7.4.12

नकल का सिद्धांत

नकल एक सार्वभौमिक परिकल्पना है। प्रकृति के हर अंग में कूट कूट कर भरी है यह प्रवृत्ति। सारी संततियाँ आकार प्रकार में अपने पूर्वजों की शतप्रतिशत नकल ही होती हैं। नित नयी मौलिकता कहाँ से लाये प्रकृति, थोड़ा बहुत बदलाव कर कम से कम कामचलाऊ अन्तर तो हो जाता है, लोग पहचान में आ जाते हैं। नकल का गुण तो हमारे गुणसूत्रों में है, वही पीढ़ी दर पीढ़ी हमारी नकल तैयार करते रहते हैं। एक पेड़ की करोड़ो पत्तियाँ, सबका आकार प्रकार एक जैसा, इतने बड़े स्तर में प्रकृति ने व्यवस्था कर रखी है नकल की।

ब्रह्मा को छोड़ दिया जाये तो सबको ज्ञान नकल के माध्यम से ही देने का विधान रखा गया है। औरों को देखिये और सीखिये, अधिक देखिये और अधिक सीखिये। सारी की सारी ज्ञानेन्द्रियाँ मानो नकल में पारंगत होने के लिये ही बनायी गयी हों। यदि नकल करना बन्द कर दिया जाये तो बच्चे का विकास ही बन्द हो जायेगा। जिज्ञासा हमें और जानने को प्रेरित अवश्य करती है पर पुनः किसी और का लिखा पढ़ने के लिये। पुरानी सीख को नये ढंग से प्रस्तुत कर लेने को कोई सृजन मान बैठें तो हमें प्रसन्न हो लेना चाहिये, अन्यथा वह नकल से अधिक कुछ भी तो नहीं।

ऐसा नहीं है कि इस विश्व में कुछ नया नहीं हो रहा है, नित हो रहा है, नये आविष्कार, नयी खोजें, पुरानी चीजों को करने के नये ढंग, उन्नत तकनीक, विश्लेषणात्मक शोध और न जाने कितना कुछ। एक शोध का पूर्ण उपभोग, सम्मिलित उपभोग, बाजार आधारित अर्थव्यवस्था से प्रेरित। उस शोध से जिसको आर्थिक लाभ हुआ, वह किसी दूसरे के शोध से उत्पादित वस्तु का प्रयोग कर रहा है। अन्ततः तो सब प्रकृति का ही उपभोग कर रहे हैं, यत् किञ्चित जगत्यांजगत। वैश्विक अर्थव्यवस्था, साम्यवाद हो या असाम्यवाद हो, सदा ही नकल पर आधारित रही है। दूसरे के शोध का लाभ विश्व ने सम्मिलित उठाया है। तनिक सृजन शेष उपभोग, एक सृष्टा शेष भोक्ता।

बड़ी बड़ी मोबाइल कम्पनियों के बीच चल रहे पैटेन्ट संबंधी मुकदमे एक दूसरे पर लगाये गये नकल के आक्षेप ही तो हैं। एक का ज्ञान दूसरे ने बिना उसका मोल चुकाये उपयोग कर लिया, उसका लाभ उठा लिया, बस बन गया मुकदमा। उपभोक्ता बने रहने में भलाई है, आपको उपयोग की छूट है, आपने उसका मोल जो दिया है। आप लाभ उठाने लगें नकल का, तो आप पर भी ठोंक दिया जायेगा मुकदमा। बौद्धिक सम्पदा के नकल में मोल देकर ही लाभ उठाया जा सकता है। यह एक सर्वथा अलग विषय है कि बौद्धिक सम्पदा का अपहरण और लाभ पदासीन और सत्तासीन जन बहुधा उठाते रहते हैं।

कहीं विकास होता है तो लोग उसे देखने लिये विदेश यात्रायें कर डालते हैं, देख कर और सीखकर आते हैं, अपने यहाँ पर उसे लागू भी करते हैं। कोई नया प्रयोग एक अनुकरणीय उदाहरण बन जाता है, सब उसकी नकल करना प्रारम्भ कर देते हैं। सार्वजनिक हित में इसे बुरा नहीं माना जाता है, विकास के लिये इसे बुरा नहीं माना जाता है। दूसरों की अच्छाईयों को समाज के व्यापक हित में अपनाना एक गर्व का विषय समझा जाता है।

विद्यालय या आईआईटी में जो भी गृहकार्य दिया जाता था, वह बहुत कुछ कहीं न कहीं से देखकर ही पूरा होता था, संभवतः उसका प्रायोजन ही वही रहता होगा, नकल से ही सही पर उसे समझना ही सबका सम्मिलित ध्येय रहता होगा। नकल करके भी जो समझना नहीं चाहते हैं, ज्ञान का न होना उनका दुखद पक्ष होता है। जो नकल करके समझ भी लेते हैं, वहाँ ध्येय मार्ग को पवित्र कर देता है।

जगत में फैले नकल संबंधी उदाहरणों पर विहंगम दृष्टि डालने में मेरा उद्देश्य अपने युवा मित्र को कोई सैद्धांतिक समर्थन देना नहीं है, वरन यह समझने का प्रयास है कि नकल किस बिन्दु तक पहुँचते पहुँचते पवित्र से अपवित्र हो जाती है। यद्यपि मेरे युवा मित्र अपने व्यक्तिगत पक्ष को प्रधान मानकर नकल को न्यायसंगत ठहरा रहे हैं, पर मेरे लिये तो नकल उतनी ही प्राकृतिक है जितना कि हमारा अस्तित्व। नकल से होने वाले हानि लाभ को इन उदाहरणों के परिप्रेक्ष्य में समझना आवश्यक हो जाता है।

व्यक्तिगत विकास, परम्परा निर्वाह, सार्वजनिक हित, सामाजिक विकास, बौद्धिक उत्थान आदि में नकल न केवल बड़ी गुणकारी मानी जाती है वरन अत्यन्त आवश्यक भी है। व्यक्तिगत हित, आर्थिक लाभ, प्रतियोगिता आदि में नकल का नाम लेते ही आदर्शवादियों की भृकुटियाँ तन जाती हैं, ऐसा लगता है कि कोई पापकर्म किया जा रहा हो। वैसे भी अब वो दिन रहे नहीं जब बोर्ड की परीक्षा में अच्छे अंक लाने से कोई ठीक ठाक नौकरी मिल जाती थी, आजकल तो चपरासी की नौकरी के लिये भी स्नातकोत्तर योग्य ज्ञान की प्रतियोगी परीक्षायें देनी पड़ती हैं।

हमारे युवामित्र परीक्षा देकर आ गये हैं, नकल की पुर्चियाँ काम आयी हैं, उत्तीर्ण होने की पूरी संभावना है। इस तथाकथित दुष्कर्म का प्रतियोगिता में या कोई आर्थिक लाभ तो वैसे भी नहीं मिलना था उनके लिये, दो व्यक्तिगत लाभ अवश्य हुये उनको। पहला, उन्हें अब खेती में नहीं खटना होगा। दूसरा, बारहवीं पास होने के कारण पढ़े लिखे का ठप्पा लग जायेगा और पिताजी के प्रयासों से किसी सुन्दर कन्या के साथ गृहस्थी बस जायेगी। इन्जीनियर या डॉक्टर के स्वप्न तो पहले भी नहीं देखे थे, व्यक्तिगत श्रम आधारित छोटा मोटा व्यवसाय ही उनके जीवन का आर्थिक आधार बनेगा।

हमारे युवा मित्र की कहानी तो सुखान्त की ओर बढ़ चली है, नकल की घटना उनके लिये एक विशेष अनुभव रही है। जीवन में कभी चिन्तनशीलता जागी तो वह भी नकल, परीक्षा और शिक्षा के ऊपर अनुभवजन्य दार्शनिक आलेख अवश्य लिखेंगे।

4.4.12

नकल क्षेत्रे

परीक्षा कक्ष से अधिक आंदोलित क्षेत्र मिलना बहुत कठिन है, मन और मस्तिष्क पूर्णतया आंदोलित रहते हैं उन तीन घंटों में। जितनी ऊष्मा भर जाती होगी, जिस व्यग्रता का साक्षी बनता होगा वह कक्ष, उतनी आतुरता संभवतः उस कक्ष में कभी न जगायी गयी होगी। परीक्षार्थियों पर एक विहंगम दृष्टि डालिये तो अति अव्यवस्थित से लेकर अध्यात्म अवस्थित, सभी प्रकार की भावभंगिमायें दिख जायेंगी। पूरे शरीर में आशीर्वादात्मक चिन्ह लिपटे हुये, टीका, अँगूठी, माला, भभूत। बहुतों के बाल बिखरे हुये, कई अपनी लकी शर्ट या पतलून चढ़ाये, कई नहा धो कर अति व्यवस्थित, सब के सब पिछले वर्ष की पढ़ाई को अंकों में बदलने को तैयार।

ऐसे गरमाये वातावरण में कुछ परमहंसीय मुखमंडल दिख जाते हैं, क्योंकि नकल की पुर्ची छिपी है अतः एक आत्मसंतोष सा झलकता है उनके चेहरे से, पर कहीं अति आत्मविश्वास से किसी को संशय न हो जाये अतः सहजता का आवरण ढकने का प्रयास करते हैं नकलपुर्चीधारी। जिस जिस अंग में पुर्ची की छुअन होती है, वहाँ एक शीतलता सी व्याप्त हो जाती है।

नकल संबधी पूरी तैयारी धरी की धरी रह जाती है यदि प्रश्नपत्र परम्परा से हटकर पूछ लिया जाता है। एक बार पूरा प्रश्नपत्र पढ़ने के बाद समझ आ जाता है कि कितना प्रतिशत पुर्चियों में छिपा हुआ है और वह कितनी देर में कर लिया जायेगा। परीक्षा में भी परीक्षा की घड़ी तब आती है जब नकल की पुर्ची अपने स्थान से निकाल कर उत्तरपुस्तिका के पन्नों के बीच रखनी होती है। निरीक्षक के टहलने का प्रारूप, उसके थोड़ा थककर बाहर जाने का अवसर या उसका आपकी ओर पीठ करने का समय, बस वही अन्तराल पर्याप्त होता है। यदि आपको सबसे पीछे की सीट मिल जाये तो नकल पर नियन्त्रण पूर्ण रहता है।

नियम कड़े होते हैं और बहुत स्थानों में पहले एक घंटे शंकाओं के निवारण हेतु बाहर जाने को नहीं मिलता है। बाथरूम ही सबसे सुरक्षित स्थान रहता है, उपयोग कर ली गयी पुर्चियों को फेंकने का और बहुत अन्दर तक छिपी पुर्चियों को सुविधाजनक स्थान में छिपाने का। वहाँ से वापस आकर उनके चेहरे का संतोष मापा नहीं जा सकता है।

जिनका स्थानीय परिवेश में अधिक अधिकार रहता है, वह नकल के पुर्चियों के कठिन प्रबंधन जैसे रास्ते को नहीं अपनाते हैं। इसमें बहुत श्रम है और निष्कर्ष भगवान भरोसे। उनका प्रथम प्रयास रहता है किसी प्रकार प्रश्नपत्र खिड़की के बाहर फेंक देना, बाहर उन पर जान छिड़कने वाला कोई मित्र उसे किसी तरह पूर्वनिश्चित हल करने वाले के पास ले जाता है, उसे घंटे भर में हल करवाता है और वापस आकर खिड़की से पुनः अन्दर पहुँचाता है। अब परीक्षार्थी का कार्य शेष समय में उसे उतार देने का रहता है। इस विधि में वाह्य परिस्थितियों पर बहुत कुछ निर्भर करता है और निष्कर्ष शेयर बाजारों की तरह बहुत ऊपर या बहुत नीचे आते हैं।

नकल के पूर्ण स्थानीय तरीके भी अपनाये जाते हैं यदि आपको विश्वास हो कि उस कक्ष में कोई इतना योग्य है जो नैया पार करा देगा। आगे पीछे वालों का सहयोग और आवश्यकता पड़ने पर लिखी जा चुकी उत्तरपुस्तिकायें भी याचकों का उद्धार करती हैं। इन छोटे संकर तरीकों से कुछ प्रतिशत ही अंक बढ़ाये जा सकते हैं, उत्तीर्ण होने जैसे महत कार्य के लिये प्रथम दो वर्णित विधियों पर पूरा विश्वास जताते रहे हैं भारत के परीक्षार्थी।

अंग्रेजों के आतंक से तो हमारे वीर क्रांतिकारियों ने हमें मुक्त कर दिया, अंग्रेजी का आतंक हमारे ऊपर अब तक व्याप्त है। जितनी नकलचर्या अंग्रेजी के प्रश्नपत्र में होती है उतनी शेष सभी विषयों में मिलाकर भी नहीं होती होगी, पास होने में अंग्रेजी एक महतबाधा रहती है। इसका प्रमुख कारण है कुछ भी समझ न आना। नकल के लिये कम से कम प्रश्न और उत्तर के बीच संबध स्थापित होना चाहिये। एक परीक्षार्थी महोदय जिन्हें अंग्रेजी का हल प्रश्नपत्र खिड़की से भेजा गया था, वे उसे उतार तक न पाये और अन्त में उत्तरपुस्तिका में ही लगा कर चले आये। एक और घटना में एक परीक्षार्थी की वह पुर्ची निरीक्षक के हाथ लग गयी जिसमें उन्होंने लिख रखा था कि किस विषय की नकलपुर्ची शरीर में कहाँ छिपा रखी है।

क्या अब भी पूछना शेष रहा कि नकल क्षेत्रे युयुत्सवः समवेता मम् बान्धवाः किम् अकुर्वत?

31.3.12

नकल की तैयारी

जब युवा मित्र निश्चय कर चुके थे कि नकल पूर्णतया न्यायसंगत और धर्मसंगत है तो उन्हें पढ़ने के लिये उकसाने का तथा कोई महत्वपूर्ण अध्याय पढ़ा देने का अर्थ शेष नहीं रहा था। जब वर्ष भर कुछ नहीं पढ़ा तो अन्त के दो दिन पढ़ने की उत्पादकता से कहीं अधिक प्रभावी होती है, नकल की पर्ची बनाने में लगे श्रम की उत्पादकता। फिर भी एक बार कुछ पाठ्यक्रम समझाने का प्रयास किया पर आँखों में शून्य और ग्रहणीय-घट को उल्टा पाकर हमारा भी उत्साह थक चला और लगने लगा कि उनके लिये नकल ही एक मार्ग बचा है, वही उनकी मुक्ति का एकमेव उपाय है।

प्राचीन काल में जब शूरवीर युद्ध में जाते होंगे तो शत्रुपक्ष की संभावित रणनीतियों पर विशद चर्चा होती होगी। हर रणनीति का करारा उत्तर नियत किया जाता होगा और मन में विजय के अतिरिक्त कोई और भाव पनपता भी न होगा। परीक्षा के पहले संभावित प्रश्न और उसके उत्तर नकल की पुर्चियों में उतारने का कार्य प्राथमिक था। पुर्चियों की संख्या बहुत अधिक होने से परीक्षा के समय उनका स्थान याद रखने में और किसी उड़नदस्ते के आने पर उन्हें छिपाये रखने में बहुत कठिनाई होती है। यदि वीर के पास अधिक अस्त्र शस्त्र रहेंगे तो उससे गति बाधित होने की संभावना रहती है, इसी सिद्धांत के आधार पर अधिक पुर्चियों का विचार त्याग दिया गया।

कम पुर्चियों में अधिक सामग्री डालने का उपक्रम नकल को एक शोध का विषय बना देता है। पहले तो छाँट कर केवल महत्वपूर्ण विषयों को एकत्र किया जाता है, उसमें से जो याद किया जा सकता है उसे छोड़ देने के बाद शेष सामग्री को नियत पुर्चियों में इतना छोटा छोटा लिखना होता है कि गागर में सागर की कहावत भी तुच्छ सी लगने लगे। लगता तो यह भी है कि चावल के दाने पर हनुमान चालीसा लिखने का विचार और कुशलता ऐसे ही गाढ़े समय में विकसित हुयी होगी। परीक्षा का भय दूर करने के लिये हनुमान चालीसा का पाठ और आराध्य को कार्य की सफलता के पश्चात अपने युद्ध कौशल की कोई भेंट चढ़ाने के विचार ने भक्तों को चावल के दाने पर हनुमान चालीसा लिखने को प्रेरित किया होगा।

दिन के समय पुर्ची बनाने में किसी के द्वारा पकड़े जाने का भय था, पिताजी ने पकड़ लिया तो दो बार पिटाई निश्चित थी, एक तो परीक्षा के पहले और दूसरी परीक्षा के बाद। इस महत्वपूर्ण कार्य के लिये रात का समय निश्चय किया गया, उस समय न केवल काम निर्विघ्न सम्पन्न हो जायेगा वरन सबको लगेगा कि बच्चे पढ़ाई में जी जान से लगे हैं। हमारा रात्रि जागरण तय था और युवा के पिता को भी लग रहा था कि हम उनके बच्चे को उत्तीर्ण कराने में अपना समुचित योगदान देकर अपने पड़ोसी धर्म का निर्वाह कर रहे हैं।

रात गहराती गयी, पुर्चियों की संख्या बढ़ती गयी। हमने भी पहले ही कह दिया था कि हम उत्तर आदि बता देंगे पर पुर्चियों को हाथ भी नहीं लगायेंगे। जिस मनोयोग से रात में पुर्चियाँ बनायी गयीं, उतना शोध और श्रम यदि चन्द्रमा में पहुँचने के लिये किया जाता तो हम १९४८ में ही वह सफलता अर्जित कर चुके होते। एक तकनीक जिसका पता चलने पर हमारा सर उनके सामने सम्मान से झुक गया, वह उस पूरे प्रकरण में दूरदर्शिता का उत्कृष्टतम उदाहरण था। एक नियम था कि नकल करते समय पकड़े जाने की स्थिति में यदि पुर्ची निरीक्षक के हाथ लग जाती है तो उसे उत्तरपुस्तिका के साथ नत्थी कर दिया जाता है और कॉपी छीन ली जाती है, तब फेल होना निश्चित है। उस स्थिति से भी पुर्ची फेंककर या निगल कर बचा जा सकता है। पुर्ची निगलने की स्थिति में कागज तो अधिक हानि नहीं करेगा पर स्याही अहित कर सकती थी। एक विशेष स्याही का प्रयोग किया गया था जो पूर्णतया प्राकृतिक थी, शरीर में घुलनशील और संभवतः पौष्टिक भी।

अब समस्या थी कि पुर्चियों को कहाँ छिपाया जाये, किस तरह के कपड़ों में अधिकाधिक पुर्चियाँ छिपायी जा सकती हैं, किन स्थानों पर हाथ डालने से निरीक्षक भी हिचकते हैं। यह एक गहन विषय था और इस पर बुद्धि से अधिक अनुभव को महत्व दिया जाता है। हमें सोने की जल्दी थी और इस विषय में हमारी योग्यता अत्यन्त सीमित थी अतः हम वहाँ से उठकर आने लगे पर एक रोचक तथ्य सुनकर रुक गये। बात चल रही थी कि किस तरह गर्मी में अधिक से अधिक कपड़े पहन कर जाया जाये, अधिक कपड़ों में पुर्चियाँ छिपाने में सुविधा रहती है। वर्षभर टीशर्ट और सैण्डल पहन कर जाने वाले जब पूरे बाँह की शर्ट और जूते मोजे पहन कर परीक्षा देने जाने लगें तो समझ लीजिये कि परीक्षा की तैयारी अत्यन्त गम्भीरता से चल रही है।

आने वाली सुबह निर्णय की सुबह थी, पर हमारे युवा मित्र भी पूरी तरह तैयार थे।

28.3.12

नकल का अधिकार

'भैया, पास न भयेन तो बप्पा बहुतै मारी' अर्थ था कि भैया, यदि परीक्षा में पास न हो पाये तो पिताजी बहुत पिटायी करेंगे। १८ साल का युवा, कक्षा १२, मार्च का महीना और आँखों का भय शत प्रतिशत प्राकृतिक। नाम का अधिक महत्व नहीं है क्योंकि आप मस्तिष्क पर थोड़ा सा भी जोर डालेंगे तो पड़ोस के किसी न किसी युवा का नाम आपके मन में कौंध जायेगा। पिता क्यों पीटेगें, क्योंकि उनका यह दृढ़ विश्वास है कि विद्यालय जाने के नाम पर लड़के मटरगस्ती करते रहते हैं क्योंकि पढ़ाई और अनुशासन रहा ही नहीं, कितना अच्छा होता कि लड़का घर में खेती आदि में पिताजी का हाथ बटाता।

लड़का भी क्या करे, परिश्रम तो बहुत किया है उसने। अब कुछ विषय ऐसे हैं जो समझ में आते ही नहीं हैं। अध्यापक ने वर्षभर कुछ पढ़ाया ही नहीं है, जब स्थानीय परीक्षा होती थी तो जुगत लगाकर पास कर दिया जाता था, बोर्ड की परीक्षाओं में पेपर बाहर वाले ही बनाते हैं और जाँचते भी बाहर ही हैं। यदि जो आता है, वह लिख दिया तो फेल होना तय है। फेल हो गये तो पिताजी को अपनी बात सिद्ध करने का अवसर मिल जायेगा और अगले साल से खेती करनी पड़ेगी।

किसी रोमांचक फिल्म से कम नहीं है, उस युवा की व्यथा कथा। जिन्हें हिन्दी फिल्में देखने का समुचित अनुभव है, उन्हें सुखान्त की आशा अन्त तक बँधी रहती है और बस एक बार दर्शक के मन में यह घर कर जाये कि पात्र निर्दोष है तो सुखान्त के लिये पात्र कुछ भी कर डाले, वह क्षम्य होता है।

अब एक ओर जीवन भर खेतों में खटना, वहीं दूसरी ओर थोड़ी बहुत नकल कर पास हो जाना और कालेज इत्यादि में नगरीय जीवन का आनन्द उठाना, युवा को निर्णय लेने में कोई कठिनाई नहीं हो रही थी। ऐसे निर्णयों को सहारा देने के लिये मन दौड़ा दौड़ा आता है, पूरी की पूरी तर्क श्रंखला के साथ।

अब देखिये कुछ दिन पहले तक स्वकेन्द्र परीक्षा होती थी अर्थात अपने ही विद्यालयों में बोर्ड की परीक्षा। जहाँ पूरे विद्यालय की प्रतिष्ठा दाँव पर लगी हो वहाँ पर छात्रों को येन केन प्रकारेण उत्तीर्ण कराना तो बनता है। कैसे भी हो बिना किसी अतिरिक्त प्रयास के सभी छात्र उत्तीर्ण हो जाते थे, ससम्मान की आस किसी को नहीं रहती थी क्योंकि सम्मान तो पहले ही गिरवी रखा जा चुका होता था। पता नहीं किस अधिकारी का निर्णय था कि परकेन्द्र परीक्षा ली जाये। किसी प्रतिद्वन्दी विद्यालय में जाकर सुविधानुसार प्रश्नपत्र हल करना तो दूर, सर हिलाना भी संभव नहीं रहता था। जहाँ कमरे में एक निरीक्षक होता था, वहाँ दो दो लग जाते थे। पता नहीं बिना पढ़े बच्चों को इस तरह से सताने में ईश्वर उन अध्यापकों को क्या आनन्द देता होगा।

स्वकेन्द्र हो या परकेन्द्र, नकल तो करनी आवश्यक ही थी। जब नकल न कर के पास होना सर्वथा असम्भव हो, तो नकल कर के पास होने का प्रयास तो किया ही जा सकता था। पकड़े जाने पर अनुत्तीर्ण कर दिये जाते हैं, पर बचने पर उत्तीर्ण होने की संभावना थी। प्रायिकता के इस सिद्धान्त पर और प्रयास सफल न होने पर भी अनुत्तीर्ण ही होने के निष्कर्षों ने नकल को दशकों तक छात्रों के बीच जीवन्त और लोकप्रिय बनाये रखा।

इस सर्वजनहिताय सिद्धान्त को तो तब झटका लगा था जब किसी मंत्री को छात्रों का यह सुख देखा नहीं गया। जो कार्य वर्ष भर की पढ़ाई करने में अक्षम थी, वह वर्षान्त की नकल करा देती थी। एक नकल अध्यादेश लाया गया जिसमें नकल करते छात्रों को सीधे जेल भेजे जाने का प्रावधान था। कितना बड़ा अन्याय, जिस अपराध के लिये पूरे शिक्षा तन्त्र को कटघरे में खड़ा किया जाना चाहिये, उसके लिये एक निरीह से छात्र को दण्ड देने के प्रावधान रखा गया। एक दो वर्ष पूरी युवाशक्ति सहमी सहमी रही, उत्तीर्ण छात्रों का प्रतिशत ३० के भी नीचे चला गया, घोर कलियुग, दो तिहाई युवाशक्ति नकारा। प्रतिक्रिया स्वाभाविक थी, नयी सरकार आयीं, छात्रों को उनका मौलिक अधिकार ससम्मान वापस कर दिया गया।

हमारे होनहार पात्र के लिये अब प्रश्न यह नहीं था कि नकल करना उचित है कि अनुचित या नकल करने का अवसर मिलेगा कि नहीं, प्रश्न इस बात का था कि नकल की किन विधियों को प्रयोग में लाकर उत्तीर्ण हुआ जा सकता था और वह भी, कम से कम प्रयास में, श्रम को भी सोच समझ कर बहाने का दायित्व जो था उन पर। या कहें कि क्या जुगत लगाने से नकल के लिये बनायी जाने वाली पुर्चियों की संख्या न्यूनतम हो और उसमें किस तरह अधिकतम सामग्री डाली जा सके।

अब कहीं जाकर हमको समझ में आया कि हमसे किस प्रकार की सहायता की अपेक्षा की जा रही थी।

24.3.12

उपलब्धि रही यह जीवन की

रातें लम्बी, दिन छोटे हैं, हम व्यथा बनाये ढोते हैं,
रातों की काली स्याही में, हम उजले दिन भी खोते हैं।
जब आशा बन उद्गार जगी, तब रोक वृत्ति चिन्तित मन की,
अपने ऊपर कुछ देर हँसा, उपलब्धि रही यह जीवन की ।।१।।

आदर्श-लता हम बोते हैं, श्रम, समय तिरोहित होते हैं,
पूर्णाहुति में सब कुछ अर्पित, लखते अतीत को, रोते हैं।
जब सुनकर चीखें पीर भरी, तब त्याग क्षुधा दावानल सी,
आदर्शों ने उपवास रखा, उपलब्धि रही यह जीवन की ।।२।।

अति उत्साहित चिन्तन मन का, जीवट था, गर्व उमड़ता था,
पा कोई समस्या कैसी भी, बन प्रबल विरोधी भिड़ता था।
जब लड़ने की इच्छा थकती, तब छोड़ पिपासा दंभ भरी,
उद्वेगों को चुपचाप सहा, उपलब्धि रही यह जीवन की ।।३।।

हम चढ़कर ऊँचे पर्वत पर, निश्चय पायें सम्मान प्रखर,
यश-सिन्धु, बिन्दु बन मिल जाते, जीवन आहुतियाँ दे देकर।
तन, मन, समर्थ हो जितना भी, हो जीवन श्रम, क्रम उतना ही,
मैं अपनी क्षमता जान सका, उपलब्धि रही यह जीवन की ।।४।।

21.3.12

होली के उन्माद में नाचना

नृत्य और संगीत, कहते हैं कि स्वर्ग की एक भेंट है, हम पृथ्वीवासियों के लिये। स्वर्ग में हर पग नृत्य है और हर बोल संगीत। कई विधायें हैं, संस्कृतियों के प्रभाव हैं, शास्त्रीय, आधुनिक, स्थानीय लोकगीत व लोकनृत्य। हर व्यक्ति किसी न किसी तरह से नृत्य और गीत से जुड़ा हुआ है। गाना अधिक व्यापक है, घर में, स्नान करते समय, टहलते हुये, पूजा करने में, खाना बनाते बनाते, हम सब कुछ न कुछ गा लेते हैं, गुनगुना लेते हैं। नाचना थोड़ा कम हो पाता है, अब आप राह चलते नाच तो नहीं सकते हैं।

जिनके पास समय है, साथ है और धन भी है, वे डिस्को आदि में जाकर अपना नृत्य-कौशल दिखा आते हैं। हम जैसे सामान्य जीवनशैली धारकों के लिये केवल दो ही अवसर आते हैं, नाचने के। एक तो किसी निकटस्थ के विवाह में या होली में। होली वर्ष में एक बार ही आती है और सारे निकटस्थों के विवाह धीरे धीरे होते रहने से नाच पाने का अवसर कम ही मिल पाता है। जहाँ पर लोक संस्कृतियाँ अभी भी जीवित हैं और किसी न किसी नृत्य शैली से संबद्ध हैं, वहाँ पर नाचने को समुचित अवसर मिलता रहता है।

प्रेम के विशेषज्ञों की माने तो, नृत्य हमारे गुणसूत्रों में आदिमकाल से विद्यमान है, एक मानसिक उथलपुथल के रूप में। वह उथलपुथल रह रहकर अपना निरूपण ढूढ़ती है, आन्तरिक विश्रंखलता नृत्य को सर्वश्रेष्ठ माध्यम मानती है। किसी को विवाह में नाचते हुये ध्यान से देखिये, ऐसा लगता है कि ऊर्जा का अस्त व्यस्त उफान एक एक कर सभी अंगों से बाहर आने का प्रयास कर रहा हो। आप अपना वीडियो स्वयं देखिये, लगेगा कोई और व्यक्ति है। नीत्ज़े कहते हैं कि आपको यदि नृत्य में बहुत अच्छा करना है तो मन की उथलपुथल का सहारा लीजिये। हिरोमू आराकावा कहते हैं कि इस अव्यवस्थित और उथलपुथल भरे विश्व में सौन्दर्य बिखरा पड़ा है। संभवतः नृत्य उसका प्राकृतिक निरूपण है।

किसी के नृत्य करने का ढंग उसके व्यक्तित्व के बारे में बहुत कुछ कह जाता है। संगीत की बीट के अनुसार पैर थिरकने चाहिये, वह तो आवश्यक ही है और सबके होते भी हैं, पर बाकी शरीर को किस तरह से संगीत में लहराया जाता है, वह हर एक के लिये अलग अलग होता है। कुछ लोगों को प्रेमासित मध्यम नृत्य भाता है, धीरे धीरे, अपने प्रेमी के साथ, लगता है मन के श्रंगार को सुगढ़ दिशा देने का कोमल प्रयास चल रहा है, ऊर्जा से अधिक स्पर्श को प्राथमिकता देता हुआ, अपने और अपनों में खोया हुआ। कई लोगों को लयात्मक नृत्य भाता है, अंगों को भाव प्रधान संवाद करते हुये, लगता है कोई सोचा हुआ संदेश प्रसारित हो रहा हो। मुझे जब भी नाचने का अवसर मिलता है, मेरे लिये वह एक ऊर्जायुक्त घटना होती है। मुझ जैसे बहुतों के लिये नाचने के लिये जब कम समय मिलता हो, तो उसमें मन की उथलपुथल ही निकलना स्वाभाविक है।

नृत्य दैनिक जीवन का हिस्सा नहीं है, होली जैसे उत्सवों में इस तरह के आनन्ददायक क्षण मिलते हैं, उन्मादित हो नृत्य करने के लिये। रंगों के पीछे हमारी कृत्रिमता छिप जाती है, या कहें कि हमारा आदिम स्वरूप बाहर आ जाता है, उपाधियों के आवरण से परे, अपने मूल स्वरूप में सराबोर, होली के उन्माद में। मित्रों का साथ, बच्चों का उत्साह, ऊर्जा से अभिभूत वातावरण, यदि आप नाच न उठें तो आपको स्वयं से कुछ गहन प्रश्न करने पड़ेंगे। कोई होली ऐसी न बीती होगी, जब जी भर कर नाचे न हों, थककर चूर न हो गये हों, दोपहर में निढाल होकर सोये न हों, शाम के मित्रों के गाना न गाया हो।

जब तक पढ़ते थे, होली का आनन्द परीक्षाओं के पहले मन का गुबार निकालने का साधन रहता था, अब नौकरी में मार्च महीने में लक्ष्य प्राप्ति की सघनता होली में गुबार निकालने का कारण बनती है। आनन्द बटोरने की व्यग्रता होली को उसका स्वच्छंद स्वरूप दे देती है। होली को सदियों से आनन्द का आशीर्वाद मिला है, होली को हमारे आदिम भाव उभारने का आशीर्वाद मिला है, होली को आनन्द में छोटे छोटे मतभेद स्वाहा कर देने का आशीर्वाद मिला हुआ है। यदि आपने जी भर कर होली के आशीर्वाद का लाभ नहीं उठाया तो अगले वर्ष तक पुनः प्रतीक्षा करनी पड़ेगी।

हम तो जी भर कर नाचे, सबके साथ। यदि आप इस वर्ष संकोच में रहे हों तो अगली बार हमारे घर में आकर होली खेलें, जी भर कर नाचेंगे, और चीख कर कहेंगे, होली है।

17.3.12

आज जी भर देख लेते

हम हृदय का उमड़ता आवेग कुछ पल रोक लेते,
समय यदि कुछ ठहर जाता, आज जी भर देख लेते।

तुम न ऐसे मुस्कराती, सकपका पलकें झपाती,
ना फुलाकर गाल अपने, सलोनी सूरत बनाती।
थे गये रम,
क्या करें हम,
यूँ ही गुपचुप बह गये थे,
आज जी भर देख लेते।१।

छिपा हाथों बीच आँखें, ना मुझे यूँ देख जाती,
सर झुकाकर तुम न केशों के किनारे मुँह छिपाती।
तुम हृदय में,
इसी लय में,
और कितना सह गये थे,
आज जी भर देख लेते।२।

तुम न ऐसे खिलखिलाती, ना मेरे मन को लुभाती,
कुछ बताना चाहकर भी, तुम न यूँ मन को छिपाती।
नहीं हाँ की,
बात मन की,
बिन कहे ही कह गये थे,
आज जी भर देख लेते।३।

ना एकाकी इस हृदय में, याद अपनी छोड़ जाती,
बढ़ी जाती जीवनी यूँ, बीच पथ न मोड़ जाती।
जो था कहना,
और कितना,
बोलने से रह गये थे,
आज जी भर देख लेते।४।

(काश, कुछ यात्रायें थोड़ी और लम्बी होतीं। १४ घंटे की रेलयात्रा, बीच में ढेरों अशाब्दिक संवाद और निष्कर्ष ये उद्गार। बस अभिषेक की पीड़ासित रेलयात्राओं से सहमत न हुआ, तो यह बताना पड़ा। विवाह के पहले की कविता है। तब बस मन को लिखना आता था, कहना तो अभी तक नहीं सीख पाये।)

14.3.12

अपूर्ण एक पूर्ण शब्द है

बचपन और युवावस्था में एक बीमारी बहुधा सबको ही होती है कि बड़ा खाली खाली सा लगता है। एक के बाद एक कोई न कोई कार्य मिलते रहना चाहिये, व्यस्तता बनी रहनी चाहिये, नहीं तो एक अजीब सी उलझन होने लगती है। कुछ अपूर्ण सा लगता है, उसे भर देने को मन उद्धत होने लगता है। हर कर्म का प्रयास परिस्थितियों को अपूर्णता से पूर्णता की ओर ले जाने के लिये होने लगता है। जितनी अधिक ऊर्जा पास रहती है उतनी अधिक अपूर्णता दिखने लगती है जगत में। हर समय कितना कुछ करने के लिये रहता है जीवन में, समय और ऊर्जा के आभाव में कई कार्य ऐसे होते हैं जिन्हे हम करना चाह कर भी नहीं कर पाते हैं। जैसे जैसे जीवन बढ़ता है, ऊर्जा कम होने लगती है, कई नियमित कार्य बढ़ जाते हैं। व्यस्त जीवन का प्रथम प्रभाव यह पड़ता है कि जगत उतना अपूर्ण नहीं दिखता है जितना कुछ वर्ष पहले तक दिखता था।

अपूर्णता एक नियत सत्य है, कोई भी ऐसा तत्व नहीं दिखायी पड़ता है जो पूर्ण हो। जब हर वस्तु में अपूर्णता हो तो वह पूर्ण से अधिक पूर्ण हो गयी। हमारे सारे प्रयास उसी दिशा में होते हैं जिस दिशा में हमें संभावना दिखती है। जब तक प्रयास उस संभावना घट को पूर्ण कर पाते हैं, तब तक संभावनाओं के नये नये घट बन चुके होते हैं, पुनः प्रयास, पुनः संभावनायें। एक सतत कर्म है यह। किसी भी क्षेत्र में यदि कभी प्रयास ठहरे हुये नहीं दिखते हैं, तो किसी भी क्षेत्र को पूर्ण नहीं कहा जा सकता है। इस दृष्टि से देखा जाये तो अपूर्णता अपने आप में शाश्वत है, अपने आप में पूर्ण है।

यदि तर्क व दर्शन की दृष्टि से न भी देखा जाये तो भी पूर्णता कहीं नहीं दिखती है, संभावना समझ के साथ साथ बढ़ती रहती है, अपूर्णता संभावना के साथ बढ़ती रहती है, जो आज पूर्णता लिये सी दिख रही है कल वह अपूर्णता लिये हुये सी दिखने लगती है। पूर्णता पाने के लिये किया गया हमारा प्रयास हमें उस दिशा में ले जाता है, जहाँ हमें अपूर्णता और अधिक स्पष्ट रूप से दिखने लगती है।

इस विचार का उद्भव व आरोहण न हुआ होता यदि मैं अपने एक चित्रकार मित्र आलोक से मिलने न पहुँचा होता। दोनों बच्चे चित्रकला से सम्पन्न वातावरण में पहुँच ऊर्जस्वित थे, उनके हाथों में काग़ज़ और पेंसिल थी, उन्हें रेखाओं को खींचने में रस आ रहा था। उस समय कला के लिये साथ में सब कुछ था पर हाथ में समय नहीं था, ट्रेन का समय बढ़ाया नहीं जा सकता था। जितना समय मिला और कला के बारे में बच्चों ने जितना समझा और जाना था, उसके लिये कुछ घंटे पर्याप्त नहीं थे। एक बड़े चित्रकार के सामने चित्र बनाने का अवसर था जिसे बच्चे अपना सर्वश्रेष्ठ प्रयास दे स्वयं को सिद्ध करना चाहते थे। जैसा संभावित था, चित्र पूरे नहीं बन सके। बच्चों ने आलोक को चित्र दिखाये और कहा कि समय नहीं था अतः पूरे नहीं बन पाये।

जब आलोक ने कहा कि मेरे लिये यही पूरा है। बच्चों को बड़ा आश्चर्य हुआ, कहा कि आपको क्यों नहीं लगता कि यह चित्र अधूरा है? आलोक का उत्तर बच्चों के लिये समझ का एक नया अध्याय बनने जा रहा था और मेरे लिये अपूर्णता की पूर्णता। आलोक ने कहा कि मुझे क्या ज्ञात कि तुम्हारी कल्पना में क्या क्या था और तुम क्या क्या बनाना चाहते थे? जो कुछ भी तुमने बनाया वह तो मेरी दृष्टि में पूर्ण है। तुम्हारे द्वारा आधा बना हुआ घर भी पूरा संदेश संप्रेषित करता है। बच्चों के चेहरे खिल गये क्योंकि अभी तक किसी भी अध्यापक ने उन्हें यह ज्ञान नहीं दिया था। उनका प्रयास सदा ही शून्य या पूर्ण के बीच मापा गया था। तथाकथित अपूर्ण कृति में किसी के द्वारा प्रयास की पूर्णता देख पाना उनके लिये सर्वथा नया अनुभव था।

मेरे मन में बहुत दिनों से यह विचार घुमड़ रहा था कि पूर्णता की खोज में हम उन तथ्यों को क्यों नकार देते हैं जिन्हें हम पूर्ण नहीं समझते हैं। आलोक का यह कहना एक आँधी की तरह ज्ञान के सारे कपाट खोल गया। क्या नहीं बना है, उसका चिन्तन कर जो बना हुआ है, उसकी अवहेलना करना कृति के साथ घोर अन्याय है। जीवन में जो नहीं मिल पाया पूर्ण होने के लिये, उसकी व्यग्रता में जो लब्ध है उसे क्यों व्यर्थ करना?

बात सच ही है, अपूर्णता एक भार की तरह आती है, कुछ रिक्त सा लगता है, पूर्णता की ललक हमें सहज नहीं होने देती है। युवावस्था में जो बीमारी ऊर्जा की अधिकता के कारण होती थी, वही बीमारी हमारी ऊर्जा की कमी को अपूर्णता के नैराश्य से जोड़ने लगती है। अनमनापन सा छाने लगता है व्यक्तित्व में, जीवन लगता है, अकारण ही निकला जा रहा है। आलोक की समझ न केवल बच्चों को समझानी होगी वरन हमें भी समझनी होगी, हमारी कर्मशीलता का खण्ड खण्ड अध्याय तभी सतत हो पायेगा तभी पूर्ण हो पायेगा। बिना अपूर्णता को समझे और स्वीकार किये, न तो हम पूर्ण हो पायेंगे और न ही प्रसन्न रह पायेंगे।

औरों के प्रयास इस अपूर्णता के लेकर भले ही व्यग्र रहें पर मेरे लिये अपूर्ण एक पूर्ण शब्द है।

10.3.12

सोझ समझ कर पीना, यह चम्बल का पानी है

जब भूगोल पढ़ना प्रारम्भ किया तब कहीं जाकर समझ में आया कि बचपन में जो भी पानी हमने पिया, वह यमुना का नहीं चम्बल का था। आगरा की यमुना में कुछ जल शेष ही नहीं रखा गया और उसी से बस ६० किमी दक्षिण में धौलपुर और मुरैना के मध्य चम्बल अपने पूरे स्वरूप में बहती है, आगे जाकर इटावा के पास दोनों मिल जाती हैं।

चम्बल अपने पानी से अधिक अपने बीहड़ों के लिये विख्यात है। बीहड़ बने कैसे, इस पर भूगोलविदों को मतभेद हो सकता है पर बीहड़ में कितने डकैतों को आश्रय मिला, उसमें कोई मतभेद नहीं है। बीहड़ों की बनावट ऐसी है कि इमामबाड़ा भी वहाँ आकर भ्रमित हो जाये। १५-२० मीटर ऊँचे अनगिनत टीले, उसमें मकड़ी के जाल की तरह बिछे रास्ते, चलते चलते कब कोई सामने प्रकट हो जाये कुछ पता नहीं। कितनी भी ऊँचाई से खड़े होकर देख ले, किस टीले के पीछे कौन छिपा है, पता ही नहीं चल सकता है। बचपन में भले ही कितनी लुकाछिपी खेली हो आपने, यहाँ आकर आप सब भूल जायेंगे, बागी दशकों से यही खेल पुलिसवालों के साथ खेल रहे हैं यहाँ पर।

कहते हैं कि यह बीहड़ तब बनने प्रारम्भ हुये जब वर्षा का पानी कई मार्गों से हो चम्बल में मिलने आया होगा। शताब्दियों का बहाव पृथ्वी की सतह में मुलायम मिट्टी को हर बार कुरेदता होगा, हर वर्ष थोड़ी थोड़ी खरोंच लगती होगी पृथ्वी को। यदि हर बार के दृश्यों को तेजी से चला कर देखा जाये तो यही लगेगा कि मदमाता पानी बहा जा रहा है, सरल पर्तों को उघाड़ता, अन्याय सा लगता है, कमजोर को अपनी जगह से हटाती शक्ति। बीहड़ों के बीच बने लहराते से रास्तों की गहराई जिस अन्याय को सहने का प्रतीक है, उसी अन्याय को सहने की शक्ति और स्थान प्रदान करता रहा है यह बीहड़।

तो क्या छिपने का उपयुक्त स्थान बागी बनाने में सहायक है? कुछ और गहरे कारण रहे होंगे कि विद्रोहीमना बीहड़ों में आश्रय लेने आये। सामाजिक व्यवस्था में बड़े बड़े छिद्र रहे होंगे जिससे समाज की ऊर्जा बीहड़ों में बहने को बाध्य हुयी होगी। भाई ने भाई को हिस्सा नहीं दिया होगा, किसी निर्बल को सताया गया होगा, प्रशासन की लोलुपता अंग्रेजों की बराबरी करने पर तुली होगी। हर बागी के साथ कोई न कोई नयी कहानी सुनने को मिल जायेगी। पीढ़ियो की वैमनस्यता का बदला आने वाली पीढ़ियों को चुकाना शेष होगा। कुछ न कुछ तो जटिलता रही होगी जो प्रशासन और समाज समय रहते समझ नहीं पाया होगा और विकास के स्थान पर यह स्थान बागियों के लिये विख्यात हो गया।

अन्याय के अध्याय तो भारत के अन्य भागों में भी लिखे गये हैं पर वहाँ पर इतने बागी नहीं हुये जितने चम्बलों के बीहड़ों ने पैदा किये। कुछ ने सह कर रहना सीख लिया, कुछ ने रह कर सहना सीख लिया, पर चम्बल के बीहड़ों ने न कभी अन्याय सहना सीखा, न कभी चैन से रहना सीखा। सहनशीलता का ज्वलनबिन्दु इतना शीघ्र भड़क जाने का कारण कुछ और पता चला।

झाँसी की पोस्टिंग के समय मुरैना और धौलपुर का क्षेत्र मंडल के अन्तर्गत ही था, लगभग उसी समय एक सहपाठी जिलाधिकारी मुरैना के पद पर था। कई बार मुरैना जाना हुआ, रेल से भी और सड़क से भी। चम्बल पुल के पास स्थित बीहड़ के अन्दर लगभग एक किमी जाने का अनुभव भी प्राप्त किया। हर दस कदम पर नया दृश्य दिख जाता था, लगा कहीं कोई बागी छिपा न बैठा हो। यद्यपि स्टेशन मास्टर ने उनकी संभावित अनुपस्थिति के बारे में आश्वस्त कर दिया था, पर जब तक वापस नहीं आ गये हृदय अव्यवस्थित सा धड़कता रहा।

कई बार जाने का अनुभव भी अपर्याप्त था, बीहड़ को समझने के लिये। सामाजिक समस्याओं की समझ भी कभी इतने गहरे निष्कर्ष गढ़ते नहीं देखी गयी। विकास के प्रति प्रशासन की उदासीनता भी विद्रोही प्रत्युत्तरों की ओर इंगित नहीं कर पायी। जब कभी स्मृति में मुरैना आया, कारण जानने का पर्याप्त चिन्तन किया, पर सफलता नहीं मिली। कुछ दिनों पहले एक परिचित पत्रकार से एक बागी(संभवतः मलखान सिंह) का स्वरचित और गाया हुआ ओजपूर्ण गीत सुना तब कहीं जाकर कारण स्पष्ट हुआ। इसी बीच पानसिंह तोमर फिल्म देखकर उस गीत को साझा करने की इच्छा भी बलवती होने लगी। साथ ही साथ यह तथ्य भी सताने लगा है कि जो पानी बीहड़ों में बागी निर्मित करता रहा है, वही पानी हम न जाने कितना पी गये हैं बचपन में, यमुना का समझ कर।

आप तो गीत सुनिये, बस। कहो, हओ...

7.3.12

अम्मा, गूगल और वेलु का पंजाबी ढाबा

रेलवे में निरीक्षण का कार्य अत्यन्त गहन होता है। आवश्यक भी है, यदि आपके संसाधन विस्तृत क्षेत्र में फैले हों। ट्रैक पर लगी एक एक क्लिप पर दैनिक रूप से दृष्टि बनाये रखनी पड़ती है, कई माध्यमों से। दूर स्थित स्टेशनों की कार्य-प्रणाली के बारे में आश्वस्त होने के लिये वहाँ जाकर निरीक्षण करना होता है। चालक और गार्ड, चलती ट्रेन से ही किसी भी असामान्य सी दिखने वाली वस्तुओं पर सतत दृष्टि बनाये रखते हैं और नियन्त्रण कक्ष को सूचित करते रहते हैं। परिचालन संबंधी प्रत्येक सूचना अपने अन्तराल में नियम से प्रेषित होती रहती हैं। आपकी एक यात्रा के पीछे हजारों कर्मचारियों का योगदान होता है।

जब तक मोबाइल जनसामान्य की वस्तु नहीं बना था, निरीक्षण रिपोर्टें विस्तृत होती थीं, कुछ बिन्दु तथ्यात्मक होते थे, कुछ सुधारात्मक। हर एक बिन्दु को गम्भीरता से लेकर उनका निपटान करना रेलवे प्रणाली का आवश्यक विधान है। अब कई कार्य मोबाइल से यथास्थान होने लगे हैं। निरीक्षण रिपोर्टें भले ही विस्तृत न रह गयी हों पर निरीक्षण प्रक्रिया यथावत है।

इसी क्रम में एक ऐसे रेलखण्ड में जाना हुआ जिसमें तीन राज्य कर्नाटक, आन्ध्रप्रदेश और तमिलनाडु पड़ते हैं। निश्चय किया गया कि एक ओर से ट्रेन के इंजन से पूरे ट्रैक का निरीक्षण और वापस आते समय सड़क मार्ग से हर स्टेशन का विस्तृत निरीक्षण किया जायेगा। पटरियों के दोनो ओर प्राकृतिक सौन्दर्य का जो खजाना छिपा है, उसका साक्षात दर्शन रेलवे के चालकों से अच्छा किसी को नहीं होता है। दोनो ओर पहाड़, झील, खेत, जंगल, गाँव, मवेशी, हरियाली, बादल, सूर्योदय और सूर्यास्त, सब के सब अपनी भव्यता में प्रकट होते जाते हैं, आपकी ओर दौड़ लगाते से, पूरी गति से। एक रोचक फिल्म से कम नहीं है, इंजन में चलना।

वापस आते समय सड़क मार्ग मुख्यतः तमिलनाडु में पड़ता है। हर स्टेशन तक सड़क से पहुँचने के लिये लगभग हर प्रकार की सड़क से होकर जाना पड़ता है। सड़क की स्थिति को लेकर मन सदा ही सशंकित रहता है, साथ में उत्तर भारत का अनुभव हो तो संशय बड़ा गहरा होता है। यद्यपि निरीक्षकों को सड़क मार्ग के बारे में समुचित ज्ञान रहता है पर बीच खण्ड में कहीं पहुँच पाने के लिये कई बार भटकना हो जाता है।

एक सुखद आश्चर्य हुआ जब गाँव तक की सड़कों को हाईवे के समस्तरीय पाया। कहा जा सकता है कि यहाँ इतना यातायात नहीं होता होगा और हर वर्ष वर्षा में सड़कें टूटती नहीं होंगी। कुछ भी कारण हो, सड़कों को इस स्तर पर बनाये रखने के लिये उनका प्रारम्भ में ही उच्चतम कोटि की गुणवत्ता से बनना आवश्यक है, ऐसा होने पर संरक्षण स्वतः सरल हो जाता है। स्थानीय निरीक्षक ने बताया कि पूरे तमिलमाडु में स्तरीय सड़कों का बनना, उनका रखरखाव और उनका हर गाँव तक विस्तार मुख्यतः अम्मा की देन है। अम्मा, यह सुश्री जयललिताजी के लिये सम्बोधन है। तमिलनाडु में, स्थानीय निरीक्षक बताते हैं, राजनीति कभी विकास के आड़े नहीं आती है और कोई भी सरकार हो, पिछली सरकार के सारे कार्य पूरे होते हैं। श्री करुणानिधिजी को सभी बड़े नगरों में फ्लाईओवर बनाने का श्रेय जाता है। प्रख्यात मुख्यमंत्री श्री एमजीआरजी को हर गाँव में बिजली पहुँचाने का उत्प्रेरक माना जाता है।

सारी सड़कें एक स्तर की होने के कारण भटकना स्वाभाविक था। राहगीरों से पूछने से जब समुचित राह नहीं मिली तब गूगल मैप से सहायता लेने की विवशता आन पड़ी। गूगल मैप की कागज के मानचित्रों पर एक बढ़त है, गूगल मैप आपकी वर्तमान स्थिति बता देता है जब कि कागज के मानचित्रों में आपको अपनी स्थिति ढूढ़नी पड़ती है। राजमार्गों में जहाँ गूगल मैप की आवश्यकता नहीं होती है वहाँ तो इण्टरनेट मिलता रहता है, पर गावों की तरफ नेटवर्क की डंडियाँ गोल हो जाती हैं। आईफोन पर देखा तो न केवल इण्टरनेट चमक रहा था वरन अपने पूरे तेज में था। यह पहला अनुभव था जब मैं अपने ड्राइवर महोदय को एक एक मोड़ पर निर्देशित कर रहा था। शेष निरीक्षण बिना व्यवधान के शीघ्र सम्पन्न हुआ, सड़कें अच्छी थी, सायं होते होते हम अपने घर में थे, यह बात अलग है कि बंगलोर के यातायात ने एक घंटा स्वाहा कर डाला।

यात्रा हो और ढाबों की बात न हो। यातायात की संभावना अच्छी सड़कों की उपस्थिति में फलने फूलने लगती है। देश के हर राज्य के ड्राइवर यहाँ की सड़कों में ट्रकों से माल ढोते दिख जाते हैं। संभवतः यही कारण होगा कि हमें 'वेलु का पंजाबी ढाबा' दिखायी दे गया। इच्छा तो हुयी कि वेलुजी के ढाबे में बैठकर दाल तड़का और तंदूरी रोटी खायी जाये। पर व्यस्तता अधिक होने के कारण और पेट को प्रयोगों से मुक्त रखते हुये गाड़ी में ही 'दही भात' से संतोष किया। देश में ट्रक ऐसे ही फैले तो पंजाब में 'मन्जीता डोसा सेन्टर' जल्दी ही खुलेगा।

दिन में कितना कुछ, कितनों के रचित विश्व के साथ साक्षात्कार, गतिमय विश्व की सामूहिक उपासना। रात कितनी अकेली, मैं, पूर्ण थकान और गाढ़ी नींद।

3.3.12

परीक्षा की विधियाँ

कुछ लोग होते हैं जिन्हें परीक्षा का तनिक भी भय नहीं होता है, अंक भले ही कितने आयें। मार्च-अप्रैल की नीरवता में डूबी गर्म दुपहरियों में यही लोग रोचकता बनाये रखते हैं। हमारे एक चचेरे भाई को बड़ी संवेदना रहती थी हम सबसे, पहले तो ये बताते थे कि कौन सा प्रश्न फँस रहा है, जब उससे भी संतोष न होता तो एक पूरा का पूरा संभावित प्रश्नपत्र बनाते और पकड़ा देते। उनका दावा रहता था कि कम से कम ८० प्रतिशत उससे ही फँसेगा। कौन से प्रश्न फँसने वाले हैं उसके लिये पिछले प्रश्नपत्रों की विवेचना और अध्यापक की मनःस्थिति, इन दोनों का सहारा विद्यार्थी कई दशकों से ले रहे हैं। कई दयालु अध्यापक पाठ्यपुस्तक के ही प्रश्न उतार देते हैं, कई अतिदयालु अध्यापक उदाहरणों को ही प्रश्न बना देते हैं और कई महादयालु अध्यापक पिछले प्रश्नपत्र में से ही अधिकतर प्रश्न उतार देते थे। अध्यापक और छात्र के संबंध में दया आना स्वाभाविक है, दयालु संस्कृति बनाये जो रखनी है।

अपनी इसी रुचि के कारण हमारे चचेरे भाई तो बहुत बड़े प्रोफेसर हो गये, उन्हें विद्यार्थियों के ये हथकण्डे भलीभाँति ज्ञात होंगे और निश्चय ही वह अपना प्रश्नपत्र थोड़ा हटकर बनाते होंगे। अध्यापकों को यह तथ्य ज्ञात है कि विद्यार्थी पाठ्यक्रम विमर्श से अधिक प्रश्नपत्र विमर्श करते हैं, जितना समय सीखने में लगना चाहिये उससे कहीं अधिक यह सिद्ध करने में लगता है कि कितना सीखा। अध्यापक सहज चिंतक होते हैं, चिंतक प्रयोगधर्मी होते हैं, यह बात अलग है कि विद्यालयों में उन्हें इन प्रयोगों की छूट नहीं मिलती है। बड़े संस्थानों में स्थिति थोड़ी बेहतर हैं और अध्यापकों को परीक्षा की विधियाँ निश्चित करने की स्वतन्त्रता रहती है। उनके लिये भी यही दो प्रश्न मन में रहते होंगे कि परीक्षा की विधि ऐसी हो जिससे विद्यार्थी सारा पाठ्यक्रम पढ़ने को बाध्य हो, और इस तरह पढ़ें जिससे विषय स्पष्ट रूप से उन्हें समझ आये और अन्ततः लम्बे समय तक मस्तिष्क में बना रहे।

पढ़ाई में नियमितता से अधिक अचूक अस्त्र कुछ भी नहीं है। यदि नियमतता है तो बड़ा और कठिन पाठ्यक्रम भी ग्राह्य हो जाता है। औचक परीक्षा एक ऐसी विधि है जो विद्यार्थी को नियमित रहने को बाध्य कर देती है, नित्य कक्षा में आना, विषय को समझना और गृहकार्य ढंग से करना। कक्षा में अन्तिम २० मिनट में वर्तमान विषय से संबंधित एक प्रश्न ही पर्याप्त होता है, इसके लिये। आईआईटी में जिन विषयों में औचक परीक्षा की विधि अपनायी गयी थी, वे विषय अभी भी स्पष्ट हैं मनसपटल पर। प्रबन्धन संस्थानों में नियमितता बनाये रखने के लिये केस स्टडी का सहारा लिया जाता है। वास्तविक जीवन की एक घटना को पढ़ने, समझने और पढ़े हुये सिद्धान्त प्रयुक्त करने को कहा जाता है, उस पर चर्चा होती है और अंक निर्धारित किये जाते हैं।

विषय का गहन ज्ञान परखने के लिये कई प्रोफेसर एक एक प्रश्न सभी विद्यार्थियों को पकड़ा देते हैं, साथ में देते हैं एक दिन या एक सप्ताह का समय। ये प्रश्न बहुधा शोध की विषय से संबद्ध होते हैं और इनका कोई एक उत्तर नहीं होता है। विषय की समझ जितनी अधिक होती है, आप उतना ही अधिक दूर तक उस प्रश्न को सुलझा सकते हैं। इसके लिये विद्यार्थियों की संख्या कम होनी चाहिये क्योंकि एक छोटे विषय से संबद्ध शोधगत प्रश्न बहुत अधिक नहीं होते हैं। दूसरी विधि बड़े प्रोजेक्ट की है जिसमें विद्यार्थी को कई पुस्तकों से पढ़कर शोध करना पड़ता है। जब कई पुस्तकों से पढ़कर लिखना होता है तो विषय अपने आप मस्तिष्क में उतरता जाता है। इन दो विधियों में परीक्षा की व्यग्रता के स्थान पर ज्ञान का विस्तार होता है, जो शिक्षा का प्राथमिक उद्देश्य भी है।

जहाँ पर परीक्षा लेना आवश्यक है, वहाँ भी प्रोफेसर सार्थक प्रयोग करते दिख जाते हैं। परीक्षा कक्षों में किताब ले जाने की छूट इसका एक उदाहरण है। जब वास्तविक जीवन में पुस्तकों और संदर्भों से सहायता लेने की छूट रहती है तो परीक्षा के समय उस सुविधा से क्यों वंचित रहा जाये। पुस्तकों को ले जाने की छूट से तैयारी करते समय विषय के मौलिक सिद्धान्तों को ढंग से समझने का समय मिलता है क्योंकि केवल याद रखने वाली चीजें तो कभी भी पुस्तक से देखी जा सकती हैं। आवश्यक पर पूरा ध्यान और अनावश्यक से पूरी मुक्ति इस विधि की विशेषता है। एक दूसरी विधि में प्रोफेसर ने अन्तिम के ५ मिनट एक दूसरे से बात करने की पूरी छूट दे दी थी। इस समय में एक दूसरे से बात करके छोटी भूलों को सुधारने का पूरा समय मिल जाता है पर पूरा उत्तर पुनः लिखने का समय नहीं मिलता है। यह छूट कई अवसरों पर बहुत काम की सिद्ध होती है।

एक विधि, जिसने मुझे सर्वाधिक प्रभावित किया और जिसमें विद्यार्थी और अध्यापक के उद्देश्यों को पूर्ण निष्कर्ष मिलते हैं। अध्यापक का उद्देश्य होता है कि विद्यार्थी पूरा विषय ढंग से पढ़े, विद्यार्थी का उद्देश्य होता है कि उसे अधिकतम अंक मिलें। अध्यापक ने निश्चय किया कि वह आपसे बस १० मिनट के लिये बात करेंगे, ३ प्रश्न पूछेंगे, उन अध्यायों पर जिन पर आप स्वयं को सहज अनुभव करते हों। लिखित से अधिक प्रभावी होती है मौखिक परीक्षा। १० मिनट के साक्षात्कार के बाद आपको आपके ग्रेड बता दिये जायेंगे। यदि आप संतुष्ट न हों तो आपको थोड़ी और तैयारी के बाद पुनः आने को कहा जायेगा और पुनः वही प्रक्रिया, और यह तब तक होता रहेगा जब तक विद्यार्थी अपने ग्रेड से संतुष्ट न हो जाये। लगभग एक तिहाई ने एक बार में ही 'ए' ग्रेड प्राप्त किया, शेष दो तिहाई को दो या अधिक बार यह प्रक्रिया अपनानी पड़ी। एक विद्यार्थी ने ५ बार साक्षात्कार दिया और अन्ततः 'ए' लाया। सबको 'ए' मिला और सबने उसके लिये यथोचित श्रम लगाया। यद्यपि प्रशासन को यह रास नहीं आया पर उसके पास भी किसी का भी 'ए' ग्रेड नकारने का कारण भी नहीं था, सबको वह विषय ढंग से आता था।

छोटी कक्षाओं के लिये अंक के स्थान पर ग्रेड देना, परीक्षा की व्यग्रता घटाने का एक अच्छा प्रयास है। विद्यालयों में कक्षाओं के अतिरिक्त वास्तविक जीवन से भी सीखने पर यथोचित बल दिया जा रहा है। बाहर घूमने ले जाना, खिलौने के माध्यम से समझाना और अन्य रोचक विधियों से सिखाना, ये सब प्रयोगधर्मिता के सशक्त उदाहरण हैं। इसी रोचकता के बीच बच्चे का स्तर परख लिया जाये और उसे आगे बढ़ने दिया जाये। जब परीक्षा का बोझ कम होगा और मस्तिष्क में कुछ स्थान खाली रहेगा, तभी सृजनता और नवीनता व्यक्तित्व का निर्माण कर पायेंगी।

परीक्षायें भार न लगें, ज्ञान का उपहार लगें।

29.2.12

आस धुआँ, हर साँस धुआँ

रघुबीरजी के लिये कूड़े के ढेर का प्रकरण अन्ततः एक चिरकालिक शान्ति लाया, यद्यपि इसके लिये उन्हें नगर निगम के अधिकारी के साथ मिलकर सारा भ्रम दूर करना पड़ा। अपने प्रयासों से रघुबीरजी एक जागरूक नागरिक के रूप में पहचान बना चुके थे, लोगों को उन पर विश्वास बढ़ चला था और पर्यावरण संबंधी किसी भी नये विषय में पहल करने के लिये अधिकृत थे।

मानसून अतृप्त धरा को संतृप्त कर के चला गया, कृतज्ञ धरती ने भी फल फूल दिये, धनधान्य दिया। जीवजगत की जठराग्नि प्रचंड ठंड में अपने पूरे आयाम में रहती है, प्रकृति जब खाने को देती है तो भूख भी देती है। शरीर को जीवन रस मिलता रहता है, स्वास्थ्य बढ़ने लगता है, मन भी प्रसन्न हो जाता है। शरीर और प्रकृति का बसन्त साथ साथ ही आ जाता है। रघुबीरजी प्रकृति के इस चक्रीय कालखण्ड को सानन्द बिता रहे थे, अपने व्यक्तिगत और व्यावसायिक कार्य निपटा रहे थे, तभी पतझड़ आ पहुँचा।

प्राकृतिक परिवेश में प्रकृति के कार्य स्पष्ट रूप से दिखायी नहीं पड़ते हैं, स्वतः हो जाते हैं, पता ही नहीं चलते हैं। प्राकृतिक परिवेश की अनुपस्थिति हमें प्राकृतिक प्रक्रियायें समझने को विवश कर देती है। पतझड़ गावों में भी आता है, पेड़ों से पत्ते झड़ते हैं, धरती से पोषित पत्ते धीरे धीरे धरती में विलीन हो जाते हैं, खाद बनकर, आगामी पत्तों को पोषित करने के लिये। नगरों में यह संभव नहीं हो पाता है, एक तो पेड़ ही कम हो चले हैं। दूसरा जब पत्ते झड़कर कांक्रीट या रोड पर गिरते हैं तो अपना निर्वाण बाधित सा पाने लगते हैं। नगरीय जीवन का यह पक्ष एक नयी समस्या लाता है, पत्तों को समेटने की समस्या और यदि उन्हें तुरन्त न समेटा जाये तो वह कूड़े के रूप में नगर में बिखर जाते हैं, यत्र तत्र सर्वत्र।

नगरनिगम होता ही है, नगरीकरण से उत्पन्न समस्याओं का निवारण करने के लिये। एक तन्त्र ही है कोई मन्त्र नहीं कि सारे कार्य पलक झपकाते ही कर डाले। कहने को तो पतझड़ के समय पत्ते समेट कर ले जाने का कार्य नियमित रूप से होना चाहिये, नगरनिगम साप्ताहिक ही कर दे तब भी कृतज्ञ बने रहना चाहिये। नगरनिगम की उदासीनता ने रघुबीरजी के पड़ोसियों को एक नयी विधि अपनाने को विवश कर दिया। आसपास की सोसाइटियों के कुछ उत्साही युवकों ने सफाई कर्मचारियों द्वारा एकत्र इन पत्तों को आग लगा देने का उपाय निकाल लिया। दिन के समय सड़कों पर आवागमन बना रहता है अतः लोगों ने रात में सुलगाने का क्रम बना लिया।

आत्मिक उन्नति और प्राणों में आयाम बनाये रखने के लिये रघुबीरजी अपनी बालकनी में प्राणायाम करते हैं, सुबह सुबह की शुद्ध ऑक्सीजन पूरे शरीर को ऊर्जामय कर देती है। पिछले दो दिनों से प्राणायाम निष्प्रभावी हो रहा था, कारण था फेफड़ों में पहुँची धुँयें की पर्याप्त मात्रा। गन्ध और दृष्टि से समझने का प्रयास किया तो कारण स्पष्ट समझ में आ गया। लगभग सौ मीटर की दूरी पर पत्तों की आग रात भर से सुलग रही थी। धुयें का यह गुबार धीरे धीरे स्मृति में घनीभूत होने लगा। ऐसा नहीं कि यह पतझड़ की ही समस्या थी, धुयें के दो और स्रोत रघुबीरजी को याद आ गये।

जाड़ों के समय भी उसी ओर से सुबह सुबह कुछ सुलगने की गंध आती थी। यद्यपि उस समय बालकनी में प्राणायाम न करने से वह धुआँ रघुबीर जी को अधिक प्रभावित नहीं करता था, पर परिवेश में जले टायर और प्लास्टिक की गंध से वातावरण बुरी तरह से प्रदूषित हो जाता था। उसका कारण भी उन्हें समझ आ गया था, आसपास की सोसाइटियों और एटीएम के चौकीदारों को रात में तापने के लिये जो भी मिल जाये, उसे सुलगाने की आदत थी। अब जीवन किसे प्रिय नहीं होता पर जब विकल्प ठंड या प्रदूषण में से किसी एक से मरने का हो, तो सब प्रदूषण करने बैठ जायेंगे, इस पर कोई आश्चर्य भी नहीं होना चाहिये।

यदि ६ ऋतुओं में केवल दो ही धूम्रदोष से ग्रसित होतीं तो भी एक संतोष किया जा सकता था, भाग्य का खेल मानकर भूला जा सकता था। एक और धुयें की गन्ध थी जो मानसून के महीनों को छोड़ वर्ष पर्यन्त आती थी, और वह भी रात में। धीरे धीरे उसका भी कारण खोजा रघुबीरजी ने। वह घर से निकले कूड़े को सफाई के ठेकेदारों के द्वारा वहीं पर एकत्र कर जला देने के कारण आती थी, यद्यपि नगरनिगम के ठेके में ठेकेदारों को धन उस कूड़े को नगर की सीमाओं से बाहर फेकने का मिलता होगा। लोभवश ठेकेदार स्थानीय निवासियों को सड़ा सा धुआँ पिला रहे थे, वह भी लगभग नियमित।

समस्यायें गम्भीर थीं, स्वयं के प्राणायाम के अतिरिक्त, प्रकृति के प्राणों की रक्षा का दायित्व था रघुबीरजी पर। जैसा कि अंदेशा था, कार्यकारिणी में यह समस्या रखते हुये ही उसे सुलझाने का उत्तरदायित्व रघुबीरजी को सौंप दिया गया। आसपड़ोस के पत्रकार और युवा भी रघुबीरजी के साथ संभावित सफलता में शामिल होने के लिये उत्साहित हो गये। वायु को शुद्ध रखना आवश्यक था, रघुबीरजी ने पुनः गहरी साँस भरी और मन को तैयार कर लिया, एक महत कार्य के लिये....

25.2.12

परीक्षा

परीक्षा श्रेष्ठता सिद्ध करने की विधि है, श्रेष्ठ होने की अनिवार्यता नहीं है। यह दर्शन का वाक्य नहीं, हम सबके दैनिक अनुभव की विषयवस्तु है। उदाहरणों की बहुतायत है, जो जीवन में श्रेष्ठ रहे और जो परीक्षा में श्रेष्ठ घोषित किये गये, उनके बीच कभी किसी प्रकार का तार्किक संबंध रहा ही नहीं है। कारण दो ही हो सकते हैं, या तो जिस पाठ्यक्रम पर परीक्षा होती है, वह बड़ा छिछला है, या तो परीक्षा की विधि में दोष है। तुरन्त ही निष्कर्ष पर पहुँच कर कुछ असिद्ध करने की व्यग्रता में नहीं हूँ, क्योंकि स्वयं भी परीक्षा की पद्धति का प्रतिफल हूँ।

क्या परीक्षा आवश्यक है? हाँ और नहीं भी। जब संसाधनों की माँग अधिक हो और आपूर्ति कम तो वह संसाधन किसे मिले, उसके लिये प्रतियोगिता होती है। प्रतियोगिता बहुधा धन की होती है, जिसके पास अधिक धन, उसके पास अधिक संसाधन। इसी प्रकार जब किसी नौकरी के लिये अधिक लोग आवेदन करते हैं तो सुयोग्य पात्र का निर्धारण करने के लिये भी प्रतियोगिता होती है, जो धन के स्थान पर ज्ञान पर आधारित होती है। यही प्रतियोगिता परीक्षा का उद्गम बिन्दु है। यह एक अलग विषय है कि परीक्षा में परखे गये ज्ञान में और नौकरी में काम आने वाले ज्ञान में जमीन आसमान का अन्तर होता है। जब संसाधन अधिकता में होते हैं, तब प्रतियोगिता होती ही नहीं है, परीक्षा की कोई आवश्यकता नहीं।

निर्धन समाज में संसाधन कम होते हैं, उनके लिये प्रतियोगिता अधिक होती है, परीक्षा एक के बाद आती रहती है, संघर्ष में बीतता है जीवन। हर छोटी छोटी चीज के लिये जूझना जब नियति हो, तब परीक्षा जीवन का अनिवार्य अंग बन कर हम सबसे चिपक जाता है। अरब के देशों के लिये परीक्षा का कोई महत्व नहीं, पश्चिमी धनाड्य देशों में भी परीक्षा होती हैं पर उनका स्वरूप इतना संघर्षमय तो नहीं ही रहता होगा जैसा अपने देश में है।

यह मानसिकता बहुत गहरे उतरी है, हमारी शिक्षा पद्धति में। यदि हम कल्पना करें कि विद्यालय में कोई परीक्षा न हो, सबको उत्तीर्ण कर दिया जाये, सबको अपने योग्य नौकरी चुनने का अधिकार हो, कोई प्रतियोगिता नहीं, सब अपना जीवन जियें, अपनी रुचि के अनुसार, आनन्द में। बहुत लोग यह बात पचा नहीं पायेंगे। मान मिले न मिले पर यह स्वप्न रह रह कर आता ही रहेगा, क्योंकि यही मेरे लिये किसी सभ्य और सुसंस्कृत समाज की आदर्श स्थिति है। आप कह सकते हैं कि यदि प्रतियोगिता नहीं रहेगी तो लोग पढ़ेगे नहीं, विज्ञान, साहित्य, तकनीकी आदि विकसित ही नहीं होंगी, हम असभ्य के असभ्य रह जायेंगे। आपके इस तर्क से मैं तुरन्त सहमत हो जाऊँगा, पर पाठ्यक्रम और परीक्षा की विधि का विश्लेषण करने के बाद।

हमारी ७० प्रतिशत बौद्धिक क्षमता समाज से प्राप्त अनौपचारिक शिक्षा से विकसित होती है, शेष ३० प्रतिशत औपचारिक शिक्षा में भी दो तिहाई क्षमता हमारी जिज्ञासा से आती है। मात्र १० प्रतिशत क्षमता नियमित अध्यापन से आती है। इसी १० प्रतिशत को विकसित करने के लिये हमारी शिक्षा पद्धति कटिबद्ध है। पूरी पठनीय सामग्री को एक वर्षीय १०-१२ पाठ्यक्रमों में बाटना, हर वर्ष परीक्षा, सब विषयों का प्रारम्भिक ज्ञान, हर बार कुछ और नया। जितना पढ़ना पड़ता है उसका केवल १० प्रतिशत ही स्मृति में रह पाता है, स्मृति में उपस्थित आधा ज्ञान ही किसी काम का होता है। कुल मिला कर जितना ज्ञान आवश्यक है उसका २० गुना हमें हजम करना पड़ता है औपचारिक शिक्षा के माध्यम से। हर पीढियों में यह मात्रा बढ़ती जाती है, क्योंकि हर विषय के पुरोधा अपने विषय के प्रति छात्रों को आकर्षित करने के लिये विषय से संबंधित तकनीकियाँ और विशिष्ट ज्ञान पाठ्यक्रम में ठूस देना चाहते हैं। गणित के जो सवाल हम कक्षा १२ में करते थे, उसे कक्षा ९ में देखकर हमारे होश उड़ गये। आने वाले समय में आवश्यक औपचारिक ज्ञान से ३० गुना बच्चे को घोटना पड़े, और वह भी मात्र १० प्रतिशत कुल बौद्धिक क्षमता विकसित करने के लिये, तो कोई आश्चर्य नहीं है, अपने बच्चों को सुपरमैन की उपाधि देना तब आपके लिये अधिक सरल होगा।

जब पाठ्यक्रम की मात्रा अधिक होगी, तो परीक्षा का भार भी उतना ही होगा। अब आयें परीक्षा की विधि पर। क्या परीक्षा यह निश्चित कर पाती है कि सब पाठ्यक्रम पढ़ डाला गया है और ढंग से समझ में आ गया है? क्या परीक्षा के प्रश्नपत्र का प्रारूप यह जानने के लिये होता है कि आपको क्या आता है या क्या नहीं आता है? परीक्षा हो जाने के बाद कितना रह पाता है दिमाग में? इन तीनों प्रश्नों का उत्तर ढूढ़ने में हमें वे राहें मिल जायेंगी, जिन पर हम अपनी आने वाली पीढ़ियों को चलते देखना चाहते हैं। अपने शैक्षणिक जीवन में परीक्षा की कई विधियों से साक्षात्कार हुआ, जिसके विषय में एक अलग पोस्ट में लिखूँगा। कोई तो कारण होगा कि परीक्षा का नाम सुन जितना पसीना और कँपकपी लोगों को आती है, उतना जून की गर्मी व दिसम्बर की सर्दी में भी नहीं आती होगी।

यदि प्रतियोगी परीक्षाओं को भी देखें तो उनमें नियत ज्ञान का स्तर, उस नौकरी में वांछित ज्ञान के स्तर से बहुत अधिक होता है। रेलवे में परास्नातकों को पत्थर ढोते हुये देखता हूँ तो देश के भविष्य के बारे कुछ बोल पाना कठिन सा लगने लगता है। हर क्षेत्र में यही स्थिति है, पढ़े अधिक हैं पर उनका महत्व नहीं है। संभवतः परीक्षा पद्धति को सही स्वरूप में देख पाना और उसे ज्ञान और उपयोगिता के अनुसार प्रयोग में ला पाना हमारे भविष्य को तय करेगा।

परीक्षा पद्धति हमारी शिक्षा व्यवस्था के लिये परीक्षा की घड़ी है।

22.2.12

फेसबुक, आपको भी धन्यवाद और विदा

नकारात्मकता से सदा ही बचना चाहता हूँ, बहुत प्रयास करता हूँ कि किसे ऐसे विषय पर न लिखूँ जिसमें पक्ष और विपक्ष के कई पाले बना कर विवाद हो, विवाद में ऊर्जा व्यर्थ हो, ऊर्जा जो कहीं और लगायी जा सकती थी, सकारात्मक दिशा में। जीवन में प्रयोगों का महत्व है, प्रयोगों से ही कुछ नया संभव भी है, प्रयोगों में प्राप्त अनुभव और भी महत्वपूर्ण होते हैं और विषयवस्तु की उपादेयता के बारे में औरों को आगाह करने में सहायक भी।

ऐसा ही एक प्रयोग फेसबुक के साथ किया था, कुछ माह पहले, सम्पर्क लगभग २५० के साथ, कई पुराने मित्र और परिवार के सदस्य, उपयोग मूलतः अपने पोस्ट का लिंक देने के लिये, साथ ही साथ कुछ रोचक पढ़ लेने का उपक्रम। बस इसी भाव से फेसबुक में गया था, वह भी किसी के यह कहने पर कि फेसबुक में साहित्य का भविष्य है। अनुभव यदि कटु नहीं रहा तो उत्साहजनक भी नहीं रहा, कुछ दिनों पहले अपना खाता बन्द कर दिया है, पूरा विचार किया, अपनी न्यूनतम और अनिवार्य की श्रेणी में उसे बैठा नहीं पाया। इसके पहले दो माह का साथ ट्विटर के साथ भी था पर वह चूँ चूँ भी निरर्थक ही लगी। अब रही सही उपस्थिति अपने ब्लॉग के साथ ही बची है, वह चलती रहेगी।

हर निर्णय का आधार होता है, आधार स्पष्ट हो तो व्यक्त भी किया जा सकता है। आधार के तीन सम्पर्क बिन्दु थे, समय, साहित्य और सामाजिकता। इन तीनों बिन्दुओं पर कितना कुछ रिस रहा था और कितना रस मिल रहा था, यह अनुभव हर व्यक्ति के लिये भिन्न हो सकता है, पर विश्लेषण हेतु विषय का उठना आवश्यक है।

पहला है सामाजिकता। यह फेसबुक का सुदृढ़ पक्ष है। अपने कई परिचितों के बारे में जाना, वे कहाँ रह रहे हैं, क्या कर रहे हैं, कुछ चित्र उनके परिवारों के, कुछ घूमने के, कुछ त्योहार के, कुछ मित्रों के साथ, जन्मदिन और वैवाहिक वर्षगाँठ की शुभकामनायें। वैसे तो जिन मित्रों और संबंधियों को जानना आवश्यक था, वे तो फेसबुक से पहले भी सम्पर्क में थे। फेसबुक के माध्यम से उनके बारे में कुछ और जान गये। कुछ और लोगों से भी परिचय बढ़ा पर उसका आधार साहित्यिक न हो विशुद्ध जान पहचान का ही रहा, वह भी किसी तीसरे पक्ष के माध्यम से। संबंधों को महत्व देने वालों के लिये, संबंधों की संख्या से कहीं अधिक, उनकी गुणवत्ता पर विश्वास होता है। फेसबुक में संबंधों का प्रवाहमयी संसार तो मिला पर जब उसकी अभिव्यक्ति में गाढ़ेपन की गहराई ढूढ़ी तो छिछलेपन के अतिरिक्त कुछ भी नहीं पाया।

दोष वातावरण का है, जहाँ स्वयं को व्यक्त करने की होड़ लगी हो, सम्पर्कों की संख्या चर्चित होने के मानक हों, औरों की अभिव्यक्ति का अवमूल्यन केवल लाइक बटन दबा कर हो जाता हो, वहाँ संबंधों के प्रगाढ़ होने की अपेक्षा करना बेईमानी है। संबंधों को पल्लवित करने के लिये समय देना पड़ता है, लगभग बराबर का, स्वयं की अभिव्यक्ति में दिया समय औरों द्वारा अभिव्यक्त को पढ़ने में दिये समय से कम ही रहे। इस वातावरण में ऊपर ऊपर तैरने को आनन्द तो बना रहा पर गहरे उतर कुछ संतुष्टि जैसा कुछ भी अर्जित नहीं हुआ।

दूसरा है समय। जहाँ पर गतिविधियों की झड़ी लगी हो, वहाँ कितना समय सर्र से निकल जाता है, पता ही नहीं चलता है। कई लोगों को जानता हूँ जो सुबह उठकर मुँह धोने के पहले फेसबुक देखते हैं। दिन में कई बार फेसबुक में कुछ न कुछ देखने में समय स्वाहा करने की लत लग जाती है सबको। संभवतः यही कारण है कई संस्थानों में फेसबुक पर रोक लगा दी गयी है। एकाग्रता नहीं रह पाती है, जब भी कुछ सोचने का समय आता है, मन में फेसबुक की घटनायें घूम जाती हैं। भरी भीड़ में परिवेश से त्यक्त युवा बहुधा फेसबुक में विचरते पाये जाते हैं। मेरा भी पर्याप्त समय फेसबुक चुराता रहा, जो पिछले कई दिनों से मुझे पूरी तरह से मिल रहा है।

तीसरा है साहित्य। साहित्य की दृष्टि से अभिव्यक्ति का सशक्त माध्यम ब्लॉग ही है। ट्विटर के १५० अक्षरों में केवल चूँ चूँ ही की जा सकती है। आप अपने होने, न होने, खोने, पाने की सूचना तो दे सकते हैं पर साहित्य सा कुछ लिख नहीं सकते हैं। फेसबुक में भी जहाँ सामाजिकता प्रधान वातावरण हो, वहाँ साहित्य गौड़ हो जाता है। वैसे तो ब्लॉग भी साहित्य का गहरा प्रारूप नहीं है, पाँच छै पैराग्राफ में बड़ी कठिनता से एक विषय समेटा जा सकता है, पर वर्तमान में यही साहित्य की न्यूनतम अभिव्यक्ति और ग्रहण करने की ईकाई है। जहाँ लाखों उदीयमान साहित्यकारों के योगदान से साहित्य सृजन के स्वप्न देखे जा रहे हों, वहाँ अभिव्यक्ति के लिये ब्लॉग से छोटी ईकाईयों का स्थान नहीं है।

पाठक ढूढ़ने का श्रम लेखक को करना होता है, उसी तरह अच्छे लेखक को ढूढ़ने का श्रम पाठक को भी करना पड़ता है। माध्यमों की अधिकता ध्यान बाटती है, अभिव्यक्ति का कूड़ा एकत्र करती है। छोटी चीजें से कुछ बड़ा बन पाने में संशय है, रेत से पिरामिड नहीं बनते, उनके लिये बड़े पत्थरों की आवश्यकता होती है। महाग्रन्थों का युग नहीं रहा पर कम से कम ब्लॉग की ईकाई से सबका योगदान बनाये रखा जा सकता है। साहित्य संवर्धन तो तभी होगा, जब अधिक लोग लिखें, अधिक लोग पढ़ें, लोग अच्छा लिखें, लोग अच्छा पढ़ें, अधिक समय तक रुचि बनी रहे, जब समय मिले तब साहित्य ही पढ़ें, बस में, ट्रेन में, हर जगह। फेसबुक सामाजिकता संवर्धित कर सकता है, साहित्य नहीं।

फेसबुक, आपको भी धन्यवाद और विदा।

18.2.12

मटर की फलियाँ

सप्ताहन्त का एक दिन नियत रहता है, सब्जी, फल और राशन की खरीददारी के लिये, यदि संभव हो सके तो शनिवार की सुबह। जब आईटी शहर के नागरिक शुक्रवार की पार्टी के बाद अलसाये से ऊँघ रहे होते हैं, मुझे मॉल खाली मिलता है, सारा का सारा सामान ताजा और व्यवस्थित, भुगतान काउण्टर आपकी प्रतीक्षा में, सब कर्मचारी आपकी सहायता करने को उद्धत। घर से बलात भेजे गये मानुष को जब स्वतन्त्र देवता जैसा सम्मान मिलता है, तो सब्जी खरीदने जैसा कर्म भी अत्यन्त रोचक हो जाता है।

घर से जो सूची बनाकर जाता हूँ आईफोन पर, वह भी मॉल में सामानों के क्रम के अनुसार होती है, सब्जी, फल, राशन और अन्त में साबुन आदि। सूची सबके सम्मिलित प्रयासों से बनती है, बच्चों की किसी विशेष सूप की फरमाईश, श्रीमतीजी की किसी व्यञ्जन बनाने की उत्कण्ठा, रसोई में समाप्तप्राय आटा, दाल, चीनी, चावल आदि के बारे में हमारे रसोईये जी की घोषणा। सप्ताह भर के बाद तैयार हुयी सूची में बहुधा कोई सामान छूट ही जाता है क्योंकि यदि ऐसा न हो, तो सामान खरीदते समय श्रीमतीजी के मोबाइल पर मिले निर्देशों से वंचित होने लगेगा जीवन। खरीददारी मुख्यतः सूची पर ही आधारित होती है पर इतने बड़े मॉल में घंटे भर बने रहने से कई और आवश्यक वस्तुयें दिख जाती हैं, घर में सामान अधिक ही आ जाता है, कुछ छूटने की घटना यदा कदा ही होती है।

कहते हैं कि आप जिस चीज से भागना चाहते हैं, वह जीवन भर आपका पीछा करती है, मेरे साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ। बचपन में पिताजी सब्जी खरीदने जाते थे, सप्ताह में दो दिन हाट लगती थी गृहनगर में, बहुत भीड़ रहती थी मानो पूरा शहर उमड़ आता हो वहाँ। पता नहीं भविष्य में गृहस्थी का क्या स्वरूप रहेगा, पता नहीं भविष्य में पति पत्नी की भूमिकायें क्या हो जायेंगी, संभवतः यही सोचकर पिताजी मुझे भी साथ ले जाते थे। सोचते होंगे, चलो कुछ तो सीख लेगा, यदि बाहर रहकर पढ़ना पड़े तो कम से कम खाना बनाकर पेट तो भर लेगा। बाहर रहकर पढ़ने के लिये यह सब जानना तो अत्यन्त आवश्यक था, पिताजी ने किया था, छोटे भाई ने भी बाद में किया, अब स्थिति यह है कि घर में मुझे छोड़कर सब खाना बना लेते हैं, बहुत अच्छा।

हाथ में एक छोटा झोला उठाये, भीड़ की रोचकता में गर्दन मटकाते हुये पिताजी के पीछे लगा रहता था। गेहूँ, चावल, दाल के दानों में जाने क्या देखकर खरीदते थे, समझ नहीं आता था। आलू, टमाटर, प्याज, एक एक को चारों ओर से देख कर क्या निश्चित करते होंगे, समझ नहीं आता था। पालक, मेथी, धनिया, पुदीना, ताजा और बासी में कैसे अन्तर करते थे, समझ नहीं आता था। हल्दी, जीरा, मसाला की महक कैसे परखते थे, समझ नहीं आता था। बस एक सहायक की तरह पीछे लगा रहता था, बस इस आस में कि किसी तरह अन्त में गन्ने का रस या बरफ के लच्छे खाने को मिल जाये, पर उसके लिये धूल भरे वातावरण में इतना श्रम करना खलता था। भगवान ने सुन ली, छात्रवास रहने आ गया, इस साप्ताहिक श्रम से छूट मिल गयी, उसके बाद पिताजी छोटे भाई को अपने साथ बाजार ले जाने लगे।

शेष पढ़ाई छात्रावास में, प्रशिक्षण और रेलवे में नौकरी, हर जगह बना बनाया खाना मिलता रहा। विवाह के बाद भी घर में रसोईया लगा रहा, सब्जी, राशन आदि आता रहा, हम अपने भय से मुक्त बने रहे, जो मिलता रहा, वह खाते रहे। कभी किसी व्यंजन विशेष के लिये आग्रह नहीं किया, कभी किसी खाने में कमी इंगित नहीं की। ऐसा लगने लगा कि पिता जी ने जो समय मुझे खरीददारी सिखाने में निवेश किया था उसका कोई प्रतिफल आ ही नहीं रहा है। जहाँ तक हो सका मैं खरीददारी से भागता रहा। अवसर भी अपनी प्रतीक्षा में था और बचपन में सीखी हुयी चीजें व्यर्थ नहीं जानी थीं, इन दोनों का सुयोग बंगलुरु में बनने लगा।

वस्तुतः तीन कारण रहे, पहला कारण हमारे रसोईयेजी का व्यक्तिगत कारणों से कई बार अपने गाँव जाना रहा। श्रीमतीजी को रसोई का पूरा कार्य करने के बाद यह सम्भव नहीं रहता था कि खरीददारी कर सकें, अतः हमको ही उस उत्तरदायित्व का निर्वाह करना पड़ा। दूसरा कारण खानपान के क्षेत्र में बच्चों की वैश्विक मानसिकता का रहा। अपने विद्यालय में पिछले दिन आये टिफिनबाक्सों के आधार पर अगले दिन की माँग रखे जाने के कारण, हर बार हम ही को प्रस्तुत होना पड़ा, या तो बाहर जाकर खिलाने के लिये या घर में बनाने हेतु आवश्यक सामग्री लाने के लिये। इटली, थाईलैण्ड, चीन, मेक्सिको, अमेरिका के व्यंजनों के साथ साथ ठेठ दक्षिण भारतीय भोजन के लिये साधन जुटाने का भार हमको ही सौंप दिया गया। तीसरा कारण मॉल में स्वयं चुनने की सुविधा व स्वच्छ और वातानुकूलित परिवेश रहा।

यह कार्य पुनः प्रारम्भ करना थोड़ा भारीपन अवश्य लाया पर बचपन में पाये तीन वर्षों के अनुभव के कारण अधिक कठिनाई नहीं हुयी। कई बार तो कार्य भार स्वरूप निपटाया पर धीरे धीरे रस आने लगा। एक एक आलू, प्याज, टमाटर, मटर छाँट के रखने में ऐसा लगने लगा मानो अपने परिवार के लिये एक स्वादिष्ट और पौष्टिक भोजन जुटाने में उपयोगी योगदान कर रहे हैं। घर में बच्चों ने जब मटर छीलकर खायी और कहा कि बड़ी मीठी और ताजी मटर है, तो सहसा एक एक मटर चुनना याद आ गया। साथ ही याद आया एक और व्यक्ति जो झोले में मुठ्ठी भर भरकर मटर डाल रहा था, संभवतः वह बचपन में अपने पिताजी के साथ बाजार नहीं गया होगा या उसे इस कार्य में रस नहीं आ रहा होगा।

पिताजी का सिखाया व्यर्थ नहीं गया, घर के लिये राशन, सब्जी आदि खरीदने से अधिक आत्मीय पारिवारिक अवसर सरलता से मिलता भी नहीं हैं। अगली बार से पृथु को भी ले जाऊँगा, भविष्य का क्या भरोसा, सुना है कई पतियों को घर में खाना बनाने का कार्य अधिक रुचिकर लगने लगा है।

15.2.12

लहरों से खेलना

सागर से साक्षात्कार उसकी लहरों के माध्यम से ही होता है। किनारे पर खड़े हो विस्तृत जलसिन्धु में लुप्त हो जाती आपकी दृष्टि, कुछ कुछ कल्पनालोक में विचरने जैसा भाव उत्पन्न करती है, पर इस प्रक्रिया में आप सागर में खो जाते है। पानी की लहराती कृशकाय सिहरन आपके पैरों को नम कर जाती है, पर इस प्रक्रिया में सागर पृथ्वी में खो जाता है। एक स्थान, जहाँ सागर का साक्षात्कार विधिवत और बराबरी से होता है, वह है जहाँ लहरें बनना प्रारम्भ होती हैं।

वैज्ञानिक दृष्टि से लहरों का बनना समझाया जा सकता है। पृथ्वी के गतिमय रहने से सागर में कुछ तरंगें उत्पन्न होती है, तरंगें सदा किनारे की ओर भागती हैं, पृथ्वी से प्राप्त ऊर्जा को पुनः किनारे पटक आने के लिये। किनारे आने पर गहरी जलराशि को जब तल में चलने की जगह नहीं मिलती है, वह ऊपर आने के लिये होड़ मचाती है, एक के ऊपर एक, ऊपर वाली आगे, नीचे वाली पीछे। धीरे धीरे ऊँचाई बढ़ती जाती है, गति बढ़ती जाती है। जब और किनारा आता है, गति स्थिर नहीं रह पाती है, लहरें टूटने लगती हैं, पीछे से आने वाली जलराशि उस ऊँचाई से जलप्रपात की तरह गिरने लगती है, दृश्य गतिमय हो जाता है, लहरों से फेन निकलने लगता है, थपेड़ों की ध्वनि मुखर होने लगती है, लगता है मानो लहरें साँप जैसी फन फैलाये, फुँफकारती चली आ रही हैं।

सम्मोहनकारी दृश्य बन जाता है, लोग मुग्ध खड़े हो निहारते रहते हैं, घंटों। मुझे भी यह देखना भाता है, घंटों, बिना थके, लगातार। मेरी दार्शनिकता मुझसे बतियाने लगती है, दिखने लगता है कि जब धीर, गम्भीर व्यक्ति को छिछले परिवेश में स्वयं को व्यक्त करने की विवशता होती होगी, उसका भी निष्कर्ष किनारे पर सर पटकती लहरों जैसा ही होता होगा। लहरों का बनना और टूटना ऊर्जा को सही स्थान न मिल पाने की देश की अवस्था को भी चित्रित कर जाता है। मेरे मन में, जूझने की जीवटता, उन लहरों से कुछ सीख लेना चाहती है। पूर्णिमा का चाँद जब प्रेमवश सागर को अपनी ओर अधिक खींचने लगता होगा, सागर की वियोगी छटपटाहट इन लहरों के माध्यम से ही स्वयं को व्यक्त कर पाती होगी।

सायं का समय है, सूरज अपनी लालिमा बिखरा रहा है, सागर किनारे, दोनों ओर बच्चे बैठे बतिया रहे हैं। समुद्र से जुड़ा सारा ज्ञान धीरे धीरे उलीच रहे हैं दोनों, पिता की स्नेहिल उपस्थिति में। दोनों को ही ज्ञात है कि यदि अगले प्रश्न में अधिक समय लिया तो पिताजी कल्पनालोक में सरक जायेंगे। अपने समय में कल्पना की अनाधिकार चेष्टा से सचेत बच्चे बहुधा मेरी कल्पनाशीलता से उकताने लगते हैं। उन्हें दूर बनती लहरों का बनना, बहना, टूटना और किनारे आकर वापस लौट जाना, यह देखना तो अच्छा लगता है पर उससे भी अच्छा लगता है, लहरों से खेलना। लहरों से खेलने का हठ सायं को पूरा नहीं किया जा सकता था, अगले दिन सुबह का समय निश्चित किया गया।

जल का आनन्द, संग संग, देवला और पृथु
बच्चों को लहरें बहुत पसन्द हैं, बेटा अब ठोड़ी तक आ गया है, तैरना आता है अतः गले तक की ऊँचाई में निर्भय हो पानी में बना रहता है। ऊँची लहर आती है तो साथ में उछल कर तैरने लगता है, पूरा आनन्द उठाता है, बस स्वयं से आगे नहीं जाने देता हूँ उसे। बिटिया माँ के साथ किनारे बैठे बैठे उकताने लगती है, भैया की तरह लहरों से खेलना चाहती है। दोनों ही साथ साथ सागर के अन्दर तक आ जाते हैं, बेटा बगल में, बिटिया गोद में। बिटिया छोटी है, लहरों की ऊँचाई उससे डेढ़ गुना अधिक है। सारी लहरें ऊँची नहीं आती हैं, वह गिनने लगती है, संभवतः हर पाँचवी लहर ऊँची होती है। धीरे धीरे उसका भी भय छूटता है, चार लहरों तक वह अपने पैरों पर खड़ी रहती हैं, बस हाथ पकड़े रहती है। हर पाँचवी लहर पर गोद में आकर चिपट जाती है। गोद में चढ़ पिता से भी ऊँची हो जाती है, लहर को अपने नीचे से जाते हुये देखती है तो खिलखिला कर हँस पड़ती है, बालसुलभ।

लहरों के साथ खेलते खेलते दो घंटे निकल जाते हैं, आँखों में थोड़ा खारा पानी जाने लगता है, धूप शरीर को तपाने लगती है, थकान होने लगती है, बच्चे वापस चले जाते हैं, मुझे कुछ और देर लहरों से खेलने का मन होता है। मैं हर पाँचवी लहर की प्रतीक्षा में रहता हूँ, लहर आती है, मैं स्वयं को छोड़ देता हूँ, थोड़ा तैरता हूँ, लहर चली जाती है, पुनः अपने पैर पर खड़ा हो जाता हूँ।

वापस अपने कमरे जा रहा हूँ, दार्शनिकता पुनः घिर आती है, आसपास की हलचल ध्यान भंग नहीं करती है। मन में विचार घुमड़ने लगते हैं, लहरों से खेलना बिल्कुल जीवन जीने जैसा ही है, हर पाँचवी लहर ऊँची आती है, थोड़ा प्रयास कर लीजिये, लहर चली जायेगी, पैर पुनः जमीन पर।

'आप फिर सोचने लगे, न' बिटिया टोक देती है, देखता हूँ, मुस्कराता हूँ, सर पर हाथ रख कर बस इतना ही कहता हूँ, 'शाम को फिर लहरों से खेलने चलेंगे'।

11.2.12

क्लाउड का धुंध

विकल्प की अधिकता भ्रम उत्पन्न करती है, भ्रम स्पष्ट दिशा ढाँक देता है, भ्रम सोचने पर विवश करता है, भ्रम निर्णय लेने को उकसाता है, भ्रम का धुंध छटने का अधैर्य एक अतिरिक्त भार की तरह साथ में लगा रहता है। कितना ही अच्छा होता कि विश्व एक मार्गी होता, एक विमीय, बढ़ते रहिये, कोई चौराहे नहीं, कोई विकल्प नहीं। पर क्या यह मानव मस्तिष्क को स्वीकार है, नहीं और जिस दिन यह स्वीकार होगा, उस दिन विकास का शब्द धरा से विदा ले लेगा। किसी कार्य को श्रेष्ठतर और उन्नत विधि से करने की ललक विकास का बीजरूप है। यह बीजरूप इस जगत में बहुतायत से फैला है। अतः जब तक विकास रहेगा, विकल्प रहेगा, भ्रम रहेगा, धुंध रहेगा। धुंध के पीछे का सूरज देखने की कला तो विकसित करनी होगी, धुंध छाटते रहना विकासीय मानव का नियत कर्म है।

ऐसा ही कुछ धुंध, इण्टरनेट में क्लाउड ने कर रखा है। क्लाउड का शाब्दिक अर्थ बादल है, प्रतीक पानी बरसाने का, संभवतः ध्येय भी वही है, सूचना के क्षेत्र में। यही भविष्य माना जा रहा है क्योंकि अपने उत्पाद बेचने के लिये और अपनी बेब साइटों पर आवागमन बनाये रखने के लिये क्लॉउड को विशेष उत्प्रेरक माना जा रहा है। पहले कितना अच्छा था कि एक हार्डडिस्क या पेन ड्राइव लिये हम लोग घूमते रहते थे, कभी कार्यालय के कम्प्यूटर से, कभी घर के कम्प्यूटर से, कभी मोबाइल से, कभी इण्टरनेट से, सूचनायें निकालते और भेजते रहते थे। एक कीड़ा काटा किसी को, कि काश यह सब अपने आप हो जाता, लीजिये प्रारम्भ हो गयी क्लाउड यात्रा।

इसके तीन अंग हैं, पहली वह सूचना जो आप इण्टरनेट पर संरक्षित रखना चाहते हैं, दूसरे वे यन्त्र जिन्हे आप उपयोग ला रहे हैं और तीसरे वह एप्पलीकेशन व माध्यम जो इस प्रक्रिया में सहायक बनते हैं। इन तीनों अंगों को दो कार्य निभाने होते हैं, पहला स्वतः सूचना संरक्षित करने का और दूसरा आपके यन्त्रों के बीच सूचनाओं की सततता बनाये रखने का। जो लोग यह मान कर चलते हैं कि इण्टरनेट की उपलब्धता अनवरत बनी रहेगी और उसके अनुसार इन सेवाओं का प्रारूप बनाते हैं, वे प्रारम्भ से ही उन स्थानों को इन सेवाओं से बाहर कर देते हैं जहाँ इंटरनेट अपने पाँव पसारने का प्रयास कर रहा है। इसके विस्तृत उपयोग के लिये यह आवश्यक है कि इन सेवाओं को, इंटरनेट की उपलब्धता और अनुपलब्धता, दोनों ही दशाओं में सुचारु चलने के लिये बनाया जाये।

तीन सिद्धान्त हैं जिनके आधार पर आप किसी भी क्लाउड सेवा की गुणवत्ता माप सकते हैं।

१. मोबाइल, लैपटॉप और इण्टरनेट पर एक ही प्रोग्राम हो। यह हो सकता है कि प्रोग्राम अपने पूर्णावतार में लैपटॉप पर हो, मोबाइल व इंटरनेट पर अर्धावतार में आ पाये, पर सूचनाओं के संपादन की सुविधा तीनों में होना आवश्यक है। इस प्रकार किसी भी माध्यम में कार्य करने में कोई कठिनाई नहीं होगी। यदि प्रोग्राम केवल इंटरनेट पर ही होगा तो आप इंटरनेट के लुप्त होते ही अपंग हो जायेंगे।

२. ऑफलाइन संपादन बहुत आवश्यक है, इस प्रकार आप उस सेवा का उपयोग कभी भी कर सकते हैं। पिछले समन्वय के बाद हुये परिवर्तनों को एकत्र करने और उसे इंटरनेट के उपलब्ध होते ही क्लाउड पर भेज देने से समन्वय का एक नया बिन्दु बन जाता है। यही क्रम चलता रहता है, हर बार, जब भी ऑफलाइन संपादन होता है। हुये बदलाव को किस प्रकार कम से कम डाटा में परिवर्तित कर क्लाउड में भेजा जाता है, यह एक अत्यन्त तकनीकी विषय है।

३. एक बार क्लाउड में परिवर्तन हो जाता है, उसके बाद किस प्रकार वह सूचना अन्य यन्त्रों पर पहुँच कर संपादित होती है, इस पर क्लाउड सेवा की गुणवत्ता का स्पष्ट निर्धारण होता है। यदि आपको उस प्रोग्राम में जाकर सूचना को अद्यतन करने के लिये अपने हाथों समन्वय करना पड़े तो वह सेवा आदर्श नहीं है। प्रोग्राम खोलते ही समन्वय स्वतः होना चाहिये। यह भी हो सकता है कि किसी एक ही लेख पर आपने मोबाइल और लैपटॉप पर आपने अलग अलग ऑफलाइन संपादन किया, बाद में इंटरनेट आने पर उन दोनों संपादनों को किस प्रकार क्लाउड सेवा सुलझायेगी और सहेजेगी, यह क्लाउड सेवा की गुणवत्ता का उन्नत अंग है।

कई कम्पनियाँ क्लाउड सेवाओं में 'कई लोगों के द्वारा संपादन की सुविधा' को जोड़कर उसे और व्यापक बना रही हैं। इसमें एक फाइल पर एक समय में कई लोग कार्य कर सकते हैं। बड़े लेखकीय प्रकल्पों पर एक साथ कार्य कर रहे कई व्यक्तियों के लिये इससे उत्कृष्ट और स्पष्ट साधन नहीं हो सकता है।

आजकल मैं अपने लेखन में इस सेवा का भरपूर उपयोग कर रहा हूँ, यह पोस्ट आधी आईफोन पर, आधी मैकबुक पर, एक चौथाई ब्रॉडबैंड के समय, एक चौथाई जीपीआरएस के समय और आधी इंटरनेट की अनुपलब्धता के समय लिखी है। एक जगह किया संपादन स्वतः ही दूसरी जगह पहुँचता रहा और अन्ततः पोस्ट आप तक।

इस समय कई क्लाउड सेवायें सक्रिय हैं, जो भी चुनें उन्हें उपरोक्त सिद्धान्तों की कसौटी पर ही चुनें, आपका जीवन सरल हो जायेगा। यदि क्लाउड सेवा में इतनी सुविधायें नहीं है तो अच्छा है कि पेन ड्राइव से ही काम चलाया जाये।

8.2.12

ब्लॉगिंग - एक हिसाब

ज्ञानदत्तजी बंगलुरु में थे, पिछले दो दिन। जब आप यह पोस्ट पढ़ रहे होंगे, उनकी ट्रेन सुन्दर दृश्यों को अपने दोनों ओर बराबर से बाँटती हुयी पूरी गति से उत्तर दिशा में भाग रही होगी। उनकी प्रशासनिक यात्रा का स्थानीय सूत्र होने के कारण बहुत समय मिला उनके साथ, कार्यालय में, मालगोदाम में, गाड़ी में, कैरिज में और घर में। बैठकों की व्यस्तता के अतिरिक्त सारा समय उनके साथ बिताने का प्रयास किया। स्वार्थ मेरा था, ब्लॉगिंग यात्रा का प्रारम्भ उन्हीं ने कराया था, लगभग ढाई वर्ष बाद उस यात्रा का विश्लेषण आवश्यक हो चला था, सब चलचित्र की तरह आँखों के सामने से निकलता चला गया।


तब लेखन के नाम पर कुछ कवितायें ही थी हाथ में, कहते हैं कि समय गाढ़ा होता है तो ही कविता अधिक बहती है, वह भी कभी कभी, महीनों के अन्तराल में रुक रुककर। नियमित लेखन के नाम पर संभवतः कुछ भी नहीं था, विचार बिन्दु घनीभूत हो बरस जाते थे, प्रवाहमयी नदी बनना कहाँ आता था उन्हें? ब्लॉगलेखन न होता तो कितना ही अनुभव अनछुआ रह जाता जीवन में।


यात्रा के कई महत्वपूर्ण पड़ाव चर्चा का विषय बन सकते हैं, विस्तृत अध्याय लिखे जा सकते हैं, पर उन सबसे हट कर बस उन अन्तरों को स्पष्ट करना चाहूँगा जो यात्रा के प्रारम्भ और वर्तमान को विभाजित करने के लिये पर्याप्त हैं। ६ अन्तर ही मुख्य हैं।


पहला है दृष्टिकोण। हर वस्तु, कर्म, घटना और विचार को अभिव्यक्ति के माध्यम से जोड़ने का अभ्यास, उनको भिन्न तरीके से देखने का भी आधार बनने लगा। विचारों की गहनता बढ़ी, हर परिस्थिति में छोटा ही सही पर कुछ न कुछ विचारणीय दिखने लगा। पहले कई दृश्य जो अधिक रोक नहीं पाते थे, बस स्वतः रुक रुक हृदय में संस्थापित होने लगे, विचार श्रंखलायें बनने लगीं, स्थिरदृश्यता आ गयी जीवन में, संवेदनाओं ने आधिपत्य जमा लिया उच्छृंखलता पर। अनुभव गाढ़े होने लगे।


दूसरा है सामाजिकता। विचारों के विनिमय का बाजार बहुत बड़ा है। बिना यहाँ आये पता ही नहीं चलता कि कैसे कैसे रत्न गढ़ रखे हैं ईश्वर ने। पढ़े लिखे लोगों की दुनिया में ढेरों दोष हो सकते हैं पर फिर भी वह जाहिलों के स्वर्ग से कहीं अधिक रोचक होती है। यहाँ न जाने कितने ऐसे लोग हैं जिनका आपके जीवन में होना एक ईश्वरीय उपहार है। प्रारम्भिक आकर्षण अपने स्थान पर बने रहेंगे पर बुद्धि आधारित सामाजिकता के क्षेत्र ईश्वर की श्रेष्ठतम रचना का श्रेष्ठतम पक्ष है।


तीसरा है अपार ज्ञान। ब्लॉग का सशक्ततम पक्ष संभवतः यही है। जब अभिव्यक्ति को पाठक के अनुरूप बना कर प्रस्तुत करने की बात हो तो ब्लॉग का कोई जोड़ नहीं। कठिन से कठिनतम विषय भी यहाँ मीठे रस की चासनी जैसे सरस बना कर उतारे जाते हैं। हर क्षेत्र के बारे में, तकनीक, संगीत, पुरातत्व, फिल्म, कोई भी विषय उठा लें, आपकी ही समझ की भाषा में उपलब्ध मिल जायेगा ज्ञान, सुपाच्य भाषा में परोस दिया गया ज्ञान। पहले केवल बड़े लेखकों की पुस्तकें पढ़ पाता था, कितने ऐसे लोगों को नहीं पढ़ पाता था जो उतने ही योग्य थे पर किसी कारण पुस्तक न लिख पाये। पढना बहुत अच्छा लगता है, स्वयं को हरकारा बना पाता हूँ, बड़े लेखकों और ब्लॉगरों के बीच, बड़ा ही साम्य दिखता है उनकी समझ के बीच। उस समझ का पुल बनने और बनाने का प्रयास करता हूँ, अपने लेखन से।


चौथा है किसी से कह देने का भाव। भले ही मन की व्यग्रता से उपजा लेखन ब्लॉग पर पूरा न आ पाये पर उस समय लिख लेने से यह लगता है कि मन किसी से कह दिया,बड़ा हल्का हो जाता है मन इस प्रकार। तनाव उतारने का इससे सहज माध्यम और क्या हो सकता है भला? विकार उपचार चाहते हैं, विचार भी लखेदते हैं, आकार चाहते हैं, एक बार अभिव्यक्ति से तृप्त हो जाने के बाद चुपचाप शान्त बैठ जाते हैं। आपका सखा बन जाता है लेखन, जिस पीड़ा से उत्पन्न होता है उसी की दवा बन जाता है लेखन।


पाँचवा है समय का सदुपयोग। टीवी आधारित मनोरंजन से छुटकारा नहीं मिल पाता यदि लेखन में मन नहीं लगता। विचार जैसे जैसे गहराते हैं, मनोरंजन का स्तर भी गहरा हो जाता है, छिछले पोखर और समुद्र के बीच का अन्तर स्पष्ट होने लगता है। टीवी देखने से कई गुना अच्छा लगता है कुछ लिखना और कुछ पढ़ना, विशेषकर ब्लॉग पर।


छठा है जीवन की गतिशीलता। जीवन में एकरूपता थका देती है, सुबह से सायं तक एक ही कार्य कीजिये तो ऊबन होने लगती है स्वयं से, संभवतः अभिरुचियाँ इसीलिये आवश्यक भी हैं जीवन में। रेलवे और साहित्य के बीच आते जाते रहने से गतिशीलता बनी रहती है। एक से ऊबे तो दूसरे में गये, विचारों में नयापन बनाये रखने में यह गतिशीलता अत्यन्त आवश्यक है, उतार चढ़ाव हो पर यह गतिशीलता जीवन में बनी रहे।


यदि उपरोक्त परिवर्तन को एक शब्द में व्यक्त करना हो तो ब्लॉगिंग एक नशा है, चढ़ने लगता है तो कुछ और नहीं सूझता, रमे रहना चाहता है, जहाँ है। नशे का हिसाब पूछना मयखानों में मना है। चढ़ा लो, हिसाब मिल जायेगा।

4.2.12

पहले तीन में आओ, आईपैड मिल जायेगा

एप्पल ने शिक्षा के क्षेत्र में पहल करते हुये आईबुक ऑथर के नाम से एक सुविधा प्रारम्भ की है। इस एप्लीकेशन के माध्यम से आप कोई पुस्तक बड़ी आसानी से लिख सकते हैं और आईट्यून के माध्यम से ईबुक के रूप में बेचकर धन भी कमा सकते हैं। उपन्यास, कविता इत्यादि के अतिरिक्त गणित, विज्ञान जैसे विषयों पर पाठ्य पुस्तक लिखने के लिये कई प्रारूप दिये गये हैं इस सुविधा में। किसी भी अध्याय में लेखन और चित्रों के अतिरिक्त वीडियो, त्रिविमीय दृश्य, पॉवर प्वाइण्ट प्रस्तुति, एक्सेलशीट गणनायें आदि के होने से पढ़ने का अनुभव अलग ही होने वाला है। पुस्तक आप मैकबुक में लिख सकते हैं पर समुचित पढ़ने के लिये आईपैड का विकल्प ही रहेगा। इस माध्यम से एप्पल का प्रयास आईपैड को शिक्षा के आवश्यक अंग के रूप में स्थापित करने का रहेगा।

मेरे अग्रज नीरजजी ने अपने पुत्र को हाईस्कूल के समय नियमित पढ़ाया है और वह प्रचलित कई पाठ्य पुस्तकों की गुणवत्ता से संतुष्ट नहीं हैं, उनका कहना है कि पाठ्यपुस्तकों को और अधिक प्रभावी ढंग से लिखा जा सकता है और रोचक बनाया जा सकता है। आईबुक ऑथर के रूप में नीरजजी को रोचक ढंग से पुस्तक लिखने के लिये एक उपहार मिल गया है। यदि वह कोई पुस्तक इसपर लिखेंगे तो वह कैसी लगेगी? इसी उत्सुकता में एक अध्याय लिखकर देखा, वह आईपैड पर कैसा लगेगा यह देखने के लिये एप्पल के स्टोर इमैजिन में गया। खड़ा हुआ आईपैड में वह अध्याय देख रहा था, बगल में एक १४-१५ साल की लड़की अपने माता पिता के साथ आईपैड देख रही थी, उनके बीच की बातचीत, न चाहते हुये भी सुनायी पड़ रही थी।

लड़की किसी तरह यह सिद्ध करने में प्रयासरत थी कि वह आईपैड एक खिलौने के रूप में नहीं लेना चाहती, वरन उसका उपयोग अपनी पढ़ाई में कर अच्छा भविष्य बना सकती है। मैं थोड़ा प्रभावित हुआ, मुझे भारत का भविष्य आशावान लगने लगा। मुझे भारतीय मेधा पर कभी संशय नहीं रहा है, पर अपनी बात खुलकर कह पाने का गुण भारतीय बच्चों में न पाकर निराशा अवश्य होती है, कुछ संकोच के कारण नहीं बोलते हैं, कुछ मर्यादा के लबादे में दबे रहते हैं। वह लड़की जब बोल रही थी, जिज्ञासावश मैं अपना कार्य छोड़ तन्मयता से बस सुने जा रहा था। भारत अपने महत भविष्य में दौड़ लगाने जा रहा था, तभी पिता का एक आश्वासन सुनकर ठिठक गया। पिता बोले, बेटी परीक्षा में पहले तीन में आओ, आईपैड मिल जायेगा।

कुछ जाना पहचाना सा लगता है यह आश्वासन, सबके साथ हुआ होगा जीवन में, बस इस वाक्य में तीन के स्थान पर कोई और संख्या व आईपैड के स्थान पर कोई और वस्तु बदल जाती होगी। आपके साथ बचपन में हुआ होगा और संभव है कि आप अपने बच्चों को यही सूत्र पिला रहे हों, पतिगण अपनी पत्नियों से कुछ ऐसा ही मीठा संवाद बोलते होंगे, पत्नियाँ भी ऐसे गुड़भरे संवादों को सूद समेत चुकाती होंगी, ध्यान से देखें तो हर जगह यही सिद्धान्त पल्लवित हो रहा है। बड़ी गहरी पैठ बना चुका है यह अन्तर्पाश, हर परिवार में।

बचपन से अब तक की दो ही घटनायें याद आती हैं, इस प्रकार के अन्तर्पाश की, क्रिकेट बैट पाने के लिये गणित की किसी परीक्षा में पूरे अंक लाने का लक्ष्य और घड़ी पाने के लिये हाईस्कूल में ससम्मान उत्तीर्ण होने का लक्ष्य। दोनों ही लक्ष्य प्राप्त हुये थे और पिताजी ने दोनों ही वचन पूरे किये, पर उसके बाद से मैं अपने कर्म करता रहा, पिताजी स्वतः ही कुछ न कुछ फल देते रहे, किसी फल विशेष के लिये किसी कर्म विशेष को विवश नहीं किया गया, कोई अन्तर्पाश नहीं रहा।

कर्मफल का सिद्धान्त है, कर्म करने से फल मिलता है, पर जगतीय कर्मफल के सिद्धान्त से थोड़ा अलग है पारिवारिक कर्मफल का सिद्धान्त। जगतीय कर्मफल में सफलता और सफलता की प्रसन्नता अपने आप में फल होता है। पारिवारिक कर्मफल में किसी कार्य की सफलता ही कर्म है, फल पूर्णतया असम्बद्ध होता है। आशाओं और आकांक्षाओं का आदान प्रदान होता है पारिवारिक परिप्रेक्ष्य में।

खैर, लड़की के पास दो माह का समय है, प्रथम तीन में आकर आईपैड पाने के लिये। भगवान करे, उसका दृढ़निश्चय उसे सफलता दिलाये। इसी बीच मैं नीरजजी को भी बोलता हूँ कि एक स्तरीय पुस्तक लिखना प्रारम्भ कर दें, आने वाली पीढियाँ ढर्रे वाली पुस्तकों के अतिरिक्त अच्छे लेखकों की पुस्तकें पढ़ने को तैयार बैठी हैं। टिम कुक जी का ईमेल लेकर उन्हे भी सूचना देता हूँ कि आप जो शिक्षा को भी संगीत, फोन और लैपटॉप की तरह एक नया स्वरूप दे रहे हैं, उसमें सप्रयास लगे रहिये। भारत में बच्चों की मेधा प्रखर है और उसे स्तरीय पोषण की आवश्यकता है, घिसे घिसाये तरीकों से कहीं अलग। भारत में हर बच्चे के पास होगा आईपैड, क्योंकि अपनी मेधा के बल पर भारत ही प्रथम तीन में सदा बना रहेगा।

1.2.12

गर्दन की मोच

यह तो निश्चित और सिद्ध था कि गर्दन की मोच नहाते समय ही आयी थी, क्योंकि पहले के गतिशील और बाद के गतिहीन जीवन के बीच वही एक स्पष्ट बिन्दु था। यह तो अच्छा हुआ कि मोच घर में ही आयी, नहीं तो क्या पता शारीरिक पीड़ा के साथ साथ ही मानसिक पीड़ा भी झेल रहे होते, अनावश्यक इधर उधर देखने के आक्षेप की। कारण वह शीघ्रता थी जिसकी आवश्यकता ही नहीं थी, निष्कर्ष वह जो पिछले ७ दिन झेला। एक समय में एक कार्य न करने का दण्ड अब ईश्वर कैसे दे या कैसे बताये कि बेटा जो भी कार्य करो मन लगा कर करो। आधे घंटे में प्रारम्भ होने वाले निरीक्षण के बारे में चार विचार मन में, समय कम, स्नान करने के लिये हाथ बाल्टी में, ललक यह देखने की, कि तौलिया रखा है कि नहीं। गर्दन बेचारी घूमती है, कोमल है, इतनी घनघोरता सह नहीं पाती है, दर्द की एक हूक सी उठती है, तुरन्त समझ में आ जाता है कि बेटा गये काम से।

राणा सांगा के संस्कार सीख में थे, पैर और हाथ चल रहे थे, गर्दन में एक दर्दनिवारक स्प्रे किया 'वोलिनी'। पूरे निरीक्षण के समय सर और कन्धे एक साथ ही घूमते थे, धीरे धीरे, सामने वाले को भी लगता था कि ध्यान पूरा दिया जा रहा है। येन केन प्रकारेण निरीक्षण समाप्त हुआ तो घर के कुछ आवश्यक कार्य निकल आये। मुख्यालय में होने वाली एक अत्यन्त महत्वपूर्ण बैठक की सूचना सायं मिली। आने जाने में दो रातों की ट्रेन यात्रा और मुख्यालय में दिन भर की व्यस्तता, जब वापस बंगलुरु आया, गर्दन की पीड़ा विकराल रूप ले चुकी थी, जरा भी हिलने से सारा शरीर पीड़ा से थरथरा जाता था।

कभी सोचा नहीं था कि एक छोटी सी मोच इतना बड़ा प्रभाव डालेगी। पहले भी मोच आयीं हैं, एक या दो दिन रह कर चली गयीं, पर यह मोच कुछ विशेष थी, मानो बहुत कुछ सिखाने आयी हो। यह पूरा दैनिक क्रम बिगाड़ कर रख सकती है, इसका अनुभव पहली बार हुआ जीवन में। रात की नींद टूटी रहने लगी, करवट बदलते ही दर्द की हूक सी उठती, सहसा याद आता कि इस पीड़ा ने करवट बदलने का अधिकार भी छीन लिया है, सहज होने में समय लगता, अगली करवट तक नींद बनी रहती। करवटें बड़ी पुरानी हैं, वे तो बनी रहेंगी, गर्दन की पीड़ा के लिये वे अपना स्थान छोड़ने वाली नहीं, पुराना नये को नहीं आने देता है, दोनों ही नहीं माने, करवटें भी रहीं, मोच भी रही, रात भी हमारी आहों से जीवन्त रही।

रात की थकान आगत दिवस को भी आहत किये रहती है, दिन में चैतन्यता बिना बताये ही कभी भी सरक लेती, सामने वाले को लगता कि साहब की ऊर्जा या तो बहुत कम है या मूड उतरा हुआ है, उत्साह की बातें या अत्यन्त आवश्यक कार्य पीछे रह जाते हैं। साथ रहने वाले पर्यवेक्षक को भी ज्ञात है कि जब साहब की ऊर्जा का स्तर कम हो तब उनका आगन्तुकों और अधीनस्थ कर्मचारियों से भेंट कराना ठीक नहीं, निर्णय उतने प्रभावी नहीं रहते हैं जैसे समान्यतया होते हैं। एकाकीपन पीड़ा को और गहरा देता है। दर्दनिवारक दवाई न खाने का हठ मेरा ही था, अपने शरीर और अपने बीच कोई अल्पकालीन झूलता तन्तु नहीं चाहता था मैं।

दो दिन बाद ही सही, अन्ततः पर्यवेक्षक ने मुझे गर्दन की सिकाई करने के लिये मना लिया, ५ दिन, नित्य आधा घंटे के लिये, रेलवे अस्पताल में। फिजियोथेरेपिस्ट श्री जॉयस योग्य थे, दो विधियाँ चुनी गयीं उनके द्वारा, इंटरफेरेन्स थेरेपी और इलेक्ट्रानिक डाइथर्मी, दोनों ही पीड़ा का क्षेत्र और प्रभाव सीमित करने के लिये। सिकाई के समय अपने आईफोन पर यह पोस्ट लिखता रहा साथ ही साथ बीच बीच में श्री जॉयस से बातचीत भी होती रही, उन्होने तकिया लगाने और पेट के बल लेटकर टाइप करने को तात्कालिक प्रभाव से मना कर दिया। जब उन्हें पता लगा कि हमारा अधिक समय कम्प्यूटर पर बीतता है तो समुचित बैठने और हर आधे घंटे में एक बार उठकर टहलने की सलाह भी हम पर थोप दी गयी। नयी जीवनशैली की गहरी समझ थी श्री जॉयस को, उनके साथ बातचीत करना अत्यन्त लाभकारी और रोचक अनुभव रहा मेरे लिये।

आज धीरे धीरे पीड़ा घट रही है और जीवन सामान्य हो रहा है, पर यह ७ दिन का समय कई अपरिवर्तनीय परिवर्तन लेकर आया। पहला तो इसके कारण सीधे रहकर चलना सीख लिया, बिना किसी विकर्षण के, पूर्ण एकाग्रमना हो। दूसरा बलात ही सही पर सुबह शीघ्र उठना होने लगा क्योंकि लेटने में होनी वाली पीड़ा से अच्छा था कुछ सार्थक कर लेना। तीसरा लाभ जीवनशैली के सम्बन्ध में श्री जॉयस की सलाह का अनुपालन, लम्बे समय ब्लॉगिंग करने वालों के लिये रामबाण। दो और परिवर्तन जो तत्काल तजना चाहूँगा, कुछ न खेलने से बढ़े वजन को और सुबह ठंड से बचने के लिये स्वेटर पहना कर बबुआ बना दिये गये स्वरूप को।

अब कहीं जाकर अंग्रेजी के इस प्रचलित मुहावरे(Pain in the neck) का व्यवहारिक अर्थ समझ में आया और साथ ही समझ आया अर्थ हिन्दी के एक गीत का, करवटें बदलते रहे सारी रात हम...आपकी कसम....