22.10.14

मेरा भगवन

वह सुन्दर से भी सुन्दरतम,
वह ज्ञान सिन्धु का गर्भ-गहन,
वह विस्तृत जग का द्रव्य-सदन,
वह यशो-ज्योति का उद्दीपन,

वह वन्दनीय, वह आराधन,
वह साध्य और वह संसाधन,
वह रत, नभ नत सा अभिवादन,
वह मुक्त, शेष का मर्यादन,

वह महातेज, वह कृपाहस्त,
वह ज्योति जगत, अनवरत स्वस्थ,
वह शान्त प्रान्त, वह सतत व्यस्त,
वह सुखद स्रोत, दुख सहज अस्त,

वह अनुशासन से पूर्ण मुक्ति,
वह द्वन्द्व परे, परिशुद्ध युक्ति,
वह मन तरंग, एकाग्र शक्ति, 
वह प्रथम चरण, संपन्न भक्ति,

वह आदि, अन्त का वर्तमान,
सब कण राजे, फिर भी प्रधान,
वह प्रश्न, स्वयं ही समाधान,
वह आकर्षण शासित विधान,

वह प्रथम शब्द, वह प्रथम अज्ञ,
वह प्रथम नाद, वह प्रथम यज्ञ,


गुंजायमान प्रतिक्षण वन्दन,
है आनन्दित मेरा भगवन।

18.10.14

मूल्य चुकाने बैठा हूँ

सहसा मन में घिर आयी, वो रात बिताने बैठा हूँ
तुमसे पाये हर सुख का अब मूल्य चुकाने बैठा हूँ 

भावों का उद्गार प्रस्फुटित, आतुर मन के आँगन में,
मेघों का उपकार, सरसता नहीं छोड़ती सावन में,
जाने क्या ऊर्जा बहती थी, सब कुछ ही अनुकूल रहा,
वर्ष दौड़ते निकल गये मधु-स्मृतियों का स्रोत बहा,
है कितना उपकार-जनित अधिकार, बताने बैठा हूँ,
तुमसे पाये हर सुख का अब मूल्य चुकाने बैठा हूँ ।

रम कर पथ के उपकरणों में मन उलझाये घूमे थे
निशा दिवस का ब्याह रचाते नित मदिराये झूमे थे
मगन इसी में, हम जीवन में आगे बढ़ना भूल गये,
कोमलता में घिरे रहे, निस्पृह हो  लड़ना भूल गये,
उस अशक्त जीवन का विधिवत भार उठाने बैठा हूँ,
तुमसे पाये हर सुख का अब मूल्य चुकाने बैठा हूँ ।

मन की पर्तें भेद रहीं हैं, बातें जो थीं नहीं बड़ी,
कहीं समय में छिपी रही जो कर्तव्यों की एक लड़ी 
अनजाने में, अनचाहे ही, रूठ गयी जिन रातों से,
नहीं याद जो रखनी चाहीं, चुभती उन सब बातों से,
निर्ममता से बहे हृदय का रक्त सुखाने बैठा हूँ,
तुमसे पाये हर सुख का अब मूल्य चुकाने बैठा हूँ ।

सब कहते हैं, जीवन मैने, अपने ही अनुरूप जिया,
नहीं रहा संवेदित, न ही संबंधों को श्रेय दिया,
सत्य यही है, मन उचाट सा रहा सदा ही बन्धों में,
आत्मा मेरी ठौर न पाती, छिछले कृत्रिम प्रबन्धों में,
निश्छल मन को पर समाज का सत्य सिखाने बैठा हूँ,
तुमसे पाये हर सुख का अब मूल्य चुकाने बैठा हूँ ।

मुझको भी पाने थे उत्तर, जब प्रश्नों से लादा तुमने,
मैं आधे से भी क्षीण रहा, जब माँग लिया आधा तुमने,
मैं क्या हूँ तेरे बिन समझो, उड़ना चाहूँ, हैं पंख नहीं,
एकांत अन्ध गलियारों में भागा फिरता हूँ ,अंत नहीं,
शान्तमना अब, जीवन का बिखराव बचाने बैठा हूँ,
तुमसे पाये हर सुख का अब मूल्य चुकाने बैठा हूँ ।

हूँ कृतज्ञ सबका जिनसे भी कोई हित स्वीकार किया,
कुछ भी सीखा, जीवन में कैसे भी अंगीकार किया,
क्यूँ विरुद्ध हूँ उन सबके, जो जीवन-पथ के ध्येय नहीं,
कुछ भी कहते हों, कहने दो, अब पाना कोई श्रेय नहीं,
तरु सहिष्णु हूँ आज, अहं का बोझ हटाने बैठा हूँ,
तुमसे पाये हर सुख का अब मूल्य चुकाने बैठा हूँ ।

15.10.14

चला हूँ देर तक

चला हूँ देर तक, यादें बहुत सी छोड़ आया हूँ 
अनेकों बन्धनों को, राह ही में तोड़ आया हूँ ।। १।।

लगा था, साथ कोई चल रहा है, प्रेम में पाशित ।
अहं की भावना से दूर कोई सहज अनुरागित ।। २।।

लगा था, साथ तेरे जीवनी यूँ बीत जायेगी ।
मदों में तिक्त आशा, मधुर सा संगीत गायेगी ।। ३।।

लगा था, जब कभी भी दुख निमग्ना ज्वार आयेगें ।
तुम्हारे प्यार के अनुभाव सारे उमड़ जायेगें ।। ४।।

लगा था, राह लम्बी, यदि कभी सोना मैं चाहूँगा ।
कहीं निश्चिन्त मैं, तेरी सलोनी गोद पाऊँगा ।। ५।।

अकेला चल रहा था और सक्षम भी था चलने को ।
लगा कुछ और आवश्यक, अभी हृद पूर्ण करने को ।। ६।।

हुआ पर व्यर्थ का आश्रित, व्यर्थ मैं लड़खड़ाया हूँ ।
चला हूँ देर तक, यादें बहुत सी छोड़ आया हूँ ।। ७।।

11.10.14

स्वप्न-सुन्दरी

खड़ी कहीं पर दूर, कल्पना के अनन्त विस्तारों में,
सुख मदिरा में चूर, नियन्त्रित नहीं मनस उद्गारों में,
यौवन से भरपूर , सिमटती नहीं शब्द आकारों में,
स्वप्नकक्ष की अनघ सुन्दरी, जाने कब से बुला रही है ।

पर हूँ मैं असमर्थ मधुरते,
स्वप्नों के सेवक हैं हम सब,
स्वप्नों के महलों में जाकर,
साधिकार नहीं रह सकते ।

हाँ जब वह दिन आयेगा,
स्वप्न रहेंगे शेष नहीं तब,
स्वप्न-भार से मुक्त व्यक्ति,
तब तेरे ही द्वारे आयेगा ।

8.10.14

झूला बन क्यों झूम रहा हूँ

झूला बन क्यों झूम रहा हूँ 

नियत दिशा है, बढ़ते जाना,
ज्ञान-कोष का वृहद खजाना,
किन्तु हृदय की लोलुपता है,
मन में कुछ अनतृप्त व्यथा है ।
भटक रहा मैं, घूम रहा हूँ ।
झूला बनकर झूम रहा हूँ ।।१।।

विजय कहाँ की, उत्सव कैसे,
रुका यहाँ किस आकर्षण से ।
अहं आज क्यों शान्त नहीं है,
आवश्यकता , अन्त नहीं है ।
विजय तुच्छ क्यों चूम रहा हूँ,
झूला बनकर झूम रहा हूँ ।।२।।

ज्ञात नहीं कब तक झूमूँगा,
पद्धति यह कैसे भूलूँगा  ।
सच पूछो तो याद नहीं है,
कब से ऐसे झूम रहा हूँ ।।३।।