4.12.16

लेखकीय संतुलन

जब कभी लगता है कि लेखन में आनन्द नहीं आ रहा है तो लेखन कम हो जाता है। 

लेखन अपने आप में एक स्वयंसिद्ध प्रक्रिया नहीं है। इसके कई कारक और प्रभाव होते हैं। क्यों लिखा जाये, कैसे लिखा जाये और क्या लिखा जाये, ये मूल प्रश्न आठ वर्ष के ब्लॉग लेखन के बाद आज भी निर्लज्ज प्रस्तुत हो जाते हैं। लेखन के प्रभाव बिन्दु पठन के कारक होते हैं। क्यों पढ़ा जाये, क्या पढ़ा जाये, इस पर निर्भर करता है कि क्या लिखा जाये। जीवन में बहुधा लगता है कि केवल शुष्क ज्ञान ही ग्रहण हो रहा है और उसका कोई अनुशीलन नहीं हो रहा है। तब जीना प्रारम्भ हो जाता है, ज्ञान का व्यवहार बढ़ जाता है, पढ़ना कम हो जाता है, लिखना कम हो जाता है। जब सारगर्भित ज्ञान के सूत्र मिलने लगते हैं तो विस्तार से मन हट जाता है, सूत्रों और शब्दों पर ही मनन करने में दिन निकल जाते हैं, पढ़ना कम हो जाता है, लिखना कम हो जाता है। जब कभी गहराई मिलती है, सिद्धान्तों के सुलझाव समझ में आने लगते हैं, तब मात्र पढ़ते रहने का मन करने लगता है, लिखना कम हो जाता है।

तीन वर्ष पहले मन में एक भाव उठा कि एक पुस्तक लिखी जाये। विषय बहुत थे जिन पर लिखा जा सकता था, हल्के और भारी, दोनों ही विषय थे। कई मित्रों से चर्चा की। उसी क्रम में एक कठोर सुझाव भी आया। जब तक लिखने की उत्कट इच्छा न हो, तब तक पुस्तक न लिखें। मन के विचार और उनमें समाहित विविधता व्यक्त करने के लिये ब्लॉग एक सशक्त माध्यम है। यदि कुछ लिखना ही हो तो ऐसा लिखा जाये जिसमें कुछ वैशिष्ट्य हो। वह वैशिष्ट्य लाने के लिये स्तरीय अध्ययन आवश्यक है। अनुभव को एक बार ही व्यक्त किया जा सकता है क्योंकि कल्पना हर बार नव कलेवर ओढ़ कर नहीं आ सकती है। इस तथ्य पर पर्याप्त सोचने के बाद पुस्तक लिखने का विचार स्थगित कर दिया गया। जो विषय पुस्तक के बारे में सोचे थे, उन्हें भी चिन्तन की प्रथम पंक्ति से उठा कर पीछे बैठा दिया गया। सहसा लगा कि सभी विषयों ने विद्रोह सा कर दिया हो। न कोई नवविचार, न कोई रोचक दृष्टिकोण, स्तब्ध सी मनःस्थिति, लिखना कम हो गया। अच्छी बात पर यह रही कि पढ़ना कम नहीं हुआ।

यह सत्य है कि व्यस्तता रही, पर व्यस्तता के कारण नियमित लिखने का समय नहीं मिला, यह तथ्य तर्कपूर्ण नहीं लगा। बहुधा अच्छा लेखन व्यस्तता के समय में ही लिखा है, एक प्रवाह में, बहुत कम समय में। जब बलात लिखने का प्रयास होता है तो उतना ही लिखने में बहुत समय लग जाता है। पता नहीं क्यों, पर प्रवाह कम हो गया। उतना ही लिखने के लिये अधिक मानसिक श्रम करना पड़ता था, आनन्द की मात्रा कम होती गयी, लिखना कम होता गया। प्रवाह क्यों कम होता है, यह समझ नहीं आता है, पर जब प्रवाह कम हो जाता है तो कुछ समझ नहीं आता है।

स्वाध्याय के क्रम में जब प्राचीन ज्ञान को समझना प्रारम्भ किया तो दो विशेष तथ्यों से साक्षात्कार हुआ। पहला अनुबन्ध चतुष्ट्य और दूसरा सूत्र शैली।

अनुबन्ध चतुष्ट्य वे चार बन्धन हैं जिनका लेखक का अनुसरण करना पड़ता है। अनुसरण करने के लिये आवश्यक है कि उन्हें पुस्तक के प्रारम्भ में ही घोषित कर दिया जाये। भारतीय ज्ञान परंपरा में यह बन्धन एक स्थायी स्तंभ रहा है। ये चार हैं - विषय, प्रयोजन, अधिकारी और सम्ब्न्ध। किस विषय पर पुस्तक है, यह प्रारम्भ में ही घोषित करना होता है। जब उस विषय पर कितना कुछ लिखा जा चुका है तो वर्तमान प्रयत्न का प्रयोजन क्या है। कौन व्यक्ति इसे पढ़ने के योग्य हैं या किसको समझ में यह पुस्तक आयेगी। इस पुस्तक के पढ़ने के बाद उस व्यक्ति में क्या परिवर्तन आयेगा। सीमायें वहुत ही स्पष्ट रूप से निर्धारित की गयी हैं। हम बहुधा केवल विषय पर ही सोच कर बैठ जाते हैं, किसी विषय में यदि थोड़ा अधिक जान जाते हैं तो लगता है कि उसे व्यक्त कर दिया जाये। शेष तीन पर तो विचार आता ही नहीं है। संभवतः अनुबन्ध चतुष्ट्य ही कारण रहा होगा कि प्राचीन समय में अनावश्यक साहित्य छन गया और बाहर नहीं आया। पुस्तक लिखना तब एक विशेष उपलब्धि रहा करती होगी। जो छनकर कालान्तर में बाहर आया, वह बार बार पढ़ने का मन करता है, वह संस्कृति की धरोहर बना।

अनुबन्ध चतुष्ट्य को यदि पुस्तक लिखने का आधार बनाया जाये तो बहुत से संशय दूर हो जाते हैं। न केवल लेखक के लिये वरन पाठक के लिये भी। जिन सिद्धान्तों पर लेखन होता है उन्हीं पर पाठन भी होता है। विषय का विस्तार असीमित है, सबकी अपनी एक कहानी है, सबकी अपनी समझ और परख है। सब अपनी कहने में आ जायें तो लिखने वाले अधिक हो जायेंगे, पढ़ने वाले कम। जैसे आजकल किसी भी चर्चा में कहने वाले अधिक रहते हैं और सुनने वाले कम मिलते हैं। केवल अपनी कह देना विषय नहीं हो सकता। उसमें कुछ मनोरंजन हो सकता है, कुछ भाव हो सकते हैं, कुछ खिचड़ी सा हो सकता है वह, पर स्वादिष्ट साहित्य नहीं हो सकता। आँकड़े देखें तो यही हो रहा है, २० लाख पुस्तकें हर वर्ष लिखी जाती हैं और औसत २५० प्रतियाँ प्रति पुस्तक बिकती हैं। अधिकांश के लिये तो पुस्तक का मूल्य और लगाया हुआ श्रम भी निकाल पाना कठिन होता है।

यदि बताने के लिये सारतत्व है, तो भी बिना प्रयोजन के लेखन का कोई औचित्य नहीं। जब विषय जीवन से जुड़ा होगा, कल्याण से जुड़ा होगा, ज्ञान से जुड़ा होगा, तो उसका प्रयोजन उतना ही अधिक होगा। अधिकारी प्रारम्भ में ही निर्धारित कर देने से लेखक के लिये अपना बौद्धिक स्तर नियत कर पाना सरल होता है। पुस्तक का आकार इस पर विशेष रूप से निर्भर करता है। यदि आप किसी विषय पर सर्वसाधारण के लिये लिख रहे हैं, तो हर पक्ष को समझा समझा कर लिखना होगा और पुस्तक का आकार बढ़ जायेगा। किसी भी जटिल पक्ष पर जाने के लिये आपको अत्यन्त कठिनाई होगी। आपको उदाहरणों औप कथाओं को विशेषरूप से सम्मिलित करना होगा। दूसरी और यदि प्रबुद्ध वर्ग के लिये कोई विषय व्याख्यायित किया जा रहा है तो कम शब्दों में अधिक बात कही जा सकती है। दोनों ही साधनों में विषय की गुणवत्ता से कोई समझौता नहीं किया जाता है, बस पुस्तक का आकार अधिकारी के अनुसार घटता बढ़ता रहता है। जब कई शास्त्र सूत्र के प्रारूप में दिखायी पड़ते हैं तो लिखने वाले और उन्हें पढ़ने वालों का उत्कृष्ट बौद्धिक स्तर समझ में आता है।


लेखकीय संतुलन के और पक्ष अगले ब्लॉग में।

30.11.16

लिली पाण्डेय

लिली रेलवे बोर्ड में वरिष्ठ अधिकारी हैं और कार्मिक विभाग का उत्तरदायित्व वहन कर रही हैं।बंगलुरु में उनके साथ कार्य करने का सौभाग्य मिला है। कला और साहित्य में रुचि है। रेलवे में कला के विषय परसफरनाम की पुस्तिका की सहलेखिका भी रही हैं। उसी के आगामी अंक के लिये लिली ने एक कविता लिखी थी। पढ़ने को दी, बहुत अच्छी लगी, गुनगुनायी और हिन्दी में अनुवाद कर दी। शाब्दिक के स्थान पर भावानुवाद किया है। आप भी पढ़ें।

Whirl of wheels
Setting in motion the celestial machinery
Turning to infinity, to eternity
An epic adventure beyond 
Beginnings & denouement 
Spinning a universe of words, forms and shapes
A cadence of dervishes
The dance of Shiva
Spasm of creation ..

~ Lily Pandeya

अथ कालचक्र निःश्वास नाद,
बढ़ता गतिमय वैश्विक प्रमाद,
शाश्वत, अनंत
निर्बन्ध छन्द,
आगत स्वागत, सब मार्ग सुप्त,
यात्रा अनादि, संहारमुक्त
शब्दों, आकृति आकारों में 
जग घूर्ण पूर्ण विस्तारों में
दरवेशी तालों पर विशेष
नर्तन नवनूतन शिवप्रवेश
घनघुमड़ उमड़ती सृष्टिशेष


भावानुवाद - प्रवीण पाण्डेय

लिली के साथ, बीजिंग में

27.11.16

चीन यात्रा - १८

अपनी संस्कृति पर गर्व करने वालों को लोग पुरातनपंथी समझते हैं। पुरातन से विद्वेष और नूतन से लगाव तथाकथित बुद्धिजीवियों का पहचान-तत्व बन गया है। समझना और समझाना तब और कठिन हो जाता है जब संस्कृति पर आस्था रखने वालों और न रखने वालों ने संस्कृति के मर्म को नहीं समझा होता है। तर्क तब परिधि पर ही रहते हैं, केन्द्र में सत्य संदोहित हुये बिना ही पड़ा रहता है। पक्ष में और विपक्ष में बोलने के लिये संस्कृति को समझना आवश्यक है। समझने के लिये पढ़ना और जीना आवश्यक है, नहीं तो तर्क शुष्क रह जाते हैं। संस्कृति के रूप में न जाने कितना ज्ञान, न जाने कितनी बुद्धिमत्ता हमें विरासत में सहज ही मिल जाती है। साथ ही साथ कुछ विकृतियाँ भी मिल जाती हैं जो संभव है कि किसी काल में संस्कृति के अनुकूल रही हों पर वर्तमान में विपरीत हों। संस्कृति का मर्म समझने के क्रम में ऐसी विकृतियाँ स्पष्ट दिखती हैं और दूर की जा सकती हैं। जो लोग मात्र कुछ विकृतियों के लिये अपनी पुरानी संस्कृति को छोड़ देते  हैं और नये को बिना सोचे समझे अपना लेते हैं, वे संस्कृति-संकर कहीं के नहीं रहते हैं। 

चीन में पुरानी संस्कृति का आज तक कहीं भी लोप नहीं हुआ है। वहाँ की सत्ता ने भले ही संस्कृति के स्वरूप को भले ही आघात पहुँचाया हो पर संस्कृति की आत्मा को नष्ट नहीं कर पायी है। कालान्तर में सत्ता ने संस्कृति के सुदृढ़ पक्षों का उपयोग आर्थिक और सशक्त राष्ट्र बनने में प्रयुक्त किया है। भारत इतिहास के आघातों से बिखरा और भ्रमित खड़ा है। संस्कृति में शक्ति के सूत्र छिपे हैं पर वह स्वयं पर विश्वास ही नहीं कर पा रहा है। बौद्धिक क्षमता है पर स्वयं को समझा नहीं पा रहा है। अन्तर्विरोधों से क्षीण और अपनी प्राथमिकतायें निर्धारित करने में असमर्थ देश को यदि कुछ चाहिये तो वह दिशा और संबल हैं। विश्व सौ पग आगे दिखता है और अपने पग पर समस्याओं के शत पाथर बँधे हैं, इसी पशोपेश के दिग्भ्रम मे आवाक सा बैठा हुआ है। 

सृजनशीलता है, सहनशीलता है, उपलब्धियों से भरा कालखण्ड है। स्वयं को सिद्ध नहीं कर पाये हैं तो पददलित भी नहीं हुये हैं। उठना होगा, बढ़ना होगा, उन्नति के शिखरों में चढ़ना होगा। पूर्वजों को संतुष्ट करने को लिये, आने वाली संततियों को गौरव करने के लिये कुछ शेष रहे, इसके लिये कुछ न कुछ करना ही होगा। छोटा नहीं, बड़ा करना होगा, बहुत बड़ा करना होगा।

चीन के रेलतन्त्र में देखा, रेल विश्वविद्यालय में देखा, नगरीय व्यवस्था में देखा, व्यापार में देखा, यातायात में देखा, कुछ भी छोटा नहीं पाया वहाँ पर। सिल्क रोड से लेकर आधुनिक सिल्क रोड तक, स्टील के उत्पादन से लेकर अंतरिक्ष कार्यक्रम तक, सब के सब असाधारण सोच के उदाहरण हैं। व्यवस्थाओं के स्वरूप जो सिद्ध हो चुके हैं, उन्हें यथास्वरूप अपनाने में क्या समस्या हो सकती है। 

भारत और चीन का संबंध बहुत पुराना है। हम चाहें, न चाहें हमें पड़ोसी के रूप में ही रहना है। भारत ने एक भी सैनिक भेजे बिना चीन को अपनी संस्कृति के बल पर सदियों तक अपने विचार के अधिकारक्षेत्र में रखा है। बौद्ध धर्म के माध्यम से अपना आध्यात्मिक वर्चस्व बनाकर रखा है। बौद्धिक प्रभुत्व के इस लम्बे कालखण्ड ने दोनों संस्कृतियों के बीच संबंध प्रगाढ़ किये हैं। वर्तमान राजनैतिक वर्चस्व की होड़ संभवतः उसी की प्रतिक्रिया है। शक्ति को शक्ति ही साधती है। अभी भी हम बौद्धिक रूप से चुके नहीं हैं। अपनी क्षमताओं का उपयोग कर हमें भी समकक्ष आना होगा और आँख से आँख मिलाकर बात करनी होगी, व्यापारिक क्षेत्र में भी, यदि आवश्यकता पड़ी तो सामरिक क्षेत्र में भी। संबंधों को राजनैतिक कटुता से हटाकर पुनः संस्कृति के आधार पर सिद्ध करना ही होगा।

व्यक्तिगत रूप से जितना सीखने को मिला, वह संभवतः पढ़कर सीख पाना संभव नहीं था। संस्कृतियाँ सोचने का ढंग बदल देती हैं। जब सब एक सा सोचते हैं तभी शक्ति का उद्भव होता है। भिन्न विचार श्रंखलायें या तो भ्रम फैलाती हैं या सीमित और दिशाहीन विकास करती हैं। यदि हमारे पास कोई एक ऐसा तत्व है जो सबको संगठित कर एक दिशा में प्रवृत्त कर सकता है तो वह है हमारी संस्कृति। बड़ी सोच के जो सूत्र हमारी संस्कृति में त्यक्त पड़े हैं, उनका आह्वान करना होगा। अपने पुरुषार्थ को पुनर्जाग्रत करना होगा। धन्यवाद उन्हें देना चाहिये जो हमें हमारी क्षमतायें सिद्ध करने के लिये उकसाते हैं। चीन का आभार, हम निश्चय ही स्वयं को सिद्ध करेंगे।


इति चीन यात्रा।

1.10.16

चीन यात्रा - १७

प्रकृति पुरुष का संग
व्यक्ति जब निश्चय कर लेता है कि उसे प्रकृति के साथ रहना है, समस्यायें स्वतः अपना समाधान ढूढ़ लाती हैं। प्रकृति की अवमानना या उस पर आधिपत्य के प्रयास अंततः विनाश के बीज बनते हैं। टाओ की प्रकृति से निकटस्थता का ऐसा ही एक सुन्दर उदाहरण है दूजिआनयान बाँध। चेन्दू सिचुआन राज्य में है और पर्वत की घाटी में होने के कारण यह क्षेत्र नदियों से प्लावित है। समस्या पहचानी सी है, वर्षा ऋतु में बाढ़ की। यदि बाढ़ से बचने के लिये नदियों से दूर रहा जाये तो अन्न उत्पादन और सूखे की समस्या। बाढ़ और सूखे की इस दुविधा से अपना देश भी दग्ध है। समाधान बाँध बनाना है, जब प्रवाह अधिक हो तो उसे रोक लिया जाये और सूखे के समय उस संचित जलराशि का उपयोग किया जाये। प्रकृति को चोट पहुँचाने के अतिरिक्त बाँध राजनैतिक चोट भी करते रहते हैं। कावेरी, सिन्धु और ब्रह्मपुत्र पर बने या बनाये जाने बाँध इसके जीवन्त उदाहरण हैं। समाधान समस्या से भी भयावह तब हो जाता है जब प्रकृति अनियन्त्रित हो जाती है। अत्यधिक वर्षा में जब ये बाँध अपनी क्षमता से अधिक पानी एकत्र कर लेते हैं तो उनका खोलना और टूटना सिचिंत क्षेत्रों में जल प्रलय बन कर आता है। बिहार हर वर्ष उसका भुक्तभोगी है। कुछ क्षेत्र बाँधों का पूरा लाभ तो स्वयं उठा लेते हैं पर दुष्परिणाम अन्य क्षेत्रों को बढ़ा देते हैं।

परिसर का मानचित्र

संचयन शब्द टाओ की शब्दावली में नहीं है, अपरिग्रह या आवश्यकता से अधिक न रखना। प्रकृति प्रवाहमान रहे, बाधायें न्यूनतम हों, यह धारणा टाओ में गहरे बसी है। इसका एक उत्कृष्ट उदाहरण है दूजिआनयान बाँध। इसे बाँध के स्थान पर सिचाई तन्त्र कहना अधिक उपयुक्त होगा। २२०० वर्ष पूर्व चेन्दू क्वेंगश्वेंग पर्वत से निकलने वाली मिंजियांग नदी के कारण हर वर्ष आने वाली भीषण बाढ़ से त्रस्त था। स्थानीय अधिकारी ली बिंग ने अपने पुत्र के साथ मिलकर इसका हल ढूढ़ा। लम्बे अवलोकन, सटीक योजना और अथक परिश्रम के बाद सिचाई तन्त्र तैयार हुआ। सम्पन्न कार्य की उत्कृष्टता इस बात से समझी जा सकती है कि पिछले २२०० वर्षों से यह तन्त्र सुचारु रूप से चल रहा है। बाढ़ की समस्या को चेन्दू में फिर कभी नहीं आयी और सिचुआन के सभी ५० नगरों में सिचाई व्यवस्था पर्याप्त है। सूखे के समय में मिंजियांग नदी का ६० प्रतिशत से भी अधिक जल सिचाई तन्त्र में आता है और वर्षा के समय यह घट कर ४० प्रतिशत से भी कम रह जाता है। कहने का आशय यह है कि अधिकता के समय यह तन्त्र अवांछित जल वापस नदी में भेज देता है। इस तन्त्र में कहीं भी जल के प्रवाह को बाधित नहीं किया गया है, बस उसे अद्भुत विधि से नियन्त्रित किया गया है। वर्ष २००० में इसे यूनेस्को ने बाढ़ नियन्त्रण, सिचाई तन्त्र, जल परिवहन और जल उपयोग के सतत लाभों के कारण अपनी सूची में स्थान दिया है।

सर्वप्रथम तो मुझे इस तन्त्र के पीछे का विज्ञान समझ नहीं आया क्योंकि इसके लिये हाइड्रोलॉजी का अध्ययन आवश्यक है। अपने साथ गये सिविल इन्जीनियरों से पूछने पर सन्तोषप्रद उत्तर नहीं मिले, संभवतः रेल की पटरियों के लौह ने जलविमर्श के विषयों को उनसे दूर कर दिया हो। वापस आने के बाद उसे कई दिनों तक समझा तब थोड़ा बहुत समझ में आया। जल के जटिल प्रवाह से शाश्वत लाभ ले पाना निश्चय ही एक प्रशंसनीय उपलब्धि है और उसके लिये प्राचीन चीन के नियन्ता साधुवाद के पात्र हैं।

समझने का लिये मॉडल
यह तन्त्र बनाने के लिये जिस स्थान को चुना गया है, वहाँ पर यह नदी दायीं ओर मुड़ती है। मुख्य प्रवाह के बायीं ओर एक उपधारा निकाली गयी है। उपधारा मुख्यधारा की तुलना में अधिक गहरी, पतली और लम्बी है। यह उपधारा आगे जाकर पुनः मुख्यधारा में मिल जाती है। बीच का भूमिखण्ड एक मछली का आकार बनाता है। इस मछली के तीन भाग हैं, मुँह, पिछले पंख का ऊपरी हिस्सा और पिछले पंख का निचला हिस्सा। मुँह के हिस्से को सप्रयास तिकोना और कठोर रखा जाता है। यह अत्यन्त महत्वपूर्ण भाग है क्योंकि यहीं से ही मुख्यधारा और उपधारा में जल का बँटवारा होता है। जब नदी में जल कम होता है तो उपधारा की गहराई अधिक होने के कारण उसमें अधिक जल जाता है। नदी की दिशा से उपधारा की दिशा तनिक बायें होने के कारण उसमें पत्थर और मिट्टी कम जाती है। जहाँ पर उपधारा मुख्यधारा से पुनः मिलती है, वहाँ पर धीरे धीरे नदी से उपधारा में बहकर आये पत्थर और मिट्टी जमा होता रहती है, इस कारण एक अस्थायी अवरोध बन जाता है। इस अवरोध के कारण मुख्यधारा में जाने वाले पानी की मात्रा कम हो जाती है। सारे पानी को उपधारा के बायीं ओर लम्बवत बनायी सिचाई नहर से प्रवाहित कर दिया जाता है। उपधारा के लम्बवत होने के कारण उस पर पत्थर और मिट्टी एकत्र नहीं होती है। इस व्यवस्था से गर्मी के समय लगभग ६० प्रतिशत जल सिचाई के लिये बनायी नहर में चला जाता है। 

मछली का मुख
जब वर्षा आती है तो मछली की पूँछ पर बने अस्थायी अवरोध बह जाते हैं। साथ ही सिंचाई नहर को जाने वाले मुँख की ऊँचाई भी बढ़ा दी जाती है। इसके लिये बड़े गोल पत्थरों को बाँस की रस्सी से लपेटकर लम्बी और बेलनाकार आकार बनाये जाते हैं और उन्हें रस्सियों के माध्यम से एक के ऊपर एक रखा जाता है। अपने आकार के कारण ये अस्थायी और पोरस दीवार की तरह कार्य करती है और तब सिचाई नहर में जाने वाले जल की मात्रा कम हो जाती है। मुख्यधारा और उपधारा दोनों ही शेष जल को बहा ले जाती हैं। इस व्यवस्था से वर्षा के समय ४० प्रतिशत से भी कम जल सिंचाई नहर में जाता है। साथ ही साथ पत्थर और मिट्टी भी सिचाई नहर में नहीं जा पाते हैं और सिंचित जलक्षेत्र बाढ़ के विभीषिका से मुक्त रहता है। इस व्यवस्था के साथ ही जल प्रवाह के प्रबंधन की अन्य कई उपव्यवस्थायें हैं और उसी के बल पर यह तन्त्र पिछले २२०० वर्षों से यथावत चल रहा है। इस पर कोई भी बड़ा निर्माण नहीं है और जिस प्राकृतिक विधि से जल और मिट्टी का पृथकीकरण किया गया है, आज के समय में वह स्वाभाविक व सरल लग सकती है पर उस समय के लिये यह निसंदेह एक अद्भुत उपलब्धि रही होगी।

मछली की पूँछ
जहाँ पर नदी, पर्वत, पेड़ और बादल एक साथ एकत्र हो जायें, प्रकृति अपने मद में रत हो जाती है। हम जब वहाँ पहुँचे, पानी बरस रहा था, हम लोग छाते निकाल कर चल रहे थे और प्रकृति के सुन्दर स्वरूप को निहारे जा रहे थे। यह दृश्य देखकर, दिन के प्रथम भाग में क्वेंगश्वेंग पर्वत के भ्रमण के पश्चात श्रान्त हुये तन में चेतना का पुनर्संचार हो गया। लगभग चार घंटे हम वहाँ घूमे, आनन्द आ गया। वहाँ के स्थानीय पर्यटकों के लिये यह अत्यन्त भ्रमणीय स्थल है, सब के सब अपने परिवारों के साथ यहाँ उपस्थित थे। निश्चिन्त समय बिताने के लिये यह उपयुक्त स्थान है, कहीं भी बैठ जायें और प्रकृति को निहारते रहें। युगल भी पर्याप्त संख्या में वहाँ थे, यहाँ से अधिक आकर्षक वातावरण उन्हें और कहाँ मिलेगा भला।

२०० वर्ष पुराना बोन्साई
इस स्थान को एक सांस्कृतिक स्थान के रूप में भी विकसित किया गया है। यहाँ पर कई मंदिर देखे, उसमें गये भी, पर जल के प्रवाह का प्रश्न जो मन में कुलबुला रहा था उस कारण किसी और तथ्य पर ध्यान नहीं दे पाया। २२०० वर्षों के इतिहास को वहाँ पर सजा कर रखा गया है। विस्तृत क्षेत्र में फैले १५-२० ऐसे मंदिर भवन हैं जहाँ पर घूमने जाया जा सकता है। पहाड़ों के ऊपर नदियों पर दृष्टि करते हुये कई भवन बने हुये थे। हम लोगों की बहुत इच्छा थी कि वहाँ चला जाये पर पूरा घूमने के लिये २-३ दिन और चाहिये थे। वहाँ जाने के बाद ही हम नीचे बहती उन्मुक्त नदी के प्रवाह का आलौकिक रूप देख सकते हैं।  यहाँ पर सब प्रकृतिमय लगता है, ज्ञान, विज्ञान, समाज और परिवेश। व्यक्ति को यहाँ पहुँचकर अपने मूल का आभास हो आता है। प्रकृति-पुरुष का संतुलन और प्रकृति का निश्चिन्त प्रवाह, यहाँ के हर दृश्य में व्यक्त है।


अगले ब्लॉग में चीन के बारे में शेष बातें।

24.9.16

चीन यात्रा - १६

टेराकोटा सेना
दिन एक था और विकल्प ढेरों। बहस इस बात पर चली कि छुट्टी के दिन कहाँ चला जाये? बहुतों की इच्छा जियान स्थित टेराकोटा सेना देखने की थी। दूसरी शताब्दी ईसा पूर्व के एक राजा ने अपनी मृत्यु के बाद अपनी रक्षा के लिये मिट्टी की सेना बनवायी थी। ८००० सैनिक, १३० रथ, ५२० घोड़े और १५० घुड़सवारों से सज्ज यह स्थान पिछले वर्ष भारतीय प्रधानमंत्री की चीन यात्रा के समय चर्चा में आया था। चेन्दू और जियान के बीच कोई बुलेट ट्रेन नहीं चलती है। अन्य ट्रेन से जाने में समय सीमा का उल्लंघन हो रहा था और हवाई यात्रा में धन बहुत अधिक लग रहा था। अन्य व्यवस्थाओं को जोड़कर पूरी यात्रा में लगभग बीस हजार रुपये का व्यय आ रहा था। इसके अतिरिक्त वहाँ पर भी पूरा समय दौड़भाग में ही बीतना था। एक तिहाई समूह फिर भी उत्साहित था पर सबका साथ नहीं होने और अन्य विकल्प होने के कारण आग्रह छोड़ दिया गया।

लेशान के बुद्ध
दूसरा विकल्प लेशान के बुद्ध का था। तीन नदियों के संगम किनारे एक खड़ी चट्टान पर ७१ मीटर की बुद्ध प्रतिमा उनके मैत्रेय रूप को दर्शाती है। आना और जाना बुलेट ट्रेन से था। यात्रा पूरे एक दिन की थी। बताया गया कि मूर्ति के नीचे से ऊपर तक जाने में बहुत घूमकर जाना पड़ता है। मूर्ति अत्यन्त सुन्दर है, पर औद्योगिक प्रदूषण और सरकार की उपेक्षा के कारण अच्छी स्थिति में नहीं है। तीसरा विकल्प लांगकुआन झील का था। यह चेन्दू से ३८ किमी दूर है और बहुत बड़े क्षेत्र में फैली है। इसके बीच में कई टापू हैं और इसका प्राकृतिक सौन्दर्य मन मोह लेता है। यहाँ पर भी पूरा दिन लग जाता है। चौथा विकल्प दो स्थानों का था, दिन के प्रथम भाग में क्वेंगश्वेंग पर्वत और दूसरे भाग में दूजिआनयान बाँध को देखने का। दोनों ही चेन्दू के पास ही हैं और सुबह शीघ्र प्रारम्भ करके सायं तक देखे जा सकते थे। दो स्थानों का लोभ अन्य तीन विकल्पों से अधिक उपयोगी लगा, पर यदि समय मिलता तो मैं सारे स्थान देखता। इसके लिये आपके पास ४ अतिरिक्त दिन होने चाहिये।

लांगकुआन झील
हम लोग सुबह ही निकल गये। क्वेंगश्वेंग पर्वत चेन्दू से ६६ किमी है और दूजिआनयान बाँध वहाँ से १५ किमी है। हम बस से गये, हमारी गाइड का नाम जॉय हान था, उसने क्वेंगश्वेंग पर्वत पहुँचने तक के समय में चीन के कई महत्वपूर्ण तथ्य बतलाये। अंग्रेजी का उच्चारण कठिनता से होने के बाद भी संवाद स्पष्ट था। पानी बरस रहा था और वातावरण सुहावना था, हम लोग कब वहाँ पहुँच गये पता ही नहीं लगा। बीच में खेतों और मानव निर्मित जंगल की कतारें थीं, एक इंच भूमि भी रिक्त नहीं थी। हमारे देश में खेतों के बीच की मेड़ों में ही इतना स्थान छोड़ दिया जाता है कि जिसमें किसी छोटे देश के लिये अन्न की व्यवस्था हो जाये।

सहज प्राकृतिक सौन्दर्य
क्वेंगश्वेंग पर्वत टाओ का प्रमुख केन्द्र है, उसका उद्भव स्थान है। यहाँ पर कई बौद्ध स्थल भी हैं। पर्वत के दो भाग हैं, सामने का और पीछे का। सामने का भाग सांस्कृतिक और प्राकृतिक दृष्टि से घूमने योग्य है, हम लोग वहीं पर ही गये। पीछे का भाग पूर्णतया मनोरंजन और प्रकृतिप्रेमियों के लिये है, समयाभाव के कारण हम वहाँ नहीं जा पाये। चोटी तक पहुँचने के लिये हमने परिवहन के सारे संभावित साधनों का प्रयोग किया। बस से वहाँ पहुँचने के बाद हमें इलेक्ट्रिक कार से अन्दर तक ले जाया गया। वहाँ से हम सीढ़ियों से पहाड़ों पर चढ़े। वहाँ से एक नाव से आगे के स्थान पर पहुँचे और अन्त में रोपवे के माध्यम से ऊपर तक गये। पुनः पैदल चल कर टाओ के मंदिर पहुँच सके। इस प्रकार की व्यवस्था में पर्वत का मौलिक स्वरूप और वन को संरक्षित रखा गया है। बीच में शांगक्विंग महल है, ऊपर शैंक्विंग मंदिर है, मार्ग के चारो ओर घना जंगल और बीच बीच में विश्राम करने के सुविधाजनक स्थान। पहाड़ों पर चढ़ाई के समय दृश्यों के आनन्द ने हमारी थकान को दूर रखा।

झील के सम्मुख
पर्वत के नीचे समतल भाग में पुष्पों और पौधों को सौन्दर्यपूर्ण ढंग से व्यवस्थित किया गया है। प्रकृति स्वयं में ही बहुत सुन्दर होती है, उसे यदि उत्कृष्ट मानवीय संयोजन मिल जाये तो वह स्वयं प्रसन्न हो जाती है और अपने प्रभावक्षेत्र में आने वाले हर जीवजन्तु और मानव को अह्लाद से भर देती है। प्रकृति के बीच आकर लगता है कि अपने ही घर आ गये हैं। सदियों बाद जब मानव औद्योगिकीकरण का निष्पक्ष विश्लेषण करने बैठेगा तो प्रकृति की घनघोर उपेक्षा और कृत्रिमता का आलिंगन उसे अंदर तक कचोटेगा। अनियन्त्रित जंगल में भी एक लय है और तथाकथित नियन्त्रित कांक्रीट के आकार रुक्षता भरे दिखते हैं। प्रत्यक्ष को प्रमाण माना जाय तो इस यात्रा के अपने चित्रों को मैं स्वयं ही पहचान नहीं पाया। स्वयं का इतना प्रसन्न और आनन्दमय कहीं नहीं पाया था, तनावमुक्त और संतुष्ट।

उत्साही समूह
पहाड़ पर चढ़ाई प्रारम्भ करने के पहले एक बड़ा ही उत्साही समूह मिला, पर्यटन में आकण्ठ आनन्दमग्न, संभवतः प्रकृति ने उनके परिवार में एक ऊर्जा भर दी हो। उनके उत्साह और ऊर्जा ने हमें भी प्रभावित किया। सीढ़ियों पर चढ़ते समय हम लोग हिन्दी साहित्य के कवियों की रचनाओं का सस्वर पाठ कर रहे थे, जिसको जो भी याद था। आस पास से निकलने वालों को आश्चर्य भी हो रहा था और अच्छा भी लग रहा था। आश्चर्य तो हम सबको भी हो रहा था क्योंकि इस प्रकार का प्रस्फुटन सामान्य परिस्थितियों में होना संभव नहीं है। पहली बार यह भी ज्ञात हुआ कि हम सबको अभी तक कितना कुछ याद है। कामायनी, उर्वशी, रश्मिरथी, शिवस्त्रोत, हिमाद्रि तुंग श्रृंग से और न जाने क्या क्या। प्रकृति यहाँ एकान्त बैठ निज रूप सँवारति, पल पल पलटति भेष, छनिक छवि छनि छनि धारति। निराला, दिनकर, प्रसाद अपनी अपनी छायाओं से बाहर आ गये थे। अपने मित्रों का साहित्यिक पक्ष जानकर सुखद आश्चर्य हुआ और सीढ़ियाँ कब पार हो गयीं, पता ही नहीं चला।

बीच रास्ते में एक मनोरंजक दृश्य दिखा। किसी बात को लेकर एक पत्नी अपने पति को जी भर के हड़का रही थी। कारण तो समझ में नहीं आया पर पति चुपचाप खड़ा सुन रहा था, एक हाथ में झोला पकड़े, दूसरे में बच्चे को। यह समझ नहीं आ रहा था कि किस बात पर डाँट पड़ रही है,  पर जिस तरह से पति खड़ा निर्विकार भाव से सब सह रहा था, उससे तो वह सिद्धपुरुष सा दिख रहा था। कृष्ण की अर्जुन को सहन करने की सलाह “तांस्तितिक्षस्व भारत” या टाओ का अकर्म “वू वाई”, इन दोनों में से किसी एक तत्व का ज्ञाता होगा वह पति, भारतीय पतियों की तरह ही।

यिन यांग
टाओ दर्शन सिद्धान्त की दृष्टि से अत्यन्त ही सहज है, इसकी व्यापकता व्यवहार में है। आपको हर क्षेत्र में टाओ को अपनाना होता है तब आप वह हो जाते हो। भारतीयों के लिये यह समझना कठिन नहीं है क्योंकि टाओ के हर सिद्धान्त या व्यवहार के लिये आप गीता, उपनिषद, रामचरितमानस आदि ग्रन्थों से पाँच उद्धरण सामने रख देंगे। कम शब्दों में कहें तो सरलता, सत्यता और प्रकृतिलयता से टाओ परिभाषित होता है। टाओ के प्रमुख तीन सिद्धान्त हैं। पहला सिद्धान्त है एकात्मता का, ब्रह्मन् जैसा, सब आपस में संबद्ध। दूसरा सिद्धान्त है यिन यांग का, विपरीतों में संतुलन, द्वन्द्व जैसा। तीसरा सिद्धान्त है वू वाई का, अकर्मता का, प्रकृति की लय को न छेड़ने का, पानी की तरह बह जाने का, व्यवहार का सहज मार्ग विकसित करने का। इन सिद्धान्तों को गहराई से समझें तो टाओ और बौद्ध में अन्तर करना कठिन हो जाता है। 

टाओ
वू वाई के सिद्धान्त पर जब एक साधक से पूछा कि आप फिर भी इतने कर्मशील क्यों हो, इतने श्रमशील क्यों हों, किसके लिये इतने उपक्रम विकसित कर रहे हो? उत्तर सुनकर हृदय अंदर तक तृप्त हो गया। साधक ने बताया कि मैं अपने कर्म को औरों की सेवा के रूप में देखता हूँ, जुड़ता भी हूँ, संतुलन भी रहता है और अकर्मता का भी बोध होता है, “कर्मण्येवाधिकारस्ते”। मन में विचार आया कि कहीं कृष्ण महाराज एक आधा अध्याय इनको भी तो नहीं सिखा गये, जाने के पहले। इस यात्रा के बाद तन श्रान्त था, मन शान्त था, आत्मा प्रफुल्लित थी, अस्तित्व संतुष्ट था।


अगले ब्ल़ॉग में दूजिआनयान बाँध के बारे में।