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7.6.15

सूरज ढूढ़ रहे अंधों में

स्वार्थ दृष्टिगत संबंधों में,
जीवन बीता अनुबंधों में,
ढक कर सर पर बोरे डाले,
सूरज ढूँढ़ रहे अंधों में।

मद में रत, बौराया नित मन,
गति घनघोर बिताया यौवन,
तन थकान, चहुँ दिशा बिखरती,
विधि छाया बिसराया जीवन।

तथ्य गूढ़, अनुभूत विवशता,
छिछली, बिखरी, जीवनरसता,
हर मोड़ों पर बाधित, पाशित,
मापरहित प्रतिकूल अवस्था।

मधुरिम सपने, ध्वस्त धरातल,
अनमन रचना, छिटके बादल,
संकेतों की बाट जोहती,
आशायें ढलती अस्ताचल।

दृष्टि बदलती, सृष्टि अधरगति,
अनुभव पथ पर, आन्दोलित मति,
संशोधित, पूरित शब्दों से,
सजती, रसती, अकुलायी क्षति।

द्वन्द्व चरम पर, जीवन साधे,
आधे सम्हले, बिखरे आधे,
स्थिरता की निशा विरहपथ,
अर्धचन्द्र अनुरूप बिता दे।