मत दे वियोग सा असह्य शब्द,
यह धैर्य-बन्ध बह जायेगा ।
यह महाप्रतीक्षा का पर्वत,
बस पल भर में ढह जायेगा ।।१।।
जीवन के पथ में संदोहित,
तब भाव सभी उड़ जायेंगे ।
जीवन रस दाता मेघ सभी,
निज पंथ छोड़ मुड़ जायेंगे ।।२।।
सुख के भी सब स्रोत हमारे,
दूर दूर हो जायेंगे ।
जो लिये पात्र आशा मदिरा,
वह चूर चूर हो जायेंगे ।।३।।
हो रक्तिक आज सभी यादें,
दर्दों में जा उतरायेंगी ।
तन मन शीतलता की दात्री,
ही स्वयं अनल बन जायेगी ।।४।।
हो व्यथित विचारों की सरिता,
निज धार स्वयं ही बदलेगी ।
अमृतमय स्वप्नों की रचना,
फिर आज मुझे ही डस लेगी।।५।।
तब यौवन की तृष्णायें सब,
कर ताण्डव मन में नाचेंगी ।
जीवन की सुन्दर रागनियाँ,
कविता शोकाकुल बाँचेंगी ।।६।।
हो जड़वत आज सभी गतियाँ,
बस बीच पंथ रुक जायेंगी ।
तेरे ऊपर केन्द्रित जो थीं,
वे निष्ठायें थक जायेंगी ।।७।।
मधुरे तेरा है कार्य बड़ा,
मेरे इस जीवन-मंचन में ।
प्रतिपल, प्रतिक्षण तू आमन्त्रित,
मेरे उजड़े से उपवन में ।।८।।