18.5.13

नदी का सागर से मिलन

सागर से मिलने भागी आती नदी
पहली बार देख रहा था, एक नदी का सागर से मिलना। स्थान कारवार, नदी काली और अरब सागर। दोपहर के समय ऊपर से पड़ने वाली सूरज की किरणें पसरी नीली परत पर चाँदी की रेखा सी झिलमिला रही थीं। पीछे जंगल, बगल में रेत, हवा में एक मध्यम ठंडक और सामने दिख रहा था नदी और सागर का मिलन। मैं लगभग वहीं खड़ा था जहाँ से कभी कविवर रवीन्द्रनाथ टैगोर ने खड़े होकर सागर और नदी का मिलन देखा था। अन्तर बस इतना था कि उन्होंने काली नदी में प्रवाह के साथ कई किलोमीटर यात्रा करने के पश्चात यह दृश्य देखा था, जबकि मुझे यह दृश्य सहसा ही देखने को मिल रहा था।

काली नदी अपने उद्गम से बस १८४ किमी बाद ही समुद्र में मिल जाती है, यह संभवतः एक ही ऐसी नदी होगी जो पूरी की पूरी एक ही जिले, उत्तर कन्नड में बहती है। पश्चिमी घाट से सागर की इतनी कम दूरी ने न जाने कितने सुन्दर और ऊँचे प्रपातों को जन्म दिया है, छोटी छोटी नदियों के जाल से बुना हुआ कोकण क्षेत्र अपने आप में एक अनूठा दृश्य रचता है, पहाड़, जंगल, प्रपात, नदियाँ, सागर, सब एक दूसरे पर अधारित और आरोपित। लगभग चार लाख लोगों की जीवन रेखा यह नदी, सागर तक आते आते निश्चिन्त हो जाती है, अपना संक्षिप्त पर सम्पूर्ण कर्म करने के पश्चात।

नदी सागर में गिरती, दायीं ओर है स्तर में असमानता
आज खड़ा मैं उसी नदी का अन्तिम बिन्दु निहार रहा था। देख रहा था कि कहीं कोई भौतिक रेखा है जिसके एक ओर को समुद्र कहा जा सके और दूसरी ओर को नदी। सहसा एक सहयात्री ने इंगित किया, थोड़ी दूरी पर स्पष्ट दिख रहा था, सागर का स्तर नीचे था, उस समय भाटा था। नदी का पानी उस स्थान पर सहसा गिरता हुआ सा दिख रहा था, बहुत सुन्दर दृश्य था। नदी की दिशा में देखा, छोटी छोटी लहरें भागी चली आ रही हैं, अपने सागर से मिलने, अपना जलचक्र पूरा करने।

रात के समय चाँद पृथ्वी के निकट होता है। अब अपना आकर्षण किस तरह व्यक्त करे? पृथ्वी को अपनी ओर खींचना चाहता है, पृथ्वी ठहरी भारी, न वह हिलती है और न ही हिलते हैं उसके पहाड़। ले दे कर एक ही तरल व्यक्तित्व है सागर का, जिस पर चाँद का जोर चल पाता है, उसे ही अपनी ओर खींच लेता है चाँद, उस स्थिति को ज्वार कहते हैं। तब सागर का जल स्तर नदी से ऊपर हो जाता है। नदी ठहर सी जाती है, उसे कुछ सूझता नहीं है, उसे दिशाभ्रम हो जाता है कि जाना किधर है। आगे बढ़ते बढ़ते सहसा उसकी गति स्थिर हो जाती है, वह वापस लौटने लगती है। और जब दोपहर में चाँद पृश्वी से दूर हो जाता है, सागर पुनः नीचे चला जाता है, नदी के स्तर से कहीं नीचे, तब नदी का जल सरपट दौड़ लगाता है।

जल का यह आड़ोलन, कभी सागर से नदी की ओर तो कभी नदी से सागर की ओर, उस सीमा को कभी एक स्थान पर स्थिर ही नहीं देता, जिसे हम नदी और सागर का मिलना कहते हैं। कैसे ढूढ़ पायेंगे आप कोई एक बिन्दु, कैसे निर्धारित कर पायेगें उन दो व्यक्तित्वों की सीमायें, जिन्हें चाँद एक दूसरे में डोलने को विवश कर देता हो। चाँद मन की गति का प्रतीक माना जाता है, सागर खारा है, नदी मीठी है, यह मिलन संबंधों को इंगित करता है। यह आड़ोलन उन अठखेलियों को भी समझने में सहायक है जो संबंधों के बीच आती जाती रहती हैं। सागर स्थिर है, नदी गतिशील है, पर वे चाहकर भी अपनी प्रकृति बचाकर नहीं रख पाते। रात को चाँद निकलता है और सागर गतिशील हो जाता है अपनी सीमायें तोड़ने लगता है, नदी सहम सी जाती है, ठिठक जाती है। सागर का खारापन मीलों अन्दर चला जाता है, लगता है कि कहीं सागर स्रोत को भी न खारा कर बैठे। एक स्थान पर, जहाँ सागर की उग्रता और नदी का प्रवाह समान हो जाता है, खारापन वहीं रुक जाता है, वहीं साम्य आ जाता है।

दिन धीरे धीरे बढ़ता है, नदी उसी साम्य को खींचते खींचते वापस सागर तट तक ले आती है और साथ ही ले आती है वह खारापन जिसे रात में सागर उसे सौंप गया था। साथ में सौंप जाती है जल के उस भाव को जो रात भर ठहरा रहा, सहमा सा। यह क्रम चलता रहता है, हर दिन, हर रात। नदी सागर हो जाती है और पुनः नदी के अतिक्रमण में लग जाती है। सागर को वर्ष भर लगता है, वाष्पित होकर बरसने में, पहाड़ों के बीच अपना स्थान ढूढ़ने में, छोटी धार से हो नदी बनने में और पुनः सागर में मिल जाने में।

नदी और सागर के रूप में प्रकृति की ये अठखेलियाँ हमें भले ही खेल सी लगती हों पर इनमें ही प्रकृति का मन्तव्य छिपा हुआ है। सागर और नदी को लगता है कि हम दोनों का संबंध नियत है, एक को जाकर दूसरे में मिल जाना है। उन्हें लगता है कि वे दो अकेले हैं जगत में। उन्हें लगता है कि उनके बीच एक साम्य है, संतुलन है, जो स्थिर है एक स्थान पर। उन्हें लगता है कि सागर और नदी का जो संबंध होना चाहिये, उसमें किसी और को क्या आपत्ति हो सकती है। नदी और सागर पर यह भूल जाते हैं कि प्रकृति कहाँ स्थितियों को स्थिर रहने देती हैं, उसने दोनों का जीवन उथल पुथलमय बनाये रखने के लिये चाँद बनाया, हर दिन उसके कारण ही ऐसा लगता है कि नदी और सागर एक दूसरे की सीमाओं का अतिक्रमण कर रहे हैं। यही नहीं, प्रकृति ने सूरज भी बनाया, केवल इसलिये कि सागर अपने मद में, खारेपन में मत्त न बना रहे, वाष्पित होकर बरसे, नदी बने।

प्रकृति के सिखाने के ढंग बड़े सरल हैं, समझना हम लोगों को ही है कि हम कितना समझ पाते हैं। प्रकृति हमें स्थिर न रहने देगी, कितना भी चाह लें हम, चाँद से संचालित मन कोई न कोई उथल पुथल मचाता ही रहेगा। यह भी सच है कि प्रकृति हमें अपनी सीमायें अतिक्रमण भी न करने देगी, कितने भी भाग्यशाली या शक्तिशाली अनुभव करें हम। आदेश कहने वाला कभी आदेश सहने की स्थिति में भी आयेगा, प्रकृति के पास पाँसा पलटने के सारे गुर हैं। सागर से धरती का मिलन होता है तो रेत के किनारे निर्मित हो जाते हैं, सारे पाथर चकनाचूर हो जाते हैं। सागर का अपनी सहधर्मी नदी से मिलन होता है तो सीमाओं का खेल चलता रहता है। सागर का आकाश से मिलन होता है तो अनन्त निर्मित हो जाता है।

प्रकृति को किसी भौतिक नियम से संचालित मानने वाले प्रकृति की विशालता को न समझ पाते हैं और न ही उसे स्वीकार कर पाते हैं। प्रकृति में सौन्दर्य है, गति है, अनुशासन है और क्रोध भी। हम तो हर रूप में जाकर हर बार खो जाते हैं। देखते देखते सागर और धरती का मिलन सागर की ओर आगे बढ़ जाता है। दोनों अपनी अठखेलियों में मगन हैं, प्रकृति भी दूर खड़ी मुस्करा रही है। हम सब यह देख कभी विस्मित होते हैं, कभी प्रसन्नचित्त। बस नदी की तरह प्रकृति में झूम जाने का मन करता है, आनन्दमय प्रकृति में।

15.5.13

दुआ सबकी मिल गयी, अच्छा हुआ

एक माह पहले जन्मदिन पर ढेरों बधाइयाँ आयी थीं, मन सुख से प्लावित हो गया था। आँखें बन्द की तो बस यही शब्द बह चले। यद्यपि फेसबुक पर इसे डाल चुका था, पर बिना ब्लॉग में स्थान पाये, बिना सुधीजनों का स्नेह पाये, रचना अपनी पूर्णता नहीं पा पाती है।

दुआ सबकी मिल गयी, अच्छा हुआ,
चिहुँकता हर बार मन, बच्चा हुआ,
कुछ सफेदी उम्र तो ले आयी है,
हाल फिर भी जो हुआ, सच्चा हुआ।

दिन वही है, बस बरसता प्यार है,
इन्द्रधनुषी सा लगे संसार है,
मूक बहता, छद्म, दुविधा से परे,
उमड़ता है, नेह का व्यापार है।

लाज आती, कोई आँखों पर धरे,
शब्द मधुरिम कर्णछिद्रों में ढरे,
कुटिल मन की गाँठ, दुखती क्षुद्रता, 
कोई तत्पर, विहँस बाँहों में भरे। 

नित्य निद्रा में अकेला, किन्तु अब,
स्वप्न में भी संग चले आयेंगे सब,
आज होगा एक जलसा देखना,
छन्द छलकें, हृदय मिल जायेंगे जब।

मैॆ रखूँगा साथ, इस विश्वास को,
प्रेमपोषित इस अनूठी प्यास को,
कल सबेरा पूर्णतः उन्नत खिले,
साध लूँगा प्रकृति की हर साँस को।


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11.5.13

ब्लॉग व्यवस्था, तृप्त अवस्था

गूगल रीडर में बढ़ते बढ़ते ब्लॉगों की संख्या ६५० के पार पहुँच गयी। तकनीक और न्यूनतम जीवन शैली विषयक लगभग ५० ब्लॉग निकाल दें, तब भी हिन्दी से जुड़े लगभग ६०० ब्लॉगों की बड़ी सूची का होना यदि कुछ इंगित करता है, तो वह अन्तर जिसे हर दिन पूरा करने के लिये कुछ न कुछ नया पढ़ते रहना आवश्यक हो जाता है। पढ़ने वाले ब्लॉगों की संख्या चाह कर भी कम नहीं कर पा रहा हूँ, यह भी इंगित करता है कि अच्छे बुरे ब्लॉगों में अन्तर की समझ भी विकसित होना शेष है, मेरे साहित्यिक पथ में। पिछले ४ वर्षों में जो भी रोचक लगता गया, सूची में स्थान पाता गया। कई और श्रेष्ठ ब्लॉगों को सूची में होना था, पर दुर्भाग्य ही कहा जायेगा मेरा कि उनसे परिचय न हो सका अब तक। संचित और अपेक्षित के बीच का अन्तर इस क्रम में तीसरा है, जो इतने ब्लॉग होने के बाद भी सूची को अपूर्ण ही रखे हुये है।

लेखन, सतत, अथक
कई नवागंतुक बहुत अच्छा लिखते हैं। कई उदाहरण देखे हैं जिसमें प्रारम्भिक किरणों की झिलमिलाहट एक आशा के सूर्य का आभास देती है। उनको पढ़ना इसलिये अच्छा लगता है कि उनके लेखन की चमक में कभी अपना अँधेरा भी दिख जाता है। उनका लेखन पथ निश्चय ही हिन्दी साहित्य का राजमार्ग बनने की क्षमता रखता है और बनेगा भी, पर यदि थकान, निराशा और उपेक्षा उन्हें उनके पथ से डिगने न दे। उनके लेखन पर उत्साह के दो शब्द कहने वाला सदा कोई न कोई रहे अवश्य, विशेषकर तब, जब रात हो, एकान्त हो और विचारों का अँधेरा घुप्प हो। इसके अतिरिक्त बहुत से ऐसे लेखक और कवि हैं, जिन्हें परिचय के चौराहे मिले ही नहीं, जिन्हें कोई स्थापित ठिकाना दिखा नहीं। उन्होंने लिखा, पर समुचित मान न पाकर उनका उत्साह हिन्दी साहित्य में स्थिर न रह पाया और उन्होने अपनी ऊर्जा के लिये कोई और अभिरुचि खोज ली। अपनी आलोचनात्मक तीक्ष्णता के बाद भी हमारी उन तक न पहुँच पाने की असमर्थता एक और अन्तर प्रस्थापित कर देती है, जिसके उस पार हमारा उत्थान सुनिश्चित है।

किसी मित्र को अंग्रेजी में लिखते हुये पाता हूँ तो उन्हें हिन्दी में लिखने का आग्रह करने से नहीं चूकता हूँ। लगता है कि यही विचार, यही चिन्तनशीलता यदि हिन्दी को अपना माध्यम बना लेगी ,तो मेरे जैसे न जाने कितने हिन्दीभाषी जो अच्छे लेखन की राह तकते हैं, तृप्त हो जायेंगे। उन्हें भी लगता होगा कि हिन्दी का विस्तार क्षेत्र उतना वृहद नहीं, आर्थिक संभावनायें उतनी सुदृढ़ नहीं, जो उत्साह बनाये रखने में समर्थ हों, क्षमतायें दोहित करने में समर्थ हों। उल्टा जब मुझे वे लोग अंग्रेजी में लिखने को प्रेरित करते हैं तो बस मुस्करा कर रह जाता हूँ। दासता की खनक और ममता का आग्रह, यह अन्तर उन्हें समझा पाने में लगने वाले प्रयास को एक मुस्कराहट से ही व्यक्त कर देता हूँ।

निश्चय ही अभी जो स्थिति है उसमें जितने लोग इण्टरनेट पर पढ़ते हैं, उसमें अंग्रेजी जानने वालों की संख्या बहुत अधिक है। यही कारण हो सकता है कि अंग्रेजी में लिखना अधिक आकर्षक लगे, अधिक प्रभावित करे। जिस गति से इण्टरनेट का विस्तार हो रहा है, आने वाले दिनों में हिन्दी पाठकों की इतनी संख्या तैयार हो जायेगी कि लेखकों को पर्याप्त रूप से पढ़े जाने का बोध होने लगेगा। हर एक नये लेखक के रूप में एक नया पाठक मिल रहा है ब्लॉग जगत को, अतः नये लेखकों का स्वागत उन्मुक्त रूप से किया जाना चाहिये।

गूगल रीडर बन्द होने की सूचना के बाद से ही मन में भय बैठ गया है कि एक अच्छे मेले के आभाव में लेखकों और पाठकों का संपर्क और कम हो जायेगा। १ जुलाई के बाद क्या सारी फीड वैसे ही सुरक्षित रह पायेगी जैसी अभी तक है। कई अन्य सेवाप्रदाताओं ने यह आश्वासन तो दिया है कि सब कुछ पहले जैसा ही रहेगा, पर तकनीक से अपरिचित न जाने कितने लेखक और पाठक अपना संपर्क खो देंगे, यह भय अभी भी है। मन में विचार आया कि कम से कम उन श्रेष्ठ ब्लॉगों को चिन्हित तो कर लूँ जिन्हें नियमित पढ़ते रहना हुआ है और यदि आवश्यकता पड़ी तो उन्हें पुनः एक एक करके अपनी नयी सूची में डाल लूँगा। इस कार्य को करने में तीन चार दिन अवश्य लग गये पर उस अनुभव में जो तथ्य सामने आये, उन्होंने मुझे एक पाठक के रूप में अन्दर तक हिला कर रख दिया है।

६०० की सूची में लगभग १२५ ब्लॉग ऐसे मिले जिसमें पिछले एक वर्ष से कुछ भी नहीं लिखा गया है। उनमें लगभग २५ ऐसे थे जो नये डोमेन में चले गये और लेखन की सततता बनाये हुये हैं। १०० ब्लॉग या कहें कि लगभग २० प्रतिशत ब्लॉग ऐसे थे जो निष्क्रिय हो चले। उनमें कई नाम ऐसे थे जो यदि बने रहते तो निश्चय ही साहित्य को लाभान्वित करते। उन्होने क्यों लिखना बन्द किया, उसके क्या विस्तृत कारण थे, इसके मूल में जाना कई चर्चाओं को जन्म दे देगा, पर यह तथ्य गहरे भेदता है कि ३ वर्ष में यदि स्थापित २० प्रतिशत ब्लॉग निष्क्रिय हो जायेंगे तो इस क्षेत्र में स्थापित लेखन का क्षरण लगभग ७ प्रतिशत प्रतिवर्ष हो जायेगा। मैं उन ब्लॉगों की बात ही नहीं कर रहा हूँ जो प्रारम्भिक वर्ष में ही अस्त हो जाते हैं, उनका प्रतिशत तो कहीं अधिक होगा। संभव है कि आधे से अधिक लोग प्रथम वर्ष में ही ब्लॉग छोड़कर चल देते हों।

फिर भी पिछले दो माह में न जाने कितने ब्लॉगों को उनके तीन-चार वर्ष पूरे होने की बधाई दे चुका हूँ, वे सारे ब्लॉग के प्रकाशित स्तम्भ हैं। जो उससे भी अधिक समय से लिख रहे हैं और अब तक नीरसता और एंकातता को प्राप्त नहीं हुये हैं, उनके हाथ में ही साहित्य का भविष्य सुरक्षित है, वही लोग हैं जो ब्लॉग को साहित्य से जोड़ देंगे। तब संभवतः साहित्यकार का बनना ब्लॉग जैसे व्यापक और सूक्ष्म स्तर से भी हो सकेगा। जहाँ इतने प्रवाह किसी धारा के लिये सुरक्षित रहेंगे, वह प्रवाहमयी धार दर्शनीय होगी।

इस प्रवाहमयी तन्त्र में जो ब्लॉग अपने आप को बचाये रहना चाहते हैं, उन्हें धैर्यपूर्वक लिखते रहना पड़ेगा, पहले तीन वर्ष, फिर पाँच वर्ष, फिर न जाने कितना और। हर सप्ताह दो पोस्ट, यदि दो संभव न हो तो कम से कम एक तो निश्चय ही। तब सूची से जो १२५ ब्लॉग अपना लेखन खो चुके हैं, वैसा पुनः नहीं होगा। संभव है कि तीन वर्षों बाद जब मैं पुनः समीक्षा करने बैठूँ तो सभी अच्छे ब्लॉग नियमित मिलें।

मुझे न जाने कितने अन्तर पाटने हैं, पर यदि अन्तर पाटने के पहले से दूसरा किनारा साथ छोड़कर चला जायेगा तो वह अन्तर कभी नहीं पट पायेगा, प्यास बढ़ती ही जायेगी। नये लेखक एक ओर से किनारा भरेंगे, पुराने लेखक दूसरे छोर को स्थापित रखेंगे, उसके बाद जो समतल तैयार होगा, उसमें सबके लिये स्थान होगा। मैं सारे निष्क्रिय ब्लॉगों को एक फोल्डर में एकत्र करके रख रहा हूँ, आशा है कि उसमें से कुछ दिनों के बाद नयी पोस्टें आनी प्रारम्भ हो जायेगीं। इन १२५ ब्लॉगों की कमी नये लेखक पूरी करेंगे अतः आने वाले दिनों में कई ब्लॉग संकलकों को मथ कर पढ़ने का प्रयास करूँगा।

पता नहीं यह क्रम कब तक चलेगा? ब्लॉग से मन भरने का प्रश्न ही नहीं, यह एक तृप्त व्यवस्था है, बस चलते रहें प्रवाह के साथ, जहाँ तक संभव हो सके।

8.5.13

लहरें

तकते हैं,
लहरें आती और जाती हैं।

लखते हैं,
कुछ लाती, कुछ ले जाती हैं।

छकते हैं,
इठलाती, हमें खिलाती हैं।

इनके जैसे ही सतत रहें,
हर पल उद्भव का राग यहाँ,
नत हो जाना, फिर फिर आना,
आरोहण का अनुनाद यहाँ।

हो मत्त, व्यग्र, चंचल, चपला,
दौड़ी आती विरही कल कल,
जड़ रूप मूक सागर तट पर,
आलिंगन का आग्रह निश्छल।

यह प्रेम नहीं, मद आकुल है,
जीवट मन है, कब से ठहरा,
यह विष फेनों का नर्तन भी,
आक्रोश व्यक्त होता गहरा।

एक द्वन्द्व मूर्त, स्तब्ध विश्व,
आकाश चेत, सो जाता है,
सागर धरती नित लीलामय,
इतिहास रेत हो जाता है।

इनकी गतियों सा बने रहें,
यदि शेष समय जो मिला क्षणिक,
संग जीवन हम भी बह जायें,
जब समय शेष न रहे तनिक।


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4.5.13

अनमोल जीवन

विश्व वंचित कर रहा है,
है सकल संवाद स्थिर,
दृष्टि में दिखती उपेक्षा,
भाव तम एकांत में घिर।

मान लो संकेत है यह,
कर्म एकल, श्वेत है यह,
आत्म की राहें प्रतीक्षित,
रत्नपूरित खेत है यह।

एक क्षण भी नहीं रोना,
हृदय की ऊर्जा पिरोना,
मिल गया अवसर अनूठा,
एक क्षण भी नहीं खोना।

आत्म है अनमोल जीवन,
उस विरह को खोल जीवन,
देख ले क्या क्या छिपा है,
जान ले क्या मोल जीवन।

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