22.10.26

एक गति हो, एक मति हो


नर-नारी की मान-प्रतिष्ठा, पाने नित अधिकार लड़ रही,

नवल, पुरातन पीढ़ी, पृथक विचार, पृथक व्यवहार लड़ रही,

भाषा लड़ती, वर्ण लड़ रहे, वर्ग विषमता द्वार चढ़ रही,

देश, प्रदेश, विशेष लड़ रहे, शेषतृषा आकार गढ़ रही ।


धर्म लड़े, बन हठी खड़े हैं, उस पर भी अब जाति लड़ी है,

सकल छोड़ कर, विकल होड़ पर, उपश्रेष्ठों की पाँति लड़ी है,

सबके बल पर, सबकी बलि पर, बढ़ जाने की ख्याति लड़ी है,

विविध विधा से विधिवत, सज्जित, लोलुपता हर भाँति लड़ी है ।


समय, ऊर्जा, सम्बन्धों का क्षय होना, हा असह्य अहा, 

सुख की चाह अभीप्सित हो पर, दुख का दर्पित दंश सहा,

स्वर होने थे एक प्रबलतम, कटुकर, कर्कश राग कहा,

किस समाज का रक्त, त्यक्त हो, मूल्यहीन बस व्यर्थ बहा।


एक रखा सदियों जिसने, वह सूत्र बढ़ाने को लड़ते,

गुणसूत्रों की प्रखर विरासत और चढ़ाने को लड़ते,

अडिग रहे पुरखे जो उनको, मान दिलाने को लड़ते,

पाला पोसा है, उस माँ का, श्रृंगार बचाने को लड़ते।


यदि हो समर्थ कुछ और तनिक, तो मन से आकर लोभ लड़े,

जो पूर्ण प्रतिज्ञा हो न सकीं, उसका विष व्यापित क्षोभ लड़े,

अपनों पर उमड़ा क्रोध लड़े और अहंकार का बोध लड़े,

अपनों से दूर करा बैठा, उस मद का मोहक मोद लड़े ।


यदि एक पंक्ति में खड़े रहे, तब शक्ति प्रबल पहचानोगे,

यदि निकटस्थों के हस्त गहे, सामर्थ्य असीमित जानोगे,

यदि कोटि कंठ स्वर एक कहें, घन गगन गहन गहरा दोगे,

यदि साथ रहे और साथ चले,  बल प्रबल, लहर लहरा दोगे।


नहीं छिटकन और विघटन,  नहीं अब कुछ और क्षति हो,

एक धड़कन, एक जीवन, बन चले सम्मिलित प्रगति हो,

गर्व, बल अग्रज सहित सब,  प्रेम, करुणा अनुज प्रति हो,

बस यही आग्रह सभी से, एक गति हो, एक मति हो।

16.9.26

फण तान, तान फण, कुटिल व्याल


कर वमन प्रसंचित विष कराल।

फण तान, तान फण, कुटिल व्याल।।


है दम्भ, नहीं इन ग्वालों ने,

सज्जन गोवंश सुपालों ने,

सब देखा पर, कुछ नहीं कहा,

उत्पात तुम्हारा शान्त सहा,

दूषित यमुना की धवल धार,

उस पर पोषित घन अहंकार,

अब दीर्घ प्रतीक्षा अन्तप्राय, आ पहुँचा तेरा न्याय काल।

फण तान, तान फण, कुटिल व्याल।।१।।


जीवन  छीने, आश्रय वंचित,

आतंक विकटतम सर्वविदित,

रण त्यक्त दिशायें, लिपट लिपट,

फण फैल गये थे निष्कंटक,

स्तुतियाँ, सब स्वर रहे व्यर्थ,

क्षण चढ़कर अब आया समर्थ,

इन तड़ित तरंगित तालों पर, है निष्प्रभ तेरी चपल चाल।

फण तान, तान फण, कुटिल व्याल।।२।।


इस पंथ भटकना भूल नहीं,

था निश्चय मेरा मार्ग यहीं, 

जन आशायें, क्रम रहे बँधा,

बस जान, समय उतना ही था

आन्दोलित श्वास सधी सी थी,

इस पल की प्यास मुझे भी थी,

क्यों अकुलाये अब विकल विकट, घट पापों का विस्तृत विशाल,

फण तान, तान फण, कुटिल व्याल।।३।।


गोपालों की इच्छा न थी,

कुख्याति बसी इतनी गहरी, 

भयग्रस्त और सकुचाये सब,

कन्दुक पर दौड़ लगाये सब,

जो नियत कर रहा सबकी गति,

संभवतः विधि की यही नियति,

कन्दुक हो जाती जल निमग्न, हतप्रभ सब देखें ग्वाल बाल,

फण तान, तान फण, कुटिल व्याल।।४।।


बस कर्म सरल करते तुम भी,

वापस कर देते जिनकी थी,

जो वस्तु उसी को लौटाते,

इतना संयम तो दिखलाते,

जल, धरा, शान्ति, सम्मान गहा,

धमकाना एकल कार्य रहा,

बस वापस माँग रहे जन को, आतंकित करते फण अराल,

फण तान, तान फण, कुटिल व्याल।।५।।


कातरता पूर्ण दृष्टि सबकी,

बन प्रश्न चुभी मुझ पर ही थी,

आग्रह मेरा था आने का,

प्रस्तुत कर्तव्य निभाने का,

था कूदा अपने कार्य निहित,

झगड़े का भाव नहीं किंचित,

तब क्यों था डसने का प्रयास, क्यों फैलाया तब जकड़ जाल,

फण तान, तान फण, कुटिल व्याल।।६।।


जब ललकारा है अनायास,

बालक जाना है, प्रकट हास,

है खड़ा बड़ी बाधा बनकर,

अपने मद की नद में तनकर,

तो कार्य रहा बस यही शेष,

तेरे अन्तर में कर प्रवेश,

तेरे ही शोणित से निश्चय, सीचूँगा तेरा तपित भाल,

फण तान, तान फण, कुटिल व्याल।।७।।


अब नहीं लगे किंचित क्षण भर, 

चढ़ गया देख तेरे फण पर,

मर्दन का नृत्य दिखाऊँगा,

वंशी से अलख जगाऊँगा,

विश्वास और अवलम्बन की,

आश्रय आकांक्षित जीवन की,

वंशी का स्वर संकेत सकल, है वृन्दावन का द्वारपाल,

फण तान, तान फण, कुटिल व्याल।।८।।


(ये पंक्तियाँ राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर के गीत "तान तान फण व्याल, कि तुझ पर मैं बाँसुरी बजाऊँ" से प्रेरित है। जहाँ दिनकर ने बाँसुरी के स्वरों से कई कल्पों को साधा है, मेरा प्रयास कृष्ण से कालिया के हुये संवाद तक ही सीमित है)

11.8.26

मैं भोग रहा या स्वयं भुक्त


न कर्मबन्ध, न संस्कार,

न चित्तवृत्ति, न क्लेश पार,

उस ओर अकेले बैठ गया,

मेरा परिचय ही निर्विकार।


न विषय रमण, न झंकृत मन,

न सुख साधन पर सतत मनन,

किस आगत के असमंजस में,

पथ सृजन शून्य, जग निर्जन वन।


न मति विरुद्ध, न भाव क्रुद्ध,

न बंध जटिल, न कंठ रुद्ध,

आलम्बन के एकाग्र क्षितिज, 

द्वन्द्व आलोड़न से विगत बुद्ध।


न शब्द पृथक, न पृथक ज्ञान,

न अर्थ पृथक, अनुभव प्रधान,

सब सम्मिलित होकर हुये एक,

संयम ने साधे समाधान।


न विलग पूर्ण, न पूर्ण विलय,

न बाधित क्रम, अवगुंठित लय,

जगती प्रवाह, पर स्थिर मन,

स्थिर गति, स्थिर हुआ समय।


न मुक्त रहा, न हुआ युक्त,

किस आकर्षण जीवन प्रयुक्त,

कारक, कर्ता, क्रम डोल रहे,

मैं भोग रहा या स्वयं भुक्त। 

14.7.26

वह क्षण भर है, पर जीवन है


गत क्षण मन जिस पर, लब्ध वही, आगत क्षण का प्रारब्ध वही,

इस गत आगत के मध्य व्यक्त, वह क्षण भर है, पर जीवन है।


स्मृति में छिटके भाव शेष, कल्पित अघटित, सम्भाव्य शेष,

है सब स्वाहा, क्षमता मन की, वह क्षण भर है, पर जीवन है।


अनगिन आकर्षण क्षेत्र बने, आते अन्तर्गत, नेत्र घने, 

मन का विशेष से जुड़ जाना, वह क्षण भर है, पर जीवन है।


जब सुप्त रहे, सब रहा रिक्त, किस गत भ्रमवत, बह गया चित्त, 

यह शून्य-सकल सम्पर्क बिन्दु, वह क्षण भर है, पर जीवन है।


एक क्षण आया, जीवन गतिमय, दूजा, सब गतियाँ, पूर्ण विलय,

दो क्षण भीतर, है पृथक पृथक, क्षण क्षण भर है, पर जीवन है।