24.8.16

चीन यात्रा - ८

पिछले एक ब्लॉग में धीरू सिंह जी ने टिप्पणी की थी “चीन को कभी अफीमचियों का देश कहा जाता था, आज कमाल है।”  सच है क्योंकि अफीम ने वहाँ के युवा को एक शताब्दी से भी अधिक समय के लिये निष्क्रिय रखा और यह भी सच है कि विकास के लिये जितना प्रयास चीन ने किया उससे कहीं अधिक प्रयास अफीम के अन्धतम से बाहर आने के लिये किया गया।

कितने ही गौरव से पूरित रहे हों, पर इतिहास के पन्ने एक टीस छोड़ जाते हैं। संभवतः यह कालखण्ड चीन के इतिहास में निम्नतम बिन्दुओं में से एक होगा, भुलाने योग्य और पुनरावृत्ति न होने देने योग्य। इस कथा की व्यथा के कुछ अध्याय भारत में भी आकर ठहरते हैं, कथा के खलनायक के रूप में नहीं वरन सहभुक्तभोगियों के रूप में, सहयात्री के रूप में।

प्रारम्भ दूसरी शताब्दी ईसा पूर्व से होता है। चीन से रेशम, कागज, चाय आदि का व्यापार “रेशम मार्ग” से होता हुआ यूरोप के पश्चिमी क्षेत्र तक पहुँचता है। मध्य एशिया और भारत भी लगभग ७००० किमी लम्बे इस मार्ग से जुड़ते हैं। मंगोलिया और मंचूरिया की ओर से होने वाले आक्रमणों से राज्य को बचाने के लिये कई चरणों में व कई परतों में चीन की दीवार का निर्माण भी होने लगता है। इस दीवार ने रेशम मार्ग को भी आक्रमणों से बचाये रखा। रेशम मार्ग में वस्तुओं के व्यापार के साथ साथ संस्कृतियों और विचारों का भी वृहद आदान प्रदान हुआ।

भारत और चीन सम्मिलित रूप से विश्व व्यापार का साठ प्रतिशत नियन्त्रित करते थे। भारत से मसालों, चाय, रेशम, सूती, हस्तकारी आदि की माँग विश्व के अन्य भागों में व्यापक थी। रेशम मार्ग का समुद्री भाग हिन्द महासागर से होकर निकलता था। उस समय किसी मुद्रा का चलन नहीं था और इन वस्तुओं के स्थान पर पश्चिमी देश सोना, चाँदी और रत्नादि दे जाते थे। क्या आपको आश्चर्य नहीं होता कि जिस भारत में सोने की केवल एक खान कोलार में है वहाँ के मंदिरों और घरों में कुन्तलों सोना कहाँ से पड़ा रहता था। भारत को सोने की चिड़िया कहा जाता था, देश ऐश्वर्य में परिपोषित था। ज्ञान और शक्ति के उपासक जब अपना सारा सामर्थ्य धनक्रम में लगा देते हैं तब समाज असंतुलित हो जाता है, विघटन के बीज पनपने लगते हैं, समाज की व्यवस्था चरमराने लगती है। सदियों से भारत के वैभव पर आँख गड़ाये लुटेरों को मौका मिल जाता है, आक्रमण, लूटमार और ध्वंस का सतत क्रम सदियों की पराधीनता ले आता है।

तब प्रादुर्भाव होता है, विशुद्ध व्यापारिक लुटेरों का, कुटिल, निर्मम और विध्वंसक अंग्रेजों का। इनकी विशेष उपलब्धि यह थी कि अर्थव्यवस्था को जो क्षति इनके पूर्ववर्ती लुटेरे ६०० वर्ष में नहीं पहुँचा सके, उसकी सहस्रगुना क्षति मात्र २०० वर्षों में अंग्रेजों ने पहुँचा दी। इनके साम्राज्य का एकल उद्देश्य लूटमार था और व्यवस्था के जितने भी तन्त्र इन्होंने बनाये, वह उस लूटमार को अत्यन्त सरल और निष्कंट बनाने के लिये थे। इस विषय पर विस्तृत और व्यापक चर्चा फिर कभी होगी। यही कार्य अंग्रेजों ने चीन के साथ भी किया। निष्कर्ष यह हुआ कि विश्व व्यापार में भारत और चीन का सम्मिलित योगदान १८०० ई में ५० प्रतिशत से घटकर १९५० में मात्र १० प्रतिशत रह गया, दोनों का ही घटकर ५ प्रतिशत हो गया। सम्प्रति भारत का विश्व व्यापार में योगदान अभी भी ७ प्रतिशत ही है जबकि चीन ने इसे १७ प्रतिशत तक पहुँचा दिया है।

ईस्ट इंडिया कंपनी १७५७ में प्लासी का युद्ध जीतने के बाद ही अपने लक्षण दिखाने लगी। भारत की अर्थव्यवस्था मूलतः कृषि आधारित थी। मुगलों ने भले ही ६०० वर्षों तक भारत के एक भूभाग में शासन किया हो पर उन्होंने कृषि को हानि कभी नहीं पहुँचायी। अंग्रेजों ने कृषि को ही तोड़ना प्रारम्भ किया, बाद में समाज को तोड़ा, संस्कृति को तोड़ा और अंत में देश तोड़कर चले गये। बंगाल में चावल बहुतायत से उत्पन्न होता था और देश के अन्य भागों में भी भेजा जाता था। वहाँ के किसानों से बलात अफीम और नील की खेती करायी गयी, लगान ५० प्रतिशत तक कर दिया। यही अफीम चीन भेजी गयी और वहाँ के युवाओं को उसकी लत लगवायी गयी। प्लासी युद्ध के मात्र २० वर्ष बाद ही बंगाल में भयंकर अकाल पड़ा। कभी धान की प्रचुरता में जीने वाला समाज चावल के एक एक दाने को तरस गया। इतिहासकार बताते हैं कि अंग्रेजों के राज में लगभग ३ करोड़ भारतीयों की मृत्यु केवल भुखमरी से हुयी, भारत की जनसंख्या का १० प्रतिशत। अपनी सफेद चमड़ी को सभ्यता का उत्कर्ष बताने वालों ने हर दस में से एक भारतीय को भूख से तड़पाकर मार डाला। 

यह अंग्रेजों के बस की ही बात थी कि जहाँ एक ओर अफीम की खेती से उन्होंने भारत की कृषि आधारित अर्थव्यवस्था चौपट की वहीं दूसरी ओर उसी अफीम से चीन के पूरे युवा समाज को १०० वर्षों तक नशे में डुबोये रखा। चीन के साथ व्यापार में ब्रिटेन को अपनी चाँदी देनी पड़ती थी। इस अफीम ने उस चाँदी का स्थान ले लिया और व्यापार अंग्रेजों के पक्ष में होने लगा। मुख्यतः तस्करी के माध्यम से किये गये अफीम के व्यापार का योगदान ब्रिटेन की कुल आय में २० प्रतिशत था।

बीजिंग यात्रा में उन गलियों में जाने को मिला जिनमें वहाँ के अफीमची निष्क्रिय पड़े रहते थे। इन गलियों को हुटांग कहा जाता है। जहाँ एक ओर बीजिंग में गगनचुम्बी अट्टालिकायें दिखायी पड़ीं, वहीं संभवतः ऐतिहासिक कारणों से राजाओं के परिसर के अत्यन्त निकट इन गलियों का स्वरूप अब तक नहीं बदला गया है। कल्पना कीजिये कि राजाओं के इतने निकट और इतने व्यापक रूप से नशा फैला हो तो वहाँ के समाज की क्या चेतना रही होगी। सर्वत्र हाहाकार मचा औऱ राजा ने अफीम के व्यापार को बन्द कराने व अफीम को नष्ट कराने के आदेश दे दिये। १८३८ में गुआन्झो में वहाँ के गवर्नर ने अंग्रेजों के गोदाम में छापा मारकर आज की तुलना में करोड़ों की अफीम जला दी। इस भयंकर आर्थिक हानि को अंग्रेज पचा नहीं पाये और १८३९ में चीन पर आक्रमण कर दिया, इसे पहला अफीम युद्ध कहा जाता है। इस युद्ध में चीन की हार हुयी और प्लासी के युद्ध की तरह उनके भी दुर्दिन प्रारम्भ हो गये। जीत स्वरूप अंग्रेजों ने हांगकांग हड़प लिया, साथ ही शंघाई सहित ५ पत्तनों पर अपने व्यापारिक प्रतिष्ठान स्थापित कर लिये।

इस पर ही अंग्रेज संतुष्ट नहीं हुये और पुनः आक्रमण का कोई न कोई कारण थोपने लगे। १८५६ से १८६० तक द्वितीय अफीम युद्ध हुआ। इसी समय भारत में भी प्रथम स्वतन्त्रता संग्राम चल रहा था, अंग्रेजों की सेनायें उसमें व्यस्त थीं पर फ्रांसीसियों द्वारा युद्ध में सहायता करने से अंग्रेजों ने वह युद्ध भी जीत लिया, जिसके बाद अंग्रेजों ने अफीम के व्यापार को पूरे चीन में आधिकारिक कर लिया। १८७९ में चीन में ६७०० टन अफीम आयात होता था। चीन में अफीम की खेती प्रारम्भ करने से १९०६ तक चीन में विश्व की अफीम का ८५ प्रतिशत उत्पादित होने लगा, लगभग ३५००० टन अफीम। वयस्क जनसंख्या का २७ प्रतिशत चीन अफीम के नशे में डूब चुका था।

चीन की साम्यवादी सरकार को अफीम का अन्धतम मिटाने का श्रेय जाता है। १९५० के दशक में एक करोड़ से भी अधिक नशेड़ियों को सुधार गृह में भेजा गया, तस्करों को मृत्युदण्ड दिया गया, अफीम की खेती के स्थान पर अन्न उत्पादन कराया गया और शेष खेती को दक्षिण चीन में स्थानान्तरित कर दिया गया। १९७१ के समय वियतनाम युद्ध में इसी अफीम की लत २० प्रतिशत अमेरिकी सैनिकों को लग गयी थी। २००३ तक भी चीन में नशेड़ियों की संख्या १० लाख के आस पास थी। कई वर्ष पहले मंदसौर में अफीम की खेती देखी थी। दो वर्ष पहले गाजीपुर में अफीम की फैक्ट्री देखी। लोगों ने बताया कि अभी भी वहाँ के युवा अफीम दबाये निष्क्रिय पड़े रहते हैं। मैं धीरू सिंह जी से पूर्णतया सहमत हूँ। यह चीन का कमाल ही है कि एक पूरी शताब्दी तक नशे में डूबे रहने के बाद भी इतना विकास कर दिखाया।


चीनी जनजीवन के कई अन्य पक्ष अगले ब्लॉग में।

20.8.16

चीन यात्रा - ७

प्रश्न अब इस बात का नहीं रहा कि बुलेट ट्रेन हमारे लिये लाभदायक है या नहीं, प्रश्न अब यह है कि हमें किस गति से आगे बढ़ना है। चीन की तरह ही १५ वर्ष लगाकर और उसी गति से सीखते हुये या चीन व अन्य विकसित देशों के १५ वर्ष के प्राप्त अनुभव को प्रारम्भिक बिन्दु मानकर। इस समय हमारे पास तकनीक नहीं है अतः हमें तकनीक आयातित करनी पड़ेगी। पर कितनी शीघ्रता से हम उसे अपने अनुरूप ढालें और उसका विस्तार पूरे भारत में करें, निर्णय इसका लेना है। भारत के भौगोलिक क्षेत्रफल में बुलेट ट्रेन का विस्तार करने के लिये वर्तमान सामान्य ट्रैक के बराबर ही हमें हाईस्पीड ट्रैक का निर्माण करना होगा। किस तरह उसमें लगने वाला व्यय न्यूनतम हो, इस बात पर अध्ययन और शोध शीघ्रातिशीघ्र प्रारम्भ हो जाना चाहिये। फ्रेट कॉरीडोर की तरह ही बुलेट कॉरीडोर पर आगामी योजना तैयार हो जानी चाहिये, इसका निर्धारण भी होना चाहिये कि किस आर्थिक मॉडल के अनुरूप हमें आगे बढ़ना है।

उत्कृष्ट कोटि के शोध और सटीक योजना के मूल में एक पूर्णकालिक समर्पण रहता है। इसी तरह रेलवे के तन्त्र का परिचालन भी एक पूर्णकालिक कार्य है। परिचालन में डूबा व्यक्ति अपनी दैनिक समस्याओं से ऊपर नहीं उठ पाता है। उसका समय दिये गये संसाधनों का सर्वोत्तम उपयोग करने में निकल जाता है और यही उसका कर्तव्य भी है। उसे अपनी कार्यशैली से मोह हो जाता है, उसे तन्त्र की कमियों से एक भावनात्मक लगाव हो जाता है। उन्हें उजागर कर वह भला कैसे अपनी परिश्रमरतता की अवमानना करेगा। जो रेलवे के परिचालन में लगे हैं, उनसे यह आशा करना कि वे परिचालन के साथ शोध और योजना में अपना योगदान देंगे, यह तनिक कठिन लगता है। 

शोध और योजना में उत्कृष्टता को लिये जहाँ एक ओर रेलक्षेत्र में कार्य के अनुभव का लाभ लेना चाहिये वहीं दूसरी ओर रेलवे से इतर और पूर्णतः शोध में जुटे लोगों को भी जोड़ना चाहिये। आर्थिक तथ्यों और प्रकल्पों को साधने के लिये भी विशेषज्ञ आवश्यक हैं। आर्थिक औचित्य के लिये आँकड़े आवश्यक होते हैं, बिना लाभ के कोई भी इन योजनाओं में धन लगाने से हिचकेगा। आँकड़े किसी भी प्रकल्प को समझने और समझाने के लिये एक पारदर्शी वातावरण बनाते हैं। जब किसी को पहले से यह ज्ञात ही न हो कि किसी स्टेशन पर कितने व्यक्तियों के आने की संभावना है, तो वह अपने व्यवसाय का आर्थिक मॉडल किस आधार पर बनायेगा। सर्वेक्षण संस्थानों की यही उपयोगिता उन्हें परिवहन के क्षेत्र में इतना महत्वपूर्ण बना देती है। चीन में सर्वेक्षण संस्थान हों या  रेल विश्वविद्यालय, वहाँ के प्रत्येक प्रोफेसर अपने क्षेत्र में सिद्धहस्त है। उनके क्षेत्र में आधुनिकतम क्या चल रहा है, उन्हें ज्ञात है। वे दैनिक परिचालन में व्यस्त नहीं हैं और शान्ति और निष्पक्षता से बैठकर तकनीक और अर्थ की दिशा और दशा समझ सकते हैं। भारत में रेलवे के क्षेत्र में इस गहनता और गहराई का आभाव है। आईआईटी और आईआईएम जैसे उच्च संस्थानों में रेल संबंधित शोधों और आँकड़ों की संख्या बहुत कम है। इस प्रकार के शोधों और आँकड़ों को योजना और निर्माण का आधार बनाने के लिये रेल विश्वविद्यालयों और सर्वेक्षण संस्थानों का यथाशीघ्र स्थापित होना अत्यन्त आवश्यक है।

चीन में रेल विश्वविद्यालयों और सर्वेक्षण संस्थानों का उपयोग लम्बी दूरी के बुलेट या सामान्य रेलमार्गों की योजना, निर्माण और परिचालन के लिये तो किया ही जाता है, उनका उपयोग नगरीय यातायात की परियोजनाओं में भी व्यापक है। मेट्रो, नगरीय बस, बीआरटी आदि सभी साधनों की योजना भी सर्वेक्षण संस्थानों के आँकड़ों से ही प्रारम्भ होती है। आर्थिक, सामाजिक, यातायात के साधन, कार्य, मनोरंजन, विद्यालय और व्यापार के स्थानों से संबंधित आँकड़ों के आधार पर मेट्रो आदि की रूपरेखा को सुनिश्चित किया जाता है। नगर की संरचना का प्रभाव नगरीय यातायात के साधनों पर भी पड़ता है। यदि सारे व्यापारिक प्रतिष्ठान, कार्यालय, विद्यालय आदि नगर के केन्द्र में हों तो यातायात अत्यन्त दुरूह हो जायेगा। सारी भीड़ एक स्थान पर ही न हो जाये, इस बात का समुचित ध्यान नगरीय संरचना में रखा जाता है। कभी कभी यातायात को सरल बनाने के लिये नगरीय संरचना में सकारात्मक परिवर्तन भी किये जाते है। 

चीन के दो बड़े नगर देखे, दोनों ही ३००० वर्ष से अधिक पुराने नगर हैं, दोनों में ही इतने लम्बे कालखण्ड में अनियन्त्रित विकास हुआ होगा। फिर भी बीजिंग और चेन्दू की नगर संरचना ने मुझे अत्यन्त प्रभावित किया। चीन के मुख्य नगर रिंगरोडों में विभाजित हैं। चेन्दू में ४ रिंग रोड और बीजिंग में रिंगरोडों की संख्या ६ है। जब भी विकास की आवश्कता होती है, एक रिंग रोड और बढ़ जाती है, पुराने नगर को बिना छेड़े। रिंग रोड को यदि साइकिल का पहिया माने तो साइकिल की तीलियों की तरह १२ सड़कें केन्द्र से बाहर की ओर निकलती हैं। जहाँ पर भी ये सड़कें रिंग रोड को काटती हैं वहाँ पर हर दिशा में जाने के लिये विधिवत फ्लाईओवर। ये सारी सड़कें १४ लेन की दिखीं, एक दिशा में ७, ४ लेन सीधे जाने वालों के लिये, २ लेन आगे से मुड़ने वालों के लिये और एक लेन साइकिल मार्ग के लिये। सड़कों के किनारे दुकानें और व्यापारिक प्रतिष्ठान, पर दुकानों के बाहर पैदल चलने वालों के लिये २०-३० मीटर चौड़े रास्ते। इसी यातायात व्यवस्था के सामानान्तर भूमिगत मेट्रो की लाइनें भी बिछी हैं। 

यह मेरे लिये बड़े ही आश्चर्य का विषय था क्योंकि पुराने नगरों में इतनी चौड़ी सड़क बना पाना असम्भव है। सारे मकान कहाँ गये, यह प्रश्न स्वाभाविक था। सारे मकान दुकानों के बाद में थे, कॉलोनी रूप में, २४ तल की एक अट्टालिका, १२० मकानों की एक अट्टालिका, बड़ी कॉलोनी में ऐसी २० अट्टालिकायें, २४०० परिवारों या १०००० जनसंख्या की एक कॉलोनी। एक तल का कोई भी मकान चेन्दू और बीजिंग की नगरीय सीमा में नहीं दिखा। स्पष्ट है कि नगरीय संसाधनों और सुविधाओं के लिये स्थान निकालने के लिये भूमि की तीसरी विमा का उपयोग किया गया, बिना किसी को उनके मूल स्थान से विस्थापित किये हुये। कोई भी भूमि का छूटा टुकड़ा नहीं दिखायी पड़ा जहाँ पर पेड़ न लगें हों, जिस पर हरियाली या उद्यान न हों। प्रक्रिया बड़ी सुस्पष्ट है, मेट्रो के स्टेशन के लिये एक कॉलोनी को तोड़ना था, पास में ही एक दूसरी कॉलोनी बनायी गयी, सारे परिवारों को उसमें संस्थापित किया गया और मेट्रो निर्माण का कार्य प्रारम्भ। कोई मुआवजा नहीं, मकान के बदले मकान, मकानों की गुणवत्ता पहले से कहीं अच्छी क्योंकि भ्रष्टाचार के लिये मृत्युदण्ड है वहाँ।

इस परिदृश्य में नये नगरों और बुलेट रेलमार्गो के निर्माण को आपस में जोड़ना आवश्यक हो जाता हो। दिल्ली से चेन्नई के बीच हर ५० किमी पर नये नगरों का निर्माण करने से लगभग ४० नये नगर अस्तित्व में आ जायेंगे। इसी प्रकार पूर्वी और चार महानगरों को जोड़ने के क्रम में ५ और बुलेट रेलमार्ग और १६० नये नगर अस्तित्व में आ जायेंगे। अच्छा हो कि ये नगर अत्यन्त छोटे कस्बों के पास आयें जिससे भूमि आदि के अधिग्रहण में समस्या न हो, यदि हो तो भूमि की तीसरी विमा का उपयोग कर उसे साधा जाये और यथासंभव कृषियोग्य भूमि को बचाया जाये। इससे विकास का भौगोलिक विस्तार भी होगा। नगरों की कल्पना विश्व भर से प्राप्त अनुभवों के आधार पर आधुनिकतम और श्रेष्ठतम हो। ऊँचे भवन, निजी वाहनों के स्थान पर नगरीय सेवाओं का प्रयोग, पेट्रोलियम के स्थान पर सौर ऊर्जा और बिजली का प्रयोग, हरे भरे उद्यान, चौड़ी सड़कें, एक किमी के घेरे में प्राप्त सारी जनसुविधायें। वर्तमान नगरों की समस्याओं से त्रस्त नागरिकों को एक नया स्वप्न देगी यह योजना। आईटी के आने से वैसे ही बहुत सी सेवायें अपनी स्थानबद्धता से मुक्त हो गयी हैं। नये नगरों का निर्माण और उन्हें बुलेट ट्रेन से जोड़ने का उपक्रम भारतीय जनमानस को अपने जीवन को विश्वस्तरीय बनाने का एक अनूठा अवसर देगा।


चीन के जीवन के अन्य पक्ष अगले ब्लॉग में।

17.8.16

चीन यात्रा - ६

चीन में हाईस्पीड रेलमार्गों के निर्माण की प्रक्रिया समझने के पहले वहाँ के स्टेशनों का स्वरूप समझ लेना आवश्यक है। स्टेशनों का वाह्य स्वरूप अलग अलग हो सकता है पर कार्यात्मक दृष्टि से उनमें एकरूपता है। स्टेशनों में कम से कम दो तल होते हैं। कई स्टेशनों में तीन से चार तक तल होते हैं। ये तल प्लेटपार्म तक सीमित नहीं होते हैं, वरन पूरे के पूरे स्टेशन के ऊपर होते हैं। ऊपर के तल में एक ओर नगरीय बस और दूसरी ओर मेट्रो के संपर्क द्वार होते हैं, नीचे के तल में प्लेटफॉर्म व रेलवे की लाइनें होती हैं। पहले तल में पहुँच कर एयरपोर्ट जैसी ही सुरक्षा जाँच होती है, बस टिकटधारक ही अन्दर जा सकते हैं। अन्दर एक बहुत बड़ा सा प्रतीक्षालय होता है, पूरा खुला हुआ। उस प्रतीक्षालय के चारों ओर दुकानें रहती हैं।  ट्रेन आने के दस मिनट पहले ही यात्रियों को स्वचलित सीढियों के माध्यम से नीचे वाले तल में जाने को मिलता है। यात्रियों को उनके पूर्वनिश्चित कोच में बैठाने के लिये एक सहायक साथ जाती है। प्लेटफार्म में यात्रियों के अतिरिक्त कोई और व्यक्ति नहीं, कोई दुकान नहीं, कोई खंभे नहीं। प्लेटफार्म पर जाने वालों और वहाँ से निकलने वालों के लिये पृथक मार्ग।

प्रथम तल को यात्री सुविधाओं के लिये विकसित करने में ही आर्थिक बुद्धिमत्ता छिपी है। वाणिज्य की दृष्टिकोण से देखा जाये तो किसी भी स्टेशन पर जितनी दुकानें आ सकती हैं, उसकी दस गुनी से अधिक दुकानें प्रथम तल में समाहित की जा सकती हैं। यदि लखनऊ स्टेशन के ऊपर का पूरा क्षेत्रफल को वाणिज्यिक रूप से विकसित किया जाये तो स्टेशन के  अन्दर और आसपास की सारी दुकाने और सुविधायें उसमें आ जायेंगी। किसी मॉल से कम नहीं दिखे वहाँ के प्रथम तल। यात्रियों के लिये जनसुविधायें, दुकानों के लिये ग्राहक और प्लेटफार्म सब प्रकार के अवरोधों से मुक्त। भारत में भी इस दिशा में कार्य प्रारम्भ किया जा चुका है और स्टेशन विकास के लिये एक कार्पोरेशन का गठन किया जा चुका है।

चीन में कोई भी रेल परियोजना केन्द्र और प्रदेश के बराबर सहयोग से बनती है। यात्रियों को रेल परिवहन की व्यवस्था करना इन सरकारों का सामाजिक दायित्व है, इसे आर्थिक बोझ के रूप में कोई नहीं लेता है। किन्तु ऐसा भी नहीं है कि रेलमार्ग कहीं भी बन जाये और सरकारें आँख बन्द कर पूरा धन लगा दें। विभिन्न स्थानों पर यातायात की कितनी माँग है, इसका निर्धारण यातायात सर्वे के लिये बने ५ संस्थानों में निरन्तर किया जाता रहता है। यही संस्थान सारे आँकड़े उपलब्ध कराते हैं। भविष्य में बढ़ने वाली माँग को भी इसमें सम्मिलित किया जाता है। औद्योगिकीकरण, नये नगरों का निर्माण, जनसंख्या का स्थानान्तरण आदि अनेकों कारकों का वैज्ञानिक विधि से आकलन एवं आँकड़ों का यथारूप संकलन किया जाता है। किन नगरों को परस्पर जोड़ने की योजना होगी, वह किन स्थानों से होकर निकलेगी, ये सब निर्णय बिना स्थानीय राजनीति के लिये जाते हैं। रेलमार्ग का निर्धारण होने पर उसके आसपास की भूमि की उपलब्धता सुनिश्चित करना राज्य सरकारों का कार्य होता है। यह बताया कि पारदर्शी प्रक्रिया और कठोर शासन का भय, इन दो तथ्यों के कारण रेलवे के लिये किये गये भूमि अधिग्रहण में कभी कोई समस्या नहीं आती है।

पहला व्यय भूमि का है। राज्य सरकारों के लिये भूमि उपलब्ध कराना अन्ततः लाभदायक होता है। पहले तो उनके राज्य के लोगों को यातायात की सुविधा मिलती है, यातायात के साधनों का विकास होने से आर्थिक गतिविधि बढ़ती है और सबसे बड़ा लाभ होता है, नगरीकरण। बुलेट मार्ग में बीजिंग से शंधाई के बीच २२ स्टेशन हैं, लगभग ६० किमी पर एक। इन सभी स्टेशनों का सम्पर्क बीजिंग और शंघाई जैसे स्टेशनों से ३-४ घंटे की दूरी पर हो जाने के कारण, इनके विकास की संभावनायें अपार हो गयी हैं। बुलेट मार्ग में आने वाले सभी स्टेशनों के आस पास लोग रहना चाहेंगे, अपने उद्योग लगाना चाहेंगे, विश्वविद्यालय, अस्पताल, कार्यालय आदि स्थापित करना चाहेंगे। नगरीकरण की यह प्रक्रिया राज्य सरकार के लिये अत्यन्त लाभकारी है। इससे न केवल क्षेत्र का आर्थिक विकास होता है, वरन कर के रूप में राज्य की आय भी होती है। तीन वर्ष पहले बंगलोर की उपनगरीय सेवाओं के विस्तार के बारे में राज्य सरकार से विचार विमर्श हो रहा था और राज्य सरकार विस्तार का व्यय वहन करने को तैयार बैठी थी। उत्सुकतावश जब उनसे पूछा कि आर्थिक रूप से आपको क्या लाभ होगा, तो उत्तर था कि यह व्यय तो भूमि की बढ़ी कीमतों के कारण रजिस्ठ्री भर से ही निकल आयेगा। यह प्रत्यक्ष लाभ हम बहुधा रेल परियोजनाओं के आकलन में आँकड़ों के रूप में नहीं रख पाते हैं। यदि रख पाते तो संभवतः रेल परियोजनायें इतनी मँहगी न लगतीं।

दूसरा बड़ा व्यय निर्माण का है। इसके लिये वहाँ के स्टेशनों के स्वरूप और उसके आर्थिक संदोहन की प्रक्रिया महत्व रखती है। जैसे ही परियोजना में रेलमार्ग के स्टेशनों को स्पष्ट निर्धारण होता है, उसमें आने वाले यात्रियों की संख्या के आधार पर उस पर वाणिज्यिक क्षेत्रफल का भी निर्धारण हो जाया है। उसके अधिकार नीलामी के माध्यम से पहले ही बेच दिये जाते हैं। निर्माण प्रारम्भ करने के लिये उसी पूँजी का उपयोग किया जाता है। जिन रेलमार्गों का आर्थिक औचित्य नहीं होता है तो उनका निर्माण व्यय वहाँ की सरकारें वहन करती हैं। २०१२ में बीजिंग में हुये ओलम्पिक में भी यही प्रक्रिया अपनायी गयी थी। खेलग्राम बनाने के पहले ही उनकी नीलामी कर दी गयी और पूरा का पूरा पैसा निर्माण कार्य में लग गया था। निर्माण हुआ, सफल खेल का आयोजन हुआ और उसके बाद घरों का आवंटन हुआ। भारत में यह मॉडल कितना सफल होगा, इस पर प्रयोग होना शेष है, पर बुलेट स्टेशन के प्रथम तल पर बनने वाले मॉल में लोग अपना व्यवसाय अवश्य स्थापित करना चाहेंगे। यही नहीं, अभी के स्टेशनों के प्रथम तल का स्वरूप बनाकर उसके वाणिज्यिक क्षेत्रफल की नीलामी से इतना धन आ जायेगा कि निर्माण कार्य प्रारम्भ कराया जा सके।

तीसरा व्यय बुलेट ट्रेनों के परिचालन का है। उसका धन ट्रेन के किराये से आता है। यदि निर्माण का पूरा धन वाणिज्यिक गतिविधि से न आ पाये तो सरकार यह निर्धारण कर सकती है कि उसका कितना भाग वह स्वयं वहन करेगी और कितना भाग यात्रियों पर डालेगी। परिचालन और रखरखाव के लिये दो अलग विभाग रहते हैं जिनके बीच यह समझौता होता है कि उस रेलमार्ग में गाड़ियों के परिचालन के लिये कितना धन दिया जाये।  यह दर प्रति ट्रेन प्रति किमी निर्धारित की जाती है। चीन में यह दर एक ट्रेन के लिये रू ५०० प्रतिकिमी है। इस दृष्टि से दिल्ली और चेन्नई के बीच २१६५ किमी की दूरी में बुलेट ट्रेन चलाने का परिचालनिक व्यय लगभग रु ११ लाख होगा। अधिक लाभ के लिये परिचालन विभाग अधिक ट्रेनें चलायेगा और रख रखाव वाला विभाग भी अपना कार्य शीघ्रता से करेगा, यह संतुलन संसाधनों का अधिकतम संदोहन करता है।


रेल परियोजना के निर्माण और परिचालन का अर्थशास्त्र अत्यत्न सरल दिखता है यदि तीनों व्ययों को आपस में गड्डमड्ड न किया जाये। यदि भूमि और निर्माण के सारे व्यय का बोझ यात्रियों पर डाला जाता है तो आर्थिक रूप से परियोजना असाध्य हो जायेगी। प्रक्रिया के तीन चरण हैं और प्रयास इस बात का रहता है कि एक चरण का प्रभाव दूसरे चरण पर न्यूनतम हो। यह सुनिश्चित करने के लिये योजना और उसका चरणबद्ध क्रियान्वयन अत्यन्त महत्वपूर्ण हो जाता है। इस निर्णय प्रक्रिया को सुदृढ़ आधार देने में वहाँ के रेल विश्वविद्यालयों और सर्वे संस्थानों की भूमिका अत्यन्त महत्वपूर्ण है। हम इसे किस तरह अपना सकते हैं, इससे संबंधित अन्य तथ्य अगले ब्लॉग में।

13.8.16

चीन यात्रा - ५

पिछले वर्ष सिंगापुर और मलेशिया जाने का अवसर मिला था, रेलवे द्वारा आयोजित प्रशिक्षण कार्यक्रम में। उस समय भी मन में एक उद्विग्नता थी, उस यात्रा के बारे में लिखने की। हमारी तुलना में, हमसे बाद स्वतन्त्र हुये छोटे छोटे देश कितने व्यवस्थित और कितने विकसित हो सकते हैं, इस तथ्य की लज्जा के कारण कुछ नहीं लिख सका।

हमारे देश में गम्भीर बातों को हवा में उड़ा देने वालों का एक सम्प्रदाय है। उन्हें किसी के विकास में, किसी के परिश्रम में, किसी के उद्भव में कोई तत्व नहीं दिखता है। वे अपने कुतर्कों से किसी को भी तुच्छ सिद्ध कर सकने की क्षमता रखते हैं। छोटे देशों की प्रगति के बारे में इसी सम्प्रदाय के ही किसी विचारक ने उनकी तुलना बन्दर और भारत की तुलना हाथी से की थी। विकास को नृत्य का पर्याय मानकर यह बताया गया था कि बन्दर तो कैसे भी नृत्य कर सकता है, हाथी को वैसे नृत्य से हानि ही होगी, कष्टकारी और शरीर को पीड़ा पहुँचाने वाला होगा ऐसा नृत्य। ऐसे ही लोग दूसरे हाथी चीन के विकास को लोकतन्त्र और कठोर शासन की बातों में घुमाकर हवा में उड़ा देते हैं। यद्यपि इनके मूल में अकर्मण्यता का भाव प्रबल होता है पर उसे तर्कबल से छिपाने का उपक्रम ही उनकी एकमात्र क्रियाशीलता है।  इस सम्प्रदाय की तर्क प्रक्रिया से पाठकों को आगाह करना आवश्यक था अन्यथा गम्भीरता की हवा निकालने का इनका उत्पात सदा सफल होता रहेगा।

चीन यात्रा में बुलेट ट्रेन में दो बार बैठने का सौभाग्य मिला। ३०० किमी प्रति घंटा की गति में ऐसा लग रहा था कि हवा में उड़ रही हो, दिल्ली आगरा के बीच १५० किमी प्रति घंटा की तुलना में कहीं अधिक सुखद। सन २००० में आरम्भ करते समय चीन की बुलेट ट्रेन तकनीक इतनी विकसित नहीं थी। पूरी की पूरी तकनीक आयातित थी। आने वाले २ वर्षों में चीन ने तकनीक के सारे पक्षों को खोला, समझा, परखा, अपनाया और अपना मॉडल बनाया, चाहे वह ट्रैक हो,  कोच हो, इंजिन हो, सिग्नल हो या संचार तन्त्र हो। बौद्धिक सम्पदा के जगत में लोग इसे नकल या चोरी भी कहते हैं। इन आक्षेपों से अविचलित चीन ने अपनायी तकनीक को और सुधारना प्रारम्भ किया, हर दो वर्ष में एक नया मॉडल, हर नये हाईस्पीड रेलमार्ग को और उन्नत बनाया। पिछले १५ वर्षों के सतत प्रयास और परिश्रम के बाद विशेषज्ञ बताते हैं कि एक तो चीन की तकनीक पूर्णतया आत्मनिर्भर है और सिग्नल के कुछ पक्षों को छोड़कर किसी से न्यून नहीं है। गुणवत्ता बढ़ाने के अतिरिक्त इस बात पर भी सतत शोध होता रहा कि किस प्रकार बुलेट ट्रेन पर होने वाला व्यय कम से कम हो जाये।

विश्व का औद्योगिक केन्द्र बनने में भी चीन ने इसी प्रक्रिया का अनुप्रयोग पूर्णता से किया है। किसी भी उत्पाद में लगने वाला व्यय कम करने में तीन कारक प्रमुख हैं, श्रमिक, माल और तकनीक। केवल श्रमिक ही अनुशासित और सस्ता मिलने से काम नहीं चल पायेगा क्योंकि कच्चे माल को बनाने के लिये चीन ले जाना और बने माल को बेचने के लिये विश्व बाजार में पहुँचाने का व्यय उत्पाद की लागत बढ़ा जायेगा। किस प्रकार उस उत्पाद में लगने वाले प्रत्येक माल को कम से कम लागत में प्राप्त करना और किस तकनीक का उपयोग कर उसे बना लेना, इन दोनों क्षेत्रों में अद्भुत शोध होता है चीन में। साइकिल को ही लें, तो उसके स्वरूप में सतत बदलाव करते करते उसमें लगने वाले धातु की मात्रा कम कर ली और उसमें लगने वाली धातु को बदल कर या उसी धातु को कम लागत में निर्माण कर उसे और सस्ता बना लिया। हर दिखने वाली वस्तु पर उनकी सरलीकृत बुद्धि और निरन्तर शोध की छाप दिखी। आप ध्यान दें तो आपको आश्चर्य ही होगा कि किस तरह चीन से आने वाली हर वस्तु इतनी सस्ती मिलने लगती है। गणेश की मूर्ति हो, दीवाली की झालर हो, हवा भरने वाले पंप हों, खिलौने हों या उड़ने वाले ड्रोन हों, चीन से भारत तक का परिवहन व्यय जोड़ने के बाद भी वे सब भारत के उत्पादों की तुलना में बहुत सस्ते बिकते हैं। सतत शोध की प्रक्रिया, हर वर्ष नया मॉडल निकालने की ललक और आगामी संभावित प्रतियोगिता की पहले से तैयारी ही उन्हें औद्योगिक उत्पादन के शीर्ष पर रखे हुये है।

उनके सामान्य रेलमार्ग लगभग रु ५० करोड़ प्रति किमी की दर से निर्मित होते हैं। इस रेलमार्ग में कोई भी समपार गेट नहीं होता है, या तो ऊपर से या नीचे से पुल बना होता है। पूरा मार्ग दोनों ओर से घिरा हुआ। इसी व्यय में दुमंजिले स्टेशनों का निर्माण भी जुड़ा है। स्टेशनों के निर्माण के भौतिक व आर्थिक स्वरूप की रोचक चर्चा आने वाले ब्लॉग में करेंगे। सामान्य रेलमार्ग और बुलेट रेलमार्गों में बस दो अन्तर प्रमुख हैं। पहला, हाईस्पीड का ट्रैक का आधार पूर्णतया कॉन्क्रीट होता है जबकि सामान्य ट्रैक गिट्टी पर डाले जाते हैं। दूसरा, हाईस्पीड के ट्रैक में घुमाव और चढ़ाव न्यूनतम होते हैं। बुलेट ट्रेन चलाने के लिये बिल्कुल सीधा और सपाट कॉन्क्रीट का रेलमार्ग चाहिये। यही कारण है कि हाईस्पीड रेलमार्ग लगभग रु २०० करोड़ के दर से निर्मित होते हैं। तुलना की जाये तो यह राशि बहुत अधिक नहीं है। हमारे देश में बनने वाली मेट्रो भी लगभग रु १००-१२० करोड़ प्रति किमी की दर से बन रही हैं। यह हो सकता हो कि प्रारम्भिक बुलेट रेलमार्गों पर आयातित तकनीक के कारण अधिक धन लगे, पर धीरे धीरे जब तकनीक का भारतीयकरण करने में हमें सफलता मिलेगी तभी जाकर इस लागत को हम कम कर सकेंगे।

यह तर्क भी दिया जाता है कि भारतीयों को इतनी शीघ्रता कभी नहीं रही कि वे ३६० किमी प्रति घंटे की गति पर आरूढ़ हों। तर्क आकर्षक लग सकता है। समय के महत्व को न समझना और उसे व्यर्थ करते रहना हमारी दिनचर्या है। भारत मे समस्या भले ही समय की न हो पर जनसंख्या की अवश्य है। जहाँ पूरी ऑस्ट्रेलिया की जनसंख्या को एक दिन में ढोने का भार हमारे कंधों पर हो तो बुलेट ट्रेन से अधिक उपयोगी और कुछ नहीं हो सकता है। उदाहरण के लिये दिल्ली और चेन्नई के बीच की दूरी २१७५ किमी है, दोनों के बीच चलने वाली ट्रेनों का दैनिक औसत ५ है। तमिलनाडु एक्सप्रेस की औसत गति ६५ किमी प्रति घंटा है, यात्रा ३३ घंटे की है, प्रतिदिन चलाने के लिये कुल ४ ट्रेनें लगती हैं। यदि ३६० किमी प्रति घंटा की बुलेट ट्रेन से यात्रा की जाये तो पहुँचने में ६-७ घंटे लगेंगे। एक ट्रेन दिन में तीन फेरे लगा लेगी। ६-७ घंटे की यात्रा बैठकर की जा सकती है, अतः ७२ के स्थान पर हर कोच में ८५ यात्री चल सकते हैं। यदि गणना की जाये तो वर्तमान २० ट्रेनों के स्थान पर केवल ४ बुलेट ट्रेनें दिल्ली और चेन्नई के बीच के यात्रियों के लिये पर्याप्त है। यदि वर्तमान ट्रेनों की तुलना में बुलेट टेनें पाँच गुनी मँहगी भी हों तो भी कोई आर्थिक बोझ नहीं पड़ेगा। यदि हवाई यात्रा में लगने वाले पूरे समय को देखा जाये तो बुलेट ट्रेनों की यात्रा में लगने वाला समय समकक्ष ही होगा। किराये की दृष्टि से रेल और हवाई जहाज के बीच का कोई समुचित बिन्दु यात्रियों के लिये मँहगा नहीं होगा।


दिल्ली से कोलकता की दूरी बीजिंग से शंघाई की दूरी के लगभग बराबर ही है। ५ घंटे से कम में पहुँचने वाली बुलेट ट्रेन का किराया रु ५५०० है। १७ घंटे में पहुँचने वाली राजधानी का एसी २ का किराया रु ३६०० व हवाई किराया रु ७००० है। बुलेट ट्रेन का परिचालनिक व्यय निकालना वर्तमान की तुलना में कठिन कार्य नहीं होगा। उस पर से यात्रियों का कितना समय बचेगा, वह देश के लिये हितकर होगा। बुलेट ट्रेन के ट्रैक के प्रारम्भिक निर्माण के व्यय को चीन में किस प्रकार साधा जाता है, अगले ब्लॉग में।

10.8.16

चीन यात्रा - ४

दिल्ली से दोपहर बारह बजे की उड़ान, गुआन्झो के लिये, साढ़े पाँच घंटे की। एयरपोर्ट पर उतारने का स्थान नहीं होने के कारण, हवाई जहाज गुआन्झो के ऊपर ही घंटे भर मँडराता रहा। हांगकांग से लगभग २०० किमी दूर, गुआन्झो में २०१० के एशियाई खेल हुये थे। चीन और भारत के समय में ढाई घंटे का अन्तर है। वहाँ के समयानुसार रात को नौ बजे हम गुआन्झो पहुँचे। वहाँ से चेन्दू की फ्लाईट तीन घंटे से अधिक देरी से थी, रात को एक बजे वहाँ से निकल कर रात को साढ़े तीन बजे हम चेन्दू पहुँच सके। परिवहन विश्वविद्यालय के होटल पहुँच कर सोने में रात का चार बज गया था।

साउथ वेस्टर्न जियोटॉन यूनिवर्सिटी (SWJTU), चीन की चार रेलवे यूनीवर्सिटी में से एक है। जियोटॉन का शाब्दिक अर्थ परिवहन या संचार होता है। इस विश्वविद्यालय में रेलवे संबंधित प्रशिक्षण, शोध व मानकीकरण होता है। इसके अतिरिक्त देश भर में ५ केन्द्र हैं जो परिवहन संबंधी आँकड़ों को एकत्र करते हैं। ये दोनों संस्थान रेलवे की आधारभूत निर्णय प्रक्रिया के स्तंभ हैं। किन्ही दो स्थानों के बीच किस प्रकार का रेल तन्त्र आयेगा, वह किन स्थानों से होकर निकलेगा, किस तकनीक से उसे बनाया जायेगा, कैसे इंजन और कोच उसमें प्रयुक्त होंगे और उसका संचालन कैसे होगा, इसकी विस्तृत रूपरेखा तैयार करने में इन संस्थानों का महत योगदान रहता है। भारतीय रेल बजट में घोषित रेल विश्वविद्यालयों का आगामी स्वरूप कैसा होगा, उसकी समग्र संभावना चीन के परिवहन विश्वविद्यालय में दिखायी पड़ी।

तीन सौ तैंतीस एकड़ में फैला यह विश्वविद्यालय १८९६ में स्थापित हुआ था। सारे संबद्ध विद्यालयों को मिलाकर यहाँ चालीस हजार विद्यार्थी, तीन हजार अध्यापक और लगभग हजार अन्य सहायक हैं।  स्वागत कार्यक्रम में वहाँ के डीन ने सेमिनार की विस्तृत रूपरेखा बतायी।  उनके उद्बोधन चीनी में थे, अनुवादक उसे अंग्रेजी में अनुवाद कर रहे थे। सेमिनार में रेलवे निर्माण, योजना, यात्री सुविधा और परिचालन के ऊपर विस्तृत चर्चा हुयी। चीन ने रेलवे विस्तार और संचालन में जिन उन्नत सिद्धान्तों को अपनाया है उनका भारत के साथ तुलनात्मक अध्ययन आवश्यक हो जाता है। 

यदि आपके मन रेलवे के क्षेत्र में चीन की प्रगति के बारे में कोई संशय है तो उन्हें आँकड़ों के माध्यम से दूर किया जा सकता है। एक और तर्क से चीन से अपनी तुलना न करने का बहाना ढूढ़ा जाता रहा है। आप कह सकते हैं कि वहाँ पर शासन व्यवस्था कठोर है, विरोध करने वालों को दण्डित किया जाता है, इस प्रकार वे कुछ भी कर सकने में सक्षम हैं। वे जो सोच लेते हैं, कर सकते हैं। हमारे देश में लोकतन्त्र हैं, यहाँ पर सबको अपनी बातें कहने का अधिकार है, इसीलिये हम विकास के क्षेत्र में मन्दगति धारण किये हैं। इस तर्क के आधार पर तुलनात्मक अध्ययन का तत्काल पटाक्षेप किया जा सकता है, पर यह तर्क अधिकांश भारतीयों को स्वीकार नहीं होगा। यद्यपि लोकतन्त्र है, सबको साथ लेकर चलने में समय लग सकता है, पर हमारी तार्किक शक्ति इतनी भी अशक्त नहीं है कि हमें अच्छी बात भी समझ न आये। संस्कृति के अध्यायों में हमारी सभ्यता ज्ञान और उन्नति के शिखर स्तम्भों में विद्यमान रही है। सदियों की पराधीनता के कारण हम पिछड़ अवश्य गये हैं, पर प्रतियोगिता से बाहर नहीं हुये हैं। हमारा अस्तित्व हमें रह रहकर झकझोरता है, विश्वगुरु के रूप में पुनर्स्थापित होने के लिये।

अधिक पीछे न जायें, १९४७ में हमारे पास ५४००० किमी रेलमार्ग था, चीन के पास उसका अाधा अर्थात २७००० किमी। पिछले ६९ वर्षों में हम मात्र ११००० किमी जोड़ पाये, जबकि चीन ने हमसे १० गुना अधिक अर्थात ११०००० रेलमार्ग बिछा दिया।  बीस वर्ष पहले तक दोनों के रेलमार्गों की लम्बाई बराबर थी, इस समय चीन में भारत का दुगना रेलमार्ग है। यही नहीं, यदि उनकी योजना के अनुसार उनका कार्य होता गया, जो कि समय से आगे चल रही हैं, तो २०३० तक चीन के पास दो लाख से अधिक रेलमार्ग होगा, भारत के वर्तमान रेलमार्ग से तिगुना।  हमारे लिये पिछले ६९ वर्ष अपने गौरव को भुलाकर पश्चिम की नकल उतारने में चले गये, अपनों को समझाने मनाने में बीत गये, राजनीति करने में निकल गये, चीन अथक परिश्रम करता गया और हमसे इतना आगे निकल गया कि जिसे छू पाने की कल्पना भी हमें स्वेदसिंधु में डुबो जाती है।

बुलेट ट्रेन को लेकर जहाँ एक ओर हमारे तथाकथित चर्चाकार उसके लाभहानि की विवेचना मे उन्मत रहते हैं, वहीं चीन ने पिछले १५ वर्षों में २०००० किमी का हाईस्पीड रेलमार्ग निर्मित कर लिया। बुलेट ट्रेनें केवल उच्च तकनीक का प्रदर्शन ही नहीं, वरन उनकी उपयोगिता अत्यधिक है। वर्तमान में जितने यात्री सामान्य गाड़ियों मे नहीं बैठते हैं, उससे कहीं अधिक बुलेट ट्रेन में यात्रा करते हैं। वर्तमान में बुलेट ट्रेनों की अधिकतम गति ३६० किमी प्रति घंटा की है, पर उन्हें ५०० किमी प्रति घंटा पहुँचने की ललक है। उनकी योजना २०३० तक ६०००० किमी हाईस्पीड रेलमार्ग और निर्माण करने की है। 

चार दिन पहले ही चीन के पूर्वी समुद्री तट से चलकर पहली मालगाड़ी तेहरान पहुँची  है। चीन जिस तरह समुद्र द्वारा लम्बे और धीरे मार्ग की निर्भरता समाप्त कर रेलमार्ग से यूरेशिया के पश्चिमी सिरों को जोड़ रहा है, उससे वह वस्तुओं के परिवहन व्यय को अधिकाधिक कम कर देगा और निकट भविष्य में सस्ता माल भेज कर अपना व्यापारिक आधिपत्य स्थापित कर लेगा। यही नहीं, मंगोलिया, तजाकिस्तान, पाकिस्तान, नेपाल, वर्मा और थाईलैंड को हाईस्पीड रेलमार्ग से जोड़ने की उसकी विस्तारवादी योजना इस महाद्वीप के यातायात परिदृश्य में आमूलचूल परिवर्तन कर देगी। तिब्बत तक का रेलमार्ग संभवतः पर्याप्त नहीं था, ऑक्टोपस की तरह चीन के रेलमार्ग की पहुँच भारत के चारों ओर अपनी उपस्थिति दिखायेगी।

विकल्प तुलना करने या न करने का नहीं है। काल के भाल पर बस दो विकल्प स्पष्ट हैं, या तो हम उद्धत हों और विकास में लग जायें, या आरोपो प्रत्यारोपों के मकडजाल में पड़े रहें और भविष्य के ग्रास में विलीन हो जायें।


कुछ और तथ्य अगले ब्लॉग में।