नर-नारी की मान-प्रतिष्ठा, पाने नित अधिकार लड़ रही,
नवल, पुरातन पीढ़ी, पृथक विचार, पृथक व्यवहार लड़ रही,
भाषा लड़ती, वर्ण लड़ रहे, वर्ग विषमता द्वार चढ़ रही,
देश, प्रदेश, विशेष लड़ रहे, शेषतृषा आकार गढ़ रही ।
धर्म लड़े, बन हठी खड़े हैं, उस पर भी अब जाति लड़ी है,
सकल छोड़ कर, विकल होड़ पर, उपश्रेष्ठों की पाँति लड़ी है,
सबके बल पर, सबकी बलि पर, बढ़ जाने की ख्याति लड़ी है,
विविध विधा से विधिवत, सज्जित, लोलुपता हर भाँति लड़ी है ।
समय, ऊर्जा, सम्बन्धों का क्षय होना, हा असह्य अहा,
सुख की चाह अभीप्सित हो पर, दुख का दर्पित दंश सहा,
स्वर होने थे एक प्रबलतम, कटुकर, कर्कश राग कहा,
किस समाज का रक्त, त्यक्त हो, मूल्यहीन बस व्यर्थ बहा।
एक रखा सदियों जिसने, वह सूत्र बढ़ाने को लड़ते,
गुणसूत्रों की प्रखर विरासत और चढ़ाने को लड़ते,
अडिग रहे पुरखे जो उनको, मान दिलाने को लड़ते,
पाला पोसा है, उस माँ का, श्रृंगार बचाने को लड़ते।
यदि हो समर्थ कुछ और तनिक, तो मन से आकर लोभ लड़े,
जो पूर्ण प्रतिज्ञा हो न सकीं, उसका विष व्यापित क्षोभ लड़े,
अपनों पर उमड़ा क्रोध लड़े और अहंकार का बोध लड़े,
अपनों से दूर करा बैठा, उस मद का मोहक मोद लड़े ।
यदि एक पंक्ति में खड़े रहे, तब शक्ति प्रबल पहचानोगे,
यदि निकटस्थों के हस्त गहे, सामर्थ्य असीमित जानोगे,
यदि कोटि कंठ स्वर एक कहें, घन गगन गहन गहरा दोगे,
यदि साथ रहे और साथ चले, बल प्रबल, लहर लहरा दोगे।
नहीं छिटकन और विघटन, नहीं अब कुछ और क्षति हो,
एक धड़कन, एक जीवन, बन चले सम्मिलित प्रगति हो,
गर्व, बल अग्रज सहित सब, प्रेम, करुणा अनुज प्रति हो,
बस यही आग्रह सभी से, एक गति हो, एक मति हो।