1.5.16

उद्वेग

अकेले बैठता हूँ, तो विचारों के बवंडर, शान्त मन को घेर लेते हैं ।
मैं कितना जूझता हूँ, किन्तु फिर डूबता हूँ, मैं निराशा की नदी में ।
अगर मैं छोड़ता हूँ, स्वयं को मन के सहारे, आत्म का अस्तित्व खोता हूँ ।
कभी कुछ सोचता हूँ, शीघ्र छिप जाती समस्या, पर विवादों के प्रवाहों में ।।

करूँ क्या मैं, कहूँ कैसे, और किसको ही बता दूँ ।
और कैसे हृदय के उद्वेग को निश्चित दिशा दूँ ।।

न जाने क्यों जो स्थिर था, वही विश्वास हिलता है ।
मुझे क्यों हर तरफ ही विरह का विस्तार दिखता है ।।


24.4.16

मातृ-श्रृंगार

टूटने पाये न संस्कृति,
टूटने पाये न गरिमा ।
काल है यह संक्रमण का,
प्रिय सदा यह याद रखना ।।

वृहद था आधार जिसका,
वृक्ष अब वह कट रहा है ।
प्रेम का विस्तार भी अब,
स्वार्थरत हो बट रहा है ।।

चमकती थी कान्ति की 
आभा सतत माँ के नयन से ।
आज फिर वह चमक सारी,
विमुख क्यों है उन्नयन से ।।

आओ माँ का रूप मित्रों,
करें गौरव से सुसज्जित।
नियम माँ के, जो सनातन,
काल चरणों में समर्पित ।।

शत्रुता अपनी भुलाकर,
रक्त का रंग संघनित हो ।
पूर्व की अवहेलना अब,
अडिग अनुशासन जनित हो ।।

आज मिल आग्रह करें, 
यह चाह जीवन की बता दें,
मातृ का श्रृंगार करके,
सार्थक जीवन बिता दें ।

17.4.16

गन्तव्य

जीवन की अनचीन्ही राहें,
पार किये कितने चौराहे
फिर भी जाने क्यों उलझन में,
मैं पंछी अनभिज्ञ दिशा से ।।१।।

रोचक है, हर राह नयी जो,
उत्सुकता की बहती धारा
किन्तु सदा ही मौन प्रश्न पर,
पूछो क्या गन्तव्य हमारा ।।२।।


10.4.16

मन-राक्षस

दुनिया,
कुछ अधखुली मस्तिष्क-पटल पर,
करती है हर काम अपनी धुन पर ।
कुछ भी हो,
मैं भी हूँ दुनिया,
और प्राप्त हैं सारे अधिकार,
मानवीय, दैवीय, राक्षसीय आदि ।
आखिर हों भी क्यों न,
मैं भी उस धरती का पुत्र,
जिसने जन्म दिया कुछ राक्षसों को,
उनके लिये अवतरित किया,
भगवान को ।
लड़ाई हुयी और विजय मिली,
सत्य को ।

शायद कभी कभी ऐसा ही युद्ध होता है,
मेरे मन की पर्तों में ।
शायद बाहरी राक्षस,
विजय पाना चाहते हों,
मन के देवता पर,
क्योंकि मन तो निर्मल है ।
और यदि होती है हार,
तो विजय पाकर राक्षस,
मन को करता दूषित, बेकार,
और इस तरह,
निर्माण होता है, एक नये राक्षस का ।
वह भी अपनी धुन में सवार,
आक्रमण हेतु खोजता है शिकार ।

3.4.16

संस्कृति

गूँजतीं हैं प्रतिध्वनियाँ,
वेद की शाश्वत ऋचायें,
अनवरत बहती रहेंगी,
वृहद संस्कृति की विधायें ।।

आज कुछ राक्षस घिनौने,
भ्रमों के आधार लेकर,
युगों के निर्मित भवन को,
ध्वस्त करना चाहते हैं ।।

यदि विचारा, यह धरातल तोड़ दोगे,
सत्य मानो कल्पना छलती तुम्हें है ।
ध्वंस का विश्वास मरकर ही रहा है,
वह जिया यदि, मात्र स्वप्नों के भवन में ।।

व्यर्थ की हठधर्मिता को,
कहीं जीवन में उतारा,
लिये हमने मातृ रक्षा के वचन हैं,
रही संचित वीरता की पूर्व गरिमा ।

रक्त का आवेश अन्दर से उठेगा,
और फूटेगा हृदय से अनल जीवट,
प्रबल विष में उफनते आघात होंगे,
जो करेंगे भस्म अनुचित गर्व तेरा ।

काल के विस्तृत पटल पर,
हैं विजय के शब्द अंकित ।