20.9.14

जीवन गाथा

उदित हुआ जीवन, नूतन मन
उद्वेगित, उत्साह भरा तन ।
भावनायें परिशुद्ध हृदय की,
आस भरी जीवन की गगरी ।।१।।

यात्रा बढ़ती, थी सुखद राह,
ऊर्जस्वित जीवन का प्रवाह ।
विस्तार सिमटते, पग बढ़ते,
मन-निश्चय हम पूरा करते ।।२।।

मदमाती वेला उत्सव की,
झूमे मन, देह, सफलता थी ।
रुक एक छाँह विश्राम करें,
फिर से मन में उत्साह भरें ।।३।।

आगामी आँधी का प्रवेग,
पर काल क्षितिज में छिपा एक ।
थी नहीं कोई चिन्ता दिखती,
निश्चिन्त आस मन में रहती ।।४।।

स्वप्नपूर्ण मन, सोये थे हम,
आयी आँधी, वेग प्रबलतम ।
राह लुप्त, राही सब भटके,
सकल ओर भीषणतम तम थे ।।५।।

जीवन का अस्तित्व कष्टमय,
स्थिर सब, बहता रहता भय ।
दिशा भ्रमित मन, लक्ष्य भूलता,
काल रुका स्तब्ध घूरता ।।६।।

बीती रात, संग दुख बीते,
हुआ प्रभात, सूर्य रण जीते ।
वेग शान्त होता मारुत का,
सकल दिख रही पूर्ण व्यवस्था ।।७।।

प्यास बुझाती बूँदें बरसीं,
मन की सब आशायें हरषीं ।
तब भूल सहज कल का प्रकरण,
कर लक्ष्य दिशा बढ़ गये चरण ।।८।।

17.9.14

आहुति बन प्रस्तुत होता हूँ

नहीं और कुछ ज्ञात मुझे, पाता प्रियतम, सुध खोता हूँ 
फल बरसायें यज्ञ तुम्हे, आहुति बन प्रस्तुत होता हूँ ।।

फूल सदृश लगते काँटे,
श्रृंगारित तुमको कर पाता ।
आँसू भी अमृत बन जाते,
तेरी पीड़ा यदि पी जाता ।
तेरा मन कूजे उत्श्रंखल, मैं व्यथा अनवरत ढोता हूँ ।
फल बरसायें यज्ञ तुम्हे, आहुति बन प्रस्तुत होता हूँ ।।१।।

प्रेम नहीं व्यापार-जगत,
इसमें देना ही देना है ।
हृदय-तरी, प्रियतम शोभित,
फिर बड़े यत्न से खेना है ।
सींच रहा मन-भावों से, मैं बीज प्रेम के बोता हूँ ।
फल बरसायें यज्ञ तुम्हे, आहुति बन प्रस्तुत होता हूँ ।।२।।

त्याग, समर्पण में जीवन,
थक सकता है, खो सकता है ।
प्रत्याशा या अभिलाषा,
मन अकुलाये, हो सकता है ।
हो न प्राप्त अधिकारों को, यह आशा हृदय सँजोता हूँ ।
फल बरसायें यज्ञ तुम्हे, आहुति बन प्रस्तुत होता हूँ ।।३।।

13.9.14

हृदय को तुम भा रही हो

प्रणय की और प्रेरणा की
मूर्ति बनती जा रही हो ।
पंथ की छाया बनी हो,
हृदय को तुम भा रही हो ।।

कोई आकर पूछ ले परिचय तुम्हारा,
जीवनी में पिरोकर अस्तित्व सारा । 
प्रेम की अभिव्यक्ति को, तुम कर्म-सुर में गा रही हो ।
हृदय को तुम भा रही हो ।।१।।

ओट में मन-कल्पना की, और सिमटकर,
रही अब तक स्वप्न-महलों से निकल कर ।
पास आकर, स्वप्न-जल-तल में डुबोती जा रही हो ।
हृदय को तुम भा रही हो ।।२।।

बिसारे अस्तित्व का क्रन्दन भुलाने,
प्रेम-पूरित राग फिर से गुनगुनाने ।
प्रतीक्षित थी, आस-पूरित, जीवनी बन आ रही हो ।
हृदय को तुम भा रही हो ।।३।।

छेड़ती उन्माद से मन की तहों को,
सरसता बिन बीत जाती जीवनी को ।
मधुर सी कविता बनाकर, बाँचती तुम जा रही हो ।
हृदय को तुम भा रही हो ।।४।।

स्वार्थ-पूरित पंक और तुम कमल-दल सी,
खिल रही निश्चिन्त, जीवन में उमड़ती ।
मुस्कराती,प्रेम की, आकृति बनाती जा रही हो ।
हृदय को तुम भा रही हो ।।५।।

सहजता चहुँ ओर डूबी प्रचुर मद में,
आत्म-केन्द्रित जनों से परिपूर्ण जग में ।
अहम्‌ तजकर, प्रेम के, अनुरूप ढलती जा रही हो ।
हृदय को तुम भा रही हो ।।६।।

उमंगों से रिक्त, सूने उपवनों में,
चेतना यदि सुप्त, एकाकी क्षणों में ।
चहकती तुम, प्रेम-पोषित, हृदय को बहका रही हो ।
हृदय को तुम भा रही हो ।।७।।

सोचता हूँ, और मेरा क्या अभीप्सित,
प्रश्न का विस्तार यदि होता असीमित ।
उत्तरों की डोर पकड़े, क्षितिज तक ले जा रही हो ।
हृदय को तुम भा रही हो ।।८।।

दूत बनकर आयी कष्टों को मिटाने,
किन्तु उपजे विरह का संकट हटाने ।
अब सनातन-संगिनी बन, साथ चलती जा रही हो ।
हृदय को तुम भा रही हो ।।९।।

10.9.14

संबंधों के पथ

बड़े अजब संबंधों के पथ,
पल में गदगद, पल में लथपथ,
सारा तो संसार वही है,
दिन वैसा है, रात वही है,
धरती वैसी, वही नील नभ
वही रहे हम, बदले थे कब,
यह रहस्य पर समझ न आये,
कोई यह गुत्थी सुलझाये,
हम भी हतप्रभ, तुम भी हतप्रभ, 
मन ने चाहा, सुधर गया सब।

6.9.14

मातृत्व

मिलता रहता अन्न धरा से,
जल बन जीवन-अमृत बरसे,
फल बोझों से झुकते तरुवर,
प्राण-वायु और औषधि पाकर,
खातेपीते इस धरती परहम जीतेसुख से रहते हैं 
प्यार भरा वात्सल्य सततमातृत्व इसी को कहते हैं ।।१।।

नील-जलधि काबहती नद का,
ऊपर फैले विस्तृत नभ का,
रसरंगों से लदे हुये वन,
आश्रय धरतीआश्रित हैं हम,
हिम आच्छादित शैलमध्य मेंसुन्दर झरने बहते हैं 
छिटकाती सौन्दर्य पूर्णमातृत्व इसी को कहते हैं ।।२।।

प्राप्त तत्व सारे आवश्यक,
तनमन हित सौन्दर्य-प्रदायक,
माणिकमोतीसोनाचाँदी,
रत्नाभूषण ला दे जाती,
मन हुलसाती सोंधी माटीजीवन बन पुष्प महकते हैं 
लाकर देती श्रृंगार विविधमातृत्व इसी को कहते हैं ।।३।।