17.9.19

अभ्यास और वैराग्य - ९

यम और नियम कुल दस गुण हैं। अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह यम कहलाते हैं। शौच, संतोष, तप, स्वाध्याय और ईश्वर प्राणिधान नियम हैं। यम निषेधपरक हैं, नियम विधिपरक। यम में हम अपनी उन प्रवृत्तियों को रोकते हैं जो हमें अस्थिर करती हैं। हम एक स्तर ऊपर उठ जाते हैं, संभवतः इसलिये कि बात आगे न बढ़े, अस्थिरता न बढ़े। नियम में हम उन गुणों को विकसित करते हैं जिससे हमें यम स्थिर रखने हेतु कुछ और मानसिक बल मिलता है। नियम से यम और भी नियमित हो जाते हैं।

मन साधने के लिये यह आवश्यक है कि शरीर सधे, परिवार सधे, समाज सधे। यदि ऐसा नहीं होगा तो मन वहीं लगा रहेगा। यदि समाज स्थिर नहीं रहेगा तो मन कैसे स्थिर रहेगा। इनको साधते साधते पर हम इतना खो जाते हैं कि मन साधने का प्रारम्भिक लक्ष्य भूल जाते हैं, नये पथ में रथ बढ़ा देते हैं। परिवार और समाज संबंधों का विस्तृत आकाश है, उसमें यदि सब मनमानी पर उतर आयेंगे तो अव्यवस्था पसर जायेगी। सुचारु व्यवस्था हेतु न्यूनतम आवश्यकतायें तो हमें माननी ही होंगी। सहजीवन के धर्म मानने होंगे।

धर्म वर्तमान का संभवतः सर्वाधिक शापित शब्द है, कोई इसका अर्थ समझना ही नहीं चाहता। इस शब्द को बहुधा कठघरे में उन शब्दों के साथ खड़ा कर दिया जाता है जिन पर हम अपनी दुर्गति और अवनति के आरोप थोपते आये होते हैं। संस्कृत की धृज् धातु से धर्म शब्द बना है, अर्थ है धारण करना। धार्यते इति धर्मः। जो समाज को धारण करे, आधार दे, स्थिरता दे, आश्रय दे, वह धर्म है। धर्म जोड़ने का कार्य करता है, तोड़ने का नहीं। धर्म की गति न्यायवत है, अन्यायवत नहीं। 

मित्र से बात हो रही थी। धर्म के नाम पर प्रचलित कई कुरीतियाँ, रूढ़ियाँ, और विक्षेपों से वह आहत हो जाते हैं। यह सब होते हुये धर्म को किस प्रकार समझा जाये, स्वीकार किया जाये। क्या माना जाये, क्या न माना जाये। धर्म के विषय में अपना दिशायन्त्र तब क्या हो भला? पशोपेश है कि संस्कृति की धरोहर न छोड़ते बनती है और न ही सहर्ष स्वीकार हो पाती है। 

जब डोर उलझ जाये तो सिरे ढूढ़ने होते हैं। मूल समझने से विकार का आकार और प्रकार सब समझ आ जाता है। क्या धर्म है और क्या नहीं, इस विषय पर सदा मनु द्वारा बताये धर्म के लक्षणों को ही स्मरण करने से भ्रम अवगलित हो जाता है। 

मनु धर्म के दस लक्षण बताते हैं। दशकम् धर्म लक्षणम् - धृति, क्षमा, दम, अस्तेय, शौच, इन्द्रियनिग्रह, धी, विद्या, सत्यम्, और अक्रोध। यदि कोई विचार, कृत्य, व्यक्ति आदि इन लक्षणों के विपरीत वर्ताव करता है तो वह धर्मसम्मत नहीं है। कर्मकाण्ड और पद्धतियाँ धर्म के लिङ्ग या चिन्ह तो हो सकते हैं पर मूल यही दस लक्षण ही होंगे। इससे स्पष्ट कोई और प्रमाण या परीक्षा हो ही नहीं सकती। यही नैतिकता भी है, वह जो आगे ले जाये। ‘नी’ धातु ‘ले जाने’ के अर्थ में आती है, नेता, नायक, नौका आदि।

ध्यान से देखे तो यम और नियम में वर्णित दस गुण और मनु द्वारा नियत धर्म के दस लक्षण लगभग एक ही हैं। अर्थ स्पष्ट है, यम और नियम का पालन सामाजिक, पारिवारिक और मानसिक स्थायित्व देता है। संभवतः योग पथ में बढ़ने के लिये इससे सशक्त आधार और कुछ हो भी नहीं सकता है। 

यम यदि वाह्य साम्य स्थापित करता है तो नियम आन्तरिक साम्य। यम और नियम का क्रम अत्यन्त महत्वपूर्ण है, हम बाहर से अन्दर की ओर बढ़ रहे हैं। आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि से हम और भी अन्दर तक जाते जायेंगे। अन्दर जानना आवश्यक है योग के लिये। जिसको जानना है, उसी के माध्यम से जानना है। मन को जानना है, मन के माध्यम से जानना। योग यही है, कठिन इसीलिये है, समय इसीलिये लगता है, इसीलिये मन की वृत्तियों को रोकना है अन्यथा न मन देख पायेगा और न मन दिख पायेगा। अन्दर देखने से मन की अन्य गति सीमित हो जाती है, तब बस दृष्टा और मन।

अगले ब्लाग में यम और नियम के व्यावहारिक और यौगिक पक्ष।

14.9.19

अभ्यास और वैराग्य - ८

टीकाकारों का मत है कि पतंजलि योगसूत्र में तीन प्रकार के साधन बताये गये हैं। पहला अभ्यास और वैराग्य का, दूसरा क्रियायोग का और तीसरा अष्टांगयोग का। यद्यपि पतंजलि ने साधकों के आधार पर वर्गीकरण नहीं किया है पर तीनों साधनों का उल्लेख क्रमशः किया है, पहले अभ्यास व वैराग्य का(१.१२), फिर क्रियायोग का(२.१) और अन्ततः अष्टांग योग का (२.२९)। ये तीनों साधन क्रमशः विस्तृत होते जाते हैं। अभ्यास और वैराग्य के बाद के सूत्रों में केवल सम्प्रज्ञात और असम्प्रज्ञात समाधि का वर्णन है, पढ़ने से लगता है कि अभ्यास और वैराग्य के द्वारा समाधि की इन अवस्थाओं को उन्नत किया जाता है। अष्टांग योग के अन्तिम तीन अंगों को यहाँ लिया गया है, धारणा, ध्यान और समाधि को। क्रियायोग में तप, स्वाध्याय और ईश्वर प्राणिधान का समन्वय है। ये तीन अवयव अष्टांग योग में नियम अंग के ही उपांग हैं।

भाष्यकारों ने इन तीन साधनों को साधकों की क्षमताओं के अनुसार वर्गीकृत किया है। अभ्यास और वैराग्य उत्तम साधकों के लिये, क्रियायोग मध्यम साधकों के लिये और अष्टांगयोग नवसाधकों के लिये। अष्टांगयोग एक पूरा मार्ग बतलाता है, सबको समावेशित करता हुआ चलता है। यदि अपनी स्थिति या क्षमता के बारे में तनिक भी संदेह हो तो अष्टांग योग का ही मार्ग अपनायें। सभी साधकों का साध्य एक ही है पर क्षमतानुसार प्रारम्भिक बिन्दु भिन्न होने के कारण तीन अलग मार्ग उल्लिखित किये गये हैं।

गीता में इन मार्गों को कैसे समझाया गया है, इसके पहले एक तथ्य जानना आवश्यक है। अभ्यास और वैराग्य के वर्णन के पश्चात ही पतंजलि सम्प्रज्ञात और असम्प्रज्ञात समाधि के बारे में बतलाते हैं। किस प्रकार श्रद्धा, वीर्य, स्मृति, समाधि और प्रज्ञा से असम्प्रज्ञात योग होता है। प्रक्रिया की तीव्रता साधन की गति पर निर्भर करती है। इस सूत्र के पश्चात एक वैकल्पिक और त्वरित उपाय बताते हैं, ईश्वरप्राणिधान, ईश्वर की भक्ति या शरणागति। इससे विघ्नों का अभाव और स्वरूप का ज्ञान हो जाता है(१.२९)। पतंजलि ने ईश्वर के लक्षण परिभाषित किये है, पाठकों या आलोचकों की कल्पना के लिये कुछ भी नहीं छोड़ा है। विघ्न भी १४ बताये गये हैं, उनका वर्णन फिर कभी। पर तीनों ही मार्गों में ईश्वरप्राणिधान एक विशिष्ट स्थान रखता है। यह एक विशेष साधन है, मार्ग में कब और कैसे आता है, मार्ग विशेष पर निर्भर करता है।

ईश्वरप्रणिधान को समझने के क्रम में भारतीय संस्कृति के तीन विशेष तत्व उद्धाटित होते हैं। ये तत्व योगसूत्र में कहीं और नहीं कहे गये हैं। पहला गुरु का महत्व, दूसरा सत्संग का महत्व और तीसरा ईश्वर का अस्तित्व। हमारे शास्त्रों में इन तीनों को व्यापकता से प्रसारित और व्याख्यायित किया है। उस पर विचार करने के पहले ईश्वर के बारे में ५ सूत्रों का अर्थ समझ लेते हैं।

क्लेश, कर्म, विपाक और आशय से असंबद्ध पुरुषविशेष ईश्वर है(१.२४)। उसका ज्ञान निरतिशय(जिससे बड़ा कुछ न हो) है(१.२५)।  ईश्वर काल से अवच्छेद नहीं है और पूर्वजों का भी गुरु है(१.२६)। उसका वाचक या नाम प्रणव या ऊँ है(१.२७)। ऊँ कार का जप उसके स्वरूप का चिन्तन है(१.२८)।

जिस मार्ग पर हम चलना चाह रहे हैं,  एक मार्गदर्शक ही हमारी सहायता कर सकता है। उसने पंथ देखा है, उसने औरों को भी वह पंथ पार कराया है। उसके अन्दर सामर्थ्य है हमारी आध्यात्मिक और भौतिक सहायता करने की। यदि हम योग के मार्ग पर ही अद्भुत सिद्धियों को प्राप्त कर सकते हैं तो जो उस प्रक्रिया के शीर्ष पर विद्यमान है, उसकी सामर्थ्य तो अनन्त होगी। ईश्वर और हमारे बीच एक प्रक्रिया का सम्बन्ध भी है और उसी प्रक्रिया का अन्तर भी। प्रक्रिया में उन्मुख होने पर वह सहाय्य है, स्नेहिल है। प्रक्रिया से विमुख के प्रति असंबद्ध और उदासीन। प्रक्रिया के अतिरिक्त अन्य सृष्टिगत कार्यों में ईश्वर की क्या भूमिका है, इस पर पतंजलि विषयान्तर नहीं होते हैं। ईश्वर पर प्रारम्भिक विश्वास भले ही हमारी श्रद्धा का द्योतक हो, पर प्रक्रिया के मार्ग में वह विश्वास नित दृढ़ीभूत होता जाता है, यही प्रक्रिया की सिद्धि है। 

गीता के परिप्रेक्ष्य से यदि इन तीनों मार्गों को पहचाने तो ये क्रमशः ज्ञानमार्ग, भक्तिमार्ग और कर्ममार्ग समझ आते हैं। मार्गों को देखें तो ये पृथक नहीं वरन एक दूसरे से आच्छादित हैं। ज्ञानमार्ग में भक्ति है, भक्तिमार्ग में कर्म है, कर्ममार्ग में भक्ति और ज्ञान दोनों ही सम्मिलित हैं। गीता में बड़ी ही सम्यकता से इसे समझाया है। मार्ग भिन्न दिखते हैं पर निष्कर्ष एक है, परस्पर पूरक हैं। 


आगे अष्टांग योग के अंगों का परिचय।

10.9.19

अभ्यास और वैराग्य - ७

अभ्यास और वैराग्य से योग की किस स्थिति तक पहुँचा जा सकता है? यदि उस स्थिति तक न पहुँच पाये तो क्या पुनः प्रारम्भ से प्रयास करना होगा? यद्यपि प्रक्रिया के प्रारम्भ होने से हमें भौतिक लाभ प्राप्त होने लगते हैं, पर आध्यात्मिक लक्ष्य क्या हैं?

योग का लक्ष्य चित्त की वृत्तियों का निरोध है। अभ्यास और वैराग्य से हम पहले पाँच अंग साधते हैं, इन्हें वाह्य अंग या बहिरंग कहा जाता है, यम, नियम, आसन, प्राणायाम और प्रत्याहार। धारणा, ध्यान और समाधि को सम्मिलित रूप से संयम की संज्ञा दी है, ये आन्तरिक अंग हैं, अंतरंग। बिना बहिरंग साधे अंतरंग संभव भी नहीं है। संयम का लक्ष्य ऋतम्भरा प्रज्ञा होती है या कहें तो वह बुद्धि जो सत्य पर टिकी रहती है। संयम का विषय क्रमशः स्थूल से सूक्ष्म होता जाता है। किस विषय पर संयम करने से क्या सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं, इसका पूरा विवरण विभूति पाद में है, उस पर चर्चा फिर कभी।

यहाँ तक की प्रक्रिया को सम्प्रज्ञातयोग कहते हैं, जिससे प्रज्ञा प्राप्त हो। अब चित्त की नयी वृत्तियों का बनना समाप्त हो जाता है पर पुरानी वृत्तियों और तज्जनित कर्मों के कारण संस्कार शेष रहते हैं। कालान्तर में वे संस्कार भी क्षीण हो जाते हैं, उस समय की अवस्था को असम्प्रज्ञातयोग, निर्बीज समाधि या कैवल्य अवस्था कहते हैं। योगसूत्र का विषय यहीं समाप्त हो जाता है, गीता उसके बाद की भी गतियों का वर्णन करती है।

स्थितिप्रज्ञ, विदेह और प्रकृतिलय, ये तीन शब्द हमें योगसूत्र और गीता से प्राप्त होते हैं। स्थितिप्रज्ञ या जिसकी बुद्धि स्थिर हो, विदेह या  देह के अभिमान से रहित और प्रकृतिलय या चित्त को प्रकृति में लीन करने वाले। इन तीनों की समाधि अवस्था को पुरुष, शरीर और प्रकृति की दृष्टि से देखा जा सकता है। चित्त पुरुष और प्रकृति के बीच का संपर्कसूत्र है। उसकी उपादेयता पुरुष को भोग से अपवर्ग तक ले जाने की है। स्थितिप्रज्ञता पर पहुँचते ही चित्त अपने कारण में विलीन हो जाता है, प्रकृति में विलीन हो जाता है, प्रकृतिलय हो जाता है। देह की इन्द्रियाँ तब चित्त के माध्यम से अपने विषयों में लिप्त नहीं हो पाती है, व्यक्ति विदेह हो जाता है।

माँ सीता को वैदेही भी कहते हैं, यह नाम उन्हें अपने पिता राजा जनक से मिला। जनक राजा थे पर विदेह थे। राजकार्य करते हुये भी निर्लिप्त थे। योग के निष्कर्षों की दृष्टि से कर्म, भक्ति और ज्ञान में कोई भेद नहीं है। अपनी क्षमताओं और रुचियों के अनुसार साधन चुनने की स्वच्छन्दता योग को और भी सौन्दर्यमयी बना देती है। योग गृहस्थ या सामाजिक जीवन में व्यवधान नहीं वरन एक वरदान है। योग को समग्रता से न जानने वालों का संशय तो समझ आता है पर जिनके समक्ष योग के इतने सुन्दर उदाहरण इतनी सहजता से उपस्थित हों, उन्हें योग स्वीकारने में संशय हो, यह सामान्य बु्द्धि से परे है।

अभ्यास की परिभाषा, गुण और उसकी अष्टांगयोग में आवश्कता बताने के साथ ही पतंजलि अभ्यास हेतु पाँच साधनों का भी वर्णन करते हैं। श्रद्धा, वीर्य, स्मृति, समाधि और प्रज्ञा। इनसे अभ्यास शीघ्रप्राप्त और अत्यन्त दृढ़ होता है। शब्द स्पष्ट हैं, फिर भी सरलता के लिये अर्थ बताते चलते हैं।

श्रद्धा - भक्तिपूर्वक विश्वास। जो कर रहे हैं उस पर पूरा विश्वास। संशय चित्त की अवस्था है, प्रभावित हुये तो पगभ्रमित होने की संभावना है, विलम्ब की संभावना है।
वीर्य - मन, इन्द्रिय और शरीर का सामर्थ्य और दृढ़ता। उत्साह बना रहना चाहिये। निष्कर्ष आने में समय लग सकता है, कई कारण होते हैं, पर उत्साह, ऊर्जा और उद्योग अत्यन्त आवश्यक है।
स्मृति - ध्येय की स्मृति, योग की क्रियाओं की स्मृति, अंगों की स्मृति, बार बार। किसी भी कार्य को करने में किसी यम या नियम की अवहेलना तो नहीं हो रही है।
समाधि - चित्त का एकाग्र होना। पूरी ऊर्जा और ध्यान एक ही कार्य में प्रस्तुत हो जाता है। इससे अभ्यास और दृढ़ होता जाता है।
प्रज्ञा - स्वयं के स्वरूप का समुचित ज्ञान, साधन और साध्य का ज्ञान, उपादेय और हेय का ज्ञान।

यावत् जीवेतम सुखम् जीवेत के अनुयायी भले ही छद्म धरे और बुद्धि के बल पर जगत को ढग लें, पर ऐसे लोगों की मानसिकता उद्भाषित होने पर बड़ी छीछालेदर होती है। आप किसी को कितना मूर्ख बना सकते हैं? उद्योग और उत्साह का अभ्यास ग्राह्य हो, कुटिलता और चालाकी त्याज्य हो। योग के पथ पर कितना भी चल सके, कोई हानि नहीं है। यह श्रीकृष्ण की घोषणा हैं, त्रायते महतो भयात् (२.४०), न मे भक्तः प्रणश्यति(९.३१)।

अगले ब्लाग में अष्टांग योग की चर्चा।

7.9.19

अभ्यास और वैराग्य - ६

वैराग्य को पतंजलि ने दो सूत्रों में परिभाषित किया है।

दृष्टानुश्रविकविषयवितृष्णस्य वशीकारसंज्ञा वैराग्यम् - देखे और सुने विषयों में वितृष्णा वशीकार वैराग्य है।
तत्परं पुरुषख्यातेर्गुणवैतृष्ण्यम् - पुरुष के ज्ञान से प्रकृति के गुणों में वितृष्णा परवैराग्य है।

वैराग्य की दो स्थितियाँ हैं, वशीकार वैराग्य एवं पर वैराग्य। जो विषय हमारे मन को बार बार इधर उधर भटकाते हैं, उनसे वितृष्णा होना वशीकार वैराग्य है। अभ्यास से स्थिर मन को यदि विषय खींचते रहेंगे तो दृढ़भूमि भी स्थिर नहीं रहेगी। वैराग्य से अभ्यास दृढ़ होता है और अभ्यास से वैराग्य। दोनों ही एक दूसरे पर आश्रित रहते हुये साथ साथ चलते हैं। जब पुरुषख्याति होती है या कहें कि अपना स्वरूप जानने की स्थिति आती है तब जो विवेक उत्पन्न होता है उससे वैराग्य पूर्णरूप से सिद्ध हो जाता है। तब विषय से मन हटाने के लिये प्रयास नहीं करना पड़ता है, वैराग्य स्वतःस्फूर्त होता है।

वैराग्य को समझने की दृष्टि से तीन तथ्य अत्यधिक महत्वपूर्ण हैं। पहला यह कि वैराग्य उपादेयता और हेयता, दोनों से ही विलग है। उपादेय अर्थात ग्रहण करने योग्य, हेय अर्थात छोड़ने योग्य। यदि किसी वस्तु या विषय के बारे में हम यह सोचते रहे कि इसे ग्रहण नहीं करना है, इसे पास नहीं आने देता है तो वह वैराग्य की स्थिति नहीं है। किसी का हेयता पक्ष सोचना भी एक प्रकार का राग है। कहते हैं कि रावण को मुक्ति इसलिये मिल गयी कि वह शत्रुता या भयवश ही सही, पर श्रीराम के बारे में सोचता रहता था। वैराग्य, किसी विषय के प्रति न उपादेयता का भाव है और न ही हेयता का।

दूसरा यह कि वैराग्य वाह्य रूप से नहीं होता है। आप इन्द्रियों से किसी विषय से दूर हैं पर मन में एक लालसा बनी हुयी है कि यह मिल जाये, तब भी वह वैराग्य नहीं है। पलायनवादी अपना घर द्वार तो छोड़ आते हैं पर उनके घर द्वार का विचार उनके मन को नहीं छोड़ता है। मानसिक भोग भी भोग ही है। वर्षा के समय किसी गुरु ने सहायता स्वरूप किसी स्त्री को उठाकर नदी पार करा दी। बहुत समय बाद जब शिष्य से न रहा गया तो उसने गुरु के समक्ष अपना संदेह रखा। गुरु ने कहा कि मैं तो उसे उठाकर छोड़ भी आया, तुम तो उसे अभी तक अपने पास रखे हो।

तीसरा यह कि किसी भोग को श्रम और साधन के अभाव में या भयवश नहीं करना वैराग्य नहीं है। आपके पास धन नहीं है और आप लड्डू नहीं खरीद सकते। आपको डायबिटीज है और लड्डू खाने से आपके स्वास्थ्य पर अत्यधिक प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा। ये दोनों ही स्थितियाँ वैराग्य की श्रेणी में नहीं आती हैं। इसमें तृष्णा मिटी नहीं है, बस रुक गयी है। जैसे ही बाध्यता हटेगी, भोग मुखर हो जायेगा। यह विचारकर कि भोग अनित्य हैं या योग में जो आत्मिक सुख है वह इन भोगों से कहीं अधिक है या कालान्तर में भोग न होने पर अन्ततः ये दुख का कारण बनेगे, ये विचार बुद्धिजनित है और वशीकार वैराग्य की श्रेणी में आयेंगे। जब यह विवेक आ जायेगा कि आत्मा और शरीर अलग अलग हैं और शरीर को विषयों से पोषित करना श्रम को व्यर्थ करना है तो वह परवैराग्य होता है।

तो क्या सब कुछ छोड़ देना चाहिये। उपयोग और उपभोग में जो भिन्नता है वही भिन्नता वैराग्य को भी स्पष्ट करती है। हमें भौतिक साधनों का उपयोग करना है, उपभोग करने नहीं पसर जाना है। एक चोर कह सकता है कि मुझे चोरी का अभ्यास है और जिनके घर चोरी होती है, उनके कष्टों से वैराग्य है। यह चोर की कुशलता तो बढ़ायेगा पर योग के साधनों का पालन नहीं करेगा अतः यह योग नहीं कहलायेगा। क्योंकि यह कार्य भु्क्तिमार्गी है, मुक्तिमार्गी नहीं। 

एक प्रकार से देखा तो अभ्यास और वैराग्य मन के ही धर्म हैं। जिस पर हमें राग होता है उस पर मन बार बार सयत्न स्थित हो जाता है, उसका अभ्यास होने लगता है। इसी प्रकार जब मन उस भोग से उकता जाता है तो उस वस्तु या विषय के प्रति मन में वैराग्य हो जाता है। अभ्यास और वैराग्य का यह क्रम चक्रीय होता है और उसी चक्र में बार बार घूमता रहता है। योग वृत्तियों का निरोध है, न कि भोग के भँवर मे बार बार डूबना। मन के अन्दर ये दोनों गुण सदा विद्यमान हैं, बस किसका अभ्यास करना है और किससे वैराग्य करना है, यह दिशा योग ही देता है।

एक स्तर पर देखा जाये तो अभ्यास और वैराग्य परस्पर विरोधाभासी हैं। अभ्यास किसी विषय में प्रवृत्त होना है वैराग्य विषयों से विरक्त होना है। तब ये साथ साथ कैसे रह सकते हैं। भारतीय संस्कृति में इस प्रकार के उदाहरण बिखरे पड़े हैं, पर समन्वय और संतुलन के स्तर पर दोनों ही एक दूसरे को पुष्टित करते हुये चलते हैं। विरोधी प्रतीत होने पर भी दोनों ही आवश्यक है, किसी एक से काम नहीं चलेगा।

अगले ब्लाग में दो और सूत्र, ५ और मूलभूत आवश्यकताओं के बारे में चर्चा।

3.9.19

अभ्यास और वैराग्य - ५

पतंजलि अभ्यास को दो सूत्रों में परिभाषित करते हैं। 

तत्र स्थितौ यत्नोऽभ्यासः - वहाँ पर यत्नपूर्वक बने रहना अभ्यास है।
स तु दीर्घकालनैरन्तर्यसत्कारासेवितो दृढभूमिः - दीर्घकाल, निरन्तर और सत्कारपूर्वक सेवित वह अभ्यास दृढ़भूमि होता है।

जहाँ पर आप हैं, वहाँ पर यत्नपूर्वक बने रहना अभ्यास है। यथास्थिति बनाये रखने के लिये अभ्यास को दृढ़भूमि होना पड़ेगा। अतः हमें दीर्घकाल तक, निरन्तर और सत्कारपूर्वक अभ्यास करना होगा।

यहाँ चार शब्दों से अभ्यास को समझना होगा - यत्नपूर्वक, दीर्घकाल, निरन्तर और सत्कारपूर्वक। हमारी प्राकृतिक दिशा अधोगामी है, यदि कुछ नहीं करेंगे तो नीचे गिरते जायेंगे। प्रयत्न करने से वहीं पर स्थित रहेंगे। प्रयत्न एक दिन के लिये नहीं लम्बे समय के लिये। प्रयत्न एक बार का नहीं, बार बार का। प्रयत्न अनमने ढंग से नहीं, पूरी श्रद्धा, क्षमता और तपपूर्वक। गुरुत्व गतिशील है, हवा में बने रहने के लिये उतना ही ऊर्ध्व बल लगाना पड़ता है। हाँ, जब पैरों के नीचे भूमि आ जाती है तब यत्न तनिक रोके जा सकते हैं, तब तनिक ठहरा जा सकता है, पर वह भी अधिक समय के लिये नहीं, बस अगली स्थिति में प्रस्थान करते तक।

जब कुछ नया साकार करना प्रारम्भ होता है, विकार घेर लेते हैं। विकार से अधिक गति से हमें प्रयत्न करना होगा। प्रतिदिन विकार की तनिक मात्रा कम करनी होगी, तनिक तीव्रता घटानी होगी और यह तब तक चलेगा जब तक विकार समूल नष्टप्राय नहीं हो जाता है।

बिना किसी कार्य को बार बार किये कुशलता भी तो नहीं आती है। करत करत अभ्यास के जड़मति होत सुजान। प्रयत्न प्रारम्भ में अत्यधिक लगता है पर अभ्यास बढ़ने से प्रयत्न की मात्रा धीरे धीरे कम होती जाती है। मेरा तो अनुभव यह रहा है कि बिना अभ्यास के कोई अच्छी बात जीवन से जुड़ती ही नहीं। यदि यदाकदा जुड़ भी गयी तो बिना अभ्यास के टिकती ही नहीं।

अभ्यास योग के आठों अंगों का करना होगा। आइये, सारे अंगों को विस्तृत रूप से समझ लें।
यम में ५ गुण होते हैं - सत्य, अहिंसा, अस्तेय, अपरिग्रह और ब्रह्मचर्य
नियम में भी ५ गुण होते हैं - शौच, सन्तोष, तप, स्वाध्याय, ईश्वर प्राणिधान 
इसके अतिरिक्त आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारण, ध्यान और समाधि।

उपरोक्त में कोई भी ऐसा साधन नहीं है जिसमें अभ्यास न लगता हो। कोई न कोई साधन हर समय उपस्थित रहता है। हर समय कुछ न कुछ अभ्यास यथास्थिति बनाये रखने के लिये करते रहने होता है। प्रश्न उठ सकता है कि क्या अभ्यास केवल आध्यात्मिक आवश्यकताओं या इन १६ साधनों के लिये ही करना चाहिये, अभ्युदय का क्या, जीविका का क्या, उद्योग का क्या? योगसूत्र का विषय यद्यपि भौतिकता से सीधे रूप से जुड़ता नहीं प्रतीत होता है पर गीता अभ्यास का विस्तार सारे कर्मों में निश्चित करती है। किसी भी क्षेत्र में बिना अभ्यास के कर्म सिद्ध हो पाना कठिन होता है।

यह भाग्यवादियों और कर्महीनों के लिये स्पष्ट संदेश है कि बिना अभ्यास के कुछ भी नहीं प्राप्त होता है, न ही भोग में, न ही अपवर्ग में, न ही अभ्युदय में, न ही निःश्रेयस में। जो पलायनवादी अपने कर्तव्यों को दुरुह जान कर उससे भागने के क्रम में आध्यामिकता का चोला चढ़ा लेते हैं, उनको भी यह सिद्धान्त समझना आवश्यक है। सकल पदारथ हैं जग माहीं, कर्महीन नर पावत नाहीं। अभ्यास से कर्म अपनी श्रेष्ठता पाता है।

कहते हैं को कोई अच्छी आदत या कुशलता पाना हो तो कम से कम २१ दिन अवश्य करें। २१ दिन में अंकुर निकल आता है और उसका लाभ भी मिलने लगता है। एक बार उससे होने वाला लाभ समर्पित श्रम और समय से अधिक हो जाता है, उसे दृढ़भूमि मिल जाती है। कुछ शीघ्र पाने की व्यग्रता और समुचित समय देने के बाद भी न फल न मिलने की रिक्तता पीड़ासित होती है। इसीलिये पतंजलि स्पष्ट रूप से कहते हैं कि अभ्यास से अन्य कठिन कर्म तो क्या, मन को साधने का कठिनतम कर्म भी संभव है।

वैराग्य के सूत्र, अभ्यास और वैराग्य एक दूसरे को किस प्रकार प्रभावित करते हैं, पारस्परिक सम्बन्धों विवेचना अगले ब्लाग में।

31.8.19

अभ्यास और वैराग्य - ४

योग एक प्रायोगिक प्रक्रिया है और भगवतगीता योग की व्याख्या प्रायोगिक दृष्टिकोण से करती है। कर्तव्य, आत्मा, स्थितिप्रज्ञ, कर्मयोग, भक्तियोग, ज्ञानयोग आदि न जाने कितने विषय हैं जिन पर कृष्ण अर्जुन के भ्रम दूर करते हैं। आधुनिक अभिभावकों द्वारा गीता आदि शास्त्रों का अध्ययन न करने देने के पीछे एक बड़ा भ्रम और भय यह भी है कि इसे पढ़कर कोई सब कुछ त्याग कर सन्यासी न हो जाये। हास्यास्पद ही है कि जिस ग्रन्थ का निष्कर्ष निराश अर्जुन को युद्ध करने के लिये प्रेरित करना था वह कर्मरहित सन्यास के बारे में कैसे उपदेशित कर सकता है।

योग का सबसे बड़ा लाभ तो यही है कि यह पलायनवादियों को कर्म हेतु प्रेरित करता है। वैराग्य के पहले अभ्यास आता है। अभ्यास और वैराग्य साथ साथ चलते हैं, एक संतुलन के साथ। बिना वैराग्य के अभ्यास दिशाहीन होता है और बिना अभ्यास के वैराग्य आधारहीन। वैशेषिक दर्शन में भी दो ध्येय माने गये हैं, अभ्युदय और निःश्रेयस। अभ्युदय भौतिक उन्नति है और निःश्रेयस वह श्रेष्ठता जिसके पश्चात कुछ और पाना शेष नहीं रहता है। यदि इन्हें चारों पुरुषार्थों में समझा जाये तो अभ्युदय धर्म पोषित अर्थ व काम है और निःश्रेयस मोक्ष है। अभ्युदय ही निःश्रेयस की भूमि है और निःश्रेयस की छाया में अभ्युदय सम्यक रूप से रह पाता है। दोनों एक दूसरे पर आश्रित है, भोग व अपवर्ग के समान ही। 

वैशेषिक पर चर्चा फिर कभी पर एक बात तो निश्चित रूप से सत्य है कि भारतीय दर्शन न तो कर्तव्यों से भागना सिखाता है और न ही सन्यास या वैराग्य के नाम पर कर्महीनता को पोषित या प्रेरित करता है। ईशोवास्योपनिषद से प्रेरित भारतीय मानस तो तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा पर आस्था रखता है, त्यागपूर्वक भोग। आश्चर्य होता है कि जिन सिद्धान्तों को हम सामान्य रूप से परस्पर विरोधी मानते हैं, वे सह अस्तित्व में कैसे रह लेते हैं। हम आगे देखेगें कि अभ्यास और वैराग्य भी एक स्तर पर एक दूसरे के विरोधी प्रतीत होते हैं, पर योग के दिशापटल पर एक दूसरे के पूरक सिद्ध होते हैं।

कार्य होने पर उन्माद और कार्य न होने पर विषाद। इस प्रकार का ‘निष्कर्ष चिन्तन’ कार्य के प्रति हमारे निष्पक्ष प्रयासों में संशय उत्पन्न करता है। अत्यधिक लगाव के बाद जब कार्य नहीं होता है तो दुख भी अत्यधिक होता है, पर बिना लगाव के कार्य होता भी तो नहीं है। पुनः विरोधी सिद्धान्त। इन दोनों में संतुलन का भाव उत्पन्न कर पाना ही समत्व है, योग है। कृष्ण कहते भी हैं कि समत्वं योग उच्यते (२.४८) - कार्य होने या न होने में सम भाव ही समत्व कहलाता है।। योगः कर्मसु कौशलम् (२.५०) - योग कर्मों में कुशलता है। योग निश्चय ही हमें कर्म में प्रेरित होने को कहता है, पर संतुलित मनःस्थिति के साथ या यदि योग की भाषा में कहा जाये तो स्थितिप्रज्ञता के साथ।

श्रीकृष्ण निश्चय ही लीलारूप थे, अवतारपुरुष थे, पर इस महिमामण्डन में हम उस पक्ष को उपेक्षित कर जाते हैं जिसने जनमानस को सर्वाधिक प्रभावित किया। भक्ति के भाव में हम अतिरेक बह जाते हैं और उनके गुणों को देख ही नहीं पाते हैं। मेरी दृष्टि में श्रीकृष्ण का महानतम उपहार योग को जनसामान्य और कर्मसामान्य में ढाल कर प्रस्तुत करना है। सुनने में और पढ़ने में, भाषा की दृष्टि से भगवतगीता सरलतम ग्रन्थों में से एक है। सरल शैली में योग जैसे जटिल विषय को जिस कुशलता से रखा गया है, वह अद्वितीय है, कृष्ण जैसे योग के महापुरोधा द्वारा ही संभव है। गीता सबको अपने तरह से समझ आती है और संभवतः वे सारे पंथ अपने निष्कर्षों पर पहुँचते हैं। यही कारण है कि गीता में जितने श्लोक नहीं हैं, उससे अधिक उसकी टीकायें हैं।

योग घर के एकान्त में कुछ समय बिताने वाली प्रातःचर्या नहीं है, यह जीवन को अद्भुत बनाने की कला है। हर कर्म में जब योग झलकने लगता है, सारे व्यक्तित्व में तब आनन्द छलकने लगता है। योग का आयाम श्रीकृष्ण के अपने जीवन में चतुर्दिक परिलक्षित था। स्नेह और बिछोह, ममत्व और समत्व, अभ्यास और वैराग्य। श्रीकृष्ण ने जीवन को जिस प्रवाह रूप में जिया, योगमार्गियों को उससे अधिक अनुकरणीय और भला क्या हो सकता है। कर्मसु कौशलम् और समत्वं का और बड़ा उदाहरण भला कौन हो सकता है। जो विषय हम भावनाओं में जीते हैं और बद्ध पड़े रहते हैं, उन्हीं विषयों में कृष्ण के निर्णय स्पष्ट छाप लिये रहते हैं, सबको झंकृत कर देते हैं। चाहे मथुरा छोड़कर द्वारका बसाना हो या कौरवों के महारथियों को महागति तक पहुँचाना हो। हम अच्छे बने रहने की बाध्यता में कष्ट सहते रहते हैं, पर कृष्ण की दृष्टि अपनाने से सब सहज हो जाता है, सब प्रवाहमय हो जाता है। यही तो योग की दृष्टि है।

अगले ब्लाग में अभ्यास और वैराग्य से संबंधित ४ सूत्र।

27.8.19

अभ्यास और वैराग्य - ३

मन का एक रूप है कि यह स्थिर नहीं रहता, इधर उधर भागता है, शीघ्र ही उकता जाता है, नयापन ढूढ़ता है, उद्योग और श्रम से भागता है, इन्द्रियों के प्रभाव में सरलता से आ जाता है, अपनी बात मनवाने हेतु तर्क कुतर्क ढूढ़ ही लाता है। दूसरा रूप है कि जिस बात की ठान लेता है, शरीर पर पूर्ण नियन्त्रण धर करवा लेता है, सृजनशील है, सटीक तर्क प्रस्तुत करता है, अद्भुत व्यक्तित्व बनाने में सहायक है। अन्तर स्पष्ट है, जहाँ अनियन्त्रित मन पहला रूप दिखलाता है, नियन्त्रित मन दूसरा। पहला रूप शत्रुवत है, दूसरा मित्रवत। किसी के जीवन में मन का यह रूपान्तरण यदि संभव हो पाता है, तो केवल अभ्यास और वैराग्य के माध्यम से।

किसका अभ्यास और किससे वैराग्य?

मन को जब साधना इतना कठिन हो और साधने से क्रियाफल में आमूलचूल परिवर्तन हो तो वह प्रक्रिया भी ठोस होगी, आजकल की भाँति कागजी या कृत्रिम नहीं। पतंजलि योग के लिये ८ अंगों की प्रक्रिया बतलाते हैं, अतः इसे अष्टांग योग भी कहते हैं। यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान, समाधि। कुछ परिचित शब्द हैं, कुछ सर्वथा अपरिचित। अभ्यास और वैराग्य के संदर्भ में और विभूतियों के संदर्भ में इनकी यथास्थान व्याख्या की जायेगी। 

योग के बारे में सर्वाधिक प्रचलित धारणा आसन की है। यह अंग हठयोग के नाम से भी जाना जाता है। यद्यपि योग में आसन की उपादेयता बस इतनी ही है कि हम बिना किसी शारिरिक व्यवधान के दीर्घ समय तक बैठकर ध्यान लगा सकें। योगी एक या दो ही आसन सिद्ध करते हैं, पद्मासन या सुखासन या सिद्धासन। शरीर को इस कार्य के लिये उद्धत किया जाता है कि शरीर में हो रहे विचलन के कारण मन अस्थिर न हो जाये। आसन योग का अंग है पर मात्र आसन ही योग नहीं है। आसन का अभ्यास शरीर को इतना स्वस्थ और सुदृढ़ कर देता है कि रोग इत्यादि होने की संभावना क्षीणातिक्षीण होती जाती है। रोगनिदान के लिये भी आसन की उपादेयता अद्भुत है, हठयोग की संभावना अपरिमित है।

आसन के साथ प्राणायाम को भी योग के रूप में द्वितीयक ख्याति प्राप्त है। प्राणायाम मन को स्थिर करने का क्रम है। इसे कारण और प्रभाव के माध्यम से समझना उचित होगा। मन की स्थिति बदलने से हमारी साँसों की गति में बदलाव आता है। जब हम क्रोधित होते हैं तो साँसों का क्रम द्रुत होता है। शान्ति में साँसें सम रहती हैं। प्राणायाम से हम अपनी साँसों को नियन्त्रित करते हैं जिससे मन यथानुसार स्थिर होने लगता है। मस्तिष्क में शुद्ध आक्सीजन की मात्रा से मन स्थिर रहता है, शान्त रहता है। जहाँ आसन तन को स्थिर करने के लिये है, प्राणायाम मन को स्थिर करने में सहायक है। जब भी प्रातःचर्या में आसन और प्राणायाम का अवसर प्राप्त होता है, शेष दिन स्फूर्त और सजीव बीतता है।

योग के संबंध में हमारा ज्ञान और सीमित प्रयोग आसन और प्राणायाम के आसपास ही भटकता रहता है। संभवतः यह इसीलिये होता होगा कि इनसे होने वाले लाभ प्रत्यक्ष दिखायी पड़ते हैं, स्वास्थ्य में, मेधा में, विचारों की सम्यकता में। कुछ लोग ध्यान भी करते हैं, किसी एक बिन्दु पर। कुछ विपश्यना जैसी पद्धति अपनाते हैं, आती जाती साँसों पर ध्यान देकर। ध्यान एक अत्यधिक कठिन प्रक्रिया है, किसी योगसाधक के बिना स्वयं करना तो और भी कठिन होती है। आसन और प्राणायाम तो सम्यक रूप से किये भी जा सकते हैं, ध्यान की परिधि के अन्दर जा पाना सबके लिये सम्भव नहीं होता है। देखा जाये तो आसन और प्राणायाम से अधिक योग की सिद्धि और प्रसिद्धि जनमानस को नहीं है।

योग के अंगों का क्रम कुछ विचार कर के ही निर्धारित किया गया है। आसन और प्राणायाम तो यम और नियम के सम्यक पालन के बिना फिर भी किये जा सकते हैं, पर ध्यान तक पहुँचने के लिये यम, नियम, प्रत्याहार और धारणा से होकर आगे बढ़ना आवश्यक है, सभी को सम्यक रूप से साधते हुये, नहीं तो ध्यान टिकेगा ही नहीं। 

यम और नियम को तो हम मुख्यतः अच्छे गुणों के रूप में लेते हैं और उसमें सुधार करने का प्रयास करते रहते हैं। प्रत्याहार को एक मानसिक सिद्धान्त मानकर प्रतीक्षा और आशा करते रहते हैं कि वह कालान्तर स्वयं सिद्ध हो जाये। धारणा के बारे में बहुधा हमारा ज्ञान विचारों के परे नहीं जा पाता। इन चार अवयवों के अभाव में ध्यान को करना तो दूर, समझ पाना भी असम्भव है।

योग एक व्यापक प्रक्रिया है, कठिन तब जब हम बिना सिद्धान्त समझे आगे बढ़ेंगे, सहज तब जब समझ कर और अभ्यास और वैराग्य से साधकर आगे बढ़ेंगे। संभवतः यही कारण रहा है कि पतंजलि ने योग की परिभाषा देने के तुरन्त बाद ही अभ्यास और वैराग्य की प्राथमिक आवश्यकता बताना उचित समझा, अष्टांग योग बताने के पहले उसे साधने के उपाय बताना उचित समझा। अगले ब्लाग में अभ्यास और वैराग्य को परिभाषित करने हेतु पतंजलि के सूत्र और योग के अन्य लाभ।

24.8.19

अभ्यास और वैराग्य - २

अभ्यास और वैराग्य सुनते ही लगता है कि संभवतः कोई हमें किसी अन्य जगत में रहने को बाध्य कर रहा है। या अन्यथा ही इतना श्रम और सब कुछ छोड़ देने के लिये उत्प्रेरित कर रहा है। इसका लाभ क्या है और जिस प्रकार हम अभी रह रहे हैं, उसमें क्या हानि है? ये प्रश्न सहज ही आते हैं।

ये प्रश्न स्वाभाविक भी हैं, मन के द्वारा उकसाये हैं, सबके मन में आते हैं। मन भला कैसे चाहेगा कि उसकी मनमानी न चले। सामान्य सा नियम भी है कि यदि कार्य में लाभ अधिक है और हानि कम तो वह करणीय है। क्यों इतना श्रम करना अभ्यास में, क्यों सब छोड़ देना वैराग्य से, क्या लाभ है स्वयं को या समाज को? सहज हैं ये प्रश्न, सबको आने भी चाहिये, शैथिल्य काल में मुझे भी आते हैं, अब तक।

अध्यात्म की बात छोड़ दें तो भी अभ्यास और वैराग्य नीत जीवन भौतिकता में श्रेयस्कर है, सर्वश्रेष्ठ है।

पंतजलि और श्रीकृष्ण ने योग की उत्कृष्टता को बताया है। अपने समय में श्रीकृष्ण निश्चय ही योग के महाप्रणेता रहे होंगे, तभी उनको योगेश्वर कहा जाता है। पतंजलि ने यदि सूत्ररूप में योग को प्रस्तुत किया तो गीता में योग की विशद प्रायोगिक व्याख्या है। कैसे करना है, करने में क्या क्या बाधायें आती हैं, उनको कैसे पार करना है, योग का व्यवहारिक जगत से क्या संबंध है। अर्जुन और श्रीकृष्ण के संवाद में हमारे प्रश्नों के उत्तर मिलते जाते हैं। 

संस्कृत, योगसूत्र और गीता के मूलपाठ समझने के प्रयास में एक बड़ा ही रोचक संबंध संज्ञान में आया है। पाणिनीकृत अष्टाध्यायी का महाभाष्य पतंजलि ने लिखा है। महाभाष्य सूत्रों की विस्तृत व्याख्या होती है। पतंजलिकृत योग सूत्र का महाभाष्य व्यास ने लिखा। जैसा कि विदित है कि महाभारत में वर्णित भगवतगीता के रचयिता व्यास हैं। मैं इतिहासकारों के कल्पनाक्षेत्र में नहीं गया हूँ पर संस्कृत, सूत्रशैली और योग के प्रणेतागण तीनों विषयों को बड़े ही सुगढ़ प्रकार से जोड़े हुये हैं।

योग प्रायोगिक है, एक एक शब्द सिद्ध किया जा सकता है, बस बताये पंथ पर चलना पड़ेगा। पतंजलि और श्रीकृष्ण दोनों ही इसकी घोषणा करते हैं। जैसे जैसे कोई योग में बढ़ता है, उसके लक्षण और सिद्धियाँ पहले से ही बतायी गयीं हैं। उन्ही लक्षणों और सिद्धियों को पढ़ लें तो समझ आ जायेगा कि योग भौतिक क्षेत्र में भी लाभकर है।

दोनों पुस्तकें कई बार पढ़कर प्रभावित इतना हूँ कि बिना प्रायोगिक अनुभव भी उस पर लिखने की धृष्टता कर रहा हूँ। दृष्टाओं ने समाधि में जाकर सब जाना है, एक एक सूत्र उनके प्रत्यक्ष का शाब्दिक प्रकटीकरण है। अन्तर है कि दृष्टाओं ने समाधि में जाकर ज्ञान पाया, हम समाधि में जाने का उपाय ढूढ़ रहे हैं। 

कहीं न कहीं प्रारम्भ तो करना ही होगा। जैसे गुरुत्व नियम है और ऊपर जाने के लिये प्रयास करना होता है उसी प्रकार मन की गति भी अधोगामी होती है। आलस्य, प्रमाद, स्वार्थ स्वतः ही आ पसरते हैं। इस स्वाभाविक जड़ता और गुरुता से बाहर आने के लिये प्रयास करना पड़ता है। स्वस्थ और पुष्ट दिनचर्या तभी आती है जब प्रयासपूर्वक जुटा जाता है। कार्य सरल नहीं है, बिना तपे निखरना और बिना लगे इस जड़ता से निकलना संभव भी नहीं है। 

योग श्रमसाध्य तो अवश्य है पर रुक्ष नहीं है। योग में बहुत कुछ है। विभूति पाद योगसूत्र का तीसरा पाद है और उसमें योगमार्ग में आगत सिद्धियों का ही विवरण है। यद्यपि पतंजलि आगाह करते हैं कि उन पर रुका न जाये, वे बाधक हो सकती हैं, पर योग के पथ पर चलने वालों के लिये ये दिशाचिन्ह भी हैं। अगले ब्लाग में योगसूत्र और गीता में वर्णित इन लाभों की चर्चा, साथ ही योग के बारे में फैले कई भ्रमों का निवारण।

17.8.19

अभ्यास और वैराग्य - १

पतंजलि पहले ४ सूत्रों में ही योग को परिभाषित कर देते है, शेष व्याख्या है। चित्त, वृत्ति, निरोध, दृष्टा, स्वरूप, सारूप्य, इन शब्दों को समझ लेने से ही पूरा योग दर्शित या स्पष्ट हो जाता है।

शाब्दिक अर्थ है। चित्त की वृत्तियों का निरोध योग है। योग में दृष्टा अपने स्वरूप में स्थित हो जाता है। अन्य समय में वह वृत्तियों के सारूप्य रहता है।

चलिये और सरल करते हैं। चित्त मन है। मन की भटकन वृत्ति है। मन की भटकन का रुकना योग है। दृष्टा मन से भिन्न है। उसका मन से भिन्न अपना एक स्वरूप है। योग की स्थिति में वह अपने स्वरूप में रहता है, नहीं तो वह मन की भटकन जैसा अनुभव करता है।

मन की भटकन को रोकने के लिये उसे समझना भी आवश्यक है। मन के अनुकूल कुछ हुआ तो हम सुखी हो जाते हैं, कुछ प्रतिकूल हुआ तो हम दुखी हो जाते हैं। कितने असहाय हो जाते हैं। मन में आ रहे विचारों का प्रवाह नियन्त्रित करना कठिन है अतः जैसा मन कहता है, हम हो जाते हैं। जो कहता है, हम कर जाते हैं। जैसा मनवाता है, हम मान जाते हैं। है न विडम्बना, हमारा सेवक हमें नियन्त्रित करता है। हम विचारों के आकार में हवा हवा हो जाते हैं। है न दयनीय स्थिति।

ऐसा नहीं है कि हमारा ही मन इतना उत्पाती है या हम ही इतने असमर्थ हैं। सबकी यही समस्या है। अर्जुन जैसा वीर भी कहता है कि हे कृष्ण, यह मन इतना चंचल है कि बलपूर्वक मुझे हर लेता है और इसे नियन्त्रित करना वायु को बाँधने से भी अधिक कठिन है। तो उपाय क्या है?

अभ्यास और वैराग्य। कृष्ण भगवद्गीता (२.३४) में और पतंजलि (१.१२) में यही उपाय बताते हैं।

कहावत है कि मन के हारे हार है, मन के जीते जीत। कटु सत्य पर यह है कि सदैव मन ही जीतता है तो वह हमारी हार ही हुयी। कहाँ से कहाँ लाकर पटक देता है। कभी अत्यधिक उन्माद में ढकेलता है तो कभी विषादग्रस्त कर जाता है। क्या दुर्गति नहीं करता है? मन की इस मनमानी में कभी कभार जो स्थिर सा दिखता है, वही हमारा स्वरूप है। सही मुहावरा तो होना चाहिये मन के जीते हार है, मन से जीते जीत।

पतंजलि मन की ५ वृत्तियाँ बताते हैं। प्रमाण, विपर्यय, विकल्प, निद्रा, स्मृति। प्रमाण (प्रत्यक्ष, अनुमान, आगम) के द्वारा प्राप्त सही ज्ञान, विपर्यय या मिथ्या ज्ञान, विकल्प या कल्पना, स्मृति या पुराने प्रत्यक्ष का पुनः उभरना, निद्रा या ज्ञान का अभाव। मन इन्ही ५ वृत्तियों के बीच अनियन्त्रित भटकता है और साथ में हमें भी बलवत बहा ले जाता है। यह साथ कालान्तर में इतना गाढ़ा हो जाता है कि हम स्वयं को ही मन समझने लगते हैं।

मन की सारूप्यता में बद्ध दृष्टा को अभ्यास और वैराग्य के माध्यम से ही मुक्त किया जा सकता है।

अभ्यास क्या है, किसका अभ्यास, किन सोपानों पर बढ़ते रहने का अभ्यास? वैराग्य ही क्यों? भौतिक, आध्यात्मिक और सामाजिक परिप्रेक्ष्य में इन प्रश्नों के उत्तर हमारी भटकन की समस्या सुलझाने के लिये आवश्यक हैं। इस विषय को समझने का प्रयास करेंगे अगले ब्लाॆग में।

10.8.19

कुछ नया कर

कल किया था, आज भी वो,
वही मति, अनुमति वही हो,
नित्य चलना उसी पथ पर,
आस फिर भी, कुछ बदलकर,
जीवनी आकृति गढ़ेगी,
कदाचित आगे बढ़ेगी,
किन्तु ठहरी और बहरी,
अनमनी अटकी दुपहरी,
उदय हो सो गया दिनकर,
एक अर्जित अंक गिनकर,
व्यर्थ किंकर्तव्य बीता,
शेष है मन क्षुब्ध रीता,
अब तो अपने पर दया कर,
कुछ नया कर।

गर्व की चर्चा कभी हो,
क्यों विगत की दुंदभी को,
बजाकर मनमुग्ध ऐंठे,
कर्म अपने छोड़ बैठे,
कुछ करें समकक्ष बढ़कर,
कुछ नहीं एक पथ पकड़कर,
तनिक स्थिरता तो लायें,
काल में हम ढह न जायें,
बिसारी छोड़ी विरासत,
नहीं कोई ध्येय अनुरत,
दिशा भ्रमवत, अधो गतिमय,
राह भटकी, विपथ-मतिमय,
पितर तर्पित हों, दया कर,
कुछ नया कर।

सृष्टि में स्थान अपना,
और सबके साथ चलना,
प्राप्ति का उद्योग वांछित,
सामने उत्थान लक्षित,
हो कठिन उलझी परिस्थिति,
रुद्ध है आरोह में गति,
प्रश्न क्षमता पर नहीं हो,
काल संग बढ़ते नहीं जो,
लक्ष्य कैसे भूल जायें,
तनिक ठहरें फिर जगायें,
पुनः स्वर विश्वास के हम,
डटे रहने से हटे तम,
सुप्त स्वप्नों पर दया कर,
कुछ नया कर।

स्वस्थ तन में स्वस्थ मन हो,
और श्रेयस पर मनन हो,
बढ़ें स्नेही सकल जन,
खुलें मन परिवार आँगन,
देश और परिवेश सुखमय,
रहे जो भी शेष, सुखमय,
उदय अपना, ध्यान जग का,
अभीप्सित उत्थान सबका,
प्रयत्नों की आस महती,
किन्तु चेष्टा नहीं दिखती,
दिन कहीं कल सा न बीते,
चाह आगत विगत जीते,
हे प्रखरमय, अब दया कर,
कुछ नया कर।

3.8.19

दुख सहना पर पीर पिरोना

बाहर तीखे तीर चल रहे,
सीना ताने वीर चल रहे,
प्यादे हो, हद में ही रहना,
दोनों ओर वजीर चल रहे।

मन अतरंगी ख्वाब न पालो,
पहले अपने होश सम्हालो,
क्यों समझो शतरंजी चौखट,
बचपन है, आनन्द मना लो।

आड़ी, तिरछी, फिरकी चालें,
कुछ बोलें और कुछ कर डालें,
अन्तस्थल तक बिंध जाओगे,
तन पर कितनी ढाल सजा लें।

घात और प्रतिघात प्रदर्शित,
छद्म धरे संहारक चर्चित,
हेतु विजय छलकृत पोषित पथ,
गुण के शिष्टाचार समर्पित।

शत युद्धस्थल और प्रहार शत,
मन अन्तरतम बार बार हत,
पर जिजीविषा अजब विकट है,
जीवट जूझी, सब प्रकार रत,

धैर्य धरो कल खेल ढलेगा,
गिरते मोहरे, ढेर सजेगा,
होंगे सारे छद्म तिरोहित,
अंतिम चालें काल चलेगा।

माना सहज नहीं बीता है,
माना अभी बहुत रीता है,
नहीं गर्भ से प्राप्त रहा कुछ,
अनुभव, देख देख सीखा है।

नहीं बने जो चाहे होना,
किञ्चित मन उत्साह खोना,
हो प्रतिकूल सकल जग फिर भी,
दुख सहना पर पीर पिरोना।

26.7.19

मैत्री, करुणा, मुदिता, उपेक्षा

पतंजलि योग सूत्र के प्रथम पाद समाधिपाद के ३३ वें सूत्र में है यह उल्लेख। कुल १९६ सूत्रों में संकलित यह दर्शन, अन्य आधुनिक दर्शनों की भाँति बुद्धिविलास या शब्द-मृगालजाल नहीं अपितु एक करणीय और अनुभवजन्य प्रक्रिया है। योग के बारे में जितने लोगों से बात की, कुछ को छोड़कर शेष सभी की जानकारी या तो अपरिपूर्ण पायी या एकपक्षीय । वह तो भला हो कि विगत कुछ वर्षों से योग जैसे संस्कृति-रत्न को समुचित प्रचार व मान मिला है नहीं तो योग मात्र कुछ कठिन और जटिल शरीर-मुद्राओं के रूप में जनमानस में प्रचलित था। मेरे लिये और मेरे जैसे अनेकों भारतीयों के लिये कारण एक ही था कि कभी भी हमने मूल पाठ करने का प्रयत्न ही नहीं किया। और जब अन्ततः अर्धज्ञान से विक्षिप्त हो मूलपाठ करना पड़ा तब लगा कि हमें बचपन से संस्कृत क्यों नहीं पढ़ायी गयी, ऐसे रत्नों के बारे में क्यों नहीं बताया गया। केवल १९६ सूत्र, एक दिन से भी कम समय लगता, यदि संस्कृत आती होती या कोई बताने वाला रहता। न मिले अवसरों के बारे में, शिक्षा पद्धति के बारे में, संस्कृति और संस्कृत के बारे में फिर कभी चर्चा।

बीच से सूत्र प्रारम्भ करने से संदर्भरहित स्थिति उत्पन्न होने का भय है अतः प्रथम से ३२ वें सूत्र तक का सारांश रख देना उचित रहेगा। चित्त की वृत्तियों का निरोध योग है। तब दृष्टा अपने स्वरूप में आता है अन्यथा वह वृत्तियों के सारूप्य रहता है। वृत्तियाँ ५ हैं, प्रमाण, विपर्याय, विकल्प, निद्रा, स्मृति। अभ्यास और वैराग्य से वह निरोध आता है। अपनी स्थिति पर यत्नपूर्वक बने रहना अभ्यास है, इन्द्रिय विषयों से वितृष्णा वैराग्य है। प्रकृतिलय और विदेह अभ्यास व वैराग्य की परिपक्व स्थितियाँ है, इनके लिये समाधि सहज है। शेष सबको श्रद्धा, वीर्य, स्मृति, समाधि और प्रज्ञापूर्वक योग सिद्ध करना होता है। या ईश्वर की शरणागति से यह शीघ्र सिद्ध हो जाती है। ईश्वर क्लेश, कर्म, विपाक व आशय से रहित और पुरुषविशेष है। वह सर्वज्ञ, सबका गुरू व काल से अवच्छेद है। ओंकार उसका नाम है। ओंकार जपने से ईश्वर का भाव आता है जिससे ९ चित्तविक्षेप सह ५ विघ्न नष्ट हो जाते हैं।

तत्पश्चात पतंजलि चित्तविक्षेप रोकने हेतु अन्य उपायों की चर्चा करते हैं। एकतत्व अभ्यास चित्त को सप्रयास एक तत्व पर बार बार लगाने को कहते हैं। दूसरा उपाय इस लेख का शीर्षक है। सुखी, दुखी, पुण्यात्मा व पापात्मा से क्रमशः मैत्री, करुणा, मुदिता व उपेक्षा का भाव रखने से चित्त शुद्ध होता है। चित्त को साधने के वर्णित उपाय मुख्यतः आध्यात्मिक, बौद्धिक या शारीरिक  स्तर पर हैं। यह उपाय सामाजिक स्तर पर कार्य करता है। योग को पूर्णतः व्यक्तिगत या आन्तरिक प्रक्रिया मान लेना एक संकुचित दृष्टि है। योग की व्याप्ति पूर्ण है। योगः कर्मषु कौशलम् । श्रीकृष्ण इस तथ्य को उच्चारित करते हैं कि कर्मों में कौशल योग से ही है।

समाज में रहने के कारण कई वाह्य कारक हमें जाने अनजाने प्रभावित करते रहते हैं। किससे किस प्रकार का व्यवहार करना है, यह प्रश्न सदा ही उठता रहता है। सबके प्रति सम व्यवहार न संभव है और न ही उचित। विवेक के अनुसार निर्णय लेना पड़ता है। निश्चय ही स्थितिप्रज्ञता में भौतिक विभेद चित्त को प्रभावित नहीं करते होंगे पर उस स्थिति तक पहुँचने के पहले हमें चित्त को स्थिर करना आना चाहिये, नीर-क्षीर विवेक होना चाहिये। उल्लिखित उपाय समाज से अधिक स्वयं के कलुष दूर करने में सहायक होते हैं।

राग, ईर्ष्या, परापकार, असूया, द्वेष और अमर्ष। ये ६ कालुष्य हैं जो सामाजिक संबंधों को प्रभावित करते हैं। सुख की अनुभूति को पुनः पाने की लालसा राग है। दुख की अनुभूति को पुनः न आने देने की भावना द्वेष है। किसी की प्राप्ति या उपलब्धि पर उसे स्वयं न पाने की वेदना ईर्ष्या है। परिस्थितियाँ मनोनकूल न होने से किसी का अहित करने का भाव परापकार है। किसी के गुण को अन्य दोष आरोपित कर छोटा दिखाने की प्रवृत्ति असूया है। किसी के अपजानजनक वचनों को सुन विचलित हो जाना या सहन न कर पाना अमर्ष है।

सुखी को देखकर मुख्यतः अपने राग या ईर्ष्या के भाव जागृत होते हैं। उसके प्रति मित्रता का भाव रखने से उसकी उपलब्धियों व प्रयासो के प्रति आदर का भाव आता है और आपके राग व ईर्ष्या क्रमशः प्रसन्नता व उत्साह में बदल जाते हैं। किसी दुखी को देखकर उसकी मूर्खताओं पर क्रोध आता है और स्वयं उससे भागने का विचार उत्पन्न होता है। करुणा की भावना क्रोध को सहयोग और सहायता में बदल देती है। पुण्यात्मा को देख कर प्रथमतः असूया होता है। उसकी महानता को छोटा करने का प्रयास हम करने लगते हैं। वह ज्ञानी है किन्तु अभिमानी है, वह तो अपनी प्रतिष्ठा के लिये ही दान करता है। इस प्रकार के निर्णय देकर से हम प्रकारान्तर से स्वयं को श्रेष्ठ दिखाने का प्रयत्न करते हैं। मुदिता का भाव, अच्छे कार्यों को देख कर प्रसन्नता का भाव हमारी तुच्छता को ढेर कर देता है और अच्छे कार्य करने वाले के उत्साह का कारण भी बनता है। इसी प्रकार पापात्मा को देखकर उसके प्रति द्वेष या अमर्ष के भाव न रखते हुये उपेक्षा से उसे महत्वहीन बना देना उचित है। इस बात पर सार्थक चर्चा हो सकती है कि पापात्मा को दण्ड या पीड़ा मिलनी चाहिये। जो सक्षम हैं और जो व्यवस्था के दायित्व में हैं, वे उसको देंगे भी। पर उसके पहले ही पापात्मा द्वारा मचाये उत्पात में शाब्दिक रूप से सम्मिलित हो जाने से उसकी मानसिकता और ध्येय, दोनों ही पुष्ट होते हैं। अतःउन्हें उपेक्षित करना ही उचित है।

शान्तचित्त न केवल समाधि जैसे आध्यात्मिक ध्येयों में सहायक है वरन सामान्य जीवन के कार्यों में अथाह ऊर्जा का स्रोत है। मुझे तो ये चार उपाय योग के व्यवहारिक और करणीय प्रक्रिया के अंगरूप में स्वीकार्य हैं। आपके चित्त की वृत्ति क्या है?

21.7.19

यह निश्चय अब, नहीं डरूँगा

अपने पथ से नहीं टरूँगा,
यह निश्चय अब, नहीं डरूँगा ।

यह सृष्टि रही विस्तीर्ण विविध, दिक उदित विदित अनुक्रम अशेष,
हैं कार्य प्रचुर, कारक अनन्त, कैसे हो निर्णय पर प्रवेश,
है लक्ष्य प्राप्ति आवश्यक पर, क्यों अनुपस्थित लक्षित लक्षण,
जग कोलाहल से हो तटस्थ, भटकन निशान्त एकान्त भ्रमण,
दिशा मिली जब, अवसर अंकुर, बढ़ते पग हैं, नहीं रुकूँगा,
यह निश्चय अब, नहीं डरूँगा ।

शब्दों में आकृष्ट, छन्दमय, जीवन के उत्कर्ष रूप,
अर्थों में अवसाद व्याप्त, चिर रही अभीप्सित प्राप्ति-धूप,
शब्द अर्थ में रिक्त वृहद, यह जगत नहीं आज्ञाकारी,
शब्द-जाल में क्षुब्ध रही यदि नहीं सृजनता व्यवहारी,
नहीं डोलना तर्क-नदी में, कर्म-वेग से ही सम्हलूँगा, 
यह निश्चय अब, नहीं डरूँगा ।

क्या होगा, यह प्रश्न व्यर्थ, यह पथ उत्तम या वह विशेष,
नियत एक जो चाह लिया पथ, प्रस्तुत होती नियति एक,
काल कभी न विपथ हुआ, जो लिख डाला वह अमिट रहा,
जो विकल्प हो फैल गया था, लक्ष्य प्राप्त हो सिमट रहा,
अपने पग पर, गतिमय रतिमय, अपने पथ चलते पहुँचूगा,
यह निश्चय अब, नहीं डरूँगा ।

यह प्रकट, रहा एकान्त विकट, सब रुचियाँ मन की दासी हैं,
मैं अपने ही घर में आश्रित, सब आशा पूर्ण प्रवासी हैं,
बहुधा अवगुंठित, पाशबद्ध, है उथल-पुथल युत जीवन क्यों,
अपने तन मन में जीवन में, करना अपना ही पीड़न क्यों,
सच कहता, अब विगत विगतमय, मन की बातें नहीं सुनूँगा,
यह निश्चय अब, नहीं डरूँगा ।

बुद्धि-नियन्त्रित कभी नहीं था, कर्म क्षेत्र जग सतत रहा है,
मेघ उमड़कर बरस रहे हैं, गंगा अविरत नीर बहा है,
एक माह में चन्द्र कलामय और कर्ममय घटता बढ़ता,
धुरी धरा पर नर्तन नित नित, सूर्य गर्भ अनवरत धधकता,
आत्मबली ऊर्जा संचारित, स्वेद कणों से सिन्धु भरूँगा,
यह निश्चय अब, नहीं डरूँगा ।