23.8.15

जीवन को जब कहा, ठहर जा

जीवन को जब कहा, ठहर जा, नहीं उसे रुकना भाता है,
और हृदय जब भरे उलाछें, सन्नाटा पसरा जाता है ।

आलस में बीते कितने दिन, कितने अवसर व्यर्थ हुये,
शब्दों से उलझे उलझे हम, कितने वाक्य निरर्थ हुये ।

मैने कब माँगी थी गति सोपान त्वरित चढ़ जाने की,
नहीं कभी भी आकांक्षा थी उत्कर्षों को पाने की ।

जीवन को देव प्रदत्त एक उपहार मान कुछ बीते दिन,
और कभी एक ध्येय अग्नि पर अर्पित करने चाहे ऋण ।

माना प्रश्न पूछ्ने का अधिकार नहीं है अब हमको,
पर क्या उत्तर दे पायें जब समय सालता है हृद को ।

7 comments:

  1. माना प्रश्न पूछ्ने का अधिकार नहीं है अब हमको,
    पर क्या उत्तर दे पायें जब समय सालता है हृद को ।

    बहुत सुंदर!

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  2. भाई, बहुत सुंदर पंक्तियाँ हैं...

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  3. भावपूर्ण रचना

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  4. जीवन तो पानी की तरह बहता है, रोकना व्यर्थ की कोशिश है।

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