18.2.12

मटर की फलियाँ

सप्ताहन्त का एक दिन नियत रहता है, सब्जी, फल और राशन की खरीददारी के लिये, यदि संभव हो सके तो शनिवार की सुबह। जब आईटी शहर के नागरिक शुक्रवार की पार्टी के बाद अलसाये से ऊँघ रहे होते हैं, मुझे मॉल खाली मिलता है, सारा का सारा सामान ताजा और व्यवस्थित, भुगतान काउण्टर आपकी प्रतीक्षा में, सब कर्मचारी आपकी सहायता करने को उद्धत। घर से बलात भेजे गये मानुष को जब स्वतन्त्र देवता जैसा सम्मान मिलता है, तो सब्जी खरीदने जैसा कर्म भी अत्यन्त रोचक हो जाता है।

घर से जो सूची बनाकर जाता हूँ आईफोन पर, वह भी मॉल में सामानों के क्रम के अनुसार होती है, सब्जी, फल, राशन और अन्त में साबुन आदि। सूची सबके सम्मिलित प्रयासों से बनती है, बच्चों की किसी विशेष सूप की फरमाईश, श्रीमतीजी की किसी व्यञ्जन बनाने की उत्कण्ठा, रसोई में समाप्तप्राय आटा, दाल, चीनी, चावल आदि के बारे में हमारे रसोईये जी की घोषणा। सप्ताह भर के बाद तैयार हुयी सूची में बहुधा कोई सामान छूट ही जाता है क्योंकि यदि ऐसा न हो, तो सामान खरीदते समय श्रीमतीजी के मोबाइल पर मिले निर्देशों से वंचित होने लगेगा जीवन। खरीददारी मुख्यतः सूची पर ही आधारित होती है पर इतने बड़े मॉल में घंटे भर बने रहने से कई और आवश्यक वस्तुयें दिख जाती हैं, घर में सामान अधिक ही आ जाता है, कुछ छूटने की घटना यदा कदा ही होती है।

कहते हैं कि आप जिस चीज से भागना चाहते हैं, वह जीवन भर आपका पीछा करती है, मेरे साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ। बचपन में पिताजी सब्जी खरीदने जाते थे, सप्ताह में दो दिन हाट लगती थी गृहनगर में, बहुत भीड़ रहती थी मानो पूरा शहर उमड़ आता हो वहाँ। पता नहीं भविष्य में गृहस्थी का क्या स्वरूप रहेगा, पता नहीं भविष्य में पति पत्नी की भूमिकायें क्या हो जायेंगी, संभवतः यही सोचकर पिताजी मुझे भी साथ ले जाते थे। सोचते होंगे, चलो कुछ तो सीख लेगा, यदि बाहर रहकर पढ़ना पड़े तो कम से कम खाना बनाकर पेट तो भर लेगा। बाहर रहकर पढ़ने के लिये यह सब जानना तो अत्यन्त आवश्यक था, पिताजी ने किया था, छोटे भाई ने भी बाद में किया, अब स्थिति यह है कि घर में मुझे छोड़कर सब खाना बना लेते हैं, बहुत अच्छा।

हाथ में एक छोटा झोला उठाये, भीड़ की रोचकता में गर्दन मटकाते हुये पिताजी के पीछे लगा रहता था। गेहूँ, चावल, दाल के दानों में जाने क्या देखकर खरीदते थे, समझ नहीं आता था। आलू, टमाटर, प्याज, एक एक को चारों ओर से देख कर क्या निश्चित करते होंगे, समझ नहीं आता था। पालक, मेथी, धनिया, पुदीना, ताजा और बासी में कैसे अन्तर करते थे, समझ नहीं आता था। हल्दी, जीरा, मसाला की महक कैसे परखते थे, समझ नहीं आता था। बस एक सहायक की तरह पीछे लगा रहता था, बस इस आस में कि किसी तरह अन्त में गन्ने का रस या बरफ के लच्छे खाने को मिल जाये, पर उसके लिये धूल भरे वातावरण में इतना श्रम करना खलता था। भगवान ने सुन ली, छात्रवास रहने आ गया, इस साप्ताहिक श्रम से छूट मिल गयी, उसके बाद पिताजी छोटे भाई को अपने साथ बाजार ले जाने लगे।

शेष पढ़ाई छात्रावास में, प्रशिक्षण और रेलवे में नौकरी, हर जगह बना बनाया खाना मिलता रहा। विवाह के बाद भी घर में रसोईया लगा रहा, सब्जी, राशन आदि आता रहा, हम अपने भय से मुक्त बने रहे, जो मिलता रहा, वह खाते रहे। कभी किसी व्यंजन विशेष के लिये आग्रह नहीं किया, कभी किसी खाने में कमी इंगित नहीं की। ऐसा लगने लगा कि पिता जी ने जो समय मुझे खरीददारी सिखाने में निवेश किया था उसका कोई प्रतिफल आ ही नहीं रहा है। जहाँ तक हो सका मैं खरीददारी से भागता रहा। अवसर भी अपनी प्रतीक्षा में था और बचपन में सीखी हुयी चीजें व्यर्थ नहीं जानी थीं, इन दोनों का सुयोग बंगलुरु में बनने लगा।

वस्तुतः तीन कारण रहे, पहला कारण हमारे रसोईयेजी का व्यक्तिगत कारणों से कई बार अपने गाँव जाना रहा। श्रीमतीजी को रसोई का पूरा कार्य करने के बाद यह सम्भव नहीं रहता था कि खरीददारी कर सकें, अतः हमको ही उस उत्तरदायित्व का निर्वाह करना पड़ा। दूसरा कारण खानपान के क्षेत्र में बच्चों की वैश्विक मानसिकता का रहा। अपने विद्यालय में पिछले दिन आये टिफिनबाक्सों के आधार पर अगले दिन की माँग रखे जाने के कारण, हर बार हम ही को प्रस्तुत होना पड़ा, या तो बाहर जाकर खिलाने के लिये या घर में बनाने हेतु आवश्यक सामग्री लाने के लिये। इटली, थाईलैण्ड, चीन, मेक्सिको, अमेरिका के व्यंजनों के साथ साथ ठेठ दक्षिण भारतीय भोजन के लिये साधन जुटाने का भार हमको ही सौंप दिया गया। तीसरा कारण मॉल में स्वयं चुनने की सुविधा व स्वच्छ और वातानुकूलित परिवेश रहा।

यह कार्य पुनः प्रारम्भ करना थोड़ा भारीपन अवश्य लाया पर बचपन में पाये तीन वर्षों के अनुभव के कारण अधिक कठिनाई नहीं हुयी। कई बार तो कार्य भार स्वरूप निपटाया पर धीरे धीरे रस आने लगा। एक एक आलू, प्याज, टमाटर, मटर छाँट के रखने में ऐसा लगने लगा मानो अपने परिवार के लिये एक स्वादिष्ट और पौष्टिक भोजन जुटाने में उपयोगी योगदान कर रहे हैं। घर में बच्चों ने जब मटर छीलकर खायी और कहा कि बड़ी मीठी और ताजी मटर है, तो सहसा एक एक मटर चुनना याद आ गया। साथ ही याद आया एक और व्यक्ति जो झोले में मुठ्ठी भर भरकर मटर डाल रहा था, संभवतः वह बचपन में अपने पिताजी के साथ बाजार नहीं गया होगा या उसे इस कार्य में रस नहीं आ रहा होगा।

पिताजी का सिखाया व्यर्थ नहीं गया, घर के लिये राशन, सब्जी आदि खरीदने से अधिक आत्मीय पारिवारिक अवसर सरलता से मिलता भी नहीं हैं। अगली बार से पृथु को भी ले जाऊँगा, भविष्य का क्या भरोसा, सुना है कई पतियों को घर में खाना बनाने का कार्य अधिक रुचिकर लगने लगा है।

68 comments:

  1. स्‍वाद का आनंद तो खरीदी के साथ ही आरंभ होता है. मटर के मीठे दाने की/में फली(भूत).

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  2. शनिवार की सुबह, मॉल में जाने का सही समय। :)
    अपन तो कालोनी के पास लगने वाली साप्‍ताहिक हॉट से ही खरीद लेते हैं, एकदम ताजी सब्जियां, वो भी कम से कम दाम में।

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  3. जब भी कभी सब्ज़ी आदि लेने जाने का मौक़ा मिलता है तो हरी-हरी ताज़ा कोमल फल सब्ज़ियों छूकर बहुत अच्छा लगता है...

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  4. कुछ दिन बाहर रहने के कारण खाना तो बनाना सीख गया पर खरीदारी करना शायद नहीं.ज्यादा छांटना-छून्टना अपने वश का नहीं रहा, इसलिए घरैतिन ने यह काम भी अपन के हाथ से ले लिया .
    अब आराम से लिखा-पढ़ी होती है, दो-चार बातें ज़रूर सुन लेता हूँ .

    आप का प्रशिक्षण काम आ रहा है, लगे रहिये !

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  5. जीवन में सीखा गया हर काम हमें कहीं न कहीं लाभ दे जाता है ..बेशक हम उसे कर न सके , लेकिन सलाह तो दी ही जा सकती है .

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  6. सीखा हुआ कभी न कभी काम आ ही जाता है ...

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  7. मैं तो भाई साहब सिर्फ सहानुभूति ही व्यक्त कर सकता हूँ :)

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  8. हमारा भी हर रविवार को फेरा तो लगता ही है, खिदिरपुर सब्जी बाज़ार का। बच्चे भी साथ होते हैं ... झोला उठाने के लिए।

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  9. बस परिवार का यही महत्‍व है कि हम सब एकदूसरे से सहजता से सीख जाते हैं।

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  10. सब्जी खरीदना एक कला है...
    मटर छीलने का अपना ही आनंद है... और उसमे से मीठे दाने खाने का भी...
    गांव में तो खेत से आ जाती थी.. उन दिनों में भी अलग मजा था..

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  11. सच है यूँ ही चीज़ें जानी सीखी जाती हैं..... और जीवन में काम भी आती है.....

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  12. वाह,छंटी-छँटाई मटर की फलियाँ !

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  13. सुपाच्य आलेख. मालों ने जीवन शैली बदल दी है.

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  14. jab pati bazaar se sabji lata hai to patni ko bhi banane me jyada hi maja aata hai.ye choti choti baaton me ek doosre ka sahyog karna hi jeevan roopi gadi ko safalta se chalata hai.bahut achcha aalekh likha parivarik lekh kahungi.

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  15. हम तो रोज सुबह घुमने के बाद कंपनी बाग चौराहे की सब्जी मंडी से , गंगा कटरी वाली हरी सब्जियां भर लाते है . बचपन में पिताजी के साथ सब्जी की खरीदारी का हमारा बृहद अनुभव है .

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  16. उत्‍कृष्‍ट प्रस्‍तुति।

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  17. पिताजी का सिखाया व्यर्थ नहीं गया, घर के लिये राशन, सब्जी आदि खरीदने से अधिक आत्मीय पारिवारिक अवसर सरलता से मिलता भी नहीं हैं।

    कुछ भी सीखा व्यर्थ नहीं जाता ...रोचक अंदाज़ ...

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  18. घर से बलात भेजे गये मानुष को जब स्वतन्त्र देवता जैसा सम्मान मिलता है, तो सब्जी खरीदने जैसा कर्म भी अत्यन्त रोचक हो जाता है।

    अब आप तो व्यंग्यकार भी हो गए! और वह भी धांसू.

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  19. शनिवार.. साप्ताहिक हाट... हम दोनों!!

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  20. बहुत ही बढि़या प्रस्‍तुति ।

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  21. बड़ों के अनुभव और बचपन में सीखा कभी व्यर्थ नहीं जाता.कहीं न कहीं किसी न किसी रूप में काम आ ही जाता है.अतीत को वर्तमान से जोड़ती सुन्दर पोस्ट.

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  22. बिल्कुल सही कह रहे हैं सीखा हुआ कभी व्यर्थ नही जाता और ऐसी आदतें हमे अपने बच्चों मे बचपन से ही डालनी चाहियें।

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  23. घर से बलात भेजे गये मानुष को जब स्वतन्त्र देवता जैसा सम्मान मिलता है, तो सब्जी खरीदने जैसा कर्म भी अत्यन्त रोचक हो जाता है।
    सीखा हुआ कभी भी व्यर्थ नहीं जाता भाई साहब .पिता जी हमें भी याद आगये .मौसमी फल और सलाद जितना हमने खाया काम आया उन्हें खाते देखा हम सीख लिए .हमारे पोते भी ज़मके खाते हैं इंद्र धनुषी सतरंगी सलाद .

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  24. पृथु को ज़रूर ले जाइएगा...

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  25. Aaj nahi to kal seekh kaam aayi jaati hai...:)

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  26. इतना चुन-चुन का मटर तो हमने भी आज तक नहीं ख़रीदा...:(:(

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  27. वाह....मटर की फलियाँ !सुन्दर पोस्ट

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  28. कई महत्त्वपूर्ण 'तकनिकी जानकारियों' सहेजे आज के ब्लॉग बुलेटिन पर आपकी इस पोस्ट को भी लिंक किया गया है, आपसे अनुरोध है कि आप ब्लॉग बुलेटिन पर आए और ब्लॉग जगत पर हमारे प्रयास का विश्लेषण करें...

    आज के दौर में जानकारी ही बचाव है - ब्लॉग बुलेटिन

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  29. घर से बलात भेजे गये मानुष को जब स्वतन्त्र देवता जैसा सम्मान मिलता है, तो सब्जी खरीदने जैसा कर्म भी अत्यन्त रोचक हो जाता है।
    :)

    सुना है कई पतियों को घर में खाना बनाने का कार्य अधिक रुचिकर लगने लगा है- अगर देखने का भी दिल हो तो यहाँ चले आईये...रुचिकर लगे न लगे...रुचि जगानी पड़ती है. :)

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  30. बहुत सुन्दर प्रस्तुति!
    --
    कल शाम से नेट की समस्या से जूझ रहा था। इसलिए कहीं कमेंट करने भी नहीं जा सका। अब नेट चला है तो आपके ब्लॉग पर पहुँचा हूँ!
    --
    आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल रविवार के चर्चा मंच पर भी की गई है!
    सूचनार्थ!

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  31. पति रसोयियें से बेहतर भला कौन ? बाजी :)

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  32. I was very afraid of going to HAAT in my village..I was very shy that time...Now I too have the same routine..Saturday or SUnday is fixed for Sabji Bhaji :-)...

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  33. कितना बदल गया है शॉपिंग का इश्टाइल :)

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  34. अच्छा है।
    मुझे बहुत रुचता है सब्जियां चुन कर खरीदना और खाना बनाना।
    सच है कि पिताजी का कुछ भी सिखाया कभी व्यर्थ नहीं जाता।

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  35. ईश्वर कितना बड़ा रसोइया है | एक से बढ़कर एक हरी मनोहारी शाक-सब्जियां |
    हरे रंग के भी सैकड़ों प्रकार बनाए है उसने ,सब्जियों के रूप में | मेरा तो हरी सब्जियों को बहुतायत में देखने मात्र से ही हिमोग्लोबिन बढ़ जाता है |

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  36. आहा.... क्या दिन याद दिलाये आपने ! बहुत बढ़िया लेख !

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  37. प्रवीण जी मेरे वैवाहिक जीवन को फिलहाल एक ही वर्ष पूर्ण हुआ है अभी तक तो इस काम से मुक्ति मिली हुई है पर बकरे की अम्मा कब तक खैर मनाएगी वाली स्थिति लग रही है आपकी पोस्ट पढ़कर... वैसे एक उपाय है अगर आप इससे बचना चाहें तो। मुझे जब भी मां सब्जी लेने भेजती थी तो मैं जानबूझकर कुछ न कुछ सामान खराब ला देता था, उकताकर उन्होंने मुझे भेजना ही बंद कर दिया।

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    1. sir jee,
      aapne bahut hi badhiya upay sujhaya hai...

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  38. सब्जी लाना भी एक कला है जो हर कोइ नहीं जानता |
    अच्छा लेख |
    आशा

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  39. 'तप' से सीखा हुआ जब 'यज्ञ' में परिवर्तित होता है
    तो आनंद तो आना ही चाहिये.

    पिताजी के दिए गए 'दान' के बिना क्या ऐसा हो पाता.
    जीवन में यज्ञ, तप और दान ही अभीष्ठ हैं.

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  40. iphone पर shopping list!
    यह कौनसा नया app है जी?

    हम इस जिम्मेदारी से बच निकले।
    कारण:
    1) पत्नि को मुझपर भरोसा नही है। कह्ती है कि मैं कुछ भी खरीदना जानता नहीं हूँ और कभी सीख भी नहीं सकता। आसानी से ठगा जाता हूँ।

    2) पत्नि को shopping इतना प्रिय है कि इसका आनंद खुद लेना चाहती है। हम वाहन चालक बनकर संतुष्ट रहते हैं। हम mall के बाहर अपनी रेवा गाडी चलाते हैम और mall के अंदर trolley धकेलते हैं।

    3)जिस shopping के लिये पत्नि को एक घंटा चाहिए, वही shopping, अवसर मिलने पर, मैं पंद्रह मिनट में करके दिखाता हूँ, जिससे वह नाखुश हो जाती है। वह मानती है कि मैं shopping का मज़ा नष्ट कर देता हूँ।

    शुभकामनाएं

    जी विश्वनाथ

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    1. नोट में ही लिखते जाते हैं, हम शॉपिंग कर्म की तरह करते हैं, हमारी श्रीमतीजी शॉपिंग में कई कर्म ढूढ़ लेती हैं।

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  41. रोचक..मटर की मीठी फलियों सी..

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  42. अभी देखा अमित जी भी पढ़ गये हैं,अब शायद आज हमारे घर भी मीठी मटर आ जाए .......:)

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  43. बहुत रोचक प्रस्तुति...मॉल में खरीदारी करने से एक सुविधा रहती है कि एक ही जगह सब सामान मिल जाता है, वरना पहले अलग अलग दुकानों के चक्कर लगाने होते थे. पहला अनुभव न भी हो, ज़िंदगी सब कुछ सिखा देती है, शॉपिंग करना भी..पर मटर छांटना वास्तव में मुश्किल काम है..

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  44. मैं तो हरी मटर को खाने के दौरान उसके खेत तक का आनंद उठा लेता हूँ। दरअसल मटर को छीलने के बाद उसकी फली को थोड़ा सा मसल कर सूंघा जाय तो वही खुशबू मिलती है जो मटर के खेतों की ओर से हवा चलने पर आती है। अबकी ट्राई किजिएगा। मटर तो मटर उसकी फलियां भी 'खेतिहर नॉस्टॉल्जिया' वाली कैफ़ियत रखती हैं।

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    1. अपने को भी यही ज्यादा पसंद है।

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  45. वाह जी , अपन तो न सिर्फ़ हाट बजार बल्कि पाक कला हस्त कला आदि तमाम टाईप की कला में पारंगत हो चुके हैं , सूची अनुसूचि सबे झेल जा रहे हैं । मटरवा का फ़ोटो देख के मोन हरिया गया

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  46. हमारे घर में भी सारी बुद्धि सब्जी लेने में लगती है। आलू मुंडेरा मण्डी से। मटर फाफमऊ से, स्पेंसर और बिगबाजार के रेट का तुलनात्मक अध्ययन... गांव से मन्गाई आलू 300 की 65 किलो पड़ी... इत्यादि।

    हम सब सब्जीलॉजी में पोस्ट ग्रेज्युयेट हो गये हैं! :-)

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  47. मटर के दाने पनीर के साथ एक डेढ़ मिनिट माइक्रोवेव करके खाइए .स्वाद के अनुरूप काली मिर्च पाउडर नमक स्तेमाल कर सकतें हैं .ताज़ी सब्जी की रंगत आकर्षित करती है बीनाई (विज़न )में इजाफा करती है .

    उबली हुई मूंफाली हमने चेन्नई में खाई है खूब .ज्यादा पौष्टिक होता है नमक भी कम लेती है .रोस्टिद(भुनी हुई ,तली हुई नहीं )का अपना स्वाद है .मध्य प्रदेश में कच्ची गीली मूंगफली आधा रेत में सेंक कर नमक हरीमिर्चा के साथ खाई जाती है . बस तली हुई बेसन चढ़ी (हल्दी राम) की मूंगफली से बचिए .

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  48. आपके हर काम की तरह सब्जी खरीदना भी सुनियोजित व हाईटेक है। और जैसा आपने कहा, यह तो बिल्कुल सही है कि यदि खाने-पीने का सामान व साग-सब्जी खरीददारी खुद की जाय तो खाने का स्वाद जरूर विशेष हो जाता है।मेरी भी यही कोशिश रहती हे कि साग-सब्जी खुद ही खरीदी जाये, बस यह है कि इस कार्य में पत्नी जी का सहयोगी का रोल निभाना ज्यादा अच्छा व उपयुक्त लगता है।

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  49. भाई .....मान गए |मटर खरीदना भी कोई आसान काम नहीं | कल से सब्जी मंडी मेरे खरीदने की दृष्टियाँ बदली बदली सी होंगीं |

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  50. umda likhte hai aap,lga ke hum bhi aap ke sath hi khridari kar rhen hai

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  51. Wow, Such a true and nice post

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  52. घर से बलात भेजे गये मानुष को जब स्वतन्त्र देवता जैसा सम्मान मिलता है, तो सब्जी खरीदने जैसा कर्म भी अत्यन्त रोचक हो जाता है।....

    सही कहते हैं... रोचक प्रस्तुति...
    सादर.

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  53. वाह !!, सुन्दर पोस्ट,
    ठीक मटर की फलियों सी.

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  54. बहुत सुंदर आलेख ...छोटी छोटी बातों में छुपी जीवन की बड़ी-बड़ी खुशियाँ ...

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  55. SIR
    ZINDAGI KE HAR CHHOTI BADI GHATNA KO SUNDAR SHABDO ME VYAKT KARNE KI AAPKI ADBHUT KALA SE MUJHE EHSAS HO RAHA HAI KI AANE WALE DINO ME AAPKE DWARO LIKHE BEST SELLER BOOKS PADHANE KO MILEGA...PAKKA MILEGA...

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  56. बहुत सही कहा ..सच है..यही जीवन है..शिव रात्रि पर हार्दिक बधाई..

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  57. hamaare bujurg behatar dhang se jivan ko samajhte hain---.
    poonam

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  58. sabjee aur grihasthi ka saman chahe mall se khareede ya haat se parantu bhawnayen to ek see hoti hai.aap ke saare lekh man ko choone waale hai.bahut badhia.

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  59. बहुत सुन्दरमहा- शिव रात्रि के विशेष पर्व पर .खरीदने के साथ ही स्वाद और खाने की प्रक्रिया की रूप रेखा बनके तैयार हो जाती है .

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  60. मटर के दानों सी सुन्दर...., पारिवारिक जीवन की सुगंध बिखेरती बढ़िया पोस्ट!

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  61. मतलब आपके हाथ के खाने से वंचित रहेंगे ..
    बहुत ही पारिवारिक पोस्ट है ... हर किसी से जुडी हुयी ...

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  62. हर परिवार की कहानी की रोचक प्रस्तुती...आपकी लेखनी आम बात को भी बरी खास और स्वादिष्ट बना देती है...आपके हर पोस्ट में ये खासियत होती है की पढ़ते हुए बोरियत महसूस नहीं होती...

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  63. सुना है कई पतियों को घर में खाना बनाने का कार्य अधिक रुचिकर लगने लगा है।

    हे भगवान!! :P

    बाई द वे, मंत्री मॉल का फोटो है न पहला वाला, दिल खुश हो गया देख कर ;)

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  64. क्षमा चाहता हूं। पता नहीं क्यों, ऐसी जगह पर मुझे घुटन सी होती है। मेरा मन कहता है इन लोगों ने देश के न जाने कितने कम पूंजी में रोजी-रोटी कमानेवालों का रोजगार छीन लिया है। बड़ी अजीब सी बदबू (शायद तरह-तरह के बॉडी स्प्रे की मिलीजुली गंध) वहां तैरती रहती है। पीले-पीले चेहरों पर कृत्रिम मुस्कान लिए लोग दिखाई देते हैं। उनमें एक अजीब सी संवेदन शून्यता महसूस होती है। पहले कभी-कभार कोई गिफ्ट बाउचर मिल जाता था तो मजबूरी में जाना पड़ता था।

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