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14.3.12

अपूर्ण एक पूर्ण शब्द है

बचपन और युवावस्था में एक बीमारी बहुधा सबको ही होती है कि बड़ा खाली खाली सा लगता है। एक के बाद एक कोई न कोई कार्य मिलते रहना चाहिये, व्यस्तता बनी रहनी चाहिये, नहीं तो एक अजीब सी उलझन होने लगती है। कुछ अपूर्ण सा लगता है, उसे भर देने को मन उद्धत होने लगता है। हर कर्म का प्रयास परिस्थितियों को अपूर्णता से पूर्णता की ओर ले जाने के लिये होने लगता है। जितनी अधिक ऊर्जा पास रहती है उतनी अधिक अपूर्णता दिखने लगती है जगत में। हर समय कितना कुछ करने के लिये रहता है जीवन में, समय और ऊर्जा के आभाव में कई कार्य ऐसे होते हैं जिन्हे हम करना चाह कर भी नहीं कर पाते हैं। जैसे जैसे जीवन बढ़ता है, ऊर्जा कम होने लगती है, कई नियमित कार्य बढ़ जाते हैं। व्यस्त जीवन का प्रथम प्रभाव यह पड़ता है कि जगत उतना अपूर्ण नहीं दिखता है जितना कुछ वर्ष पहले तक दिखता था।

अपूर्णता एक नियत सत्य है, कोई भी ऐसा तत्व नहीं दिखायी पड़ता है जो पूर्ण हो। जब हर वस्तु में अपूर्णता हो तो वह पूर्ण से अधिक पूर्ण हो गयी। हमारे सारे प्रयास उसी दिशा में होते हैं जिस दिशा में हमें संभावना दिखती है। जब तक प्रयास उस संभावना घट को पूर्ण कर पाते हैं, तब तक संभावनाओं के नये नये घट बन चुके होते हैं, पुनः प्रयास, पुनः संभावनायें। एक सतत कर्म है यह। किसी भी क्षेत्र में यदि कभी प्रयास ठहरे हुये नहीं दिखते हैं, तो किसी भी क्षेत्र को पूर्ण नहीं कहा जा सकता है। इस दृष्टि से देखा जाये तो अपूर्णता अपने आप में शाश्वत है, अपने आप में पूर्ण है।

यदि तर्क व दर्शन की दृष्टि से न भी देखा जाये तो भी पूर्णता कहीं नहीं दिखती है, संभावना समझ के साथ साथ बढ़ती रहती है, अपूर्णता संभावना के साथ बढ़ती रहती है, जो आज पूर्णता लिये सी दिख रही है कल वह अपूर्णता लिये हुये सी दिखने लगती है। पूर्णता पाने के लिये किया गया हमारा प्रयास हमें उस दिशा में ले जाता है, जहाँ हमें अपूर्णता और अधिक स्पष्ट रूप से दिखने लगती है।

इस विचार का उद्भव व आरोहण न हुआ होता यदि मैं अपने एक चित्रकार मित्र आलोक से मिलने न पहुँचा होता। दोनों बच्चे चित्रकला से सम्पन्न वातावरण में पहुँच ऊर्जस्वित थे, उनके हाथों में काग़ज़ और पेंसिल थी, उन्हें रेखाओं को खींचने में रस आ रहा था। उस समय कला के लिये साथ में सब कुछ था पर हाथ में समय नहीं था, ट्रेन का समय बढ़ाया नहीं जा सकता था। जितना समय मिला और कला के बारे में बच्चों ने जितना समझा और जाना था, उसके लिये कुछ घंटे पर्याप्त नहीं थे। एक बड़े चित्रकार के सामने चित्र बनाने का अवसर था जिसे बच्चे अपना सर्वश्रेष्ठ प्रयास दे स्वयं को सिद्ध करना चाहते थे। जैसा संभावित था, चित्र पूरे नहीं बन सके। बच्चों ने आलोक को चित्र दिखाये और कहा कि समय नहीं था अतः पूरे नहीं बन पाये।

जब आलोक ने कहा कि मेरे लिये यही पूरा है। बच्चों को बड़ा आश्चर्य हुआ, कहा कि आपको क्यों नहीं लगता कि यह चित्र अधूरा है? आलोक का उत्तर बच्चों के लिये समझ का एक नया अध्याय बनने जा रहा था और मेरे लिये अपूर्णता की पूर्णता। आलोक ने कहा कि मुझे क्या ज्ञात कि तुम्हारी कल्पना में क्या क्या था और तुम क्या क्या बनाना चाहते थे? जो कुछ भी तुमने बनाया वह तो मेरी दृष्टि में पूर्ण है। तुम्हारे द्वारा आधा बना हुआ घर भी पूरा संदेश संप्रेषित करता है। बच्चों के चेहरे खिल गये क्योंकि अभी तक किसी भी अध्यापक ने उन्हें यह ज्ञान नहीं दिया था। उनका प्रयास सदा ही शून्य या पूर्ण के बीच मापा गया था। तथाकथित अपूर्ण कृति में किसी के द्वारा प्रयास की पूर्णता देख पाना उनके लिये सर्वथा नया अनुभव था।

मेरे मन में बहुत दिनों से यह विचार घुमड़ रहा था कि पूर्णता की खोज में हम उन तथ्यों को क्यों नकार देते हैं जिन्हें हम पूर्ण नहीं समझते हैं। आलोक का यह कहना एक आँधी की तरह ज्ञान के सारे कपाट खोल गया। क्या नहीं बना है, उसका चिन्तन कर जो बना हुआ है, उसकी अवहेलना करना कृति के साथ घोर अन्याय है। जीवन में जो नहीं मिल पाया पूर्ण होने के लिये, उसकी व्यग्रता में जो लब्ध है उसे क्यों व्यर्थ करना?

बात सच ही है, अपूर्णता एक भार की तरह आती है, कुछ रिक्त सा लगता है, पूर्णता की ललक हमें सहज नहीं होने देती है। युवावस्था में जो बीमारी ऊर्जा की अधिकता के कारण होती थी, वही बीमारी हमारी ऊर्जा की कमी को अपूर्णता के नैराश्य से जोड़ने लगती है। अनमनापन सा छाने लगता है व्यक्तित्व में, जीवन लगता है, अकारण ही निकला जा रहा है। आलोक की समझ न केवल बच्चों को समझानी होगी वरन हमें भी समझनी होगी, हमारी कर्मशीलता का खण्ड खण्ड अध्याय तभी सतत हो पायेगा तभी पूर्ण हो पायेगा। बिना अपूर्णता को समझे और स्वीकार किये, न तो हम पूर्ण हो पायेंगे और न ही प्रसन्न रह पायेंगे।

औरों के प्रयास इस अपूर्णता के लेकर भले ही व्यग्र रहें पर मेरे लिये अपूर्ण एक पूर्ण शब्द है।