न कर्मबन्ध, न संस्कार,
न चित्तवृत्ति, न क्लेश पार,
उस ओर अकेले बैठ गया,
मेरा परिचय ही निर्विकार।
न विषय रमण, न झंकृत मन,
न सुख साधन पर सतत मनन,
किस आगत के असमंजस में,
पथ सृजन शून्य, जग निर्जन वन।
न मति विरुद्ध, न भाव क्रुद्ध,
न बंध जटिल, न कंठ रुद्ध,
आलम्बन के एकाग्र क्षितिज,
द्वन्द्व आलोड़न से विगत बुद्ध।
न शब्द पृथक, न पृथक ज्ञान,
न अर्थ पृथक, अनुभव प्रधान,
सब सम्मिलित होकर हुये एक,
संयम ने साधे समाधान।
न विलग पूर्ण, न पूर्ण विलय,
न बाधित क्रम, अवगुंठित लय,
जगती प्रवाह, पर स्थिर मन,
स्थिर गति, स्थिर हुआ समय।
न मुक्त रहा, न हुआ युक्त,
किस आकर्षण जीवन प्रयुक्त,
कारक, कर्ता, क्रम डोल रहे,
मैं भोग रहा या स्वयं भुक्त।
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