23.4.14

मेरी कविता

मेरी कविता है आज दुखी,
शायद मेरी ही गलती है ।
कुछ है स्वभाव भी रूखा सा,
कुछ रागें क्षुब्ध मचलती हैं ।।

मैं कृतघ्न हूँ, सुख की मदिरा,
खुद ही पीकर मस्त हो गया ।
सुख-यात्रा में छोड़ तुझे,
तेरे संग केवल दुख बाँटे हैं ।।

असह्य वेदना के घावों ने,
आश्रय तुझसे ही पाया है ।
मेरी एक सिसकी ने तेरा,
ढेरों अश्रु बहाया है ।
पर तूने जाने कितने सावन एकाकी ही काटे हैं ।
मैं कृतघ्न हूँ, जीवन में तेरे संग केवल दुख बाँटे हैं ।।१।।

गोद तुम्हारी मेरे सर की,
चिन्ता सब हर लेती है ।
तेरे वक्षस्थल की धड़कन,
प्रबल सान्त्वना देती है ।
पंथों के दिग्भ्रम में तेरे ही शब्द मुझे थपकाते हैं ।
ना जाने क्यों, जीवन में तेरे संग केवल दुख बाँटे हैं ।।२।।

अब लगता तेरे संग बैठूँ,
मैं बचे हुये सब दिन काटूँ ।
तेरे मधुवन में आकर के,
मिलजुल कर सारे सुख बाटूँ ।
बस तेरे दूर चले जाने के, कल्पित भाव सताते हैं ।
करना प्रायश्चित क्योंकि तेरे संग केवल दुख बाँटे हैं ।।३।।

(बहुत दिन हुये, लेखन से विशेषकर कविता से दूर हूँ, पूर्वव्यक्त भय मन में उभर आया)

19.4.14

जीवनी अलमस्त हो

मगन हो अपने विचारों के किनारों में,
जीवनी अलमस्त हो चुपचाप बहती जा रही थी ।
कहीं पर गाम्भीर्य की गहराइयों का,
और उत्श्रंखल विनोदों का कहीं मिश्रण बनी थी ।
कहीं पर हो संकुचित व्यवधान से,
और समतल में कहीं विस्तार की जननी बनी थी ।
वक्रता के थे किनारे इस जगत में,
काटती रहती उन्हें, उस वक्रता से रहित करती ।
मार्ग के सब अनुभवों का रस समेटे,
हो बड़ी निश्चिन्त वह जीवन समर में जा रही थी ।

किन्तु तब नियमित कलापों से व्यथित हो,
मनदशा रसहीनता को अग्रसर थी ।
इस असत भू के हृदय में सत्य क्या है,
मनस सागर में दबी इच्छा प्रबल थी ।।

व्यक्ति का जीवन विरह है,
इस विरह का सत्य क्या है ?
सतत मानव से विलग उस,
तत्व का अस्तित्व क्या है ?
शान्त सब जीवन बिताते,
किन्तु उसमें सत्व क्या है ?
अन्ध जीवन की दशा पर,
सत्य का वक्तव्य क्या है ?

ज्ञान की हैं कठिन राहें,
तर्क के कंकड़ बिछे हैं,
पथ प्रदर्शक भी नहीं है,
सत्य-चिन्तन चिर असम्भव ।

इन विचारों के प्रचण्डित धुन्ध में,
जीवनी भी पन्थ अपना खो रही है ।
बहु-प्रतीक्षित सत्य भी यदि सरल न हो,
तो मुझे उस सत्य की इच्छा नहीं है ।।

जीवनी अलमस्त हो चुपचाप बहना चाहती है ।
चित्र साभार - freehdw.com

16.4.14

मध्यमार्गी पथ असाध्य है

आदर्शों के मरुथल में, जीवन कष्टों का छोर नहीं है,
भ्रष्टाचारी दलदल में आ बचा सके, कोई जोर नहीं है ।
इन दो विषम उपायों से जीवन-रजनी में भोर नहीं है,
मध्यमार्गी पथ असाध्य है, अनुभव-युक्त किशोर नहीं है ।।

अन्तः दीपक जला हुआ है,
राग द्वेष से घिरा हुआ है,
मानव क्या निष्कर्ष निकाले, नियत बुद्धि का ठौर नहीं है ।
मध्यमार्गी पथ असाध्य है, अनुभव-युक्त किशोर नहीं है ।।१।।

संस्कार की सतोपासना,
औ’ समाज की कुटिल वासना,
स्वयं निरन्तर संग्रामित, जीवन निश्चय की ओर नहीं है ।
मध्यमार्गी पथ असाध्य है, अनुभव-युक्त किशोर नहीं है ।।२।।

आदर्शों का ध्येय मिला है,
आत्मोन्नति का पंथ खुला है,
पर समाज में जीवन यह, कटु सम्बन्धों की डोर नहीं है ।
मध्यमार्गी पथ असाध्य है, अनुभव-युक्त किशोर नहीं है ।।३।।

(एक किशोर के रूप में लिखी यह कविता आज पुनः याद आ गयी, पता नहीं क्यों?)

12.4.14

लोकपथ

अनवरत सुख की पिपासा,
प्रकृति में उन्मुक्तता है ।
शान्ति को मन ढूढ़ता है,
प्रेम को मन मचलता है ।।

है विडम्बना मनुज की पर,
विचारों के समन्वय सुर,
क्यों नही मिल पा रहे हैं ?
स्वार्थरत हो चीखते हैं,
मदित होकर मनुज सारे,
बेसुरे हो गा रहे हैं ।

जीतने की कोशिशों में,
दास होते जा रहे हैं ।
कहाँ प्रभुता पा रहे है ?
तथ्यभेदी प्रचुरता है,
जागरण के आवरण में,
अन्त्य सोते जा रहे हैं ।

आगामी आशा भरमाती,
शंका शंकित होती जाती,
लोग किस पथ जा रहे हैं,
लोकपथ क्या आ रहे हैं?

9.4.14

आभार बंगलुरू

पहली बार जब १९९३ में बंगलुरू आया था तो मन अभिभूत हो गया था, हर ओर हरा भरा, हर ओर पेड़ ही पेड़। सुदृढ़ नगरीय बससेवा होने पर भी मित्रों के साथ प्रतिदिन ६-७ किमी का स्वच्छंद पैदल चलना हो ही जाता था। अच्छा लगता था, बतियाना, गपियाना और गहरी साँसों में प्रकृति की सोंधी गंध को भर लेना। उस समय यह सेवानिवृत लोगों का प्रतिष्ठित आधार बन चुका था, पर आईटी के उत्थानपथ पर अपनी शैशवास्था में था। वह प्रवास भले ही ६ माह का रहा हो पर मन में बंगलुरु के प्रति एक विशिष्ट आकर्षण बना रहा। १६ वर्ष बाद जब रेलवे ने यहाँ मुझे अपनी सेवायें देने का अवसर दिया तो मन ही मन ईश्वर को मन की अतृप्त इच्छाओं को मान देने के लिये धन्यवाद दिया और सपरिवार यहाँ रहने आ गया। पता ही नहीं चला कि ५ वर्ष कब निकल गये और आज, जब यहाँ से विदा लेने का समय आ रहा है तो मन यहाँ बिताये समय का मूल्यांकन करने में लगा हुआ है। 

सोचा नहीं था कि यह नगर मन में इतना बस जायेगा। हर नगर का एक व्यक्तित्व होता है, वहाँ रहना उससे नित व्यवहार करने सा है। उस नगरीय व्यक्तित्व के विकास में हम अपना कुछ योगदान दे पायें, न दे पायें, पर उस नगर का प्रभाव हमारे व्यक्तित्व पर व्यापक होता है। उस नगर में रहना उस प्रभाव को जीवन में अंगीकृत करने सा है, कुछ अस्थायी सा, कुछ स्थायी सा। यह तो समय ही बतायेगा कि आगामी नगर अपना स्थान बनाते समय बंगलुरू के कितने तत्वों को विस्थापित कर देगा, पर यहाँ से जाते समय अपनी तुलना अपने ही पाँच वर्ष पहले के व्यक्तित्व से करता हूँ तो अन्तर स्पष्ट दिखता है। कई अन्य कारक भी रहे होंगे इस अन्तर के, पर उसमें बंगलुरू का भाग अधिकतम है।

शरीर जो झेलता है, मन भी वैसा बनने लगता है। यही कारण है कि किसी स्थान की जलवायु व्यक्तित्व का बाहरी आकार भी गढ़ती है और व्यवहार की मानसिकता भी। बंगलुरू का तापमान सम है, पर्याप्त वर्षा भी होती है यहाँ। आप आश्चर्य करेंगे कि पिछले पाँच वर्षों में मैंने एक बार भी मुझे स्वेटर नहीं पहना है, सुबह की हवाओं से बचने के लिये अधिकतम ट्रैकसूट का अपर। लोग कहते हैं कि सम तापमान शरीर की प्रतिरोधक क्षमता कम करता है और वातावरण में जीवाणुओं को पनपने में सहायता करता है। पूर्ववर्ती स्थानों के विषम तापमानों से तपे और सिकुड़े शरीर की सहनशीलता का प्रताप था या सौभाग्य कि शरीर ने कोई विशेष कष्ट नहीं दिया यहाँ पर। आगे शरीर का क्या होगा, यह तो भविष्य ही बतायेगा, पर इस सम तापमान ने मन पर एक विशेष प्रभाव डाला है। मन कहीं अधिक संतुलित और सम हो गया, क्रोध कम हो गया। अब दृष्टिगत असहजता विकार नहीं लाती है अपितु समाधान ढूढ़ने में तत्पर हो जाती है।समत्वता आच्छादित है, स्थितिप्रज्ञता की छिटकी सुगन्ध दे गया बंगलुरू। 

अट्टालिकाओं से शोभित बंगलुरू
२० वर्ष पहले के बंगलुरू में इतना यातायात नहीं था। बंगलुरू कभी भी राजधानी के रूप में योजना बनाकर बसाया नहीं गया। सेवानिवृत्ति के बाद मानव जीवन को जो आवश्यक होता है, वे सारे अनिवार्य तत्व उपस्थित थे यहाँ। कहते हैं कि पुष्प का सौन्दर्य मधुमक्खी को आकर्षित करता है और उस आकर्षण से ही उसके मधु का शोषण भी होता है। अच्छी सम जलवायु और हरा भरा वातावरण, यहाँ की जनसंख्या बढ़ने के कारक सदा से थे, पर आईटी ने उस प्रक्रिया को तीव्रतम कर दिया। जो बढ़ोत्तरी आधी शताब्दी में होनी थी, वह दो दशकों में ही हो गयी। वाहनों की अधिकाधिक संख्या और सड़कों की सीमित चौड़ाई, पहले तो यहाँ के पेड़ों को लील गयी और फिर यहाँ का यातायात बाधित करने लगी। वाहनों की गति पैदल के समकक्ष हो गयी, साथ ही वाहनों की अधिकता पैदल यात्रियों की संरक्षा को भयग्रस्त कर बैठी। बाधित यातायात ने औरों की तरह मुझे भी दो गुण सिखाये, धैर्य और अनुशासन। धैर्य इसलिये कि झल्लाने से वाहन उड़ने नहीं लगेगा, अनुशासन इसलिये कि वह तोड़ने से आर्थिक दण्ड और लम्बे जाम। पाँच वर्षों में तो विश्चय ही कुछ माह ट्रैफिक सिग्नल पर बिताये हैं मैंने, पर इन दो गुणों की महत्ता समझने के लिये वह तर्पण भी स्वीकार है जीवन को।

अच्छी राजधानी बनने के जीतोड़ प्रयास में यह नगर अपनी मौलिकता खो बैठा है। एक स्वच्छंदता का भाव जो दो दशक पहले यहाँ की सोंधी हवा में मुझे मिला था, उसका स्थान कॉन्क्रीट मिश्रित गुरुत्व और रूक्षता ने ले लिया है। ठीक वैसा ही कुछ परिवर्तन मेरे व्यवहार में भी हुआ। बचपन की स्वच्छंदता और युवावस्था की ऊर्जा के स्थान पर व्यवहार में गृहस्वामी और बड़े अधिकारी का गांभीर्य आ गया। मुझे जब भी स्मृतियों का बंगलुरू ढूढ़ना होता था तो किसी हरे भरे बड़े पेड़ की छाँह निहारने लगता, उसकी छाँह में मुझे मेरा बचपन भी दिख जाता। नित विकास और विस्तार करता बंगलुरू मुझे अपना सा लगता, स्मृतियों से जूझता, फिर भी आगे बढ़ता, सबको स्वयं में समाहित करने के लिये, सागर सा विशाल और खारा।

जब कोई प्यारा नगर होता है तो लोग वहाँ रहना चाहते हैं। लोगों की वहाँ रहने की इच्छा से वह स्थान फलता फूलता है। अन्योन्याश्रयता का यह भाव निवासी और नगर, दोनों के लिये लाभप्रद रहता है, पर यह भाव एक सीमा तक ही वहन किया जा सकता है। यह नगर फला फूला, अर्थव्यवस्था में धन का प्रवाह हुआ, यहाँ के लोगों को काम मिला। संसाधन अधिक होते हैं, तो प्रतियोगिता कम हो जाती है, जीवटता कम हो जाती है। भारत और चीन के विद्यार्थियों का अपने अमेरिकी समकक्षों से अच्छा करने का भाव इसी प्रतियोगिता से, इसी जीवटता से आता है। उत्तर प्रदेश और बिहार के लोगों का प्रतियोगी परीक्षाओं में सब कुछ झोंक देने का भाव इसी जीवटता से आता है। जहाँ पर सरकारी नौकरी के अतिरिक्त कोई और विकल्प नहीं हैं, यदि वहाँ के लोग जीवट नहीं रहेंगे, तो वे कहीं के नहीं रहेंगे। बहुधा आक्षेप लगता है कि यहाँ के लोग अधिक प्रतियोगी नहीं होते हैं और रेलवे व अन्य क्षेत्रों की सरकारी नौकरियों में देश के अन्य भागों से लोग आ जाते हैं। सुविधा और विकास का यह पक्ष विश्व के लिये भला ही नया न हो, पर मेरे लिये इस बात को समझने का अवसर बड़ी निकटता से मिला।

यहाँ पर बाहर के लोग आकर जीविका पाते हैं। आईटी क्षेत्र में आने वाले तीन तरह के लोग होते हैं। पहले वे, जो बंगलोर का उपयोग विदेश जाने के लिये लॉन्चपैड की तरह करते हैं। दूसरे वे, जो तनिक स्थिर होने और पहचान पाने के पश्चात अपने घर के आसपास की कोई नौकरी ढूढ़ते हैं। तीसरे वे, जो यहाँ बस जाते हैं। इसी प्रकार सरकारी नौकरी में यहाँ भर्ती होने वाले लोग भी दो मानसिकताओं में रहते हैं। अपने अधीनस्थ कई कर्मचारियों को देखा है, प्रथम तीन वर्ष तक घर वापस जाने की तड़पन धीरे धीरे यहाँ की सुविधाओं में बस जाने के भाव में बदल जाती है। जो यहाँ बस जाते हैं, उन परिवारों को पास से देखने और उनमें आया बदलाव जानने का अवसर मिला। उनके अनुसार यहाँ की भाषा भर सीख लेने से यहाँ रहने में आनन्द आने लगता है। भाषा नहीं भी सीख पाने से कोई विशेष कठिनाई नहीं होती है, पर रचने बसने के लिये भाषाई ज्ञान आवश्यक है। पूरे देश में संस्कृति एक सी है, केवल स्थानीय भाषा भर जान लेने से आप वहाँ के मूल निवासी जैसे हो जाते हैं। देश की एकता को पुष्ट करने का यह सूत्र आनन्द देने वाला रहा।

बंगलुरू आधुनिक भी है और मँहगा भी। सामान्य उपयोग की वस्तुयें और खाने पीने का सामान बड़ा मँहगा है यहाँ पर। आधुनिकता से दोनों पक्षों से परिचय में बंगलुरू का विशेष महत्व रहा है। तकनीक के क्षेत्र में क्या नया हो रहा है, इसके बारे में जानकारी रखना कठिन नहीं रहा मेरे लिये। यहाँ पर आने के बाद से घर के सारे यन्त्र बदले जा चुके हैं। घर में ही नहीं वरन कार्यक्षेत्र में आईटी संबंधित तकनीक के अनुप्रयोग देश के अन्य क्षेत्रों में भी अनुसरण योग्य समझे गये हैं। यह प्रशासनिक रूप से अत्यधिक संतोष का विषय रहा है मेरे लिये। आधुनिकता के नकारात्मक पक्ष भी हैं। जिस तरह धूप में रहने से उसके प्रति सहनशीलता विकसित हो जाती है, उसी प्रकार आधुनिकता के प्रति भी सहनशीलता विकसित हो गयी है। आधुनिक परिवेश देखकर अब मन भ्रमित नहीं होता है। जहाँ आधुनिकता के सकारात्मक पक्ष के उपयोग का महत्व और क्रियाविधि समझ आ गयी है, वहीं फ़ैशन आदि अन्य नकारात्मक पक्षों को महत्व न देना भी बंगलुरू से ही सीखा है।

संस्कृति की अन्य विधाओं की दृष्टि से बंगलुरू बड़ा ही गतिशील रहा है। यहाँ पर ही संगीत, नाटक, साहित्य और अभिनय के सशक्त हस्ताक्षरों को देखने का अवसर मिला। संस्कृति के इन पक्षों को साक्षात देखना अपने आप में ही एक अनुभव था। ब्लॉग लेखन का शुभारम्भ यहीं आने के साथ हुआ था। यहाँ पर लेखन का समय भी मिला और लेखन योग्य विषय भी। लेखन के लिये यहाँ वर्ष भर उपयुक्त समय रहता है। सम जलवायु में जब शरीर और मन को कष्ट न हो, तो दिन में किसी भी समय लिखा जा सकता है। यदि किसी लेखक को किसी पुस्तक पर कार्य करना हो, बंगलुरू एक उपयुक्त स्थान है। कुछ माह के लिये यहाँ आकर लेखकीय उत्पादकता बढ़ायी जा सकती है।

मेरे लिये ही नहीं, श्रीमतीजी के लिये भी बंगलुरू का प्रवास कूड़ा प्रबन्धन व बाग़वानी के लिये विशेष रहा। यहाँ की जलवायु में पौधों की कई प्रजातियाँ उन्होंने गमलों में लगा रखी थीं, आगामी नगरों में वे गमले इतने हरे भरे नहीं रहेंगे। बच्चों के लिये भी यहाँ के ५ वर्ष अपनों से तनिक भिन्न पारिवारिक पृष्ठभूमि के बच्चों के साथ घुलने मिलने वाले रहे। बच्चे वयस्कों से कहीं अधिक सहजता से घुल मिल जाते हैं। उनके विकास में इस तथ्य का योगदान वृहद रहेगा है। अपने बचपन की तुलना उनसे करता हूँ तो अन्तर सार्थक व स्पष्ट दिखता है।

विस्तार में जाता हूँँ तो अन्तहीन क्रम दिखता है जिनके प्रति अपनी कृतज्ञता ज्ञापित कर सकूँ। अभी बस इतना कह सकता हूँ, आभार बंगलुरू।

चित्र साभार - www.spicejet.com