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29.2.12

आस धुआँ, हर साँस धुआँ

रघुबीरजी के लिये कूड़े के ढेर का प्रकरण अन्ततः एक चिरकालिक शान्ति लाया, यद्यपि इसके लिये उन्हें नगर निगम के अधिकारी के साथ मिलकर सारा भ्रम दूर करना पड़ा। अपने प्रयासों से रघुबीरजी एक जागरूक नागरिक के रूप में पहचान बना चुके थे, लोगों को उन पर विश्वास बढ़ चला था और पर्यावरण संबंधी किसी भी नये विषय में पहल करने के लिये अधिकृत थे।

मानसून अतृप्त धरा को संतृप्त कर के चला गया, कृतज्ञ धरती ने भी फल फूल दिये, धनधान्य दिया। जीवजगत की जठराग्नि प्रचंड ठंड में अपने पूरे आयाम में रहती है, प्रकृति जब खाने को देती है तो भूख भी देती है। शरीर को जीवन रस मिलता रहता है, स्वास्थ्य बढ़ने लगता है, मन भी प्रसन्न हो जाता है। शरीर और प्रकृति का बसन्त साथ साथ ही आ जाता है। रघुबीरजी प्रकृति के इस चक्रीय कालखण्ड को सानन्द बिता रहे थे, अपने व्यक्तिगत और व्यावसायिक कार्य निपटा रहे थे, तभी पतझड़ आ पहुँचा।

प्राकृतिक परिवेश में प्रकृति के कार्य स्पष्ट रूप से दिखायी नहीं पड़ते हैं, स्वतः हो जाते हैं, पता ही नहीं चलते हैं। प्राकृतिक परिवेश की अनुपस्थिति हमें प्राकृतिक प्रक्रियायें समझने को विवश कर देती है। पतझड़ गावों में भी आता है, पेड़ों से पत्ते झड़ते हैं, धरती से पोषित पत्ते धीरे धीरे धरती में विलीन हो जाते हैं, खाद बनकर, आगामी पत्तों को पोषित करने के लिये। नगरों में यह संभव नहीं हो पाता है, एक तो पेड़ ही कम हो चले हैं। दूसरा जब पत्ते झड़कर कांक्रीट या रोड पर गिरते हैं तो अपना निर्वाण बाधित सा पाने लगते हैं। नगरीय जीवन का यह पक्ष एक नयी समस्या लाता है, पत्तों को समेटने की समस्या और यदि उन्हें तुरन्त न समेटा जाये तो वह कूड़े के रूप में नगर में बिखर जाते हैं, यत्र तत्र सर्वत्र।

नगरनिगम होता ही है, नगरीकरण से उत्पन्न समस्याओं का निवारण करने के लिये। एक तन्त्र ही है कोई मन्त्र नहीं कि सारे कार्य पलक झपकाते ही कर डाले। कहने को तो पतझड़ के समय पत्ते समेट कर ले जाने का कार्य नियमित रूप से होना चाहिये, नगरनिगम साप्ताहिक ही कर दे तब भी कृतज्ञ बने रहना चाहिये। नगरनिगम की उदासीनता ने रघुबीरजी के पड़ोसियों को एक नयी विधि अपनाने को विवश कर दिया। आसपास की सोसाइटियों के कुछ उत्साही युवकों ने सफाई कर्मचारियों द्वारा एकत्र इन पत्तों को आग लगा देने का उपाय निकाल लिया। दिन के समय सड़कों पर आवागमन बना रहता है अतः लोगों ने रात में सुलगाने का क्रम बना लिया।

आत्मिक उन्नति और प्राणों में आयाम बनाये रखने के लिये रघुबीरजी अपनी बालकनी में प्राणायाम करते हैं, सुबह सुबह की शुद्ध ऑक्सीजन पूरे शरीर को ऊर्जामय कर देती है। पिछले दो दिनों से प्राणायाम निष्प्रभावी हो रहा था, कारण था फेफड़ों में पहुँची धुँयें की पर्याप्त मात्रा। गन्ध और दृष्टि से समझने का प्रयास किया तो कारण स्पष्ट समझ में आ गया। लगभग सौ मीटर की दूरी पर पत्तों की आग रात भर से सुलग रही थी। धुयें का यह गुबार धीरे धीरे स्मृति में घनीभूत होने लगा। ऐसा नहीं कि यह पतझड़ की ही समस्या थी, धुयें के दो और स्रोत रघुबीरजी को याद आ गये।

जाड़ों के समय भी उसी ओर से सुबह सुबह कुछ सुलगने की गंध आती थी। यद्यपि उस समय बालकनी में प्राणायाम न करने से वह धुआँ रघुबीर जी को अधिक प्रभावित नहीं करता था, पर परिवेश में जले टायर और प्लास्टिक की गंध से वातावरण बुरी तरह से प्रदूषित हो जाता था। उसका कारण भी उन्हें समझ आ गया था, आसपास की सोसाइटियों और एटीएम के चौकीदारों को रात में तापने के लिये जो भी मिल जाये, उसे सुलगाने की आदत थी। अब जीवन किसे प्रिय नहीं होता पर जब विकल्प ठंड या प्रदूषण में से किसी एक से मरने का हो, तो सब प्रदूषण करने बैठ जायेंगे, इस पर कोई आश्चर्य भी नहीं होना चाहिये।

यदि ६ ऋतुओं में केवल दो ही धूम्रदोष से ग्रसित होतीं तो भी एक संतोष किया जा सकता था, भाग्य का खेल मानकर भूला जा सकता था। एक और धुयें की गन्ध थी जो मानसून के महीनों को छोड़ वर्ष पर्यन्त आती थी, और वह भी रात में। धीरे धीरे उसका भी कारण खोजा रघुबीरजी ने। वह घर से निकले कूड़े को सफाई के ठेकेदारों के द्वारा वहीं पर एकत्र कर जला देने के कारण आती थी, यद्यपि नगरनिगम के ठेके में ठेकेदारों को धन उस कूड़े को नगर की सीमाओं से बाहर फेकने का मिलता होगा। लोभवश ठेकेदार स्थानीय निवासियों को सड़ा सा धुआँ पिला रहे थे, वह भी लगभग नियमित।

समस्यायें गम्भीर थीं, स्वयं के प्राणायाम के अतिरिक्त, प्रकृति के प्राणों की रक्षा का दायित्व था रघुबीरजी पर। जैसा कि अंदेशा था, कार्यकारिणी में यह समस्या रखते हुये ही उसे सुलझाने का उत्तरदायित्व रघुबीरजी को सौंप दिया गया। आसपड़ोस के पत्रकार और युवा भी रघुबीरजी के साथ संभावित सफलता में शामिल होने के लिये उत्साहित हो गये। वायु को शुद्ध रखना आवश्यक था, रघुबीरजी ने पुनः गहरी साँस भरी और मन को तैयार कर लिया, एक महत कार्य के लिये....

18.1.12

रघुबीरजी और कूड़े का ढेर

चायपान आधुनिक जीवनशैली का अनिवार्य अंग बन चुका है, पहले मैं नहीं पीता था पर उस कारण से हर जगह पर इतने तर्क पीने पड़ते थे कि मुझे चाय अधिक स्वास्थ्यकारी लगने लगी। बहुतों के लिये यह दिन का प्रथम पेय होता है, जापानी तो इसको पीने में पूजा करने से भी अधिक श्रम कर डालते हैं, पर बहुतों के लिये कार्यालय से आने के बाद अपनी श्रीमतीजी के साथ बिताये कुछ एकांत पलों की साक्षी बनती है चाय।

जब चाय की चैतन्यता गले के नीचे उतर रही हो तो दृश्य में अपना स्थान घेरे कूड़े का ढेर बड़ा ही खटकने लगा रघुबीरजी को। यद्यपि बिजली के जिन खम्भों के बीच वह कूड़े का ढेर था वे सोसाइटी की परिधि के बाहर थे, पर जीवन के मधुरिम क्षणों को इतनी कर्कशता से प्रभावित करने वाली परिस्थितियाँ भला मन की परिधि के बाहर कहाँ जा पाती हैं? कई बार वहाँ से कूड़ा हटवाया गया, पर स्थिति वही की वही बनी रही। कहते हैं कि कूड़ा कूड़े को आकर्षित करता है और खाली स्थान और अधिक कूड़े की प्रतीक्षा में रहता है। बिना कायाकल्प कोई उपाय नहीं दिख रहा था, मन में निर्णय हो चुका था, रघुबीरजी कुछ अच्छे पौधे जाकर ले आये, समय लगाकर उन्हें रोपित भी कर दिया, मानसून अपने प्रभाव में था, कुछ ही दिनों में वह स्थान दर्शनीय हो गया, चाय पीने में अब पूरा रस आने लगा रघुबीर जी को।

छोटे कायाकल्पों में बड़े बदलावों की संभावना छिपी रहती है। कहानी यहीं समाप्त हो गयी होती यदि रघुबीरजी को उस संभावना को औरों में ढूढ़ने का कीड़ा न काटा होता। औरों को प्रेरित करने के लिये उन्होने उस स्थान के पहले और बाद के चित्रों को एक साथ रख कर अपनी सोसाइटी के सब सदस्यों को ईमेल के माध्यम से भेजने का मन बनाया। कुछ व्यस्तताओं के कारण वह मेल भेजने में ४-५ दिन की देरी हो गयी, उतना अन्तराल पर्याप्त था, समय को अँगड़ाई लेने के लिये।

जब चार वर्ष पहले उनकी सोसाइटी का निर्माण हुआ था तो जाने अनजाने उसका स्तर पास की सोसाइटी से नीचे था, हर बरसात आसपास का जल सोसाइटी में आकर भर जाता था और कुछ निदान ढूढ़ने का संदेश दे जाता था। हर वर्ष कुछ भागदौड़ और नगरनिगम की अन्यमनस्कता, इतनी छोटी समस्या सुलझाने के प्रति। सिविल सेवा की तैयारी में लगे लड़को के भाग्य की तरह अन्ततः चौथे वर्ष रघुबीरजी को आशा की किरण उस समय दिखायी पड़ी जब वह एक नये अधिकारी से मिलकर आये, संवाद सकारात्मक रहा। पानी को एकत्र कर पाइप के माध्यम से मेनपाइप में जोड़ देने की योजना थी जो मानसून आने के पर्याप्त पहले क्रियान्वित कर दी गयी।

कार्य के सम्पादन के साथ ही लोगों का रघुबीरजी पर विश्वास बढ़ने लगा, परिवेश के उत्साही और पत्रकारी युवक घटनाक्रम में रुचि लेने लगे, यह सब देखकर रघुबीरजी ने भव्य भविष्य के आस की साँस ली जिससे उनका सीना चौड़ा होने लगा। लगा कि मानसून आने के पहले बड़ा महत कार्य सम्पन्न हो गया। कुछ सप्ताह बाद ही, भला हो एक खोजी युवक का, जिसने आकर बताया कि पाइप तो मेनपाइप तक पहुँच गया है पर अभी तक जुड़ा नहीं है और बरसात होने की स्थिति में सारा पानी कीचड़ समेत आ जायेगा, पहले से कहीं अधिक। रघुबीरजी के प्रयासों में पुनः गति आ गयी, पहले तो कई पत्र भेजे, कोई प्रभाव नहीं पड़ा। अन्ततः अधिकारी से पुनः मिलकर अनुनय विनय की, उसने अगले दिन शेष कार्य करवाने का आश्वासन दे दिया। रघुबीरजी का मन प्रसन्न था, सुखद भविष्य की आस अधिक सुख लाती है, लगे हाथों रघुबीरजी ने कूड़े के स्थान के कायाकल्प की ईमेल भी सबको प्रेषित कर दी।

उस रात बारिश हुयी थी, पाइप से कीचड़ अधिक आ गया था। अगले दिन बड़ी सुबह कार्य आरम्भ हो गया, बुलडोजर कीचड़ साफ करना प्रारम्भ कर चुके थे और पाइप जोड़ने का कार्य दोपहर तक हो जाने की संभावना थी। रघुबीरजी अपना चाय का प्याला ले बॉलकनी में समाचार पत्र पढ़ने लगे। तीसरा पेज खोलते ही उनका दिल धक से रह गया, किसी उत्साही पत्रकार ने नगरनिगम की अकर्मण्यता और रघुबीरजी के प्रयासों पर एक हलचलपूर्ण आलेख छाप दिया था, सचित्र, एक ओर नायक के रूप में रघुबीरजी, दूसरी ओर खलनायक के रूप में नगरनिगम का अधिकारी और बीच में कीचड़ के साथ बिना जुड़े हुये दो पाइप। रघुबीरजी सोच ही रहे थे कि कहीं वह अधिकारी यह समाचार न पढ़ ले, तब तक अधिकारी का क्रोध भरा फोन आ गया, आधे घंटे के अन्दर ही नगरनिगमकर्मी वापस जा चुके थे।

सूरज चढ़ आया था, दोपहर होते होते लोग ईमेल पढ़ चुके थे, उत्सुकतावश बाहर आये तो दृश्य पूर्णतया बदला हुआ था, कायाकल्प हुये कूड़े के स्थान का पुनः कायाकल्प हो चुका था, हरी चादर के ऊपर अभी अभी उलीचे कीचड़ की परत जमी थी, ईमेल में प्रेषित दोनों चित्रों से भयावह थी उस जगह की स्थिति। सोसाइटी का गेट व निकट भविष्य, दोनों ही कीचड़रुद्ध दिख रहे थे।

कहते हैं कि कीचड़ में कमल खिलते हैं पर आज यहाँ पर कीचड़ रघुबीरजी के श्रम-कमलों की लील चुका था, सौन्दर्यबोध सशंकित था, बॉलकनी की चाय कसैली होनी तय थी, सोसाइटी के सदस्यों के आलोचनात्मक स्वर अवसरप्रदत्त शक्ति से सम्पन्न थे। रघुबीरजी पर हार मानने वाले जीवों में नहीं थे, साँस सीने में गहरी भर जाती है, रघुबीरजी की पुनः जूझने की इच्छा बलवती होने लगती है.....

14.1.12

रघुबीरजी की कथा

रघुबीरजी अपनी पत्नी के साथ अपने घर की बॉलकनी में बैठकर चाय की चुस्कियों का आनन्द ले रहे हैं, घर सोसाइटी की तीसरी मंजिल में है और रघुबीरजी हैं उस सोसाइटी के सचिव। कर्मठ और जागरूक, अन्दर से कुछ सार्थक कर डालने को उत्सुक, हर दिन विश्व को कुछ नया दे जाने का स्वप्न देखकर ही उठते हैं रघुबीरजी। एक युवा के उत्साह और एक वृद्ध के अनुभव के बीच एक सशक्त अनुपात सँजोये है रघुबीरजी का व्यक्तित्व, प्रौढ़ता को भला इससे अच्छा उपहार क्या मिल सकता है?

रघुबीरजी के जीवन में तीन विश्व बसते हैं, तीनों विश्व शताब्दियों के अन्तर में स्थापित, तीनों का मोह बराबरी से समाया हुआ उनके हृदय में, किसको किसके ऊपर प्राथमिकता दें यह निर्णय करना बहुधा उनके लिये ही कठिन हो जाता है। एक विश्व शारीरिक, एक मानसिक और एक आध्यात्मिक है उनके लिये, इन तीन अवयवों की क्षुधापूर्ति की संतुष्टि उनके मुखमंडल से स्पष्ट झलकती है।

पहला और शारीरिक विश्व उनके व्यवसाय का है। उन्नत तकनीकी शिक्षा, मौलिक शोध और सतत श्रम का प्रतीक है उनका व्यवसाय। जीवकोपार्जन के इस स्रोत को सम्यक रूप से सजाकर अब उन्हें अपने शेष दो विश्वों के लिये पर्याप्त समय मिलने लगा है। इस कारण उन्हें बहुधा विदेश यात्रा करनी पड़ती है। तकनीक, वाणिज्य और वैश्विक परिप्रेक्ष्य उनके प्रथम विश्व के अंग हैं और समयरेखा में सबसे आगे खड़े हैं।

दूसरा और मानसिक विश्व उनकी पर्यावरणीय चेतना का है। इस चेतना के कारण वह सोसाइटी के सचिव हुये या सोसाइटी के सचिव होने के बाद उनकी पर्यावरणीय कुण्डलनी जागृत हुयी, ठीक ठीक कहना कठिन है पर उनके पर्यावरणीय प्रयोगों की चाह ने सोसाइटी में कई बार उत्सुकता, भय और सुख की त्रिवेणी बहायी है। नये प्रयोग के बारे में सोचना, उसे क्रमशः कार्यान्वित करना और उसमें आने वाली बाधाओं को झेलना, किसी गठबन्धन सरकार चलाने से कम कठिन नहीं है। अपने परिवेश में घटनाओं का संलिप्त साक्षी बनना उनके दूसरे विश्व का केन्द्रबिन्दु है और समयरेखा में मध्य में अवस्थित है।

तीसरा और आध्यात्मिक विश्व उनके गाँव व संस्कृति की जड़ों से जुड़ाव का है। जिन गलियों में पले बढ़े, जहाँ शिक्षा ली, जिन सांस्कृतिक आधारों में जीवन को समझने की बुद्धि दी और जहाँ जाकर छिप जाने की चाह व्यग्रता के हर पहले क्षण में होती हो, वह उनके जीवन के रिक्त क्षणों से बन्धन बन जुड़ सा गया है। सभ्यता के मानकों में भले ही वह विश्व समुन्नत न हो पर रघुबीरजी के जीवन का स्थायी स्तम्भ है वह विश्व, समयरेखा के आखिरी छोर पर त्यक्त सा।

रघुबीरजी के जीवन में आनन्द बहुत ही कम होता यदि एक भी विश्व उनके जीवन से अनुपस्थित होता। आनन्द इसलिये क्योंकि उन्हें तीनों विश्वों के श्रेष्ठतम तत्व प्राप्त हैं। पहले विश्व के प्रेम की कमी तीसरे विश्व से, तीसरे विश्व के धन और तकनीक की कमी पहले विश्व से, दूसरे विश्व के आलस्य और विरोध से जूझने की शक्ति तीसरे विश्व से और समाधान पहले विश्व से, सब के सब एक दूसरे के प्रेरक और पूरक। तीन विश्वों में एक साथ रहने से उनकी दृष्टि इतनी परिपक्व हो चली है कि उन्हें तीनों की सम्भावित दिशा और उसे बदलने के उपाय स्पष्ट दिखायी देते हैं।

रघुबीरजी के जीवन का यही उजला पक्ष उनकी अधीरता का एकल स्रोत है। समयरेखा में तीन विश्वों की उपस्थिति इतनी दूर दूर है कि उन्हें एक साथ ला पाने की अधीरता बहुधा उनके प्रयासों से अधिक बलवती हो जाती है। अपनी समग्र समझ सबको समझा पाना उनकी ऊर्जा को सर्वाधिक निचोड़ने वाला कार्य है, भाषा और तर्कसूत्र एक विश्व से दूसरे तक पहुँचते पहुँचते अपनी सामर्थ्य खो देते हैं। यही अधीरता रघुबीरजी की कथा का रोचक पक्ष है।

रघुबीरजी थोड़ी थोड़ी मात्रा में हम सबके भीतर विद्यमान हैं, देश तो रघुबीरजी के व्यक्तित्व का भौगोलिक रूपान्तरण ही है, रघुबीरजी के तीनों विश्व इस देश में भी बसते हैं। रघुबीरजी का आनन्द हम सबका आनन्द है और रघुबीरजी की कथा हम सबकी कथा। उनकी हर घटना में आप अपना मन डाल कर देखिये, संभव है कि उनकी कथा आपकी दवा बन जाये।

खैर, रघुबीरजी को बॉलकनी से एक कूड़े का ढेर दिखता है, बिजली के दो खंभों के बीच.......

(रघुबीरजी मेरे लिये एक पात्र नहीं वरन देश और समाज समझने के नेत्र हैं, यह श्रंखला यथासंभव समाज में व्याप्त रोचकता का अनुसरण करने का प्रयास करेगी)