6.11.21

मित्र - ४०(भेदी और कृपापात्र)

भेदियों की कारण-श्रृंखला में एक प्रमुख कारण कृपापात्र बनने का आया। कृपापात्र बनने का प्रयास आगामी लाभ पाने के लिये या हानि से बचने के लिये किया जाता है। वैसे कृपापात्र शब्द का अर्थ अत्यन्त उत्कर्ष लिये हुये है और बहुधा अध्यात्म में ईश्वरीय कृपा के लिये प्रयुक्त होता है। आधुनिक संदर्भों में यह सत्ता के निकट मँडराने वालों का प्रतीक बन गया है।

कृपापात्र बनने में समस्या अनुपात की आती है। आप जितना निवेश करते हैं उससे कहीं अधिक पाने की चाह रखते हैं। ऐसा पर सदैव होता नहीं है। कभी आप यह कहते हुये निराश हो जाते हो या प्रयास छोड़ देते हो या विद्रोही बन जाते हो कि मैंने क्या तक नहीं किया और मुझे मिला क्या? यदि स्वामी के पास देने के लिये पर्याप्त है तो प्रतियोगिता कम होती है नहीं तो कृपापात्रों के द्वारा कुछ भी अर्पण कर देने की स्थिति सी बन जाती है। यह प्रतियोगितायें अत्यन्त रोचक और पूर्ण मनोरंजन के तत्व लिये होती हैं।


कृपापात्र बनने की राह और प्रियतम पाने की राह एक सी हैं। दोनों में ही अपना सर्वस्व तज कर अपने लक्ष्य की रुचियाँ, अभिरुचियाँ, संरुचियाँ आदि समझनी और जीनी पड़ती हैं। भोजन, वेश, शब्द और न जाने कितने तत्व हैं जिससे अपने अभीष्ट का भोग लगाना पड़ता है। वह भी बिना किसी देरी के, “राणा की पुतली फिरी नहीं तब तक चेतक मुड़ जाता था।” ईश्वर का भक्त बनना कठिन है, सतत साधना का मार्ग अपनाना पड़ता है। किन्तु उससे भी अधिक कठिन है आधुनिक संदर्भों में कृपापात्र बनना। यह सबके बस की बात नहीं है क्योंकि भक्ति में ईश्वर को भजने के लिये गुण अधिरोपित करने की आवश्यकता नहीं है। ईश्वर गुणों से परिपूर्ण है और उन्हीं गुणों को हम प्राप्त करने के लिये हम उसे भजते हैं। कृपापात्र बनने में पहले स्वामी में गुण ढूढ़ने पड़ते हैं, उनको समाज में प्रचारित और प्रसारित करना पड़ता है और तब गुण को गुणी से मिलाने हेतु स्तुति की जाती है।


कई बार तो स्वामी को यह प्रतीत होना चाहिये कि आपने वह गुण उनके अन्दर खोजा है। उसके पहले तो स्वामी को ज्ञात ही नहीं था कि वह तत्गुणसम्पन्न हैं। भक्ति से दूसरा अन्तर यह आता है कि कृपापात्र अपने स्वामी की स्तुति कुछ और करता है और चाहता कुछ और है। इस कृत्रिमता में जीना तपस्या नहीं तो और क्या है। सामान्यजन और ईर्ष्यालु जिसे नित नित घुटना कहते हैं, कृपापात्री के लिये वह साधना का पथ है। इस विषय का विस्तार और उसका समुचित निस्तार कई अध्यायों में भी नहीं समा पायेगा पर भेदियों के कारण के रूप में इतना ही जानना पर्याप्त है कि छात्रावास के चिंतन में इसे बहुत आदर के भाव में नहीं लिया जाता था वरन एक मानसिक दुर्बलता का प्रतीक माना जाता था। युवा को अपने कर्म पर पूर्ण विश्वास होना चाहिये और जब वह अपनी क्षमता के चरम पर स्वयं पहुँचता है तो उसे हाथ देने वाले लोग मिल ही जाते हैं।


भेदियों के विषय में आलोक के विचार सबसे अलग थे, उन्होंने भेदिये बनने से अधिक भेदिये बनाने की प्रक्रिया को समझाया। उनके शब्दों में “पुलिस जिस तरह भेदियों के साथ कठोरता और प्रलोभन से कार्य करती है, छात्रावास में भेदिये बनाना उसी कला का अंग था। बार बार बुलाकर महत्वपूर्ण और अनुशासित होने का भाव दिलाना, बुराई पर विजय के लिये सच्चाई का साथ देने के लिये प्रेरित करना, मित्रों के साथ किये छल को परम कर्तव्य की संज्ञा देना, इन भावों को बार बार बाल मन पर चढ़ाते रहना, इसी प्रकार की तकनीक प्रयोग में लायी जाती थी और बहुधा सफल भी होती थी।”


देखा जाये तो अनुशासन को लागू करने में कारक बनने का मान दिया जाता था भेदियों को। अनुशासन स्थापित करने के बड़े कार्य में सम्मिलित होने का भाव भेदिये तैयार करता रहा। यह एक ऐसा काम है कि जिसमें मना करना या उत्साह न दिखाना स्वयं में ही अनुशासनहीनता समझी जा सकती थी।


प्राचार्यजी को काण्डों की सूचना तो निश्चित रूप से भेदियों से ही मिलती थी पर छात्रावास अधीक्षक आचार्यजी का एक स्वयं का तन्त्र था। कई बार ढेरों ऐसे काण्ड जो अत्यन्त सावधानी से किये गये, जिनमें किंचित मात्र संशय नहीं रखा गया, जिनकी योजना और क्रियान्वयन में किसी और को भी सम्मिलित नहीं किया गया, उन सबमें भी जब हम लोग पकड़े जाने लगे तो लगने लगा कि छात्रावास के भीतर से कहीं बड़ा तन्त्र बाहर में है। तब मोबाइल और व्हाट्सएप का समय नहीं था कि जिसके माध्यम से उनको सूचना दी जाती। फिर उनको निश्चित रूप से सब कैसे पता चल जाता था, यह आज तक रहस्य है।


जो भी हो, भेदियों ने हमारे कार्य को कठिन और प्रयत्नों को अधिक व्यापक बना दिया था पर साथ ही रोचकता इतनी बढ़ा दी थी कि काण्ड करने में मन लगा ही रहा। आज भी किसी कार्य के सारे संभावित निष्कर्षों की योजना में कल्पना कर लेना और उसके अनुसार योजना में सुधार लाना संभवतः छात्रावास की ही देन है। योजना और क्रियान्वयन में पैनापन भी नहीं आता यदि हम पकड़े नहीं जाते। तब निरन्तर सुधार और विकल्पों जैसे शब्दों को हम समझ भी न पाते। इन सबका श्रेय भेदियों को जाता है। अतः तुलसीदासजी की परम्परा का निर्वाह करते हुये प्रारम्भ में न सही पर अन्त में ही, मैं उन स्वनामधन्य दुष्टमना भेदियों की वन्दना करता हूँ।

4.11.21

मित्र - ३९(भेदी और प्राप्ति)

भेदी बनने के कई तुच्छ कारण भी थे। तीन मुख्य कारण पिछले ब्लाग में समझे जा चुके हैं। कुछ और कारण जो पंकज, रवीन्द्र और आलोक ने बताये हैं, उन्हें यथारूप उन्हीं के शब्दों में व्यक्त करना उचित रहेगा।

पंकज कहते हैं कि जितने लोग प्राचार्यजी के सानिध्य में थे, उनमें से अधिकतर हरीराम नाई की भूमिका में रहते थे। संदर्भ बताते चले कि शोले फिल्म में जेलर साहब को सारी सूचनायें पहुँचाने का कार्य हरीराम नाई करते थे। इसका कोई विशेष प्रत्यक्ष कारण तो समझ नहीं आता है पर प्राचार्यजी को यह सब सूचनायें बताकर कोई लाभ लेने के मन्तव्य रहता होगा। संवेदनशील सूचनायें न भी हों, सामान्य सूचनायें भी बताकर विश्वासपात्रता पायी जा सकती है। जहाँ तक हम लोगों को ज्ञात है, प्राचार्यजी से किसी के द्वारा कोई भौतिक लाभ लेने का प्रश्न ही नहीं था। उनके सिद्धान्त अडिग थे और उनमें किसी भी व्युत्थान का किंचित भी स्थान नहीं था। आपके ऐसा करने से उनके मन में अधिकतम यही भाव जग सकते थे कि आप बड़े ही सुसंस्कृत छात्र है, आपके आदर्श बड़े ही उच्च कोटि के हैं और आपके अन्दर कर्मशिथिल और धर्मशिथिल समाज को सुधारने की उत्कट आकांक्षा है। इस छवि के अतिरिक्त यदि कोई किसी अन्य लाभ के लिये उनसे आशा करता था तो वह अत्यन्त मूर्ख था।


प्राचार्यजी के सानिध्य में रहने वालों के लिये सबसे अधिक कुछ लाभ था तो वह उनके सत्संग का लाभ था। पर इसके लिये भेदिये बनने की आवश्यकता नहीं थी, अपने साथियों का अहित करने की आवश्यकता नहीं थी। सत्संग का लाभ तो बिना किसी प्रत्याशा के भी लिया जा सकता था। प्राचार्यजी को रामचरितमानस, गीता, भारतीय संस्कृति, सनातन शास्त्र आदि विषयों में सिद्धहस्तता थी। यद्यपि विशालकक्ष के प्रवचनों में उनकी आशाओं का स्तर अत्यन्त ऊँचा पाकर बहुधा हीनभावना आती थी। बहुधा यह भी लगता था कि जैसे पूरा प्रवचन आपको ही लक्षित कर के कहा जा रहा है, उस समय अटपटा भी लगता था, क्षोभ भी होता था और कदाचित क्रोध भी आता था। जिस समय मन इस उद्वेलित अवस्था में हो तो प्रवचन का सार तत्व आपके हृदय तक पहुँचने से रह जाता है। आप उस निधि का सही अवमूल्यन नहीं कर सकते हैं। अब वही तत्व जब स्वाध्याय के माध्यम से पा रहा हूँ तब उनकी महत्ता समझ आ रही है।


मुझे लगता है कि पूर्वोक्त दोनों ही विचार प्राचार्यजी के सानिध्य में रहने वालों के मन में नहीं होगे। उन्हें न कोई लाभ लेना होगा और न ही कोई सत्संग से जीवन सवाँरना होगा। क्योंकि उनसे लाभ लेना संभव नहीं था और सत्संग सबके लिये समान उपलब्ध था। अपने को छात्रावास की शक्ति संरचना में श्रेष्ठ दिखने का प्रयास ही एक ऐसा कारण दिखता है जो अत्यन्त व्यवहारिक भी है और प्रासंगिक भी। व्यवहारिक इसलिये कि इसमें अधिक श्रम नहीं लगता है, दिन में एक दो बार जाकर सत्ता से अपनी निकटता प्रसारित की जा सकती है। प्रासंगिक इसलिये क्योंकि आजकल सत्ता अपना उतना भौकाल नहीं चमका पाती है जितना उससे अपनी निकटता दिखाने और बताने वाले चमका लेते हैं।


यद्यपि छात्रावास की शक्ति संचरना में ऐसा कुछ था नहीं जिसके लिये इतना भी श्रम करना पड़े। सारी प्रक्रियायें नियमबद्ध थीं, अनुशासन में ढील मिलने का प्रश्न नहीं था और भोजनालय आदि में भी शक्तिसम्पन्नजनों के लिये अतिरिक्त पकवान जैसी भी व्यवस्था नहीं थी। हाँ, बस आपकी सत्ता से निकटता जानकर कोई अन्यथा ही आपसे उलझने का प्रयास नहीं करेगा। कभी कभी आपसे न उलझने का यह भाव उपेक्षा में बदल जाता है। समाज ऐसे शक्ति सम्पन्नों के नखड़े नहीं झेल पाता है। जो भी लोग उनके पास जाते हैं, अपने कार्य हेतु ही जाते हैं। शक्ति के साथ यदि समाज की सेवा का भाव न आया तो वह शक्ति निष्फल है, वह व्यक्ति ठूँठ है। मुझे तो यही लगता है कि जब शक्ति का भाव रक्षा में हो, सहायता में हो तो उसको पाने के लिये भेदी बनने की क्या आवश्यकता क्योंकि उससे अन्ततः वैमनस्य और अपमान ही मिलता है।


रवीन्द्र के शब्दों में, “छात्रावास अधीक्षक आचार्य जी का गुप्तचरतंत्र आज की सीबीआई से भी ज्यादा सुदृढ़ था क्योंकि भेदी बहुत आसानी से मिल जाते थे। जन्म से कोई भेदी नहीं था या मित्रो को दंड दिलवाने में उत्सुक नहीं था लेकिन आचार्य जी के निकटतम आना या कुछ तथाकथित मित्रों की तरह बड़े दम्भ के साथ आचार्य जी के नीले स्कूटर की पीछे वाली सीट पर सहपाठियों को तिरछी नज़र से देखते हुए धूमने जाना शामिल था। चूंकि ये अवसर कुछ ही लोगो को प्राप्त था अतः बाकी किसी का भी भेदी बनना अचंभित करने बाला नही था।”


रवीन्द्र का यह विश्लेषण भेदियों के प्रयत्नों को अपने समाज में एक विशिष्ट स्थान पाने के लिये और उस स्थान का सार्वजिनक आनन्द उठाने के लिये था। यह भेदियों के चरित्र और कृतित्व को विनोद से प्रेरित मानते हैं। यह तो रवीन्द्र के हृदय की विशालता ही कही जायेगी क्योंकि भेदियों के द्वारा पकड़ाये जाने पर रवीन्द्र की व्यक्तिगत रूप से बड़ी हानि हुयी है। कई बार इनके घर पत्र तक लिखे गये हैं।


शेष कारण और आलोक का मत अगले ब्लाग में।

2.11.21

मित्र - ३८(भेदी और कारण)

भेदी होने के कारण ढूढ़ने बैठा तो एक के बाद एक कई कारण मिलते गये। जैसा कि पिछले ब्लाग में चर्चा की थी कि कोई भी कारण दीर्घकाल में उपयोगी सिद्ध नहीं पाया गया। यदि किसी में संबंधों का दोष था तो किसी में विश्वास का, किसी में स्वामी से मान न मिलने की आशंका थी तो किसी में अलग थलग पड़ जाने भय, किसी में अपमान था तो किसी में स्वयं छले जाने का दोष। फिर भी अल्पकालिक कारणों की चर्चा आवश्यक है क्योंकि बहुधा भेदी अपनी बुद्धि को समुचित प्रयुक्त नहीं कर पाता है, अल्पकालिक लाभ के लिये दीर्घकालिक हानि कर बैठता है।

कहा जा सकता है कि नैतिक कारणों से भेदी अपने कर्मों में बाध्य होता है। सच है, नैतिकता स्थापित करने की बाध्यता किसी से क्या कर्म न करा दे? नियमों का पालन हो यदि यह नैतिकता की परिधि में आता हो तो इसके सुनिश्चित करने की प्रक्रिया भी नैतिकता और नियमों से आबद्ध होनी चाहिये। इस परिप्रेक्ष्य में नैतिकता तो यह कहती है कि सामने वाले को इस बारे में बताया जाये, संकेत दिया जाये या चेतावनी दी जाये जिससे उसे सुधरने का अवसर मिल सके। नियमों के उल्लंघन में नैतिकता के प्रयोग का उद्देश्य तो उसका पालन ही होना चाहिये। सीधे दण्ड व्यवस्था को लागू करवा देना कुछ भी हो सकता है, नैतिकता नहीं।


भेदियों के समर्थक कह सकते हैं कि भेदियों का उद्देश्य तो नैतिकता से प्रेरित था पर उनके अन्दर भय था कि कहीं प्रत्यक्ष कह देने से विवाद न बढ़े, परिणाम अशोभनीय न हो जायें। या नियमों के उल्लंघनकर्ता नैतिकता के वाहकों का अहित न कर बैठें। इस संभावना को एक बार स्वीकार भी किया जाता है क्योंकि आजकल के वातावरण इस प्रकार की कई घटनायें सुनने में आती हैं जब किसी अपराध के साक्षीजनों को क्षति पहुँचायी जाती है। अतः इस दुष्परिणाम को संभावना को ही न आने के उद्देश्य से सीधे भेद बताना श्रेयस्कर है। यह तर्क उस समाज के लिये तो ठीक है जहाँ पर शक्ति असंतुलन अधिक है या अराजकता अधिक है। पर छात्रावास के परिवेश में जहाँ हम सब लगभग एक समान हैं और हम सबके ऊपर एक सशक्त ढण्डकर्ता या विधानकर्ता बैठा है, नैतिकता के निर्वहन में भय का तर्क शिथिल प्रतीत होता है।


भेदियों के हृदय में नैतिक कारण तो कभी नहीं रहता होगा क्योंकि उनके कर्मों में परमार्थ के कोई लक्षण नहीं थे। जिस कारण से भी हों पर समाजसुधार की प्रेरणा से उनके कर्म प्रेरित नहीं थे।


दूसरा कारण, हो सकता था कि ईर्ष्या का हो। ईर्ष्या इस बात की कि हम सब नियम तोड़ कर सुख प्राप्त कर रहे हैं और उनके सुख संचय में शुष्कता है। वैसे तो सुखी को देखकर उससे मित्रता का भाव उत्पन्न होना चाहिये। मित्रता इसलिये कि सीखा जा सके कि कैसे सुख प्राप्त किया जाता है, कैसे उद्योगरत रहा जाता है, कैसे उद्यम किया जाता है और कैसे बु्द्धि का समुचित प्रयोग कर योजना बनायी जाती हैं और आगामी बाधायें पार की जाती हैं। यदि यह सब सीख लिया जाये तो सुख वैसे ही प्राप्त हो जायेगा। इसके स्थान पर ईर्ष्या का भाव मात्र तुलना के कारण आता है, वह प्रसन्न है पर मैं नहीं। तो किस प्रकार से उसकी प्रसन्नता को कम किया जाये? ऐसा नहीं है कि ईर्ष्या में कार्य कम करना पड़ता है या ऊर्जा कम लगती है। ध्यान से देखा जाये तो ईर्ष्या में आप मित्रता से कहीं अधिक कार्य करते हैं। मित्रता तो सरलतम है, बिना अधिक प्रयास के आपका सुख बढ़ जाता है। वहीं दूसरी ओर ईर्ष्या में समय, बुद्धि और ऊर्जा कहीं अधिक लगती है, बस दूसरों का सुख कम करने के लिये।


ईर्ष्या बड़ी बलवती है, आवश्यक न भी हो तब भी आप प्रतियोगिता में खड़े हो जाते हैं। प्रतियोगिता कि सामने वाला अधिक प्रसन्न कैसे है? प्रतियोगिता उस समय तो ठीक होती है जब प्राप्य वस्तु एक ही हो। यहाँ तो हाट खाने की वस्तुओं से भरे पड़े हैं, टाकीजें फिल्मों से पटी पड़ी है, सबके पास व्यय करने के लिये पर्याप्त धन है तो प्रतियोगिता का भाव कैसा? जगत में सुख की भी कमी नहीं है, आप ईर्ष्यावश प्रतियोगिता करेंगे और भेद जाकर अपने स्वामी को बता देंगे तो वह सुख विशेष नहीं रहेगा, कोई दूसरा सुख आ जायेगा। इस तरह के कई प्रकरण छात्रावास में हुये हैं जब भेदियों के कारण एक सुख का मार्ग बन्द कर दिया गया तो हम लोगों ने कोई और लक्ष्य और साधन ढूढ़ लिया।


तीसरा कारण है, कष्ट देने का स्वभाव। यदि कोई स्वभावतः दुष्ट है तो उसका सारा ध्यान इसी बात पर लगा रहेगा कि सामने वाले को कैसे कष्ट दिया जाये। तब उसकी परिधि में मात्र आप ही नहीं आते हो, वे सब आते हैं जो भी उसके संपर्क में रहते हैं। आपके लिये भेद के द्वारा कष्ट उत्पन्न करेगा तो औरों के लिये किसी और कारण से कष्ट पहुँचायेगा। ऐसे लोगों को सुख दुख के बीच का अन्तर ज्ञात नहीं होता है। यह संग “बेर केर को संग” जैसा होता है, “वा डोलत रस आपने, वाके फाटत अंग”। इस तरह के दुष्ट सबके लिये घातक होते हैं, विशेषकर उस स्वामी के लिये भी जिनकी ये सेवा करते हुये प्रतीत होते हैं।


भेदियों के शेष कारण अगले ब्लाग में।

30.10.21

मित्र - ३७(भेदी मनःस्थिति)

आपके साथ रहने वालों का भेदी बन जाना, यह सहजीविता का सामान्य लक्षण नहीं है। यह समाज के वे स्खलनक हैं जिन्हें आभास नहीं होता है कि जब समाज का ढाँचा ढहता है तो साथ में उनका भी पतन होता है। दृढ़ समाज में औरों की उपलब्धियों तो एक बार स्वीकार्य भी हो जाये पर भेदिये तो अपने समाज को संकट में डाल कर स्वयं को गौरवान्वित अनुभव करते हैं। जब समाज ही ढह जायेगा तो आपकी जय बोलने वाला कौन रहेगा, जब समाज ही ढह जायेगा तो किसके कन्धे पर खड़े होकर आप स्वयं को यशदीप घोषित करेंगे।

संस्कारवश स्पष्टवादी रहा हूँ अतः मन में जो बात होती है व्यक्ति के समक्ष कह देता हूँ। सामनेवाले में सुधरने की संभावना रहती है तो उस दृष्टि से, नहीं तो औरों का अहित न हो इसलिये चेतावनी की दृष्टि से व्यक्त कर देता हूँ। मेरे मन में कभी किसी का भेद किसी को बताने का विचार ही नहीं आया। यदि किसी व्यक्ति की अनुपस्थिति में उसके बारे में बात होती भी है तो भी परोक्ष आलोचना से बचता हूँ और प्रत्यक्ष कहना श्रेयस्कर समझता हूँ। यदि लगता है कि मेरे संज्ञान में आयी कोई बात किसी का कोई अहित कर सकती है और वह उसको ज्ञात होनी चाहिये तो मैं सीधा या संकेतों में कह देता हूँ। किसी कनिष्ठ के बारे में प्रशासन की धारणा उस तक पहुँचा देना मुझे इसलिये आवश्यक लगता है कि कनिष्ठ को एक अवसर मिल जायेगा सुधरने का, अपने आप को व्यक्त करने का, तथ्यों को यथारूप प्रस्तुत करने का। सामान्य परिस्थितियों में सामने वाले को एक अवसर देना सहजीविता का आवश्यक अंग है।


इस परिप्रेक्ष्य में मुझे कभी समझ ही नहीं आया कि लोग भेदी क्यों बन जाते हैं? इस बारे में अपने मित्रों के विचार जाने किन्तु फिर भी मन को संतुष्ट न कर सका कि चाहे जो कारण रहे पर भेद खुल जाने के बाद जो तनाव उत्पन्न होता होगा उसका निराकरण कैसे किया जाता होगा? भेद खुल जाने के बाद जो वैमनस्यता होगी उसका पूर्वाभास ही अपने आप में सशक्त निषेधक है कि भेदी न बना जाये।


लम्बे समय तक भेदी बने रहना भी संभव नहीं है। कृत्रिम आचरण, अति सतर्कता और अटपटा व्यवहार आज नहीं तो कल भेदी का भेद खोल ही देते हैं। तब जो निष्कर्ष आते हैं, यदि वही स्वीकार्य थे तो पहले ही उनको व्यक्त करने में क्या हानि थी? अपना वास्तविक परिचय छिपाकर कुछ कालखण्ड जी लेने में भला कौन सा बड़ा लाभ मिलता होगा? भेदी को किसी भी समाज में सम्मान के साथ नहीं देखा जाता है। अपमान की दृष्टियों से तो भला यही होगा कि स्पष्टवादी होकर अपना मन्तव्य व्यक्त किया जाये। आपका मत सामने वाले को स्वीकार्य हो या आपकी उपेक्षा हो या आपका उपहास उड़े पर ये सब अपमान सहने के पहले तो प्रयोग में लाये ही जा सकते हैं।


भेदी जिस स्वामी को जाकर सारी बात बताता है, उसके मन में भेदी के बारे में कैसे विचार रहते होंगे? महान तो कदापि नहीं क्योंकि जो अपनों से विश्वासघात कर सकता है वह अपने नवस्वीकार्य स्वामी से भी कर सकता है। इतिहास इस बात का साक्षी है कि भेदियों को कभी भी कोई महत्वपूर्ण और विश्वासयोग्य पुरस्कार स्वामी ने नहीं दिया होगा। यथासंभव पीछा छुड़ाने की घटनायें अवश्य होती हैं भेदियों के साथ। क्रूर स्वामी तो कार्य सम्पन्न हो जाने के बाद भेदिये को मरवा तक डालते थे।


भेदी स्वयं में शक्तिशाली हो न हों पर जिस मात्रा में वे शक्तिसंतुलन अस्थिर करते हैं, उससे उनकी ध्वंसकता नापी जा सकती है। चर्चित कहावत है, “घर का भेदी लंका ढहाये”। इस प्रकार में रावण को तो फिर भी ज्ञात था कि विभीषण अपमानित होकर गया है, सब के सब ज्ञात रहस्य बता देगा। कम से कम रावण को विभीषण के मन्तव्य के बारे में कोई संदेह नहीं था। विभीषण रावण को समझाकर गया था, अपना स्पष्ट मत प्रकट कर के गया था। अपने युद्ध की तैयारी रावण यह तथ्य जानते हुये कर रहा था और इस संभावित संकट को जानते हुये रणनीति बना रहा था। हमारी स्थिति में तो परिमाम और भी भयानक थे क्योंकि हमको तो यह ज्ञात ही नहीं था कि हमारी कौन सी सूचना दूसरे पक्ष तक जा रही है या कौन उस सूचना को पहुँचा रहा है?


हमें तो भेदी के बारे में तब ज्ञात होता था जब हम पकड़े जा चुके होते थे, जब हम रण हार चुके होते थे। उस समय भी यह सुनिश्चित नहीं हो पाता था कि भेदी कौन है, यद्यपि ५-६ लोगों पर संशय अवश्य होता था। ५-६ लोगों पर संशय कोई ऐसी अनुकूल स्थिति नहीं होती जो कि भविष्य में आपका संकट कम कर सके। जब तक पूरी तरह से ज्ञात न हो कि भेदी कौन है आप निष्कंटक अपनी योजनायें क्रियान्वित नहीं कर सकते। योजनाओं में सूचनाओं की गोपनीयता का बड़ा ही महत्वपूर्ण स्थान है। बिना गोपनीयता के किसी काण्ड को निष्पादित करने का प्रयास आँख पर पट्टी बाँध कर सड़क पर चलने जैसा है।


योजना तो तब और रोचक हो जाती है जब आपको भेदी के बारे में ज्ञात हो और भेदी को यह तथ्य ज्ञात न हो। तब आप भ्रामक सूचना पहुँचाकर न केवल आप अपना कार्य पूरा ककरते हैं वरन भेदी को उसके स्वामी के सामने विश्वासहीन, स्तरहीन और अनुपयोगी सिद्ध कर देते हैं। उस तरह के भी कई प्रकरण आये पर मुख्यतः हम भेदियों के हाथों छले जाते रहे।


भेदी को क्या मिलता था हमारी सूचनायें अपने स्वामी तक पहुँचा कर। जानेंगे अगले ब्लाग में।

28.10.21

मित्र - ३६(विघ्नमना भेदिये)

हम अपने बुद्धिबल और साहस से जिस स्तर तक पहुँच रहे थे, वहाँ पर बहुत अधिक दिनों तक बने रहना संभव नहीं हो रहा था। जिस दिन काण्डस्थल पर साक्षात छात्रावास अधीक्षक प्रकट हो जाते, उसी दिन हमारे श्रमशील पुरुषार्थों का पटाक्षेप हो जाता था। आलोक के मत में कोई एक भेदी नहीं, वरन स्वनामधन्य दुष्टों की पूरी श्रृंखला थी। तुलसीदासजी ने उनके महत्व को पहचाना है और रामचरितमानस के प्रथम काण्ड में देवताओं के बाद उनकी ही वन्दना की है। अपने उत्थान में न्यूनतम व्यय करने वाले और दूसरों का अहित करने में अपना सर्वस्व झोंकने को तत्पर उन भेदियों के बिना हमारी छात्रावास की कथा अपूर्ण है।

पतंजलि योगसूत्र में समुचित सामाजिक गतिमयता की बड़ी ही गंभीर और लाभदायक सलाह दी गयी है। सुखी के साथ मित्रता का भाव, दुखी के साथ करुणा का भाव, पुण्यात्मा के साथ मुदिता का भाव और पापात्मा के साथ उपेक्षा का भाव रखना चाहिये। भेदियों की दृष्टि में हम सुखी थे क्योंकि बिना अनुमति के टीवी पर फिल्म देख रहे थे, बाहर के व्यंजन, मिठाईयाँ आदि मँगा कर खा रहे थे, समय समय पर फिल्म देखने भी जा रहे थे। अच्छा तो यह होता कि हमें सुखी देखकर और पतंजलि की सलाह को ध्यान में रख हम सबसे मित्रता की जाती और सुविधाओं का लाभ उठाया जाता। प्रत्यक्ष रूप से साथ आने में यदि बुद्धिहीनता या लघुता सिद्ध हो रही थी तो हमारे प्रयोगों के तत्वसार को अपनाकर बिना श्रेय दिये ही सुविधा उठायी जा सकती थी।


यदि भेदियों की दृष्टि में हम पापात्मा थे तो भी हम उपेक्षा के पात्र थे। यद्यपि इस पर एक विस्तारित चर्चा हो सकती है कि नियम के विरुद्ध जाना क्या पाप की श्रेणी में माना जायेगा? पाप तो तब होता जब किसी का कोई अहित होता, किसी को कोई पीड़ा पहुँचती। “परहित सरिस धरम नहिं भाई, परपीड़ा सम नहिं अधमाई”। हमारे परिप्रेक्ष्य में नियम के विरुद्ध जाने का अर्थ था, बाहर का कुछ खाना या बाहर जाकर कोई फिल्म देखना। इससे भला किसी का क्या अहित? और जब अहित नहीं तो पाप कैसा? यदि विस्तृत दृष्टिकोण से भी देखा जाये तो कोई कह सकता है कि इसको “अनुशासन” और “स्वयं के भविष्य” के अहित की श्रेणी में लाया जा सकता है। ये दोनों ही इतने मूर्त रूप तो नहीं जिनको पीड़ा पहुँचे। यदि अनुशासनहीनता के कारण व्यवस्था को ठेस पहुँचती भी है तो भी वह पापतुल्य नहीं हो सकता है।


नियमों के पालक और उनसे पालित अपनी अपनी समझ का युद्ध लड़ते हैं। एक की समझ में वह ठीक है, दूसरे की समझ में वह आधारहीन और विचारहीन। पहले की समझ में उससे दूसरे का विकास होगा, दूसरे की समझ में वह पहले का अहं है। कालान्तर में बात हित की रह ही नहीं जाती है। पहला कहता है कि हम तो मनवा के रहेंगे, तो दूसरा कहता है कि “ई चोलबे ना”। अन्ततः नियम तार तार हो असमय निस्तार पा जाता है। अतः नियमों की व्यवस्था के लिये यह बहुत ही आवश्यक है कि पालक और पालित अपनी अपनी समझ दूसरों को समझा सकें और एक साझा निष्कर्ष पर पहुँच सकें, एक समझौता सा कर सकें। समझौता जो शब्दों से अधिक भावों पर आश्रित हो, कुछ कुछ अमेरिका के संविधान जैसा क्योंकि बहुधा शब्द तो सबके अर्थों में प्रयुक्त हो जाते हैं, अर्थ में भी और अनर्थ में भी।


यदि मान भी लिया जाये नियमों का उल्लंघन पापकर्म की श्रेणी में आता है, तो उसकी उपेक्षा कर देना चाहिये था। प्रेम और द्वेष दोनों ही सापेक्षिक होते हैं। दोनों में ही आप सामने वाले को महत्व देते हैं। उपेक्षा में उस पापकर्म को महत्व नहीं मिलता है जिससे वह निष्प्राण और निर्बल हो जाता है। उस स्थिति में शमन और दमन दोनों ही सरल हो जाता है। द्वेष में आप पापी के बारे में सोचते हैं, क्रोधित होते हैं, दुखी होते हैं। इससे पापकर्म को और प्रेरणा मिलती है, बल मिलता है। 


यदि भेदी के मन में उपेक्षा के भाव नहीं भी आये तो पहले किसी हितैषी की भाँति प्रत्यक्ष कहना था या किसी वीर की भाँति चुनौती देना था। दोनों ही नहीं किया और साथ में पता भी चलने दिया कि मन में क्या चल रहा है? यदि हम सबको भेदियों के मन में घटित विचारक्रम का पता चल जाता तो हम सजग हो उनसे दूरी बना लेते। यह तो लगभग निश्चित ही था कि कुटिलता और हानि पहुँचाने के भाव से भेदकर्म किया गया था।


इस क्रिया को और ऐसे व्यक्तियों को गु्प्तचर न कह कर भेदी की संज्ञा पर आपत्ति हो सकती है क्योंकि भेदी एक नकारात्मक शब्द है जबकि गुप्तचर एक निश्चित व्यवस्था के प्रति इंगित करता है। गुप्तचर बहुधा आपके बीच का नहीं होता, वह आपका मित्र नहीं होता है, उसकी निष्ठा आपके प्रति नहीं होकर अपने स्वामी के प्रति होती है। अपने गुप्तचर कर्म को करने के क्रम में वह आपसे मित्रता का अभिनय करता है, आपका विश्वास जीतता है, आपके प्रति निष्ठा व्यक्त करता है। वहीं दूसरी ओर भेदी पहले आपका मित्र होता है, आपके साथ रहता हो पर कालान्तर में किसी प्रलोभन में आकर या किसी स्वार्थ के वशीभूत हो अपने नये स्वामी के लिये कार्य करने लगता है। अपने पाले बदलने की कुटिलता को भेदी कहना ही उपयुक्त कहा जायेगा।


कारण क्या रहा होगा कि अपने मित्रों से छल कर कुछ छात्रावासी भेदी बन गये। जानेंगे अगले ब्लाग में।