16.9.21

राम का निर्णय (पीड़ा)


माँ कौशल्या को लक्ष्य कर दिये गये तर्कों से लक्ष्मण ने धर्म और कुल के रक्षक के रूप में दशरथ पर प्रश्न उठा दिया था। लक्ष्मण के लिये पिता की न्यायप्रियता संशयात्मक सिद्ध कर अब उसका कारण देना आवश्यक हो गया था। दशरथ सदा ही धर्म और कुल की प्रतिष्ठा के वाहक रहे हैं और उन्होंने कभी भी जन सामान्य को इसका अवसर नहीं दिया है कि उनके लिये हुये निर्णयों में कोई न्यूनता दिखा सके। सभा में आये किसी प्रश्न पर सबकी मन्त्रणा सुनकर और अन्त में गुरु वशिष्ठ से धर्म की गूढ़ व्याख्या समाहित कर निर्णय लेने के क्रम ने दशरथ की छवि एक सुदृढ़ धर्मपालक के रूप में स्थापित कर दी थी। संभवतः प्रक्रिया का प्रभाव था कि धर्मशास्त्रों में वर्णित समस्त पक्ष निर्णय लेने में विश्लेषित किये जाते थे। राम को युवराज बनाने का निर्णय भी दशरथ ने इसी प्रकार लिया था, सभा के सभी मन्त्रियों ने और और गुरु वशिष्ठ ने उसका समर्थन किया था।


राजा बद्ध होता है उन आधारों पर जिन पर आधारित प्रशासन व्यवस्था की सहमति उसने अपनी प्रजा से की होती है। राज्य के संचलन और राजधर्म के निर्वहन का आधार उदात्त वैदिक सिद्धान्त रहे हैं जिसमें सबको समाहित कर लेने की मन्त्र सर्वत्र विद्यमान हैं। जन, पशु, वनस्पति, सबके प्रति तो न्याय के सूत्र संकलित हैं शास्त्रों में। इस बारे में बहुधा संशय नहीं रहता है यदि फिर भी कोई विषम परिस्थिति सामने आती थी तो पूर्ववर्ती राजाओं द्वारा लिये गये निर्णय एक संदर्भ के रूप में कार्य करते थे। सहत्रों वर्षों से प्रशासनिक और सामाजिक स्मृति में सतत संचित उन्हीं निर्णयों को कुल परम्परा का नाम दिया गया है। कुल परम्परा राज्य के लिये थी, परिवारों के लिये थी, गुरुकुलों के लिये थी। कुल परम्परा एक बौद्धिक धरोहर थी जो जीवन के मानदण्डों को तनिक भी गिरने नहीं देती थी।


लक्ष्मण को ज्ञात था कि व्यक्ति से बड़ा समाज, समाज से बड़ा राज्य होता है। व्यक्ति के रूप में लिये निर्णय यदि राज्य को प्रभावित करें तो वह दिशा और दशा अनर्थकारी हो जायेगी। राजा के रूप में लिये निर्णय यदि धर्म और कुल दोनों का ही अहित करें तो उनका औचित्य प्रश्न आमन्त्रित करता है। राम को युवराज बनाने का निर्णय प्रशासनिक प्रक्रिया से लिया गया था, उसमें सारे संबद्ध पक्षों से चर्चा की गयी थी। वहीं दूसरी ओर राम को वन भेजने का निर्णय पूर्णतया व्यक्तिगत था, वहाँ राजा दशरथ ने किसी से विमर्श क्यों नहीं किया?


लक्ष्मण कैकेयी के वरों के प्रति दशरथ के मौन समर्थन को एक व्यक्ति के रूप में लिया हुआ निर्णय मान रहे थे। इस परिप्रेक्ष्य में राजा दशरथ की विवशता और बाध्यता सर्वविदित थी। कोई उस अप्रिय सत्य को व्यक्त कर राजपरिवार का वातावरण भारी नहीं करना चाहता था। सब यही चाहते थे कि राजा की मानसिक विवशताओं का दुष्प्रभाव सीमित रहे। आज सहसा वह मानसिक दुर्बलता अपनी मर्यादा लाँघ कर राम पर, राज्य पर, धर्म पर और कुल के मान पर चढ़ी आ रही है। अब यह आवश्यक हो गया है कि उस सत्य को कहा जाये।


आज तो सत्य का दिन ही कहा जायेगा, कैकेयी का सत्य प्रकट हुआ, दशरथ की विवशता का सत्य प्रकट हुआ और अभी कुछ क्षण पहले माँ कौशल्या ने भी राजपरिवार में चली आ रही प्रतिस्पर्धात्मक वेदनीय स्थितियों का सत्य प्रकट हुआ। यद्यपि बड़ी माँ ने इस बारे में अधिक कुछ नहीं कहा पर सत्य तो प्रकट हो ही गया आज, कहाँ छिप सका। प्रबल वेदना के क्षणों में यह विशेष सामर्थ्य होती है कि वे सत्य को पिघला कर सामने ला देते हैं। लक्ष्मण ने भी मन में वर्षों से रखे सत्य को स्पष्ट रूप से व्यक्त करने का निश्चय किया। लक्ष्मण जानते थे उनके द्वारा व्यक्त सत्य माँ कौशल्या के प्रति भी संवेदना प्रकट करेगा। भैया राम से पिता की निंदा या दोष-कथन करना अमर्यादित होगा। माँ से ही पिता के दोषों को कहा जा सकता है। यह विचार कर और बड़ी माँ को ही लक्ष्य कर लक्ष्मण ने पुनः कहना प्रारम्भ किया।


बड़ी माँ, एक राजा के रूप में न सही पर एक पिता के रूप में पुत्र की रक्षा का दायित्व भी तो महाराज का है। पुत्र के साथ अन्याय हो और पिता उसका प्रतिकार न कर पाये, यह व्यक्तित्व की विवशता को दिखाता है। कौन सी ऐसी महत्वपूर्ण बात है जिसके कारण पिता अपने पुत्र को योगक्षेम सुनिश्चित नहीं कर पा रहे हैं। पुत्र जो उनका प्रिय है, आज्ञाकारी है, सुशील है, सौम्य है, विनम्र है, मर्यादित है, उसकी भी रक्षा न कर पाने की विवशता क्यों है पिताजी को। 


बड़ी माँ, पिताजी कर्तव्य-अकर्तव्य का बोध खो बैठे हैं। एक तो वह वृद्ध हैं और उस पर भी विषयों ने उन्हें अपने वश में कर लिया है। इस स्थिति में माँ कैकेयी उनसे कुछ भी करा सकती है। यह निर्णय तो उस अविवेकी अवस्था का प्रारम्भ भर है। आगे क्या अनर्थ होने वाला है इसकी कल्पना करना कठिन है।


लक्ष्मण का सपाट और स्पष्ट रूप से पिता को कामी और स्त्रीवशी कहने से पहले से ही शोक डूबा परिवेश और भी स्तब्ध हो गया। इस विषय पर लक्ष्मण कुछ और भी कहना चाह रहे थे पर वह उन्हें आवश्यक नहीं लगा। सत्य यही था पर घोर अप्रिय होने के कारण माँ कौशल्या निश्चय रूप से आहत हुयी थी। मर्यादा लाँघ कर दूसरी ओर खड़े लक्ष्मण के लिये अप्रिय सत्य की पीड़ा को और बढ़ाना अनावश्यक लगा। आगे क्या करना है उस कर्म को सुनिश्चित कर लक्ष्मण राम से प्रार्थना की।  


भैया, प्रतिज्ञा की बात या वन जाने की बात किसी और को ज्ञात नहीं है। राज्य की बागडोर अपने हाथों में ले लो। इस विषय में जो भी भरत का पक्ष लेगा, मैं उसका वध कर दूँगा, वह भले ही पिताजी ही क्यों न हों। 


लक्ष्मण क्रोध में थे, युद्ध की स्थिति में पिताजी को भी मार डालने तक को तैयार हो जाने की मनःस्थिति सामान्य नहीं थी। लक्ष्मण के भीतर का दुख विस्फोटित हो चुका था। राम को अब कुछ कहना आवश्यक था।

14.9.21

राम का निर्णय(मूल प्रश्न)


लक्ष्मण के पास अपनी बात प्रारम्भ करने के लिये दो विकल्प थे। पहला था राम से अपने स्नेह का आधार लेकर उनसे प्रार्थना करना कि राम वन न जायें। इस विकल्प में समस्या यह थी कि राम निर्णय ले चुके थे। माँ कौशल्या की स्पष्ट आज्ञा को भी आदरपूर्वक मना कर चुके थे, अपनी नितान्त अक्षमता दिखा चुके थे। धर्म, कुल और पिता के मान की विवशता का तर्क माँ को आश्वस्त न कर सका था, फिर भी माँ कौशल्या ने राम के वनगमन के निर्णय को भारी मन से स्वीकार कर लिया था। सामान्य परिस्थितियों में राम अपने अनुज की मंत्रणा का मान रखते हैं और यदि निर्णय नहीं लिया हो या निष्कर्षों में अधिक अन्तर नहीं हो तो स्वीकार भी कर लेते हैं।


आज परिस्थितियाँ भिन्न थीं। अनुज के रूप में किये अनुनय विनय के प्रयासों के फलित होने की संभावना शून्य ही थी। समझने के लिये मन का मृदुल होना आवश्यक था किन्तु राम अपने कठोर निर्णय से हृदय को वज्रवत किये बैठे थे। उसे भेद पाना या उसका प्रयत्न भी कर पाना लक्ष्मण के सामर्थ्य के बाहर था। साथ ही अनुनय विनय में समय अधिक लगने की संभावना थी। राम को अभी सीता के पास जाना है, उनके पास लम्बी मंत्रणा का समय तो कदापि नहीं है। जो भी कहना होगा लक्ष्मण को कठोर आवरण भेदने के लिये कहना होगा, सब अल्प समय में कहना होगा।


धर्म, कुल और पिता के मान पर राम के तर्कों पर माँ कौशल्या ने तो कुछ नहीं कहा पर लक्ष्मण को उन तर्कों में असंगतियाँ ही दिखीं। लक्ष्मण को इनको ही खण्डित करने में अपना दूसरा विकल्प दिखा। न्याय की परम्परा है कि तर्क को तर्क से ही खण्डित करना होता है। यद्यपि तथ्य कठोर होने वाले थे, व्यक्तिगत रूप से आहत करने वाले थे। पर मात्र इस कारण से ही उनको हृदय में ही रखकर व्यक्त न किया जाये, अब इसका समय नहीं था। मर्यादा तनिक भंग हो भी जाये पर सत्य तो उद्भाषित होना ही चाहिये। लक्ष्मण ने निश्चय किया कि उन्हें निर्णय की प्रक्रिया पर भी प्रश्न उठाने होंगे।


लक्ष्मण बोलना प्रारम्भ करते हैं। राम तो पहले ही लक्ष्मण के शब्दों की प्रतीक्षा कर रहे थे, माँ कौशल्या भी आशान्वित हुयी कि संभवतः लक्ष्मण अपने अग्रज को समझा पायें। पिछले कुछ वर्षों में राम के साथ यदि कोई सर्वाधिक रहा है तो वह लक्ष्मण है। पिछले कुछ वर्षों में राम किसी पर सर्वाधिक विश्वास करते हैं तो वह लक्ष्मण है। लक्ष्मण राम को अपना आदर्श मानते हैं और सारी आज्ञाओं का अक्षरशः पालन करते हैं। राम भी लक्ष्मण को मान देते हैं और अपनी निर्णय प्रक्रियाओं में सम्मिलित करते हैं। माँ कौशल्या आशान्वित थी कि लक्ष्मण राम के मन की भाषा जानते हैं और उसी भाषा में राम को समझाने में सक्षम भी हो सकेगें। सहसा विचार श्रृंखला के भारीपन में माँ कौशल्या डूबने लगी, सोचने लगी कि पता नहीं क्या निष्कर्ष होगा, राम मानेंगे कि नहीं, राम अपना निर्णय बदलेंगे कि नहीं। अनिश्चितता के क्षणों से माँ कौशल्या सहसा बाहर आती है। सारी संभावनायें भुला कर, सारा विश्लेषण भुलाकर बस यह मनाती है कि किसी तरह लक्ष्मण राम को मना ले। ईश्वर लक्ष्मण को सारा वाककौशल प्रदान करे।


लक्ष्मण तनिक ठिठकते हैं, तर्कों को संवाद में संयोजित करने के क्रम में उनके मन में एक प्रश्न उठ खड़ा होता है। उहाप्रेरित मानसिक पूर्वाभ्यास इस प्रकार के दोषों को संवाद के पहले ही सामने ले आता है। वह अपने पिता के अन्यायपूर्ण आचरण पर प्रश्न करने वाले थे। संभवतः वह संवाद भ्राता राम को असहनीय होता और क्रोध उत्पन्न करता जो कि परवर्ती संवादों को भी निष्प्रभ कर सकता था। दूसरा पक्ष यह भी था कि भ्राता राम से माँ कौशल्या के सामने उनके पति की निंदा करना अनुचित लग रहा था। साथ ही उनके तर्क माँ कौशल्या को राम के द्वारा कहे धर्म, कुल और पिता के मान पर ही आधारित थे। यद्यपि बड़ी माँ विलाप करके शान्त हो गयी थीं पर तर्क तो उनको ही करने थे। किसी के वार्तालाप को इस प्रकार हस्तगत कर लेना अशोभनीय समझा जाता था। सहसा लक्ष्मण को कौंधता है कि क्यों न बड़ी माँ के सम्मुख ही अपनी बात रखूँ। बड़ी माँ को उनके तर्कों का बल मिलेगा और उनके तर्कों को बड़ी माँ की वरिष्ठता का सहारा। संभवतः भैया राम तब मान जायें। लक्ष्मण तब स्वर संयत कर कहते हैं।


बड़ी माँ, भ्राता राम का क्या अपराध है जो उन्हें इस प्रकार देश से निकाला जा रहा है? किस अधिकार से राम को वनवास दिया जा रहा है?  संवाद का प्रारम्भ मूल प्रश्न उठा रहा था और माँ कौशल्या से उठा रहा था। यहाँ लक्ष्मण मर्यादा का पालन भी कर रहे थे और अपनी कठोर बात का आधार भी तैयार कर रहे थे। लक्ष्मण आगे कहते हैं। आर्य राम सर्वप्रिय हैं, अयोध्या की प्रजा उनको हृदय से स्वीकार करती है और अत्यन्त प्रफुल्लित है कि राम सिंहासनारूढ़ हो रहे हैं। प्रजा को ज्ञात नहीं है कि उनकी आशाओं पर कुठाराघात करने के कारक कोई और नहीं वरन उनके ही राजा दशरथ हैं। 


नगर से निष्कासित करने का दण्ड तो उन अपराधियों और अधमों को दिया जाता है जो सर्वजन के लिये अहितकर हों और जिनके सुधरने की लेशमात्र भी आशा न हो। राजा स्वयं जानते हैं कि साधारणजन को भी यह दण्ड नहीं दिया जा सकता है। जब इस प्रकार का दण्ड किसी नगरवासी को नहीं दिया जा सकता तो राम को क्यों वनवास दिया जा रहा है? राम के प्रति अन्याय और प्रजा की आंकाक्षा के माध्यम से लक्ष्मण धीरे धीरे दशरथ की ओर लक्ष्य कर रहे थे। यह निर्णय धर्म के किस पक्ष से न्यायसंगत है। इसमें किसका हित हो रहा है?


रघुकुल में प्रतिज्ञा का महत्व है, दिये गये वचनों का महत्व है। कुल परम्परा के निर्वहन के लिये हम सदा ही दृढ़संकल्पित रहते हैं। राजा दशरथ ने कल ही तो प्रजा को वचन दिया था कि राम को युवराज बनायेंगे। आज वह वचन तोड़ा जा रहा है और उसे तोड़ने में जिन वचनों का आधार लिया जा रहा है, वे नितान्त व्यक्तिगत थे। राजा दशरथ ने अपनी प्राणरक्षा के लिये उन वरों को देने का वचन दिया था। उन वरों का आधार कृतज्ञता थी, उनका महत्व तात्कालिक था, न कि अवसरवादिता पर केन्द्रित। प्रजा को दिये वचन सार्वजनिक हैं, सबके हित में हैं, उनका महत्व और तात्कालिकता कैकेयी को दिये वचन से कहीं अधिक है। लक्ष्मण निर्णय लेने को प्रमुख आधार को ही आधारहीन कर रहे थे।


बड़ी माँ, कुल परम्परा तो यह भी है कि सदा ही अग्रज पुत्र युवराज बनते हैं। एक व्यक्तिगत वचन को कुल की प्रतिज्ञा मान कर शताब्दियों से चली आ रही और सबके द्वारा स्वीकार्य अक्षुण्ण कुल परम्परा की अवहेलना क्यों? यद्यपि लक्ष्मण दशरथ को ही लक्ष्य कर रहे थे पर अभी तक उनके व्यक्तिगत आचरण पर नहीं आये थे। किसी के निर्णय की आलोचना उतना आहत नहीं करती है जितनी किसी निर्णयकर्ता की आलोचना कर जाती है।


माँ कौशल्या लक्ष्मण के तर्कों से बल पा रही थी, शान्त खड़े राम समझ रहे थे कि लक्ष्मण आगे क्या कहेंगे?

11.9.21

जीवन-प्रश्न


भवन, भव्यता, निद्रासुख में,

व्यञ्जन का हो स्वादातुर मैं,

और मदों से पूर्ण जीवनी,

कामातुर यदि बहलाऊँगा ।

लज्जित खुद के न्याय क्षेत्र में,

पशु-विकसित मैं कहलाऊँगा ।।

 

देखो सब उस पथ जाते हैं ।

जाते हैं, सब खो जाते हैं ।।

 

अपनी जीवन-धारा को मैं,

सबके संग में क्यों बहने दूँ ।

व्यर्थ करूँ जीवन विशिष्ट क्यों ?

 

और जागरण के नादों में,

मूल्य कहाँ इन स्वप्नों का है ।

निश्चय मानो जीवन अपना,

उत्तर गहरे प्रश्नों का है ।।

9.9.21

राम का निर्णय (लक्ष्मण)

 

माँ कौशल्या आगे कुछ न कह सकी। पुत्र और पति, दोनों ही अपने निर्णयों के प्रति सदा ही दृढ़ रहे हैं। रघुकुल की परम्परा सामान्य मानवीय भावों से बढ़कर एक विशाल दुर्ग का रूप ले चुकी थी, उसके पार जाना अब रघुकुलमणियों के लिये भी असंभव है। सब अपने व्यक्तिगत उदाहरणों से उसकी ऊँचाई बढ़ाने में लगे हैं। राम के वन जाने का दुख अत्यन्त असह्य था। माँ राम को भी जानती थी। कठिन निर्णय ले चुके राम को आज मानसिक समर्थन की आवश्यकता थी। पुत्र से विरह का दुख सह लेगी पर माँ राम में दैन्यता के भाव नहीं आने देगी। माँ कौशल्या समाज के सम्मुख राम को दृढ़ देखना चाहती थी, किसी भी दीनता से परे। तदन्तर राम की उपेक्षा न करते हुये माँ कौशल्या कक्ष में ही एक शून्य ढूढ़कर शोकमना तकने लगती हैं।


लक्ष्मण के मन में विचारों का बवंडर हिलोरें ले रहा था। मर्यादा के अनुपालन में लक्ष्मण ने कभी कोई शिथिलता नहीं दिखायी है पर जब समय आया है और अनुमति दी गयी है तो मन के भाव स्पष्टता और समुचित प्रबलता से प्रकट किये हैं। आज प्रातः से लक्ष्मण शान्त थे, बस राम को रघुकुल पर आया संकट सम्हालते देख रहे थे। राम ने वन जाने का निर्णय ले लिया, माँ कैकेयी को सुना दिया, माँ कौशल्या को भी आश्वस्त कर दिया, पर अपने अनुज लक्ष्मण का पक्ष तो सुना ही नहीं। पहले भी किसी विशेष निर्णय को लेने से पूर्व राम लक्ष्मण के विचार अवश्य जान लेते थे, कभी कोई छूटा हुआ व्यवहारिक पक्ष जानने के लिये या कभी लक्ष्मण को उस विषय में शिक्षित करने के लिये या कभी  लक्ष्मण को समझाने के क्रम में अपनी निर्णय प्रक्रिया पुनर्वलोकित करने के लिये। आज का निर्णय भैया ने बिना कुछ कहे ले लिया, संभवतः वह इस निर्णय के अथाह भार से अपने अनुज को मुक्त रखना चाह रहे हों।


लक्ष्मण के पास कहने के लिये बहुत कुछ था। लक्ष्मण बचपन से ही राम के निकट रहे हैं, उन्हें भैया का स्नेहिल भाव खींच ले जाता है। राम के निर्णयों को उन्होंने निकटता से देखा है। देखा ही नहीं वरन लक्ष्मण ने उनसे बहुत कुछ सीखा भी है। राम के निर्णय सदा ही जन सामान्य से भिन्न रहे हैं। राम को कभी तात्कालिकता से बिद्ध नहीं देखा था, एक संयत दीर्घकालिक परिप्रेक्ष्य राम के निर्णयों का वैशिष्ट्य रहा है। न्याय, दर्शन, धर्म, नीति और सामाजिकता का अद्भुत संमिश्रण रही है, राम की निर्णय प्रक्रिया। बचपन में भी जीतती हुयी क्रीड़ा में सहज भाव से जानबूझ कर हार जाने की भैया राम की प्रवृत्ति लक्ष्मण को अचंभित कर जाती थी। खेल होता ही इसीलिये है कि उसमें जीता जाये और उस प्रसन्नता का उत्सव मनाया जाये। पर राम के उत्सव उस जीत हार की सीमित व्याख्या से बहुत बड़े रहे हैं। राम के लिये खेल के उत्साह से भी अधिक सम्बन्धों की ऊष्मा महत्वपूर्ण रही है, अपने अनुजों के प्रति स्नेह का भाव प्रखर रहा है। 


आज के निर्णय में भी लक्ष्मण को बचपन के ही राम दिख रहे हैं, भरत से राज्य को हार कर सम्बन्धों को बचाते हुये। आज के निर्णय में लक्ष्मण को न न्याय दिख रहा है, न धर्म दिख रहा है, न नीति दिख रही है और न ही सामाजिकता। लक्ष्मण का मन था कि माँ कैकेयी के सामने ही उनकी कुटिलता को अपने तर्कों से तार तार कर दें। लक्ष्मण वहीं पर ही अपने पिता को भी धिक्कारना चाहते थे। राम ने एक क्षण भी संवाद को अपने नियन्त्रण से बाहर जाने ही नहीं दिया, किसी और को, विशेषकर लक्ष्मण को अवसर ही नहीं दिया कि वह कुछ कह सकें।


अपने निर्णय को इतने स्पष्ट रूप से दोनों माताओं से सम्मुख घोषित कर राम ने लक्ष्मण के कार्य को अत्यन्त कठिन कर दिया था। लक्ष्मण मन में सतत सोच रहे थे कि किस प्रकार से वह अपने तर्कों को संयोजित करे जिससे वे भैया राम को निर्णय वापस लेने के लिये प्रभावित कर सके। राम के जो तर्क लक्ष्मण सुन चुके थे उनसे भिन्न और गहरे तर्क लक्ष्मण को प्रस्तुत करने थे। इस बात की संभावना कम थी कि राम अपना निर्णय बदलेंगे पर लक्ष्मण अपनी बात कहने से स्वयं को आज रोकेंगे नहीं।


माँ कौशल्या के शोक में गहरी श्वास लेकर निश्चेष्ट शान्त बैठ जाने के पश्चात कक्ष में स्तब्धता छा गयी। संभवतः यही अवसर था लक्ष्मण के पास राम से अपनी बात कहने का। लक्ष्मण राम को ओर अनुमति हेतु निहारते हैं, राम समझ जाते हैं कि अब लक्ष्मण को अधिक रोक पाना संभव नहीं होगा। राम को इस बात का अनुमान अवश्य था कि लक्ष्मण के तर्क प्रबल होंगे, उनमें व्यवहारिकता और मनोविज्ञान भरा होगा, आवेश के भी अंश होंगे, पर सब कह लेने के पश्चात लक्ष्मण करेंगे वही जो राम समझायेंगे। राम यह मानते थे कि निर्णय लेते समय मन की बात कहना उचित है, सभी पक्ष उजागर करना आवश्यक है। किन्तु जब एक बार सारे विकल्पों को तौल कर निर्णय ले दिया जाता है तो सभी को अपने सुझाये विकल्प के प्रति अनुराग तज कर उसे स्वीकार करना चाहिये, भयवश नहीं, नीतिवश। लक्षमण के संशय आधारभूत रहते हैं। लक्ष्मण के दृष्टिकोण तनिक भिन्न अवश्य रहते हैं पर एक बार धर्म की दिशा पा जाने के बाद स्वयं को परिवर्धित कर सकने की सामर्थ्य भी रखते हैं।


सदा ही राम को लगता था कि लक्ष्मण के प्रश्न, लघु संशय और व्यवहारिक दृष्टिकोण उनके निर्णय की गुणवत्ता बढ़ा जाते हैं। आज क्या संवाद होगा और उसका निर्णय पर कितना प्रभाव पड़ सकेगा, इस बात का पूर्वानुमान होने के बाद भी लक्ष्मण को अपनी बात दृढ़ता से रखने का अवसर देना चाहते थे राम। अपने निर्णयों में लक्ष्मण का आधार राम को सदा ही आवश्यक लगा है और उसकी आवश्यकता कहीं अधिक थी।


राम संकेत देते हैं, लक्ष्मण आगे बढ़कर राम के चरण पकड़ लेते हैं। इस प्रकार चरण गहना स्पर्शमात्र के भाव से कहीं अधिक संघनित संप्रेषण था। दो भाव स्पष्ट थे। पहला, राम के कठिन निर्णय के प्रति भाई की संवेदना। दूसरा, इस निर्णय के संदर्भ में कठोर और स्पष्ट वचन बोलने की अनुमति। लक्ष्मण राम के निर्णय को उचित नहीं मान रहे थे पर लिये गये निर्णय की महानता के प्रति भीतर से द्रवित भी थे।


राम लक्ष्मण को उठाकर गले से लगा लेते हैं। लक्ष्मण गाम्भीर्य में पूर्णतया डूबे थे और नहीं चाहते थे कि अश्रु उनकी तर्क श्रृंखला को अव्यवस्थित कर दें। राम के स्पंद लक्ष्मण को आश्वासन दे रहे थे, अपनी बात स्पष्ट रखने के लिये। राम के स्पंद यह विश्वास दे रहे थे कि आज कठोरतम बातें भी सहर्ष सुनी जायेंगी। राम के स्पंद लक्ष्मण की ऊर्जा बढ़ा रहे थे।

7.9.21

राम का निर्णय (कौशल्या)


राम के लिये वे क्षण प्रबल और अनियन्त्रित उथलपुथल में बीते। पिता का शोक और नैराश्य, माँ कैकेयी का अविश्वास और रुक्षता, भरत के असमंजस की आगत स्थिति, लक्ष्मण का क्रोध, सीता को होने वाला विरह का अपार दुख, वनवास की रूपरेखा और उस पर माँ कौशल्या का मूर्छित हो जाना। राम को इस प्रकार बद्ध होना स्वीकार नहीं था। उनका प्रथम प्रयास रहता था कि किस प्रकार परिस्थियों की विषमता में मन का समत्व प्राप्त किया जाये। यद्यपि गुरु वशिष्ठ के इस सिद्धान्त का अनुप्रयोग सरल परिस्थितियों में कई बार कर चुके थे राम, पर आज का प्रश्न जटिलतम था। भावनाओं में बहकर राम को निर्णय लेना स्वीकार नहीं था, राम सदा ही स्थिर बुद्धि से निर्णय लेना चाहते थे। आज भावनाओं का ज्वार प्रबलतम था, आज राम के हृदय की कठिनतम परीक्षा थी।


माँ की चेतना लौटती है, राम को सम्मुख और निकट पा एक स्वाभाविक सी प्रसन्नता हृदय में आती है पर तभी स्मृतियों का झोंका सहसा उन्हें करुण कर जाता है, अश्रु पुनः बहने लगते हैं। “माँ” कहते हैं राम और वह स्वर कुछ आग्रह कर रहा होता है अपनी माँ से। बचपन से ही पुत्र का वह एक स्वर अत्यन्त विशेष रहता है अपनी माँ से, जब किसी वस्तु या अनुग्रह की चाह रहती है पुत्र हृदय में। आज न कोई व्यञ्जन चाहिये था राम को, आज न कोई अनुमति पानी थी राम को, आज न पिता तक कोई बात पहुँचाना चाहते थे राम। आज राम का स्वर अपनी माँ से अपने पुत्र के लिये विलाप न करने की भर का आग्रह कर रहा था।


कौशल्या राम के सर पर हाथ फेरती है और विलाप न करने का आग्रह स्वीकार कर शान्त हो जाती है। विचारों को संयत कर यह निश्चित करती है कि आज राम से मन के सारे भाव कह दूँगी, वह सारे कारण कह दूँगी जो वह वर्षों अपने हृदय में छिपाये रही। कौशल्या निश्चित कर चुकी थी कि आज वह माँ से अधिक महारानी और पूर्व राजपुत्री के रूप में बात करेगी। सब कुछ स्पष्ट बताने के लिये माँ कौशल्या वह छोर ढूढ़ रही थी, जहाँ से बात प्रारम्भ हो सके।


प्रिय राम, आपके जन्म ने मुझे जीवन में एक अपार सुख दिया है। आपके न आने तक मैं वन्ध्या होने का अभिशाप लिये जी रही थी। माँ के लिये पुत्र या पुत्री न होने का दुख अपार होता है। ईश्वर ने कृपा की, पिता ने यज्ञ किया और फलस्वरूप आप जैसा उपहार मुझे मिला। जीवन सच में सुख से परिपूर्ण हो गया था। किन्तु इस क्षण को सम्मुख पा ऐसा लग रहा है कि यदि मैं ही वन्ध्या होती तब भी सारे दुख झेल लेती और जीवन निर्वाह कर लेती। तुम जैसा पुत्र होने के बाद जो सुखानुभूति हुयी, अब वह ही साथ न रहे, वह अत्यन्त दुखदायी है, अपार पीड़ादायी है।


राम, एक ज्येष्ठतम रानी के रूप में जो कल्याण और सुख मेरे अधिकार में थे, वह मुझे मिले नहीं। राजमाता के रूप उस कमी को पूर्ण करने की आस मन में थी, पर अब तुम्हारे वन जाने से छोटी सौत के विदीर्ण करने वाले वचन मुझे सुनने पड़ेंगे। तुम्हारे यहाँ रहने पर भी जब मैं सौतों से तिरस्कृत रही हूँ, पता नहीं तुम्हारे जाने पर क्या होगा? मैं यहाँ अब नहीं रह सकती। मैं भी तुम्हारे साथ ही वन चलूँगी। बोलते बोलते माँ कौशल्या रुक गयी, मानो साथ जाने का निर्णय सभी दुखों को विराम देने वाला हो। 


राम भारी मन से अपनी माँ की पीड़ा सुन रहे थे। अधिकारों के इस विश्व में न जाने कौन सा अभाव मन बिद्ध कर जाये। मन में वर्षों से चुभी व छिपी बातें और उस पर भी व्यक्तिगत व सामाजिक मौन? राम को यह समीकरण ज्ञात थे पर यह बातें कभी कही नहीं गयीं। राजपरिवारों के दुख भौतिक आवश्यकताओं के नहीं वरन मानसिक अधिकारों के होते हैं। कौशल्या को भी लगा कि उनका व्यक्तिगत दुख है, उसमें पुत्र को क्यों व्यथित करना? माँ कौशल्या ने पत्नी के अधिकार के विषय को सहसा बन्द कर दिया। माँ के अधिकारों का स्मरण कर पुनः बोलना प्रारम्भ किया।


प्रिय राम, माता की सेवा करना तुम्हारा धर्म है, तुम वह करो। वन जाने से वह तुम्हारे लिये सम्भव नहीं होगा, अतः वन मत जाओ। तुम्हारे पिता का तुम पर जितना अधिकार है, उतना ही अधिकार माँ के रूप में मेरा भी है। उस अधिकार से मैं तुम्हें आज्ञा देती हूँ कि तुम वन नहीं जाओगे, राम। यदि तुम फिर भी नहीं मानते हो और अपने पिता की प्रतिज्ञा को माँ से अधिक मान देते हो तो मैं तुम्हारे साथ चलूँगी जिससे तुम मेरी सेवा कर सको। यदि फिर भी तुम मुझे छोड़कर वन गये तो मैं प्राण त्याग दूँगी और उसका सारा दोष और पाप तुम पर लगेगा।


राम इस तर्क श्रृंखला के बारे में विचार कर के नहीं आये थे। माँ ने कभी इस प्रकार अधिकार नहीं जताया। माँ आज तर्कों को यथासम्भव हर प्रकार से जोड़कर प्रस्तुत कर रही है। माँ का हृदय किसी तरह से अपने पुत्र को रोकना चाह रहा है। राम यह तथ्य समझ तो रहे थे पर यह नहीं सोच पा रहे थे कि किस तरह माँ को समझाया जाये और उनका शोक कम किया जाये। राम के उत्तर देने में आये एक क्षणिक से विराम से माँ की आशायें बढ़ चली थीं पर वह हृदय से जानती थीं कि राम हर पक्ष को भलीभाँति विचार कर ही निर्णय लेते हैं। यदि निर्णय ले लिया है तो उसे अकाट्य तर्क, धर्म संदर्भ और सरल संवाद से व्यक्त भी करेंगे।


राम ने माँ को हाथ जोड़कर पुनः प्रणाम किया और इस प्रकार बोले। माँ, मुझमें पिता की आज्ञा का उल्लंघन करने की शक्ति नहीं है। पिता की आज्ञा के लिये कण्डु ने गाय के, परशुराम ने माँ के, सगर के पुत्रों ने स्वयं के प्राणों की आहुति दी थी। वन मुझे जाना होगा माँ। बस चौदह वर्ष में मैं प्रतिज्ञा पूरी करके लौट आऊँगा और आपकी सेवा का कर्तव्य दुगने प्रयास से पूरा करूँगा। जहाँ तक आपके जाने का प्रश्न है तो वह धर्मसम्मत नहीं है। पति के जीवित होने तक उसके ही साथ रहने का वचन आपको निभाना है। और इस समय तो पिता के विदीर्ण हृदय को सर्वाधिक आवश्यकता आपकी है। आपको ही तो उनके दुख को भी शान्त करना है।


माँ का मन होता है कि मानता नहीं है। अश्रुपूरित माँ वन साथ न चलने के कारण अस्वीकार कर अपनी असहायता और दीनता प्रस्तुत करना चाह रही थी। राम इस प्रकार बार बार रोके जाने पर मन में ही आवेश में भर रहे थे।


यह विषम स्थिति भाँप कर लक्ष्मण ने क्रोध को संयत किया और राम को विमर्श देने की आज्ञा माँगी। राम जानते थे कि लक्ष्मण के हृदय में एक उथलपुथल चल रही है और उसे बाहर आना आवश्यक है। राम लक्ष्मण को अपनी बात कहने के लिये संकेत देते हैं।