फिर कभी पर छात्रावास में हम लोगों की जीवनशैली में आमूलचूल परिवर्तन होना प्रारम्भ हो गया। जिन ढीलों को हम अपना अधिकार माने बैठे थे, जिन पर कभी कोई प्रश्न नहीं करता था, जिन कृत्यों के बारे में किसी को पता नहीं चलता था, वे सारे तत्व विचारणीय हो गये और हम सबकी दशा दयनीय।


छात्रावास सम्हाल पाना सबके बस की बात नहीं है। इसमें समय, ऊर्जा और बुद्धि तीनों ही चाहिये होता है। पहली बार लगा था कि तीनों में ही हमसे कोई आगे चल रहा है। एक के बाद एक ऐसी घटनायें होती गयी, ऐसी स्थानों से लोग टहलते हुये पकड़े गये कि यह समझना कठिन हो गया कि क्या करें, क्या न करें? अनुशासन अपने स्थान पर था पर युवा मन को लगने लगा कि उनकी ऊर्जा को कहीं से चुनौती मिल रही है। योजना का जो स्तर अभी तक हम लोग प्रयोग में ला रहे थे, उससे कहीं सूक्ष्मतर दृष्टि से हम देखे जा रहे थे। जिन दुर्गों में हम निश्चिन्त हो बैठे थे, वे सब एक के बाद एक ढह रहे थे। कौन सा सूचना तन्त्र कार्य कर रहा है, यह समझ नहीं आ रहा था? बात नियमों के कठिन या सरल होने की नहीं रह गयी थी, अब प्रतिष्ठा स्वयं को सिद्ध करने की हो गयी थी। संदेश देने के पहले ही पकड़े जा रहे थे, उत्पात मचाने के पहले ही उद्घाटित हुये जा रहे थे।


रण अब प्रत्यक्ष नहीं रह गया था, रण एक नये स्तर पर पहुँच गया था।

13.3.21

मित्र - १६

उत्पात और दण्ड के संदर्भ में सुन्दरकाण्ड का वह प्रकरण अत्यन्त रोचक व गूढ़ है जिसमें सीता का पता लगाने के बाद वानर दल वापस आता है और अपने राजा सुग्रीव से मिलने के पहले उनके प्रिय मधुवन में शहद के छत्ते तोड़ तोड़ कर खाता है। मधुवन सुग्रीव को इतना प्रिय था कि उसकी रक्षा के लिये उन्होंने अपने मामा दधिमुख को नियुक्त किया था। दधिमुख के मना करने पर भी अंगद और हनुमान ने वानरों को प्रेरित किया कि वे जितना आनन्द उठाना चाहें, उठायें। हार मानकर जब दधिमुख सुग्रीव के पास जाते हैं तो राजा सुग्रीव को उस उत्पात के पीछे का संदेश समझ आ जाता है, जिसे देने का उपक्रम वानरदल कर रहा था। 

“जौं न होत सीता सुधि पाई, मधुवन के फल सकहिं कि खाई।” आशय स्पष्ट था, यदि सफल आकर न आये होते, सीता का पता लगा कर न आये होते तो इतना साहस नहीं कर सकते थे। सुग्रीव मुस्करा देते हैं, दधिमुख को उन्हें सादर लेकर आने को कहते हैं। उत्पात मचा पर कोई दण्ड नहीं वरन सर्वत्र प्रसन्नता। सफलता, उत्साह, साहस, उत्पात, क्रोध, संदेश और विनोद का यह क्रम बड़ा ही रोचक है। कभी कुछ पहले आ जाता है, कभी कुछ बाद में आता है या नहीं भी आता है। 

इसके पहले हनुमानजी अशोकवाटिका में भी उत्पात मचा चुके थे। उस घटना को भी उपरिलिखित क्रम से देखें तो सफलता सीता माँ का पता लगाने की, उत्साह सीता माँ द्वारा पुत्र के रूप में दिये आशीर्वाद का, साहस कुछ विशेष कर दिखाने का, क्रोध रावण पर, संदेश राम की शक्ति का, निष्कर्ष रावण की अतिप्रिय अशोकवाटिका का उजाड़ देना। मधुवन और अशोकवाटिका, दोनों में ही उत्पात हुआ, दोनों में ही हनुमानजी की प्रमुख भूमिका थी, पर दोनों में संदेश भिन्न था। 

बचपन से ही हम सब हनुमानजी के किंकर हैं, उनका चरित्र भाता है, विशेषकर जहाँ शक्ति प्रयुक्त हो, जहाँ कुछ उठक पटक हो। राम के प्रति उनकी अनन्यभक्ति की समझ तो बहुत बाद में आयी। सागर पर छलाँग लगानी हो, अशोक वाटिका का विध्वंस हो, लंकादहन हो, संजीवनी बूटी के लिये पूरा पहाड़ उठा लाना हो, सूर्य को निगलने कूद पड़ना हो, अहिरावण की भुजा उखाड़नी हो, उनका रौद्र रूप अभिभूत कर जाता है। परोक्ष रूप से बालमन को एक संस्तुति सी मिलती है, उत्पात मचाने के लिये। 

हम सबके लिये बस भिन्नता यही रही कि संदेश कुछ देना चाह रहे थे, दे कुछ और गये। सफलता की जो परिभाषा हमने समझ रखी थी उससे हमारे आचार्यों के विचार कभी मेल ही नहीं खाये। फल यह मिला कि जहाँ हनुमानजी को राम ने गले लगा लिया, हम लोग बहुधा ढंग से कूटे गये। 

सफलता आते ही हम कुछ विशेष हो जाते हैं। सामान्य रूप से देखें तो उत्पात की घटनाओं के पीछे कोई तात्कालिक सफलता होती है। एक मित्र के पुत्र अपने मित्रों के साथ सड़क पर पार्टी कर रहे थे, पुलिस उठाकर ले गयी, पता चला किसी की पदोन्नति हुयी थी, उत्पात मचा कर व्यक्त कर रहे थे। सफलता मदवत ऊर्जा भर देती है, कहीं निकालने की इच्छा होती है, शीघ्र ही। अब सार्थक कार्य तो धीरे धीरे होते हैं, समय लेते हैं, उत्पात शीघ्र सम्पन्न हो जाता है। छोटा बच्चा चीखता है, संभवतः सदैव पीड़ा न रहती हो, वह चीख कर उत्सुकता व्यक्त करता हो, कहता हो कि मेरी भी सुनो या मुझे भी समय दो। 

संदेश जिसको पहुँचाना होता है, उसका ध्यान आकर्षित करने के लिये उत्पात की दिशा उस वस्तु के प्रति होगी जो सर्वाधिक प्रिय हो। बच्चा आपकी शान्ति भंग करता है, आधी रात को। युवा अति अनुशासन में नियम तोड़ता है क्योंकि नियम व्यवस्था को प्रिय होते हैं। यदि अतिप्रिय वस्तु पर लक्ष्य नहीं करेंगे तो संभव है कि उत्पात-प्रेषित-संदेश शिथिल पड़ जाये। 

समस्या यह भी है कि यदि बच्चा उत्पात न मचाये, उद्दण्डता न करे तो उसे सामान्य विकास नहीं कहा जा सकता। उत्पाती बालक से कम से कम दो तथ्यों पर हमें संतुष्ट रहना चाहिये। पहला कि बालक में ऊर्जा है और दूसरा कि उसमें सृजनात्मकता है। किस स्तर का उत्पात किया है, किसे लक्ष्य किया है, क्या संदेश दिया है और कौन सी प्रिय वस्तु तोड़ी है, ये सब सूचक हैं कि विकास की दशा और दिशा क्या है, मानसिक व शारीरिक दोनों। 

एक समय तक तो सब ठीक चलता है, हमारे उत्पात स्वीकार्य होते हैं। तब क्या ऐसे कारण होते होंगे कि हमें सहसा दण्ड मिलने लगता है? हम ही अपनी सीमा लाँघ जाते हैं या संदेश ठीक नहीं पहुँचा होता है। जिसमें सोचते हैं कि हमने बुद्धि का विशेष प्रयोग किया है और उसकी सराहना होनी चाहिये, उसे अनुशासनहीनता समझ लिया जाता है। जिसे दीनता मानते रहे, उसे अनुशासन समझा जाता है। 

सफलता और संदेश की समझ में भिन्नता आने से अनुशासित और अनुशासक पीड़ित रहते हैं। छात्रावास और विद्यालय का पूरा समय यही समझने और समझाने में चला गया।

9.3.21

मित्र -१५

अशोक व्यग्र थे। जिस कार्य को यत्न, परिश्रम और लगन से खड़ा करने में वर्षों लगे, सहसा कोई आ टपकता है और श्रेय लेकर चला जाता है। अशोक भावनात्मक जीव नहीं हैं और अपने प्लांट में उनकी छवि जीवट प्रबन्धक की है, कार्य निष्पादक के रूप में। हर परिस्थिति में प्रसन्न रह लेना उनके स्वभाव का अंग है पर मित्रों से बातचीत में मन के कुछ अव्यक्त और खटकते भाव शब्द पा जाते हैं। “रहिमन निज मन की व्यथा” वाला दोहा मित्रों में प्रयुक्त नहीं होता है और न ही होना चाहिये। कई बार अपना कोमल पक्ष घर में नहीं बताया जा सकता है क्योंकि वहाँ पर आपका रूप सबकी व्यथा सम्हालने का होता है, न कि अपनी व्यक्त करने का।

पूछा कि क्या ऐसा पहली बार हुआ है? बहुत बार लगभग यही हुआ है, थोड़ा बहुत भिन्न रूपों में। ऐसे कटु अनुभवों की प्रायः वह उपेक्षा कर देते हैं और कर्मयोगी के रूप में अपने प्लांट के प्रति सतत समर्पित रहते हैं। श्रेय पर अपना अधिकार जताने की या उसे बताने की प्रवृत्ति ईश्वर ने उनको नहीं दी है या यह करना उनको याचक सा कृत्य लगता हो। एक कार्य में जब कई लोगों ने हाथ लगाया हो या दृष्टि जमाई हो या चर्चा चलाई हो, तो सफलता का श्रेय बटने में अन्याय हो ही जाता है। श्रेय आर्थिक नहीं भी हो, पीठ थपथपा देना या कंधे पर हाथ रख देना ही पर्याप्त होता है। प्रशंसा इतनी मादक होती है कि उसके सम्मुख धनप्रदत्त सुख क्षीणवत हो जाते हैं। कार्यक्षमता कई गुना बढ़ जाती है। वहीं इसके विपरीत जब लगता है कि अन्याय बार बार और जानबूझ कर किया जा रहा है तो कार्य अतिसामान्य क्षमता में निष्पादित होता है। 

एक प्रबन्धक के रूप में और रेलवे में लगभग २५ वर्ष के अनुभव के आधार पर कह सकता हूँ कि अपने कनिष्ठों के कार्य का श्रेय ले जाना मुर्गी को काट कर सारे अण्डे एक साथ निकालने जैसा है। उसके बाद मुर्गी अण्डे देने की स्थिति में ही नहीं रहती है। कनिष्ठों का मनोबल टूट जाता है। कनिष्ठों को कार्य का श्रेय देने से आपको स्वयं ही उनके नेतृत्व का श्रेय मिल जाता है। समझदार अधिकारी जानता है कि जो कार्य कई लोगों ने मिलकर किया हो, उसमें एक का श्रेय लेकर उभरना कईयों के प्रति अन्याय करने के बाद हुआ होगा। 

कार्य यदि अपेक्षित कोटि का नहीं भी हुआ तो भी प्रयास का श्रेय दिया ही जा सकता है। एक दो बार यह प्रयोग भी किया है कि किसी कार्य के लिये एक ढीले कर्मचारी को भी आंशिक श्रेय दिया। आत्मग्लनि का भाव रहा हो या नव उत्साह हो, उस कर्मचारी ने अगला कार्य सर्वोत्तम कर के दिखाया और सच्चा श्रेय साधिकार अर्जित किया। 

मेरे अनुभव सुनाने से संभवतः अशोक का क्षोभ कम न हो पाता अतः यह सब उसको नहीं बताया। यहाँ प्रश्न कार्यक्षमता बढ़ाने का नहीं था, अन्याय का दंश झेले मित्र को समझने का था। बताया कि इस दलदल में वह एकाकी नहीं है, हम सबके साथ यह होता है, एक बार नहीं बार बार। हाँ, जब पहली बार हुआ था तो कष्ट बहुत हुआ था। इसके विपरीत भी हुआ है। एक स्थान पर पदस्थापना के तीसरे ही दिन किसी स्टेशन में यात्री सुविधाओं का उद्घाटन था। मंत्रीजी ने मंच से प्रशंसा कर दी। मन बिना प्रयास किये पूर्ण प्रफुल्लित हो गया। उस समय तो अपने पूर्ववर्ती को श्रेय देने की स्थिति ही नहीं थी। कई बार पूर्ववर्तियों के किये प्रयास से आपको कार्य पका पकाया मिलता है, बस श्रेय भर लेने का श्रम करना होता है। एक स्थान पर पूर्ववर्ती ने तन्त्र, व्यवस्थायें और सहयोगी इतने उत्कृष्ट कर दिये थे कि एक के बाद एक कार्य होते चले गये। 

इस आधार पर देखा जाये तो कई बार आपको उस कार्य का श्रेय मिल जाता है जो आपने नहीं किया है। कई बार आपको किसी और के कृत्यों का दण्ड भी मिलता है। वर्षों से चौपट तन्त्र में आप कार्य करने जाते हैं और सहसा सारे आँकड़े भरभरा कर गिरने लगते हैं। कई बार आँकड़ों को कृत्रिम रूप से इतना बढ़ा चढ़ा दिया जाता है कि आपके पहुँचते ही आपके प्रयास भरभरा कर गिर जाते हैं, यदि आपने स्थिति को यथारूप प्रस्तुत करने का प्रयास किया। ऐसी स्थिति में तब कुछ नहीं किया जा सकता है। अपने वरिष्ठों को सत्य बताईये और फल की कामना से रहित हो कार्य में लग जाइये। आप कितना भी कार्य कर लेंगे, आँकड़े पिछले वर्ष की तुलना में उस अनुपात में सुधरने से रहे। 

श्रेय का आदान प्रदान तो होता ही रहता है, प्रकृति की व्यवस्था जो है। दुख अन्याय पर होता है, जब यही कार्य जानबूझ कर किया जाता है। कर्मफल का सिद्धान्त मानकर चलिये तो इस जटिलता की व्याख्या कर सकेंगे। मान लीजिये कि पिछले जन्म में श्रेय लेने वाले ने आपकी जान बचायी थी, उस सुकृत्य का फल वह पा रहा है। मान लीजिये कि वह अगले जन्म में आपके काम आयेगा। अन्याय की गाँठ फिर भी न सुलझे तो सब ईश्वर पर छोड़ दीजिये, उसका न्याय तन्त्र अद्भुत है। एक क्षेत्र में हुयी हानि की भरपायी वह दूसरे क्षेत्र में कर देता है। देवो अन्यत्र चिन्तयेत। 

इस चर्चा के बाद हम दोनों को विद्यालय की वह घटना याद आयी जब हम दोनों की कुटाई हुयी थी। किसी और के कृत्य का दण्ड मिला था।

6.3.21

मित्र - १४

जिस समय छात्रावास में आये थे, लगभग १०० छात्रावासी और १० कक्ष थे जो ७ वर्षों बाद बढ़कर क्रमशः १३० और १२ हो गये। इनमें से दो कक्ष बड़े थे, शेष कक्षों में प्रत्येक में ९ छात्र रहते थे। एक कक्षप्रमुख होता था, जो मुख्यतः १२वीं कक्षा का होता था, शेष कनिष्ठ कक्षाओं से, लगभग हर कक्षा से एक। दो या तीन ऐसे छात्र होते थे जिनको अपने कक्ष में अपनी कक्षा के मित्र मिल जाते थे, अन्यथा सबके लिये कक्ष का स्वरूप एक अनुशासनात्मक व्यवस्था की तरह था। सबको अपने सभी कार्य करने होते थे और यह सुनिश्चित रखने का दायित्व कक्षप्रमुख का होता था। कक्ष में झाड़ू लगाने का कार्य क्रम से आता था। एक दण्ड विधान था कि यदि झाड़ू नहीं लगायी या ठीक से नहीं लगायी तो अगले दो दिन लगानी पड़ती थी। 

प्रातः जागरण का कार्यक्रम व्यवस्थित रूप से होता था। प्रारम्भ के दिनों में प्रधानाचार्यजी स्वयं उठाने आते थे। वह कक्षप्रमुख या कक्ष के किसी अन्य उत्साही को उठा देते थे और उसका कार्य रहता था शेष सबको उठाना। जैसे ही पहले कक्ष से जागरण प्रारम्भ होता था आने वाले कक्षों को आहट लगने लगती थी और धीरे धीरे वह आहट एक स्पष्ट कोलाहल का स्वर ले लेती थी। आहट पर आँख खुलने पर लगता था कि अभी ५ मिनट और हैं, एक झपकी ली जा सकती है। एक बार आपके कक्षप्रमुख को उठा दिया उसके बाद भी लगता था कि शेष ७ को पहले उठाया जाये, उसके बाद उनका क्रम आये। आशा के ये दो कालखण्ड भले ही कुछ मिनटों के होते थे पर इनमें चुरायी हुयी नींद बहुमूल्य होती थी। 

नहीं उठने के या देर से उठने के छोटे मोटे बहाने स्वीकार्य नहीं थे। हाथ, पाँव, पेट, नाक आदि की पीड़ा प्रत्यक्ष प्रमाण के अभाव में असिद्ध थी। इन पीड़ाओं के अनुमान लगाने के साधन नहीं थे और आपके वचन शब्द प्रमाण माने जाये, आप उस स्तर के आप्त नहीं थे। सर्वाधिक प्रमाणिक ज्वर माना जाता था। उठने की इच्छा नहीं होने पर मन स्वयं से ही प्रश्न करता कि जरा जाँच लो, कहीं ज्वर तो नहीं है। जाड़े में रजाई से शरीर निकालने पर वैसे ही गरमाता है, उससे स्वयं को ज्वर का भ्रम हो जाये पर कक्षप्रमुख को नहीं होता था। यहाँ पर कक्षप्रमुख का ७ वर्ष का अनुभव बड़ा काम आता था। वैसे भी यदि आप अस्वस्थ न हों तो उसका बहाना बना कर छात्रावास में लेटे रहना सर्वाधिक उबाऊ कार्य होता था। आप पर इतने प्रतिबन्ध लग जाते थे कि बहाना भय से भाग जाता था। हिलने डुलने की मनाही, बाहर टहलने पर प्रतिबन्ध, भोजन के लिये खिचड़ी, खेलकूद मना, दो बार आचार्यों का आगमन और पूछताछ। आपका पुराना इतिहास भी टटोला जाता था कि कहीं यह स्वभावतः तो अस्वस्थ नहीं पड़ जाते हैं। आधे घंटे की नींद के लिये कोई इतना झंझट क्यों मोल ले भला? 

प्रारम्भ में तो थोड़े बहुत बहाने फिर भी चल जाते थे, पर जब से आचार्य दीपकजी को छात्रावास अधीक्षक बनाया गया तब से प्रातः समय से उठ जाना ही श्रेयस्कर था। अस्वस्थ होने की स्थिति में वह कई बार आकर कक्ष में झाँक जाते थे। आप अगर लेटे लेटे ऊब कर टहलने लगे तो टोक देते थे और पुनः लेटने का संकेत देते थे। सायं होने पर चिकित्सक के पास ले जाना प्रारम्भ कर दिया। बच्चों को सुई से डर लगता था, उसी डर से छोटे मोटे ज्वर तो अपने आप ही ठीक हो जाते थे। यदि कोई बहाना बना कर चिकित्सक के पास जाने की निडरता दिखा भी दें तो वहाँ पहुँच कर उतने ही उच्च स्तर का अभिनय भी करना होता था, नहीं तो पकड़े जाने की पूरी संभावना रहती थी। अब आधे घंटे की अतिरिक्त नींद के लिये इतने यत्न कौन करे? 

उठने के पश्चात सबको विशालकक्ष में एकत्र होना होता था, आधे घंटे के अन्दर, वहाँ प्रवचन होता था, सदाचार की बातें बतायी जाती थी, प्रातःस्मरणीय विचार संप्रेषित किये जाते थे। मुझे आज तक इसका कारण समझ नहीं आया। आधे घंटे के अन्दर सब दीर्घशंका से निवृत्त नहीं हो सकते थे, जब उठने में इतनी मानसिक बाधा हो तो अन्य नित्यकर्मों में कितनी होगी? यदि एक बार मान लिया कि सब आदर्शवत व्यवहार करें तो इतने शौचालय नहीं थे कि सब निवृत्त हो सके। लगभग ९ छात्रों पर एक शौचालय होता था। कई बार तो ऐसा होता था कि आप क्रम में खड़े हैं और आधे घंटे के बाद आपका समय आया, तो उस समय आप क्या करेंगे? एक बड़ी उहापोह की स्थिति रहती थी, किंकर्तव्यविमूढ़ता की स्थिति, निर्णय के विकट क्षण। यदि आप समय से विशालकक्ष नहीं पहुँचे तो आपको प्रधानाचर्यजी के सामने प्रस्तुत होने का निर्देश मिल जायेगा और आदर्श आचरण न करने के लिये इतना लज्जित होना पड़ेगा कि उसके सामने सारे दुख सहनीय हो जायें। 

देखा जाये तो जागरण के तुरन्त बाद निर्णय कई चरणों में लेना होता था। पहला कि उठना है कि नहीं? यदि नहीं उठना है तो क्या बहाना बनाना है? क्या एक बार उठकर पुनः सोने का अवसर मिल सकता है, यदि कक्ष से सब चले गये हों? यदि उठ गये तो निवृत्त होने जायें या रोक कर रखे? यदि रोक कर रखा या दबाव न आये तो क्या वह और आधे घंटे तक सहन किया जा सकता है? यदि निवृत्त होने गये और जगह नहीं हो तो वापस विशालकक्ष जायें या प्रतीक्षा करें? यदि क्रम आने के समय में विशालकक्ष में उपस्थित होने का समय हो जाये तो कहाँ जायें? यदि निर्णय रुक जाने का लिया तो जब बुलाया जायेगा तो क्या उत्तर देंगे? क्या बार बार वही उत्तर देने से पकड़ तो नहीं जायेंगे। ऐसे न जाने कितने प्रश्नों पर प्रथम आधे घंटे में निर्णय लेना होता था। दिन का प्रारम्भ निर्णयशास्त्र के प्रायोगिक अध्याय से होती था। 

अन्ततः होता यही था कि १५-२० छात्र नहीं आते थे और उसका उत्तर देने का भार कक्षप्रमुख पर आता था। शेष में आधे बिना निवृत्त हो आ बैठते थे। इस वर्ग ने कई बार विशालकक्ष में अशोभनीय और अवर्णनीय स्थिति उत्पन्न कर दी थी। एक तिहाई तो शाल या चद्दर कान तक ओढ़कर झपकी मार लेते थे। ठंड के समय दरी पर बैठने से नीचे से तापमान असहनीय हो जाता था और छात्र जड़वत हो जाते थे। ऐसी स्थिति में सामान्य विश्व ही नहीं भाता है, आदर्श कहाँ से सुहायेगा। ऐसी स्थिति में प्रवचन कितना ग्राह्य हो पाता होगा? विशालकक्ष से वापस आने के बाद घटनाक्रम सहसा गतिशील हो जाता था। उस समय थोड़ी नींद मार लेने के विचार तब से काल कवलित हो गये जब से दीपकजी उस समय भी निरीक्षण करने आने लगे। 

एक स्पष्टीकरण - ये तथ्य दृष्टाभाव से लिखे है। सर्वघटित तथ्यों में पात्रों का विशेष महत्व नहीं रहता है। मैं उठने के बाद निर्णय प्रक्रिया के किन अंगों को वरीयता देता था, इस विषय में मौन रहना उचित है।

2.3.21

मित्र - १३

यह तथ्य बहुत बात में ज्ञात हुआ कि प्रातः शीघ्र उठने के लिये रात्रि १० बजे तक सो जाना ही पर्याप्त नहीं है। आयुर्वेद के सिद्धान्त बताते हैं कि रात्रि का भोजन कम मात्रा में और रात्रि ८ बजे के पहले करना आवश्यक है। यदि ऐसा करेंगे तो सहज ही ५ बजे नींद खुल जाती है। जब से इसका अभ्यास किया है, स्वतः ५ बजे नींद खुलने लगी और उठने पर अधिक स्फूर्ति अनुभव होने लगी। इस प्रयोग के बाद ही समझ में आया कि छात्रावास में प्रातः ५ बजे बलात उठा देने में हम लोगों के मन में खिन्नता का भाव क्यों आता था? क्या ऐसा था जो अनुशासन के पालक और पालित, दोनों ही न समझ सके। दिनचर्या का प्रथम अंग ही यदि त्रुटिपूर्ण रहा हो तो दिन कैसे अच्छा बीतता होगा? ऐसी ढेर सारी मूढ़तायें थीं जो बहुत बाद मे समझ आ पायीं। 

हम सबके लिये रात्रि का भोजन महाभोज की तरह होता था। दिन भर का सारा कार्य निपटा कर विगत सारी पीड़ाओं के दुख को सहला सकने वाला सुख भोजन में ढूढ़ा जाता था। पूरी दिनचर्या में यही एक समय होता था जिसके तुरन्त बाद कोई और कार्य नहीं रहता था, विश्राम के अतिरिक्त। दोपहर का भोजन ३५ मिनट में, एक अल्पाहार के बाद विद्यालय और दूसरे के बाद खेलकूद, शान्ति से खा पाने का कोई समय ही नहीं। आयुर्वेद कहता है, तन्मना भुञ्जीथा, मन लगा कर खाना चाहिये। यह उपदेश हम केवल रात्रि के भोजन में ही प्रयुक्त कर पाते थे। 

रात्रि का भोजन स्वल्प कैसे हो सकता था? जब इस बात की होड़ लगती हो कि कौन अधिक रोटी खा सकता है तो भोजन कम कैसे हो सकता है? ऐसी प्रतियोगिताओं में धुरन्धर १८ रोटियाँ तक खा जाते थे। जब मंगलवार को खीर पूड़ी बनी हो तो आधा भोजन तो पूड़ी-सब्जी का होता था और उसके ऊपर आधा खीर-पूड़ी का। प्रयत्न यह भी रहता था कि एक बार खीर और मिल जाये और इसके लिये याचना करने में किसी को कोई लाज नहीं आती थी। मंगलवार को सुन्दरकाण्ड का पाठ होता था और उसके बाद लम्बा सा प्रवचन। “वातजातं नमामि” का आशीर्वाद, प्रवचनीय प्रतीक्षा और पूरे समय भोज्य पर ध्यान से क्षुधा और भड़क जाती थी। खीर-पूड़ी तब प्रसाद और पेट प्रासाद बन जाता था। खीर के प्रति प्रेम अभी तक स्थिर है और सौभाग्य से पूड़ी भी मिल जाये तो वह दिन मंगलवार हो जाता है। 

वैसे तो खीर बचती नहीं थी, यदि बच गयी तो हम लोग उसे गिलास में भरकर कक्ष में ले आते थे। अगले दिन प्रातः वह छात्र सबसे पहले तैयार होकर अपनी खीर चढ़ा जाता था क्योंकि संभावना इस बात की पूरी रहती थी कि कोई और आकर न पी जाये। जब अमृतकलश के लिये देव और दानवों में युुद्ध हो गया था तो खीरगिलास के लिये एक मित्र से छल कौन सा बड़ा कठिन कार्य था? 

रात्रि में भोजन के बाद दूध मिलता था, एक गिलास। कई बार ऐसा होता था कि सब्जी अच्छी नहीं बनती थी तो हमारी सारी आशायें दूध पर टिक जाती थीं। तब दूध के सहारे हम लोग ४ रोटी तक खा जाते थे। रोटी में बहुत हल्का सा नमक लगाया और त्रिभुज या बेलन जैसा मोड़कर दूध के साथ धीरे धीरे खा गये। जहाँ पर हर जटिलता को सरल बनाने में मानव मन लग जाये, वहाँ पर कम भोजन कर भूखे पेट सो जाना तो प्रतिभा का अपमान ही है। आयुर्वेद में जब से पढ़ा है कि नमक व दूध विरुद्ध आहार की श्रेणी में आते हैं तब से यह प्रयोग बन्द कर दिया है। यद्यपि नमक बहुत ही कम लगाते थे पर उससे भी त्वचा रोग होने संभावना ने इस व्यंजन का पटाक्षेप कर दिया है। 

भोजन पचाने के लिये शरीर को समय चाहिये होता है। पूरे पाचन काल में जठराग्नि बनाये रखने के लिये रक्त का प्रवाह पेट की ओर हो जाता है। तब न शरीर कार्य करता है और न मस्तिष्क। रात्रि का निश्चेष्ट विश्राम ही तब सहायता करता है। जब भोजन अधिक कर लिया हो तो यह विश्राम और भी अधिक आवश्यक हो जाता है। यदि कम खायें और ८ बजे के पहले खा लें तो लगभग ९ घंटे में खाया हुआ खाना पच जाता है। यदि ऐसा नहीं हुआ तो न ही नींद खुलती है और न ही पेट स्वच्छ होता है, न प्रारम्भ अच्छा, न दिन अच्छा। 

कक्षा ६ में आये १०-११ वर्ष के बालक के लिये और कक्षा १२ में पढ़ रहे १७-१८ के युवा के लिये निद्रा की आवश्यकतायें भिन्न भिन्न होती हैं। बालक को कम से कम ८ घंटे की निद्रा चाहिये। सबको एक ही तुला में तौल देना बालकों के साथ अन्याय है। मुझे याद है कि कक्षा ८-९ तक उठने के बाद चैतन्यता कभी आयी ही नहीं। बस ऊँघते हुये प्रातः का प्रवचन सुनते रहे। अच्छा यह रहता कि सुबह ५ बजे उठने के लिये, सायं ७३० तक भोजन हो जाता, भोजन हल्का रहता, कनिष्ठ छात्र ९ बजे तक और वरिष्ठ छात्र १० बजे तक सो जाते। भोजन की न्यूनता को संतुलित करने के लिये दोपहर के भोजन की मात्रा और काल बढ़ाया जाता। 

यदि आयुर्वेद के तत्व हमें ज्ञात होते तो संभवतः हमारे प्रभात भी स्फूर्तिमय होते।