Showing posts with label संबंध. Show all posts
Showing posts with label संबंध. Show all posts

13.12.15

और तुम

मन की तहों में क्या हलचल मची है ।
न बोलूँ अगर, पर ये आँखें बतातीं ।।१।।

अगर पूछ सकते तो धड़कन से पूछो ।
किसे कष्ट कितना, वह कहकर सुनाती ।।२।।

तुम्हारे लिये मात्र सो के है उठना ।
तड़प कितनी होती, जो रातें सताती ।।३।।

वचन था, हृदय को हृदय में रखेंगे ।
भूले नहीं, बात तुमने भुला दी ।।४।।

कहा, तुम नहीं तो, नहीं चैन आता ।
सुनी बात, सुनकर हँसी में उड़ा दी ।।५।।

है मन को मनाने के औरों तरीके ।
नहीं बोलते बात, तुमपर जो आती ।।६।।

तुममें बसा मन, तुम्हे मन में ढूढ़ूँ ।
यही कर्म औ चाह मन में बसा ली ।।७।।

मेरी जीवनी को, समझती है दुनिया ।
नहीं कुछ किया और यूँ ही बिता दी ।।८।।


17.9.14

आहुति बन प्रस्तुत होता हूँ

नहीं और कुछ ज्ञात मुझे, पाता प्रियतम, सुध खोता हूँ 
फल बरसायें यज्ञ तुम्हे, आहुति बन प्रस्तुत होता हूँ ।।

फूल सदृश लगते काँटे,
श्रृंगारित तुमको कर पाता ।
आँसू भी अमृत बन जाते,
तेरी पीड़ा यदि पी जाता ।
तेरा मन कूजे उत्श्रंखल, मैं व्यथा अनवरत ढोता हूँ ।
फल बरसायें यज्ञ तुम्हे, आहुति बन प्रस्तुत होता हूँ ।।१।।

प्रेम नहीं व्यापार-जगत,
इसमें देना ही देना है ।
हृदय-तरी, प्रियतम शोभित,
फिर बड़े यत्न से खेना है ।
सींच रहा मन-भावों से, मैं बीज प्रेम के बोता हूँ ।
फल बरसायें यज्ञ तुम्हे, आहुति बन प्रस्तुत होता हूँ ।।२।।

त्याग, समर्पण में जीवन,
थक सकता है, खो सकता है ।
प्रत्याशा या अभिलाषा,
मन अकुलाये, हो सकता है ।
हो न प्राप्त अधिकारों को, यह आशा हृदय सँजोता हूँ ।
फल बरसायें यज्ञ तुम्हे, आहुति बन प्रस्तुत होता हूँ ।।३।।

13.9.14

हृदय को तुम भा रही हो

प्रणय की और प्रेरणा की
मूर्ति बनती जा रही हो ।
पंथ की छाया बनी हो,
हृदय को तुम भा रही हो ।।

कोई आकर पूछ ले परिचय तुम्हारा,
जीवनी में पिरोकर अस्तित्व सारा । 
प्रेम की अभिव्यक्ति को, तुम कर्म-सुर में गा रही हो ।
हृदय को तुम भा रही हो ।।१।।

ओट में मन-कल्पना की, और सिमटकर,
रही अब तक स्वप्न-महलों से निकल कर ।
पास आकर, स्वप्न-जल-तल में डुबोती जा रही हो ।
हृदय को तुम भा रही हो ।।२।।

बिसारे अस्तित्व का क्रन्दन भुलाने,
प्रेम-पूरित राग फिर से गुनगुनाने ।
प्रतीक्षित थी, आस-पूरित, जीवनी बन आ रही हो ।
हृदय को तुम भा रही हो ।।३।।

छेड़ती उन्माद से मन की तहों को,
सरसता बिन बीत जाती जीवनी को ।
मधुर सी कविता बनाकर, बाँचती तुम जा रही हो ।
हृदय को तुम भा रही हो ।।४।।

स्वार्थ-पूरित पंक और तुम कमल-दल सी,
खिल रही निश्चिन्त, जीवन में उमड़ती ।
मुस्कराती,प्रेम की, आकृति बनाती जा रही हो ।
हृदय को तुम भा रही हो ।।५।।

सहजता चहुँ ओर डूबी प्रचुर मद में,
आत्म-केन्द्रित जनों से परिपूर्ण जग में ।
अहम्‌ तजकर, प्रेम के, अनुरूप ढलती जा रही हो ।
हृदय को तुम भा रही हो ।।६।।

उमंगों से रिक्त, सूने उपवनों में,
चेतना यदि सुप्त, एकाकी क्षणों में ।
चहकती तुम, प्रेम-पोषित, हृदय को बहका रही हो ।
हृदय को तुम भा रही हो ।।७।।

सोचता हूँ, और मेरा क्या अभीप्सित,
प्रश्न का विस्तार यदि होता असीमित ।
उत्तरों की डोर पकड़े, क्षितिज तक ले जा रही हो ।
हृदय को तुम भा रही हो ।।८।।

दूत बनकर आयी कष्टों को मिटाने,
किन्तु उपजे विरह का संकट हटाने ।
अब सनातन-संगिनी बन, साथ चलती जा रही हो ।
हृदय को तुम भा रही हो ।।९।।

10.9.14

संबंधों के पथ

बड़े अजब संबंधों के पथ,
पल में गदगद, पल में लथपथ,
सारा तो संसार वही है,
दिन वैसा है, रात वही है,
धरती वैसी, वही नील नभ
वही रहे हम, बदले थे कब,
यह रहस्य पर समझ न आये,
कोई यह गुत्थी सुलझाये,
हम भी हतप्रभ, तुम भी हतप्रभ, 
मन ने चाहा, सुधर गया सब।

3.6.14

दो माह के बनारसी

बनारस आ गये हैं, पर जब तक इस तथ्य को उदरस्थ कर पाता, दो माह बीत गये। पता ही नहीं चला, यहाँ पर आना और यहाँ प्रवाहित कई धाराओं में आत्ममुग्ध हो रम जाना। इसे घटनाओं की अनवरत गति कह लें, कार्यस्थल में स्थापित होने का प्रयास करती मति कह लें, या अर्धविक्षिप्त अवस्था में समय की क्षति कह लें, एक स्थान पर बैठकर लिखने का समय ही नहीं मिल पाया। न ब्लॉग पढ़ना ही हो सका, न ही उन पर कुछ कहना हो सका। हो सका तो, पठनीय रचनाओं पर उड़ती सी एक दृष्टि और मन में घुमड़ते विचारों के बादल की कविताई शब्दवृष्टि।

सोचा कि लिखें, बनारस पर, जितना भी देख पाये, पहले दिन, प्रभार लेने के पहले। चार स्थान पर गये, भोर उठकर। गंगा माँ की गोद में स्नेहिल स्नान, बनारस के कोतवाल कालभैरव से आज्ञापत्र, बनारस बसाने वाले बाबा विश्वनाथ का आशीर्वाद और अन्त में भक्तिप्रवर संकचमोचन के दर्शन। एक दिन में इतना पुण्य एकत्र कर और आध्यात्मिक क्षुधा तृप्त कर बैठे ही थे कि हमारे सहायक कचौड़ी, दही और जलेबी ले आये। मन आनन्द में हो तो भूख बहुत लगती है। हम भी अपवाद न थे, आकण्ठ पकवान चढ़ाये और प्रभार लेने पहुँच गये।

प्रभार परिचालन का था, व्यस्तता आवश्यक अंग है इसका। इस तथ्य का आभास तो था, पर इतना भी नहीं सोचा था कि प्रथम ५ घंटों जैसे स्वर्णिम कालखण्ड को व्यक्त कर पाने के लिये दो माह तक जूझना होगा, वैसे उन्मुक्त क्षणों को पुनः पाने की प्रतीक्षा तो अब भी है।

सोचा कि क्या लिखता, बनारस पर, सारे प्रचार माध्यम इस नगरी की स्तुति में लगे थे, गुण व्याख्यायित करने में और दोष अनुमानित करने में। गलियों में, घाटों में, नदी के सिकुड़े पाटों में, भौतिक अव्यवस्था में आध्यात्मिक व्यवस्था को ढूढ़ निकालने का अथक प्रयास करते हुये सभी। राजनीति के बहाने ही सही, काल की गति उन्हें खींचकर यहाँ ले आयी थी, संभवतः हमें भी, एक प्रत्यक्ष पर मूकदर्शक के रूप में।

सोचा कि कैसे लिखता, जब कार्य में थक जाने के बाद और घर वापस लौटने के पहले गाढ़ी बनारसी लस्सी का बड़ा कुल्हड़ आपको बुला रहा हो, आप मना न कर पायें और पूरा चढ़ा लें। जब स्वाद में और पेट में इतना गाढ़ापन पहुँच जाये, तो दृष्टि से न कुछ दिखता है और मन से न कुछ लिखता है।

सोचा कि कैसे लिखता, जब आपके ही पुत्र और पुत्री बनारस की तुलना बंगलोर से करने में जुट जायें और गिन गिन कर दोष गिनायें। इस तथ्य को उनको कौन समझाये कि यहाँ दृष्टिगत आध्यात्मिक व्यवस्था शेष अव्यवस्थाओं पर कहीं भारी है। देश के हर कोने से आये लोग यहाँ सत्य खोजते हुये दिख जायेंगे। क्या भीड़ सदा ही अव्यवस्थाजनक होती है, इस प्रश्न का उत्तर दे पाने से अच्छा होता कि मैं उन्हें कुम्भ मेले में घुमाने ले जाता। अधिक नहीं समझा पाता हूँ क्योंकि तुलना असहाय हो जाती है, बच्चे इण्टरनेट के माध्यम से व्यवस्थित नगरों के चित्र देख चुके होते हैं, लेख पढ़ चुके होते हैं, अन्तर समझ चुके होते हैं। कैसे बताता कि हम भौतिक जगत पर ध्यान ही नहीं दे सके, शरीर के भीतर का सँवारने के क्रम में बाहर अस्तव्यस्ता धारण किये रहे।

सोचा कि दोष ही कैसे लिखता, जब श्रीमतीजी को यहाँ की अव्यवस्थता में अपने गृहनगर में रहने सा लग रहा हो,  और इसी बहाने मायके जाने की बाध्यता कम हो रही हो। यहाँ की गलियों में और कहीं भी पड़े कूड़े को देखकर कई बार तो उन्हें कानपुर के कई मुहल्ले तक याद आ जाते हैं। नये स्थान पर भी ससुराल पक्ष की इतनी उपस्थिति को कभी भी उत्साहपूर्वक लिखने वाली विषयवस्तु नहीं बनानी चाहिये, यही सोच कर बस लिखते लिखते रह गया। आशा है कि भविष्य में दोनों नगर एक गति से विकसित हों जिससे श्रीमतीजी की सापेक्षिक दृष्टि में घर्षण न हो, उन्हें समदृश्यता मिली रहे।

सोचा कि निरपेक्ष हो कैसे लिखता जब मेरे संबंध-तन्तु और मेधा-तन्तु इस नगर से जुड़े हों। मेरी माँ बचपन से ही मेरी प्रवीणता का स्रोत वाराणसी को उद्घोषित कर चुकी हैं। पिता की ओर से मेधा के प्रवाह की दिशा बताने वाले विज्ञान को मेरी माँ अपने उदाहरणों से निस्तेज कर चुकी हैं। उनकी माता के नाना बनारस के प्रकाण्ड विद्वान थे। मेरी बौद्धिक क्षमताओं में मेरी माँ को सदा ही मेरी नानी के नाना की कहानियों की झलक दिखती रही है। मेरा बनारस जाना उनके लिये मुझे मेरे बौद्धिक स्रोत के समीप जाना लग रहा है। जब मेरे मस्तिष्क में बनारस का तत्व विद्यमान हो तो लेखन में कैसे अपेक्षित निरपेक्षता आ सकेगी।

हम भी दो माह के बनारसी हो गये हैं। प्रारब्ध का लब्ध कहें या कर्मक्षेत्र की आश्रयता, गंगा का आदेश कहें या सहज शिव का उत्प्रेरण, संस्कृति का पुरस्कार कहें या लेखकीय अपेक्षाओं की सांध्रता, हम बनारस के हो चुके हैं। समय अपने पट खोलेगा और हमारा भी इतिहास और इतिवृत्त बनारस में सना होगा।  

17.5.14

अस्तित्व लगाने बैठा हूँ

कर लो प्रारम्भ महाभारत, निष्कर्ष बताने बैठा हूँ,
तुम रोज उजाड़ो घर मेरा, मैं रोज बनाने बैठा हूँ।

आवारापन मेरे मन का, कुछ और जमीनें पायेगा,
मर्यादा की जो दरक रही, दीवार हटाने बैठा हूँ।

सम्बन्धों के क्षण मैंने, हो उन्मादित निर्बाध जिये,
निश्चिन्त रहो, अब आहुति बन, अस्तित्व लगाने बैठा हूँ।

5.2.14

डियर फॉदर

कुछ माह पहले बंगलोर में परेश रावल अभिनीत यह नाटक देखा था, एक टिकट अतिरिक्त था तो प्रशान्त को भी ले गया था। हास्य का पुट लिये और मनोरंजन के थाल में परोसे इस नाटक में संदेश बड़ा ही स्पष्ट था। कभी कभी जो कड़वे सच डाँट कर या उपदेश की भाषा में नहीं समझाये जा सकते हैं, उनके लिये संभवतः यही सर्वाधिक उचित, सार्थक और सशक्त माध्यम है। परेश रावल के अभिनय की कुशलता और भावों के बीच सहज संक्रमण की कलात्मकता ने लम्बे चले इस नाटक में पल भर के लिये अपने स्थान से हिलने नहीं दिया।

समझ आपस की
चार पात्र हैं, पिता, पुत्र, बहू और इंस्पेक्टर। पिता और इंस्पेक्टर का पात्र परेश रावल ने किया है। कहानी बड़ी सीधी है और उसकी आंशिक झलक हर ऐसे परिवार में देखी जा सकती है। पुत्र और बहू दोनों ही नौकरी करते हैं और बहुधा उन्हें सायं घर आते आते देर हो जाती है और थकान भी। पिता वृद्ध हैं, अकेले भी, अपने आप को जितना व्यस्त रख सकते हैं, रखते हैं। घर पर अपना अधिकार समझते हैं और पुत्र और बहू से अपनी आत्मीयता भी। इसी कारण बहुधा वह ऐसी बातें कह देते हैं जो बहू को चुभ सी जाती हैं। उन्हें लगता है कि समाज की मौलिक समझ में पीढ़ियों का अन्तर है, बहू को ससुर की समझ रूढ़िवादी लगती है तो ससुर को बहू की समझ व्यर्थवादी लगती है।

समझ का यही अन्तर हास्य का कारण बनता है। दोनों पक्षों के द्वारा एक दूसरे के तर्कों में से कुतर्क को हटाने से विषय अपने संवादों के माध्यम से स्पष्ट होता जाता है, ससुर और बहू को नहीं वरन दर्शकों को। पति दोनों की इस संवादीय वाणवर्षा में सदा ही बिंधा दिखता है, किसी का पक्ष स्पष्ट रूप से नहीं ले सकता है, किसी बहाने एकान्त ढूँढ लेता है।

इसी बीच पिता बालकनी से गिर कर अस्पताल पहुँच जाते हैं। इस घटना की जाँच करने इंस्पेक्टर आता है और गिरने के सभी पहलुओं का विधिवत अध्ययन करता है, दम्पति का बयान आदि भी लेता है। कहानी गम्भीर होने लगती है। नित्य की बहस तो ठीक थी पर उन्हीं बातों से कोई इंस्पेक्टर कोई आपराधिक निहितार्थ निकालने लगे तो दम्पति का चिन्तित होना स्वाभाविक ही है। यही होता है, पति, पत्नी अपनी बहसों में कटुता के तत्व को न याद रखने की सी बातें करते हैं। इससे यही तर्क कोई पारिवारिक द्वन्द्व न लग विशुद्ध बौद्धिक बहस सी लगने लगते हैं। इंस्पेक्टर इस तथाकथित हृदय परिवर्तन से प्रभावित नहीं होता है और उन दोनों के ऊपर पिता की सुनियोजित हत्या का आरोप लगाता है।

अपने आप को उस आरोप से बचाने के पक्ष में दिये गये तर्क वस्तुतः उनकी आदर्शवादी सोच को दिखाते थे। व्यवहारिकता और आदर्शवादिता का यह नया अन्तर नाटक को एक और स्तर गहरे ले जाता है और संबंधों को समझने में सहायता करता है। दैवयोग से पिताजी को अस्पताल में होश आ जाता है और वह आकर सच बता देते हैं कि कुछ ठीक करने के प्रयास में फिसल जाने से यह दुर्घटना हुयी है। सुखद अन्त की आस थी पर पिता तब अपनी टीस व्यक्त करते हैं।

पिता कहते हैं कि मुझे ज्ञात है कि बहू का पक्ष बहुधा ठीक ही रहता है, पर मेरे अन्दर दिन भर किसी से बात न करने के कारण जो एकान्तजनित अकुलाहट रहती है, वही मुझे उद्धत करती है और मैं जानबूझकर कुछ न होते हुये भी बहस करने योग्य तत्व निकाल लेता हूँ। मुझे इस खटपट में अच्छा लगता है, कुछ व्यस्तता का आभास होता है। पिता तब अपने पुत्र से कहते हैं कि तुम्हें याद है कि पिछली बार तुमने मुझे कब स्पर्श किया था। बचपन से बड़े होने तक स्नेह और आशीर्वाद का संचरण स्पर्श से ही तो होता रहा है। इस स्पर्श की अनुपस्थिति यदि अकुलाहट न भरे तो अस्वाभाविक ही है। संभवतः अभी तुम्हें इस तथ्य की आवश्यकता सहज न लगे पर जीवन की साँझ में यह होने लगता है।

नाटक के अंतिम पड़ाव पर पूरा सभागार गहरी स्तब्धता में था, निश्चय ही बहुत लोग यह सोच रहे होंगे कि पिछली बार कब उन्होंने अपने बूढ़े माता पिता को स्पर्श किया होगा? दर्शकों की प्रतिक्रिया देख उत्तर पाना कठिन नहीं था। कई और सोच रहे होंगे कि स्पर्श के स्नेह में पल्लवित हुये वे कब स्वतन्त्र हो गये और स्पर्श की संवेदना को भुला बैठे। आँखें मेरी भी नम थीं, मैं उस समय अपने बूढ़े माता पिता से दो हज़ार किलोमीटर दूर था।

कभी कभी अधिक बुद्धि के कुप्रभाव में हम तर्क से सुख के बड़े बड़े मानक गढ़ देते हैं, जब कि वास्तविक सुख कहीं अधिक सहज और सरल होता है। लोग कहते हैं कि बच्चे और वृद्धों के स्वभाव में कोई अन्तर नहीं होता है। जहाँ तक स्नेह की बात होती है, कोई अन्तर नहीं होता है। अन्तर यदि होता है तो हठ का। बच्चे पर यदि ध्यान न दिया जाये तो वह धरती आसमान एक कर देता है। वृद्ध अपनी बात कहना तो चाहते हैं पर मर्यादाओं को मन में रख बहुधा मौन होकर अपनी पीड़ा पीना सीख लेते हैं, स्पर्श के स्नेह को अकुलाते रहते हैं।

एक बार अपने बूढ़े माता पिता को सस्नेह स्पर्श तो कीजिये, उनकी त्वचा में स्नेहिल कंपन आने लगेगा, उनकी आँखें नम हो चलेंगी, वर्षों का संचित स्नेह प्लावित हो बहने लगेगा, संबंधों के व्याजाल सुलझने लगेंगे, पीढ़ियों के अन्तर मिटने लगेगा। यही नहीं, आप भी अधिक व्यापक अनुभव करने लगेंगे, संभवतः वैसा ही कुछ, जैसा मैं डियर फ़ादर देखने के बाद अनुभव कर रहा था।

2.11.13

भाषायी संबंध

न जाने कितना कुछ कहती यह भाषा
भाषा संबंधी अध्ययन के समय में एक विशेष प्रश्न आया था, कि किस प्रकार भाषा संस्कृतियों के पक्षों को अपने में समा कर रखती है और किस प्रकार वह चिन्तन को प्रभावित करती है। छोटा सा एक तुलनात्मक उदाहरण लें, वैज्ञानिक भाषा का और आदिवासी क्षेत्र में बोली जाने वाली भाषाओं का। वैज्ञानिक भाषा में प्रयुक्त शब्द जैसे एन्ट्रॉपी अपने आप में न जाने कितने सिद्धान्त समाहित किये बैठा है। जब भी वह बोला जायेगा, ऊष्मागतिकी के द्वितीय सिद्धांत तक प्रयुक्त सारा ज्ञान उस शब्द में व्याख्या सहित समाया मिलेगा। इसी प्रकार आदिवासीय क्षेत्र में बोली जाने वाली भाषा में प्रकृति की उपासना की प्रमुखता होगी, उन्नत शब्द प्रकृति की किसी शक्ति का वर्णन करते हुये ही दिखेंगे। ज्ञान के विकास में शब्द सामर्थ्यशाली होते चले जाते हैं और आने वाली पीढ़ियों की चिन्तन प्रक्रिया को सुदृढ़ बनाते रहते हैं।

गहरे सिद्धान्तों को वहन कर सकने के लिये भाषा का स्वरूप और बनावट भी गहरी होनी चाहिये। रोमन अंक किसी भी स्थिति में गणित के अग्रतम सिद्धान्तों को व्यक्त नहीं कर पायेंगे। कल्पना कीजिये कि यदि रोमन अंकों में आपको गुणा करने का भी कार्य दिया जाता तो गणित के प्रति आपका क्या रुझान होता? इसी प्रकार देखिये तो कम्प्यूटर को अंग्रेजी सीधे समझ नहीं आती, अतः उससे कार्य निकालने के लिये जावा या सी प्लस आदि कम्प्यूटर भाषाओं का उपयोग किया जा रहा है। एस क्यू एल(Structured Query Language, SQL) के नाम से नयी कम्प्यूटर भाषा विकसित हो रही है, जिसमें एक व्यवस्थित क्रम हो और कम्प्यूटर को उस भाषा को समझने में कोई भी भ्रम न रहे, हर बार शब्द और निर्देश वही अर्थ बता सकें।

जहाँ तक देखा गया है, कोई एक संस्कृति या तन्त्र एक दिशा में बहुत आगे तक चली जाती है और उस संस्कृति को व्यक्त करने वाली भाषा संस्कृति के सशक्त पक्षों को अपने में समेट लेती है। कल्पना कीजिये कि भाषा की विकास प्रक्रिया तब कैसी होती होगी, जब किसी संस्कृति में दो पक्ष सशक्त होते होंगे। भाषा का आकार और शब्दकोश तब कैसे विकसित होता होगा? क्या होता होगा, जब संस्कृति का भौतिक पक्ष, मानसिक पक्ष, बौद्धिक पक्ष या आध्यात्मिक पक्ष संतुलित रहता होगा, भाषा तब कैसे अपना मार्ग ढूंढ़ती होगी, कैसे अपना समन्वय बिठाती होगी?

भाषा के शब्दों में कितना अर्थ छिपा है और वे एक वाक्य के रूप में कितना भ्रमरहित संप्रेषण करते हैं, यह किसी भी भाषा के सामर्थ्य को दिखाते हैं। यहाँ पर एक बात समझनी आवश्यक हो जाती है जो भाषा के अनुवादकों के कठिन श्रम को समझने में सहायक है। किसी एक भाषा से दूसरी भाषा में अनुवाद की प्रक्रिया केवल दोनों भाषाओं के शब्दकोश से होकर नहीं जाती है, वरन अनुवाद से न्याय करने के लिये शब्दों द्वारा व्यक्त संास्कृतिक अनुगूँज और उस भाषा में छिपे व्याकरणीय भ्रमतन्तु समझने आवश्यक हैं। सफल अनुवाद इन दोनों को पूरी तरह से समझे बिना संभव ही नहीं है। अनुवादकों का कार्य सृजनशीलता में लेखकों से भले ही कम हो, पर संप्रेषण में लगे श्रम और समझ की दृष्टि से बहुत अधिक है, दो भाषाओं की संस्कृति और भाषायी शैली समझने की दृष्टि से बहुत अधिक है।

अनुवादकों का कार्य तब कठिन हो जाता है जब संस्कृतियाँ सर्वथा भिन्न हो। गणित और विज्ञान ने पूरे विश्व में अपनी भाषा एक सी बना ली है अतः एक देश में हुये विकास को दूसरे देश में सरलता से पढ़ा जा सकता है, बिना अनुवादकों की सहायता के। वहीं दूसरी ओर एक संस्कृति में ही पोषित दो पड़ोसी भाषाओं के बीच भी अनुवाद बड़ी समस्या नहीं है। कई शब्दों की समानता और व्याकरण की समरूपता इस कार्य को उतना कठिन नहीं रहने देती है। भिन्न संस्कृतियों की भाषा के बीच सेतु का कार्य करने के लिये मन में SQL जैसी ही किसी भाषा का निर्माण करना पड़ता है, या कहें सेतुबन्ध बनाने के लिये अनुवादक को अलिखित तीसरी भाषा गढ़नी पड़ती है।

जब दो भाषायें संपर्क में आती हैं, उन दोनों के बीच शब्दों और सिद्धान्तों के बीच सांस्कृतिक आदान प्रदान की प्रक्रिया चलती है। जानकर कोई आश्चर्य नहीं होगा कि जहाँ वैज्ञानिक शब्दकोश अंग्रेजी से भारतीय भाषाओं में आया है, भारतीय भाषाओं के आध्यात्मिक शब्दकोश से अंग्रेजी सम्पन्न हुयी है। कारण स्पष्ट है जब सारी वैज्ञानिक प्रगति अंग्रेजी में हो रही थी, भारतीय भाषाओं के अधिनायक अपनी स्वतन्त्रता के संघर्ष में डूबे थे। इसी प्रकार जब भारत में मनीषी अध्यात्म के उन्नत ग्रन्थ लिख रहे थे, यूरोप व अरब के देश अपने अंधे युग में थे।

हमको अपने सूत्र साधने
भारतीय भाषाओं में उपस्थित समानता और व्याकरण भारतीय भाषाओं के एक स्रोत की ओर इंगित करता है। यदि संस्कृत को केन्द्र में रखकर देखें तो तमिल को छोड़कर शेष सभी भारतीय भाषाओं की समरूपता का प्रतिशत ६५ से ऊपर है, कुछ में यह प्रतिशत ८५ तक भी पहुँच जाता है। व्याकरण और वर्णमाला के अतिरिक्त संस्कृति की समानता इसका प्रमुख कारण है। तमिल के साथ जहाँ सांस्कृतिक समैक्य है, व्याकरण और वर्णमाला थोड़ी भिन्न होने पर भी समानता का प्रतिशत ४५ के आसपास आता है। भाषाओं में बटे भारत में इस प्रकार की समानता ढूँढ निकालने का कार्य गम्भीरता से नहीं लिया गया है, एक भाषा को थोपे जाने के भावनात्मक भय ने एकता पाने की संभावनाओं पर भी कुठाराघात किया है। ६५ प्रतिशत की शाब्दिक समानता क्या पर्याप्त नहीं थी, हम लोगों को एक दूसरे के हृदय में पहुँच पाने के लिये?

देश के भाषायी प्रश्न को भावनात्मकता से विलग कर तथ्यात्मक आधार पर देखा जाये तो भाषायें न केवल एक दूसरे पर अपना प्रभाव डालती रहती हैं, वरन औरों के प्रभाव से स्वयं को बचाती रहती हैं। दूसरी भाषा के शब्दों को अपनी भाषा में लेने से भाषा के समृद्धिकरण के लाभ भी हैं और स्वयं के निगले जाने का भय भी। दो भाषाओं के जन के बीच संपर्क किसी एक भाषा में ही होता है। आवश्यकतानुसार लोग एक दूसरे की भाषा बोल भी लेते हैं, पर यह बात मानकर चलिये कि आवश्यकता कितनी भी गहरी हो, अपनी भाषा के मोहतन्तु इतनी सरलता से जाते नहीं हैं। बाह्य परिवेश में विवशतावश कोई भी भाषा बोले, पर घर आकर लोग अपनी मातृभाषा ही बोलते हैं। अपनी भाषा को, अपनी संस्कृति को बचाये रखने का मोह सबको होता है।

कभी सोचा है कि किसी एक बांग्लाभाषी का बंगलोर में क्या भाषायी आधार रहता होगा? मैं बताता हूँ क्योंकि मैं ऐसे कई परिवारों को जानता हूँ। घर में बांग्ला, बाहर कन्नड़, कार्यालय में अंग्रेजी और मेरे साथ हिन्दी। प्रश्न और जटिल कर देते हैं, पति पत्नी दोनों ही अलग भाषा बोलते हैं, बच्चा कौन सी भाषा सीखेगा? अंग्रेजी विश्व से जुड़ने की भाषा है, परिवेश की भाषा कुछ और हो सकती है? ऐसी भाषायी संबंधों में वह क्या ग्रहण करता होगा, किस भाषा में कितनी गहराई तक जा पाता होगा? या भ्रम में कुछ भी नहीं सीख पाता होगा? एक से अधिक भाषा जानने के लिये तब अधिक समस्या नहीं रहती होगी जब दोनों भाषाओं में सांस्कृतिक समानता हो। तब संभव है कि शब्द भी उभयनिष्ठ हों। समस्या तब आती है जब भाषाओं से संबद्ध संस्कृतियाँ भिन्न होती हैं, उनके भौतिक, मानसिक, बौद्धिक और आध्यात्मिक विमायें भिन्न होती हैं। अनुवादक का कार्य भी इसी आधार पर अपनी सरलता या जटिलता ढूँढता होगा।

जिस तरह से विश्व में भौगोलिकता के पार पारस्परिक संपर्कबिन्दु बढ़ रहे हैं, जिस तरह भाषाओं का आवागमन हो रहा है, जिस प्रकार बहुभाषी जन तैयार हो रहे हैं, उससे यह तो निश्चित है कि सभी भाषाओं में सतत परिवर्धन होगा। संस्कृतियों के इस वृहद मेले में भाषायें किस तरह प्रभावित होगीं, उनके आपसी संबंध किस तरह के होंगे, उनके संमिश्रण से शब्दकोश क्या आकार धरेंगे, यह शोध का विषय है। अंग्रेजी संस्कृति हर ओर फैली और निष्कर्ष स्वरूप शब्दकोश का आकार ३ हजार शब्दों से ३ लाख शब्दों तक हो गया है। अन्य भाषायें अंग्रेजी के इस ऐश्वर्य से प्रभावित होंगी कि अपनी राह स्वयं गढ़ेंगी? भारतीय भाषायें किस ओर बढ़ेंगी?

भाषाओं का प्रश्न जितना सरल लोग बनाने का प्रयास करते हैं, उतना सरल वह होता नहीं। मानव संबंधों से भी अधिक दुलार पाती हैं भाषाओं की भावनायें। जो हमको हमारे भाव समझाने का प्रयत्न अपने हर शब्द से करती हैं, हम भी उसके भाव समझ सकें, हम भी नित एक होते विश्व में भाषायी संबंध समझ सकें।

30.1.13

ताकि सुरक्षित रहे आधी आबादी

पहले ही स्पष्ट कर दूँ कि यह लेख पूर्णतया व्यक्तिगत अनुभवों और लेखक की सीमित बौद्धिक क्षमताओं के आधार पर ही लिखा गया है। जीवन में संस्कार, संस्कृति, शिक्षा, सामाजिकता आदि के अंश समुचित रूप से विद्यमान रहते हैं अतः विचार प्रक्रिया में उनका उपस्थित रहना स्वाभाविक है। विचार पद्धतियों के मत भिन्न हो सकते हैं, एक छोर पर बैठे व्यक्ति को दूसरा छोर स्पष्ट न दिखता हो, पर बिना दोनों छोरों को समाहित किये कोई संगठित सूत्र निकलना कठिन होता है। दूसरे तथ्यों और सत्यों की उपस्थिति हीन सिद्ध कर देना भले ही बौद्धिक धरातल पर विजय ले आये पर वह विजय समाज की विजय नहीं हो सकती। जीवन एकान्त या घर्षण में नहीं जिया जा सकता है, एक राह निकलनी ही होती है, सबके चलने के लिये। एकरंगी आदर्श की तुलना में बहुरंगी यथार्थ ही सबको भाता है, वही समाज की भी राह होती है।

बहुत दिनों से इस विषय पर लिखना चाह रहा था, पर पिछले माह हुये घटनाक्रम और सामाजिक परिवेश में मचे हाहाकार ने इस विषय पर चिन्तन के सारे कपाट बन्द कर दिये। लगा कहीं कुछ भी ऐसा लिख दिया जो परोक्ष रूप से भी हाहाकार के स्वर में नहीं हुआ तो हमारी मानसिकता को दोषी मान उसे भी कटघरे में खड़ा कर दिया जायेगा। एक पक्षीय संवेदनशीलता को दूसरी ओर से संवेदनहीनता घोषित कर दिया जायेगा। वादी, विवादी, संवादी, न जाने कितने स्वर उठ खड़े होंगे। भिन्न वादों के बादल धीरे धीरे छट रहे हैं, विवादों के स्वर मंद पड़ रहे हैं, संभवतः यही समय है कि विगत विचारों को संघनित कर एक सार्थक संवाद किया जाये, उन समस्याओं पर जो हमें व्यथित किये हैं, उस मूलभूत माध्यम से जो हम सबको छूकर निकलता है।

पुरुषों के प्रति अपराध और महिलाओं द्वारा महिलाओं के प्रति किये अपराध विषयक्षेत्र से बाहर रखे गये हैं। यह लेख मात्र पुरुषों के द्वारा महिलाओं के प्रति बढ़ते अपराधों पर ही केन्द्रित है और उसी में ही सीमित रहेगा। यद्यपि तीनों प्रकार के अपराध समाज में विद्यमान है और एक दूसरे से प्रभावित भी, पर पुरुषों के द्वारा महिलाओं के प्रति किये गये अपराध कहीं अधिक मात्रा में हैं और कहीं अधिक संवेदनहीन हैं। यदि मात्र उनके कारणों की विवेचना व निदान कर लिया जाये तो शेष दो स्वयं ही सध जायेंगे।

समाज परिवारों से बनता है, परिवार संबंधों से बनते हैं, संबंध व्यक्तियों के बीच पल्लवित होते हैं। यदि समाज के किसी विकार का विश्लेषण करना हो तो चिन्तनपथ संबंधों से होकर जायेगा। मेरी वर्तमान स्थिति में वह प्रमुखतः ४ संबंधों से होकर निकलता है, माँ, बहन, पत्नी और बेटी। कई लोगों के लिये यह चारों संबंध भले ही उपस्थित न हों, पर हमारा अस्तित्व माँ के संबंध और उपकार का ही प्रतिफल है। यह एक विमा तो बनी ही रहेगी, जन्म हुआ है तो संबंध भी बना है। प्रस्तुत लेख में मेरा आग्रह और विचारदिशा बस यही दिखाने की रहेगी कि यदि इन चार संबंधों की संवेदनशीलता को जिया जाये और उसे सदा याद रखा जाये तो उपस्थित समस्या का सहज निदान ढूढ़ा जा सकता है।

माँ की महानता को उजागर करता हुआ पूरा का पूरा साहित्य है, पूरा का पूरा भावनात्मक पक्ष है। जीवन देने से लेकर लालन पालन तक माँ के ममत्व का कोई मोल नहीं, बस उसे एक पक्षीय अहैतुक कृपा ही मानी जायेगी। ममत्व बड़ा ही प्राकृतिक है, हर जीव में विद्यमान है, सब जानते हैं कि किस तरह अपनी संतानों की रक्षा करनी है। यदि किसी भी वस्तु के प्रति कृतज्ञता प्रथम वरीयता में खड़ी है तो वह है माँ की ममता। ऐसा नहीं है कि एक पुत्र इस तथ्य को नहीं जानता है, कोई भी औसत बुद्धि वाले के लिये यह निष्कर्ष निकालना कठिन नहीं है और पुत्र की मौलिक विचारप्रवाहों में इसका महत्व रहता भी है। तब कुछ लोगों में महिलाओं के प्रति आदर क्षीण कैसे होता है, यहाँ तक कि कैसे अपनी ही वृद्ध माताओं को उनके पुत्र ध्यान नहीं देते। उत्तर संभवतः उनके परिवार में ही छिपा रहता है। बच्चे अपने माँ और पिता के संबंधों को ही देख कर सीखते हैं, उन्हें ही अपना आदर्श मानते हैं। उनका आपसी व्यवहार पुत्र के लिये बहुत महत्वपूर्ण होता है।

अब जिन परिवारों में पत्नी को प्यार व सम्मान नहीं मिलेगा, वहाँ के बच्चे क्या देखेंगे और क्या सीखेंगे? जीवन की प्रथम शिक्षा ही यदि महिलाओं के प्रति अनादर की हुयी तो कहाँ तक माँ का किया उपकार बच्चों के मस्तिष्क में सर्वोपरि बना रहेगा। उसे भी लगने लगेगा कि ममता आदि सब भावनात्मक विषय हैं पर पारिवारिक परिस्थितियों में महिलाओं की यही स्थिति है, यही सम्मान है। माता पिता के बीच सामञ्जस्य के आभाव में दो तरह की मानसिकता ही विकसित होती है, या तो पुत्र पिता की तरह रुक्ष व असंवेदनशील हो जाता है या माँ के प्रति अपने उपकार से बद्ध अतिसंवेदनशील हो जाता है, भावुक हो जाता है। दोनों ही परिस्थितियाँ संतुलित विकास में अवरोध हैं। महिलाओं के प्रति हमारे व्यवहार के प्रथम बीज हमारे माता पिता ने ही बोये होते हैं। यदि किसी व्यक्ति ने महिला के प्रति कोई अपराध किया है तो प्रथम प्रश्न माता पिता पर उठना चाहिये, संभावना बहुत है कि उत्तर वहीं मिल जायेगा।

महिलायें आधी आबादी हैं, यदि उनके साथ निभा कर जीना नहीं आ पाया तो हम अर्धजगत से विलग ही अनुभव पा पायेंगे, अर्धशिक्षित ही रह जायेंगे। अनुभव की दूसरी शिक्षा बहन के माध्यम से आती है। हर घर में बहन होनी आवश्यक है, यदि घर में बहन नहीं होगी तो ममता के द्वारा प्राप्त महिलाओं के प्रति संवेदनशीलता भी घुल जाने का भय है तब। एक निकट संबंधी के परिवार को जानता हूँ, सारे पुत्र ही हैं, उनके घर का वातावरण काटने को दौड़ता है, किस समय वहाँ क्या बोल दिया जायेगा, पता नहीं चलता है। ऐसा नहीं है कि सारे परिवार ऐसे ही होते हैं पर बहन का घर में होना पुत्र को महिलाओं के प्रति और संवेदनशील बनाता है। मैं बुंदेलखण्ड से आता हूँ और वहाँ की एक मान्यता मुझे सदा आशा की किरण दिखाती है। वहाँ माँ की कोख तब तक शुद्ध नहीं मानी जाती जब तक वह किसी बिटिया को जन्म न दे दे। संभवतः मेरे घर में भी तीसरी सन्तान के रूप में मेरी छोटी बहन को आना इसी मान्यता की पुकार रही होगी। अत्यधिक पुत्रमोह और पुत्रियों को गर्भ में ही समाप्त कर देने की प्रथा न जाने कहाँ जन्मी, न जाने क्यों जन्मी, कहना कठिन है। पर वही प्रारम्भिक अपराध है, महिलाओं को प्रति और उनका बहनों के रूप में परिवार में न आना एक और कारण है, भाईयों के अन्दर वह संवेदनशीलता न उत्पन्न होने का, जो पुत्रों को संतुलित रूप से विकसित करने के लिये आवश्यक है।

तीसरा और महत्वपूर्ण पड़ाव पत्नी के रूप में आता है। इस पड़ाव में ही पुरुष की समझ और संवेदनशीलता विकसित और परिपक्व होती है, उसे साथ में मिलकर कार्य करने वाला साथी मिलता है। अब तक वह परिवार का अंग रहता था, पत्नी के आने के बाद उस पर परिवार चलाने का उत्तरदायित्व भी आ जाता है। जब मिलकर किसी एक ध्येय के लिये दो लोग कार्य करते हैं, एक दूसरे को समझने के लिये उससे अच्छा माध्यम नहीं हो सकता है। परिवार के माध्यम से समाज से जुड़ना, दूसरे पक्ष के संबंधियों से जुड़ना, समाज को और अधिक समझ पाना, ये सब उस प्रक्रिया का अंग है जो हमें समाज के रूप में रहना सिखाती है। बच्चों को एक प्रभावी नागरिक के रूप में विकसित करना और उन्हें समाज और विशेषकर महिलाओं के प्रति संवेदनशील बनाना, परिवार का ही कार्य है। एक प्रसन्न परिवार संवेदनाओं का केन्द्र होता है, यही वह केन्द्र है जिसका सुचारु और अधिकारपूर्ण संचालन महिलाओं के प्रति अपराधों पर सशक्त नियन्त्रण रख सकता है।

चौथा और सर्वाधिक मधुर संबंध बिटिया का होता है। प्रथम तीन संबंधों में तो पुरुष ने केवल कुछ ग्रहण ही किया होता है, यह वह समय होता है जब कुछ देने की स्थिति में होते हैं हम। किसी बिटिया को पालना और बड़े होते देखना ही महिलाओं की संवेदना समुचित समझने का माध्यम है। व्यक्तिगत अनुभव से ही कह सकता हूँ कि पुरुष के दायित्वबोध का निष्पादन बिटिया के लालन पालन में ही उभर कर आता है, पुरुष के रुक्ष भाव उसी समय अपनी गाँठ खोल देते हैं, पितृत्व के निर्वाह में ही पूर्णता पाता है पुरुष का अस्तित्व। जब आप एक के प्रति लालन पालन का भाव लेकर जी रहे होते हैं तो किसी अन्य के प्रति अपराध का भाव भी कैसे ला सकते हैं।

जो इन चारों संबंधों को पर्याप्त मान देता है, वह सहायक होता है सुख में, समृद्धि में, वह सहायक होता है सभ्यता को उत्कृष्ट स्थान पर पहुँचाने के लिये, वह सहायक होता है ऐसी मानसिकता फैलाने में जहाँ सबका समुचित सम्मान हो, सबका समुचित आदर हो। फिर भी ऐसे तत्व बने रहेंगे जो सधा सधाया संतुलन बिगाड़ने का प्रयत्न करेंगे। कानून व्यवस्था ऐसे ही अपवादों से निपटने के लिये बनी है, सामाजिक व्यवस्था को यथा रूप चलने देने के लिये। वृहद बदलाव पर अन्दर से आता है, भव्यता का प्रकटीकरण पहले हृदय के अन्दर होता है तब कहीं वह वास्तविकता में ढलता है। जो चार संबंध हमें सर्वाधिक प्रिय हैं, उन्हीं में हमारी सामाजिक स्थिरता व संतुलन के बीज छिपे हैं। उन्हीं को साधने से सब सध जायेगा, शेष साधने के लिये तन्त्र उपस्थित हैं।

मुझे बड़ा ही आश्चर्य लगा कि अब तक मचे हाहाकार में कठिनतम दण्ड की बात तो सबने की, जो निसंदेह आवश्यक भी है, पर संबंधों के जिन सशक्त तन्तुओं से एक सार्वजनिक चेतना का विकास संभव था, उस पर सब मौन रहे। अधिकारों की लड़ाई खिंचती है, तनाव लाती है। संबंधों की उपासना जोड़ती है, आनन्द लाती है। हमारे सामूहिक कलंक के मुक्ति का मार्ग संभवतः यही है कि हम सब अपने इन चार संबंधों को प्रगाढ़ करें, और संवेदनशील करें।

(यह लेख राजस्थान पत्रिका के २६ जनवरी विशेषांक में भी छपा है, बंगलोर संस्करण में)