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25.9.21

जय कोटि जनों की अभिलाषा


(जब जब जनाधिकारों का हनन होता है, मन चीत्कार कर उठता है। आज पड़ोस में पुनः वही हो रहा है जो ३२ वर्ष पूर्व चीन के थियानमेन चौक पर हुआ था। तब के व्यक्त युवामन के उद्गार आज भी प्रासंगिक हैं।)

 

भड़काओ लोकतन्त्र ज्वाला, यह सारा राज्य तुम्हारा है ।

यह धरती क्या, यह अम्बर क्या, सारा ब्रम्हाण्ड तुम्हारा है ।।१।।

बस एक अकेले माओ के, तुम दास न यारों अब होना ।

अपने सिद्धान्त बना डालो, तुम अपनी नैया खुद खेना ।।२।।

 

युग परिवर्तित, जग परिवर्तित, ये नीति क्यों स्थिर रह जायें ।

आओ सूखा सा वृक्ष गिरा, एक उत्तम पौध लगा जायें ।।३।।

सरिता बहती, बहता समीर, चलना युग शाश्वत धर्म सदा ।

स्थिर तडाग में, रुकी वायु में नहीं जीवनी शक्ति सदा ।।४।।

 

है परिवर्तन जीवन लक्षण, सिद्धान्त काल से सत्यापित ।

फिर नीति क्यों शाश्वत माने हम, जिस पर है जीवन आधारित ।।५।।

भेड़चाल में नहीं चलो, तुम अपनी राह स्वयं खोजो ।

मस्तिष्क तुम्हारे साथ सदा, अपने सिद्धान्त स्वयं सोचो ।।६।।

 

हो मानवता से परिपूर्णित, स्वछन्द रूप से कार्य करो ।

जिसमें तेरे ही भाव जगें, एक ऐसा गढ़ तैयार करो ।।७।।

शासक का जीना प्रजा हेतु, यह राजधर्म की परिभाषा ।

उस पर निर्भर सारा समाज, जय कोटि जनों की अभिलाषा ।।८।।

 

रे चीन देश के राजाओं, निज देश दमन क्यों कर डाला ।

राजधर्म की सत्यनिष्ठता को तुमने झुठला डाला  ।।९।।

सारा समाज विपरीत खड़ा, जब लोकतन्त्र को पाने में ।

लेकिन तुमने कुछ सुनी नहीं, बस अपना रौब जमाने में ।।१०।।

 

तुमने आवाज सुनी होती, इन मानवता के कानों से ।

माओ का चश्मा आँख लगा पर तूने की मनमाने से ।११।। 

पराधीन हो मन से भी, यह तुमने आज दिखा डाला ।

वर्षों की मेहनत का रूपक, निज जीवन वृक्ष सुखा डाला ।।१२।।

 

तुमने चलवाये टैंक तोप, जनता बिल्कुल असहाय खड़ी ।

तुमने मरवाये मानव क्यों, करवायी भूल नितान्त बड़ी ।।१३।।

जिसको तुम दाबोगे जितना, वह द्विगुण वेग से फूटेगा ।

जो आज बनी है चिन्गारी, वह ज्वाला बनकर फूटेगा ।।१४।।

 

अत्युत्तम आज यही होगा, फूँको नवजीवन नातों में ।

तज देश ग्रहण सन्यास करो, अब लोकतन्त्र के हाथों में ।।१५।।

जीवन की खोयी निष्ठा को, तुम फिर से आज जिला डालो ।

तुम राष्ट्र बगीचे में सुन्दर से, मानव पुष्प खिला डालो ।।१६।।


2.8.15

आकांक्षा से भरे नयन हैं

आकांक्षा से भरे नयन हैं और असुँअन की धार बहे,
सक्षम खाली हाथ, उठे हैं सम्मुख, अपनी बात कहे,
सूचक हैं ये, प्रश्न उठाते, आज आपके बारे में,
आप समझते, अश्रु खुशी के, हाथ उठे जयकारे में ।

हम थे भ्रम में, शायद हमने, लोकतन्त्र-रण जीता है,
पाँच वर्ष अज्ञातवास, पर समय आपका बीता है,
आये पुनः बिछाने चोपड़, आशाओं की, स्वप्नों की,
पाँसे फेंके, खेल रहे हैं, राजनीति फिर अपनों की,

अब होगा सब ठीक, समस्यायें जो थी, मिट जायेंगी,
नयी नीतियाँ देखो, उजला नवप्रभात ले आयेंगी,
व्यक्ति व्यक्ति को तोड़ रहे जो, हाथ जोड़कर खड़े हुये,
आज आपके मत पाने बन भिक्षु अकिंचन पड़े हुये,

निष्ठाओं का भवन तुम्हारा जगह जगह से टूटा है,
अपना वचन निभाना था जो, सिद्ध कर दिया झूठा है,
किस को समझाना चाहो तुम, कौन कथा तुम बाँच रहे,
मन के छल को, खड़े हुये क्यों चौराहे पर जाँच रहे,

नहीं तुम्हारे आश्वासन अब काम तुम्हारे आयेंगे,
हर हाथों को काम, और यह अश्रु सूख जब जायेंगे,
तभी समझना जनमानस-स्नेह, हृदय की धड़कन को,
अपना ही पाओगे हर क्षण, तब समाज में जन जन को।

25.1.14

सड़कों पर लोकतन्त्र

नहीं, संदर्भ बिल्कुल वह नहीं है जो आप समझ रहे हैं। सड़कों पर किये हुये विशेष कृत्य पर नहीं, वरन यह शीर्षक सड़कों पर किये हुये वृहद अवलोकनों के पश्चात समझ में आयी रोचकता पर आधारित है। रेलवे में सारे निरीक्षण ट्रेन से किये जाने असम्भव होते हैं। समपार फाटकों, पुलों और संरक्षा के लिये महत्वपूर्ण कई स्थानों पर ट्रेन नहीं रुकती है। मोटरट्रॉली से इन स्थानों पर पहुँचा तो जा सकता है पर रेलमार्ग में ट्रेनों की बहुतायत से अत्यधिक समय लग सकता है। साथ ही साथ यदि आपने बीच खण्ड में गहन निरीक्षण कर अधिक समय ले लिया तो उसमें अन्य ट्रेनों के विलम्बित होने की संभावना बढ़ जाती है। जहाँ कहीं भी पहुँचा जा सकता है, निरीक्षण सड़क मार्ग से करना श्रेयस्कर होता है।

यही कारण रहा कि सड़क मार्ग पर कई हज़ार किलोमीटर चलना हुआ। दक्षिण भारत में सड़कें बहुत अच्छी हैं और जितने किलोमीटर जाना हो, बहुधा उतने मिनट से अधिक का समय नहीं लगता है। हाँ, बेंगलोर से बाहर निकलने और वापस आने के लिये सुबह और सायं के व्यस्त घंटों से स्वयं को बचाना होता है। सुबह शीघ्र निकल कर सायं होने के पहले ही वापस आने से ही समय की बचत संभव है यहाँ। आगे बैठने से सड़क की गतिविधि स्पष्ट दिखती हैं।

निरीक्षणों के समय की गयी सड़क यात्राओं में किये गये सतत अवलोकनों से इस विषय की उत्पत्ति हुयी है। हर बार जो देखा, उसमें लोकतन्त्र के साम्यरूप स्वतः ही दिखते गये। जो भी घटना देखी, विचार किया तो पाया कि लोकतन्त्र में भी यही होता है। धीरे धीरे सड़क यात्राओं की क्रियात्मक रिक्तताओं को सार्थक विचारशीलता मिलती गयी। मन में उठते प्रश्नों को उत्तर मिलता गया, उत्तरों की निश्चितता सिद्धान्त में बदलती गयी, उबाऊ सड़क यात्राओं में आनन्द आने लगा और साथ ही साथ सड़क के बहाने लोकतन्त्र की प्रक्रियाओं को समझने का अवसर भी मिलता गया।

कभी कभी बड़े तन्त्र को न समझ पाने की स्थिति में उससे मिलते जुलते छोटे तन्त्र को समझने से बड़े तन्त्र के गुण समझ में आ जाते हैं। तब उन दो तन्त्रों के भिन्न अवयवों में एक नियत संबंध पा लेने से एक तन्त्र की जानकारी को दूसरे तन्त्र की समस्यायें सुलझाने में प्रयोग किया जा सकता है। इन्जीनियरिंग में इस तकनीक को सिमुलेशन कहते हैं। बड़े तन्त्रों पर प्रयोग करना बड़ा कठिन, महँगा और घातक हो सकता है, अतः उपयुक्त और सर्वाधिक मिलते जुलते तन्त्र पर प्रयोग कर अवलोकन के निष्कर्षों से बड़े तन्त्र को लाभ पहुँचाया जा सकता है। उदाहरण के लिये अच्छे हवाई जहाज़ बनाने के आकाश में प्रयोग करने असंभव होते हैं, तब प्रयोगशाला में प्रयोग करने के लिये हमें छोटे मॉडल और ठीक वैसा ही तन्त्र बनाना होता है, जो बड़े से मिलता जुलता हो।

अव्यवस्थित लोकतन्त्र के संकेत
मैं न तो राजनीति शास्त्र का विद्यार्थी रहा हूँ और न ही लोकतन्त्र के प्रयोगों पर गहरी रुचि है, पर टीवी चैनलों, ट्रेन के डब्बों और चाय की दुकानों पर हुयी हाहाकारी चर्चाओं से अछूता भी नहीं रह सका हूँ। जब लोग अपने कार्य करने के तरीक़ों को लोकतन्त्र की सच्ची परिभाषा बताने लगते हैं तो मुझे पर सड़क पर दिखी किसी घटना से उसकी साम्यता दिख जाती है। तब लगता है कि सड़कों पर तो और बहुत कुछ होता है तो क्या सिमुलेशन के सिद्धान्तों के आधार पर लोकतन्त्र में उन सबकी संभावना बनती है क्या? इन तथाकथित प्रयोगों के अतिरिक्त यदि कोई लोकतन्त्र पर सार्थक प्रयोग करना भी चाहे तो क्या सीमित भाग पर किये प्रयोग सार्वभौमिक हो सकेंगे? न जाने कितने प्रयोगों में हम हाथ झुलसा बैठे हैं, आइये सड़कीय तन्त्र से उसकी अद्भुत साम्यता देख भविष्य के निष्कर्ष निकालने के प्रयास करते हैं।

एक सड़क है, दो दिशायें हैं, दोनों दिशाओं में वाहन चल रहे हैं। यदि एक ही लेन होगी तो जब भी कोई सामने से आयेगा तो गति धीमी कर खड़ंजे में उतरना पड़ेगा। यही नहीं आगे चलने वाला कितने भी धीरे चले, पीछे वाले को आगे निकलने नहीं देगा। कुछ ऐसा ही दिखता है हमें लोकतन्त्र में भी। सड़क चौड़ी कर दें, आने जाने वालों के लिये अलग अलग लेन बना दें। एक दिशा में भी दो लेन बना दें जिससे पीछे से अधिक गति से आने वाले को रुकना न पड़े। आगे बढ़िये तो आपको चौराहे मिलते हैं, बायें या जायें से आने वाले के लिये आपको रुकना पड़ता है। रोकने के लिये या तो सिग्नल लगे रहते हैं या ट्रैफिकवाला खड़ा रहता है। जो भी रहे, चक्रीयता से सबको जाने देता है। जब किसी दिशा से आने वाला प्रवाह कम या अधिक हो तो सिग्नल की अवधि यथानुसार कम या अधिक की जाती है।

व्यवस्थित लोकतन्त्र के संकेत
जब लगता है कि चौराहे पर दोनों ही दिशाओं में प्रवाह सतत है और बहुत लोगों को बहुत अधिक विलम्ब हो रहा है तो फ्लाईओवर बनाये जाते हैं जिससे दोनों दिशाओं का यातायात निर्बाध चले। इस स्थिति में सीधे जाने वालों को तो सुविधा हो जाती है, पर बायें या जायें मुड़ने वालों के लिये पूरा चक्कर लगा कर जाना पड़ता है। अष्टचक्रीय आकृतियाँ बन जाती हैं यदि हर दिशा के यातायात को बिना रुके जाना हो। लोकतन्त्र में भी यदि लोगों के भिन्न विचारों और अपेक्षाओं को समाहित करना हो तो ऐसी ही व्यापक आधारभूत संरचनायें बनानी होती हैं और जब तक वह संभव न हो, अनुशासित ढंग से व्यवस्था चलानी होती है।

यातायात व्यवस्था का यदि कोई मानक हो सकता है तो वह है, चलने वाली गाड़ियों का न्यूनतम विलम्ब। वह विलम्ब शून्य हो जाये तो सर्वोत्तम, पर उसके लिये व्यापक आधारभूत संरचनायें आवश्यक होंगी। जो भी हो, पर प्रयास की दिशा वही हो जिससे यह विलम्ब न्यूनतम हो जाये। ऐसा नहीं है कि विलम्ब न्यूनतम हो जाने से सारे वाहन एक गति में चलने लगेंगे। भिन्न वाहन होंगे, भिन्न चालक होंगे, वाहनों की अपनी क्षमता और चालकों की अपनी योग्यता होगी। हो सकता है कोई गतिशील वाहन में बैठा हुआ भी धीरे चला रहा हो, कोई चालक थका हुआ हो, कोई अपने वाहन को क्षमता से भी अधिक खींच रहा हो। सब उसी के अनुसार गतिशील होंगे पर व्यवधान रहने से उन्हें अपनी क्षमता से जीने का अवसर न मिलना सड़कों पर उपजे असंतोष का प्रथम स्वर होता है, यही लोकतन्त्र में भी होता है।

कभी दो ट्रकों को सड़क पर प्रतियोगिता करते हुये देखा है? यदि भारी भरकम दो ट्रक मदत्त हो जायें तो छोटे वाहन दूर ही रह कर आगे बढ़ते रहते हैं, पास रहकर अपने जीवन को संकट में नहीं डालते हैं। कभी देखा है कि जब दो बड़े ट्रक दोनों लेनों पर एक ही गति से और बराबर से चलते हैं तो पीछे से पों पों करती गतिमय और क्षमतावान फ़ोर्ड और बीएमडब्लुओं को कितनी मानसिक पीड़ा होती होगी। लोकतन्त्र की प्रक्रियाओं में भी देखा जाये तो इस तरह मिल जुल कर रास्ता छेकने वालों की कमी नहीं है। उनके बीच तनिक सी भी जगह मिल जाये तो लहराते हुये कई गाड़ियाँ देखते ही देखते आगे निकल जाती है। बग़ल की लेन से जा रही यदि किसी गाड़ी से आगे निकलना होता है तो कई बार लोग बहुत अधिक गति पकड़ लेते हैं।

किसी गाँव या क़स्बे के पास से निकलते हुये स्पीड ब्रेकरों से सामना होता है और आप न चाहकर भी अपनी गति नियन्त्रित करते हैं, आप सावधानी से गति का पालन करते हैं। कई वाहनों की गाड़ी का मॉडल ही नहीं, उसकी नम्बर प्लेट के अंक भी उसके अतिविशिष्ट होने के संकेत दे जाते हैं। हम जैसे कुछ समझदार वाहन सड़क पर तब निकलते हैं जब यातायात कम होता है। रोड पर बने गढ्ढे न केवल गति कम करते हैं वरन वाहन और चालक का कचूमर भी निकाल देते हैं। रात में सामने की ओर से आते हुये वाहनों की लाइटों से आँखें चुँधियाँ जाती हैं। रोड के किनारे लगे हुये बड़े बड़े विज्ञापनों के बोर्ड आपका ध्यान भंग करने का प्रयास करते हैं। बहुधा बड़े नगर या गंतव्य पर पहुँचने के समय बड़े बड़े जाम लग जाते हैं। ये सारी साम्यतायें मुझे लोकतन्त्र में यथारूप दिखती हैं।

मैंने ऐसे चालक और वाहन भी बहुतायत में देखें हैं जो सड़क पर बिखरी संभावनाओं से अलग चुपचाप समगति बनाये रहते हैं और अपने गंतव्य पर पहुँचते हैं। ऐसे अनुशासन में रहने वालों की संख्या बहुत अधिक है, सड़क का तन्त्र ऐसे ही लोगों से स्थिर रहता है, चलता रहता है। नहीं तो गतिमय प्रयोग करने वाले बहुत से कहीं सड़क के किनारे दुर्घटनाग्रस्त पड़े होते हैं, क्योंकि सब के सब तो प्रथम आ नहीं सकते।

आप भी जब अगली बार सड़क यात्रा करें तो सड़क पर हो रहे उन प्रयोगों को अवश्य देखियेगा जो लोकतन्त्र में या तो चल रहे हैं या निकट भविष्य में उनकी संभावना बन रही है। हो सकता है कि कभी ऐसे ही अपना देश लाभान्वित हो जाये।

चित्र साभार - www.colourbox.comwww.sfgate.com

25.8.12

झण्डा ऊँचा रहे हमारा

स्वतन्त्रता दिवस था, सुबह सर ऊँचा कर भारत के झण्डे के सामने राष्ट्रगान का सस्वर पाठ किया था। जब भी राष्ट्रगान बजता है, दृष्टि स्वतः ही झण्डे की ओर चली जाती है। बहती हवा में लहराता झण्डा मन में रोमांच भर देता है, लगता है कि कोई प्रतीक है जो हमें एक देश के सूत्र में बाँधे है, कोई प्रतीक है जो हमें उस संघर्ष की याद दिलाता है जो हमारे पूर्वजों की भेंट थी हम लोगों के लिये, इसलिये कि हम मुक्त गगन में जी सकें। घर वापस आकर कवि प्रदीप के लिखे गीतों पर आधारित एक कार्यक्रम देख रहा था। मन संतुष्ट था, भारत का लोकतन्त्र अपने ६५ वर्ष पूरे कर चुका था।

तभी वाणिज्य विभाग के अधिकारी का फोन आता है कि सर गुवाहटी के लिये ६०० अतिरिक्त टिकट बिक चुके हैं, लगता है कि आज जाने वाली ट्रेन में अतिरिक्त कोच लगाने होंगे। सामान्य दिनों की अपेक्षा संख्या अधिक थी पर कारण विशेष ज्ञात नहीं था, अधीनस्थों को अतिरिक्त कोचों की व्यवस्था सम्बन्धित आवश्यक निर्देश देकर आश्वस्त हो गये। अभी दो घंटे ही और बीते होंगे कि सूचना मिली कि टिकटों की संख्या २००० पार कर चुकी है, स्टेशन पर बहुत भीड़ है और लोग अभी भी टिकट ले रहे हैं। यह निश्चय ही असामान्य था, कोई बात अवश्य थी। उस समय बच्चों के साथ टेबल टेनिस खेल रहा था, जब और जानकारी लेने के लिये मोबाइल पर बात करने लगा तो बच्चों ने इस तरह देखा, मानो कह रहे हों कि आप यहाँ पर भी चालू हो गये।

दस मिनट में यह पक्का हो गया था कि लोग व्यग्र हैं और पलायन कर रहे हैं। नियत ट्रेन में इतनी क्षमता नहीं है कि वह इतने यात्रियों को ले जा पायेगी। अतिरिक्त कोच लगाने पर भी सबको स्थान नहीं दिया जा सकता था। एक विशेष ट्रेन चलाने का निर्णय लिया गया। सामान्य स्थिति में एक नियत प्रक्रिया के बाद ही ऐसी अनुमति मिलती हैं पर परिस्थितियों की गम्भीरता को देखते हुये तुरन्त ही मौखिक अनुमति मिल गयी। राष्ट्रीय अवकाश था और अधीनस्थों की संख्या अन्य दिनों से कम थी, फिर भी सब स्टेशन पर पहुँच गये थे। स्टेशन पर भीड़ अप्रत्याशित थी और सूचना मिल चुकी थी कि ३००० से अधिक टिकट बिक चुके हैं। व्यवस्था बनाये रखने के लिये सुरक्षा बल पहुँच चुके थे।

जो लोग रेलवे से जुड़े हैं, वे जानते हैं कि इतने कम समय में एक विशेष ट्रेन को चलाना बड़ा ही दुरूह कार्य है। कोचों को एकत्र करना, एक साथ लाकर ट्रेन को स्वरूप देना, ६ घंटे के नियत गहन परीक्षण में देना, इंजन, ड्राइवर और गार्ड आदि की व्यवस्था करना। इन सब कार्यों में कई निर्णय तात्कालिक लेने होते हैं, उस हेतु सारे सम्बन्धित अधिकारी और पर्यवेक्षक अपने कार्यस्थल पर पहुँच चुके थे, कार्य अपनी पूरी गति में था। उधर भीड़ व्यग्र हो रही थी, उन्हें भी बताना आवश्यक था कि उनके लिये एक विशेष ट्रेन चलायी जायेगी। नियत ट्रेन के पहले ही एक विशेष ट्रेन चलाने की घोषणा ने भीड़ को संयत किया, प्लेटफार्म नियत कर उसकी भी उद्घोषणा कर दी गयी। सुरक्षाबलों ने बड़ी ही कुशलता से सबको नियत प्लेटफार्म पर पहुँचाने का कार्य प्रारम्भ किया। धीरे धीरे सारा प्लेटफार्म भर गया, लोग अनुशासित हो विशेष ट्रेन के आने की प्रतीक्षा करने लगे।

जिस समय संवेदनायें अपने उफान पर हों, समस्या को सीमित मान लेने की भूल नहीं की जा सकती थी। इतनी व्यवस्था करने के बाद भी टिकट बिक्री पर दृष्टि बनी हुयी थी। पहली विशेष ट्रेन जाने में अभी ४ घंटे शेष थे, तभी पता लगा कि टिकट ७००० की संख्या पार कर चुके हैं। निर्णय लेना आवश्यक था, एक और विशेष ट्रेन की अनुमति लेकर उसकी घोषणा कर दी गयी। जब घर में ४ लोगों का खाना बनता हो और सहसा गृहणी को १०० लोगों की व्यवस्था करने को कहा जाये, तो जो स्थिति गृहणी की होती है, वैसी ही हम लोगों की हो रही थी। हाथ में जो भी था, उसे सेवा में लगा दिया गया, पड़ोसी मंडलों और मुख्यालयों से सहायता के लिये गुहार लगायी गयी। वरिष्ठों ने परिस्थितियों को समझा और यथासंभव और त्वरित सहायता की व्यवस्था की। सहायता आनी थी पर उसमें समय लगना था, सामने ७००० की संख्या। बस ईश्वर से यही मना रहे थे कि आज संख्या इससे अधिक न बढ़े, दो विशेष और एक नियमित ट्रेन में ७००० यात्रियों को भेजना संभव था।

ट्रेनों की तैयारी पर और भीड़ की गतिविधियों पर दृष्टि बनी रहे, इस कारण फुट ओवर पुल पर एक स्थान ढूढ़ा गया। वह भीड़ के प्रवाह से थोड़ा अलग था और निर्णय लेने के लिये समुचित। तब तक स्टेशन पर पहुँच चुके मीडिया और अन्य संगठनों की दृष्टि से भी दूर था वह स्थान। एक सुरक्षाकर्मी और एक पर्यवेक्षक के साथ वहाँ पर कोई व्यवधान नहीं था। स्टेशन पर लगातार उद्घोषणा की जा रही थी जिससे भीड़ संयत बनी रहे, सबको यह विश्वास दिलाया जा रहा था कि सबको भेजने की व्यवस्था की जायेगी। इतनी अधिक भीड़ तीन घंटे संयत और अनुशासित बैठी रही, यह अपने आप में स्मरणीय अनुभव था हम सबके लिये।

अन्ततः पहली विशेष ट्रेन आयी, पर उसके पहले निर्णय इस बात का लेना था कि कोचों के दरवाजे पहले से खोलकर लाया जाये या बन्द कर के। दरवाजे खोलकर लाने से लोग चलती ट्रेन में घुसने का प्रयास करते और कुछ अनहोनी होने की संभावना बनी रहती। बन्द कर के लाने से लोग अधीर हो जाते। अन्ततः निर्णय लिया गया कि प्लेटफार्म की ओर दरवाजे बन्द रखे जायेंगे औऱ दूसरी ओर के खुले। हर कोच में एक कर्मचारी रहेगा जो अन्दर से दरवाजा तभी खोलेगा जब सुरक्षाबल बाहर से भीड़ को पंक्तिबद्ध और अनुशासित कर लेंगे। इसमें थोड़ा समय अधिक लगा, कर्मचारी अधिक लगे पर बिना किसी घटना के ट्रेन में यात्री बैठ गये। प्लेटफार्म पर बचे लोगों को अगली ट्रेन तक रुकने को कहा गया। जब ट्रेन सकुशल निकल गयी तभी अन्य यात्रियों को एक अस्थायी जमावड़े से प्लेटफार्म तक आने दिया गया।

डेढ़ घंटे के अन्दर तीन ट्रेन जाने के पश्चात प्लेटफार्म और टिकटघर खाली हो चुका था। आरक्षित यात्रियों समेत लगभग ८५०० यात्रियों को सकुशल भेजने के बाद समय देखा तो रात्रि २ बज चुके थे। हमारा कार्य फिर भी समाप्त नहीं हुआ था, लगभग आधे घंटे दिनभर के कार्य की कमियों पर छोटी चर्चा हुयी, अच्छे कार्य के लिये अधीनस्थों की पीठ थपथपायी गयी। यह मानकर चला जा रहा था कि अगले दिन भी यही प्रवाह बना रहेगा। अन्य मंडलों से आने वाली सहायता के आधार पर अगले दिन की रूपरेखा बनाकर घरों की ओर प्रस्थान किया गया।

घर आया तो दोनों बच्चे गहरी नींद में सो रहे थे, न साथ टेबल टेनिस खेल पाया, न साथ में भोजन ही कर पाया। मेरी भी आँखों में गहरी नींद थी, पर यह सोच रहा था कि जब कल बच्चे पूछेंगे कि देर रात तक स्टेशन पर क्या कर रहे थे, तो क्या उत्तर दूँगा? यदि कहूँगा कि ६५ वर्ष के लोकतन्त्र की दृढ़ता का एक अपवाद देख कर आया हूँ, तो क्या वे इस बात को समझ पायेंगे? एक रेलवे कर्मचारी के रूप में सामने उपस्थित कार्य को सकुशल निभा पाने की उपलब्धि क्या उन्हें सगर्व बता पाऊँगा? पंजाब, सिन्धु, गुजरात, मराठा, द्राविड़, उत्कल, बंग, जो कभी एक वाक्य में पिरोये गये थे, जो राष्ट्रगान के अंग थे, वे आज अपने अपने अलग अर्थ क्यों ढूढ़ने लगे हैं, क्या यह समझा पाऊँगा?

अधिक सोच नहीं पाता हूँ, निढाल हो बिस्तर पर लुढ़क जाता हूँ। जो भी हो, कल फिर गाऊँगा, झण्डा ऊँचा रहे हमारा।