12.11.19

मेरे राम

राम के बारे में जितना पढ़ा, रामचरितमानस के माध्यम से ही पढ़ा। जितनी बार पढ़ा, राम उतने ही रमते गये मन में। हर उस संबंध में रम गये जो उन्होंने निभाया। समझ नहीं आता कि तुलसी ने राम को प्रसारित किया कि राम ने तुलसी को या हनुमान ने दोनों को?

जितनी बार भी राम का चरित्र पढ़ा है जीवन में, आँखें नम हुयी हैं। कल मेरे राम को अपना आश्रय मिल गया, कृतज्ञतावश पुनः अश्रु बह चले। धार्मिक उन्माद के इस कालखण्ड में भी सदैव ही मेरे राम मुझे दिखते रहे हैं, त्याग में, मर्यादा में, शालीनता में, चारित्रिक मूल्यों में। दो माह पूर्व देख आया था उनको, दृश्य देखकर हृदय बैठ गया था। आज राम को वहाँ आश्रय मिला जिसके लिये मेरे राम स्वर्णमयी लंका छोड़ आये। उल्लास के आँसू है। जिनका भी तनिक योगदान है, मेरे राम को आश्रय दिलाने में, सबको मेरी अश्रुपूरित अंजलि, शब्द भाव न व्यक्त कर पायें संभवतः।

बार बार पढ़ा राम को, बार बार जाना राम को, सीमित मन से जितना संभव हुआ। हर बार पिछली बार से अधिक रोया मन। अथाह धैर्य, अथाह प्रेम, अथाह औदार्य, अथाह आर्जवता। भला कौन सहता है इतना? कौन अपने मानक स्वयं इतने कठिन बनाता है जीवन में? कौन बैठकर शबरी के जूठे बेर प्रेमपूर्वक खाता है? कौन अपने भाईयों को इतना चाहता है? कौन कहता है धरती से कि भरत जब इस पथ आये तो उसे न चुभना क्योंकि जब उसे पता चलेगा कि राम को यही कष्ट हुआ होगा तो वह सह न पायेगा। कौन भाई भला अपने भाई को इस स्तर तक समझ भी पाता होगा? कौन सा मानक हो उनके लिये जो सबके मानक हों।

रामचरितमानस पढ़ने में कई बार आँखें गीली संभवतः इसीलिये होती हैं। राम पर तो चाह कर भी किसी को क्रोध नहीं आ सकता। मेरे राम तो प्रारम्भ से अन्त तक औरों के हित के लिये स्वयं के द्वारा सताये हुये रहे। सदैव दुख सहने को तैयार। अब इस सहनशीलता पर बताईये क्रोध आये कि नयन आर्द्र हो जायें? 

राम में रमना अब किसी प्रतीक की प्रतीक्षा में नहीं रहता हैं मेरे लिये। रामचरितमानस में उतरते ही आँसुओं के स्रोत सक्रिय हो जाते हैं। इतना वृहद चरित्र हृदय में उतारने में डर केवल इस बात का लगता है कि कहीं मेरी क्षुद्रता अपना अहम न खो दे।

राम पर संवाद जितना भी होता है उसमें एक पक्ष उन्हें सर्वजन की तरह निर्णय न लेने लिये उलाहना देता है वहीं दूसरा पक्ष उनकी महानता, उनके त्याग से उन्हें परिभाषित करता है। एक कहता है कि क्यों हो गये इतने लौह हृदय? मानवीय भावों को क्यों नहीं प्रदर्शित किया, क्यों तोड़ी उनकी सीमायें? दूसरा पक्ष उनको महानता की चौखट में जड़कर आराध्य बना देता है। कितना सहा है उस आराध्य ने, हर पग पर, पर पथ पर, आज तक, अब तक। इतनी आराधना के बाद भी असमर्थ रहे उनके आराधक, ५०० वर्ष का वनवास। बैठी सगुन मनावत माता जैसा भाव लेकर आज आस प्रस्फुटित हुयी है। महानता धारण करना कठिनतम है, फिर भी संयमित रहे मेरे राम, मर्यादा में, आज तक।

कभी चाहा कि कृष्ण की तरह व्यवहारिक हो जाऊँ, शठे शाठ्यम् समाचरेत सीख लूँ। गुरुचरणदास की डिफिकल्टी आफ बीइंग गुड पढ़ी। सज्जनता के दंश को समझा। कृष्ण का चरित्र आकर्षक लगता है, आश्चर्य होता है कि कैसे बुद्धिबल पर पूरा महाभारत जीतने की क्षमता थी उनमें। शत्रुओं को उनके स्तर पर जाकर निपटाया। समय आया तो रण छोड़कर भाग भी गये। मेरे राम तो अपने आदर्शों से हिले ही नहीं, रण छोड़ा ही नहीं, अपने ऊपर ही सब ले लिया, अद्भुत स्थैर्य था उनमें। मैं तो चाह कर भी कृष्ण सा नहीं हो पाया, हर बार लगा कि अपने राम से तनिक सा भी छल न हो जाये।


रोम रमो हे राम, तुम्हारी जय हो।
जन मन के अभिराम, तुम्हारी जय हो।

चित्र साभार - https://www.whoa.in/gallery/lord-ram-with-hanuman-milan-image

9.11.19

अभ्यास और वैराग्य - २४

जब एक ही विषय पर धारणा, ध्यान और समाधि क्रमपूर्वक लगे तो उसका पारिभाषिक नाम संयम है। यह लौकिक संयम से तनिक भिन्न है। जब समाधि लगने लगती है तो विषय उत्तरोत्तर सूक्ष्म होते जाते हैं। अनन्त विषय हैं, संयम के लिये, लगभग सारे ही स्थूल और सूक्ष्म विषयों पर, भावों पर, विचारों पर, शब्दों पर, मन्त्रों पर, सब पर ही संयम किया जा सकता है।

संयम का जय होने पर प्रज्ञा का आलोक हो जाता है, विषय प्रकट हो जाते है। ज्ञान से समझ और प्रकाशित हो जाती है। यही समझ समाधि का प्रत्यक्ष है, उससे प्रज्ञा बढ़ती जाती है, समझ की गहराई बढ़ती है। जैसे जैसे संयम स्थिर होता है, प्रज्ञा उतनी ही निर्मल (विशारदी) होती जाती है। यह अनुकूल स्थिति अभ्यास से बनती जाती है। पहले पहले समझ अस्पष्ट होती है, धीरे धीरे स्पष्ट होती जाती है। धारणा के समय विषयगत ज्ञानवृत्तियाँ अपनी अस्पष्टता तजकर समाधि की स्थिति में पूर्ण स्पष्ट हो जाती हैं। 

संयम का प्रयोग भिन्न भिन्न भूमियों में होता है। भूमियों का स्तर धीरे धीरे बढ़ता जाता है। पिछली सीढ़ी अगले के विनियोग के लिये सहायक होती है। प्रक्रिया है, पहले स्थूल से प्रारम्भ करेंगे, धीरे धीरे सूक्ष्म पर जाते जायेंगे। सीधे ऊपर की सीढ़ी में नहीं पहुँच सकते हैं। ईश्वर की कृपा से यदि किसी ने उत्तर की भूमि को जीत लिया है जो उसे उनसे अधर भूमियों में संयम करने की आवश्यकता नहीं है। उसे निम्न भूमियों का साक्षात्कार करने की आवश्यकता ही नहीं है। जब ईश्वर की कृपा हो गयी और निम्न भूमियों को अन्य विधि से जान लिया है, तो संयम से जानने की क्या आवश्यकता है?

अगली भूमि कौन सी होगी, योग ही अपने आप उसे बता देगा, ज्ञान हो जायेगा। जैसा कि पहले भी चर्चा हो चुकी है, योगेन योगो ज्ञातव्यो योगो योगात्प्रवर्तते। योग के द्वारा योग जाना जाता है और योग से ही योग आगे बढ़ता है। योग के प्रति जो अप्रमत्त है वह योग में अधिक रमता है। जो भटकता नहीं है, मदमत नहीं होता है, वही देर तक योग में रहता है। हमें ज्ञान से सुख मिलता है, ज्ञान से दृष्टि मिलती है, भटकाव रुक जाता है। ज्ञान का सुख लौकिक सुख से अधिक होता है, पर क्षीण तो वह भी होता है। इसी प्रकार समाधि से प्राप्त ज्ञान का सुख और भी अधिक होता है, पर क्षीणता उसमें भी आती है। बस परमात्मा का सुख बिना क्षीणता के होता है। 

विषयगत समाधि को सम्प्रज्ञात समाधि कहते हैं, क्योंकि इसमें हमें कुछ ज्ञात रहता है। सम्प्रज्ञात समाधि के चार चरण हैं, वितर्क, विचार, आनन्द और अस्मिता, ये क्रमशः स्थूल से सूक्ष्म से सूक्ष्मतर होती जाती है। जैसा कि योग की परिभाषा में कहा गया था कि योग चित्त की वृत्तियाँ का निरोध है, पर सम्प्रज्ञात समाधि में विषय भी रहता है और संबंधित वृत्तियाँ भी। इससे परे असम्प्रज्ञात समाधि होती है, जिसे निर्बीज समाधि भी कहते हैं, इसमें वृत्तियों का अभाव होने लगता है, इसमें सम्प्रज्ञात का अभाव हो जाता है। यह परवैराग्य होने पर होती है।

संयम की प्रक्रिया में चित्त में परिवर्तन आते हैं, इन्हें परिणाम कहते हैं। सर्वार्थता (चंचलता) से एकाग्रता आने के क्रम को समाधि परिणाम कहते हैं। इसमें सर्वार्थता और एकाग्रता का क्रमशः क्षय और उदय होता है। इसमें शान्त होने वाली वृत्ति चंचलता की है और उदित होने वाली वृत्ति एकाग्रता की। जब शान्त होने वाली और उदित होने वाली वृत्ति एक सी या तुल्य हों तो उसे एकाग्रता परिणाम कहते हैं। और अन्ततः जब वृत्तियाँ उठनी बन्द हो जायें तो उसे निरोध परिणाम कहते हैं।

वृत्तियाँ संस्कार को जन्म देती हैं, संस्कार कालान्तर में वृत्तियों को जन्म देते हैं। यह क्रम सतत है क्योंकि संस्कार ही हमारे कर्माशय में एकत्र रहते हैं और उचित समय और वातावरण पाकर प्रस्फुटित होते हैं। निरोध परिणाम के समय जब कोई वृत्ति नहीं है, तब चित्त में क्या होता है? उस समय निरोध संस्कार उत्पन्न होते हैं। प्रश्न उठ सकता है कि यदि वृत्ति नहीं तो संस्कार कैसे? चित्त को वृत्तिरहित क्षणों का बोध रहता है, उसका भी संस्कार पड़ता है। निरोध परिणाम संस्कारों के स्तर पर होता है।

असम्प्रज्ञात समाधि में आये निरोध परिणाम के कारण निरोध संस्कार व्युत्थान संस्कार का स्थान लेते जाते हैं। जब निरोध संस्कार प्रबल होते हैं तो वह प्रशान्तवाहिता की स्थिति होती है। जब समाधि टूटती है तो व्युत्थान संस्कार पुनः आ जाते हैं। यह क्रम चलता रहता है, अभ्यास से, वैराग्य से, कैवल्य की प्राप्ति तक। जब कोई संस्कार शेष नहीं रहते तो मुक्ति है। जब संस्कार नहीं शेष तो वापस इस संसार में आने का कारण नहीं। और जब तक इस संसार में हैं भी, तो निर्लिप्त, विदेह, प्रकृतिलय।
यह संयोग ही रहा कि दो दिन पूर्व कोयम्बटूर जाना हुआ। वहाँ पर ईशा ध्यान केन्द्र में प्राणप्रतिष्ठित ध्यानलिंगम् के समक्ष ध्यान लगाने का अवसर मिला। अद्भुत अनुभव था वह। बाहर प्रांगण में आदियोगी की ध्यानस्थ प्रतिमा निहार कर मंत्रमुग्ध सा खड़ा रहा। अद्भुत शान्ति, अद्भुत सुख, अद्भुत तृप्त शिव समाधिस्थ थे। 

यद्यपि सिद्धियों के बारे में लिखने की पूर्वयोजना थी पर आदियोगी को रमा देखकर वे वृत्तियाँ अवसान पा गयीं। अभ्यास और वैराग्य के प्रकरण को यहीं विराम। शेष फिर कभी।

5.11.19

अभ्यास और वैराग्य - २३

ध्यान के समय ध्येय, ध्याता और ध्यान रहते हैं। ध्येय में भी तीन तत्व रहते हैं, शब्द, प्रत्यय और अर्थ। शब्द उसका नाम है, प्रत्यय उसके बारे में ज्ञान है और अर्थ वह वस्तु या विषय स्वयं। पद शब्द है और पदार्थ उस शब्द का वास्तविक स्वरूप, जो पद को अर्थ दे। लड्डू शब्द है, उसका गोल होना, मीठा होना उसके बारे में ज्ञान है और स्वयं ही लड्डू अर्थ है।

ध्यान के समय हम ध्येय के बारे में प्रत्यय की एकतानता करते हैं। समाधि में यही इतनी गहरी हो जाती है कि उस स्थिति में शेष कुछ न होकर मात्र अर्थ ही रह जाता है। तब न ध्येय रहता है, न शब्द, न प्रत्यय, न ध्याता। न इस बात का भान कि ज्ञान हो रहा, न इस बात का भान कि ध्यान हो रहा है, न उस बात का भान कि मैं ध्यान कर रहा हूँ। सब मिलकर अर्थ में लीन हो जाते हैं। यह समझने में तनिक कठिन लगता है क्योंकि हमारी लौकिक समझ ज्ञान के पर्यन्त नहीं जा पाती है। 

एक लौकिक उदाहरण लेते हैं। जब हम कोई फिल्म देख रहे होते हैं तो कभी कभी किसी पात्र के साथ स्वयं को इतना जोड़ लेते हैं कि उसके भाव हमारे भाव हो जाते हैं। यदि वह कष्ट में होता है तो हमें कष्ट होने लगता है, यदि वह हँसता है तो हम हँस देते हैं। यह वही समाधि की स्थिति है, न फिल्म, न अभिनेता, न हाल, न कुर्सी, न यह भान कि फिल्म देखी जा रही है। न अभिनेता का नाम, न उसका अन्य ज्ञान। बस उसका अर्थ, उसका भाव प्रस्फुट हो जाता है। संभवतः यही आधार रहा होगा जिस पर कश्मीर के उद्भट विद्वान अभिनवगुप्त ने यह सिद्ध किया कि नाट्यशास्त्र में रस की उत्पत्ति चित्त में ही होती है। जिसके कारण रस उत्पन्न होता है, वे बस उद्दीपन मात्र हैं।

तदेवार्थमात्रनिर्भासं स्वरूपशून्यमिव समाधिः॥३.३॥ सूत्र का एक एक शब्द समाधि का वर्णन कर रहा है। तत् एव अर्थ मात्र निर्भासं स्वरूपशून्यम् इव समाधिः। तत् अर्थात ध्यान की स्थिति में, अर्थ मात्र निर्भासं अर्थात केवल अर्थ का भान, स्वरूपशून्यं अर्थात न स्वयं का ज्ञान, न वस्तु के स्वरूप का ज्ञान। कहा जाता है कि ईश्वर सत, चित और आनन्द स्वरूप है। यदि हम ईश्वर के आनन्द स्वरूप पर धारणा करते हैं, किसी चित्र के माध्यम से या अर्चविग्रह पर देशबंध करके। आँख बन्द करके ध्यान में उतर जाते हैं। ध्यान की स्थिति में ईश्वर के आनन्द स्वरूप के बारे में जो भी हमारा ज्ञान है, उसी के विचार स्मृतिवृत्ति के माध्यम से चित्त में आने लगेंगे, कोई अन्य वृत्ति नहीं। ध्यान करते करते जब केवल ईश्वरीय आनन्द शेष रह जाये और कुछ न रहे, तब समाधि होती है। उस आनन्द का प्रत्ययात्मक स्वरूप प्रत्यक्षात्मक स्वरूप में बदल जाये, ध्येय के स्वभाव से सब प्रकाशित हो जाते, वह समाधि है।

शब्द नहीं रहा, ज्ञान भी नहीं रहा, बस अर्थ रहा। मुझे ज्ञान हो रहा है, इस बात का ज्ञान भी न रहा, अर्थ के अतिरिक्त कुछ और न रहा, अर्थ मात्र निर्भास रहा। ध्याता और ध्यान का बोध नहीं रहा। ध्येय में शब्द का और उसके ज्ञान का भी ज्ञान न रहा है, सब अर्थ में लीन हो गया।

कई व्याख्या हैं। परमात्मा के आनन्द स्वरूप का ध्यान, अभी तीनों हैं, परमात्मा, आनन्द स्वरूप और ध्यान। जब केवल आनन्द रह जाता है, कुछ और नहीं, तो समाधि है। गवेषणा की दृष्टि से देखें, तो समाधि में खोज समाप्त हो जाती है। ध्यान में गवेषणा चलती रहती है, मन में उसके चित्र बनते रहते हैं, प्रत्ययात्मकता बनी रहती है, यह ऐसा होगा, वैसा होगा, यह आकार होगा इत्यादि। जब वह वस्तु प्रत्यक्ष मिल जाती है तो गवेषणा समाप्त हो गयी, यह स्वरूपशून्य की परिभाषा है। स्वरूपशून्य की दो और परिभाषा भी हैं, ध्याता के स्वरूप से शून्य और ध्यान के स्वरूप से शून्य। व्यास किन्तु प्रत्ययात्मक स्वरूप से शून्य होने की बात करते हैं। क्या था, कैसा था, उन सबसे शून्य हो जाना। जब वस्तु आ जायेगी, प्रत्यक्ष हो जायेगा, तब समाधि है। ध्येय स्वभाव आवेश को समाधि कहते हैं। समाधि पिछले ७ अंगों का प्रतिफल है।

धारणा, ध्यान और समाधि की यात्रा को यदि समग्र रूप से देखें तो यह एक प्रत्यक्ष से प्रत्यक्ष की यात्रा है। धारणा में जो प्रत्यक्ष था वह अन्य वृत्तियों, अन्य प्रत्ययों से आच्छादित था। जब ध्यान के द्वारा अन्य वृत्तियों को हटाया और उसी के बारे में ज्ञानवृत्तियों को समेटा तो शेष सब आच्छादन हट कर वस्तु का परिपूर्ण प्रत्यक्ष हुआ, यह समाधि की स्थिति है।

समाधि की अनुभूतित इस परिभाषा को जानने से, वस्तुओं और उनके ज्ञान के बारे में कुछ तथ्य स्पष्ट हो जाते हैं। पहला यह कि सारा घटनाक्रम चित्त में हो रहा है और समाधि आने पर अर्थ चित्त में ही प्रस्फुटित होता है। हम इन्द्रियों से वस्तु का प्रत्यक्ष अवश्य करते हैं पर उसकी संरचना और स्वरूप चित्त में ही बनता है। रस आदि भी चित्त में ही उदित होते हैं। देखा जाये तो एक पूरा का पूरा वही संसार बसता है चित्त में भी। यत्मुण्डे तत्ब्रह्माण्डे, इस पर व्याख्या फिर कभी। जो हम जानते नहीं, वह हमारे लिये हैं भी नहीं। उसी वस्तु को बाहर देखने से उसको उन सबसे जोड़कर देखते हैं जो कि उससे मुख्यतः असम्बद्ध हैं। उन्हीं वस्तुओं को धारणा, ध्यान और समाधि के माध्यम से देखते हैं तो वह दर्शन सम्यक परिप्रक्ष्य में होता है, संबंध अर्थपूर्ण होता है, सही दृष्टा के परिप्रेक्ष्य में होता है।

दूसरा तथ्य यह कि जानने की सीमा से भी आगे है, होने की सीमा। ज्ञान से विज्ञान की यात्रा। विषय में समाधिस्थ होकर इतना उतर जाते हैं कि उस समय केवल अर्थ रहता है, केवल विषय रहता है, केवल वस्तु रहती है, ज्ञान की इससे परे भला और क्या सीमा होगी?

तीसरा तथ्य यह कि समाधि अन्त नहीं वरन प्रत्यक्ष का प्रारम्भ है, ज्ञान का प्रारम्भ है। समझने की ऐसी प्रक्रिया है जो सघन है, सान्ध्रित है, सम्पूर्ण है। इस प्रक्रिया से स्थूल, सूक्ष्म, आत्म आदि विषयों का परिचय होता है, प्रज्ञा आती है, ज्ञान से समझ और भी प्रकाशित हो जाती है, अस्पष्टता से स्पष्टता आ जाती है। अन्त में जब प्रत्ययात्मकता की परिपक्वता आती है, कुछ और जानना शेष नहीं रहता है, तब परवैराग्य के आने पर ऋतम्भरा प्रज्ञा आती है, सत्य को प्रभासित करने वाली प्रज्ञा।

सही ज्ञान का प्रस्फुटन हमें सही कर्म करने को प्रेरित करता है। योगः कर्मषु कौशलम्। जो अधिक जानता है वह अधिक कुशल भी है।


अगले ब्लाग में संयम की प्रक्रिया।

2.11.19

अभ्यास और वैराग्य - २२

ध्यान धारणा से आगे की स्थिति है। जिस स्थान पर धारणा लगायी, उस स्थान पर प्रत्यय (ज्ञानवृत्ति) की एकतानता ध्यान है। विषय कुछ भी हो सकता है। जहाँ विभूतियों या सिद्धियों की चर्चा की गयी है, वहाँ पर स्थूल से लेकर सूक्ष्म विषय लिये गये हैं। प्रश्न उठ सकता है कि कौन सा विषय लेना है और कब लेना है? या कहें कि हम योग में कितना बढ़ पाये हैं यह कौन निर्धारित करेगा? क्या कोई अन्तःस्थल की यात्रा में हमारा मार्गदर्शन करेगा?

यद्यपि सिद्धियाँ अपने आप में योगसाधना का फल हैं, पर पतंजलि उन पर रुकने और भोग करने के बारे में आगाह करते हैं। अन्तिम उद्देश्य सारी चित्त वृत्तियों का निरोध है। जब तक वहाँ नहीं पहुँचा जाता है, कहीं पर भी रुक जाना बाधा हो सकता है। सिद्धियों का उपयोग तब दो बातों के लिये किया जाता है। पहला सामर्थ्य और अभ्यास के रूप में जो हमें आगे बढ़ने को प्रेरित करती है और सहायक भी है। दूसरा यह एक चिन्ह भी है कि हमारी साधना अब कहाँ तक पहुँची है? योग के बारे में व्यास ने दो तथ्य स्पष्ट कर दिये हैं। पहला है, योगेन योगो ज्ञातव्यो योगो योगात्प्रवर्तते। यह बहुत ही प्रभावशाली वक्तव्य है। योग के द्वारा योग को जाना जाता है, योग से ही योग बढ़ता है। दूसरा तथ्य यह कि योग के प्रति जो अप्रमत्त है वही योग में अधिक रमता है। जो भटकता नहीं है, मदमत नहीं होता है, वही देर तक योग में रहता है। आगे कहाँ जाना है, योग ही स्वयं आपको बता देगा, सहज ही ज्ञान हो जायेगा। एक बिन्दु तक पहुँचने के बाद योग ही आपका पथप्रदर्शक भी है और योग ही पथरक्षक भी।

तत्र प्रत्ययैकतानता ध्यानम्॥३.२॥ धारणा के विषय पर प्रत्यय (ज्ञानवृत्ति) और एकतानता ही ध्यान है। धारणा में प्रत्यक्ष रूप से चित्त का किसी विषय पर देश बंध किया था, ध्यान में उस विषय पर ज्ञानवृत्ति की एकतानता होती है। उस पर चिन्तन, उसी प्रकार के विचारों द्वारा, सदृश प्रवाह। वृत्ति के रूप में जहाँ धारणा में प्रत्यक्ष था, ध्यान में स्मृति प्रधान हो जाती है। विषय के गुण, धर्म आदि के बारे में वृत्तियाँ बनती रहती हैं, अन्य किसी विषय से अपरामृष्ट, अछूती। उस समय मात्र तीन रहते हैं, ध्येय, ध्याता और ध्यान। ध्याता के ध्यान में ध्येय की कल्पना की जाती है, स्मृति का सहारा लिया जाता है, उपस्थित ज्ञान को प्रयुक्त किया जाता है, उस पर ही रमा जाता है। ध्यान करने के लिये स्थानविशेष की आवश्यकता नहीं पड़ती है। 

ध्यान की प्रक्रिया का उद्देश्य क्या है? ज्ञान, एकाग्रता, एकतानता? एक विषय पर ही जो जानते हैं, ध्यान करने से वह ज्ञान बढ़े न बढ़े पर ज्ञान स्पष्ट अवश्य हो जायेगा। उसके साथ उपस्थित अन्य ज्ञान छट जाने से वह पैना अवश्य हो जायेगा। अन्य वृत्तियों को न आने देने से एकाग्रता बढ़ेगी और एकतानता होने से उसी विषय से संबंधित और वृत्तियाँ उपजेंगी। जो प्रत्यय इस प्रकार होगा, वह प्रभाषित व पूर्ण होगा। जो ज्ञान होगा उससे वह विषय प्रकाशित होगा, स्पष्ट दिखेगा। कहते हैं कि किसी भी विषय के बारे में दृश्य का निर्माण चित्त में ही होता है। हम आँखों से देखते अवश्य हैं, पर चित्र चित्त में ही बनता है। गंध, रस, स्पर्श, शब्द आदि सब के सब चित्त में ही संग्रहित और प्रकट होते हैं। नींबू देखकर स्वयं ही लार कैसे निकल आती है? रूप का विषय तो रस से सर्वथा भिन्न है तो दोनों में संबंध कैसा? यह चित्त के द्वारा ही होता है। समाधि के वर्णन में इस तथ्य को तनिक और समझेंगे। 

योग से हमारी सामर्थ्य बढ़ती है। पर यह सामर्थ्य कितनी बढ़ती है, यह कैसे ज्ञात होगा? योगी सामान्य रूप से अपनी सिद्धियों के बारे में बताता नहीं है, पर कहीं न कहीं से इस बारे ज्ञात हो ही जाता है। इस प्रकरण को हमें शब्द प्रमाण के रूप में लेना होता है, स्वयं के द्वारा सिद्ध करने तक, तब यह प्रत्यक्ष हो जाता है। सत्यार्थ प्रकाश में कहा गया है, जितना सामर्थ्य बढ़ना उचित है, उतना ही बढ़ता है। कहने का तात्पर्य है कि अनुचित नहीं बढ़ता है, मुक्ति प्राप्ति के लिये जितना आवश्यक है। पतंजलि इसे विघ्न भी मानते हैं। यहाँ पर जो रुक जाता है और उसका उपभोग या दुरुपयोग करने लगता है, वह पतित हो जाता है, तो एक सीमा के पार वैसे भी जा नहीं पाता है। जो इसे बस साधन मात्र मानते हैं और समाधि ही जिनका अन्तिम आश्रय है, वे इस पर रुकते ही नहीं हैं, उनके लिये भी इसकी सीमा लाँघने का भी प्रश्न ही नहीं है। मुक्ति के लिये जितनी सामर्थ्य आवश्यक है, उससे अधिक पाने की आवश्यकता ही नहीं।

सांख्य दर्शन में कहा गया है, ध्यानम् निर्विषयम् मनः, ध्यान मन का निर्विषय होना है। एकतानता होने पर विषय एक ही रहेगा, अन्य नहीं। एक विषय ही होगा, क्योंकि कम से कम एक तो रहेगा ही। दूसरी व्याख्या यह हो सकती है कि सांख्य के संदर्भ में ध्यान को अन्तिम स्थिति मानी है, उसमें समाधि से संग लिया है। सांख्य में ही कहा गया है, रागोः उपहत ध्यानम्, राग का उपहत होना ध्यान है। महर्षि दयानन्द कहते हैं कि कम से कम एक घंटा ध्यान में बैठे। ध्यान और उपासना में अन्तर है, उपासना ईश्वर का ध्यान है। यदि कोई आत्म का ध्यान करता है तो वह उपासना नहीं होगी यद्यपि एकाग्रता और एकतानता दोनों में ही रहेगी। मनु कहते हैं, ध्यानयोगेन सम्पश्येत गतिम् अस्यांतरात्मा - ध्यान के द्वारा अन्तरात्मा की गति को देखें। अन्तरात्मा या परमात्मा, दोनों ही हो सकता है, एक में ध्यान, दूसरे में उपासना।

एकाग्रता तो प्राणायाम से ही प्रारम्भ हो जाती है। प्राणायाम, धारणा, ध्यान, समाधि में कालखण्ड का निर्धारण किया गया है, गणितीय ढंग से, कि कम से कम कितनी देर उसे करना चाहिये। निमेष-उन्मेष (पलक झपकाने) को एक मात्रा कहते हैं, इसका कालखण्ड लगभग ८/४५ सेकण्ड का होता है। पूरक(श्वास लेना), कुम्भक(श्वास रोकना) और रेचक(श्वास छोड़ना) में १,४ और २ का अनुपात होता है। १६ मात्रा पूरक, ६४ मात्रा कुम्भक और ३२ मात्रा रेचक, कुल लगभग २० सेकण्ड। २० सेकण्ड का एक प्राणायामकाल, १२ प्राणायामकाल का एक धारणाकाल, १२ धारणाकाल का एक ध्यानकाल और १२ ध्यानकाल का एक समाधिकाल। इसे यदि मिनटों में बदलें तो ४ मिनट का धारणाकाल, ४८ मिनट का ध्यानकाल औऱ ९.६ घंटे का समाधिकाल। यह न्यूनतम है।

अब ध्यान अंधकार में करें कि प्रकाश में? ध्यान भंग न हो, इसलिये अंधकार का सहारा ले सकते हैं। क्या अंधकार को विषय बनाकर ध्यान किया जा सकता है? उत्तर नकारात्मक है। ध्यान में वस्तु के गुण धर्म के बारे में चिन्तन होता है। शून्य पर, अंधकार पर ध्यान करना या कुछ भी विचार नहीं करना ध्यान नहीं है, कम से कम योगदर्शन का ध्यान नहीं है। यह एक सकारात्मक प्रक्रिया है। स्थूल और सूक्ष्म विषयों के अतिरिक्त भावनात्मक विषयों में भी संयम लगता है। विभूतियों के वर्णन में देखेगे कि चार भावनायें, मैत्री, करुणा, मुदिता और उपेक्षा में भी पहले तीन में ही संयम लगता है। उपेक्षा में संयम नहीं लगता है, वह तम है, अंधकार है, अभाव है। ध्यान का निष्कर्ष प्रत्यय है और जिस पर ज्ञान नहीं, जिससे ध्यान के निष्कर्ष न निकलें, वह भला कैसा ध्यान? समाधि में अर्थ पाने के लिये ध्यान में सकारात्मकता आवश्यक है।

अगले ब्लाग में समाधि।

29.10.19

अभ्यास और वैराग्य - २१

बहिरंग अंतरंग का आधार है। प्रत्याहार बहिरंग की परिधि है। यह मन की सामान्य स्थिति हो जाती है, जहाँ पर भी मन गया, वहाँ से लौट कर वापस आ जाता है। देखा जाये तो एकाग्रता की स्थिति प्राणायाम से ही प्रारम्भ हो जाती है। यम, नियम व आसन के माध्यम से शरीर में और प्राणायाम व प्रत्याहार के माध्यम से मन में एक लयता सी आने लगती है। धारणा, ध्यान और समाधि किस तरह से एक दूसरे से भिन्न हैं और किस तरह से एक है?

धारणा, ध्यान और समाधि को संयम के नाम से भी जाना जाता है। यह एक पारिभाषिक शब्द है और इसका लौकिक शब्द संयम से संबंध नहीं है। प्रारम्भ की स्थिति में धारणा की मात्रा अधिक रहती है, पर अभ्यास होते होते, धारणा से चलकर ध्यान की स्थिति आती है और कब ध्यान से समाधिस्थ हो जाते हैं, यह ज्ञात नहीं रहता है। 

देश में बंध होना ही चित्त की धारणा है। चित्त को एक स्थान (देश) पर स्थिर करने का स्थूल साधन है धारणा। शरीर का कोई भी स्थान लिया जा सकता है। नाभिचक्र, हृदयपुंडरीक, मूर्द्धज्योति, नासिकाग्र, जिह्वाग्र आदि देश पर चित्त का बंध होना या वाह्य विषय में चित्त का वृत्तिमात्र के द्वारा बंध होना। बाहर के शब्दादि या मूर्तिादि वाह्य देश हैं। जहाँ पर चित्त बन्ध है, बस उसी की वृत्ति और प्रत्याहार के माध्यम से इन्द्रियसमूहों का अपने विषय न ग्रहण करना। प्रत्याहारमूलक धारणा ही समाधि की अंगभूत धारणा है। यह प्राणायाम के समय की साँसों पर की गयी एकाग्रता से भिन्न भी है और परिष्कृत भी।

धारणाओं में षटचक्र, ज्योति, मूर्ति या नाद की धारणायें प्रमुख हैं। चित्त उसी पर स्थापित कर दिया जाता है और जैसे ही चित्त की कहीं और वृत्ति होती है, चित्त स्वयं को पुनः वहीं स्थिर कर देता है। प्रारम्भ में यह यह अत्यन्त न्यून अन्तराल में टूटता है, पर धीरे धीरे अभ्यास से धारणा का समय बढ़ाया जा सकता है। किसी दिये की जलती लौ पर धारणा की जा सकती है, अर्चविग्रह पर की जा सकती है, ओंकार पर की जा सकती है, किसी मन्त्र पर की जा सकती है। उद्देश्य एक ही है कि चित्त को बारम्बार वहीं पर ले आना, कहीं भी भटके, सप्रयास वहीं पर ले आना।

शरीर के अंगों पर धारणा करने से एक संवेदना की अनुभूति होती है। यह अनुभूति परिचायक है कि धारणा कार्यशील है। कभी हृदयस्थल पर करने से हृदयगति बढ़ने लगे और असहज सा लगे तो उसे वहीं छोड़ देना चाहिये, कहीं और धारणा लगानी चाहिये। यदि नहीं समझ आये कि कहाँ करना उचित होगा तो परीक्षण कर लें, जहाँ एकाग्रता सिद्ध हो, वहीं पर धारणा का अभ्यास प्रारम्भ कर दें। त्राटक क्रिया धारणा ही है, मैंने स्वयं एक साधक को त्राटक के द्वारा चम्मच को टेढ़ा करते देखा है। योग के विषय में यह चमत्कार उतने महत्वपूर्ण नहीं हैं, धारणा का प्रयोजन ध्यान को साधना है, पर एकाग्रता और स्वास्थ्य की दृष्टि से धारणा फिर भी फलमयी है। धारणा प्रत्यक्ष करनी होती है, इसमें चिन्तन नहीं होता है, ज्ञानात्मकता का इसमें अभाव रहना चाहिये, आँख बन्द कर चिन्तन नहीं करना है इसमें। शरीर के जिस अंग पर धारणा कर रहे हैं, उस पर संवेदना बनी रहनी चाहिये। चिन्तन प्रारम्भ होते ही वह ध्यान का प्रारम्भ हो जाता है। धारणा तो बस एक ही वृत्ति है, बार बार, उसी देश पर, एक बिन्दु पर, स्थिर सी, पुनरपि, सतत, यथासंभव।

जहाँ एक ओर ज्योति, षटचक्र, मूर्ति आदि एक बिन्दु या देश में स्थित हैं, नाद एक देश में स्थित हुआ नहीं लगता है। तो चित्त कहाँ धारण करें? चिंनाद, शंखनाद, घंटानाद आदि नाद केन्द्रित होते होते शरीर में किसी एक बिन्दु विशेष में गूँजते हैं। वही बिन्दु देश बंध हो जाता है। 

धारणा के विषय में पूरा चक्र सिद्धान्त प्रचलित है। साधक अनुभव से बतलाते हैं कि भिन्न चक्रों पर धारणा करने से शरीर पर भिन्न प्रभाव पड़ता है, विशेष भाव उमड़ते हैं। कहते हैं कि यथासंभव अपने स्वभाव के अनुसार ऊपर के चक्रों पर धारणा करें, नीचे के चक्रों पर धारणा करने से लोभ, मोह आदि के रूप में छिपे संस्कार भड़क सकते हैं। मूलाधार से प्रारम्भ कर सुषुम्ना तक कुंडलिनी नामक धारा की धारणा से एक एक चक्र ऊपर उठना होता है। आश्चर्य ही है कि वृत्तिमात्र से चित्त स्थिर करने भर से शारीरिक और मानसिक परिवर्तन प्रस्फुटित होने लगते हैं। एक एक भाव से ऊपर उठते हुये चित्त की ऊपरी स्थिति पर पहुँचने का विज्ञान है यह।

धारणा चित्त का वृत्तिमात्र के द्वारा बन्ध है, बार बार वृत्ति उसी पर हो, चित्त वहीं पर लगे। धारणा को विस्तृत रूप से और पृथक रूप से समझना इसलिये आवश्यक है क्योंकि बहुधा इसे ध्यान और समाधि से अन्तर्मिश्रित करके जोड़ा जाता है और सबको ही ध्यान कह दिया जाता है। यह प्रक्रिया सिद्ध होना ध्यान में उतरने में अत्यन्त सहायक है। प्रक्रिया के रूप में, प्रभाव के रूप में और क्रमिक विकास के रूप में धारणा, ध्यान और समाधि भिन्न हैं, उन्हें यथास्थान व्याख्यायित किया जायेगा।

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