3.3.12

परीक्षा की विधियाँ

कुछ लोग होते हैं जिन्हें परीक्षा का तनिक भी भय नहीं होता है, अंक भले ही कितने आयें। मार्च-अप्रैल की नीरवता में डूबी गर्म दुपहरियों में यही लोग रोचकता बनाये रखते हैं। हमारे एक चचेरे भाई को बड़ी संवेदना रहती थी हम सबसे, पहले तो ये बताते थे कि कौन सा प्रश्न फँस रहा है, जब उससे भी संतोष न होता तो एक पूरा का पूरा संभावित प्रश्नपत्र बनाते और पकड़ा देते। उनका दावा रहता था कि कम से कम ८० प्रतिशत उससे ही फँसेगा। कौन से प्रश्न फँसने वाले हैं उसके लिये पिछले प्रश्नपत्रों की विवेचना और अध्यापक की मनःस्थिति, इन दोनों का सहारा विद्यार्थी कई दशकों से ले रहे हैं। कई दयालु अध्यापक पाठ्यपुस्तक के ही प्रश्न उतार देते हैं, कई अतिदयालु अध्यापक उदाहरणों को ही प्रश्न बना देते हैं और कई महादयालु अध्यापक पिछले प्रश्नपत्र में से ही अधिकतर प्रश्न उतार देते थे। अध्यापक और छात्र के संबंध में दया आना स्वाभाविक है, दयालु संस्कृति बनाये जो रखनी है।

अपनी इसी रुचि के कारण हमारे चचेरे भाई तो बहुत बड़े प्रोफेसर हो गये, उन्हें विद्यार्थियों के ये हथकण्डे भलीभाँति ज्ञात होंगे और निश्चय ही वह अपना प्रश्नपत्र थोड़ा हटकर बनाते होंगे। अध्यापकों को यह तथ्य ज्ञात है कि विद्यार्थी पाठ्यक्रम विमर्श से अधिक प्रश्नपत्र विमर्श करते हैं, जितना समय सीखने में लगना चाहिये उससे कहीं अधिक यह सिद्ध करने में लगता है कि कितना सीखा। अध्यापक सहज चिंतक होते हैं, चिंतक प्रयोगधर्मी होते हैं, यह बात अलग है कि विद्यालयों में उन्हें इन प्रयोगों की छूट नहीं मिलती है। बड़े संस्थानों में स्थिति थोड़ी बेहतर हैं और अध्यापकों को परीक्षा की विधियाँ निश्चित करने की स्वतन्त्रता रहती है। उनके लिये भी यही दो प्रश्न मन में रहते होंगे कि परीक्षा की विधि ऐसी हो जिससे विद्यार्थी सारा पाठ्यक्रम पढ़ने को बाध्य हो, और इस तरह पढ़ें जिससे विषय स्पष्ट रूप से उन्हें समझ आये और अन्ततः लम्बे समय तक मस्तिष्क में बना रहे।

पढ़ाई में नियमितता से अधिक अचूक अस्त्र कुछ भी नहीं है। यदि नियमतता है तो बड़ा और कठिन पाठ्यक्रम भी ग्राह्य हो जाता है। औचक परीक्षा एक ऐसी विधि है जो विद्यार्थी को नियमित रहने को बाध्य कर देती है, नित्य कक्षा में आना, विषय को समझना और गृहकार्य ढंग से करना। कक्षा में अन्तिम २० मिनट में वर्तमान विषय से संबंधित एक प्रश्न ही पर्याप्त होता है, इसके लिये। आईआईटी में जिन विषयों में औचक परीक्षा की विधि अपनायी गयी थी, वे विषय अभी भी स्पष्ट हैं मनसपटल पर। प्रबन्धन संस्थानों में नियमितता बनाये रखने के लिये केस स्टडी का सहारा लिया जाता है। वास्तविक जीवन की एक घटना को पढ़ने, समझने और पढ़े हुये सिद्धान्त प्रयुक्त करने को कहा जाता है, उस पर चर्चा होती है और अंक निर्धारित किये जाते हैं।

विषय का गहन ज्ञान परखने के लिये कई प्रोफेसर एक एक प्रश्न सभी विद्यार्थियों को पकड़ा देते हैं, साथ में देते हैं एक दिन या एक सप्ताह का समय। ये प्रश्न बहुधा शोध की विषय से संबद्ध होते हैं और इनका कोई एक उत्तर नहीं होता है। विषय की समझ जितनी अधिक होती है, आप उतना ही अधिक दूर तक उस प्रश्न को सुलझा सकते हैं। इसके लिये विद्यार्थियों की संख्या कम होनी चाहिये क्योंकि एक छोटे विषय से संबद्ध शोधगत प्रश्न बहुत अधिक नहीं होते हैं। दूसरी विधि बड़े प्रोजेक्ट की है जिसमें विद्यार्थी को कई पुस्तकों से पढ़कर शोध करना पड़ता है। जब कई पुस्तकों से पढ़कर लिखना होता है तो विषय अपने आप मस्तिष्क में उतरता जाता है। इन दो विधियों में परीक्षा की व्यग्रता के स्थान पर ज्ञान का विस्तार होता है, जो शिक्षा का प्राथमिक उद्देश्य भी है।

जहाँ पर परीक्षा लेना आवश्यक है, वहाँ भी प्रोफेसर सार्थक प्रयोग करते दिख जाते हैं। परीक्षा कक्षों में किताब ले जाने की छूट इसका एक उदाहरण है। जब वास्तविक जीवन में पुस्तकों और संदर्भों से सहायता लेने की छूट रहती है तो परीक्षा के समय उस सुविधा से क्यों वंचित रहा जाये। पुस्तकों को ले जाने की छूट से तैयारी करते समय विषय के मौलिक सिद्धान्तों को ढंग से समझने का समय मिलता है क्योंकि केवल याद रखने वाली चीजें तो कभी भी पुस्तक से देखी जा सकती हैं। आवश्यक पर पूरा ध्यान और अनावश्यक से पूरी मुक्ति इस विधि की विशेषता है। एक दूसरी विधि में प्रोफेसर ने अन्तिम के ५ मिनट एक दूसरे से बात करने की पूरी छूट दे दी थी। इस समय में एक दूसरे से बात करके छोटी भूलों को सुधारने का पूरा समय मिल जाता है पर पूरा उत्तर पुनः लिखने का समय नहीं मिलता है। यह छूट कई अवसरों पर बहुत काम की सिद्ध होती है।

एक विधि, जिसने मुझे सर्वाधिक प्रभावित किया और जिसमें विद्यार्थी और अध्यापक के उद्देश्यों को पूर्ण निष्कर्ष मिलते हैं। अध्यापक का उद्देश्य होता है कि विद्यार्थी पूरा विषय ढंग से पढ़े, विद्यार्थी का उद्देश्य होता है कि उसे अधिकतम अंक मिलें। अध्यापक ने निश्चय किया कि वह आपसे बस १० मिनट के लिये बात करेंगे, ३ प्रश्न पूछेंगे, उन अध्यायों पर जिन पर आप स्वयं को सहज अनुभव करते हों। लिखित से अधिक प्रभावी होती है मौखिक परीक्षा। १० मिनट के साक्षात्कार के बाद आपको आपके ग्रेड बता दिये जायेंगे। यदि आप संतुष्ट न हों तो आपको थोड़ी और तैयारी के बाद पुनः आने को कहा जायेगा और पुनः वही प्रक्रिया, और यह तब तक होता रहेगा जब तक विद्यार्थी अपने ग्रेड से संतुष्ट न हो जाये। लगभग एक तिहाई ने एक बार में ही 'ए' ग्रेड प्राप्त किया, शेष दो तिहाई को दो या अधिक बार यह प्रक्रिया अपनानी पड़ी। एक विद्यार्थी ने ५ बार साक्षात्कार दिया और अन्ततः 'ए' लाया। सबको 'ए' मिला और सबने उसके लिये यथोचित श्रम लगाया। यद्यपि प्रशासन को यह रास नहीं आया पर उसके पास भी किसी का भी 'ए' ग्रेड नकारने का कारण भी नहीं था, सबको वह विषय ढंग से आता था।

छोटी कक्षाओं के लिये अंक के स्थान पर ग्रेड देना, परीक्षा की व्यग्रता घटाने का एक अच्छा प्रयास है। विद्यालयों में कक्षाओं के अतिरिक्त वास्तविक जीवन से भी सीखने पर यथोचित बल दिया जा रहा है। बाहर घूमने ले जाना, खिलौने के माध्यम से समझाना और अन्य रोचक विधियों से सिखाना, ये सब प्रयोगधर्मिता के सशक्त उदाहरण हैं। इसी रोचकता के बीच बच्चे का स्तर परख लिया जाये और उसे आगे बढ़ने दिया जाये। जब परीक्षा का बोझ कम होगा और मस्तिष्क में कुछ स्थान खाली रहेगा, तभी सृजनता और नवीनता व्यक्तित्व का निर्माण कर पायेंगी।

परीक्षायें भार न लगें, ज्ञान का उपहार लगें।

152 comments:

  1. पढ़ाई और परीक्षा के तरीकों से रोचकता पैदा की जा सकती है जिससे विद्यार्थी पढ़ाई को अपने व्यक्तित्व विकास करने के लिये उपयोग में ला सके, और विद्यार्थी उन पाठों को अपने मानस पटल से कभी मिटा ना पाये।

    अगर कोई ठोकर खाकर सीखता है तो उसे हमेशा याद रहती है, परंतु दूसरों के अनुभव से सीखना या समझकर सीखना जल्दी भूल जाता है।

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    1. यदि वही ज्ञान रोचक ढंग से दिया जाये और किसी और रोचक तरीके से बिना ज्ञान-प्रक्रिया बाधित किये परख लिया जाये तो उससे अच्छा कुछ भी नहीं।

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    2. इस पोस्ट का इंतज़ार हमें भी था..:)
      आपने कितनी सहजता और अच्छे से बातों को यहाँ लिख दिया..
      बहुत अच्छी पोस्ट!

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    3. अभी नक़ल वाली घटनाओं का आना शेष है।

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  2. विद्यार्थियों का कन्फ्यूजन इससे दूर होगा |अच्छी पोस्ट |सर होली की शुभकामनायें |

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    1. परीक्षा की तैयारी और व्यग्रता शिक्षा-प्रक्रिया को बाधित सा कर रहे हैं।

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  3. परीक्षा व्यवस्था को खंगालती और भावी संभावनाओं को तलाशती पोस्ट

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    1. प्रयोगधर्मिता की छूट देनी होगी, शेष कार्य चिन्तनशील अध्यापक कर लेंगे।

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  4. अच्छी विधियाँ हैँ पढ़ाई मेँ रोचकता लाने के लिए। धन्यवाद सर ऐसी जानकारी के लिये।अपने अध्यापक बन्धुओँ को होली की शुभकामनाएँ!!!

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    1. अध्यापक बन्धुओं को मेरी ओर से भी हार्दिक शुभकामनायें।

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  5. परीक्षा को खेल और इस खेल को उसके नियमों से ही खेला जाना वाजिब होता है.

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    1. नियम खेल की गुणवत्ता बढ़ायें तो आनन्द ही आ जाये।

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  6. परीक्षा का सिलसिला ।
    बढ़िया विश्लेषण मिला ।

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    1. स्वस्थ बने आधारशिला..

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  7. भारत में परीक्षा और पद्धतियों को लेकर परीक्षण, और प्रयोग का दौर चलता रहा है, चल रहा है! पता नहीं कब यह अपनी नियति को प्राप्त करेगा।

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    1. अच्छे प्रयोगों को शिक्षा व्यवस्था में स्थायी स्थान मिले..

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  8. यह सही है कि हमारी परीक्षा व्यवस्था अक्सर विद्यार्थियों की कल्पनाशीलता और सृजन पर एक भार हो जाती है !
    सार्थक आकलन !

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    1. वर्तमान परीक्षा पद्धति में सृजनशीलता और कल्पनाशीलता बाधित सी दिखती हैं..

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  9. सरकारी स्कूलों में परीक्षा के नाम पर मजाक हो रहा है.लगातार रिकॉर्ड बेहतर होने के बावजूद बारहवीं पास बच्चे एक शुद्ध वाक्य बोल या लिख नहीं पाते.यह हमारी शिक्षा या परीक्षा-प्रणाली की असफलता नहीं तो और क्या है ?

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    1. शिक्षा का हौवा इसी तरह के उत्पाद देगा, देश को शुभकामनायें..

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  10. हाँ अब छोटी कक्षाओं में तो काफी बदलाव आ गया है पढाई के तरीकों में ....... सृजनशीलता के भी मन मस्तिष्क में जगह खाली बचनी चाहिए ......

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    1. छोटी कक्षाओं के सफल प्रयोग बड़ी कक्षाओं में भी पहुँचे..

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  11. आपके ये अनुभव परीक्षार्थियों के संबल बनेगें !

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    1. यह बात परीक्षा लेने वालों को समझ में आये तो बात बने..

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  12. Bahut hee badhiya aalekh!

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    1. बहुत धन्यवाद आपका..

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  13. ab to pariksha ka der nikal hi jayega dimag se.........sartahk lekh ke liye shukriyan

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    1. परीक्षा का डर ज्ञान को बाधित करता है, छात्र परीक्षा के लिये पढ़ने लगता है, सीखने के लिये नहीं।

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  14. परीक्षा पद्धति में बदलाव दिखे तो लगे है ग्रेडिंग लागू करके . लेकिन मैंने एक बात और महसूस की है की प्ररीक्षा को ओप्सनल बनाया जा रहा है जो ठीक नहीं लगता .

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    1. पूरी निरंकुशता नहीं की जा सकती है पर परीक्षा साखने और समझने में प्रेरक हो

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  15. खूब सोचा-विचारा ,अच्छा है कोई रास्ता निकले जो ग्राह्य हो सके !

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    1. राह तो निकलनी ही होगी, छात्रों को तनावग्रस्त करके तो नहीं सिखाया जा सकता है।

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  16. पढ़ाई. परीक्षा ... सबमें बदलाव है और कई बदलाव बेकार लगते हैं .

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    1. पद्धति उद्देश्य के अनुरूप ही हो।

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  17. जिस प्रकार आजकल परिक्षार्थी परिक्षाओं को हौव्वा बना लेते हैं और जितना दबाव महसूस करते हैं, उस से बचने के लिये ऐसे बदलाव बहुत अच्छे हैं।

    प्रणाम

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    1. पूरे वर्ष में परीक्षा ही प्रधान हो जाती है, शेष सब छूट जाता है।

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  18. परीक्षा का आनन्द तब है, जब आप परीक्षा देकर बाहर निकले और आत्मविश्वास से कह पायें कि मेरे इतने अंक आयेंगे भले वह संख्या शून्य ही क्यों न हो. और आकलन करने के लिये परीक्षा का होना तो अत्यावश्यक है.

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    1. परीक्षा और उसका आकलन, दोनों पर ही विचार करने की आवश्यकता है।

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  19. परीक्षा उत्तीर्ण होना और विषय की समझ होना, सफल होना और ज्ञानी होना.. विरोधाभास कब दूर होगा!!

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    1. काश किसी छात्र के लिये इन सबका अर्थ एक ही हो।

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  20. रोचक एवं सारगर्भित लेख...
    हार्दिक बधाई..

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    1. बहुत धन्यवाद आपका

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  21. बेहद प्रायोगिक. सौ टके की बातें. यदि यही अंग्रेजी में लिखें तो १०००० डालर की बात होती.

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    1. प्रयोग अध्यापक कर रहे हैं और उसके अच्छे निष्कर्ष भी निकल रहे हैं

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  22. उद्वेलित करती हुई ..सार्थक चिंतन..

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  23. Apke iss post ne school collge ki yaad dila thi..! Aaj bhi uss time ke baare main soochne se jaan nikal jate hai!

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    1. परीक्षा का भय समाप्तकर न जाने कितना कुछ और सिखाया जा सकता है।

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  24. bahut prabhaav shali aur rochak likha hai padhne me interest bana raha yahi to visheshta hai aapke lekhan ki.

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    1. इसी प्रकार की रोचकता शिक्षा पद्धति को भी बनाये रखनी हो।

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  25. रोचक सार्थक प्रस्तुति,....

    NEW POST...फिर से आई होली...

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    1. बहुत धन्यवाद आपका।

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  26. परीक्षायें भार न लगें, ज्ञान का उपहार लगें।

    सार्थक चिंतन ...प्रभावी आलेख ...!!

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    1. परीक्षाओं को हल्का और सतत तो बनाना ही होगा, वर्ष का अन्त तो वर्ष का निर्धारण नहीं कर सकता है।

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  27. kuchh salo pahle ye post dekha hota:)

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    1. कुछ प्रयोगों में हिस्सा बना हूँ ओर उसका व्यक्तिगत विश्लेषण भी किया है।

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  28. .सार्थक चिंतन.रोचक लेख....

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    1. बहुत धन्यवाद आपका।

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  29. परीक्षा के दौरान बेहतर अंक लाने का दबाव अक्सर विद्‌यार्थियों के अस्वस्थ होने का कारण बनता है। विशेषकर, तब जबकि उन्होंने सालभर जमकर पढ़ाई न की हो। अति महत्वाकांक्षी अभिभावकों के दबाव के कारण ही अपेक्षित परिणाम नहीं आने पर विद्‌यार्थी मानसिक रूप से टूट जाते हैं और गलत कदम उठा लेते हैं। परीक्षा का भार कम करने की कोई भी योजना अभिभावकों की सक्रिय सहभागिता के बिना पूरी नहीं होगी।

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    1. परीक्षा के पहले और अंक आने के बाद तनाव झेलते हैं बच्चे। परीक्षाविधि सहज हो तो रुचि बनी रहेगी।

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  30. Replies
    1. बहुत धन्यवाद आपका

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  31. होली है होलो हुलस, हाजिर हफ्ता-हाट ।

    चर्चित चर्चा-मंच पर, रविकर जोहे बाट ।


    रविवारीय चर्चा-मंच

    charchamanch.blogspot.com

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    1. बहुत आभार आपका यह पोस्ट सम्मिलित करने के लिये।

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  32. upyukt samay ki sarthak rachna .......bahut sunder sujhav hai baccho ke liye

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    1. यह सब प्रयोग अच्छे निष्कर्ष दे चुके हैं, आवश्यकता है इन्हें स्थायी करने की।

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  33. Bahut achhi baat kahi hai aapne...

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    1. बहुत धन्यवाद आपका

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  34. विचारोतेजक सार्थक पोस्ट.

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    1. विचारों को प्रयोग में स्थान मिलता रहे और प्रयोगों को जीवन में भी।

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  35. बहुत बढ़िया प्रस्तुति!
    रंगों के त्यौहार होलिकोत्सव की अग्रिम शुभकामनाएँ!

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    1. आपको भी शुभकामनायें।

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  36. samayanukool post!!!!!!!!

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    1. बहुत धन्यवाद आपका

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  37. aadarniy pravin bhai sahab PRANAM SWIKAREN. GRADATION ek bahut hi kamajor pranali hai jisamen nirantarata tutati hai . kabhi wistar se baten karenge yadi bhawan ne awasar diya to.exa aur edu.pranali me sudhar jaruri hai kintu puri pidi ka satyanash ho jaye aisa nahin. panch sal bad kisi saamany ghar ka ladaka chaparasi bhi nahi ban payega yadi aisaa hi badalaw ka daur chala to.

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    1. संघर्ष तो हमारे रग रग में बसा है, जब संसाधन कम हों तो यह स्वाभाविक भी है। प्रणाली ज्ञान आधारित हो, आकलन आधारित न हो।

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  38. SIR....bahut hi badiya aalekh...pahle main bhi sochti thi..ITNE MEIN SE ITNE TO MUJHE MIL HI JAYENGE...

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    1. अंक यदि आपके ज्ञान का आकलन होते को कोई समस्या ही नहीं थी। एक तो बहुत अधिक पढ़ना और उसे ठीक से समझ न पाना, यह पद्धति का ही दोष कहा जायेगा।

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  39. पढ़ाई में नियमितता से अधिक अचूक अस्त्र कुछ भी नहीं है। यदि नियमतता है तो बड़ा और कठिन पाठ्यक्रम भी ग्राह्य हो जाता है। औचक परीक्षा एक ऐसी विधि है जो विद्यार्थी को नियमित रहने को बाध्य कर देती है, नित्य कक्षा में आना, विषय को समझना और गृहकार्य ढंग से करना। कक्षा में अन्तिम २० मिनट में वर्तमान विषय से संबंधित एक प्रश्न ही पर्याप्त होता है, इसके लिये।
    ग्रेडिंग प्रणाली और मौखिक परीक्षण अच्छे प्रयोग हैं हीन भावना कम करने का कारगर उपाय भी .संरचनात्मक पढ़ाई सीखाई का अपना विशेष स्थान है .स्ट्रक्चरल एजुकेशन आज की आवश्यकता है .

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    1. यह स्तम्भ बनाये जा सकते हैं, ज्ञान देने के साथ साथ किसकी किसमें रुचि है और कौन किसके लिये सर्वाधिक उपयुक्त है, यह भी पता करने का काम शिक्षा पद्धति का ही हो।

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  40. मै अब तक भी किसी परीक्षा में सफ़ल नहीं हो पाई हूँ......सफ़ल होना क्या होता है?..और मुझे लगता है प्रश्न हमेशा बाकि रहना चाहिए...

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    1. सफल होते होते लोग जीवन में असफल होने लगते हैं।

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  41. मध्य प्रदेश में एकलव्य नाम का ग्रुप इस विषय में अच्छा शोध कर रहा है.संदर्भ नाम की एक पत्रिका भी निकलता है. आपको पसंद आएगी.

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    1. यदि आप कृपा कर उसका लिंक ईमेल कर दें तो आभारी रहूँगा।

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  42. परीक्षायें भार न लगें, ज्ञान का उपहार लगें...

    बढ़िया लेख...

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    1. भार लगने से शिक्षा की रोचकता कम हो जाती है।

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  43. विद्यार्थी पाठ्यक्रम विमर्श से अधिक प्रश्नपत्र विमर्श करते हैं :P
    Damn true... just finished with exams and your post gave me enough points to think :)
    Problem we are facing today is with few exceptions (IITs, IIMs etc) the quality of teaching across India is in a sorry state... universities have pathetic teachers which in turn results in more pathetic students.

    visiting after a long time !!
    hope u doing fine :)

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    1. हर परीक्षा के बाद सोचता था कि क्या खोया क्या पाया? असंतुष्ट होकर पुनः अगले साल की तैयारी में लग जाता था..

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  44. अच्छी पोस्ट ... सार्थक चिंतन ... वैसे इस विषय पे सरकार को सार्वजनिक बहस का के माध्यम बदलना चाहिए ...

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    1. बहस आवश्यक है और सबको बोलने का विषय भी है। सब ही इस व्यवस्था की देन हैं..

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  45. स्कूल में हमारे एक अध्यापक थे।
    परीक्षा के कुछ दिन पहले syllabus पूरा हो चुका था।
    उन्होंने हम विध्यार्थियों से कहा " मैंने course पूरा पढा दिया। कुछ पूछना हो तो पूछो।
    एक विध्यार्थी ने पूछा "सर, कृपया बताइए exam के लिये important topics कौनसे हैं ताकि हम उसपर ज्यादा ध्यान दे सकें।
    अध्यापक ने उत्तर दिया "वे सभी topics जिसमें तुम कमजोर हो, important हैं।

    शुभकामनाएं
    जी विश्वनाथ

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    1. कुछ अध्यापक बस यही ढूढ़ने में लगे रहते हैं कि छात्रों को क्या नहीं आता है? निश्चय ही यह तो हमारा उद्देश्य नहीं था।

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  46. प्रवीण जी ,

    बहुत सार्थक मुद्दा उठाया है आपने ... लेकिन आज शिक्षा पद्धति में बदलाव होने के बाद भी असल वो नहीं है जो दिखता है ... छोटी कक्षाओं में मौखिक परीक्षा , प्रोजेक्ट वर्क के नाम पर बच्चों को कुछ ज्ञान नहीं मिल पाता ... क्यों कि नीतियाँ ऐसी हैं कि आप को बच्चे को अगली कक्षा में भेजना ही है ... यदि बच्चा उत्तीर्ण नहीं हो रहा तो शिक्षक की शामत आ जाती है ... और इन सबसे बचने के लिए शिक्षक उन बच्चों को ए + ग्रेड देते हैं जो एक शब्द भी नहीं बोलते .... क्यों कि लिखित में तो वो बच्चे कुछ लिखेंगे ही नहीं ...यहाँ तक कि जो बच्चा केवल प्रश्न पत्र के प्रश्न ही उतार कर लिख देता है उसे भी उसके सुलेख के आधार पर अंक देने पड़ जाते हैं ... आपने लिखा है कि जब तक सब ए ग्रेड नहीं लाये तब तक मौखिक परीक्षा ली गयी ... पर यह युक्ति हर जगह नहीं चलती .... शिक्षक भी अपने बोझ को क्यों बढ़ाए ? यह भावना उसके मन में रहती है ....अंक लुटाने में उसके घर से क्या जाता है ... एक बार परीक्षा ली और काम खत्म ... यदि सच ही शिक्षा के प्रति गंभीर हैं तो सही निरीक्षण हो ... और देखा जाए कि जो अंक बच्चों को मिले हैं वो उचित हैं या नहीं ... यह सब मैं छोटी कक्षाओं की बात कर रही हूँ .... निजी संस्थानों में क्या होता है यह नहीं कह सकती .... केंद्रीय विद्यालय में रह चुकी हूँ .... अपने अनुभव से ही यह बात कही है ... आभार

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    1. आपका कहना शब्दशः सही है, बिना शिक्षा पद्धति में बदलाव किये परीक्षा पद्धति बदलने से कुछ नहीं होगा। जो घटना बतायी है वह आईआईटी की है और वहाँ सब परीक्षा और ग्रेड का अर्थ समझते हैं। बच्चों के लिये अन्तर ही नहीं पड़ता है कि वह क्या सीख रहे हैं क्या नहीं? उन्हें बहुत सम्भाल कर ढालना पड़ता है। हर माता पिता ध्यान दें और विद्यालय में भी एक अध्यापक २० छात्रों से अधिक को न देखे।

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  47. जितना सार्थक आलेख है उतने ही अच्छे आपके उत्तर है टिप्पणियों के.लेख गहन चिंतन से निकला लगता है जिस पर विचारो का सतत प्रवाह चल हीरहा हो.

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    1. जीवन भर परीक्षाओं से गुजरने के बाद यही विचार रह रहकर आता है कि परीक्षायें शिक्षा का कितना हित कर रही हैं।

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  48. परीक्षा पर आपकी पिछली पोस्ट और ये पोस्ट सार्थक लगी। शिक्षा के क्षेत्र में बदलाव हो रहा है पर अभी भी बहुत सारे बिंदुओं पर और काम किया जाना जरूरी है जिसका जिक्र आपकी इन दोनों प्रविष्टियों में भी हुआ है।

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    1. प्रयोगों को स्थायी रूप न देने तक कोई बड़ा बदलाव आना कठिन है, प्रयोगों को समझ कर अपनाना।

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  49. बहुत बढ़िया प्रस्तुति!
    रंगों के त्यौहार होलिकोत्सव की अग्रिम शुभकामनाएँ!

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    1. आपको को भी ढेरों शुभकामनायें..

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  50. मेरा पहले का कमेंट चोरी चला गया...


    :)


    सार्थक चिंतन..

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    1. कनाडा से आते आते बीच में इतने लुटेरे जो बैठे हैं।

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  51. परीक्षाओं के अपने लटके झटके टोटके हर दौर में रहें हैं . १९६१-६३ का दौर याद है हम पढ़ते थे इंटर -मिदियेत साइंस यानी आई एससी में यानी बारवीं में .

    परीक्षा के दिनों में विषय के पर्चे से सम्बद्ध २४ घंटे पहले का गैस (गैस पेपर )आता था .कीमत होती थी चार आना .हाथों हाथ बिक जाता था .

    परीक्षा पूर्व मारिया साहब का गैस लो .अंग्रेजी की परिक्षोँ में फिट बैठता है यह दौर था १९८० -१९९० का .हम खुद व्याख्याता थे महाविद्यालय में .

    अब तो बाकायदा अखबारों में मोडल प्रश्न पत्र परीक्षा पूर्व प्रकाशित किये जातें हैं .

    अपनी उत्तेजना रही है इस सबकी .अलबत्ता मौखिक माहिरी सबको समान अवसर देती है अपने चुनिन्दा विषय पर सीखने का .पसंद आया यह आलेख .

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    1. गेस पेपर सारे ज्ञान के उत्कर्ष के रूप में आ जाता है, पिछला सीखा सब भूल जाता है इस समय।

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  52. असली परीक्षा तो पढ़े हुए को apply करने में ही होती है.
    सुन्दर सार्थक प्रस्तुति.

    होली की सभी जन को हार्दिक शुभकामनाएँ.

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    1. अध्यापक जब प्रोजेक्ट देते थे तो उस विषय की इतनी जानकारी हो जाती थी कि उस पर पूछा कोई भी प्रश्न सविस्तार समझाया जा सकता है।

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  53. बढ़िया संग्रहणीय पोस्ट
    रंगोत्सव पर आपको शुभकामनायें !

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    1. आपको भी होली की ढेरों शुभकामनायें..

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  54. इस समय अंक संक्रमण काल चल रहा है, विज्ञानं के छात्रों को प्रायोगिक अंक प्राप्त होते हैं जिससे उन्हें आसानी रहती है, परन्तु अन्य संकाय तो परेशानी झेलते रहते हैं.

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    1. कई लोग केवल इसीलिये विज्ञान विषय लेते हैं कि प्रायोगिक परीज्ञाओं में पूरे अंक हो जायें।

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  55. बहुत ही सार्थक विषय ...सटीक लेखन के लिए ..आभार ।

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    1. बहुत धन्यवाद आपका..

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  56. lagta hai jaise shabdon ka apne vash mein kar liya hai aapne... kaash vaakyon ka itna shuddhi karan humare paas bhi hota... ghar jane ko late ho raha hai fir bhi pura padhe bina rah nahi paya....

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    1. शब्दों ने हमें वश में कर रखा है, इनके पाश से निकल पाना बड़ा कठिन है।

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  57. सुन्दर लेख के लिए आभार के साथ ही .....होली पर हार्दिक शुभकामाएं पाण्डेय जी |

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    1. धन्यवाद और आपको भी होली की शुभकामनायें..

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  58. परीक्षा और उसके अंक..हमेशा ही ज्यादातर विद्यार्थियों के लिए डर का ही सबब होता है..

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    1. जान तो अंकों पर ही अटकी रहती है, पढ़ाई गौड़ हो जाती है।

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  59. परीक्षायें भार न लगें, ज्ञान का उपहार लगें-- शिक्षा का ऐसा ही स्वरुप होना चाहिए न की साल भर भार स्वरुप किसी भी तरह 10 प्रश्न पढ़कर पूरे साल की डिग्री ले लेना .

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    1. सच कहा, गेस पेपर का समय है, कौन सा प्रश्न फँस रहा है, इस पर अधिक ध्यान है।

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  60. आज की पढ़ाई ज्ञान अर्जन पर कम और परीक्षा में नंबरों पर अधिक जोर देती है...बहुत सार्थक आलेख..होली की हार्दिक शुभकामनायें!

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    1. बस अच्छे अंक की विधि ज्ञात हो जाये, पढ़ाई पर तब कोई ध्यान नहीं देना चाहता है।

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  61. परीक्षा प्रणाली में बदलाव की नितांत आवश्यकता है ! परीक्षा प्रणाली ही पढाई के तरीके को तय करती है ! आपने सही लिखा है कि पढाई ज्ञानार्जन का साधन होना चाहिए न कि बोझ !
    आपको सपरिवार होली की अनंत शुभकामनायें !

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    1. परीक्षा के समय पर यही लगता है कि वर्ष भर कोई बोझ ढोया गया है।

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  62. परीक्षा प्रणाली में बदलाव की नितांत आवश्यकता है ! परीक्षा प्रणाली ही पढाई के तरीके को तय करती है ! आपने सही लिखा है कि पढाई ज्ञानार्जन का साधन होना चाहिए न कि बोझ !
    आपको सपरिवार होली की अनंत शुभकामनायें !

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  63. आप को और आपके पूरे परिवार को हमारी ओर से होली मुबारक हो

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    1. आपको भी बहुत शुभकामनायें..

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  64. विश्लेषण परक अच्छा आलेख .होली मुबारक .

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  65. prviin bhai aap ko privar sahit rngotsv kii meri or se hardik shubhkamnaye kripya swikar kr len mujhe prsnnta hogi
    aap ka pyar nirntr mere sathrhta hai kin shbdon me aabhar vykt kroon bndhu mere hridt me aap ka vishesh sthan hai
    pun:hardik aabhar
    kripya apna mail bhejen
    mera mail hai - dr.vedvyathit@gmail.com

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    1. आपका बहुत बहुत आभार..

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  66. :(
    अब ये सब पढ़ने से क्या फायदा, नंबर तो बढ़ने से रहे ...

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    1. बिना नम्बर की पढ़ाई अच्छी भी नहीं लगती थी अब तक। स्वान्तः सुखाय पढ़ना तो बहुत देर से सीखा..

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  67. अध्यापक और छात्र के संबंध में दया आना स्वाभाविक है, दयालु संस्कृति बनाये जो रखनी है।

    परीक्षायें भार न लगें, ज्ञान का उपहार लगें...
    ati uttam ,priksha chahe jaisi bhi ho thoda darati to hai hi ,haan himmat nahi harni chahiye .

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    1. परीक्षाओं के भार से ज्ञान बाधित न हो, बस यही अपेक्षा है परीक्षा से..

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  68. is lekh se bachpan ke padhai wale din yaad aa gaye ,sabke anubhav aur aapki post dono ne to kai baate yaad dila di .

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    1. जब भी परीक्षा का तनाव होता था, गर्मी का माहौल रहता था। अब भी गर्मी में तनाव आ जाता है।

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  69. परिक्षा और कोयल की कूक का गहन संबंध है । कोयल की कूक मतलब परीक्षा के दिन ।
    मुझे तो कॉलेज छूटने के बाद कई सालों तक कोयल की कूक से दिल की धडकनें बढ जाने का अनुभव है ।
    गैस पेपर संभावित प्रश्न यह तो परीक्षार्थियों का साझा अनुभव है चाहे कितन ही तैयारी क्यूं ना की हो रेडीमेड पेपर का मोह संवरण किसे नही होता । पर आप जैसी स्थिति बता रहे हैं वह तो केवल प्रोफेशनल संस्थानों में ही होती होगी ।
    स्कूली विधार्थियों के ऐसे भाग्य कहां ?

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    1. सच कहा आपने, गर्मी आते ही तनाव सा लगने लगता है अब भी..

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  70. इस पोस्‍ट में मेरे कई कई सहपाठियों के और कुछ अध्‍यापकों के चेहरे नजर आने लगे मुझे।

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    1. हमने तो परीक्षा के समय पूर्णव्यथित से न जाने कितने चेहरे देखे हैं..

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  71. विचार उत्तेजक पोस्ट है यह आपकी बहुत अच्छा और सार्थक लिखा है आपने वाकई परीक्षा विधि में बदलाव लाया जाना बहुत ज़रूर है ताकि परीक्षायें बोझ नहीं रोचक बन सके।

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    1. परीक्षायें साल भर होती रहेंगी और रोचक रहेंगी तो शिक्षा सफल रहेगी..

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  72. बच्चे और अभिभावक दोनो पहले से अधिक चिंतित रहते हैं। ग्रेडिंग सिस्टम से बोझ कम हुआ ऐसा नहीं लगता।

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    1. तय तो यही था कि ९८ वाले को ९९ वाले से चिढ़ हो आती थी, उसे कम किया जा सकता है ग्रेडिंग व्यवस्था से।

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  73. गंभीर मुद्दे पर सहज व्यवहारिक और सार्थक विचार।
    एसा आप ही कर सकते हैं।
    बधाई और शुभकामनाएं।

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    1. बहुत आभार आपका, परीक्षा पद्धति आत्ममंथन चाहती है।

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  74. prabhavshali post .....sadar abhar pandey ji.

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  75. बहुत सुन्दर प्रस्तुति. खूबसूरत तस्वीरें....

    आपको सपरिवार रंगों के पर्व होलिकोत्सव की हार्दिक शुभकामनाएँ......!!!!

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  76. बहुत बहुत धन्यवाद आपका।

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  77. शायद आपकी इस प्रविष्टी की चर्चाआज बुधवार के चर्चा मंच पर भी हो!
    सूचनार्थ

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