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4.10.15

नयन प्यारे

होंठ कपते लाज मारे, किन्तु आँखों के सहारे,
पूछती कुछ प्रश्न और अध्याय कहती प्रेम के ।।१।।

हठी मन के भाव सारे, सौंप बैठे बिन विचारे,
हृदय के सब स्वप्न तेरी झील आँखों में दिखें ।।२।।

समूचा अस्तित्व हारे, पा तुम्हारे नयन प्यारे,
द्रवित हूँ, उन्माद में मन, बहा जाता बिन रुके ।।३।।