6.11.21

मित्र - ४०(भेदी और कृपापात्र)

भेदियों की कारण-श्रृंखला में एक प्रमुख कारण कृपापात्र बनने का आया। कृपापात्र बनने का प्रयास आगामी लाभ पाने के लिये या हानि से बचने के लिये किया जाता है। वैसे कृपापात्र शब्द का अर्थ अत्यन्त उत्कर्ष लिये हुये है और बहुधा अध्यात्म में ईश्वरीय कृपा के लिये प्रयुक्त होता है। आधुनिक संदर्भों में यह सत्ता के निकट मँडराने वालों का प्रतीक बन गया है।

कृपापात्र बनने में समस्या अनुपात की आती है। आप जितना निवेश करते हैं उससे कहीं अधिक पाने की चाह रखते हैं। ऐसा पर सदैव होता नहीं है। कभी आप यह कहते हुये निराश हो जाते हो या प्रयास छोड़ देते हो या विद्रोही बन जाते हो कि मैंने क्या तक नहीं किया और मुझे मिला क्या? यदि स्वामी के पास देने के लिये पर्याप्त है तो प्रतियोगिता कम होती है नहीं तो कृपापात्रों के द्वारा कुछ भी अर्पण कर देने की स्थिति सी बन जाती है। यह प्रतियोगितायें अत्यन्त रोचक और पूर्ण मनोरंजन के तत्व लिये होती हैं।


कृपापात्र बनने की राह और प्रियतम पाने की राह एक सी हैं। दोनों में ही अपना सर्वस्व तज कर अपने लक्ष्य की रुचियाँ, अभिरुचियाँ, संरुचियाँ आदि समझनी और जीनी पड़ती हैं। भोजन, वेश, शब्द और न जाने कितने तत्व हैं जिससे अपने अभीष्ट का भोग लगाना पड़ता है। वह भी बिना किसी देरी के, “राणा की पुतली फिरी नहीं तब तक चेतक मुड़ जाता था।” ईश्वर का भक्त बनना कठिन है, सतत साधना का मार्ग अपनाना पड़ता है। किन्तु उससे भी अधिक कठिन है आधुनिक संदर्भों में कृपापात्र बनना। यह सबके बस की बात नहीं है क्योंकि भक्ति में ईश्वर को भजने के लिये गुण अधिरोपित करने की आवश्यकता नहीं है। ईश्वर गुणों से परिपूर्ण है और उन्हीं गुणों को हम प्राप्त करने के लिये हम उसे भजते हैं। कृपापात्र बनने में पहले स्वामी में गुण ढूढ़ने पड़ते हैं, उनको समाज में प्रचारित और प्रसारित करना पड़ता है और तब गुण को गुणी से मिलाने हेतु स्तुति की जाती है।


कई बार तो स्वामी को यह प्रतीत होना चाहिये कि आपने वह गुण उनके अन्दर खोजा है। उसके पहले तो स्वामी को ज्ञात ही नहीं था कि वह तत्गुणसम्पन्न हैं। भक्ति से दूसरा अन्तर यह आता है कि कृपापात्र अपने स्वामी की स्तुति कुछ और करता है और चाहता कुछ और है। इस कृत्रिमता में जीना तपस्या नहीं तो और क्या है। सामान्यजन और ईर्ष्यालु जिसे नित नित घुटना कहते हैं, कृपापात्री के लिये वह साधना का पथ है। इस विषय का विस्तार और उसका समुचित निस्तार कई अध्यायों में भी नहीं समा पायेगा पर भेदियों के कारण के रूप में इतना ही जानना पर्याप्त है कि छात्रावास के चिंतन में इसे बहुत आदर के भाव में नहीं लिया जाता था वरन एक मानसिक दुर्बलता का प्रतीक माना जाता था। युवा को अपने कर्म पर पूर्ण विश्वास होना चाहिये और जब वह अपनी क्षमता के चरम पर स्वयं पहुँचता है तो उसे हाथ देने वाले लोग मिल ही जाते हैं।


भेदियों के विषय में आलोक के विचार सबसे अलग थे, उन्होंने भेदिये बनने से अधिक भेदिये बनाने की प्रक्रिया को समझाया। उनके शब्दों में “पुलिस जिस तरह भेदियों के साथ कठोरता और प्रलोभन से कार्य करती है, छात्रावास में भेदिये बनाना उसी कला का अंग था। बार बार बुलाकर महत्वपूर्ण और अनुशासित होने का भाव दिलाना, बुराई पर विजय के लिये सच्चाई का साथ देने के लिये प्रेरित करना, मित्रों के साथ किये छल को परम कर्तव्य की संज्ञा देना, इन भावों को बार बार बाल मन पर चढ़ाते रहना, इसी प्रकार की तकनीक प्रयोग में लायी जाती थी और बहुधा सफल भी होती थी।”


देखा जाये तो अनुशासन को लागू करने में कारक बनने का मान दिया जाता था भेदियों को। अनुशासन स्थापित करने के बड़े कार्य में सम्मिलित होने का भाव भेदिये तैयार करता रहा। यह एक ऐसा काम है कि जिसमें मना करना या उत्साह न दिखाना स्वयं में ही अनुशासनहीनता समझी जा सकती थी।


प्राचार्यजी को काण्डों की सूचना तो निश्चित रूप से भेदियों से ही मिलती थी पर छात्रावास अधीक्षक आचार्यजी का एक स्वयं का तन्त्र था। कई बार ढेरों ऐसे काण्ड जो अत्यन्त सावधानी से किये गये, जिनमें किंचित मात्र संशय नहीं रखा गया, जिनकी योजना और क्रियान्वयन में किसी और को भी सम्मिलित नहीं किया गया, उन सबमें भी जब हम लोग पकड़े जाने लगे तो लगने लगा कि छात्रावास के भीतर से कहीं बड़ा तन्त्र बाहर में है। तब मोबाइल और व्हाट्सएप का समय नहीं था कि जिसके माध्यम से उनको सूचना दी जाती। फिर उनको निश्चित रूप से सब कैसे पता चल जाता था, यह आज तक रहस्य है।


जो भी हो, भेदियों ने हमारे कार्य को कठिन और प्रयत्नों को अधिक व्यापक बना दिया था पर साथ ही रोचकता इतनी बढ़ा दी थी कि काण्ड करने में मन लगा ही रहा। आज भी किसी कार्य के सारे संभावित निष्कर्षों की योजना में कल्पना कर लेना और उसके अनुसार योजना में सुधार लाना संभवतः छात्रावास की ही देन है। योजना और क्रियान्वयन में पैनापन भी नहीं आता यदि हम पकड़े नहीं जाते। तब निरन्तर सुधार और विकल्पों जैसे शब्दों को हम समझ भी न पाते। इन सबका श्रेय भेदियों को जाता है। अतः तुलसीदासजी की परम्परा का निर्वाह करते हुये प्रारम्भ में न सही पर अन्त में ही, मैं उन स्वनामधन्य दुष्टमना भेदियों की वन्दना करता हूँ।

4.11.21

मित्र - ३९(भेदी और प्राप्ति)

भेदी बनने के कई तुच्छ कारण भी थे। तीन मुख्य कारण पिछले ब्लाग में समझे जा चुके हैं। कुछ और कारण जो पंकज, रवीन्द्र और आलोक ने बताये हैं, उन्हें यथारूप उन्हीं के शब्दों में व्यक्त करना उचित रहेगा।

पंकज कहते हैं कि जितने लोग प्राचार्यजी के सानिध्य में थे, उनमें से अधिकतर हरीराम नाई की भूमिका में रहते थे। संदर्भ बताते चले कि शोले फिल्म में जेलर साहब को सारी सूचनायें पहुँचाने का कार्य हरीराम नाई करते थे। इसका कोई विशेष प्रत्यक्ष कारण तो समझ नहीं आता है पर प्राचार्यजी को यह सब सूचनायें बताकर कोई लाभ लेने के मन्तव्य रहता होगा। संवेदनशील सूचनायें न भी हों, सामान्य सूचनायें भी बताकर विश्वासपात्रता पायी जा सकती है। जहाँ तक हम लोगों को ज्ञात है, प्राचार्यजी से किसी के द्वारा कोई भौतिक लाभ लेने का प्रश्न ही नहीं था। उनके सिद्धान्त अडिग थे और उनमें किसी भी व्युत्थान का किंचित भी स्थान नहीं था। आपके ऐसा करने से उनके मन में अधिकतम यही भाव जग सकते थे कि आप बड़े ही सुसंस्कृत छात्र है, आपके आदर्श बड़े ही उच्च कोटि के हैं और आपके अन्दर कर्मशिथिल और धर्मशिथिल समाज को सुधारने की उत्कट आकांक्षा है। इस छवि के अतिरिक्त यदि कोई किसी अन्य लाभ के लिये उनसे आशा करता था तो वह अत्यन्त मूर्ख था।


प्राचार्यजी के सानिध्य में रहने वालों के लिये सबसे अधिक कुछ लाभ था तो वह उनके सत्संग का लाभ था। पर इसके लिये भेदिये बनने की आवश्यकता नहीं थी, अपने साथियों का अहित करने की आवश्यकता नहीं थी। सत्संग का लाभ तो बिना किसी प्रत्याशा के भी लिया जा सकता था। प्राचार्यजी को रामचरितमानस, गीता, भारतीय संस्कृति, सनातन शास्त्र आदि विषयों में सिद्धहस्तता थी। यद्यपि विशालकक्ष के प्रवचनों में उनकी आशाओं का स्तर अत्यन्त ऊँचा पाकर बहुधा हीनभावना आती थी। बहुधा यह भी लगता था कि जैसे पूरा प्रवचन आपको ही लक्षित कर के कहा जा रहा है, उस समय अटपटा भी लगता था, क्षोभ भी होता था और कदाचित क्रोध भी आता था। जिस समय मन इस उद्वेलित अवस्था में हो तो प्रवचन का सार तत्व आपके हृदय तक पहुँचने से रह जाता है। आप उस निधि का सही अवमूल्यन नहीं कर सकते हैं। अब वही तत्व जब स्वाध्याय के माध्यम से पा रहा हूँ तब उनकी महत्ता समझ आ रही है।


मुझे लगता है कि पूर्वोक्त दोनों ही विचार प्राचार्यजी के सानिध्य में रहने वालों के मन में नहीं होगे। उन्हें न कोई लाभ लेना होगा और न ही कोई सत्संग से जीवन सवाँरना होगा। क्योंकि उनसे लाभ लेना संभव नहीं था और सत्संग सबके लिये समान उपलब्ध था। अपने को छात्रावास की शक्ति संरचना में श्रेष्ठ दिखने का प्रयास ही एक ऐसा कारण दिखता है जो अत्यन्त व्यवहारिक भी है और प्रासंगिक भी। व्यवहारिक इसलिये कि इसमें अधिक श्रम नहीं लगता है, दिन में एक दो बार जाकर सत्ता से अपनी निकटता प्रसारित की जा सकती है। प्रासंगिक इसलिये क्योंकि आजकल सत्ता अपना उतना भौकाल नहीं चमका पाती है जितना उससे अपनी निकटता दिखाने और बताने वाले चमका लेते हैं।


यद्यपि छात्रावास की शक्ति संचरना में ऐसा कुछ था नहीं जिसके लिये इतना भी श्रम करना पड़े। सारी प्रक्रियायें नियमबद्ध थीं, अनुशासन में ढील मिलने का प्रश्न नहीं था और भोजनालय आदि में भी शक्तिसम्पन्नजनों के लिये अतिरिक्त पकवान जैसी भी व्यवस्था नहीं थी। हाँ, बस आपकी सत्ता से निकटता जानकर कोई अन्यथा ही आपसे उलझने का प्रयास नहीं करेगा। कभी कभी आपसे न उलझने का यह भाव उपेक्षा में बदल जाता है। समाज ऐसे शक्ति सम्पन्नों के नखड़े नहीं झेल पाता है। जो भी लोग उनके पास जाते हैं, अपने कार्य हेतु ही जाते हैं। शक्ति के साथ यदि समाज की सेवा का भाव न आया तो वह शक्ति निष्फल है, वह व्यक्ति ठूँठ है। मुझे तो यही लगता है कि जब शक्ति का भाव रक्षा में हो, सहायता में हो तो उसको पाने के लिये भेदी बनने की क्या आवश्यकता क्योंकि उससे अन्ततः वैमनस्य और अपमान ही मिलता है।


रवीन्द्र के शब्दों में, “छात्रावास अधीक्षक आचार्य जी का गुप्तचरतंत्र आज की सीबीआई से भी ज्यादा सुदृढ़ था क्योंकि भेदी बहुत आसानी से मिल जाते थे। जन्म से कोई भेदी नहीं था या मित्रो को दंड दिलवाने में उत्सुक नहीं था लेकिन आचार्य जी के निकटतम आना या कुछ तथाकथित मित्रों की तरह बड़े दम्भ के साथ आचार्य जी के नीले स्कूटर की पीछे वाली सीट पर सहपाठियों को तिरछी नज़र से देखते हुए धूमने जाना शामिल था। चूंकि ये अवसर कुछ ही लोगो को प्राप्त था अतः बाकी किसी का भी भेदी बनना अचंभित करने बाला नही था।”


रवीन्द्र का यह विश्लेषण भेदियों के प्रयत्नों को अपने समाज में एक विशिष्ट स्थान पाने के लिये और उस स्थान का सार्वजिनक आनन्द उठाने के लिये था। यह भेदियों के चरित्र और कृतित्व को विनोद से प्रेरित मानते हैं। यह तो रवीन्द्र के हृदय की विशालता ही कही जायेगी क्योंकि भेदियों के द्वारा पकड़ाये जाने पर रवीन्द्र की व्यक्तिगत रूप से बड़ी हानि हुयी है। कई बार इनके घर पत्र तक लिखे गये हैं।


शेष कारण और आलोक का मत अगले ब्लाग में।

2.11.21

मित्र - ३८(भेदी और कारण)

भेदी होने के कारण ढूढ़ने बैठा तो एक के बाद एक कई कारण मिलते गये। जैसा कि पिछले ब्लाग में चर्चा की थी कि कोई भी कारण दीर्घकाल में उपयोगी सिद्ध नहीं पाया गया। यदि किसी में संबंधों का दोष था तो किसी में विश्वास का, किसी में स्वामी से मान न मिलने की आशंका थी तो किसी में अलग थलग पड़ जाने भय, किसी में अपमान था तो किसी में स्वयं छले जाने का दोष। फिर भी अल्पकालिक कारणों की चर्चा आवश्यक है क्योंकि बहुधा भेदी अपनी बुद्धि को समुचित प्रयुक्त नहीं कर पाता है, अल्पकालिक लाभ के लिये दीर्घकालिक हानि कर बैठता है।

कहा जा सकता है कि नैतिक कारणों से भेदी अपने कर्मों में बाध्य होता है। सच है, नैतिकता स्थापित करने की बाध्यता किसी से क्या कर्म न करा दे? नियमों का पालन हो यदि यह नैतिकता की परिधि में आता हो तो इसके सुनिश्चित करने की प्रक्रिया भी नैतिकता और नियमों से आबद्ध होनी चाहिये। इस परिप्रेक्ष्य में नैतिकता तो यह कहती है कि सामने वाले को इस बारे में बताया जाये, संकेत दिया जाये या चेतावनी दी जाये जिससे उसे सुधरने का अवसर मिल सके। नियमों के उल्लंघन में नैतिकता के प्रयोग का उद्देश्य तो उसका पालन ही होना चाहिये। सीधे दण्ड व्यवस्था को लागू करवा देना कुछ भी हो सकता है, नैतिकता नहीं।


भेदियों के समर्थक कह सकते हैं कि भेदियों का उद्देश्य तो नैतिकता से प्रेरित था पर उनके अन्दर भय था कि कहीं प्रत्यक्ष कह देने से विवाद न बढ़े, परिणाम अशोभनीय न हो जायें। या नियमों के उल्लंघनकर्ता नैतिकता के वाहकों का अहित न कर बैठें। इस संभावना को एक बार स्वीकार भी किया जाता है क्योंकि आजकल के वातावरण इस प्रकार की कई घटनायें सुनने में आती हैं जब किसी अपराध के साक्षीजनों को क्षति पहुँचायी जाती है। अतः इस दुष्परिणाम को संभावना को ही न आने के उद्देश्य से सीधे भेद बताना श्रेयस्कर है। यह तर्क उस समाज के लिये तो ठीक है जहाँ पर शक्ति असंतुलन अधिक है या अराजकता अधिक है। पर छात्रावास के परिवेश में जहाँ हम सब लगभग एक समान हैं और हम सबके ऊपर एक सशक्त ढण्डकर्ता या विधानकर्ता बैठा है, नैतिकता के निर्वहन में भय का तर्क शिथिल प्रतीत होता है।


भेदियों के हृदय में नैतिक कारण तो कभी नहीं रहता होगा क्योंकि उनके कर्मों में परमार्थ के कोई लक्षण नहीं थे। जिस कारण से भी हों पर समाजसुधार की प्रेरणा से उनके कर्म प्रेरित नहीं थे।


दूसरा कारण, हो सकता था कि ईर्ष्या का हो। ईर्ष्या इस बात की कि हम सब नियम तोड़ कर सुख प्राप्त कर रहे हैं और उनके सुख संचय में शुष्कता है। वैसे तो सुखी को देखकर उससे मित्रता का भाव उत्पन्न होना चाहिये। मित्रता इसलिये कि सीखा जा सके कि कैसे सुख प्राप्त किया जाता है, कैसे उद्योगरत रहा जाता है, कैसे उद्यम किया जाता है और कैसे बु्द्धि का समुचित प्रयोग कर योजना बनायी जाती हैं और आगामी बाधायें पार की जाती हैं। यदि यह सब सीख लिया जाये तो सुख वैसे ही प्राप्त हो जायेगा। इसके स्थान पर ईर्ष्या का भाव मात्र तुलना के कारण आता है, वह प्रसन्न है पर मैं नहीं। तो किस प्रकार से उसकी प्रसन्नता को कम किया जाये? ऐसा नहीं है कि ईर्ष्या में कार्य कम करना पड़ता है या ऊर्जा कम लगती है। ध्यान से देखा जाये तो ईर्ष्या में आप मित्रता से कहीं अधिक कार्य करते हैं। मित्रता तो सरलतम है, बिना अधिक प्रयास के आपका सुख बढ़ जाता है। वहीं दूसरी ओर ईर्ष्या में समय, बुद्धि और ऊर्जा कहीं अधिक लगती है, बस दूसरों का सुख कम करने के लिये।


ईर्ष्या बड़ी बलवती है, आवश्यक न भी हो तब भी आप प्रतियोगिता में खड़े हो जाते हैं। प्रतियोगिता कि सामने वाला अधिक प्रसन्न कैसे है? प्रतियोगिता उस समय तो ठीक होती है जब प्राप्य वस्तु एक ही हो। यहाँ तो हाट खाने की वस्तुओं से भरे पड़े हैं, टाकीजें फिल्मों से पटी पड़ी है, सबके पास व्यय करने के लिये पर्याप्त धन है तो प्रतियोगिता का भाव कैसा? जगत में सुख की भी कमी नहीं है, आप ईर्ष्यावश प्रतियोगिता करेंगे और भेद जाकर अपने स्वामी को बता देंगे तो वह सुख विशेष नहीं रहेगा, कोई दूसरा सुख आ जायेगा। इस तरह के कई प्रकरण छात्रावास में हुये हैं जब भेदियों के कारण एक सुख का मार्ग बन्द कर दिया गया तो हम लोगों ने कोई और लक्ष्य और साधन ढूढ़ लिया।


तीसरा कारण है, कष्ट देने का स्वभाव। यदि कोई स्वभावतः दुष्ट है तो उसका सारा ध्यान इसी बात पर लगा रहेगा कि सामने वाले को कैसे कष्ट दिया जाये। तब उसकी परिधि में मात्र आप ही नहीं आते हो, वे सब आते हैं जो भी उसके संपर्क में रहते हैं। आपके लिये भेद के द्वारा कष्ट उत्पन्न करेगा तो औरों के लिये किसी और कारण से कष्ट पहुँचायेगा। ऐसे लोगों को सुख दुख के बीच का अन्तर ज्ञात नहीं होता है। यह संग “बेर केर को संग” जैसा होता है, “वा डोलत रस आपने, वाके फाटत अंग”। इस तरह के दुष्ट सबके लिये घातक होते हैं, विशेषकर उस स्वामी के लिये भी जिनकी ये सेवा करते हुये प्रतीत होते हैं।


भेदियों के शेष कारण अगले ब्लाग में।

30.10.21

मित्र - ३७(भेदी मनःस्थिति)

आपके साथ रहने वालों का भेदी बन जाना, यह सहजीविता का सामान्य लक्षण नहीं है। यह समाज के वे स्खलनक हैं जिन्हें आभास नहीं होता है कि जब समाज का ढाँचा ढहता है तो साथ में उनका भी पतन होता है। दृढ़ समाज में औरों की उपलब्धियों तो एक बार स्वीकार्य भी हो जाये पर भेदिये तो अपने समाज को संकट में डाल कर स्वयं को गौरवान्वित अनुभव करते हैं। जब समाज ही ढह जायेगा तो आपकी जय बोलने वाला कौन रहेगा, जब समाज ही ढह जायेगा तो किसके कन्धे पर खड़े होकर आप स्वयं को यशदीप घोषित करेंगे।

संस्कारवश स्पष्टवादी रहा हूँ अतः मन में जो बात होती है व्यक्ति के समक्ष कह देता हूँ। सामनेवाले में सुधरने की संभावना रहती है तो उस दृष्टि से, नहीं तो औरों का अहित न हो इसलिये चेतावनी की दृष्टि से व्यक्त कर देता हूँ। मेरे मन में कभी किसी का भेद किसी को बताने का विचार ही नहीं आया। यदि किसी व्यक्ति की अनुपस्थिति में उसके बारे में बात होती भी है तो भी परोक्ष आलोचना से बचता हूँ और प्रत्यक्ष कहना श्रेयस्कर समझता हूँ। यदि लगता है कि मेरे संज्ञान में आयी कोई बात किसी का कोई अहित कर सकती है और वह उसको ज्ञात होनी चाहिये तो मैं सीधा या संकेतों में कह देता हूँ। किसी कनिष्ठ के बारे में प्रशासन की धारणा उस तक पहुँचा देना मुझे इसलिये आवश्यक लगता है कि कनिष्ठ को एक अवसर मिल जायेगा सुधरने का, अपने आप को व्यक्त करने का, तथ्यों को यथारूप प्रस्तुत करने का। सामान्य परिस्थितियों में सामने वाले को एक अवसर देना सहजीविता का आवश्यक अंग है।


इस परिप्रेक्ष्य में मुझे कभी समझ ही नहीं आया कि लोग भेदी क्यों बन जाते हैं? इस बारे में अपने मित्रों के विचार जाने किन्तु फिर भी मन को संतुष्ट न कर सका कि चाहे जो कारण रहे पर भेद खुल जाने के बाद जो तनाव उत्पन्न होता होगा उसका निराकरण कैसे किया जाता होगा? भेद खुल जाने के बाद जो वैमनस्यता होगी उसका पूर्वाभास ही अपने आप में सशक्त निषेधक है कि भेदी न बना जाये।


लम्बे समय तक भेदी बने रहना भी संभव नहीं है। कृत्रिम आचरण, अति सतर्कता और अटपटा व्यवहार आज नहीं तो कल भेदी का भेद खोल ही देते हैं। तब जो निष्कर्ष आते हैं, यदि वही स्वीकार्य थे तो पहले ही उनको व्यक्त करने में क्या हानि थी? अपना वास्तविक परिचय छिपाकर कुछ कालखण्ड जी लेने में भला कौन सा बड़ा लाभ मिलता होगा? भेदी को किसी भी समाज में सम्मान के साथ नहीं देखा जाता है। अपमान की दृष्टियों से तो भला यही होगा कि स्पष्टवादी होकर अपना मन्तव्य व्यक्त किया जाये। आपका मत सामने वाले को स्वीकार्य हो या आपकी उपेक्षा हो या आपका उपहास उड़े पर ये सब अपमान सहने के पहले तो प्रयोग में लाये ही जा सकते हैं।


भेदी जिस स्वामी को जाकर सारी बात बताता है, उसके मन में भेदी के बारे में कैसे विचार रहते होंगे? महान तो कदापि नहीं क्योंकि जो अपनों से विश्वासघात कर सकता है वह अपने नवस्वीकार्य स्वामी से भी कर सकता है। इतिहास इस बात का साक्षी है कि भेदियों को कभी भी कोई महत्वपूर्ण और विश्वासयोग्य पुरस्कार स्वामी ने नहीं दिया होगा। यथासंभव पीछा छुड़ाने की घटनायें अवश्य होती हैं भेदियों के साथ। क्रूर स्वामी तो कार्य सम्पन्न हो जाने के बाद भेदिये को मरवा तक डालते थे।


भेदी स्वयं में शक्तिशाली हो न हों पर जिस मात्रा में वे शक्तिसंतुलन अस्थिर करते हैं, उससे उनकी ध्वंसकता नापी जा सकती है। चर्चित कहावत है, “घर का भेदी लंका ढहाये”। इस प्रकार में रावण को तो फिर भी ज्ञात था कि विभीषण अपमानित होकर गया है, सब के सब ज्ञात रहस्य बता देगा। कम से कम रावण को विभीषण के मन्तव्य के बारे में कोई संदेह नहीं था। विभीषण रावण को समझाकर गया था, अपना स्पष्ट मत प्रकट कर के गया था। अपने युद्ध की तैयारी रावण यह तथ्य जानते हुये कर रहा था और इस संभावित संकट को जानते हुये रणनीति बना रहा था। हमारी स्थिति में तो परिमाम और भी भयानक थे क्योंकि हमको तो यह ज्ञात ही नहीं था कि हमारी कौन सी सूचना दूसरे पक्ष तक जा रही है या कौन उस सूचना को पहुँचा रहा है?


हमें तो भेदी के बारे में तब ज्ञात होता था जब हम पकड़े जा चुके होते थे, जब हम रण हार चुके होते थे। उस समय भी यह सुनिश्चित नहीं हो पाता था कि भेदी कौन है, यद्यपि ५-६ लोगों पर संशय अवश्य होता था। ५-६ लोगों पर संशय कोई ऐसी अनुकूल स्थिति नहीं होती जो कि भविष्य में आपका संकट कम कर सके। जब तक पूरी तरह से ज्ञात न हो कि भेदी कौन है आप निष्कंटक अपनी योजनायें क्रियान्वित नहीं कर सकते। योजनाओं में सूचनाओं की गोपनीयता का बड़ा ही महत्वपूर्ण स्थान है। बिना गोपनीयता के किसी काण्ड को निष्पादित करने का प्रयास आँख पर पट्टी बाँध कर सड़क पर चलने जैसा है।


योजना तो तब और रोचक हो जाती है जब आपको भेदी के बारे में ज्ञात हो और भेदी को यह तथ्य ज्ञात न हो। तब आप भ्रामक सूचना पहुँचाकर न केवल आप अपना कार्य पूरा ककरते हैं वरन भेदी को उसके स्वामी के सामने विश्वासहीन, स्तरहीन और अनुपयोगी सिद्ध कर देते हैं। उस तरह के भी कई प्रकरण आये पर मुख्यतः हम भेदियों के हाथों छले जाते रहे।


भेदी को क्या मिलता था हमारी सूचनायें अपने स्वामी तक पहुँचा कर। जानेंगे अगले ब्लाग में।

28.10.21

मित्र - ३६(विघ्नमना भेदिये)

हम अपने बुद्धिबल और साहस से जिस स्तर तक पहुँच रहे थे, वहाँ पर बहुत अधिक दिनों तक बने रहना संभव नहीं हो रहा था। जिस दिन काण्डस्थल पर साक्षात छात्रावास अधीक्षक प्रकट हो जाते, उसी दिन हमारे श्रमशील पुरुषार्थों का पटाक्षेप हो जाता था। आलोक के मत में कोई एक भेदी नहीं, वरन स्वनामधन्य दुष्टों की पूरी श्रृंखला थी। तुलसीदासजी ने उनके महत्व को पहचाना है और रामचरितमानस के प्रथम काण्ड में देवताओं के बाद उनकी ही वन्दना की है। अपने उत्थान में न्यूनतम व्यय करने वाले और दूसरों का अहित करने में अपना सर्वस्व झोंकने को तत्पर उन भेदियों के बिना हमारी छात्रावास की कथा अपूर्ण है।

पतंजलि योगसूत्र में समुचित सामाजिक गतिमयता की बड़ी ही गंभीर और लाभदायक सलाह दी गयी है। सुखी के साथ मित्रता का भाव, दुखी के साथ करुणा का भाव, पुण्यात्मा के साथ मुदिता का भाव और पापात्मा के साथ उपेक्षा का भाव रखना चाहिये। भेदियों की दृष्टि में हम सुखी थे क्योंकि बिना अनुमति के टीवी पर फिल्म देख रहे थे, बाहर के व्यंजन, मिठाईयाँ आदि मँगा कर खा रहे थे, समय समय पर फिल्म देखने भी जा रहे थे। अच्छा तो यह होता कि हमें सुखी देखकर और पतंजलि की सलाह को ध्यान में रख हम सबसे मित्रता की जाती और सुविधाओं का लाभ उठाया जाता। प्रत्यक्ष रूप से साथ आने में यदि बुद्धिहीनता या लघुता सिद्ध हो रही थी तो हमारे प्रयोगों के तत्वसार को अपनाकर बिना श्रेय दिये ही सुविधा उठायी जा सकती थी।


यदि भेदियों की दृष्टि में हम पापात्मा थे तो भी हम उपेक्षा के पात्र थे। यद्यपि इस पर एक विस्तारित चर्चा हो सकती है कि नियम के विरुद्ध जाना क्या पाप की श्रेणी में माना जायेगा? पाप तो तब होता जब किसी का कोई अहित होता, किसी को कोई पीड़ा पहुँचती। “परहित सरिस धरम नहिं भाई, परपीड़ा सम नहिं अधमाई”। हमारे परिप्रेक्ष्य में नियम के विरुद्ध जाने का अर्थ था, बाहर का कुछ खाना या बाहर जाकर कोई फिल्म देखना। इससे भला किसी का क्या अहित? और जब अहित नहीं तो पाप कैसा? यदि विस्तृत दृष्टिकोण से भी देखा जाये तो कोई कह सकता है कि इसको “अनुशासन” और “स्वयं के भविष्य” के अहित की श्रेणी में लाया जा सकता है। ये दोनों ही इतने मूर्त रूप तो नहीं जिनको पीड़ा पहुँचे। यदि अनुशासनहीनता के कारण व्यवस्था को ठेस पहुँचती भी है तो भी वह पापतुल्य नहीं हो सकता है।


नियमों के पालक और उनसे पालित अपनी अपनी समझ का युद्ध लड़ते हैं। एक की समझ में वह ठीक है, दूसरे की समझ में वह आधारहीन और विचारहीन। पहले की समझ में उससे दूसरे का विकास होगा, दूसरे की समझ में वह पहले का अहं है। कालान्तर में बात हित की रह ही नहीं जाती है। पहला कहता है कि हम तो मनवा के रहेंगे, तो दूसरा कहता है कि “ई चोलबे ना”। अन्ततः नियम तार तार हो असमय निस्तार पा जाता है। अतः नियमों की व्यवस्था के लिये यह बहुत ही आवश्यक है कि पालक और पालित अपनी अपनी समझ दूसरों को समझा सकें और एक साझा निष्कर्ष पर पहुँच सकें, एक समझौता सा कर सकें। समझौता जो शब्दों से अधिक भावों पर आश्रित हो, कुछ कुछ अमेरिका के संविधान जैसा क्योंकि बहुधा शब्द तो सबके अर्थों में प्रयुक्त हो जाते हैं, अर्थ में भी और अनर्थ में भी।


यदि मान भी लिया जाये नियमों का उल्लंघन पापकर्म की श्रेणी में आता है, तो उसकी उपेक्षा कर देना चाहिये था। प्रेम और द्वेष दोनों ही सापेक्षिक होते हैं। दोनों में ही आप सामने वाले को महत्व देते हैं। उपेक्षा में उस पापकर्म को महत्व नहीं मिलता है जिससे वह निष्प्राण और निर्बल हो जाता है। उस स्थिति में शमन और दमन दोनों ही सरल हो जाता है। द्वेष में आप पापी के बारे में सोचते हैं, क्रोधित होते हैं, दुखी होते हैं। इससे पापकर्म को और प्रेरणा मिलती है, बल मिलता है। 


यदि भेदी के मन में उपेक्षा के भाव नहीं भी आये तो पहले किसी हितैषी की भाँति प्रत्यक्ष कहना था या किसी वीर की भाँति चुनौती देना था। दोनों ही नहीं किया और साथ में पता भी चलने दिया कि मन में क्या चल रहा है? यदि हम सबको भेदियों के मन में घटित विचारक्रम का पता चल जाता तो हम सजग हो उनसे दूरी बना लेते। यह तो लगभग निश्चित ही था कि कुटिलता और हानि पहुँचाने के भाव से भेदकर्म किया गया था।


इस क्रिया को और ऐसे व्यक्तियों को गु्प्तचर न कह कर भेदी की संज्ञा पर आपत्ति हो सकती है क्योंकि भेदी एक नकारात्मक शब्द है जबकि गुप्तचर एक निश्चित व्यवस्था के प्रति इंगित करता है। गुप्तचर बहुधा आपके बीच का नहीं होता, वह आपका मित्र नहीं होता है, उसकी निष्ठा आपके प्रति नहीं होकर अपने स्वामी के प्रति होती है। अपने गुप्तचर कर्म को करने के क्रम में वह आपसे मित्रता का अभिनय करता है, आपका विश्वास जीतता है, आपके प्रति निष्ठा व्यक्त करता है। वहीं दूसरी ओर भेदी पहले आपका मित्र होता है, आपके साथ रहता हो पर कालान्तर में किसी प्रलोभन में आकर या किसी स्वार्थ के वशीभूत हो अपने नये स्वामी के लिये कार्य करने लगता है। अपने पाले बदलने की कुटिलता को भेदी कहना ही उपयुक्त कहा जायेगा।


कारण क्या रहा होगा कि अपने मित्रों से छल कर कुछ छात्रावासी भेदी बन गये। जानेंगे अगले ब्लाग में।

26.10.21

मित्र - ३५(वीसीआर)

शुक्रवार की देर रात की फिल्म का अध्याय असमय अवसान पा चुका था। यह भेद छात्रावास अधीक्षक तक कैसे पहुँचा उसका पता अभी तक नहीं चला। मन की ऊर्जा कार्यविशेष की राह नहीं तकती है, उसे तो जो भी दिशा मिल जाये, जो भी समक्ष राह दिख जाये, वह उसी में बढ़ी चलती है। हमारा पंथ भी इसी सिद्धान्त से प्रेरित था।

व्यक्तियों, वस्तुओं की तरह ही विचारों का अपना कालखण्ड होता है जिसमें वे उत्पन्न होते हैं, बढ़ते हैं, विकसित होते हैं और अन्ततः अवसान पा जाते हैं। तब उनका स्थान कोई अन्य विचार ले लेता है। अपने प्राधान्य का उछाह और साम्राज्य विचारों ने बहुत देखा है। जिस समय विचार अपने चरम पर होता है उसके चारों ओर संरचनाओं के ताने बाने इस प्रकार बुने जाते हैं मानो वह सदा ही रहने वाला है। जैसे ही वह अस्त होता है उस पर आधारित सारे स्वप्न अवसाद में डूब जाते हैं। हमारा युवा मन संभवतः इस शाश्वत तथ्य को समझता था। हमारी ऊर्जा का कालखण्ड हमारे अस्त हुये विचारों और प्रयोगों से कहीं बड़ा था।


तकनीक का क्षेत्र ऐसा है जिसमें परिवर्तन की गति अधिक है। एक विचार आता है, पल्लवित होता है और प्रयाण कर जाता है। इस शताब्दी में जन्में युवाओं को यदि बताया जाये कि हम लोग वीसीआर में फिल्में देखते थे तो उन्हें साथ में यह भी बताना पड़ेगा कि वीसीआर होता क्या था? यद्यपि आजकल गूगल महाराज पुराने ज्ञान को संजो कर रखे रहते हैं नहीं तो इसकी स्वतः कल्पना करना कठिन होता। इसी प्रकार टीवी आने के समय किसी ने कहाँ सोचा था कि वीसीआर जैसा कोई यन्त्र आयेगा और उसमें फिल्में देखी जा सकेंगी। जिन्होने वह कालखण्ड जिया है वही इसकी रोचकता को समझ सकते हैं और व्यक्त कर सकते हैं।


हमें भी याद है रात रात भर जग कर तीन फिल्में एक के बाद एक देखना। दृश्य, गीत, संवाद और कहानी इस प्रकार मस्तिष्क में गुत्थमगुत्था हो जाते थे कि एक फिल्म के प्रकरण में दूसरी फिल्म कब घुस जाती थी पता ही नहीं चलता था। स्पष्ट याद है उन तीन फिल्मों को चयनित करने में लगे समय, बुद्धि, ऊर्जा और वे विवाद भी जब कोई एक निर्णय नहीं हो पाता था। याद है थकान से पथरायी आँखों में संतुष्टि की रेखायें। साथ ही याद है बड़ी माचिस के आकार के डब्बों में बन्द जीवन्त और रोमांचक कहानियाँ।


हम छात्रावासियों की स्मृति में वीसीआर को लेकर एक और अध्याय जुड़ा था। शुक्रवार के प्रकरण के बाद कुछ ऐसा करना आवश्यक था जिस पर आगामी समय को और आगामी पीढ़ी को अपनी क्षमताओं पर क्षोभ न हो। इतिहास रचने का दायित्वबोध हमें नित नये काण्ड करने की प्रेरणा देता था। वीसीआर जैसे यन्त्र ने अतृप्त साहस को पुनर्जीवित कर दिया।


छात्रावास में वीसीआर मँगाने की योजना बनी। उद्योग करने वाले कुछ न कुछ सीखते रहते हैं, चाहे सफलता मिले या असफलता। वीसीआर लगाने वाले एक बड़े से घनाकार डब्बे में टीवी लाते थे और साथ में एक ब्रीफकेस जिसमें वीसीआर रहता था। बहुधा एक रिक्शे में सारा सामान आता था। रिक्शे को छात्रावास में पूरे उपकरणों के साथ लाना संदेह उत्पन्न कर सकता था। यह निश्चित किया गया कि केवल वीसीआर लाया जायेगा, टीवी स्थानीय ही लगेगा। बाहर के व्यक्ति का छात्रावास परिसर में टहलना भी योजना के लिये ठीक नहीं था अतः उसे लाने और लगाने की सारी व्यवस्थाओं को भी स्थानीय प्रकार से सम्पन्न करना पड़ा। छात्रावास के टीवी में उसे लगाना अनुपयुक्त था अतः छात्रावास सहायक के घर लगा कर देखना निश्चित हुआ।


यह बताना ठीक न रहेगा कि इस प्रकार कुल कितनी फिल्में देखी गयी। इससे व्यर्थ ही आकड़ा विचार से अधिक महत्व पा जाता है। जैसे हर विचार का कालखण्ड होता है, इसका भी पटाक्षेप एक फिल्म विशेष के साथ हो गया। अनुराग बताते हैं कि फिल्म थी देवानन्द की “जानी मेरा नाम” और उस समय गाना चल रहा था, “पल भर के लिये कोई हमें प्यार कर ले”। देवानन्द सारी खिड़कियों और कपाट में झाँक झाँक कर मुख दिखाते हैं और अभिनेत्री सारी खिड़कियाँ और कपाट एक एक कर बन्द करती है। उसी क्रम में सहसा हम देखते हैं कि फिल्म के बाहर उस कक्ष के कपाट में एक दाढ़ी वाले अभिनेता खड़े थे। उनके हाथ में एक सोंटा था। यद्यपि उसी गीत की पंक्तियाँ टीवी में गूँज रही थी पर लग रहा था कि आचार्यजी बोल रहे हों। पंक्तियाँ थी “हमने बहुत तुम्हें छिप छिप कर देखा”।


आगे का वर्णन स्वतः समझने योग्य है। इससे अधिक नाटकीयता से इस प्रकरण का अन्त नहीं हो सकता था। पर क्या करें, हर प्रयोग का एक कालखण्ड होता है, इसका भी था।


इस प्रकार बार बार पकड़ा जाना मन को बहुत खटक रहा था। जानेगें उनके कारकों को भी, अगले ब्लाग में।

23.10.21

मित्र - ३४(शुक्रवार की फिल्म)

यहाँ पर एक तथ्य स्पष्ट करना आवश्यक है कि सभी छात्रावासी फिल्मों के प्रति इतने उत्साहित नहीं थे। कुछ उस समय का उपयोग अध्ययन में करते थे। कुछ जो देखने को मिल जाये, उसी को देखकर संतुष्ट हो जाते थे, अन्यथा प्रयास नहीं करते थे। कुछ संभावनाओं पर दृष्टि अवश्य रखते थे पर स्वयं कुछ भी साहसिक करने से बचते थे। यदि कोई व्यवस्था ऐसी स्थापित हो जाये जो कि कष्टप्रद न हो और उसमें पकड़े जाने की संभावना भी कम हो तो वे उसमें सम्मिलित हो जाते थे। पूरे छात्रावास में लगभग दस ही ऐसे अग्रणी महारथी थे जो परिधि का विस्तार बढ़ाने के सतत प्रयत्न में लगे रहते थे। संतुष्टि शब्द उनके लिये नहीं था, सीमायें उनके लिये नहीं थी, उनकी आँखों में चमक तब आती थी जब उत्पात का कोई विचार योजना की परिपक्वता के निकट होता था।

ऐसे लोग अप्राप्य को ध्येय बनाये रहते हैं और व्यस्त रहते हैं। टीवी के सारे कार्यक्रमों में बस एक ही अप्राप्य रह गया था, शुक्रवार देर रात की फिल्म। उसको देखने की बात तो दूर, उसकी चर्चा भी चारित्रिक अपयश ला सकती थी। रात ११ बजे प्रारम्भ होने वाली यह फिल्म शयनकाल में पड़ती थी, वयस्कों के लिये थी और किसी प्रकार से उचित नहीं ठहरायी जा सकती थी। फिर भी कुछ साहसी उसे देखने के लिये प्रयत्नशील रहते थे।


रात्रि के कार्यक्रमों में सबसे बड़ी बाधा यह थी कि वे किसी के घर जाकर नहीं देखे जो सकते थे। यह न केवल उनका व्यक्तिगत समय होता है वरन सबके सोने का समय होता है। मुझे स्पष्ट याद है कि जब १९८६ में फुटबाल का वर्ल्डकप आ रहा था तो मैच मध्य रात्रि को आते थे। फुटबाल के प्रति न केवल मुझे प्रेम था वरन पिताजी का भी उत्साह देखते बनता था। हम लोग पशोपेश में थे कि क्या किया जाये? निर्णय यही हुआ कि टीवी लिया जाये। इस प्रकार हमारे घर में प्रथम टीवी आया।


शुक्रवार देर रात्रि के फिल्म के लिये छात्रावास के टीवी पर ही आश्रय था, शेष अन्य टीवी अचिन्त्य थे। एक बार अनुमति के लिये प्रार्थनापत्र लिखा गया। उत्सुकजन सार्वजनिक रूप से जो निर्लज्ज किये गये कि उसके बाद से वैधानिक उपायों से फिल्म देखने का विचार आना भी बन्द हो गया। अब जो भी करना था, गुप्त रूप से करना था।


टीवी कक्ष प्रारम्भिक वर्षों में भोजनालय के साथ वाले कक्ष में था, जो कि आधार तल में था। छात्रावास प्रथम तल में था। जब छात्रावास में संख्या बढ़ी तो टीवी कक्ष भोजनालय में समा गया और टीवी कक्ष प्रथम तल में चला गया। छात्रावास के कुछ और कक्ष भी तब प्रथम तल में आ गये। उस समय छात्रावास के कक्षों के बीच ही टीवी कक्ष था। दोनों ही समय टीवी एक बड़े पल्ले की लकड़ी की अल्मारी में रहता था और उस पर एक ताला लगा रहता था। ताले की चाभी छात्रावास प्रमुख के पास थी। साथ में एक ताला कक्ष में भी लगा दिया जाता था।


प्रथम तल के टीवी कक्ष में दो चाभियों की व्यवस्था करनी होती थी, या तो छात्रावास प्रमुख से माँग कर या पार कर या उसकी प्रतिलिपि बनवा कर। इसमें दूसरा और तीसरा उपाय अधिक उपयोग में आया क्योंकि चाभी देने का पूरा उत्तरदायित्व छात्रावास प्रमुख पर ही आता। जब आधार तल में टीवी कक्ष था तब भोजनालय और टीवी कक्ष के बीच में एक किवाड़ था। भोजनालय में ही ताला बन्द होता था, टीवी कक्ष का कपाट अन्दर से बन्द किया जाता था। भोजन के बाद बर्तनों की सफाई के समय यदि किवाड़ के अन्दर की चिटकनी खोल दी जाती थी तो भोजनालय के ताले की चाभी की आवश्यकता नहीं पड़ती थी।


एक बार जब अल्मारी का ताला बदला पाया गया तो कुण्डी के बोल्ट खोलकर फिल्म देखी गयी। उस समय दो सावधानियाँ रखी जाती थी। पहली सावधानी यह कि जो भी आता था वह अपने बिस्तर पर तकिया के ऊपर चादर चढ़ाकर आता था जिससे यह पता न लगे कि कोई अनुपस्थित है। दूसरी सावधानी में टीवी कक्ष का प्रकाश बन्द रखा जाता था और खिड़की पर चादर लगा कर टीवी से बाहर आ रहे प्रकाश को भी रोक दिया जाता था।


यह बताना कठिन है कि इस प्रकार कितनी बार हमें शुक्रवार की फिल्म देखने में सफलता मिली। सफलता इस बात पर निर्भर करती थी कि उस समय शेष सभी लोग विशेषकर छात्रावास अधीक्षक सो गये हों। हमारे महती प्रयासों की सुन्दर संरचना पर तुषारापात उस समय हुआ जब चादर की झीने प्रकाश के पीछे दीपकजी दिखायी पड़े। उसके बाद से न केवल शुक्रवार हाथ से गया वरन दण्डस्वरूप अन्य फिल्मों से भी हाथ धोना पड़ा।


फिर भी सब कुछ हाथ से नहीं गया था, जानेंगे अगले ब्लाग में।

21.10.21

मित्र - ३३(शनिवार की फिल्म)

छात्रावास परिसर में कुछ ४ टीवी थे। यद्यपि कुछ की पहुँच छात्रावास के बाहर उन घरों में थी जहाँ पर टीवी होते थे, पर ऐसी संख्या बहुत कम थी और उन प्रयासों में दुगुना दुस्साहस था। एक तो बाहर निकल कर जाना, तीन घंटे के लिये और दूरदर्शन पर आने वाली फिल्म देखकर आना। इसमें पकड़े जाने की संभावना बहुत अधिक थी। साथ ही इस बात का भी भय था कि उनका छात्रावास अधीक्षक आचार्यजी से भी परिचय था। इस स्थिति में हमारे प्रयास और भेद कब तक गुप्त रखे जा सकेंगे, इस बात पर भी संशय था। यदि तीन घंटे को बाहर जाने का साहस करने का अवसर ही रहा है, तो टाकीज में जाकर नयी फिल्म देखने का आनन्द क्यों न लिया जाये। संभवतः इन्हीं कारणों से यह प्रवृत्ति छात्रावासियों के मानस में अत्यन्त विरल मात्रा में थी।

एक टीवी छात्रावास में, एक प्रमुख छात्रावास अधीक्षक के घर में, एक छात्रावास अधीक्षक के घर में और एक छात्रावास सहायक के घर में था। यद्यपि बाद में कई अन्य सहायकों के घर में भी टीवी आ गये थे। प्रमुख छात्रावास अधीक्षक गृहस्थ थे अतः उनका टीवी प्रयोग की परिधि से बाहर था। रुचियाँ मिलने के कारण छात्रावास अधीक्षक का टीवी मुख्यतः क्रिकेट के लिये प्रयोग में आता था। छात्रावास का टीवी बिना अनुमति के अपना मुखमंडल नहीं खोलता था। शेष एक टीवी जो सहायक के यहाँ था उसी पर सभी की आशायें टिकी रहती थी।


पता नहीं कैसे प्रारम्भ हुआ पर कुछ अति उत्साही छात्रावासी शनिवार या रविवार की अनुमति न मिलने वाली एक फिल्म को वहाँ देखने जाने लगे। सहायकों का घर छात्रावास अधीक्षकों और प्रधानाचार्य के घरों से विपरीत दिशा में था। वहाँ पहुँचने के लिये छात्रावास के बीच से होकर जाना होता था। वह स्थान स्नानागार के पास भी था। वहाँ पहुँचने के लिये अधिक प्रयत्न की आवश्यकता नहीं थी और साथ ही पकड़े जाने की संभावना भी कम थी। कोई छात्रावास अधीक्षक यदि उस क्षेत्र के आसपास होता था तो वह सूचना त्वरित गति से वहाँ पहुँच जाती थी और सभी छात्रावासी विसर्जित होकर निर्विकार रूप कोई अन्य कार्य करते हुये प्रतीत होते थे।


सहायक नवगृहस्थ थे और टीवी भी उनके यहाँ नया ही आया था, बच्चों को आया देखकर वात्सल्यवश मना नहीं कर पाये होंगे। वैसे भी वह समय ऐसा था कि टीवी देखने आये आगन्तुक को मना नहीं किया जाता था। घर के टीवी को औरों के समक्ष प्रस्तुत करना ऐश्वर्य और औदार्य, दोनों के ही लक्षणों में गिना जाता था। रामायण और महाभारत के आने के बाद आगन्तुकों को बैठाकर टीवी दिखाना एक धार्मिक और पुण्य का कार्य भी समझा जाता था। हरि की अनंत कथा को प्रसारित होने में सहायक होने के कारण भक्त जैसा अनुभव होता था। कई गृहस्थ उस समय बालिका भोज या प्रसाद वितरण कर पुण्य को कई गुना बढ़ा लेते थे।


समस्या यह थी कि वह सहायक प्रधानाचार्यजी के अत्यन्त निकट थे, उनके व्यक्तिगत सहायक के रूप में। इस बात का भय रहना स्वाभाविक ही था कि कहीं उनके माध्यम से बात प्रधानाचार्यजी तक न पहुँच जाये। केवल वात्सल्य भाव ही था या नियम तोड़ने में सहभागिता का दोष या टीवी बन्द हो जाने का भय या कोई अन्य कारण, उन सहायक ने कभी भी यह बात प्रधानाचार्यजी को नहीं बतायी। यह बात अलग थी कि छात्रावास अधीक्षक को यह बात पता लगी पर उसका दण्ड छात्रावासियों की उद्दण्डता को ही मिला, सहायकों को विवशता का लाभ देकर प्रताड़ित नहीं किया गया।


आगे सहायकों के प्रकरण में यह उल्लेख रहेगा कि किस प्रकार सहायकगण हम लोगों की वेदना के प्रति मन ही मन अधिक संवेदी थे। यद्यपि सत्ता के प्रति प्रत्यक्ष रूप से निष्ठावान रहना उनके कर्तव्यों का अभिन्न अंग था पर परोक्ष रूप से और व्यवहारिकता के धरातल पर हमसे उनकी संवेदनायें अनुनादित थीं। हम छात्रावासियों ने सदैव ही सहायकों को अपने अनुकूल ही पाया था और कई स्वप्नों को जीवटता से जीने में अत्यन्त उपयोगी भी। आज भी छात्रावासियों की प्रफुल्लित यादों में सहायकों का आना जाना निर्बाध होता है, एक आवश्यक अंग की तरह।


छात्रावास के टीवी पर चित्रहार, रविवार पूर्वाह्न के कार्यक्रम और एक फिल्म देखते थे। क्रिकेट मैच बहुधा छात्रावास अधीक्षक के घर में देखने को मिल जाता था। छूट गयी दो फिल्मों में एक फिल्म छात्रावास सहायक के घर में देखना हो जाता था। इस सबके बाद भी कुछ छात्रावासियों का मन नहीं भरता था, उन्हें लगता था कि कोई भी मनोरंजन बिना मन को रंजित किये निकल न जाये, व्यर्थ न हो जाये। उनके महास्वप्नों का उत्कर्ष बिन्दु उन प्रयत्नों में परिलक्षित था जो शुक्रवार रात्रि की फिल्म देखने के लिये किये गये।


सब जानेंगे अगले ब्लाग में।

19.10.21

मित्र - ३२ (फिल्म और विकल्प)

मन सदा ही कुछ नया चाहता है, स्वयं को अपने स्वरूप से भिन्न रंगना चाहता है। मन को रंगने का उपक्रम मनोरंजन कहलाता है। मनोरंजन मन को सुख देता है, सुख राग उत्पन्न करता है, राग आकर्षण का हेतु है। टीवी के कार्यक्रम आपके अन्दर के मनोरंजन की थाह मापने लगे। प्रचार माध्यम उस आकर्षण को भुनाने लगे, विज्ञापन आपकी निर्णय प्रक्रिया को प्रभावित करने के उद्देश्य से उन कार्यक्रमों के बीच उपस्थित हो जाते जिन पर आपका मन लगा होता है। विज्ञापन मनोरंजन को प्रायोजित करने लगे, मनोहरण करने के लिये। फिल्में, चित्रहार, कथाश्रृंखलायें आदि मनोरंजन के साथ साथ दूरदर्शन की आय का साधन बनने लगीं। सप्ताह में एक के स्थान पर तीन फिल्में और दो चित्रहार हो गये।

बाहर की फिल्म देखने के असफल प्रयासों के प्रकरणों में दबे और क्षुब्ध छात्रावासी हृदयों को दूरदर्शन का यह विस्तार बड़ा ही आनन्द और उत्साह देने वाला था। सहज आशा के प्रवाह में पर शंकाओं की बाधायें खड़ी थी। एक चित्रहार, एक फिल्म और रविवार पूर्वाह्न के कार्यक्रम लगभग स्थिर हो चुके थे। जहाँ शुक्रवार देर रात को आने वाली फिल्म अपनी अनुमानित और अतिरंजित विषयवस्तु के कारण निषिद्ध थी, शनिवार की फिल्म आशा किरण की बनी हुयी थी। जब छात्रावास अधीक्षक का स्पष्ट निर्णय सुना कि एक सप्ताह में एक ही फिल्म देखने की अनुमति मिलेगी तो दुख भी हुआ और संतोष भी। दुख इस बात का दूरदर्शन के द्वारा प्रदत्त आधा मनोरंजन बिना सुख दिये ही व्यर्थ चला जायेगा। संतोष इस बात का था कि कम से कम एक फिल्म तो देखने को मिलेगी। पहले इस बात की संभावना भी रहती थी कि रविवार को कहीं ऐसी फिल्म न आ जाये जिसके लिये अनुमति न मिले। अब लगता था कि दो में कम से कम एक तो अनुमति योग्य होगी ही।


दैवयोग से यह एक ऐसी परिस्थिति थी जिसमें दोनों ही पक्षों को लगता था कि उनकी जीत हुयी थी। एक ही फिल्म होने से उसकी अनुमति मिलने से हमारी विजय, न मिलने से हमारी हार होती थी। यहाँ तीन फिल्में थी, एक प्रतिबन्धित, एक की अनुमति और एक की अनुमति नहीं। इस प्रकार सबके भाग में कुछ न कुछ था। कभी कभी संसाधन बढ़ा देने से दोनों पक्षों को ही विजय की अनुभूति होने लगती है। मनोवैज्ञानिक दृष्टि से दोनों पक्षों के हाथ में कुछ न कुछ रहने से निष्कर्ष आनन्दमयी और दीर्घकालिक रहते हैं। जब कभी भी किसी विषय पर प्रतिपक्ष से समझौता वार्ता होती है तो आदान प्रदान की स्थितियाँ बनती हैं। आधार सिमटा होने पर या एक ही निश्चित विषय पर कई बार वार्तायें टूट जाने का भय रहता है। जो वस्तु या माँग पानी है, उसके साथ कई और वस्तुओं या माँगों को जोड़ देने से यह संभावना बनी रहती है कि कम से कम मूल माँग तो पूरी हो ही जायेगी। दोनों पक्ष अपनी माँगों पर पीछे जाते हैं, दोनों को एक जीत का भाव रहता है और दोनों को ही संतोष रहता है। आधुनिक प्रबन्धन में वार्तातन्त्र का विकास और क्रियान्वयन एक विशिष्ट विषय है।


समस्या विकल्पों में होती है। विकल्प भ्रमित करते हैं। प्रकृति की जटिलता भी ऐसी है कि हर विकल्प कुछ गुण तो कुछ दोष लिये रहता है। संसाधन इतने नहीं रहते हैं कि सारे विकल्प प्राप्त किये जा सकें। हमारे लिये जब एक ही फिल्म देखने की अनुमति रहती थी तो प्रश्न इस बात का उठता था कि कौन सी फिल्म देखी जाये, शनिवार की या रविवार की? तुलना बड़ी घातक होती है, एक को दूसरे से लड़ाती है। सप्ताहान्त में आने वाली दो फिल्मों ने कभी नहीं सोचा होगा कि छात्रावासी बैठकर उनके गुणदोषों का निर्धारण करेंगे कि कौन सी देखी जाये, कौन सी नहीं? तब कई स्वर बौद्धिक उठते हैं, कई अपने अनुभव से बात करते हैं, कई केवल अभिनेता या अभिनेत्री के नाम पर मुग्ध रहते हैं। कुल मिलाकर एक कार्य मिल जाता है कि क्या देखें और क्या नहीं? कुछ कहते हैं कि शनिवार की ही देख लो, पता नहीं रविवार को बिजली आये न आये? देखा जाये तो यह भी अत्यन्त व्यवहारिक दृष्टिकोण है कि जो हाथ में है, उसे भोग लो।


कभी कभी बच्चे किसी खिलौने आदि की माँग करते हैं तो बुद्धिमान अभिभावक उन्हें दो तीन और विकल्प बताकर चिन्तन में ठेल देते हैं। बच्चों को भी लगता होगा कि उनके अभिभावक उनके बारे में इतना अधिक सोचते हैं। इस प्रकार के भ्रम उत्पन्न कर कभी कभी बच्चों से विकल्पों का खेल खेला जाता है। “पर शर्माजी के बच्चे टिंकू का यही खिलौना तो दो दिन में टूट गया था”, एक और गुगली और निर्णय प्रक्रिया में बच्चा जूझता रहता है। हमें कभी कभी लगता था कि एक फिल्म का विकल्प देकर हमारी सम्मिलित निर्णय प्रक्रिया में विभ्रम उत्पन्न करने का प्रयास किया जा रहा था।


समस्या तब आती है जब आपने विकल्प ठीक से नहीं चुना। प्रश्नपत्र में यदि विकल्प वाले प्रश्न में दुर्भाग्यवश अंक नहीं मिले तो दुख के साथ क्रोध इस बात पर आता है कि दूसरा प्रश्न हल कर लेना चाहिये था। परीक्षाओं में विकल्प को भी एक प्रश्न के रूप में लेना चाहिये। ८ में से ५ प्रश्न करना, यह सुविधा कम, दुविधा अधिक होती है। या तो ३ प्रश्न अत्यन्त कठिन हों तो शेष ५ प्रश्न सरलता से चुने जा सकते हैं। यदि सारे प्रश्न एक ही स्तर के हों तो विकल्प दुविधा बढ़ा जाते हैं। बहुधा ऐसे ५ प्रश्न चुन लिये जाते हैं जो कि अन्ततः हानिप्रद होते हैं।


एक फिल्म चुनने के प्रयास में हमारे साथ कई बार ऐसा हुआ। जिसे अच्छी फिल्म विचार कर देखा उसमें निराशा हुयी। देखा जाये तो यह निराशा भी मायावी थी, मानसिक थी। जब तक दोनों फिल्म नहीं देखी जायें तब तक इस बात का निर्णय कैसे होगा कि कौन सी फिल्म अच्छी है? जिस प्रकार लोग किसी और के सुखों कर देखकर व्यर्थ ही दुखी होते रहते हैं उसी प्रकार हम लोग भी न देखी हुयी फिल्म को देखी हुयी फिल्म से अच्छा मानकर दुखी हो लेते थे। 


फिर भी अनपाये को पाने का प्रयास कुछ छात्रावासियों न कभी छोड़ा ही नहीं। कुछ अनुमति वाली फिल्म तो देखते ही थे। साथ ही साथ जिसकी अनुमति नहीं मिलती थी उसे भी निपटा आते थे। कई बार जब शुक्रवार की फिल्म देखने के प्रयास हुये तब जाकर लगा कि हम सबके अन्दर फिल्म का आनन्द उठाने की इच्छा अदम्य है।


प्रयासों की न समाप्त होने वाली यही उर्ध्वाग्नि अगले ब्लाग में।

16.10.21

राम का निर्णय(संवेदना)

 

राम वन को चल दिये। नगरवासी उनके साथ रहने का निश्चय कर पीछे चलने लगे। राम ने आगामी रात्रि में ही सबको सोता हुआ छोड़कर चुपचाप अपनी यात्रा में बढ़ जाने का निश्चय किया। श्रृंगवेरपुर में मित्र निषादराज से भेंट करने के बाद राम प्रयागराज में मुनि भरद्वाज के आश्रम में गये और उनके सुझाने पर चित्रकूट में आकर रहने लगे।


इघर अयोध्या में अतिशय मानसिक पीड़ा और आत्मग्लानि के बोध से भरे राज दशरथ का माँ कौशल्या के महल में ही देहावसान हो गया। भरत को कैकेय से यथाशीघ्र बुलाया जाना, पिता की सकारण मृत्यु और भैया राम का वनगमन, स्वयं को दोनों का कारण मानना, अतीव लज्जा और क्रोध के भाव से अपनी माँ को धिक्कारना, भैया राम को लाने के लिये चित्रकूट के लिये सेना सहित प्रयाण करना, कथा का गतिक्रम चलता रहता है।


इस बीच राम के द्वारा लिये हुये वनगमन के निर्णय के बारे में पक्ष और प्रतिपक्ष के तर्क अवसान पा जाते हैं। सब शोकमना हो स्वीकार ही कर लेते हैं कि राम ने उचित किया। चित्रकूट प्रवास के प्रथम दिन राम पिता दशरथ को लेकर तनिक व्याकुल होते हैं और लक्ष्मण से आग्रह करते हैं कि वह वापस अयोध्या जायें और पिता का ध्यान रखें। विचार श्रृंखला के क्रम में यह बात उठती है कि किस प्रकार पिता परवश होते हैं और अपने आज्ञाकारी पुत्र के वनगमन के वर को स्वीकार कर लेते हैं। पिता की यह मनःस्थिति लक्ष्मण को उनकी सहायता हेतु वापस लौट जाने के लिये कही जाती है। यद्यपि लक्ष्मण सविनय मना कर देते हैं पर राम के हृदय की पीड़ा और अन्याय का निहित भाव राम के विलाप से व्यक्त होता है।


चित्रकूट से चलने के बाद एक अन्य प्रकरण में जब राक्षस विराध ने सीता को उठा लिया था तब सीता को भय से काँपते हुये देख राम की पीड़ा पुनः छलकी। उन्हें अकारण ही दुख देने के कैकेयी के मन्तव्य को कहते हुये तब राम कहते हैं। वन में हमारे लिये जिस दुख की प्राप्ति कैकेयी को अभीष्ट थी, वह आज दिख रहा है। संभवतः तभी वह मात्र भरत के लिये राज्य पाकर संतुष्ट नहीं हुयी। समस्त प्राणियों का प्रिय होने पर भी मुझको वन भेज दिया, लगता है माँ कैकेयी का मनोरथ आज सफल हुआ। राज्य के अपहरण और पिता की मृत्यु से मुझे उतना कष्ट नहीं हुआ जितना विदेहनन्दिनी को राक्षस के स्पर्श करने से हुआ। कैकेयी के कृत्य से राम दुखी थे, क्षुब्ध भी पर अपने वनगमन के निर्णय पर उनको कभी संशय नहीं रहा।


राम जानते थे कि धर्म का पालन सरल नहीं होता है। सरल विकल्प भी थे पर उन्होंने वन जाना सहर्ष स्वीकार कर लिया। यह अत्यन्त कठिन विकल्प था। परिवार का बिखराव, पिता का देहान्त, दो भाइयों का वन में भ्रमण, जनककुमारी को वन के कष्ट, भरत का अग्रज की भाँति ही तापस वेष में ग्राम से ही राज्य का संचालन, नगरवासियों का अपार दुख, विकल्प अत्यन्त कठिन था। मात्र कैकेयी और उसकी दासी प्रसन्न थी। वह सीमित प्रसन्नता भी पुत्र भरत का स्नेह खोकर दुख में बदल गयी। सरल विकल्प होता कि लक्ष्मण की मन्त्रणानुसार राम राज्य का अधिग्रहण कर लेते तो कैकेयी को छोड़ कर सब प्रसन्न रहते।


इतने लोगों को कष्ट देने का विकल्प राम ने क्यों चुना? यद्यपि राम स्वयं ही वन जाकर समस्या का निदान करते हुये प्रतीत हुये, पर उन्हें इस बात का भान तो था कि किस प्रकार सब अस्तव्यस्त हो जायेगा। यद्यपि राजपरिवार के स्थायित्व पर पहला कठोर प्रहार माँ कैकेयी का था पर क्या राम शेष अस्तव्यतता रोक सकते थे। क्या सत्य का मार्ग परिवार, समाज, नगर आदि के कष्टों से भी बढ़कर था?


व्यवहारिकता के परिप्रेक्ष्य में लक्ष्मण के विचार अत्यन्त तर्कसंगत लगते हैं। गुरु वशिष्ठ का सीता को युवराज्ञी बनाने के लिये धर्मसम्मत व्याख्या करना, पिता को स्वयं को कारागार में डाल देने को प्रस्तुत होना, माँ कौशल्या का वन न जाने की प्रत्याज्ञा देना, इन सबके ऊपर राम ने वनगमन को चुना। पिता को न कभी दोषमुक्त किया, न कभी अपने वनगमन का दोष ही दिया।


प्रयास और प्रभाव की दृष्टि से पुरुषार्थों में काम तात्कालिकता का द्योतक है, अर्थ का क्षेत्र तनिक बड़ा होता है, धर्म का कालखण्ड विस्तृत होता है और मोक्ष का अपरिमित। राम ने काम और अर्थ की तुलना में धर्म को चुना। दीर्घकालिक दृष्टि और सैद्धान्तिक आग्रह के मार्ग में यदि कष्ट आये तो राम ने सहे।


भरत के चित्रकूट आगमन पर वनगमन पर एक बार पुनः विस्तृत चर्चा हुयी। भरत, वशिष्ठ, जाबालि ने अपने विचारों को प्रस्तुत किया पर राम ने सबका शमन किया और पिता की आज्ञा को ही सर्वोपरि मानने का ही निश्चय किया। पिता की परवशता, अयोध्या का कल्याण, कुलपरम्परा, नास्तिकता के सिद्धान्त और धर्म के व्यवहारिक पक्ष को अस्वीकार करते हुये राम अपने निर्णय पर दृढ़ रहे। समस्त अयोध्या की प्रार्थना और करुणामयी आग्रह पर भी राम विचलित नहीं हुये। अन्ततः भरत का मान रखते हुये उन्होंने अपनी खड़ाऊँ दे दी जिन्हें भरत ने प्रतीक बनाकर तापस वेष में ही चौदह वर्ष तक शासन किया।


राम के वनगमन का प्रकरण और सम्बन्धित संवाद राम के वैशिष्ट्य और प्रखर निर्णय प्रक्रिया को व्याख्यायित करते हैं। वर्तमान में राम सर्वपूजनीय हैं पर उस समय की कल्पना कीजिये कि १८ वर्ष का एक युवा राजकुमार जो कि अपनी सामर्थ्य ताड़का वध और शिवधनुष भंग कर स्थापित कर चुका था, सहसा सब त्यागकर वन चला जाता है। उस काल के जनों में राम का सम्मान कितना बढ़ गया होगा? कालान्तर में राक्षस उन्मूलन, संगठनशक्ति और रावणवध के पश्चात उनका राजा बनना सबके लिये अत्यन्त उत्साह और हर्ष का विषय होगा। रामराज्य के उत्कर्ष और राम के व्यक्तित्व से संलग्न इतिहास ने ही वाल्मीकि को प्रेरित किया होगा कि वह राम का चरित्र आने वाली पीढ़ियों के लिये संरक्षित करें।


राम को वाल्मीकि ने एक संवेदित राजकुमार के रूप में प्रस्तुत किया है जिसने अपने निर्णयों से अपना उत्कृष्ट उत्कर्ष गढ़ा। ऐसा उदाहरण प्रस्तुत किया जो असामान्य था। जब केवल वनगमन के निर्णय पर ही अध्याय लिखे जा सकते हैं तो राम का सम्पूर्ण चरित्र कितना अनुकरणीय होगा, उसकी कल्पना करना कठिन है। मेरे राम मुझे शक्ति दें कि उनके वनगमन से आज भी जो दुख मेरे मन में व्याप्त है, उसका निवारण कर सकूँ। जय श्री राम।

14.10.21

राम का निर्णय (प्रयाण)

 

सुमन्त्र का मन कैकेयी की कुटिल गति देखकर बिद्ध था। प्रातः से ही कैकेयी के आचरण ने उनको व्यथित कर रखा था। दशरथ और राम के बीच का यह संवाद सुनकर राज परिवार में मर्यादा का यथासम्भव मान रखने वाले सुमन्त्र का धैर्य भी टूट गया। मूर्च्छित दशरथ राम के कन्धे पर टिके थे, कक्ष में मचा हाहाकार शान्त हो चुका था, सबको व्यग्रता से प्रतीक्षा थी कि दशरथ की चेतना वापस लौटे। राम को आज्ञा पाने और शीघ्रता से वनगमन की आकुलता थी। संताप और समय की स्तब्धता ने सुमन्त्र को अवसर दिया कि वह कैकेयी को समझायें और अपना हठ त्यागने को प्रेरित करें। तनिक क्रोध भरे कंपित स्वर में सुमन्त्र ने कहा। 


देवि, जब तुमने अपने पति राजा दशरथ का ही त्याग कर दिया है तो हे कुलघातिनी, ऐसा कोई कुकर्म शेष नहीं रहा जो तुम न कर सको। जिस प्रतापी राजा ने तुम्हें इतना मान दिया, इतना ऐश्वर्य दिया, उसको इतना संताप न दो, इतना अपमान न करो। कुल की परम्परा से च्युत हो और अधर्मपूर्वक यदि तुम कार्य करोगी तो कौन ब्राह्मण, धर्मज्ञ, नगरवासी या सेवक यहाँ रुकेगा? तब किस पर तुम राज्य करोगी? 


मुझे लगता है देवि कि तुम्हारा स्वभाव भी तुम्हारी माता पर गया है। तुम्हारी माता के दुराग्रह से हम परिचित हैं और यह भी जानते हैं कि किस प्रकार एक साधु द्वारा तुम्हारे पिता को दिये गये वर से ज्ञात किसी तथ्य को जानने के लिये उन्होंने हठपूर्वक आचरण किया था। तथ्य बताने पर तुम्हारे पिता की मृत्यु निश्चित थी पर मना करने पर भी तुम्हारी माँ नहीं मानी। तब साधु से विमर्श करके तुम्हारे पिता ने तुम्हारी माँ को घर से निकाल दिया था। आज तुम अपनी माँ के समान ही हठ पर अड़ी हो। यह रघुकुल की ही मर्यादा और कुलपरम्परा है कि तुम्हें अपनी माँ जैसा दण्ड नहीं मिल रहा है। अभी भी चेत जाओ और राम को वन जाने से रोक लो। अपयश मत पाओ। राम सा आज्ञाकारी पुत्र त्याग कर तुम कहीं प्रसन्न नहीं रहोगी। सुमन्त्र के तीक्ष्ण, उद्वेलित और सार्वजनिक रूप से अपमानित करने वाले वचनों से भी कैकेयी के मुख पर कोई विकार नहीं आया। अपने वर पूर्ण होने के इतने निकट आ वह और भी कठोर हो गयी थी।


दशरथ चेतते हैं, राम को अपने समीप पाकर उनका हृदय शक्ति पा जाता था। सुमन्त्र को इस प्रकार कैकेयी को समझाते हुये सुनते भी हैं। मन में एक निश्चय कर सुमन्त्र को आज्ञा देते हैं। सूत, तुम रत्नों से भरी चतुरङ्गिणी सेना राम के साथ वन भेजो। वणिजों, सेविकाओं और राम के समस्त सहायकों को प्रचुर धन सहित राम के साथ जाने की आज्ञा दो। कोष, अन्न और समस्त मनोवाञ्छित भोगों से सम्पन्न कर राम को यहाँ से भेजा जाये। शेष अयोध्या का पालन भरत करेंगे। पूर्व में सुमन्त्र के वचनों से आहत हुयी और मन में क्रोध समाये कैकेयी तमतमा कर सहसा बोल उठी कि महाराज आप ऐसा नहीं कर सकते, तब भरत के लिये शेष ही क्या रहेगा? दशरथ ने कहा कि इस प्रकार का कोई प्रतिबन्ध तो तूने अपने वरों में नहीं लगाया था। कैकेयी का क्रोध अब कुल पर लक्षित हो गया था, वह बोली कि जिस प्रकार आपके पूर्वज राजा सगर ने अपने पुत्र असमञ्ज को राज्य से निकाल दिया था उसी प्रकार आप राम को निष्काषित कर राज्य के द्वार सदा के लिये बन्द कर दीजिये। जानबूझकर की गयी इस अपमानपूर्ण तुलना पर कक्ष में सभी लोग कैकेयी को धिक्कारने लगे। तब राज्य के आदरणीय और वयोवद्ध मन्त्री सिद्धार्थ आगे बढ़कर कैकेयी से तथ्यों को स्पष्ट करते हैं।


देवि, असमञ्ज दुष्ट बुद्धि का था, मार्ग पर खेल रहे बालकों को सरयू में फेंक देने को अपना मनोरञ्जन समझता था। प्रजाजनों द्वारा राजा सगर को जब इस संदर्भ में निवेदन किया गया तो उन्होंने मन्त्रियों के साथ राजकुमार के अन्य कार्यकलापों के बारे में मन्त्रणा कर उसे राज्य से बाहर भेजने का निर्णय किया था। राज्य के हित में सगर ने अपने अहितकारी पुत्र को त्याग दिया था। देवि, राम ने कौन सा अपराध किया है? हम सब लोग राम में एक भी अवगुण नहीं देखते हैं। यदि तुम्हें किञ्चित भी कोई दोष दिखता हो कहो पर इस प्रकार अनर्गल प्रलाप मत करो। अभी भी चेत जाओ और लोकनिन्दा से बचो। यह सुनकर दशरथ कैकेयी को झिड़कते हुये बोले, “पापरुपणी, तेरी सारी चेष्टायें साधुपुरुषों के विपरीत हैं। मैं भी सारा राज्य त्याग कर राम के पीछे चला जाऊँगा, तू राज्य का सुख भोग”।


माँ कैकेयी के प्रति पिता की क्षुब्धता और सभा में व्याप्त आकुलता देख राम अत्यन्त विनीत स्वर में कहते हैं। पिताजी, मैं समस्त भोगों का त्याग कर चुका हूँ और वन में वन के द्वारा ही जीवन निर्वाह करना चाहता हूँ। मुझे सेना से क्या प्रयोजन? उत्तम हाथी का त्याग कर बाँधे जाने वाले रस्से से क्या आसक्ति? मुझे तो माँ कैकेयी वल्कल वस्त्र ला दें।


राम और लक्ष्मण दोनों ने ही पिता के सामने ही वल्कल वसन धारण कर लिये। कक्ष में सबकी आँखों में अश्रु छलक आये। चीर धारण में कुशल न होने के कारण सीता रुद्ध और लज्जा भरे स्वर में राम को सहायता के लिये पुकारती है। राम राजस्त्रियों के बीच पहुँच कर सीता को वल्कल वस्त्र बाँधना बताते हैं। वहाँ उपस्थित मातायें और सभी नारियाँ राम से तनिक खिन्न स्वर में कहती है कि हे राम सीता को इस प्रकार वन में रहने की आज्ञा नहीं दी गयी है। माताओं के इस प्रकार कहने पर भी राम ने सीता को वल्कल वस्त्र पहना दिये। यह देखकर प्रशान्त स्वभाव के गुरु वशिष्ठ के भी नेत्रों में करुणाश्रु छलक आये। वह सीता को रोककर कुपित स्वर में कैकेयी से बोले। 


“अधर्मप्रवृत्त दुर्बुद्धि कैकेयी, तू कैकेयराज के कुल का कलङ्क है। राजा से छल कर अब पुनः अपनी सीमा लाँघ रही है। सीता राम की अर्धाङ्गिनी हैं। राम के पश्चात उनका इस सिहांसन पर अधिकार है। वह अब राम को प्रस्तुत हुये सिंहासन पर बैठेंगी। देवी सीता वन नहीं जायेंगी।”


गुरु वशिष्ठ से धर्म और नीति की व्याख्या सुन और सीता का अधिकार जानकर कैकेयी का मद तनिक ठहर गया। गुरु वशिष्ठ आगे कहते हैं। “यदि देवी सीता फिर भी वन जाती हैं तो हम सब और नगरवासी भी वन चले जायेंगे। और जिस भरत से बिना मन्त्रणा किये तूने यह प्रपंच रचा है, वह भरत भी तुझे धिक्कारेगा क्योंकि अयोध्या में कोई ऐसा नहीं है जो राम से स्नेह न करता हो। देवी सीता वल्कल वसन धारण नहीं करेंगी।” सीता सब सुनकर भी संकोचवश पति के समान ही वल्कल वसन धारण किये रही। यह देख दशरथ ने कैकेयी को धिक्कारते हुये सीता पर वल्कल वसन पहनने की बाध्यता समाप्त कर अपनी अभिरुचि, गरिमा और सुख के अनुसार वस्त्र और आभूषण धारण करने की व्यवस्था और आज्ञा दी।


दशरथ ने सुमन्त्र को रथ से राम को वन तक छोड़ आने की आज्ञा दी। राम ने पिता दशरथ से माँ कौशल्या के शोकनिवारण हेतु विशेष स्नेह देने की प्रार्थना की। माँ कौशल्या ने सीता को चौदह वर्ष के लिये पर्याप्त वस्त्र और आभूषण दिये और पति के साथ वन में जीवन निर्वाह करने के सूत्र दिये। माँ सुमित्रा ने पुत्र लक्ष्मण को नीति और सेवा सम्बन्धी शिक्षा और आशीर्वाद दिया। सबको अश्रु में छोड़ और पिताजी और माताओं की परिक्रमा कर राम लक्ष्मण और सीता सहित कक्ष से बाहर निकल गये। 


राम मुखमण्डल पर अपने गुरुतर निर्णय को शान्त पर सगर्व भाव से धारण किये थे। वह क्रियान्वयन की रूपरेखा बनाते रथ पर चढ़ते हैं। सुमन्त्र रथ को हाँकते हैं, नगरवासी राम को शोकमना हो वनगमन करते देखते हैं। उनका प्रिय राजकुमार राम अपनी अयोध्या छोड़ रहा है।

12.10.21

राम का निर्णय (वचन या आज्ञा)


गुरु वशिष्ठ, पिता दशरथ और सब माताओं को वहाँ एकत्र देख राम ने हाथ जोड़कर प्रणाम करते हुये कक्ष में प्रवेश किया। पीछे सीता और अन्त में लक्ष्मण भी सबकी दृष्टि में आकर खड़े हो गये। राम को इस प्रकार नत भाव से आता देख राजा दशरथ व्याकुल हो उठे। राम की ओर दौड़े पर राम तक पहुँच पाने के पहले ही मूर्च्छित होकर गिर गये। यह देख राम शीघ्रता से पिता के पास पहुँचे हैं और सहारा दिया। लक्ष्मण ने भी हाथ बढ़ाया और सीता भी निकट आ गयीं। उपस्थित सभी लोग यह दृश्य देखकर “हा राम हा राम” बोल कर चीत्कार कर उठे। करुण वातावरण और पिता की यह स्थिति देख राम की आँखों में अश्रु उमड़ आये। लक्ष्मण और सीता के साथ राम ने पिता को दोनों हाथों से उठाया और शैय्या पर लिटाया। प्रतीक्षा के कुछ क्षणों बाद जब दशरथ को चेत आया, राम ने हाथ जोड़कर पिता से कहा।


पिताजी, मुझे दण्डकारण्य जाने की आज्ञा दीजिये। अनुज लक्ष्मण को भी अनुमति दीजिये और यह स्वीकार कीजिये कि सीता भी मेरे साथ वन जायें। मैंने चेष्टा अवश्य की पर ये दोनों यहाँ नहीं रुकना चाह रहे हैं। जैसे ब्रह्माजी ने अपने पुत्र सनकादिक मुनियों को वन जाने की आज्ञा दी थी, वैसे आप हम सबको प्रस्थान करने की आज्ञा दीजिये।


दशरथ स्तब्ध थे। एक पुत्र के जाने का शोक उनसे सम्हाला नहीं जा रहा था। प्रातः से ही लज्जा के कारण उनके मुख से एक भी शब्द नहीं निकल पा रहा था। “हा राम” के अतिरिक्त सारे शब्द अश्रु बन कर बह रहे थे। शोक संतप्त राजा कक्ष में बैठे प्रातः से बस यही मना रहे थे कि कोई चमत्कार हो जाये और राम का वन जाना रुक जाये। अब आँखों के सम्मुख सीता और लक्ष्मण भी वन जाने को प्रस्तुत खड़े हैं। सीता वन में कैसे रहेगी? क्या हो गया है राम को? निराशा की इस पराकाष्ठा में राम के प्रति उनके प्रथम शब्द निकलते हैं। यद्यपि शब्द आज्ञा से थे पर उसमें स्वर प्रार्थना सा था।


हे रघुनन्दन, मैं कैकेयी को दिये गये वर के कारण मोह में पड़ गया हूँ। मुझे कारागार में डालकर तुम स्वयं ही अयोध्या के राजा बन जाओ।


राम आज्ञा की प्रतीक्षा कर रहे थे और आशा कर रहे थे कि अपना शोकयुक्त मौन छोड़ पिता दशरथ कुछ कहें। पिता अपनी आत्मग्लानि से निकलें और अपने राम के निर्णय का सम्मान करें। यद्यपि मन में राम ने यह निश्चय कर लिया था कि यदि राजा कुछ नहीं कहते हैं तो “मौनं स्वीकृति लक्षणं” का संकेत ग्रहण करते हुये वह पिता की परिक्रमा कर वन को चले जायेंगे। पिता ने साहस किया या उनका शोक घनीभूत हो शब्द पा गया, पर यह कौन सी आज्ञा है? पिता सबके सम्मुख यह क्या कह रहे हैं? पिता यह क्या आज्ञा दे रहे हैं?


वनगमन का पूर्ण आधार पिता की आज्ञा का अनुपालना थी। यह तर्क कौशल्या और लक्ष्मण से हुये संवादों में बारम्बार व्यक्त भी हुआ था। पिता यह कौन सा आग्रह कर रहे हैं, स्वयं को कारागार में डाल देने का? आत्मग्लानिजनित दैन्यता का दूसरा स्वरूप पिता दशरथ द्वारा व्यक्त था। गत रात्रि से शोक लहर में बहते हुये पिता दशरथ अभी तक सामान्य नहीं हो पाये हैं। राम बिना कुछ अधिक बोले शीघ्रातिशीघ्र वन के लिये निकल जाना चाह रहे थे। पहले माँ कौशल्या, तत्पश्चात लक्ष्मण और सीता के द्वारा विलम्ब हो चुका था, अब स्वयं पिता दशरथ यह भ्रमपूर्ण वचन बोल रहे थे।


कक्ष में सबका ध्यान राजा दशरथ की मूर्च्छा पर था, राम के आज्ञा माँगने पर था। दशरथ का यह कहना सबको अचम्भित कर गया। सबका मुख अब आश्चर्य से राम की ओर था। राम पिता की इस आज्ञा का क्या उत्तर देते हैं? राम इस प्रश्न का क्या समाधान करते हैं? पिता के जिस वचन पर राम ने अपना पूर्व निर्णय आधारित किया था, उसके विपरीत संकेतों को अब राम अपने निर्णय में कैसे समाहित करेंगे? दो विपरीत आज्ञाओं में कौन सी आज्ञा किस कारण करणीय है, कक्ष में सब जानने को उत्सुक थे। कक्ष में व्याप्त शोक के सागर में संभावना का एक अंश दिखा था, सब अपना दुख क्षणभर को भुला राम की ओर देख रहे थे। सत्य के किस स्वरूप का ग्रहण करेंगे राम? किस सिद्धान्त पर राम निष्कर्ष प्रतिपादित करेंगे? पिता के वर्तमान वचनों का मान रखेगें या दशकों पूर्व दिये वरों का मोल रहेगा? सत्य रहेगा या वचन मात्र?


राम दशरथ के कथन का मर्म समझ गये थे। कथन के पूर्व चरण में यद्यपि पिता ने उसमें कैकेयी के दिये वरों के मोह का संदर्भ दिया था किन्तु उत्तर पक्ष में पिता का राम के प्रति मोह झलक रहा था। मोह कथन के दोनों भागों में था, पूर्व में कैकेयी के प्रति, उत्तर में राम के प्रति। मोह के ये दोनों आवरण पिता की दो मनःस्थिति और तज्जनित दो आज्ञाओं के मूल कारण थे। इस भ्रम से परे राम को सत्य का वरण करना था, निर्णय लेना था।


राम ने सविनय हाथ जोड़े और पिता से कहा। पिता आप सहस्रों वर्षों तक राज्य करें, मैं अब वन में रहूँगा। चौदह वर्ष व्यतीत होने पर पुनः आपके युगल चरणों में मस्तक झुकाऊँगा। आप क्षुब्ध न हों, आप आँसू न बहायें, सरितायें मिलने पर भी समुद्र अपनी मर्यादा नहीं लाँघता। मुझे न इस राज्य की, न सुख की, न पृथ्वी की, न भोगों की, न स्वर्ग की और न जीवन की ही इच्छा है। मेरे मन में यदि कोई इच्छा है तो यही कि आप सत्यवादी रहें। आपका कोई वचन मिथ्या न हो पाये। यह बात मैं आपके सामने सत्य और शुभकर्मों की शपथ खाकर कहता हूँ। राम ने स्पष्ट शब्दों में वातावरण में व्याप्त क्षणिक अनिश्चितता को विराम दे दिया था। साथ ही विनम्रतापूर्वक पिता के वचनों का मान भी रख लिया था।


राजा दशरथ राम का मुख देखे जा रहे थे। यह विचार कि चौदह वर्ष तक वह राम का मुख नहीं देख पायेंगे, उन्हें व्याकुल किये जा रहा था। कातर भाव में दशरथ पुनः बोले। राम, मेरे साथ छल हुआ है। उस विषम परिस्थिति में भी तुमने ज्येष्ठ पुत्र का कर्तव्य निभाया है। मैं यह भी जानता हूँ कि तुम्हारा निश्चय अडिग है। मेरा एक आग्रह स्वीकार कर लो कि आज रात्रि भर विश्राम करके प्रातः वन चले जाना। मैं तुम्हें जी भर कर देख लूँ। सत्य के बन्धन में और कैकेयी के कटु वचनों की बाध्यता के बीच महाप्रतापी दशरथ की दैन्यता तुच्छ सी प्रार्थना पर आकर रुक गयी थी। राम यह तथ्य जानते थे। पिता के मन की कातरता को विश्राम देना आवश्यक था, वह दशरथ को और संकुचित होते नहीं देख सकते थे। माँ कैकेयी को राम आज ही वन जाने का वचन दे चुके थे। इस परिप्रेक्ष्य में उन्हें पिता का यह आग्रह भी वचन की अवमानना लग रहा था। अत्यन्त कोमल स्वर में राम ने कहा।


पिताजी, आपके सत्य के प्रतिपालन में मैंने तत्क्षण राज्य त्यागकर वनगमन के लिये प्रस्थान कर दिया था। शेष आज्ञायें लेने और सुहृदों को सूचित करने में यथासम्भव शीघ्रता करने में जो विलम्ब हुआ है, उसके लिये मुझे आप और माँ कैकेयी क्षमा करें। वनगमन के लिये प्रस्तुत होकर एक क्षण भी अयोध्या में रुकने का विचार करना मर्यादाओं का उल्लंघन है। मैंने आज ही वनगमन जाने का वचन दिया है, मुझे उसका पालन करने में आशीर्वाद और शक्ति दें और अपना शोक भीतर छिपा लें। मैं अपने निश्चय के विपरीत कुछ नहीं कर सकता। आपकी प्रतिज्ञा सत्य हो।


दशरथ ने राम को भींच कर हृदय से लगा लिया। राम ने सदा ही उनको सुख दिया है और अपना नाम सार्थक किया है। दशरथ के अश्रु अनवरत बहे जा रहे थे। हृदय को अद्भुत सी शान्ति दे रहा था राम का स्पर्श। कैकेयी की कुटिल अग्नि में दग्ध दशरथ का हृदय राम के आचरण से शीतल हो गया था। शोक में था पर स्वीकार कर शान्त हो गया था। दशरथ को समय की सुध न रही, इस शान्ति में वह कब अचेत हो गये, उन्हें किसी की सुध न रही।