7.12.16

सूत्र शैली

अनुबन्ध चतुष्ट्य को लेखन का आधार मान लेने से इस विषय पर एक सुस्पष्टता आ जाती है। लिखने के पहले इस पर विचार कर लेने से लेखन का स्तर स्वतः ही बढ़ जाता है। इसका अनुपालन पुस्तक लिखने के अतिरिक्त लेखन की अन्य विधाओं में भी किया जाना चाहिये। चलिये, अपने ब्लॉग में इसे प्रयुक्त करते हैं। मेरे ब्लॉग के विषय विविध हैं, जीवन से जुड़े, अध्ययन किये हुये, सामाजिक अवलोकन के, आत्मिक अनुभव के, और ऐसे ही जाने कितने विषय। प्रयोजन मात्र अभिव्यक्ति है, विशुद्ध स्वार्थ, क्योंकि किसी विषय को लिखने और पाठकों को समझाने के क्रम में वह और भी स्पष्ट हो जाता है। बचपन में भी लिखकर पढ़ते थे, सीखते थे, समझते थे। लिखने और उस पर आयी टिप्पणियों से विषय की समझ और भी विस्तारित हो जाती है। प्रयोजन हिन्दी का प्रचार प्रसार भी है, जिन विषयों में समान्यतः अंग्रेजी का प्राधान्य है, उन्हें हिन्दी पाठकों के लिये सुलभ बनाना है।  प्रयोजन उस विषय पर कोई विशिष्ट टीका या संदर्भ लिखना नहीं है। अधिकारी कोई भी है जो उस विषय में रुचि रखता हो, अधिकारी सर्वसाधारण हैं। सम्बन्ध बड़ा सरल है, ब्लॉग पढ़ने के बाद पाठक के जीवन में कोई विशेष परिवर्तन की आशा नहीं करता हूँ, बस पढ़ते समय पाठक उन्हीं भावनाओं से होकर निकले जिन भावनाओं से प्रेरित हो वह ब्लॉग लिखा गया था।

अपने ब्लॉग का अनुबन्ध चतुष्ट्य लिखने के बाद ऐसा लगा कि इन संदर्भों में कुछ विशेष और स्तरीय लेखन नहीं कर पा रहा हूँ, संभवतः इसीलिये आनन्द का भाव नहीं जग पा रहा है। सतही अनुभव और परिधि में घूमने में तो कोई आनन्द नहीं, जाना तो केन्द्र तक पड़ेगा तभी कुछ तत्व मिलेगा। उन विषयों पर लिखने में अत्यधिक संतुष्टि मिली जिन पर गहराई में उतर कर लिखा, विषय को सामान्य से अधिक समझा, विषय के सब पक्षों को समझ और समझा पाया। निश्चय ही संतुष्टि की उन स्मृतियों को अपने लेखकीय जीवन में पुनर्स्थापित करना पड़ेगा, तब कहीं आनन्द के कुछ छींटे मन पर पड़ेंगे।

सूत्र शैली भारत की ज्ञान परंपरा की अत्यन्त सशक्त विधा है। यह साक्षी है कि उस समय के संवाद, लेखन और अभिव्यक्ति का बौद्धिक स्तर कितना उत्कृष्ट था। योगसूत्र जैसा कठिन विषय पतंजलि ने मात्र १९५ सूत्रों में लिख दिया,  या कहें तो लगभग ६० श्लोकों में। पाणिनी ने पूरी संस्कृत व्याकरण मात्र ४००० सूत्रों में समाहित कर दी। सांख्य के प्रणेता कपिल मुनि ने मात्र २२ सूत्रों में अपने सिद्धान्त के प्रतिपादित किया। सूत्र में न्यूनतम शब्दों का प्रयोग उसे शाब्दिक कोलाहल से मुक्त कर और भी प्रभावी बना देता है। शब्दों का चयन सूत्र के अर्थ को असंदिग्ध रूप से व्यक्त करने में समर्थ होता है। सारवत कहना, यह सूत्रशैली के ही हस्ताक्षर हैं, विचारों की श्रंखला को कम वाक्यों में कह पाने की शक्ति। यदि एक से अधिक अर्थ बताना आशय है तो उस कला में भी सूत्रशैली सटीक बैठती है, उपयुक्त शब्दों को प्रयोग से यह सुनिश्चित होता है। सूत्र भी लम्बे नहीं, छोटे से, याद करने में सरल, विस्तार से समझाने में सरल। एक तो संस्कृत स्वयं में ही कोलाहल मुक्त भाषा है, न्यूनतम शब्दों में अधिकतम प्रेषित करने की सक्षमता समाये भाषा। धातु, प्रत्यय, विभक्ति, उपसर्ग, प्रत्याहार, संधि, समास आदि सबका एकल उद्देश्य अभिव्यक्ति की सुगठता और सघनता है। उस भाषा में व्यक्त सूत्रशैली में एक भी अक्षर अतिरिक्त नहीं है, एक भी अर्थ लुप्त नहीं है। इस तथ्य की उद्घोषणा प्रणेताओं ने अपनी रचनाओं के पहले ही किया है।

अभिव्यक्ति की इस पराकाष्ठा को देखता हूँ तो गर्व भी होता है और लाज भी आती है। गर्व इस बात का कि हमारे पूर्वज सतत चिन्तनशील थे, अद्भुत मेधा के स्वामी थे। लाज इस बात की आती है कि उन पुरोधाओं की संतति होने के बाद भी, उनके द्वारा निर्मित संस्कृति का पलने का लाभ होने के बाद भी हम उन मानकों के आसपास भी नहीं छिटकते हैं। जितना पढ़ता हूँ, जितना सोचता और समझता हूँ उतना ही अभिभूत हो जाता हूँ। अब आप ही कल्पना कीजिये कि जब मन की स्थिति नित उन उच्च मानकों पर जी रही हो, उस समय कुछ भी ऐसा कहना जिसमें गुणवत्ता न हो, एक निष्कर्षहीन श्रम लगता है। यही कारण रहता होगा कि लेखन का आनन्द अल्पतर होता गया।

ऐसा नहीं है कि सूत्रशैली कोई कृत्रिम तकनीक है। शब्दों की शक्ति अथाह है, एक एक शब्द जीवन बदलने में समर्थ है। इतिहास साक्षी है कि सत्य, अहिंसा, समानता, न्याय, अपरिग्रह, धर्म आदि कितने ही शब्दों ने समाज, देश और संस्कृतियों की दिशा बदल दी है। पहले उन शब्दों को परिभाषित करना, संस्कृति में उनके अर्थ को पोषित करना, उन्हें विचारपूर्ण, सिद्धान्तपूर्ण बनाना। कई कालों में और धीरे धीरे शब्द शक्ति ग्रहण करते हैं। उदाहरणस्वरूप योग कहने को तो एक शब्द है पर पूरा जीवन इस एक शब्द से साधा जा सकता है। सत्य और अहिंसा जैसे दो शब्दों से गांधीजी ने देश के जनमानस की सोच बदल दी। ऐसे ही शब्दों ने राजनैतिक परिवर्तन भी कराये हैं और समाज की चेतना में ऊर्जा संचारित की है। व्यक्तिगत जीवन में भी सूत्रशैली की उपयोगिता है। बचपन परीक्षा की तैयारी करते समय किसी विषय को पढ़ते समय हम संक्षिप्त रूप में लिख लेते हैं ताकि परीक्षा के पहले कम समय में उन्हें दोहराया जा सके। यही नहीं, विज्ञान के बड़े बड़े सिद्धान्त भी गणितीय सूत्रों के रूप में व्यक्त किये जाते हैं।

सूत्रशैली का अर्थ मात्र संक्षिप्तीकरण नहीं है। वृहद अर्थों में देखा जाये तो यह एक संतुलन है। अनुबन्ध चतुष्ट्य जहाँ एक ओर आवश्यक और अनावश्यक के बीच संतुलन करता है, सूत्रशैली अधिकारी का निर्धारण कर विस्तार और संप्रेषणीयता के बीच संतुलन करती है। किसी सिद्धान्त को विस्तार से लिख देना सरल है पर उसे याद रख पाना और उचित समय में प्रयोग में ला पाना कठिन है। अत्यन्त क्लिष्ट करने से संक्षिप्तीकरण तो हो सकता है, पर उसकी संप्रेषणीयता में ग्रहण लग जाता है। शब्दों को उस सीमा तक न्यून किया जाये जब तक अर्थ पूर्णता से संप्रेषित होता रहे। जिस समय लगे कि एक भी शब्द हटाने से संप्रेषण प्रभावित होगा, वही सूत्र की इष्टतम स्थिति है। एक और शब्द जब अधिक और व्यर्थ प्रतीत हो तो समझ लीजिये कि आपने सूत्र पा लिया। संतुलन का अर्थ ही यही होता है कि दो विपरीत लगने वाले गुणों को किस सीमा तक साधा जाये कि प्रभाव महत्तम हो।

संतुलन में ही बुद्ध का मध्यमार्ग छिपा है, कृष्ण की स्थितिप्रज्ञता छिपी है, प्रकृति और पुरुष का साम्य छिपा है, जीवन के सफलतापूर्वक निर्वाह की कुंजी छिपी है।


जीवन और लेखन में संतुलन के अन्य उदाहरण अगले ब्लॉग में।

4.12.16

लेखकीय संतुलन

जब कभी लगता है कि लेखन में आनन्द नहीं आ रहा है तो लेखन कम हो जाता है। 

लेखन अपने आप में एक स्वयंसिद्ध प्रक्रिया नहीं है। इसके कई कारक और प्रभाव होते हैं। क्यों लिखा जाये, कैसे लिखा जाये और क्या लिखा जाये, ये मूल प्रश्न आठ वर्ष के ब्लॉग लेखन के बाद आज भी निर्लज्ज प्रस्तुत हो जाते हैं। लेखन के प्रभाव बिन्दु पठन के कारक होते हैं। क्यों पढ़ा जाये, क्या पढ़ा जाये, इस पर निर्भर करता है कि क्या लिखा जाये। जीवन में बहुधा लगता है कि केवल शुष्क ज्ञान ही ग्रहण हो रहा है और उसका कोई अनुशीलन नहीं हो रहा है। तब जीना प्रारम्भ हो जाता है, ज्ञान का व्यवहार बढ़ जाता है, पढ़ना कम हो जाता है, लिखना कम हो जाता है। जब सारगर्भित ज्ञान के सूत्र मिलने लगते हैं तो विस्तार से मन हट जाता है, सूत्रों और शब्दों पर ही मनन करने में दिन निकल जाते हैं, पढ़ना कम हो जाता है, लिखना कम हो जाता है। जब कभी गहराई मिलती है, सिद्धान्तों के सुलझाव समझ में आने लगते हैं, तब मात्र पढ़ते रहने का मन करने लगता है, लिखना कम हो जाता है।

तीन वर्ष पहले मन में एक भाव उठा कि एक पुस्तक लिखी जाये। विषय बहुत थे जिन पर लिखा जा सकता था, हल्के और भारी, दोनों ही विषय थे। कई मित्रों से चर्चा की। उसी क्रम में एक कठोर सुझाव भी आया। जब तक लिखने की उत्कट इच्छा न हो, तब तक पुस्तक न लिखें। मन के विचार और उनमें समाहित विविधता व्यक्त करने के लिये ब्लॉग एक सशक्त माध्यम है। यदि कुछ लिखना ही हो तो ऐसा लिखा जाये जिसमें कुछ वैशिष्ट्य हो। वह वैशिष्ट्य लाने के लिये स्तरीय अध्ययन आवश्यक है। अनुभव को एक बार ही व्यक्त किया जा सकता है क्योंकि कल्पना हर बार नव कलेवर ओढ़ कर नहीं आ सकती है। इस तथ्य पर पर्याप्त सोचने के बाद पुस्तक लिखने का विचार स्थगित कर दिया गया। जो विषय पुस्तक के बारे में सोचे थे, उन्हें भी चिन्तन की प्रथम पंक्ति से उठा कर पीछे बैठा दिया गया। सहसा लगा कि सभी विषयों ने विद्रोह सा कर दिया हो। न कोई नवविचार, न कोई रोचक दृष्टिकोण, स्तब्ध सी मनःस्थिति, लिखना कम हो गया। अच्छी बात पर यह रही कि पढ़ना कम नहीं हुआ।

यह सत्य है कि व्यस्तता रही, पर व्यस्तता के कारण नियमित लिखने का समय नहीं मिला, यह तथ्य तर्कपूर्ण नहीं लगा। बहुधा अच्छा लेखन व्यस्तता के समय में ही लिखा है, एक प्रवाह में, बहुत कम समय में। जब बलात लिखने का प्रयास होता है तो उतना ही लिखने में बहुत समय लग जाता है। पता नहीं क्यों, पर प्रवाह कम हो गया। उतना ही लिखने के लिये अधिक मानसिक श्रम करना पड़ता था, आनन्द की मात्रा कम होती गयी, लिखना कम होता गया। प्रवाह क्यों कम होता है, यह समझ नहीं आता है, पर जब प्रवाह कम हो जाता है तो कुछ समझ नहीं आता है।

स्वाध्याय के क्रम में जब प्राचीन ज्ञान को समझना प्रारम्भ किया तो दो विशेष तथ्यों से साक्षात्कार हुआ। पहला अनुबन्ध चतुष्ट्य और दूसरा सूत्र शैली।

अनुबन्ध चतुष्ट्य वे चार बन्धन हैं जिनका लेखक को अनुसरण करना पड़ता है। अनुसरण करने के लिये आवश्यक है कि उन्हें पुस्तक के प्रारम्भ में ही घोषित कर दिया जाये। भारतीय ज्ञान परंपरा में यह बन्धन एक स्थायी स्तंभ रहा है। ये चार हैं - विषय, प्रयोजन, अधिकारी और सम्ब्न्ध। किस विषय पर पुस्तक है, यह प्रारम्भ में ही घोषित करना होता है। जब उस विषय पर कितना कुछ लिखा जा चुका है तो वर्तमान प्रयत्न का प्रयोजन क्या है। कौन व्यक्ति इसे पढ़ने के योग्य हैं या किसको समझ में यह पुस्तक आयेगी। इस पुस्तक के पढ़ने के बाद उस व्यक्ति में क्या परिवर्तन आयेगा। सीमायें वहुत ही स्पष्ट रूप से निर्धारित की गयी हैं। हम बहुधा केवल विषय पर ही सोच कर बैठ जाते हैं, किसी विषय में यदि थोड़ा अधिक जान जाते हैं तो लगता है कि उसे व्यक्त कर दिया जाये। शेष तीन पर तो विचार आता ही नहीं है। संभवतः अनुबन्ध चतुष्ट्य ही कारण रहा होगा कि प्राचीन समय में अनावश्यक साहित्य छन गया और बाहर नहीं आया। पुस्तक लिखना तब एक विशेष उपलब्धि रहा करती होगी। जो छनकर कालान्तर में बाहर आया, वह बार बार पढ़ने का मन करता है, वह संस्कृति की धरोहर बना।

अनुबन्ध चतुष्ट्य को यदि पुस्तक लिखने का आधार बनाया जाये तो बहुत से संशय दूर हो जाते हैं। न केवल लेखक के लिये वरन पाठक के लिये भी। जिन सिद्धान्तों पर लेखन होता है उन्हीं पर पाठन भी होता है। विषय का विस्तार असीमित है, सबकी अपनी एक कहानी है, सबकी अपनी समझ और परख है। सब अपनी कहने में आ जायें तो लिखने वाले अधिक हो जायेंगे, पढ़ने वाले कम। जैसे आजकल किसी भी चर्चा में कहने वाले अधिक रहते हैं और सुनने वाले कम मिलते हैं। केवल अपनी कह देना विषय नहीं हो सकता। उसमें कुछ मनोरंजन हो सकता है, कुछ भाव हो सकते हैं, कुछ खिचड़ी सा हो सकता है वह, पर स्वादिष्ट साहित्य नहीं हो सकता। आँकड़े देखें तो यही हो रहा है, २० लाख पुस्तकें हर वर्ष लिखी जाती हैं और औसत २५० प्रतियाँ प्रति पुस्तक बिकती हैं। अधिकांश के लिये तो पुस्तक का मूल्य और लगाया हुआ श्रम भी निकाल पाना कठिन होता है।

यदि बताने के लिये सारतत्व है, तो भी बिना प्रयोजन के लेखन का कोई औचित्य नहीं। जब विषय जीवन से जुड़ा होगा, कल्याण से जुड़ा होगा, ज्ञान से जुड़ा होगा, तो उसका प्रयोजन उतना ही अधिक होगा। अधिकारी प्रारम्भ में ही निर्धारित कर देने से लेखक के लिये अपना बौद्धिक स्तर नियत कर पाना सरल होता है। पुस्तक का आकार इस पर विशेष रूप से निर्भर करता है। यदि आप किसी विषय पर सर्वसाधारण के लिये लिख रहे हैं, तो हर पक्ष को समझा समझा कर लिखना होगा और पुस्तक का आकार बढ़ जायेगा। किसी भी जटिल पक्ष पर जाने के लिये आपको अत्यन्त कठिनाई होगी। आपको उदाहरणों औप कथाओं को विशेषरूप से सम्मिलित करना होगा। दूसरी और यदि प्रबुद्ध वर्ग के लिये कोई विषय व्याख्यायित किया जा रहा है तो कम शब्दों में अधिक बात कही जा सकती है। दोनों ही साधनों में विषय की गुणवत्ता से कोई समझौता नहीं किया जाता है, बस पुस्तक का आकार अधिकारी के अनुसार घटता बढ़ता रहता है। जब कई शास्त्र सूत्र के प्रारूप में दिखायी पड़ते हैं तो लिखने वाले और उन्हें पढ़ने वालों का उत्कृष्ट बौद्धिक स्तर समझ में आता है।


लेखकीय संतुलन के और पक्ष अगले ब्लॉग में।

30.11.16

लिली पाण्डेय

लिली रेलवे बोर्ड में वरिष्ठ अधिकारी हैं और कार्मिक विभाग का उत्तरदायित्व वहन कर रही हैं।बंगलुरु में उनके साथ कार्य करने का सौभाग्य मिला है। कला और साहित्य में रुचि है। रेलवे में कला के विषय परसफरनाम की पुस्तिका की सहलेखिका भी रही हैं। उसी के आगामी अंक के लिये लिली ने एक कविता लिखी थी। पढ़ने को दी, बहुत अच्छी लगी, गुनगुनायी और हिन्दी में अनुवाद कर दी। शाब्दिक के स्थान पर भावानुवाद किया है। आप भी पढ़ें।

Whirl of wheels
Setting in motion the celestial machinery
Turning to infinity, to eternity
An epic adventure beyond 
Beginnings & denouement 
Spinning a universe of words, forms and shapes
A cadence of dervishes
The dance of Shiva
Spasm of creation ..

~ Lily Pandeya

अथ कालचक्र निःश्वास नाद,
बढ़ता गतिमय वैश्विक प्रमाद,
शाश्वत, अनंत
निर्बन्ध छन्द,
आगत स्वागत, सब मार्ग सुप्त,
यात्रा अनादि, संहारमुक्त
शब्दों, आकृति आकारों में 
जग घूर्ण पूर्ण विस्तारों में
दरवेशी तालों पर विशेष
नर्तन नवनूतन शिवप्रवेश
घनघुमड़ उमड़ती सृष्टिशेष


भावानुवाद - प्रवीण पाण्डेय

लिली के साथ, बीजिंग में

27.11.16

चीन यात्रा - १८

अपनी संस्कृति पर गर्व करने वालों को लोग पुरातनपंथी समझते हैं। पुरातन से विद्वेष और नूतन से लगाव तथाकथित बुद्धिजीवियों का पहचान-तत्व बन गया है। समझना और समझाना तब और कठिन हो जाता है जब संस्कृति पर आस्था रखने वालों और न रखने वालों ने संस्कृति के मर्म को नहीं समझा होता है। तर्क तब परिधि पर ही रहते हैं, केन्द्र में सत्य संदोहित हुये बिना ही पड़ा रहता है। पक्ष में और विपक्ष में बोलने के लिये संस्कृति को समझना आवश्यक है। समझने के लिये पढ़ना और जीना आवश्यक है, नहीं तो तर्क शुष्क रह जाते हैं। संस्कृति के रूप में न जाने कितना ज्ञान, न जाने कितनी बुद्धिमत्ता हमें विरासत में सहज ही मिल जाती है। साथ ही साथ कुछ विकृतियाँ भी मिल जाती हैं जो संभव है कि किसी काल में संस्कृति के अनुकूल रही हों पर वर्तमान में विपरीत हों। संस्कृति का मर्म समझने के क्रम में ऐसी विकृतियाँ स्पष्ट दिखती हैं और दूर की जा सकती हैं। जो लोग मात्र कुछ विकृतियों के लिये अपनी पुरानी संस्कृति को छोड़ देते  हैं और नये को बिना सोचे समझे अपना लेते हैं, वे संस्कृति-संकर कहीं के नहीं रहते हैं। 

चीन में पुरानी संस्कृति का आज तक कहीं भी लोप नहीं हुआ है। वहाँ की सत्ता ने भले ही संस्कृति के स्वरूप को भले ही आघात पहुँचाया हो पर संस्कृति की आत्मा को नष्ट नहीं कर पायी है। कालान्तर में सत्ता ने संस्कृति के सुदृढ़ पक्षों का उपयोग आर्थिक और सशक्त राष्ट्र बनने में प्रयुक्त किया है। भारत इतिहास के आघातों से बिखरा और भ्रमित खड़ा है। संस्कृति में शक्ति के सूत्र छिपे हैं पर वह स्वयं पर विश्वास ही नहीं कर पा रहा है। बौद्धिक क्षमता है पर स्वयं को समझा नहीं पा रहा है। अन्तर्विरोधों से क्षीण और अपनी प्राथमिकतायें निर्धारित करने में असमर्थ देश को यदि कुछ चाहिये तो वह दिशा और संबल हैं। विश्व सौ पग आगे दिखता है और अपने पग पर समस्याओं के शत पाथर बँधे हैं, इसी पशोपेश के दिग्भ्रम मे आवाक सा बैठा हुआ है। 

सृजनशीलता है, सहनशीलता है, उपलब्धियों से भरा कालखण्ड है। स्वयं को सिद्ध नहीं कर पाये हैं तो पददलित भी नहीं हुये हैं। उठना होगा, बढ़ना होगा, उन्नति के शिखरों में चढ़ना होगा। पूर्वजों को संतुष्ट करने को लिये, आने वाली संततियों को गौरव करने के लिये कुछ शेष रहे, इसके लिये कुछ न कुछ करना ही होगा। छोटा नहीं, बड़ा करना होगा, बहुत बड़ा करना होगा।

चीन के रेलतन्त्र में देखा, रेल विश्वविद्यालय में देखा, नगरीय व्यवस्था में देखा, व्यापार में देखा, यातायात में देखा, कुछ भी छोटा नहीं पाया वहाँ पर। सिल्क रोड से लेकर आधुनिक सिल्क रोड तक, स्टील के उत्पादन से लेकर अंतरिक्ष कार्यक्रम तक, सब के सब असाधारण सोच के उदाहरण हैं। व्यवस्थाओं के स्वरूप जो सिद्ध हो चुके हैं, उन्हें यथास्वरूप अपनाने में क्या समस्या हो सकती है। 

भारत और चीन का संबंध बहुत पुराना है। हम चाहें, न चाहें हमें पड़ोसी के रूप में ही रहना है। भारत ने एक भी सैनिक भेजे बिना चीन को अपनी संस्कृति के बल पर सदियों तक अपने विचार के अधिकारक्षेत्र में रखा है। बौद्ध धर्म के माध्यम से अपना आध्यात्मिक वर्चस्व बनाकर रखा है। बौद्धिक प्रभुत्व के इस लम्बे कालखण्ड ने दोनों संस्कृतियों के बीच संबंध प्रगाढ़ किये हैं। वर्तमान राजनैतिक वर्चस्व की होड़ संभवतः उसी की प्रतिक्रिया है। शक्ति को शक्ति ही साधती है। अभी भी हम बौद्धिक रूप से चुके नहीं हैं। अपनी क्षमताओं का उपयोग कर हमें भी समकक्ष आना होगा और आँख से आँख मिलाकर बात करनी होगी, व्यापारिक क्षेत्र में भी, यदि आवश्यकता पड़ी तो सामरिक क्षेत्र में भी। संबंधों को राजनैतिक कटुता से हटाकर पुनः संस्कृति के आधार पर सिद्ध करना ही होगा।

व्यक्तिगत रूप से जितना सीखने को मिला, वह संभवतः पढ़कर सीख पाना संभव नहीं था। संस्कृतियाँ सोचने का ढंग बदल देती हैं। जब सब एक सा सोचते हैं तभी शक्ति का उद्भव होता है। भिन्न विचार श्रंखलायें या तो भ्रम फैलाती हैं या सीमित और दिशाहीन विकास करती हैं। यदि हमारे पास कोई एक ऐसा तत्व है जो सबको संगठित कर एक दिशा में प्रवृत्त कर सकता है तो वह है हमारी संस्कृति। बड़ी सोच के जो सूत्र हमारी संस्कृति में त्यक्त पड़े हैं, उनका आह्वान करना होगा। अपने पुरुषार्थ को पुनर्जाग्रत करना होगा। धन्यवाद उन्हें देना चाहिये जो हमें हमारी क्षमतायें सिद्ध करने के लिये उकसाते हैं। चीन का आभार, हम निश्चय ही स्वयं को सिद्ध करेंगे।


इति चीन यात्रा।

1.10.16

चीन यात्रा - १७

प्रकृति पुरुष का संग
व्यक्ति जब निश्चय कर लेता है कि उसे प्रकृति के साथ रहना है, समस्यायें स्वतः अपना समाधान ढूढ़ लाती हैं। प्रकृति की अवमानना या उस पर आधिपत्य के प्रयास अंततः विनाश के बीज बनते हैं। टाओ की प्रकृति से निकटस्थता का ऐसा ही एक सुन्दर उदाहरण है दूजिआनयान बाँध। चेन्दू सिचुआन राज्य में है और पर्वत की घाटी में होने के कारण यह क्षेत्र नदियों से प्लावित है। समस्या पहचानी सी है, वर्षा ऋतु में बाढ़ की। यदि बाढ़ से बचने के लिये नदियों से दूर रहा जाये तो अन्न उत्पादन और सूखे की समस्या। बाढ़ और सूखे की इस दुविधा से अपना देश भी दग्ध है। समाधान बाँध बनाना है, जब प्रवाह अधिक हो तो उसे रोक लिया जाये और सूखे के समय उस संचित जलराशि का उपयोग किया जाये। प्रकृति को चोट पहुँचाने के अतिरिक्त बाँध राजनैतिक चोट भी करते रहते हैं। कावेरी, सिन्धु और ब्रह्मपुत्र पर बने या बनाये जाने बाँध इसके जीवन्त उदाहरण हैं। समाधान समस्या से भी भयावह तब हो जाता है जब प्रकृति अनियन्त्रित हो जाती है। अत्यधिक वर्षा में जब ये बाँध अपनी क्षमता से अधिक पानी एकत्र कर लेते हैं तो उनका खोलना और टूटना सिचिंत क्षेत्रों में जल प्रलय बन कर आता है। बिहार हर वर्ष उसका भुक्तभोगी है। कुछ क्षेत्र बाँधों का पूरा लाभ तो स्वयं उठा लेते हैं पर दुष्परिणाम अन्य क्षेत्रों को बढ़ा देते हैं।

परिसर का मानचित्र

संचयन शब्द टाओ की शब्दावली में नहीं है, अपरिग्रह या आवश्यकता से अधिक न रखना। प्रकृति प्रवाहमान रहे, बाधायें न्यूनतम हों, यह धारणा टाओ में गहरे बसी है। इसका एक उत्कृष्ट उदाहरण है दूजिआनयान बाँध। इसे बाँध के स्थान पर सिचाई तन्त्र कहना अधिक उपयुक्त होगा। २२०० वर्ष पूर्व चेन्दू क्वेंगश्वेंग पर्वत से निकलने वाली मिंजियांग नदी के कारण हर वर्ष आने वाली भीषण बाढ़ से त्रस्त था। स्थानीय अधिकारी ली बिंग ने अपने पुत्र के साथ मिलकर इसका हल ढूढ़ा। लम्बे अवलोकन, सटीक योजना और अथक परिश्रम के बाद सिचाई तन्त्र तैयार हुआ। सम्पन्न कार्य की उत्कृष्टता इस बात से समझी जा सकती है कि पिछले २२०० वर्षों से यह तन्त्र सुचारु रूप से चल रहा है। बाढ़ की समस्या को चेन्दू में फिर कभी नहीं आयी और सिचुआन के सभी ५० नगरों में सिचाई व्यवस्था पर्याप्त है। सूखे के समय में मिंजियांग नदी का ६० प्रतिशत से भी अधिक जल सिचाई तन्त्र में आता है और वर्षा के समय यह घट कर ४० प्रतिशत से भी कम रह जाता है। कहने का आशय यह है कि अधिकता के समय यह तन्त्र अवांछित जल वापस नदी में भेज देता है। इस तन्त्र में कहीं भी जल के प्रवाह को बाधित नहीं किया गया है, बस उसे अद्भुत विधि से नियन्त्रित किया गया है। वर्ष २००० में इसे यूनेस्को ने बाढ़ नियन्त्रण, सिचाई तन्त्र, जल परिवहन और जल उपयोग के सतत लाभों के कारण अपनी सूची में स्थान दिया है।

सर्वप्रथम तो मुझे इस तन्त्र के पीछे का विज्ञान समझ नहीं आया क्योंकि इसके लिये हाइड्रोलॉजी का अध्ययन आवश्यक है। अपने साथ गये सिविल इन्जीनियरों से पूछने पर सन्तोषप्रद उत्तर नहीं मिले, संभवतः रेल की पटरियों के लौह ने जलविमर्श के विषयों को उनसे दूर कर दिया हो। वापस आने के बाद उसे कई दिनों तक समझा तब थोड़ा बहुत समझ में आया। जल के जटिल प्रवाह से शाश्वत लाभ ले पाना निश्चय ही एक प्रशंसनीय उपलब्धि है और उसके लिये प्राचीन चीन के नियन्ता साधुवाद के पात्र हैं।

समझने का लिये मॉडल
यह तन्त्र बनाने के लिये जिस स्थान को चुना गया है, वहाँ पर यह नदी दायीं ओर मुड़ती है। मुख्य प्रवाह के बायीं ओर एक उपधारा निकाली गयी है। उपधारा मुख्यधारा की तुलना में अधिक गहरी, पतली और लम्बी है। यह उपधारा आगे जाकर पुनः मुख्यधारा में मिल जाती है। बीच का भूमिखण्ड एक मछली का आकार बनाता है। इस मछली के तीन भाग हैं, मुँह, पिछले पंख का ऊपरी हिस्सा और पिछले पंख का निचला हिस्सा। मुँह के हिस्से को सप्रयास तिकोना और कठोर रखा जाता है। यह अत्यन्त महत्वपूर्ण भाग है क्योंकि यहीं से ही मुख्यधारा और उपधारा में जल का बँटवारा होता है। जब नदी में जल कम होता है तो उपधारा की गहराई अधिक होने के कारण उसमें अधिक जल जाता है। नदी की दिशा से उपधारा की दिशा तनिक बायें होने के कारण उसमें पत्थर और मिट्टी कम जाती है। जहाँ पर उपधारा मुख्यधारा से पुनः मिलती है, वहाँ पर धीरे धीरे नदी से उपधारा में बहकर आये पत्थर और मिट्टी जमा होता रहती है, इस कारण एक अस्थायी अवरोध बन जाता है। इस अवरोध के कारण मुख्यधारा में जाने वाले पानी की मात्रा कम हो जाती है। सारे पानी को उपधारा के बायीं ओर लम्बवत बनायी सिचाई नहर से प्रवाहित कर दिया जाता है। उपधारा के लम्बवत होने के कारण उस पर पत्थर और मिट्टी एकत्र नहीं होती है। इस व्यवस्था से गर्मी के समय लगभग ६० प्रतिशत जल सिचाई के लिये बनायी नहर में चला जाता है। 

मछली का मुख
जब वर्षा आती है तो मछली की पूँछ पर बने अस्थायी अवरोध बह जाते हैं। साथ ही सिंचाई नहर को जाने वाले मुँख की ऊँचाई भी बढ़ा दी जाती है। इसके लिये बड़े गोल पत्थरों को बाँस की रस्सी से लपेटकर लम्बी और बेलनाकार आकार बनाये जाते हैं और उन्हें रस्सियों के माध्यम से एक के ऊपर एक रखा जाता है। अपने आकार के कारण ये अस्थायी और पोरस दीवार की तरह कार्य करती है और तब सिचाई नहर में जाने वाले जल की मात्रा कम हो जाती है। मुख्यधारा और उपधारा दोनों ही शेष जल को बहा ले जाती हैं। इस व्यवस्था से वर्षा के समय ४० प्रतिशत से भी कम जल सिंचाई नहर में जाता है। साथ ही साथ पत्थर और मिट्टी भी सिचाई नहर में नहीं जा पाते हैं और सिंचित जलक्षेत्र बाढ़ के विभीषिका से मुक्त रहता है। इस व्यवस्था के साथ ही जल प्रवाह के प्रबंधन की अन्य कई उपव्यवस्थायें हैं और उसी के बल पर यह तन्त्र पिछले २२०० वर्षों से यथावत चल रहा है। इस पर कोई भी बड़ा निर्माण नहीं है और जिस प्राकृतिक विधि से जल और मिट्टी का पृथकीकरण किया गया है, आज के समय में वह स्वाभाविक व सरल लग सकती है पर उस समय के लिये यह निसंदेह एक अद्भुत उपलब्धि रही होगी।

मछली की पूँछ
जहाँ पर नदी, पर्वत, पेड़ और बादल एक साथ एकत्र हो जायें, प्रकृति अपने मद में रत हो जाती है। हम जब वहाँ पहुँचे, पानी बरस रहा था, हम लोग छाते निकाल कर चल रहे थे और प्रकृति के सुन्दर स्वरूप को निहारे जा रहे थे। यह दृश्य देखकर, दिन के प्रथम भाग में क्वेंगश्वेंग पर्वत के भ्रमण के पश्चात श्रान्त हुये तन में चेतना का पुनर्संचार हो गया। लगभग चार घंटे हम वहाँ घूमे, आनन्द आ गया। वहाँ के स्थानीय पर्यटकों के लिये यह अत्यन्त भ्रमणीय स्थल है, सब के सब अपने परिवारों के साथ यहाँ उपस्थित थे। निश्चिन्त समय बिताने के लिये यह उपयुक्त स्थान है, कहीं भी बैठ जायें और प्रकृति को निहारते रहें। युगल भी पर्याप्त संख्या में वहाँ थे, यहाँ से अधिक आकर्षक वातावरण उन्हें और कहाँ मिलेगा भला।

२०० वर्ष पुराना बोन्साई
इस स्थान को एक सांस्कृतिक स्थान के रूप में भी विकसित किया गया है। यहाँ पर कई मंदिर देखे, उसमें गये भी, पर जल के प्रवाह का प्रश्न जो मन में कुलबुला रहा था उस कारण किसी और तथ्य पर ध्यान नहीं दे पाया। २२०० वर्षों के इतिहास को वहाँ पर सजा कर रखा गया है। विस्तृत क्षेत्र में फैले १५-२० ऐसे मंदिर भवन हैं जहाँ पर घूमने जाया जा सकता है। पहाड़ों के ऊपर नदियों पर दृष्टि करते हुये कई भवन बने हुये थे। हम लोगों की बहुत इच्छा थी कि वहाँ चला जाये पर पूरा घूमने के लिये २-३ दिन और चाहिये थे। वहाँ जाने के बाद ही हम नीचे बहती उन्मुक्त नदी के प्रवाह का आलौकिक रूप देख सकते हैं।  यहाँ पर सब प्रकृतिमय लगता है, ज्ञान, विज्ञान, समाज और परिवेश। व्यक्ति को यहाँ पहुँचकर अपने मूल का आभास हो आता है। प्रकृति-पुरुष का संतुलन और प्रकृति का निश्चिन्त प्रवाह, यहाँ के हर दृश्य में व्यक्त है।


अगले ब्लॉग में चीन के बारे में शेष बातें।