न दैन्यं न पलायनम्
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10.1.16
सुख लौटा दो
शापित
धन
-
यश
नहीं
चाहिये
,
व्यथा
-
जनित
रस
नहीं
चाहिये
।
त्यक्त
,
कुभाषित
जीवन,
तेरा संग
पाने
को
अति
आकुल
है
।
तेरी
फैली
बाहों
में
छिप
जाने को
रग
रग
व्याकुल
है
।।
मुझको
अपने
पास
बुला लो
,
मुझको
मेरा
सुख
लौटा
दो
।
27.12.15
जीवन-इच्छा
बहुधा
मैं
असहाय
पाता
हूँ
स्वयं
को
,
खोखले
दिखते
मुझे
उद्देश्य
मेरे
।
विवश
हो
मैं
चाहता
हूँ
गोद
ऐसी
,
तुष्ट
हूँ
मैं
,
सान्त्वना
भी
मिले
मुझको
।।
१।।
व्यथित
मन
में
चीखता
तम
रिक्तता
का
,
जानता
हूँ
पर
स्वयं
से
भागता
हूँ
।
स्वयं
के
धोखे
विकट
हो
काटते
हैं
,
प्राप्त
जल
पर
तृप्त
मैं
न
हो
सका
हूँ
।।
२।।
विकल
अन्तरमन
उलसना
चाहता
है
,
हर्ष
का
जीवन
बिताना
चाहता
।
व्यर्थ
का
दुख
पा
बहुत
यह
रो
चुका
है
,
प्रेम
का
अभिराम
पाना
चाहता
।।
३।।
24.5.14
हँस लेते सब
सुखी
पलों
की
आस
लगाये
,
कुछ लोगों के संग बिताये,
माह, दिवस बिन आडम्बर के,
प्राय ही कष्टों से लड़ के,
बिन प्रयास बढ़ जाते थे पग,
चाह अकेली, हँस लेते सब ।।१।।
किन्तु लगा सब हुआ निरर्थक,
श्रम निष्फल, देखें हैं अब तक,
दुखी दुखी चेहरे मुरझाये,
जाने कितना बोझ उठाये,
मानो पीड़ा बरसाता नभ ।
चाह अकेली, हँस लेते सब ।।२।।
कुछ वर्षों में सिमटा जीवन,
और बहुत कुछ करने का मन,
चलो आज मिल दुख बाँटेंगे,
चुभते काँटों को काटेंगे,
सुख-समृद्धि में खेले यह जग ।
चाह अकेली, हँस लेते सब ।।३।।
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