21.9.19

अभ्यास और वैराग्य - १०

एक प्रश्न उठ सकता है कि योग के आठ अंगों में क्या कोई क्रम है, जिसका पालन करना आवश्यक हो? इसी प्रकार क्या दस यम और नियमों में भी कोई क्रम रखा जाना चाहिये? विश्लेषण के लिये अष्टांगों को तीन उपसमूह में व्यवस्थित किया जा सकता है। प्रथम यम और नियम, द्वितीय आसन, प्राणायाम और प्रत्याहार और तृतीय धारणा, ध्यान और समाधि। तीनों उपसमूह स्वतन्त्र स्तरों पर अभ्यास किये जा सकते हैं। प्रथम का यथासंभव पालन, द्वितीय का नियमित अभ्यास और तृतीय का किंचित प्रयास। बस तृतीय में क्रम तो है पर स्पष्ट रूप से पृथकता नहीं है, धारणा में ध्यान या ध्यान में समाधि कब आ जाती है, पता नहीं चलता है।

प्रारम्भ तो तीनों स्तरों पर करना ही होगा। यदि हम प्रतीक्षा करते रहें कि जब पहला सिद्ध होगा तब ही दूसरा करेंगे और बिना दूसरे के तीसरे के बारे में सोचना ही नहीं है, तब संभवतः हम कभी प्रारम्भ ही न कर पायें। ऐसा भी नहीं है कि हम आसन और प्राणायम से तन और मन पुष्ट करते रहे और यमों और नियमों का निशंक उल्लंघन करते रहें। इससे कोई लाभ नहीं होगा। तीनों एक साथ प्रारम्भ करने होंगे, कालान्तर में ये तीनों एक दूसरे को पुष्ट करते हुये सिद्ध होते जायेंगे।

यम में पहला उपांग है अहिंसा। सब अंगों में यह प्रथम है,  प्रधान है, कठिन है और इसे जीवनपर्यन्त सिद्ध करते रहना होता है। पारिभाषिक और प्रायोगिक स्तर पर अहिंसा को समझने में बहुधा भ्रम की स्थिति हो जाती है। यह विशेष तथ्य अहिंसा को और भी गूढ़ बना देता है। गीता इस विषय में एक ओर संशय उत्पन्न करती है तो निदान भी करती है। संशय यह कि यदि अहिंसा प्रथम सोपान है तो युद्ध क्यों और हिंसा क्यों? निदान यह कि कृष्ण स्वयं यह कहते हैं कि ‘सुख दुखे समे कृत्वा लाभालाभौ जयाजयौ, ततो युद्धाय युजस्व नैवं पापमवाप्यसि। तात्पर्य यह कि हिंसा करने से पाप तो लगता है पर योग की स्थिति में रह कर युद्ध करोगे तो पाप नहीं लगेगा, समेकृत्वा की स्थिति में रह कर युद्ध।

गीता के अतिरिक्त महाभारत जैसे युद्धकाव्य में अन्य स्थानों पर भी अहिंसा को सर्वाधिक वांछित गुण बताया गया है। प्रथमदृष्टया यह विरोधाभास लग सकता है पर व्यास के द्वारा योगसूत्र के भाष्य से निष्कर्ष व्यवस्थित हो जायेंगे। 

अहिंसा परमो धर्मस्तथाहिंसा परो दमः अहिंसा परमं दानमहिंसा परमं तपः 
(अहिंसा परम धर्म है, वही परम आत्मसंयम है, वही परम दान है, और वही परम तप है।)
अहिंसा परमो यज्ञस्तथाहिंसा परं फलम् अहिंसा परमं मित्रमहिंसा परमं सुखम् 
(अहिंसा परम यज्ञ है, अहिंसा ही परम फल है, वह परम मित्र है, और वही परम सुख है)

योगसूत्र(२.३०) में तो पतंजलि ने अहिंसा को एक यम बतला दिया पर उन्होंने अहिंसा की कोई परिभाषा नहीं दी है। पर उसी सूत्र के व्यासभाष्य में अहिंसा को परिभाषित किया गया है। बहुधा यह माना जाता है कि किसी को दुख देना हिंसा है, पर ऐसा नहीं है। यदि ऐसा होता तो चोर को पकड़ना, शत्रु से अपनी रक्षा करना, आततायियों से जनसामान्य को बचाना, यह सब हिंसा के श्रेणी में आ जायेगा। सारे आराध्य, राम, कृष्ण, शिव, हनुमान योग के प्रथम उपांग के उल्लंघन में लिप्त पाये जायेंगे।

व्यास की परिभाषा इस प्रकार है। पूरी तरह से, मनसा वाचा और कर्मणा, हर समय, हर परिस्थतियों में, सबके प्रति अनभिद्रोह का भाव अहिसा है। अनभिद्रोह अर्थात अभिद्रोह न होना। अभिद्रोह - चारों ओर से द्रोह। द्रोह द्रुह धातु से बना है जिसका अर्थ है, घृणा करना, हानि पहुँचाने का अवसर देखना, षड़यन्त्र करना, उपद्रव करना। परदोषदर्शन भी द्रोह है, हिंसा है। इसलिये अहिंसा को केवल दूसरों को दुख न देने की दृष्टि से नहीं देखना चाहिये। अहिंसा का भाव कर्ता के परिप्रेक्ष्य में समझना होगा,  न कि सामने वाले के दृष्टिकोण से। आपने किसी के भले के लिये कुछ सलाह दी, सामने वाले को अच्छा नहीं लगा, तो क्या यह हिंसा हो जायेगी? बच्चों को हम सदैव दृढ़ता से समझाते हैं, उनके भले के लिये ही। यदि किसी दुष्ट ने सज्जन के प्रति दुर्व्यवहार किया और सज्जन ने उसे उदारमना हो सह लिया। इसमें यदि सज्जन को दुख नहीं हुआ तो क्या वह हिंसा नहीं होगी? यदि कोई दुकानदार बड़े प्यार से बात करके अपने ग्राहक छल कर रहा है, तो क्या ग्राहक को दुख नहीं होने के कारण यह हिंसा के श्रेणी में नहीं आयेगा? 

अन्याय को बढ़ावा देना, विपरीत बातों को प्रश्रय देना, ये कालान्तर में समाज का अहित करते हैं, हिंसा बढ़ाते हैं। इनका प्रतिकार तो करना ही होगा। अपनी रक्षा का उपक्रम, अन्याय का प्रतिकार, परित्राणाय साधूनाम, विनाशाय दुष्कृताम् ,इन सबको हिंसा की श्रेणी में नहीं लिया जा सकता है। पर प्रतिकार भी उचित मात्रा में होना चाहिये, सामने वाले को सुधारने के क्रम में। यदि प्रतिकार भी आवश्यकता से अधिक हो गया तो संभवतः वह भी हिंसा की श्रेणी में आ जाये। दूसरी ओर यदि हम अहिंसा को शाब्दिक अर्थों में ही लपेटे रहें, अन्याय होता देखें और मुँह मोड़कर चल दें तो वह भी हिंसा में हमारी सहभागिता होगी। ये दोनों ही अति उचित नहीं है।

इस आधार पर विवेचन कर जिस अहिंसा का पालन हम करते हैं वह अहिंसा आध्यात्मिक दृष्टि से सर्वाधिक महत्वपूर्ण है। अहिंसा को यमनियमादि का आधार बताया गया है। यम नियम अहिंसामूलक है। उनसे अहिंसा और परिशुद्ध होती है। अहिंसा की सिद्धि अन्त में होती है। और जब अहिंसा की सिद्धि होती है तो पतंजलि कहते हैं।

अहिंसाप्रतिष्ठायां तत्सन्निधौ वैरत्यागः(२.३५)(अहिंसा की दृढ़ स्थिति होने पर उस योगी के निकट सब प्राणी वैर का त्याग कर देते हैं।) कथाओं में पढ़ते हैं कि ऋषियों के आश्रमों में सारे मृगों में वैर का अभाव दिखता है। अद्भुत प्रभाव है अहिंसा का, व्यापक सामाजिक, मानसिक और आध्यात्मिक स्थायित्व देती है अहिंसा।

अगले ब्लाग में सत्य की विवेचना और युधिष्ठिर का सत्य।

17.9.19

अभ्यास और वैराग्य - ९

यम और नियम कुल दस गुण हैं। अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह यम कहलाते हैं। शौच, संतोष, तप, स्वाध्याय और ईश्वर प्राणिधान नियम हैं। यम निषेधपरक हैं, नियम विधिपरक। यम में हम अपनी उन प्रवृत्तियों को रोकते हैं जो हमें अस्थिर करती हैं। हम एक स्तर ऊपर उठ जाते हैं, संभवतः इसलिये कि बात आगे न बढ़े, अस्थिरता न बढ़े। नियम में हम उन गुणों को विकसित करते हैं जिससे हमें यम स्थिर रखने हेतु कुछ और मानसिक बल मिलता है। नियम से यम और भी नियमित हो जाते हैं।

मन साधने के लिये यह आवश्यक है कि शरीर सधे, परिवार सधे, समाज सधे। यदि ऐसा नहीं होगा तो मन वहीं लगा रहेगा। यदि समाज स्थिर नहीं रहेगा तो मन कैसे स्थिर रहेगा। इनको साधते साधते पर हम इतना खो जाते हैं कि मन साधने का प्रारम्भिक लक्ष्य भूल जाते हैं, नये पथ में रथ बढ़ा देते हैं। परिवार और समाज संबंधों का विस्तृत आकाश है, उसमें यदि सब मनमानी पर उतर आयेंगे तो अव्यवस्था पसर जायेगी। सुचारु व्यवस्था हेतु न्यूनतम आवश्यकतायें तो हमें माननी ही होंगी। सहजीवन के धर्म मानने होंगे।

धर्म वर्तमान का संभवतः सर्वाधिक शापित शब्द है, कोई इसका अर्थ समझना ही नहीं चाहता। इस शब्द को बहुधा कठघरे में उन शब्दों के साथ खड़ा कर दिया जाता है जिन पर हम अपनी दुर्गति और अवनति के आरोप थोपते आये होते हैं। संस्कृत की धृज् धातु से धर्म शब्द बना है, अर्थ है धारण करना। धार्यते इति धर्मः। जो समाज को धारण करे, आधार दे, स्थिरता दे, आश्रय दे, वह धर्म है। धर्म जोड़ने का कार्य करता है, तोड़ने का नहीं। धर्म की गति न्यायवत है, अन्यायवत नहीं। 

मित्र से बात हो रही थी। धर्म के नाम पर प्रचलित कई कुरीतियाँ, रूढ़ियाँ, और विक्षेपों से वह आहत हो जाते हैं। यह सब होते हुये धर्म को किस प्रकार समझा जाये, स्वीकार किया जाये। क्या माना जाये, क्या न माना जाये। धर्म के विषय में अपना दिशायन्त्र तब क्या हो भला? पशोपेश है कि संस्कृति की धरोहर न छोड़ते बनती है और न ही सहर्ष स्वीकार हो पाती है। 

जब डोर उलझ जाये तो सिरे ढूढ़ने होते हैं। मूल समझने से विकार का आकार और प्रकार सब समझ आ जाता है। क्या धर्म है और क्या नहीं, इस विषय पर सदा मनु द्वारा बताये धर्म के लक्षणों को ही स्मरण करने से भ्रम अवगलित हो जाता है। 

मनु धर्म के दस लक्षण बताते हैं। दशकम् धर्म लक्षणम् - धृति, क्षमा, दम, अस्तेय, शौच, इन्द्रियनिग्रह, धी, विद्या, सत्यम्, और अक्रोध। यदि कोई विचार, कृत्य, व्यक्ति आदि इन लक्षणों के विपरीत वर्ताव करता है तो वह धर्मसम्मत नहीं है। कर्मकाण्ड और पद्धतियाँ धर्म के लिङ्ग या चिन्ह तो हो सकते हैं पर मूल यही दस लक्षण ही होंगे। इससे स्पष्ट कोई और प्रमाण या परीक्षा हो ही नहीं सकती। यही नैतिकता भी है, वह जो आगे ले जाये। ‘नी’ धातु ‘ले जाने’ के अर्थ में आती है, नेता, नायक, नौका आदि।

ध्यान से देखे तो यम और नियम में वर्णित दस गुण और मनु द्वारा नियत धर्म के दस लक्षण लगभग एक ही हैं। अर्थ स्पष्ट है, यम और नियम का पालन सामाजिक, पारिवारिक और मानसिक स्थायित्व देता है। संभवतः योग पथ में बढ़ने के लिये इससे सशक्त आधार और कुछ हो भी नहीं सकता है। 

यम यदि वाह्य साम्य स्थापित करता है तो नियम आन्तरिक साम्य। यम और नियम का क्रम अत्यन्त महत्वपूर्ण है, हम बाहर से अन्दर की ओर बढ़ रहे हैं। आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि से हम और भी अन्दर तक जाते जायेंगे। अन्दर जानना आवश्यक है योग के लिये। जिसको जानना है, उसी के माध्यम से जानना है। मन को जानना है, मन के माध्यम से जानना। योग यही है, कठिन इसीलिये है, समय इसीलिये लगता है, इसीलिये मन की वृत्तियों को रोकना है अन्यथा न मन देख पायेगा और न मन दिख पायेगा। अन्दर देखने से मन की अन्य गति सीमित हो जाती है, तब बस दृष्टा और मन।

अगले ब्लाग में यम और नियम के व्यावहारिक और यौगिक पक्ष।

14.9.19

अभ्यास और वैराग्य - ८

टीकाकारों का मत है कि पतंजलि योगसूत्र में तीन प्रकार के साधन बताये गये हैं। पहला अभ्यास और वैराग्य का, दूसरा क्रियायोग का और तीसरा अष्टांगयोग का। यद्यपि पतंजलि ने साधकों के आधार पर वर्गीकरण नहीं किया है पर तीनों साधनों का उल्लेख क्रमशः किया है, पहले अभ्यास व वैराग्य का(१.१२), फिर क्रियायोग का(२.१) और अन्ततः अष्टांग योग का (२.२९)। ये तीनों साधन क्रमशः विस्तृत होते जाते हैं। अभ्यास और वैराग्य के बाद के सूत्रों में केवल सम्प्रज्ञात और असम्प्रज्ञात समाधि का वर्णन है, पढ़ने से लगता है कि अभ्यास और वैराग्य के द्वारा समाधि की इन अवस्थाओं को उन्नत किया जाता है। अष्टांग योग के अन्तिम तीन अंगों को यहाँ लिया गया है, धारणा, ध्यान और समाधि को। क्रियायोग में तप, स्वाध्याय और ईश्वर प्राणिधान का समन्वय है। ये तीन अवयव अष्टांग योग में नियम अंग के ही उपांग हैं।

भाष्यकारों ने इन तीन साधनों को साधकों की क्षमताओं के अनुसार वर्गीकृत किया है। अभ्यास और वैराग्य उत्तम साधकों के लिये, क्रियायोग मध्यम साधकों के लिये और अष्टांगयोग नवसाधकों के लिये। अष्टांगयोग एक पूरा मार्ग बतलाता है, सबको समावेशित करता हुआ चलता है। यदि अपनी स्थिति या क्षमता के बारे में तनिक भी संदेह हो तो अष्टांग योग का ही मार्ग अपनायें। सभी साधकों का साध्य एक ही है पर क्षमतानुसार प्रारम्भिक बिन्दु भिन्न होने के कारण तीन अलग मार्ग उल्लिखित किये गये हैं।

गीता में इन मार्गों को कैसे समझाया गया है, इसके पहले एक तथ्य जानना आवश्यक है। अभ्यास और वैराग्य के वर्णन के पश्चात ही पतंजलि सम्प्रज्ञात और असम्प्रज्ञात समाधि के बारे में बतलाते हैं। किस प्रकार श्रद्धा, वीर्य, स्मृति, समाधि और प्रज्ञा से असम्प्रज्ञात योग होता है। प्रक्रिया की तीव्रता साधन की गति पर निर्भर करती है। इस सूत्र के पश्चात एक वैकल्पिक और त्वरित उपाय बताते हैं, ईश्वरप्राणिधान, ईश्वर की भक्ति या शरणागति। इससे विघ्नों का अभाव और स्वरूप का ज्ञान हो जाता है(१.२९)। पतंजलि ने ईश्वर के लक्षण परिभाषित किये है, पाठकों या आलोचकों की कल्पना के लिये कुछ भी नहीं छोड़ा है। विघ्न भी १४ बताये गये हैं, उनका वर्णन फिर कभी। पर तीनों ही मार्गों में ईश्वरप्राणिधान एक विशिष्ट स्थान रखता है। यह एक विशेष साधन है, मार्ग में कब और कैसे आता है, मार्ग विशेष पर निर्भर करता है।

ईश्वरप्रणिधान को समझने के क्रम में भारतीय संस्कृति के तीन विशेष तत्व उद्धाटित होते हैं। ये तत्व योगसूत्र में कहीं और नहीं कहे गये हैं। पहला गुरु का महत्व, दूसरा सत्संग का महत्व और तीसरा ईश्वर का अस्तित्व। हमारे शास्त्रों में इन तीनों को व्यापकता से प्रसारित और व्याख्यायित किया है। उस पर विचार करने के पहले ईश्वर के बारे में ५ सूत्रों का अर्थ समझ लेते हैं।

क्लेश, कर्म, विपाक और आशय से असंबद्ध पुरुषविशेष ईश्वर है(१.२४)। उसका ज्ञान निरतिशय(जिससे बड़ा कुछ न हो) है(१.२५)।  ईश्वर काल से अवच्छेद नहीं है और पूर्वजों का भी गुरु है(१.२६)। उसका वाचक या नाम प्रणव या ऊँ है(१.२७)। ऊँ कार का जप उसके स्वरूप का चिन्तन है(१.२८)।

जिस मार्ग पर हम चलना चाह रहे हैं,  एक मार्गदर्शक ही हमारी सहायता कर सकता है। उसने पंथ देखा है, उसने औरों को भी वह पंथ पार कराया है। उसके अन्दर सामर्थ्य है हमारी आध्यात्मिक और भौतिक सहायता करने की। यदि हम योग के मार्ग पर ही अद्भुत सिद्धियों को प्राप्त कर सकते हैं तो जो उस प्रक्रिया के शीर्ष पर विद्यमान है, उसकी सामर्थ्य तो अनन्त होगी। ईश्वर और हमारे बीच एक प्रक्रिया का सम्बन्ध भी है और उसी प्रक्रिया का अन्तर भी। प्रक्रिया में उन्मुख होने पर वह सहाय्य है, स्नेहिल है। प्रक्रिया से विमुख के प्रति असंबद्ध और उदासीन। प्रक्रिया के अतिरिक्त अन्य सृष्टिगत कार्यों में ईश्वर की क्या भूमिका है, इस पर पतंजलि विषयान्तर नहीं होते हैं। ईश्वर पर प्रारम्भिक विश्वास भले ही हमारी श्रद्धा का द्योतक हो, पर प्रक्रिया के मार्ग में वह विश्वास नित दृढ़ीभूत होता जाता है, यही प्रक्रिया की सिद्धि है। 

गीता के परिप्रेक्ष्य से यदि इन तीनों मार्गों को पहचाने तो ये क्रमशः ज्ञानमार्ग, भक्तिमार्ग और कर्ममार्ग समझ आते हैं। मार्गों को देखें तो ये पृथक नहीं वरन एक दूसरे से आच्छादित हैं। ज्ञानमार्ग में भक्ति है, भक्तिमार्ग में कर्म है, कर्ममार्ग में भक्ति और ज्ञान दोनों ही सम्मिलित हैं। गीता में बड़ी ही सम्यकता से इसे समझाया है। मार्ग भिन्न दिखते हैं पर निष्कर्ष एक है, परस्पर पूरक हैं। 


आगे अष्टांग योग के अंगों का परिचय।

10.9.19

अभ्यास और वैराग्य - ७

अभ्यास और वैराग्य से योग की किस स्थिति तक पहुँचा जा सकता है? यदि उस स्थिति तक न पहुँच पाये तो क्या पुनः प्रारम्भ से प्रयास करना होगा? यद्यपि प्रक्रिया के प्रारम्भ होने से हमें भौतिक लाभ प्राप्त होने लगते हैं, पर आध्यात्मिक लक्ष्य क्या हैं?

योग का लक्ष्य चित्त की वृत्तियों का निरोध है। अभ्यास और वैराग्य से हम पहले पाँच अंग साधते हैं, इन्हें वाह्य अंग या बहिरंग कहा जाता है, यम, नियम, आसन, प्राणायाम और प्रत्याहार। धारणा, ध्यान और समाधि को सम्मिलित रूप से संयम की संज्ञा दी है, ये आन्तरिक अंग हैं, अंतरंग। बिना बहिरंग साधे अंतरंग संभव भी नहीं है। संयम का लक्ष्य ऋतम्भरा प्रज्ञा होती है या कहें तो वह बुद्धि जो सत्य पर टिकी रहती है। संयम का विषय क्रमशः स्थूल से सूक्ष्म होता जाता है। किस विषय पर संयम करने से क्या सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं, इसका पूरा विवरण विभूति पाद में है, उस पर चर्चा फिर कभी।

यहाँ तक की प्रक्रिया को सम्प्रज्ञातयोग कहते हैं, जिससे प्रज्ञा प्राप्त हो। अब चित्त की नयी वृत्तियों का बनना समाप्त हो जाता है पर पुरानी वृत्तियों और तज्जनित कर्मों के कारण संस्कार शेष रहते हैं। कालान्तर में वे संस्कार भी क्षीण हो जाते हैं, उस समय की अवस्था को असम्प्रज्ञातयोग, निर्बीज समाधि या कैवल्य अवस्था कहते हैं। योगसूत्र का विषय यहीं समाप्त हो जाता है, गीता उसके बाद की भी गतियों का वर्णन करती है।

स्थितिप्रज्ञ, विदेह और प्रकृतिलय, ये तीन शब्द हमें योगसूत्र और गीता से प्राप्त होते हैं। स्थितिप्रज्ञ या जिसकी बुद्धि स्थिर हो, विदेह या  देह के अभिमान से रहित और प्रकृतिलय या चित्त को प्रकृति में लीन करने वाले। इन तीनों की समाधि अवस्था को पुरुष, शरीर और प्रकृति की दृष्टि से देखा जा सकता है। चित्त पुरुष और प्रकृति के बीच का संपर्कसूत्र है। उसकी उपादेयता पुरुष को भोग से अपवर्ग तक ले जाने की है। स्थितिप्रज्ञता पर पहुँचते ही चित्त अपने कारण में विलीन हो जाता है, प्रकृति में विलीन हो जाता है, प्रकृतिलय हो जाता है। देह की इन्द्रियाँ तब चित्त के माध्यम से अपने विषयों में लिप्त नहीं हो पाती है, व्यक्ति विदेह हो जाता है।

माँ सीता को वैदेही भी कहते हैं, यह नाम उन्हें अपने पिता राजा जनक से मिला। जनक राजा थे पर विदेह थे। राजकार्य करते हुये भी निर्लिप्त थे। योग के निष्कर्षों की दृष्टि से कर्म, भक्ति और ज्ञान में कोई भेद नहीं है। अपनी क्षमताओं और रुचियों के अनुसार साधन चुनने की स्वच्छन्दता योग को और भी सौन्दर्यमयी बना देती है। योग गृहस्थ या सामाजिक जीवन में व्यवधान नहीं वरन एक वरदान है। योग को समग्रता से न जानने वालों का संशय तो समझ आता है पर जिनके समक्ष योग के इतने सुन्दर उदाहरण इतनी सहजता से उपस्थित हों, उन्हें योग स्वीकारने में संशय हो, यह सामान्य बु्द्धि से परे है।

अभ्यास की परिभाषा, गुण और उसकी अष्टांगयोग में आवश्कता बताने के साथ ही पतंजलि अभ्यास हेतु पाँच साधनों का भी वर्णन करते हैं। श्रद्धा, वीर्य, स्मृति, समाधि और प्रज्ञा। इनसे अभ्यास शीघ्रप्राप्त और अत्यन्त दृढ़ होता है। शब्द स्पष्ट हैं, फिर भी सरलता के लिये अर्थ बताते चलते हैं।

श्रद्धा - भक्तिपूर्वक विश्वास। जो कर रहे हैं उस पर पूरा विश्वास। संशय चित्त की अवस्था है, प्रभावित हुये तो पगभ्रमित होने की संभावना है, विलम्ब की संभावना है।
वीर्य - मन, इन्द्रिय और शरीर का सामर्थ्य और दृढ़ता। उत्साह बना रहना चाहिये। निष्कर्ष आने में समय लग सकता है, कई कारण होते हैं, पर उत्साह, ऊर्जा और उद्योग अत्यन्त आवश्यक है।
स्मृति - ध्येय की स्मृति, योग की क्रियाओं की स्मृति, अंगों की स्मृति, बार बार। किसी भी कार्य को करने में किसी यम या नियम की अवहेलना तो नहीं हो रही है।
समाधि - चित्त का एकाग्र होना। पूरी ऊर्जा और ध्यान एक ही कार्य में प्रस्तुत हो जाता है। इससे अभ्यास और दृढ़ होता जाता है।
प्रज्ञा - स्वयं के स्वरूप का समुचित ज्ञान, साधन और साध्य का ज्ञान, उपादेय और हेय का ज्ञान।

यावत् जीवेतम सुखम् जीवेत के अनुयायी भले ही छद्म धरे और बुद्धि के बल पर जगत को ढग लें, पर ऐसे लोगों की मानसिकता उद्भाषित होने पर बड़ी छीछालेदर होती है। आप किसी को कितना मूर्ख बना सकते हैं? उद्योग और उत्साह का अभ्यास ग्राह्य हो, कुटिलता और चालाकी त्याज्य हो। योग के पथ पर कितना भी चल सके, कोई हानि नहीं है। यह श्रीकृष्ण की घोषणा हैं, त्रायते महतो भयात् (२.४०), न मे भक्तः प्रणश्यति(९.३१)।

अगले ब्लाग में अष्टांग योग की चर्चा।

7.9.19

अभ्यास और वैराग्य - ६

वैराग्य को पतंजलि ने दो सूत्रों में परिभाषित किया है।

दृष्टानुश्रविकविषयवितृष्णस्य वशीकारसंज्ञा वैराग्यम् - देखे और सुने विषयों में वितृष्णा वशीकार वैराग्य है।
तत्परं पुरुषख्यातेर्गुणवैतृष्ण्यम् - पुरुष के ज्ञान से प्रकृति के गुणों में वितृष्णा परवैराग्य है।

वैराग्य की दो स्थितियाँ हैं, वशीकार वैराग्य एवं पर वैराग्य। जो विषय हमारे मन को बार बार इधर उधर भटकाते हैं, उनसे वितृष्णा होना वशीकार वैराग्य है। अभ्यास से स्थिर मन को यदि विषय खींचते रहेंगे तो दृढ़भूमि भी स्थिर नहीं रहेगी। वैराग्य से अभ्यास दृढ़ होता है और अभ्यास से वैराग्य। दोनों ही एक दूसरे पर आश्रित रहते हुये साथ साथ चलते हैं। जब पुरुषख्याति होती है या कहें कि अपना स्वरूप जानने की स्थिति आती है तब जो विवेक उत्पन्न होता है उससे वैराग्य पूर्णरूप से सिद्ध हो जाता है। तब विषय से मन हटाने के लिये प्रयास नहीं करना पड़ता है, वैराग्य स्वतःस्फूर्त होता है।

वैराग्य को समझने की दृष्टि से तीन तथ्य अत्यधिक महत्वपूर्ण हैं। पहला यह कि वैराग्य उपादेयता और हेयता, दोनों से ही विलग है। उपादेय अर्थात ग्रहण करने योग्य, हेय अर्थात छोड़ने योग्य। यदि किसी वस्तु या विषय के बारे में हम यह सोचते रहे कि इसे ग्रहण नहीं करना है, इसे पास नहीं आने देता है तो वह वैराग्य की स्थिति नहीं है। किसी का हेयता पक्ष सोचना भी एक प्रकार का राग है। कहते हैं कि रावण को मुक्ति इसलिये मिल गयी कि वह शत्रुता या भयवश ही सही, पर श्रीराम के बारे में सोचता रहता था। वैराग्य, किसी विषय के प्रति न उपादेयता का भाव है और न ही हेयता का।

दूसरा यह कि वैराग्य वाह्य रूप से नहीं होता है। आप इन्द्रियों से किसी विषय से दूर हैं पर मन में एक लालसा बनी हुयी है कि यह मिल जाये, तब भी वह वैराग्य नहीं है। पलायनवादी अपना घर द्वार तो छोड़ आते हैं पर उनके घर द्वार का विचार उनके मन को नहीं छोड़ता है। मानसिक भोग भी भोग ही है। वर्षा के समय किसी गुरु ने सहायता स्वरूप किसी स्त्री को उठाकर नदी पार करा दी। बहुत समय बाद जब शिष्य से न रहा गया तो उसने गुरु के समक्ष अपना संदेह रखा। गुरु ने कहा कि मैं तो उसे उठाकर छोड़ भी आया, तुम तो उसे अभी तक अपने पास रखे हो।

तीसरा यह कि किसी भोग को श्रम और साधन के अभाव में या भयवश नहीं करना वैराग्य नहीं है। आपके पास धन नहीं है और आप लड्डू नहीं खरीद सकते। आपको डायबिटीज है और लड्डू खाने से आपके स्वास्थ्य पर अत्यधिक प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा। ये दोनों ही स्थितियाँ वैराग्य की श्रेणी में नहीं आती हैं। इसमें तृष्णा मिटी नहीं है, बस रुक गयी है। जैसे ही बाध्यता हटेगी, भोग मुखर हो जायेगा। यह विचारकर कि भोग अनित्य हैं या योग में जो आत्मिक सुख है वह इन भोगों से कहीं अधिक है या कालान्तर में भोग न होने पर अन्ततः ये दुख का कारण बनेगे, ये विचार बुद्धिजनित है और वशीकार वैराग्य की श्रेणी में आयेंगे। जब यह विवेक आ जायेगा कि आत्मा और शरीर अलग अलग हैं और शरीर को विषयों से पोषित करना श्रम को व्यर्थ करना है तो वह परवैराग्य होता है।

तो क्या सब कुछ छोड़ देना चाहिये। उपयोग और उपभोग में जो भिन्नता है वही भिन्नता वैराग्य को भी स्पष्ट करती है। हमें भौतिक साधनों का उपयोग करना है, उपभोग करने नहीं पसर जाना है। एक चोर कह सकता है कि मुझे चोरी का अभ्यास है और जिनके घर चोरी होती है, उनके कष्टों से वैराग्य है। यह चोर की कुशलता तो बढ़ायेगा पर योग के साधनों का पालन नहीं करेगा अतः यह योग नहीं कहलायेगा। क्योंकि यह कार्य भु्क्तिमार्गी है, मुक्तिमार्गी नहीं। 

एक प्रकार से देखा तो अभ्यास और वैराग्य मन के ही धर्म हैं। जिस पर हमें राग होता है उस पर मन बार बार सयत्न स्थित हो जाता है, उसका अभ्यास होने लगता है। इसी प्रकार जब मन उस भोग से उकता जाता है तो उस वस्तु या विषय के प्रति मन में वैराग्य हो जाता है। अभ्यास और वैराग्य का यह क्रम चक्रीय होता है और उसी चक्र में बार बार घूमता रहता है। योग वृत्तियों का निरोध है, न कि भोग के भँवर मे बार बार डूबना। मन के अन्दर ये दोनों गुण सदा विद्यमान हैं, बस किसका अभ्यास करना है और किससे वैराग्य करना है, यह दिशा योग ही देता है।

एक स्तर पर देखा जाये तो अभ्यास और वैराग्य परस्पर विरोधाभासी हैं। अभ्यास किसी विषय में प्रवृत्त होना है वैराग्य विषयों से विरक्त होना है। तब ये साथ साथ कैसे रह सकते हैं। भारतीय संस्कृति में इस प्रकार के उदाहरण बिखरे पड़े हैं, पर समन्वय और संतुलन के स्तर पर दोनों ही एक दूसरे को पुष्टित करते हुये चलते हैं। विरोधी प्रतीत होने पर भी दोनों ही आवश्यक है, किसी एक से काम नहीं चलेगा।

अगले ब्लाग में दो और सूत्र, ५ और मूलभूत आवश्यकताओं के बारे में चर्चा।