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28.2.16

स्वयं ही समाया

समर्पण हे देवी, तुम्हें आज जीवन,
तुम्हें पा के, जीवन में सर्वस्व पाया ।
है मन आज मोदित, यह तन आज पुलकित,
मैं मरुजीव सौन्दर्य-रस में नहाया ।।१।।

खड़ा तृप्त हूँ आज शाश्वत-क्षुधित मैं,
ज्यों आ रूप-लावण्य तूने चखाया ।
विचारों के दीपक न जाने कहाँ हैं,
समग्र पन्थ केवल जो तूने दिखाया ।।२।।

मेरी जीव-नौका भँवर में फँसी थी,
तो नाविक कुशल बन तूने बचाया ।
तेरी प्रेम-धारा अपरिमित, असीमित,
समेटूँ कहाँ मैं स्वयं ही समाया ।।३।।

24.1.16

ध्येय और प्रेम

आज फिर क्यों याद आयी,
नाव फिर से डगमगाई ।

ध्येय में क्या आज, अपने भी पराये हो चुके हैं,
ध्येय ही जीवन है, क्या और अब कुछ भी नहीं है ।
ध्येय की वीरानियों में, एक स्वर देता सुनाई ।
आज फिर क्यों याद आयी ।।१।।

शुष्क धरती पर कोई, मृदुफल कभी बोता नहीं है,
साथ जल का न मिले, तो फल कोई होता नहीं है ।
प्रेम जल है, ध्येय फल है, यह सनातन रीति भाई ।
आज फिर क्यों याद आयी ।।२।।

आज जब आराध्य को कुछ फूल अर्पित हो रहे हैं,
क्यों समुन्दर भ्रान्तियों के फिर हिलोरें ले रहे हैं ।
नयन में क्यों ध्येय-ज्योति, अश्रु बनकर डबडबाई ।
आज फिर क्यों याद आयी ।।३।।

आज जब दिन का परिश्रम, रात्रि का सुख चाहता है,
शान्ति में यादों का झोंका, ध्यान सारा बाँटता है ।
रागिनी फिर आज अपने, स्वर में क्यों संताप लायी ।
आज फिर क्यों याद आयी ।।४।।

ध्येय पथ में प्रेम का व्यवधान तो चिर काल से है,
किन्तु मानव की प्रतिष्ठा आज शर-सन्धान से है ।
फिर भी मैनें ध्येय-प्रतिमा प्रेम के जल से बनायी ।
आज फिर क्यों याद आयी ।।५।।


13.9.15

पंथ प्रथम है

आँखों से क्यों खींच रही हो,
आकर्षण-तरु सींच रही हो,
नहीं शक्ति, आमन्त्रण तज दूँ,
उद्वेलित हूँ, नहीं सहज हूँ,
साँसों का आवेग विषम है,
आशंकित हूँ, पंथ प्रथम है ।

प्रेम तुम्हारा, आधी रचना,
आधा जगना, आधा सपना,
नहीं सूझता है कुछ मन को,
कैसे रोकूँ आज समय को,
सुख, व्याकुलता मिश्रित क्रम है,
आशंकित हूँ, पंथ प्रथम है ।

17.5.15

प्रेम अपना

परिचयी आकाश में, हर रोज तारे टूटते हैं,
लोग थोड़ा साथ चलते और थकते, छूटते हैं,
किन्तु फिर भी मन यही कहता, तुम्हारे साथ जीवन,
प्रेम के चिरपाश में बँध, क्षितिज तक चलता रहेगा ।।१।।

विविधता से पूर्ण है जग, लोग फिर भी ऊब जाते,
काल के आवेग में आ, पंथ रह रह डगमगाते,
नहीं भरता दम्भ फिर भी, मन सतत यह कह रहा है,
आत्म-पोषित, प्रेम अपना, दुग्ध सा धवलित रहेगा ।।२।।

12.4.15

उलझी लट सुलझा दो

मन की उलझी लट सुलझा दो,
मेरे प्यारे प्रेम सरोवर ।
लुप्त दृष्टि से पथ, दिखला दो,
स्वप्नशील दर्शन झिंझोड़कर ।।१।।

ढूढ़ा था, वह लुप्त हो गया,
जागृत था, वह सुप्त हो गया ।
मार्ग विचारों को दिखला दो,
मन की उलझी लट सुलझा दो ।।२।।

कागज पर कुछ रेखायें थीं,
मूर्ति उभरने को उत्सुक थी ।
बना अधूरा चित्र बना दो,
मन की उलझी लट सुलझा दो ।।३।।

समय बिताने जीवन बीता,
कक्ष अनुभवों का था रीता ।
प्रश्नों के उत्तर बतला दो,
मन की उलझी लट सुलझा दो ।।४।।

मेरे प्यारे प्रेम सरोवर,
अनुयायी पर कृपा-हस्त धर ।
प्रेम, दया के दीप जला दो,
मन की उलझी लट सुलझा दो ।।५।।

12.11.14

प्रेम-प्लावन

प्रेम-प्लावित हो गया मन,
पा गया अभिराम चिन्तन ।
खोज में कब से तुम्हारी,
भटकता अविराम जीवन ।।

साधना का प्रात और वह ज्ञान की तपती दुपहरी,
निर्णयों की साँझ प्रेरित, संयमों के अडिग प्रहरी ।
आज रजनी मधुर स्वर में कर रही मधुमाय गुञ्जन ।
प्रेम-प्लावित हो गया मन ।। १।।

आज लक्षित निज जनों में, स्वार्थ परिभाषा बने,
कर्म का अवमूल्यन, जब व्यक्तिगत आशा बने ।
शुष्कता से दग्ध नयनों को मिला है प्रेम-अञ्जन ।
प्रेम-प्लावित हो गया मन ।। २।।

जब सुखों की पूर्णता पर काल की बेड़ी पड़ी है,
स्रोत सीमित, विवशता भी आज मुँह बाये खड़ी है ।
प्रेम का अम्बार लेकिन, बढ़ रहा निर्बाध हर क्षण ।
प्रेम-प्लावित हो गया मन ।। ३।।

19.7.14

प्रेम और प्राप्ति

स्वतः तृप्ति हैप्रेम शब्द में प्यास नहीं है,
मात्र कर्म हैफल की कोई आस नहीं है,
प्रेम साम्य हैकभी कोई आराध्य नहीं है,
सदा मुक्त हैअधिकारों को साध्य नहीं है 

यदि कभी भी प्रेम का विन्यास लभ हो जटिलता को,
सत्य मानो प्राप्ति की इच्छा जगी हैअनबुझी है 
प्राप्ति का उद्योग यूँ ही मधुरता को जकड़ता है,
प्रेम तो उन्मुक्तता हैव्यथा शासित तम नहीं है ।।

प्रेम का निष्कर्ष सुख है,
वेदना का विष नहीं है 
अमरता का वर मिला है,
काल से शापित नहीं है ।।

18.12.13

चलो रूप परिभाषित कर दें

नेहा
वत्सल

(वत्सल अर्चना चावजी के सुपुत्र हैं, मृदुल, सौम्य और विलक्षण प्रतिभा के धनी, न जाने कितने क्षेत्रों में। नेहा उनकी धर्मपत्नी हैं। स्नेहिल वत्सल ने नेहा के कई चित्रों का मोहक स्वरूप जब फेसबुक में पोस्ट किया तो आनन्द में अनायास ही शब्द बह चले)

भाव उभारें, अमृत भर दें,
चलो रूप परिभाषित कर दें,

किन शब्दों में ढूँढ़े उपमा,
कैसे व्यक्त करें मन सपना,
कहना मन का रह न जाये,
अलंकार में बह न जाये,
ऊर्जान्वित उन्माद उकेरण,
शब्दों में शाश्वत उत्प्रेरण,
सघन सान्ध्रता प्लावित कर दें,
चलो रूप परिभाषित कर दें।

रंग हजारों, रूप समाये,
इन्द्रधनुष आकार बनाये,
जितने छिटके, उतने विस्तृत,
जितने उड़ते, उतने आश्रित,
हो जाये विस्मृत विश्लेषण,
रंगों में संचित संप्रेषण,
मूर्तमान संभावित कर दें,
चलो रूप परिभाषित कर दें।

कुछ हँसते से चित्र उतारूँ,
यथारूप, मैं यथा बसा लूँ,
जितना देखूँ, उतना बढ़ती,
आकृति सुखमय घूर्ण उमड़ती,
धूप छाँव का हर पल घर्षण,
दृष्टिबद्ध अधिकृत आकर्षण,
किरण अरुण अनुनादित कर दें,
चलो रूप परिभाषित कर दें।

प्रेम रूप के विग्रह गढ़ता,
भावजनित मन आग्रह पढ़ता,
रूप प्रेम पाकर संवर्धित,
कांति तरंगें अर्पित अर्जित,
एक दूजे पर आश्रय अनुपम,
रूप प्रेममय, पूर्ण समर्पण,
अन्तः प्रेम प्रभासित कर दें,
चलो रूप परिभाषित कर दें।

11.8.12

प्रेम के निष्कर्ष

यद्यपि यह विषय उर्वशी में अपनी पूर्णता से व्यक्त नहीं हुआ है, पर बहुधा दिनकर के दर्शनमय आख्यान के संकेत उस दिशा में जाते हैं। प्रकृति ने मानव शरीर में सहज ही आकर्षण के भाव भर दिये हैं, हम जैसे लघु-ईश्वरों के अहं को संतुष्ट करने के लिये सुख के साधन भी जुटा दिये हैं, हम आनन्द में उतराते तो हैं पर शीघ्र ही स्रोत सूख जाते हैं, हम सुखों के घट भरने का पुनः प्रयास करते हैं, प्रकृति द्वारा प्रस्तुत प्रवृत्तिमार्ग अपना लेते हैं। प्रकृति हमारे ऊपर शासन करती है, हमारी शासन करने की आकांक्षा का लाभ लेकर।

क्या हमें यह खेल समझ नहीं आता है? निश्चय ही आता होगा, सुख के सारे स्रोत अल्पकालिक है, सुख के साथ दुख भी आता है, पर यह सब जानकर भी अपनी समझ न बना पाना या जानकर भी उसे क्रियान्वित न कर पाना। भला क्या कारण होगा इसका? सुखों को छोड़ पाना कठिन है, बहुत कठिन, किसी भी उस पथ के लिये जिसका निष्कर्ष अभी तक दिखा ही नहीं, अनुभव तक नहीं हुआ। अनिश्चितता एक बहुत बड़ा कारण है, श्रेष्ठ विकल्प की अनुपस्थिति बहुत बड़ा कारण है। प्रकृति का खेल ज्ञात है, उतना निर्मल नहीं है, पर कुछ तो है। निर्वात में रह पाना कभी जीवन ने सीखा ही नहीं, एक पल के लिये भी। प्रकृति भला क्यों सिखाने लगी हमें, निर्वात में चल पाना, उड़ पाना, वह तो बाँधती है और वही सिखाती भी है। हम जान भी जायें कि हम बँधे हैं, पर मुक्त नहीं हो पाते हैं, बन्धन में ही सुख मान लेते हैं।

यही प्रश्न प्रेम के भी हैं। लौकिक प्रेम या आलौकिक प्रेम। भक्ति ईश्वरीय प्रेम की अभिव्यक्ति है, आत्मा का संवाद। प्रणय प्राकृतिक प्रेम का निरूपण है, शरीर का संवाद। क्या प्रणय में बिन उतरे भक्ति को समझा जा सकता है, क्या भक्ति के निर्वात में चल ईश्वरीय प्रेम तक पहुँचा जा सकता है? यह प्रश्न चिरकाल से मानव मेधा को कुरेद रहा है, अनुभव के न जाने कितने अध्याय लिखे जा चुके हैं, इस विषय पर। प्रश्न अब भी वही है, प्रश्न अब भी उतना उलझा है।

शास्त्र तो कहते हैं, प्रणय में जो क्षणिक सुख लब्ध है, उसका अनन्त और निर्बाध संस्करण भक्ति में ही मिल पाता है, प्रणय बस उस महासुख का संकेत भर है। संकेत की दिशा अपने लक्ष्य की दिशा से भिन्न क्यों होने लगी भला, यदि ऐसा है तो अनन्त सुख की एक राह प्रणय से भी होकर जाती होगी। यदि अनन्त सुख की एक राह निवृत्ति के निर्वात से होकर जाती है तो प्रवृत्ति के ठोस धरातल से भी कोई न कोई मार्ग तो होगा ही। अग्नि पर चलते जाना और तृप्तमना हो अनन्त को पा जाना, संभवतः यही इस राह के साक्ष्य हों।

न मैं किसी धर्माचार्य की तरह किसी पंथ का प्रतिपादन कर रहा हूँ और न ही किसी स्थापित पंथ पर कोई टीका टिप्पणी। मैं तो बस उन संकेतों को समझने का प्रयास भर कर रहा हूँ जिससे सारी प्रकृति संचालित है और जो अनन्त सुख की ओर हमारा ध्यान इंगित करते हैं।

नास्तिक दर्शन तो शरीर के परे जाता भी नहीं हैं, अतः उसमें शारीरिक प्रेम ही सर्वोपरि हुआ। आस्तिक दर्शन में थोड़ा गहरे उतरें तो प्रकृति के रचे जाने का कारण ज्ञात होता है। हमारा मूल स्वभाव प्रेम का है, निर्मल, निष्कपट, धवल, अनन्त प्रेम का। जब भी हम अपने मूल स्वभाव में रहते हैं, आनन्द में रहते हैं। न जाने कहाँ से, हमारे मन में नियन्त्रण करने का ईश्वरीय भाव जग जाता है। करुणावश ईश्वर एक विश्व रच देते हैं, उसके संचालनार्थ प्रकृति को नियुक्त करते हैं, हम उसमें रहने आ जाते हैं, स्वयं को ईश्वर समझ कर। शून्य से उत्पन्न विश्व में जितनी धनात्मकता होगी, उतनी ही ऋणात्मकता भी, सुख होगा तो दुख भी, यही द्वन्द्व का आधार भी है।

प्रकृति चक्र से बाहर निकलने का मार्ग संभवतः उन कारकों में ही छिपा होगा, जिनके कारण हम इस प्रकृति चक्र में आ पहुँचे। यदि अहं कारण है तो अहं को छोड़ कर पुनः इस चक्र से बाहर निकला जा सकता है। जगत की नश्वरता यदि यह संकेत देती है कि यह हमारा स्थायी घर नहीं, तो प्रेम की उपस्थिति उससे बाहर आने का मार्ग भी बतलाती है। प्रेम से बड़ा भला और क्या उपाय हो सकता है, अहं के संहार का। नियन्त्रित करने की प्रवृत्ति से बाहर आ प्रेमी को अपना सब कुछ समर्पण कर देना, अपने अहं त्याग देने का सर्वोत्तम उपाय है। शरीर से मन तक बढ़ता, एक व्यक्ति से पूरे समूह में विस्तारित होता, दया, करुणा आदि रूपों में अपनी निष्पत्ति पाता, प्रेम में सारे विश्व को समेट लेने की शक्ति है।

प्रेम आनन्द तभी देगा, जब वह अपने निर्मल रूप में प्रस्तुत हो। अधिकार का भाव प्रेम नहीं हो सकता है। अधिकार का भाव हमें उस दलदल में वापस ठेलना चाहता है, जिससे बाहर निकलने के लिये हमने प्रेम का सहारा लिया है। द्वन्द्व के दलदल से बाहर निकल यदि आनन्द के नभ में उड़ान भरनी है तो प्रेम के पंख लगाने होंगे और अधिकार के भार त्यागने भी। प्रेम के निष्कर्ष व्यापक हैं, उर्वशी के अर्थ गूढ़ हैं। स्वर्ग मही का भेद, नर की अग्नि, कामना-वह्नि की शिखा, सब के सब प्रेम के ही पूर्वपक्ष हैं, प्रकृति-सागर में डूबकर आनन्द के माणिक निकालने के संकेत। दिनकरकृत उर्वशी का पाठ प्रकृति के उन अमूर्त तत्वों को गुनने का साधन है जिसमें प्रेम के निष्कर्ष गुँथे हुये हैं।

28.7.12

स्वर्ग मही का भेद

स्वर्ग का नाम आते ही उसके अस्तित्व पर प्रश्न खड़े होने लगते हैं, गुण और परिभाषा जानने के पहले ही। यद्यपि सारे धर्मों में यह संकल्पना है, पर उसके विस्तार में न जाते हुये मात्र उन गुणों को छूते हुये निकलने का प्रयास करूँगा, जिनसे उर्वशी और उसकी प्रेम भावनायें प्रभावित हैं। इस प्रेमकथा में स्वर्ग से पूरी तरह से बच पाना कठिन है क्योंकि इसमें प्रेम का आधा आधार नर और नारी के बीच का आकर्षण है, और शेष आधार स्वर्ग और मही के बीच के आकर्षण का। स्वर्ग और मही के आकर्षण की पहेली समझना, प्रेम के उस गुण को समझने जैसा है जिसमें परम्परागत बुद्धि गच्चा खा जाती है।

अच्छे कर्म और परिश्रम करने से स्वर्ग मिलता है। स्वर्ग की परिभाषा कुछ पहचानी पहचानी से लगे, अतः समानता हेतु यह माना जा सकता है कि स्वर्ग हमारी पृथ्वी के उन स्थानों जैसा है, जहाँ ऐश्वर्य है, धनधान्य है, जहाँ किसी चीज की कमी नहीं है। जहाँ सब कुछ बहुत ही अच्छा है, आनन्द विलास की सारी सुविधायें हैं, सुख ही सुख पसरा है। जन्म, मृत्यु, जरा, व्याधि, इसकी तनिक छाँव नहीं है वहाँ। वहीं दूसरी ओर मृत्युलोक में पीड़ा है, हर सुख में दुख छिपा है, द्वन्द्व भरा है। मृत्युलोक में रहने वाले हम सब, स्वाभाविक है कि इसी कारण से स्वर्ग के प्रति आकृष्ट होते हैं।

पुरुरवा भी अपवाद नहीं हैं। उर्वशी नारी है और सौन्दर्य का चरम है, आकर्षण गहरा होना ही है। साथ ही साथ वह स्वर्ग से भी है, जहाँ प्रणय एक कला है, जहाँ ऐश्वर्य एक जीवन पद्धति है, जहाँ श्रृंगार समीर संग बहता है। उर्वशी के प्रति पुरुरवा की प्रेमासित आकांक्षा सहजता से समझी जा सकती है, पर उर्वशी को पुरुरवा के अन्दर क्या भाया जिसके लिये वह स्वर्ग छोड़कर मही पर आने को उद्धत हो गयी। इस तथ्य को समझ पाना न केवल प्रेम का रहस्य जानने में सहायक होगा वरन मृत्युलोक के नरों को वह अभिमान भी देगा जो स्वर्गलोक में अनुपस्थित है।

चलिये ढूढ़ते हैं कि पुरुरवा में मृत्युलोक के कौन से विशेष गुण हैं जिससे उर्वशी अभिभूत है। पुरुरवा सुन्दर हैं, राजा हैं, शक्तिशाली हैं, वीर हैं, देवताओं का साथ देते हैं, सात्विक हैं, गुणवान हैं। पर यह सब तो स्वर्ग के देवों में भी है। कहीँ ऐसा तो नहीं कि उर्वशी को मृत्युलोक की मूलभूत प्रकृति ही अच्छी लगती हो, वही प्रमुख हो, पुरुरवा गौड़ हों। ऐसा भी हो सकता है कि प्रेम बिना किसी नियम के अनियन्त्रित ही उमड़ आता हो, उर्वशी को स्वयं भी न समझ आता हो कि उसे पुरुरवा से प्रेम क्यों हो गया। संभावनायें अनेक हैं। जब भी संशय हो, तो सबसे अच्छा समाधान वही कर सकता है जिसके बारे में संशय हो। उर्वशी के संवाद ही इस संशय को मिटाने में सहायक होंगे।

स्वर्ग के सुखों में कल्पना की प्रधानता हैं, वहाँ रूप का आनन्द दृष्टि से ही मिल जाता है, वहाँ व्यञ्जन का आनन्द उसकी गन्ध से ही मिल जाता है। जब मन की कल्पना सुख का निर्धारण करने लगे और सुख का संचार शरीर तक न पहुँचे तो कुछ छूटा छूटा सा लगता होगा स्वर्ग में, कुछ कुछ कृत्रिम सा लगता होगा स्वर्ग में। यद्यपि प्रेम का प्रारम्भ दृष्टि और कल्पना के माध्यम से ही होता है, स्वर्गलोक में भी और मृत्युलोक में भी, पर स्वर्गलोक में वह संचार कल्पना तक ही सीमित रहता है, मृत्युलोक में वह संचार शरीर तक आता है, अप्रतिबन्धित। शरीर से सुख भोगने की प्रवृत्ति दुख भी देती है, शरीर का सुख अल्पकालिक भी होता है। द्वन्द्व देता है शरीर, तब सुख की अनुपस्थिति दुख का आधार निर्माण करने लगती है। यद्यपि मृत्युलोक में दुख की उपस्थिति सुख की उपलब्धता बाधित और सीमित कर देती हैं, पर दुख के बाद सुख की अनुभूति में जो गाढ़ापन होता है, वह स्वर्गलोक में कहीं नहीं मिलता है। उर्वशी और अन्य देवता जिन्हें मृत्युलोक का आकर्षण है, उनके अन्दर सुख का गाढ़ापन एक न एक कारक होगा।

प्रेम स्वर्ग में एक क्रीड़ा है, देवताओं के लिये भी और अप्सराओं के लिये भी, वहाँ भावों से अधिक भोगों की प्रधानता है। प्रेम हुआ तो हुआ, नहीं तो जीवन चलता ही रहता है। जहाँ भोगों की अधिकता हो, वहाँ प्रेम को क्या वरीयता मिलेगी, यह विचार कर पाना कोई कठिन कार्य नहीं है। वहीं मृत्युलोक में प्रेम से बड़ा कोई रोग नहीं है, जिसे हो जाता है, उसे कोई औषधि नहीं मिलती है, न नींद आती है, न स्थायित्व मिलता है। कारण यही होगा कि हम प्रेम को अत्यधिक गम्भीरता से लेते हैं। जहाँ सुखों का आकाल पड़ा हो, वहाँ प्रेम में ही सुखों की उपस्थिति ढूढ़ने लगते हैं हम पृथ्वीवासी। उर्वशी के मन में प्रेम की उस एकात्मता और गूढ़ता की आकांक्षा जगी होगी, प्रेम के उस पक्ष की जो मात्र मृत्युलोक में मिलती है। उर्वशी के लिये मृत्युलोक के प्रेम का लोभ यातना से भरा होने वाला था, माँ बनने की पीड़ा से भरा, फिर भी वह प्रेम की उस गहराई को छूना चाहती थी जो केवल मृत्युलोक में सुलभ थी।

तीसरा कारण नर के भीतर की वह अग्नि है जो उसे संघर्ष करते रहने को प्रेरित करती रहती है। देवताओं के मन में कोई कामना, द्वन्द्व व परिताप शेष नहीं रहता है, तब उस अग्नि की अनुपस्थिति भी स्वाभाविक है जो इन गुणों का कारण बनती है। नर जानता है कि जब तक उसके अन्दर वह अग्नि है, जब तक उसके अन्दर कामना है, तभी तक सब उसके सम्मुख नत मस्तक हैं, सब इसी अग्नि का सम्मान करते हैं, देव भी, दानव भी। यही अग्नि द्वन्द्व उत्पन्न करती है, मन को स्थिर भी नहीं रहने देती है, उसे बारी बारी से दोनों तटों पर डुलाती है, कभी स्वर्ग सुहाता है, कभी मही सुहाती है। वह अग्नि रक्त की ऊष्णता में विद्यमान है, जब रक्त नर की नसों में अनियन्त्रित दौड़ता है, जब हुंकार अग्नि बरसाती है, सामने उपस्थित जन सहम जाते हैं, सुरक्षित आश्रय ढूढ़ते हैं। जिस समय पुरुरवा ने उर्वशी को केसी दानव से बचाया होगा तो अनजाने में हुये स्पर्श में इसी अग्नि की तपन उर्वशी के उर में बस गयी होगी।

प्रेम शरीर का भी विषय है, मन में उत्पन्न होता है पर निरूपण शरीर में पाता है। जैसे जैसे आत्मा का प्रकाश फैलता है, शरीर अपना महत्व खोने लगता है, जन्म मृत्यु के चक्र से बाहर निकलने लगता है। आत्मा का प्रकाश प्रेम के उपासकों के लिये बाधक है। गन्धमादन पर्वत पर, जब उर्वशी ने पुरुरवा से पूछा कि यदि आपको प्रेम था तो आपने मेरा हरण क्यों नहीं कर लिया? जब पुरुरवा कर्म और विकर्म की बात करने लगे तो उर्वशी का हृदय धक से रह गया, उसे लगा कि वह पुनः किसी देव की बाहों में पड़ी है। उसने कहा कि मैं अन्धकार की प्रतिमा हूँ, मैं आपके हृदय के अन्धकार पर राज्य करती हूँ, उसी के माध्यम से मेरा आप पर अधिकार है, जिस दिन आपको प्रकाश मिलेगा, आप भी देव हो जाओगे, वे देव जिन्हे छोड़ मैं आपकी बाहों में पड़ी हूँ।

प्रेम अंधकार से पोषित क्यों होता है, कहना कठिन है, पर दैनिक जीवन में उसका उदाहरण मिल जाता है। पति कभी कोई धार्मिक ग्रन्थ पढ़ने लगे तो पत्नी तुरन्त ही सशंकित हो जाती हैं। उन्हें लगने लगता है कि पति विरक्त हो जायेंगे, उनके प्रेम में भला ऐसी क्या कमी रह गयी जो पति विरक्तिमना होने लगे हैं। आप पर उनका और प्रेम उमड़ने लगता है। मही में एक गुरुता है, सब चीजों को अपनी ओर आकर्षित करने की, प्रेम भी आकर्षण का विषय है अतः उसमें भी गुरुता स्वाभाविक है। प्रेम और मही में स्वभावों का मिलन है, स्वर्ग प्रेम को समझने में असमर्थ रहता है, उर्वशी को प्रेम की अनुभूति पाने मही पर उतरना पड़ता है, किसी पुरुरवा के बाहु-वलय में।

25.7.12

उर्वशी, एक कथा

कथाओं का अपना संसार है, सच हों या कल्पना। उनमें एकसूत्रता होती है जो पात्रों को जोड़े रहती है। कथा में पात्रों का चरित्र महत्वपूर्ण है या परिस्थितियों का क्रम, कहना कठिन है, क्योंकि दोनों ही ऐसे गुँथे रहते हैं कि उन्हें अलग अलग कर उनका विश्लेषण असंभव सा होता है। उर्वशी की कथा का भी यही स्वरूप है, उर्वशी, पुरुरवा और समस्त पात्र परिस्थितियों से संबद्ध हो कथा का निर्माण करते हैं, एक बड़ी रोचक कथा का।

उर्वशी अप्सरा है, वह स्वर्ग की संस्कृति का अंग है, नृत्य, संगीत, मोहन, सम्मोहन आदि उसके दैनिक कर्म हैं पर उसे कुछ अतृप्त सा लगता है। सर्वसुखमयता के संसार में स्थिर पड़े रहने से उसे प्रकृति और उसके तत्वों के आड़ोलन का आस्वाद नहीं मिलता है। रात्रि को बहुधा वह अपनी सहेलियों के साथ मृत्युलोक का भ्रमण करती है। स्वर्ग में सब शाश्वत है, मृत्युलोक में सृजन और लुप्त होने की क्रिया उसे लुभाती है। रात में ओस का बनना, सूर्यकिरण पड़ते ही उड़ जाना, फूलों का खिलना, बन्द हो जाना, इनमें उसे कुछ क्रियाशीलता दिखती है, कुछ प्रकृतिशीलता दिखती है। मृत्युलोक के तत्वों की जीवटता, और जिजीविषा के प्रति मन में स्फोटित अग्नि, ये गुण उसके आकर्ष के प्रमुख उद्दीपन है। ऐसा क्यों है, यह एक वृहद विषय है, क्योंकि अध्ययन यह भी स्पष्ट करेगा कि देवता सदैव पृथ्वी में जन्म लेने के लिये लालायित क्यों रहते हैं?

पुरुरवा प्रतापी राजा हैं, चन्द्रवंशी, प्रतिष्ठानपुर के, आधुनिक प्रयाग के निकट। देवताओं के अधिकार क्षेत्र में दानव जब भी उत्पात मचाते हैं, पुरुरवा को सहायता के लिये पुकारा जाता है। वीरता, प्रखरता, संवेदनशीलता आदि सभी गुण होने पर भी उन्हें स्वर्ग का तन्त्र और ऐश्वर्य अत्यधिक अभिभूत करता है, स्वर्ग का हर तत्व सुन्दर लगता है। उसे पाने की एक अग्नि मन में रहती है। स्वर्गलोक के उत्सवों के बाद बहुधा वह रथारूढ़ बादलों में वेग से भ्रमण किया करते हैं, कोई दिशा नहीं, कोई ध्येय नहीं, बस मन की अग्नि को बुझाने, आवरगी सा कुछ।

दोनों की ऐसी ही मनःस्थिति की कोई रात्रि है, भ्रमणशील उर्वशी को केसी दानव देखता है, अरक्षित पा अपहरण कर लेता है, उर्वशी सहायता के लिये पुकारती है, निरुद्देश्य घूम रहे पुरुरवा की विचारतन्द्रा टूटती है। वीर पुरुरवा केसी दावन को युद्ध के लिये ललकारते हैं, मदमत्त और भीमकाय दानव पर सिंह सा टूट पड़ते हैं पुरुरवा। केसी से उर्वशी को छीनने के प्रयास में कई बार अनायास ही पुरुरवा व उर्वशी के शरीरों का स्पर्श होता है, नयन मिलते हैं, उस छुअन की तरंगें आसक्तिमय हो दोनों को ही अपहरित कर लेती है, अकथ प्रेम में। आहत केसी दानव भाग जाता है, पुरुरवा उर्वशी को सादर व ससम्मान वापस स्वर्ग भेज देते हैं, पुरुरवा वापस पृथ्वी आ जाते हैं। दोनों ही अपना हृदय खो आते हैं, स्मृतियाँ ले आते हैं, प्रेम दोनों का जीवन आच्छादित कर लेता है।

उर्वशी के लिये अपने प्रेम को पहले न कह पाने की लज्जा, पुरुरवा के लिये अस्वीकार कर दिये जाने का भय, पहल नहीं हो पाती है, प्रेम की अतृप्त ज्वाला दोनों का ही मन और जीवन लीलने लगती है। अनमनी सी उर्वशी एक बार विष्णु और लक्ष्मी पर आधारित नृत्यनाटिका कर रही है, लक्ष्मी का अभिनय करते हुये वह विष्णु को पुरुषोत्तम के स्थान पर पुरुरवा कह जाती है। निर्देशक भरत मुनि क्रोधित हो श्राप दे देते हैं कि जिस पुरुष के बारे में तू चिन्तनमग्न है, जा उसे वरण कर, स्वर्ग से निष्कासन का श्राप देते हैं। पर याद रख कि तुझे एक समय में पति या पुत्र ही मिलेगा, जिस समय तेरे पति और पुत्र का मिलन होगा, तुझे स्वर्ग वापस आना पड़ेगा।

तमिल मे कहावत है, उर्वशी शापम् उपकारम्, उस समय तो पुत्र का विचार मन में था ही नहीं इसलिये उर्वशी को यह श्राप भी एक उपकार सा लगता है। वह अपनी सखी से पुरुरवा को प्रणय-निमन्त्रण भेजती है, जिसे सहर्ष स्वागत मिलता है। उर्वशी प्रेमारूढ़ हो स्वर्ग से मही उतर आती है, पुरुरवा उसके साथ गन्धमादन की रमणीक पहाड़ी पर रहने लगते है, वहीं से राजकाज के निर्देश देते हैं। पुरुरवा की पहली पत्नी औशीनरी प्रतिष्ठानपुर में ही रहती हैं, निःसन्तान होने का दुख है उन्हें, पुत्रप्राप्ति के क्रम में पति के किसी दूसरी नारी के संग होने का क्षोभ वह राज्य के संचालन में सक्रिय रहकर छिपा लेती हैं।

एक वर्ष हर्षातिरेक में बीत जाता है, एक दूसरे के प्रेम में निमग्न दोनों को ही संसार की सुध नहीं रहती है। इस समय दोनों के बीच हुये संवाद को नर और नारी की परस्पर मनःस्थिति समझने के लिये आधारभूत माना जा सकता है। उन सूक्ष्म विवेचनाओं का वर्णन एक अलग अध्याय माँगता है। एक वर्ष के बाद की दो प्रचलित कथायें हैं, पर दोनों का उद्देश्य एक है। एक कथा के अनुसार वनभ्रमण के समय पुरुरवा की दृष्टि क्षण भर के लिये नदी से झुक कर जल भरती हुयी एक युवती पर ठहर जाती है, यह देख कर उर्वशी क्रोधवश और डाहवश लता बन जाती है। पुरुरवा उसे ढूढ़ते हैं पर वह मिलती नहीं है। पुरुरवा की विछोह दशा से द्रवित हो तथा उनके द्वारा ऋण को चुकाने के लिये देवता उन्हें एक मणि देते हैं, जिसको छूने से उर्वशी पुनः शरीररूप में आ जाती है। दूसरी कथा के अनुसार कुछ समय के लिये पुरुरवा यज्ञ कराने के लिये अपने राज्य वापस जाते हैं, तत्पश्चात वापस आ जाते हैं।

जो भी कथा हो पर इस समयावधि में उर्वशी ऋषि च्यवन और उनकी पत्नी सुकन्या के आश्रम में रहती है और अपने पुत्र आयु को जन्म देती है। पिता और पुत्र एक साथ मिल न जायें, उर्वशी की सहायता के लिये यह देवताओं की चाल थी। जो भी हो, पर उसके बाद उर्वशी पुरुरवा के साथ महल वापस आ जाती है और औशीनरी भी उसे स्वीकार कर लेती है। अगले १६ वर्ष उनका जीवन आनन्दमय और प्रेममय बीतता है, स्वर्ग और मही का श्रेष्ठस्वरूप उनके प्रेम के रुप में प्रतिष्ठापित होता है।

१६ वर्षों तक आयु का पालन पोषण महर्षि च्यवन और सुकन्या के आश्रम में होता है, माता-पिता से प्राप्त श्रेष्ठ गुणों को आश्रम की सम्यक और कुशल शिक्षा पद्धति और मणिमय कर देती है। योग्य आयु जब १६ वर्ष का होता है, महर्षि च्यवन उसे सुकन्या के साथ राजा के पास भेज देते हैं। श्राप के प्रभाव से उर्वशी को न चाहते हुये भी स्वर्ग वापस जाना पड़ जाता है। एक ओर उर्वशी के जाने का दुख, दूसरी ओर युवा पुत्र को सामने पाने का हर्ष, पुरुरवा राज्य आयु को सौंप कर गन्धमादन वापस चले जाते हैं। वर्षों से वात्सल्य हृदय में समेटे औशीनरी आयु को सहर्ष स्वीकार कर लेती है और राजमाता के रूप में अपने दायित्व का निर्वाह करती है।

दिनकर कथा यहीं समाप्त कर देते हैं पर अन्य विवरणों के अनुसार दानवों के साथ हुये एक और युद्ध के लिये देवताओं को पुरुरवा की सहायता की आवश्यकता पड़ती है, पुरुरवा सहायता करते हैं, देवता युद्ध जीत जाते हैं। युद्ध के बाद विदा लेते पुरुरवा के लिये इन्द्र उपहारस्वरूप उर्वशी को स्वर्ग से मुक्त कर देते हैं। पुरुरवा और उर्वशी तब जीवन पर्यन्त साथ साथ रहते हैं, उनके सात और पुत्र होते हैं। जीवन बीतता है, प्रेममुदित हो, प्रेम विजयी होता है, स्वर्ग और मही का मिलन स्थायी हो जाता है, गन्धमादन पर्वत पर।

21.7.12

उर्वशी, एक परिचय

जो भी कारण रहा हो पर जिसे भी उर्वशी की कथा सुनायी, उसके लिये वह नयी थी। पुस्तक पढ़ने के बाद, पात्रों को समझने के बाद, कथा कहना और भी सरल हो जाता है, और भी रुचिकर हो जाता है। लगता है मानो सबकुछ आपके सामने ही घटा है, मानो पात्रों ने अपने मन के उद्गार एकान्त में आपसे कहे हों। कालिदास कृत विक्रमोर्वशीयम् भी एक नाटक के रूप में लिखी गयी है, दिनकर कृत उर्वशी भी उसी शैली में निरूपित है, पात्रों को अपनी बात कहने में कठिनता नहीं होती, हर बार संदर्भ और सूत्रधार की आवश्यकता नहीं पड़ती है।

मानकर चल रहा हूँ कि आप में अधिकांश को यह कथा ज्ञात होगी, फिर भी उसे एक बार और कह देने का लोभ संवरण नहीं कर पा रहा हूँ। पात्रों का परिचय और उनकी चरित्रगत विशेषता का पूर्वज्ञान पाठकों को लेखक के साथ कदमताल का आनन्द देती है और बहुधा लेखक जो कहने वाला होता है, वह बात पाठक के मन में पहले ही घुमड़ आती है। संभवतः इसे ही पढ़ने का रस कहा जाता है, तब लगता है कि लेखक से आमने सामने बैठकर बातें की जा रही हैं। पात्र भी साथ में बैठे हैं, चर्चा जब भटकती है तब वे उसे सुधार देते हैं, नहीं तो सहमति में सर हिला देते हैं।

यदि विषयवस्तु को केन्द्र में रखें तो नारी पात्रों को चार स्तरों पर रखा जा सकता है। ये सर्वाधिक महत्वपूर्ण हैं क्योंकि इनके आपसी संवादों के माध्यम से ही दिनकर ने प्रेम के रहस्यों की पर्तों को धीरे धीरे खोला है। एक छोर में अप्सरायें हैं, जो स्वतन्त्र हैं, स्वच्छन्द हैं, उत्श्रंखल हैं, भोग और आनन्द में आकण्ठ डूबी। उन्हें न भविष्य की चिन्ता है, न भूतकाल का दुख, वे वर्तमान के स्वर्ग में जीती हैं। सौन्दर्य की स्वामिनी इन्द्रलोक में रहती हैं, सुविधाओं के ऐश्वर्य में। चिरयौवना हैं और उसके प्रति सजग भी, किसी की माँ बनकर वे अपना यौवन क्षणभर के लिये भी नहीं खोना चाहती हैं। देवता उनके प्रशंसक हैं और प्रेमी भी, कोई एक नहीं सब, किसी एक के लिये नहीं, सबके लिये। नृत्य, संगीत, गीत, कला आदि में संतृप्त निमग्न आनन्दविलास की प्रतिमूर्ति हैं अप्सरायें। देव, मनुज, दानव, सब के सब लालायित रहते हैं, उनका सानिध्य पाने के लिये, उनका होना उत्सवीय होता है, उनका न होना प्रतीक्षापूर्ण। कोई तापस अपनी तपस्या से इन्द्र के आसन पर अधिकार न कर बैठे, उस हेतु सदा ही अप्सराओं को भेजा जाता रहा है, उनकी तपस्या भंग करने।

कथा के दूसरे छोर पर हैं, सुकन्या, महर्षि च्यवन की सहधर्मिणी। कहते हैं, जब महर्षि च्यवन तपस्यारत थे, चंचल सुकन्या ने कौतूहलवश तपस्वी की पलक खींच दी थी। तपस्या टूटती है, सुकन्या को लगता है कि महर्षि उसे भस्म कर देंगे। पता नहीं विधि ने क्या नियत किया था कि महर्षि की आँखों में कोप के अंगार के स्थान पर प्रेम की लालिमा उभर आयी, रूपमयी सुकन्या का सात्विक सौन्दर्य उन्हें बहा ले गया। उन्होंने रुपमयी सुकन्या से विवाह का प्रस्ताव रखा। वृद्ध महर्षि ने विवाह हेतु तपस्या से ही पुनः यौवन ग्रहण करने का विश्वास दिलाया। उनके पास अर्पित करने के लिये केवल तापस का तप था, उन्होने अपने प्रेम से अरण्य में स्वर्ग उतारने का वचन दिया। बस यही कहा कि 'हरि प्रसन्न यदि नहीं, सिद्धि बनकर तुम क्यों आयी हो'। सुकन्या, जिससे विवाह के लिये न जाने कितने युवराज आतुर थे, महर्षि के एकांगी समर्पण में सहर्ष सिमट गयी और अरण्य में महर्षि च्वयन की पत्नी बन गुरुकुल में व्यस्त हो गयी।

इन दोनों छोरों के बीच में हैं दो और पात्र, औशीनरी और उर्वशी। औशीनरी पुरुरवा की धर्मपत्नी है, राज्य चलाने में सहयोगिनी है, पर दुर्भाग्यवश निःसन्तान है। वह मानवी है अतः प्रेम उसके लिये समर्पण भी है और अधिकार भी। पुरुरवा का उर्वशी के प्रति आकृष्ट होना उसे सालता है, पर पुरुरवा के मन में उसके लिये सम्मान कम नहीं होता है, सारे राजकीय व धार्मिक अवसरों पर औशीनरी ही पुरुरवा के वामांग में विराजती है। पुरुरवा को सन्तान की उत्कट चाह थी, वंश बढ़ाने का भार था, उस पृष्ठभूमि में पुरुरवा और उर्वशी की प्रेमकथा सहती है औशीनरी। कहानी के अन्त में पुरुरवा और उर्वशी के पुत्र आयु की राजमाता बन, औशीनरी उस पर वर्षों का संचित वात्सल्य उड़ेलने से भी नहीं पीछे रहती है।

कथा के केन्द्र में है उर्वशी, उसकी गति के माध्यम से कथा में संक्रमण होता है, अप्सरा, मानवी और तापसी के चरित्रों के बीच। उर्वशी अप्सरा है, इन्द्रलोक का प्रमुखतम आकर्षण, सब देव उसके लिये कुछ भी कर देने को लालायित रहते थे। एक अप्सरा जिसका मन स्वर्गलोक के आनन्द विलास की एकरूपता से उकता जाता है। उसे प्रेम की वह अवस्था चाहिये जिसमें अग्नि की धधक हो, जिसमें आकर्ष की तपन हो, जिसमें स्नेहिल अनुराग हो। देवप्रेम का कृत्रिम स्वरूप उसके लिये असहनीय सा था, उसे मानवीय प्रेम की प्राकृतिक रूक्षता रुचिकर लगती थी। उसे मृत्युलोक अच्छा लगता था। इस बीज का क्या वृक्ष पनपता है, इसकी कहानी है उर्वशी।

पुरुरवा ही प्रमुख नर पात्र की ध्वजा वहन करते हैं, उन्हीं के माध्यम से नर के भीतर की विभिन्न मनोदशाओं का चित्रण किया गया है। वह एक प्रतापी राजा हैं, देवों को बहुधा सहायता देते रहते हैं, दानवों के विरुद्ध। पुरुरवा के मन में देवलोक के प्रति अप्रतिम आकर्षण है, उन्हें यह तथ्य कचोटता भी है कि श्रेष्ठ होने पर भी उनके पास वह सब क्यों नहीं है? एक अतृप्त तृषा सदा ही उनके पीछे भागती है, एक अधूरेपन के भाव का लहराना उन्हें खटकता है।

यही पाँच पात्र उर्वशी की कथाभूमि का निर्माण करते हैं, उनकी चरित्रगत विशेषता कथा के अन्दर प्रेम के इतने रंग भर लाती है जो विषय समझने में बड़े आवश्यक होते हैं। आज भी ध्यान से देखेंगे तो यही पात्र हमारे चारों ओर खड़े दिखायी पड़ेंगे। हमारा प्रेम भले ही किसी एक पात्र से स्वयं को न जोड़ पाये, पर वह निश्चय ही इन्हीं के बीच कहीं अवस्थित रहता है।

सृष्टि के चलने में प्रेम धुरा सा कार्य करता है, धुरा जो स्वयं तो स्थिर रहता है पर किनारों को चलाता रहता है। प्रेम के प्रवाह में अस्थिर हम सब उस मर्म को समझना चाहते हैं जिसमें हमें तृप्ति का आनन्द मिले। उर्वशी का पढ़ना संभवतः उन सिद्धान्तों को समझने की राह बने, जिस पर हमारी चाह चलना चाहती हो।

18.7.12

उर्वशी, एक परिक्रमा

उर्वशी पुस्तक दस वर्ष पहले खरीदी थी, बिलासपुर में, किताबघर से। प्रतीक्षित पुस्तकों की सूची में पड़ी रही वह, दस वर्षों तक। बक्सों में भरकर न जाने कितने स्थानान्तरण झेले, उतने ही घरों की मुख्य अल्मारियों में सजी रही उर्वशी। कितनी बार उसे देखा, पुस्तकों के चयन में, हर बार मन में कुछ होते होते रह गया, उर्वशी पढ़ने के लिये नहीं उठा पाया। दिनकर की उर्वशी भी इतनी उपेक्षित नहीं रही होगी, वह तो पत्थरों में भी आकार बना निकल आती है, अनुपेक्षित और उन्मत्त। अब माह भर पहले, जब से उठाया है उर्वशी को, दो बार पढ़ चुका हूँ, पाँच लोगों को पूरा कथानक सुना चुका हूँ, उसके प्रत्येक पात्र को देखने लगा हूँ, पुनर्जीवित, वर्तमान में।

ऐसा भी नहीं कि उर्वशी पूर्णतया ही अपरिचित थी। पढ़ रखा था कि एक अप्सरा थी, बहुत ही सुन्दर, सकल विश्व में सुन्दरतम, चिरयौवना, उड़ती सी, मधुरिम, मदिर, लहर सी। यह भी पढ़ रखा था कि राजा पुरुरवा का पराक्रम अतुलनीय था, उनके राज्य की सीमाओं के परे स्थापित, स्वर्ग लोक तक। कथारूप में पढ़ रखा था, अन्य कथाओं की तरह, अध्ययन करना शेष था। कहते हैं कि ज्ञान तब तक उद्धाटित नहीं होता है जब तक अनुभव उसे आमन्त्रित न करे। शब्द भी तभी अपना रहस्य खोलते हैं, जब अनुभव उसे कचोटता है, उसे कुछ सोचने को विवश करता है।

दिनकर की प्रतिभा का, दिनकर के अनुभव का एक मधुरतम व प्रखरतम फल था, उर्वशी खण्ड काव्य का सृजन। तब तक दिनकर अपनी ओजपूर्ण शब्द-ऋचाओं का सृजन कर चुके थे, स्वयं को स्थापित कर चुके थे। पचास के तीन वर्ष पहले और तीन वर्ष बाद, इन ६ वर्षों में उर्वशी शब्दरूप धर दिनकर के हृदय से बह निकली। ओजभरे रचना-प्रवाह की पूर्णता थी उर्वशी, मन में किसी अकुंश के हट जाने का निष्कर्ष थी उर्वशी। दिनकर को उर्वशी के लिये ही ज्ञानपीठ भी मिला।

पता नहीं मेरा क्या कारण रहा हो, पर उर्वशी का आगमन एक अंकुश के हटने सा था, उसके नायक के रूप में पुरुरवा के लिये, उसके लेखक के रूप में दिनकर के लिये और उसके पाठक के रूप में मेरे लिये भी। इसके पहले कि मैं स्वयं को पाठक के रूप में और महिमामंडित कर डालूँ, इतना तो कहना आवश्यक है कि उर्वशी ने समझ के कई द्वार खोले हैं, यदि ऐसा नहीं होता तो यह विषय शेष जीवन भी मौन ही रहता, एक ऐसे अनुभव के रूप में जो मन ही मन गुन कर अपना जीवन जी डालता है, अपने को अभिव्यक्त नहीं कर पाता है।

पिछली दो बार से मैं विषय के चारों ओर से परिक्रमा लगाकर निकला जा रहा हूँ, इस बार भी विषय में प्रवेश का साहस नहीं दिखा पा रहा हूँ, न जाने क्या अंकुश है, न जाने क्या हिचक है, क्यों नहीं विषय को सरलता से और सहजता से कह पा रहा हूँ? उसका कारण जाने बिना और उसे अभिव्यक्त किये बिना, विषय से न्याय करना कठिन होगा मेरे लिये। सबसे पहले तो अपने लिये उस परिस्थिति को समझने का प्रयास करता हूँ मैं।

हम भारतीयों के लिये प्रेम सदा ही हृदय का विषय रहा है, हृदय के अन्दर ही रहा है, उसकी वाह्य अभिव्यक्ति ही बाधित रही है अपनी संस्कृति में, मर्यादित रही है अपने संस्कारों में। प्रेम समझने का विषय रहा है, न कि अभिव्यक्त करने का। घर और समाज के परिवेश में पति पत्नी का प्रेम भी संबंधों की सूची में एक अल्पमुखर स्वरूप धरे रहता है। किसी को प्रेम हो जाना विकार के रूप में देखा जाता है, एक पन्थभ्रम के रूप में देखा जाता है, ऐसा लगता है कि यह यौवन का लहकपन है, इसमें गहराई कम है, धीरे धीरे यह नशा उतर जायेगा। प्रश्न दो हैं। पहला, क्या यह सोच सही है या गलत है? दूसरा, क्या यह सोच हमारी संस्कृति का अंग है या परिस्थितिजन्य है?

ध्यान से देखा जाये तो यही दो प्रश्न अनुत्तरित थे। जब तक इन दो प्रश्नों के उत्तर नहीं ढूढ़ लेंगे, उर्वशी की परिक्रमा ही काटते रहेंगे, अन्तर में नहीं उतर पायेंगे। जब मैं प्रेम की बात करता हूँ तो उसे उस सुविधा से अलग रखता हूँ जो मात्र अल्पकालिक शारीरिक आनन्द से जोड़कर देखी जाती है। प्रेम की धधक अल्पकालिक नहीं हो सकती है, अप्सराओं की क्रीड़ा को कभी प्रेम का नाम नहीं दिया गया है। स्वच्छन्दता में आकर्षण तो रहता है पर स्थायित्व नहीं, अतः आकर्षण कभी गहन नहीं हो पाता है। प्रेम में आकर्षण भी है और स्थायित्व भी, गहनता का पर्याय। स्वच्छन्द क्रीड़ा भले ही संस्कृति में वक्र दृष्टि से देखी गयी हो, प्रेम सदा ही सम्मान लिये जिया है।

जिस संस्कृति में ईश्वरीय प्रेम पुरुषार्थ की पराकाष्ठा है, उस संस्कृति में मानवीय प्रेम इतना शमित कैसे रह सकता है? उन परिस्थितियों का सामाजिक और ऐतिहासिक विश्लेषण एक वृहद विषय है, पर निष्कर्ष इतने अपरिचित भी नहीं होंगे जिन्हें देख हमें आश्चर्य हो जाये। यदि किसी के सही स्वरूप नहीं देखगें तो उसकी विकृतियाँ उभरेंगी, यही संभवतः प्रेम के साथ भी हुआ है। विकृतियों से परे प्रेम के सकल पक्षों का विस्तार है उर्वशी का पढ़ना।

इन दो प्रश्नों के उत्तर स्पष्ट हैं, संस्कृति में प्रेम बाधित नहीं है और इसके पक्षों की चर्चा आवश्यक है, अपना स्वरूप समझने में, एक नर के रूप में, एक नारी के रूप में।

उर्वशी की परिक्रमायें, उन संशयों को उतार फेंकने के लिये थीं जो वर्षों से मन और जीवन से बँधे हुये थे, उन अंकुशों को हटा देने के लिये थीं जो हमारा मन बाधित करते हैं, उन कुण्ठाओं को जला देने के लिये थीं जो मन को पूर्णता प्राप्त करने में बाधक थीं। एक मानसिक पात्रता आवश्यक थी उर्वशी को समझने के लिये, उर्वशी का परिचय पाने के लिये।

अब प्रवाह निष्कंट बहेगा।

30.6.12

पर न जाने बात क्या है

लखनऊ का असह्य ताप, प्रशिक्षण की गम्भीरता, सायं तरणताल में निस्पंद उतराना, कार्य से कहीं दूर आधुनिक मनीषी की तरह बहते दिन। जहाँ मन में एक अपराधबोध था, किसी को न सूचित करने का, वहीं एक निश्चिन्तता भी थी कि शेष समय अपना ही रहेगा। यद्यपि सामाजिकता के प्रति यह उदासीनता और अन्यमनस्कता किसी भी कोण से क्षम्य नहीं है, पर स्वयं को एकान्तवास में रखने का दण्ड भी भुगतना था, अपने को समझने के लिये समय चाहिये था। स्वार्थ सर चढ़ बोला और मैं अपने आगमन के बारे में मित्रों और शुभचिन्तकों को सूचित करने के स्थान पर मौन रहा।

एकान्त ढेरों सम्भावनायें लेकर आता है, लगता है कि अब अपने से बतियायेंगे, अपने मन को मनायेंगे, अपने को तनिक और जानेंगे। अब एकान्त काटता नहीं है, जो अपेक्षित रहता है यथासंभव दे ही जाता है। एक क्रम बन गया, सोने के पहले रामधारी सिंह दिनकर कृत 'उर्वशी' पढ़ने का, सोने की प्रक्रिया में उसे समझने का, और उठने के पश्चात उसे गुनने का। रात्रि को कल्पनालोक में बिचरने का पूरा वातावरण था, श्रृंगार-ऊर्मियों में बहकने की प्रचुर सामग्री थी, पर शरीर दिनभर की थकान के बाद निढाल निद्रा में मन के आग्रहों को कल पर टालता रहा, हर रात।

पुरुरवा सनातन नर का प्रतीक है, उर्वशी सनातन नारी की, दिनकर की आधारभूत संकल्पना में स्वयं को रखकर, अपनी विवशताओं के आवरण में उर्वशी को समेटने का प्रयास करता रहा। यह समझने का प्रयास करता रहा कि सब कुछ पाने के बाद भी प्यास क्यों नहीं बुझती है, क्या पाना शेष रह जाता है? दिनकर मानते हैं कि नर के भीतर एक और नर रहता है और नारी के भीतर एक और नारी, उनको ही पाकर प्रेम को संतुष्टि मिलती है, प्रेम को अपने अस्तित्व का उत्कर्ष मिलता है। अपने अन्दर के एक और नर को अपने वाह्य आवरण से अलग रखने और नारी के भीतर की नारी की झलक को अपनी स्मृतिकक्षों से सहेज लाने का प्रयास करता रहा।

बात गहरी हो चली थी, सतही-श्रृंगार की कल्पना निस्तेज थी। उर्वशी की काव्यमयी पंक्तियाँ रह रहकर मन को प्रेम के उस पंथ पर ले जाने को तैयार बैठी थीं, जहाँ सनातन नर को सनातन नारी के अन्तरतम के दर्शन होने थे।

आकर्ष का संचार, संचार की मात्रा और मात्रा की गणित, सब का सब समझना था शब्दों के माध्यम से। प्रायोगिक प्रकरण तो बहुधा हमें हतप्रभ सा अकेला छोड़ चुके थे, न जाने कितनी बार। स्वयं को समझने का प्रयास तो तब भी किया जा सकता है, आप अपने मन से बातें कर सकते हैं, पर उस अग्नि को कैसे समझेंगे जिसके प्रभाव में आते ही दिग्भ्रम हो जाता है, मन और विचार अस्थिर हो जाते हैं, हृद के स्पंद अनियन्त्रित से अपना आश्रय ढूढ़ने लगते हैं। आप भी पुरुरवा की तरह प्रश्न पूछते फिरते हैं,

पर न जाने बात क्या है,
इन्द्र का आयुध, पुरुष जो झेल सकता है,
सिंह के बाहें मिलाकर खेल सकता है,
रूपसी के सामने असहाय हो जाता,
शक्ति के रहते हुये निरुपाय हो जाता,
बिद्ध हो जाता सहज बंकिम नयन के बाण से,
जीत लेती रूपसी नारी उसे मुस्कान से।

काश मुनियों की तपस्या भंग न हो, वे सिद्ध हैं, वे इस तत्व को समझकर इससे पार पाने में सक्षम भी हैं। हम असहाय हैं, इस आकर्षण को समझने में असमर्थ, हतप्रभ और स्थिर हैं।

स्वीकार है कि कई बार अपेक्षित को पा न पाने का क्रोध राह भरमाता है, बहुधा मन दुख से भर जाता है, जीवन भर उस राह में न बढ़ने के प्रण तक कर बैठता है, पर फिर भी इस विषय का सत्य जानने को मन उत्सुक रहता है। एक अद्भुत सी पुरुवाई बह रही है जगत में, प्रकृति में, जो सदा ही मन की जिज्ञासा और आनन्द की उत्कण्ठा प्रेम की राह में बलवत ले जाती है।

प्रश्नों की अग्नि में अनुभवों की आहुतियाँ पड़ रही हैं, प्रेम के सिद्धान्त अनमने हैं, अपने ऊपर किसी का नियन्त्रण नहीं चाहते हैं। पुरुरवा थोड़ा समझ आता है, लगता है उसमें संभवतः वही आकांक्षायें अतृप्त रही होंगी जो कि हम सब में हैं। उर्वशी भी थोड़ी समझ आती है, अपने हृदय का आह्लाद उसकी प्रेम तरंगों का संकेत भर है।

वापस आ गया हूँ, लखनऊ की तपन पर भले ही बंगलोर ने शीतल फुहार छिड़क दी हो, पर उर्वशी का पढ़ना और उर्वशी की खोज अब तक जारी है, 'उर्वशी' के बीच पृष्ठों में विचारों और अंगारों के बवंडर अब भी उठ खड़े होते हैं। दिनकर की 'उर्वशी' को पढ़ना अपनी सनातन उर्वशी को जानने का संकेत है, अन्तहीन को समझने का संकेत है।

21.12.11

आत्मीय अनुपात

एक बड़े होटल का परिवेश, सामने रखे विविध प्रकार के व्यंजन, विकल्पों में भ्रमित होती आपकी चयन प्रक्रिया, क्या लें, क्या न लें, किसमें कितना मसाला है, किसमें कितनी कैलोरी है, फाइबर है या नहीं, देश विदेश की सांस्कृतिक महक समेटे, कलात्मकता में सजे, आप के द्वारा आस्वादित किये जाने की राह देख रहे हैं, सब के सब। आपको क्या अच्छा लगता है? बड़ा ही व्यक्तिगत प्रश्न है, ढेरों विमायें समेटे है, भोजन को स्वाद का उद्गम मानने वाले भक्तगण बड़ा ही निश्चयात्मक उत्तर देंगे, भोजन को पोषण का आधार मानने वाले अनिश्चय की स्थिति में रहेंगे, बहुतों के लिये कुछ स्पष्ट सा, कुछ अस्पष्ट सा, या कुछ भी।

स्वाद, पोषण और संतुष्टि। स्वाद और पोषण का पुराना बैर है। विशुद्ध प्राकृतिक अवयवों में स्वाद भले ही न हो, पोषण पूर्ण रहता है। तेल, मसाले, घी आदि में स्वाद निखरता है पर शरीर उससे सशंकित रहता है। संतुष्टि का कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है, परिभाषित करना भी कठिन है। खुलकर भूख लगना संतुष्टि का प्रमुख कारक है, जब जठराग्नि धधकती है तो स्वाद भी आता है, पोषण भी होता है और संतुष्टि भी होती है। संतुष्टि मापने का एक आधार हो सकता है कि आपको भोजन के बाद कैसा लगता है, उत्साह आता है, उबाल आता है, उनींदापन आता है या उन्माद आता है। कहने को तो भोजन भी त्रिगुणी होता है, सतो, रजो और तमो, गीता में इसकी विस्तृत व्याख्या भी की गयी है। भोजन का गुण उसके प्रभाव में छिपा रहता है।

आप याद कीजिये कि आपको सबसे अधिक संतुष्टि कहाँ का भोजन करने के बाद प्राप्त होती है। बहुत कम ही लोग ऐसे होंगे जो किसी होटल का नाम लेंगे। बहुत से लोग अपनी माताजी या श्रीमतीजी का नाम लेंगे। घर में बनी एक कटोरी दाल और चार रोटी के सामने किसी बड़े होटल का पूरा मीनू लघुतर लगता है। बाहर जाकर न खाने की मेरी प्रवृत्ति को श्रीमतीजी द्वारा मेरी कृपणता से जोड़ने के कारण ही बाहर जाना पड़ता है। वैसे भी महीने में दो-तीन बार बाहर जाकर अन्य स्वादों को चखने में घर की अन्नपूर्णा को ही विश्राम मिलता है और हमारा स्वाद भी बदल जाता है।

ऐसा क्या है घर के खाने में जो इतनी संतुष्टि उत्पन्न करता है। कहते हैं जिस भाव से भोजन बनाया जाता है वह भाव हम भोजन के साथ ग्रहण करते हैं। घर में अशिक्षित माँ के हाथों से प्रेमपूर्वक बना हुआ भोजन, बड़े होटल के प्रशिक्षित रसोईये के हाथों से बने पकवानों से कहीं सुस्वादु और संतुष्टिकारक होता है। माँ के लिये बेटे का महत्व, रसोईये के लिये ग्राहक के महत्व से कहीं अधिक प्रेमासित व वात्सल्यपूर्ण होता है। वह भाव जब भोजन में पड़ता है तो स्वाद निराला हो जाता है। इसके विपरीत एक बार एक छात्रावास में आत्महत्यायें बढ़ने का विशेष कारण नहीं मिल रहा था, कारण का अनुमान तब लगा जब वहाँ के प्रमुख रसोईये ने भी आत्महत्या कर ली। आत्महंता मनःस्थिति में भोजन बनाने का कुप्रभाव यदि भोजन करने वाले पर पड़ जाये तो आश्चर्य नहीं होना चाहिये।

भले ही इस अवधारणा का कोई वैज्ञानिक आधार न हो, भले ही भौतिक और मानसिक धरातलों के बीच के संबंध के सूत्र न मिले हों, भले ही भोजन-पाचन को रसायनिक क्रियाओं के परे न समझा जा सका हो, भले ही आज भी कई घरों में भोजन बनाने वाले के ऊपर पवित्रता की घोर कटिबद्धता हो, भले ही चुपके से बाहर भोजन करना कई घरों में हीन दृष्टि से देखा जाता हो, पर हम सब कहीं न कहीं यह अनुभव अवश्य करते हैं कि प्यार से बनाये खाने में एक आत्मीय अनुपात होता है।

भोजन पौष्टिक तत्वों से बने, स्वादपूर्ण हो, प्रेमनिहित हो और घर की आर्थिक क्षमता के अनुरूप हो, संभवतः यही आत्मीय अनुपात हो हमारे भोजन का।

20.4.11

पर साथ छोड़ क्यों चली गयी

विवाह-पूर्व के प्रेमोद्गारों में एक अनकही सी कड़ी सेंसरशिप लगी रहती है। आप कितना भी उन्हें समझा लें कि यह रचना विशुद्ध कल्पनाशीलता का सुन्दरतम निष्कर्ष है पर आपका आश्वासन धरा का धरा रहता है और उस रचना के हर शब्दों में वह आकार ढूढ़ा जाता है जिसको हृदय में रखकर यह कविता लिखी गयी होगी।

इस संशयात्मक दृष्टिभरी प्रक्रिया में साहित्य की विशेष हानि होती है। जिन रचनाओं को उत्सुक प्रेमियों का हृदयगीत बन अनुनादित होना था, वे अपने अस्तित्व के घेरों और अंधेरों में विवादित हो पड़ी रहती हैं।

आज निर्भयात्मक उच्छ्वास ले उसे आपके सामने रख दे रहा हूँ। आपसे भी यही अनुरोध है कि प्रेम की सुन्दर अल्पना पर अपनी कल्पना के घोड़े दौड़ा कर उसे कोई और रूप न दें, बस पूर्ण साहित्यिकता से बांचें।


मैने अपने जीवन के, सुन्दरतम स्वप्नों के रंग को,
तेरे कोरे कागज जैसे, आमन्त्रण में भरने को,
सरसायी उन आशाओं में, मैं उत्सुक था, उत्साहित था,
तू आयी भी, इठलायी भी, पर साथ छोड़ क्यों चली गयी ।।१।।

क्यों मुक्त-पिपासा शब्दों का आकार नहीं ले पाती है,
ना जाने किस आशंका में, आकांक्षा कुढ़ती जाती है,
थी व्यक्त सदा मन-अभिलाषा, हर्षाये नेत्र-निवेदन से,
तू समझी भी, मुस्कायी भी, पर साथ छोड़ क्यों चली गयी ।।२।।

है नहीं वाक्‌ प्रतिभा मुझमें, ना ही शब्दों का चतुर चयन,
है नहीं सूझता, किस प्रकार से कह दूँ, हृद के स्पन्दन,
आँखों में था लिये हुये, आन्दोलित मन के आग्रह को,
आँखों से आँख मिलायी भी, पर साथ छोड़ क्यों चली गयी ।।३।।

2.3.11

बसन्त का सन्त

यह एक सुन्दर संयोग ही है कि वैलेन्टाइन दिन बसन्त में पड़ता है। बसन्त प्रकृति के उत्साह का प्रतीक है और प्रेम प्रकृति की गति का। प्रेम का यह प्रतीकोत्सव भला और किस ऋतु को सुशोभित करता? आधुनिक सांस्कृतिक परिप्रेक्ष्य में कुछ प्रश्न उभरते हैं। क्या प्रेम का अर्थ भिन्न संस्कृतियों में भिन्न होता है? प्रेम के आवरण में फूहड़ता का आचरण क्या किसी की सांस्कृतिक विरासत का अंग हो सकता है? प्रेम का सांस्कृतिक स्वरूप क्या किसी देश या समाज की सीमा में बँध कर रह सकता है? हर बार जो उत्तर मिलता है, वह धीरे धीरे सबको समेट लेता है, अपने अन्दर। जैसे जैसे प्रेम की गहराई में उतरने का यत्न करेंगे, वह दैहिक, मानसिक, बौद्धिक सीमाओं को समेटता हुआ अध्यात्मिकता में डूब जाता है।

प्रेम में अध्यात्म जैसा शब्द जोड़ते ही, बहुतों को लगता है कि, उसमें रोचकता निचोड़ ली गयी, अब होगी कोई नीरस सी असहनीय, अचंचलात्मक बातें। प्रेम की गहराई में उतरते ही उसमें ऐसा भारीपन आ जायेगा जो सबके बस की बात नहीं। मीरा का पागलपन, गोपियों की व्यथा, प्रेम की गहनतम अभिव्यक्तियाँ हैं। यह गुरुता उन लोगों को असहनीय है जिनके लिये प्रेम का उद्भव, अभिव्यक्ति और निरूपण एक नियत दिन में ही हो जाने चाहिये। आप कहें कि चलिये प्रेम को कम से कम एक माह में पल्लवित करें या बसंत में बढ़ायें तो आप पर आरोप लग जायेंगे कि आप वैलेन्टाइन बाबा का अपमान कर रहे हैं क्योंकि प्रेम के लिये एक नियत दिन है। क्या वैलेन्टाइन बाबा ने कहा था कि उन्हें एक दिन का कारागार दे दो?

मेरा 14 फरवरी से कोई विरोध नहीं अपितु वैलेन्टाइन बाबा के प्रति अगाध श्रद्धा है। हो भी क्यों न, प्रेम ही सकल विश्व की गति का एकल महत्वपूर्ण कारण है। अपने जीवन से प्रेम हटा दीजिये, आप जड़वत हो जायेंगे। प्रेमजनित गतियाँ असाधारण होती हैं, रोचक भी। उस असाधारणता को एक दिन में सीमित कर देना बाबा का अपमान है, प्रेम का भी। देखिये न, जिस सन्त ने प्रेम का पटल एक दिन से बढ़ाकर जीवन भर का कर देने का प्रयास किया, उसका प्रतीक पुनः हमने एक दिन में समेट दिया।

श्रुतियों के अनुसार, सैनिकों को विवाह की अनुमति न थी, कारण यह कि वे किसी आकर्षण में बँधे बिना ही पूरे मनोयोग से युद्ध करें। यह एक कारण था जिससे बिना विवाह  ही एक दिवसीय सम्बन्धों को आश्रय मिलता था। वैलेन्टाइन बाबा के प्रयासों से वह सम्बन्ध जीवनपर्यन्त बने, विवाह को मान्यता मिली और समाज को नैतिक स्थिरता। प्रेम में जो जितना गहरा उतरेगा, उसको उतना खजाना मिलेगा। सतह पर छींटे बिखेरेंगे तो सतही सुख मिलेगा, गहराई की डुबकी लगायेंगे तो मन के कोमलतम भावों में पगे रत्न होंगे आपके जीवन में। गहरापन बिना समय व्यय किये नहीं आता है, वर्षों की सतत साधना और तब स्पष्ट होता है प्रेम। प्रेम एक दिन का कर्म नहीं, वर्षों का मर्म है।

गहराई के साथ साथ प्रेम में एक विस्तार भी है। किसी की मुस्कराहटों पर निसार हो जाना, किसी को समझ लेना और किसी का दर्द बाटने की अभिलाषा ही प्रेम है। प्रेम तो बादल की तरह भरा हुआ होता है जो बरसना चाहता है या होता है धरती की तरह जो सब कुछ अपने भीतर समाहित कर लेने को आतुर होती है और उसे हजार गुना करके लौटा देती है। प्रेम समर्पण की धरा पर उत्पन्न होता है, निःस्वार्थ भाव से बढ़ता है और विराट हो जाता है, मानवता का विस्तार लिये। सच्चा प्रेम  किसी दिनविशेष से परे सतत पल्लवित होता रहता है।

वैलेन्टाइन बाबा ने तो प्रेम को विस्तार और गहराई दी थी, हमने ही उसे एक दिन में और सतही आकर्षण में समेट दिया। आप ही बताईये कि प्रेम के गूढ़ विषय में किसी की सतही समझ और तज्जनित फूहड़ता के कारण मैं उस सन्त पर श्रद्धा रखना कैसे कम कर दूँ, जिसने प्रेम को सही सामाजिक रूपों में स्थापित किया? मेरे लिये तो वह बसन्त के सन्त हैं।

18.9.10

कटी पतंग से इश्किया तक

चालीस वर्षों में एक पीढ़ी दूसरी में पदोन्नति पा जाती है पर नहीं भुलाये जा पाते हैं वह अनुभव व भावनायें जो हम जी आये होते हैं। बहुत से गुदगुदा जाने वाले क्षणों में हमारे प्रेम की अवधारणा कहीं न कहीं छिपी रहती है। किसी व्यक्ति विशेष के लिये प्रेम की यह अवधारणा भले ही न बदले पर समाज में आया बदलाव भी आँखों से ओझल नहीं किया जा सकता है। 1970 से 2010 तक, ये बदलाव क्या रंग लाये हैं, यदि देखना चाहें तो आपको मैं टहला लाता हूँ।

कटी पतंग नामक फिल्म आयी थी 1970 में। एक विधवा(कटी पतंग) के प्रति उमड़ता नायक का प्रेम व्यक्त होता है, एक गीत के माध्यम से। राजेश खन्ना आशा पारिख को नाव में बिठा कर ले जा रहे हैं और गा रहे है "जिस गली में तेरा घर न हो बालमा, उस गली से हमें तो गुज़रना नहीं"। पूरा गीत सुने तो भाव निकलेगें पूर्ण समर्पण व एकनिष्ठता के। आज भी जब कोई युवा नायिका वह गीत सुनती है तो स्वयं को सातवें आसमान में पाती है, जबकि वही गीत सुनकर युवा नायक स्वयं को सात कारागारों में घिरा पाता है।

इस वर्ष एक फिल्म आयी, इश्किया। इसमें भी एक विधवा के प्रति नायकों का प्रेम उमड़ता है, एक दूसरे गीत के माध्यम से। नसीरुद्दीन शाह व अरशद वारसी विद्याबालन को देख गाना गाते हैं "डर लगता है तनहा सोने में जी, दिल तो बच्चा है जी"। इस गीत के बोल दिल की असंतुलित, बच्चासम और कुछ भी कर जाने की प्रवृति पर केन्द्रित हैं। इस गाने को सुन भले ही नायिकायें उतना सहज न अनुभव करें पर नायकगण अपनी उन्मुक्तता दिल के बच्चेपन पर न्योछावर कर बड़ा स्वच्छन्द अनुभव करते हैं।

जिन्होने अपनी युवावस्था में कटी पतंग आधारित प्रेम अवधारणा अपनी मानसिकता में सजायी है, उन्हें इश्किया के विचार भाव छिछोरापन लगेंगे, वहीं आज की पीढ़ी को कटी पतंग जैसा समर्पण सम्पूर्ण-मूर्खता लगती है।

1970 में मेरा जन्म नहीं हुआ था और 2010 में हम प्रेम के अवस्था को पार कर गृहस्थी में बँधे हैं। इस प्रकार हम तो कोई भी छोर नहीं पकड़ पाये। पर कुछ वयोवृद्ध व कुछ उदीयमान ब्लॉगर अब तक इस पोस्ट की तह तक पहुँच चुके होंगे और करने के लिये टिप्पणी भी सोच ली होगी। उन्हीं का प्रकाश, प्रेम के इस अन्धतम में जी रहे हम अल्पज्ञों का ज्ञान बढ़ा पायेगा। कुछ व्यक्तित्व जो प्रेमजगत के अत्याधिपति हैं, निश्चय ही अल्पज्ञों के मार्गदर्शन में स्वतः आगे आयेंगे।

पता नहीं कि कौन सा सच आपके हृदय की धड़कन है?

आपके प्रेम की अवधारणा जिस पर भी ठीक उतरती हो आप वह गाना सुन लीजिये। दोनों के ही सुर उतने ही उखड़े हैं जितना इस काल में प्रेम पर विश्वास। मेरे गाने के पूर्व दुस्साहस को सराहने का फल मात्र है यह श्रवण। अपना बढ़ना बन्द करने के प्रयास में मैंने कुछ दिन पहले ये दोनों गीत मंच से गाये थे। जब गीत चयन कर रहा था तब यह आशा नहीं थी कि मैं प्रेम के दो छोरों में, सारे सुनने वालों को बाँधने का प्रयास कर रहा हूँ।


जिस गली में तेरा घर न हो बालमा


दिल तो बच्चा है जी