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15.6.13

मैकबुक मिनी

नहीं, एप्पल ने किसी नये उत्पाद की घोषणा नहीं की है, यह मेरे नये प्रयोग का नाम है। इसके पीछे एक रोचक कहानी है, एक परिवर्धित सततता है, एक सुनिश्चित योजना है और उत्पादकतापूर्ण उत्साहवर्धन भी।

जिन्होंने मैकबुक एयर को देखा और परखा है, उन्हें यह ज्ञात होगा कि यह सबसे हल्का लैपटॉप है, ११.६ इंच स्क्रीन और भार मात्र एक किलो। उठाने में सुविधाजनक, रखने में सुरक्षित और कम्प्यूटर के मानकों में आधुनिकतम। यही नहीं, बैटरी भी पर्याप्त रहती है, लगभग ६ घंटे। दो वर्ष पहले लिया था और आज भी नया सा ही लगता है। उपयोग भी सघन है, परिचालन, प्रशासनिक, लेखन और ब्लॉग संबंधी सारे कार्य उसी लैपटॉप में ही होते हैं। कुल मिलाकर मेरे द्वारा ६ घंटे औऱ बच्चों द्वारा २ घंटे उपयोग में आता है। लगभग ८ घंटे के उपयोग में दो बार बैटरी चार्ज करनी पड़ जाती है। उपयोगिता की दृष्टि से देखा जाये तो सामान्य से कहीं अधिक मूल्य देने के बाद भी कहीं अधिक संतुष्ट और प्रसन्न हूँ।

कुछ दिन पहले बिटिया का जन्मदिन था। पढ़ाई में पिछले वर्षों की अपेक्षा बहुत अच्छा प्रदर्शन करने के कारण मन प्रसन्न था और उसे कुछ अच्छा उपहार देने का मन बना लिया था, ऐसा उपहार जो आगे भी उसके काम आ सके। सोचा, विचारा और जाकर एप्पल का आईपैड मिनी ले आया। पता नहीं, आप लोग क्या कहेंगे? आप कह सकते हैं कि दस वर्ष की बिटिया को इतना बहुमूल्य उपहार देना एक मूर्खता है। सबने यही कहा कि ऐसे तो आप बच्चों को बिगाड़ देंगे। क्या करें, मुझे लगा कि अभी थोड़ा बहुत गेम खेलेगी, थोड़े बहुत गाने सुनेगी, वीडियो देख लेगी, पर धीरे धीरे पढ़ने और अन्य सार्थक उपयोग में लाने लगेगी। जो भी हो, बिटिया बड़ी प्रसन्न है, सहेलियों के बीच सगर्व लिये घूमती भी है।

आईपैड मिनी मात्र ३०० ग्राम का है, अत्यन्त हल्का, ८ इंच की स्क्रीन और कार्य करने में अत्यधिक सुविधाजनक। छोटी सी बिटिया के हाथ में छोटा सा आईपैड मिनी, उपयुक्त और मेल खाता। रोचकता में ही सही, वह उस पर बहुत कुछ करना सीख गयी। फिर भी तकनीकी रूप से उसमें कुछ भी करने का उत्तरदायित्व मेरा ही था, मैं उसका तकनीकी सलाहकार जो था। इसी बहाने कई बार उसे देखने, समझने और उस पर कार्य करने का अवसर भी मिला। अब बिटिया जब स्कूल जाती थी, उसका लाभ उठा कर उसे कई बार कार्यालय भी ले गया। उसमें कार्य कर बड़ा आनन्द आया। मैकबुक एयर पर किये जाने वाले सारे कार्य बड़ी सरलता से उसमें भी कर सका। धीरे धीरे नशा बढ़ता गया, कार्यालय में आईपैड मिनी अपना अधिकार बढ़ाने लगा, साथ ही लम्बे निरीक्षणों में और वाहन में भी उसका उपयोग करने लगा।

एक बात जो सर्वाधिक प्रभावित कर गयी, वह थी लगभग तीन गुनी बैटरी, बिना एक बार भी चार्ज किये हुये लगभग १५ घंटे। साथ में चार्जर ले जाने की आवश्यकता समाप्त हो गयी। अब एक तिहाई से भी कम भार में तीन गुनी से भी बैटरी, धीरे धीरे उस पर मन डोलने लगा। बहुधा घर में भी उसे उपयोग में लाने लगा, कहीं कोने में चुपचाप, बिटिया से आँँख बचा कर, घंटे भर के लिये।

बस दो समस्यायें हैं, एक तो स्क्रीन पर टाइप करने से टाइपिंग की गति बहुत कम होने लगती है, उतनी नहीं रहती है जितनी एक भौतिक कीबोर्ड में। जब सोच समझ कर लिखना हो तो वह गति अधिक महत्व नहीं रखती, पर जब विचारों का प्रवाह गतिमय हो तो ऊँगलियों को भी और अधिक थिरकना पड़ता है। उसे एक हाथ से पकड़कर दूसरे हाथ से टाइप करने में बायाँ हाथ थोड़ा थकने लगता है और केवल एक हाथ के प्रयोग से टाइपिंग की गति आधी हो जाती है। दूसरा यह कि कीबोर्ड स्क्रीन पर आ जाने से कार्य करने के लिये क्षेत्रफल कम मिलता है और देखने में थोड़ी असुविधा होने लगती है। संभवतः यही दो बिन्दु प्रमुख थे जब टैबलेट के ऊपर वरीयता देकर मैकबुक एयर को खरीदा था।

थोड़ी सुविधा और थोड़ी असुविधा के साथ आईपैड के प्रयोग में मिलाजुला अनुभव हो रहा था। जब तनिक सुविधाभोगी प्रयोग हो तो आईपैड मिनी, जब तनिक गतिमय लेखन हो तो मैकबुक एयर। मेरे इस व्यवहार से सर्वाधिक अड़चन बिटिया को होने लगी। यद्यपि मैकबुक एयर का प्रयोग करते हुये उसे भी कई गेम उस पर अच्छे लगने लगे थे, पर मेरा यह व्यवहार देखकर उसे लगा कि उसके हाथ से कहीं दोनों ही न निकल जायें, जब नहीं तब पिताजी किसी पर भी कार्य करने लगते हैं। एक दिन हमें चेतावनी मिल गयी कि आप किसी एक का ही उपयोग करने का निश्चित कर लें, दूसरा पूरी तरह उसके लिये छोड़ दें।

किसी पुराने नशेड़ी की तरह मुझे भी आईपैड मिनी के प्रयोग में आनन्द आने लगा था। इस चेतावनी के बाद कोई न कोई उपाय ढूढ़ना आवश्यक हो चला था। एक दिन बंगलोर में भ्रमण करते समय लॉजीटेक कम्पनी की नयी खुली दुकान में जाना हुआ। आईपैड मिनी के लिये एक ब्लूटूथ कीबोर्ड देखा, बहुत छोटा और कई प्रकार से उपयोगी। लगा कि इसे लेने से उपरिलिखित दो समस्यायें सुलझ जायेंगी और आईपैड मिनी के सशक्त पक्ष भी बने रहेंगे। एक दिन बिटिया के साथ गये और जाकर वह कीबोर्ड ले आये। तब तक अनुभव नहीं था कि वह उपयोग में कैसा रहेगा? दो लाभ स्पष्ट थे, पहला वह कीबोर्ड एक कवर का भी कार्य करने लगा, उसकी बनावट बिल्कुल आईपैड मिनी से मेल खाती थी। दूसरा वह एक आधार के रूप में भी कार्य करने लगा, लम्बा और चौ़ड़ा, दोनों ही प्रकार से। अब लिखने, पढ़ने, वीडियो देखने और अन्य कार्य करने में सुविधापूर्ण आनन्द आने लगा है। आप दोनों का अन्तर चित्र में देखिये।

यह कीबोर्ड परम्परागत कीबोर्डों के आधे आकार का है। एक संशय हो सकता है कि आकार आधा होने पर टाइप करने में कठिनाई हो सकती है। हाँ, यदि आप दसों ऊँगलियों से टाइप करते हैं तो संभव है कि कई बार आपसे भूल हो जाये और आपकी ऊँगलियाँ कुछ और टाइप कर जायें। पर यदि आप मेरी तरह हैं और दो ऊँगलियों से ही देख देख कर टाइप करते हैं तो आपकी गति पहले से और अधिक हो जायेगी, क्योंकि इसमें आपको अन्य कीबोर्डों की तुलना में हाथ बहुत कम हिलाना पड़ेगा।

अभ्यास लय पकड़ चुका है और टाईपिंग की गति पहले से बीस प्रतिशत अधिक हो गयी है। बैटरी तीन गुनी और कीबोर्ड को मिलाकर भी भार मैकबुक एयर का आधा रह गया है। यदि मूल्य भी देखा जाये तो वह भी मैकबुक एयर का आधा ही है। अन्य कार्यों के बारे में तो नहीं कह सकता पर लेखन, कार्यालय, अध्ययन समेत मेरे सारे कार्यों के लिये यह पर्याप्त है। जब से इस प्रयोग में लगा हूँ, लेखन बहुत अधिक बढ़ गया है। इसका नामकरण मैंने 'मैकबुक मिनी' किया है। अब बिटिया मेरे 'मैकबुक एयर' में प्रसन्न है और मैं उसके 'मैकबुक मिनी' में।

4.2.12

पहले तीन में आओ, आईपैड मिल जायेगा

एप्पल ने शिक्षा के क्षेत्र में पहल करते हुये आईबुक ऑथर के नाम से एक सुविधा प्रारम्भ की है। इस एप्लीकेशन के माध्यम से आप कोई पुस्तक बड़ी आसानी से लिख सकते हैं और आईट्यून के माध्यम से ईबुक के रूप में बेचकर धन भी कमा सकते हैं। उपन्यास, कविता इत्यादि के अतिरिक्त गणित, विज्ञान जैसे विषयों पर पाठ्य पुस्तक लिखने के लिये कई प्रारूप दिये गये हैं इस सुविधा में। किसी भी अध्याय में लेखन और चित्रों के अतिरिक्त वीडियो, त्रिविमीय दृश्य, पॉवर प्वाइण्ट प्रस्तुति, एक्सेलशीट गणनायें आदि के होने से पढ़ने का अनुभव अलग ही होने वाला है। पुस्तक आप मैकबुक में लिख सकते हैं पर समुचित पढ़ने के लिये आईपैड का विकल्प ही रहेगा। इस माध्यम से एप्पल का प्रयास आईपैड को शिक्षा के आवश्यक अंग के रूप में स्थापित करने का रहेगा।

मेरे अग्रज नीरजजी ने अपने पुत्र को हाईस्कूल के समय नियमित पढ़ाया है और वह प्रचलित कई पाठ्य पुस्तकों की गुणवत्ता से संतुष्ट नहीं हैं, उनका कहना है कि पाठ्यपुस्तकों को और अधिक प्रभावी ढंग से लिखा जा सकता है और रोचक बनाया जा सकता है। आईबुक ऑथर के रूप में नीरजजी को रोचक ढंग से पुस्तक लिखने के लिये एक उपहार मिल गया है। यदि वह कोई पुस्तक इसपर लिखेंगे तो वह कैसी लगेगी? इसी उत्सुकता में एक अध्याय लिखकर देखा, वह आईपैड पर कैसा लगेगा यह देखने के लिये एप्पल के स्टोर इमैजिन में गया। खड़ा हुआ आईपैड में वह अध्याय देख रहा था, बगल में एक १४-१५ साल की लड़की अपने माता पिता के साथ आईपैड देख रही थी, उनके बीच की बातचीत, न चाहते हुये भी सुनायी पड़ रही थी।

लड़की किसी तरह यह सिद्ध करने में प्रयासरत थी कि वह आईपैड एक खिलौने के रूप में नहीं लेना चाहती, वरन उसका उपयोग अपनी पढ़ाई में कर अच्छा भविष्य बना सकती है। मैं थोड़ा प्रभावित हुआ, मुझे भारत का भविष्य आशावान लगने लगा। मुझे भारतीय मेधा पर कभी संशय नहीं रहा है, पर अपनी बात खुलकर कह पाने का गुण भारतीय बच्चों में न पाकर निराशा अवश्य होती है, कुछ संकोच के कारण नहीं बोलते हैं, कुछ मर्यादा के लबादे में दबे रहते हैं। वह लड़की जब बोल रही थी, जिज्ञासावश मैं अपना कार्य छोड़ तन्मयता से बस सुने जा रहा था। भारत अपने महत भविष्य में दौड़ लगाने जा रहा था, तभी पिता का एक आश्वासन सुनकर ठिठक गया। पिता बोले, बेटी परीक्षा में पहले तीन में आओ, आईपैड मिल जायेगा।

कुछ जाना पहचाना सा लगता है यह आश्वासन, सबके साथ हुआ होगा जीवन में, बस इस वाक्य में तीन के स्थान पर कोई और संख्या व आईपैड के स्थान पर कोई और वस्तु बदल जाती होगी। आपके साथ बचपन में हुआ होगा और संभव है कि आप अपने बच्चों को यही सूत्र पिला रहे हों, पतिगण अपनी पत्नियों से कुछ ऐसा ही मीठा संवाद बोलते होंगे, पत्नियाँ भी ऐसे गुड़भरे संवादों को सूद समेत चुकाती होंगी, ध्यान से देखें तो हर जगह यही सिद्धान्त पल्लवित हो रहा है। बड़ी गहरी पैठ बना चुका है यह अन्तर्पाश, हर परिवार में।

बचपन से अब तक की दो ही घटनायें याद आती हैं, इस प्रकार के अन्तर्पाश की, क्रिकेट बैट पाने के लिये गणित की किसी परीक्षा में पूरे अंक लाने का लक्ष्य और घड़ी पाने के लिये हाईस्कूल में ससम्मान उत्तीर्ण होने का लक्ष्य। दोनों ही लक्ष्य प्राप्त हुये थे और पिताजी ने दोनों ही वचन पूरे किये, पर उसके बाद से मैं अपने कर्म करता रहा, पिताजी स्वतः ही कुछ न कुछ फल देते रहे, किसी फल विशेष के लिये किसी कर्म विशेष को विवश नहीं किया गया, कोई अन्तर्पाश नहीं रहा।

कर्मफल का सिद्धान्त है, कर्म करने से फल मिलता है, पर जगतीय कर्मफल के सिद्धान्त से थोड़ा अलग है पारिवारिक कर्मफल का सिद्धान्त। जगतीय कर्मफल में सफलता और सफलता की प्रसन्नता अपने आप में फल होता है। पारिवारिक कर्मफल में किसी कार्य की सफलता ही कर्म है, फल पूर्णतया असम्बद्ध होता है। आशाओं और आकांक्षाओं का आदान प्रदान होता है पारिवारिक परिप्रेक्ष्य में।

खैर, लड़की के पास दो माह का समय है, प्रथम तीन में आकर आईपैड पाने के लिये। भगवान करे, उसका दृढ़निश्चय उसे सफलता दिलाये। इसी बीच मैं नीरजजी को भी बोलता हूँ कि एक स्तरीय पुस्तक लिखना प्रारम्भ कर दें, आने वाली पीढियाँ ढर्रे वाली पुस्तकों के अतिरिक्त अच्छे लेखकों की पुस्तकें पढ़ने को तैयार बैठी हैं। टिम कुक जी का ईमेल लेकर उन्हे भी सूचना देता हूँ कि आप जो शिक्षा को भी संगीत, फोन और लैपटॉप की तरह एक नया स्वरूप दे रहे हैं, उसमें सप्रयास लगे रहिये। भारत में बच्चों की मेधा प्रखर है और उसे स्तरीय पोषण की आवश्यकता है, घिसे घिसाये तरीकों से कहीं अलग। भारत में हर बच्चे के पास होगा आईपैड, क्योंकि अपनी मेधा के बल पर भारत ही प्रथम तीन में सदा बना रहेगा।

10.12.11

आईपैड या मैकबुक एयर

एक मित्र मिले, हमारा नया मैकबुक एयर देखे, प्रभावित हुये, बोले बड़ा हल्का है, पर जाते जाते संशय की एक कील ठोंक गये, कहे कि हल्का ही लेना था तो आईपैड ले लेते, हल्का भी पड़ता, सस्ता भी। बात ठीक ही थी, सहसा लगा कि कहीं गलत निर्णय तो नहीं ले लिया है। ऐसा नहीं था कि निर्णय प्रक्रिया में यह तथ्य ध्यान में नहीं था, पर किसी और के आत्मविश्वास को त्वरित झुठलाया भी नहीं जा सकता है।

पहले आईपैड के उन तीन पक्षों को समझ लें जो मैकबुक एयर पर भारी हैं। पहला, मैकबुक एयर के १००० ग्राम की तुलना में आईपैड का भार ७०० ग्राम है। ३०० ग्राम की कमी के कारण आप आईपैड को लम्बे समय तक एक हाथ से पकड़ कर उपयोग में ला सकते हैं, कोई पुस्तक पढ़ सकते हैं। लैपटॉप से पुस्तक पढ़ने के प्रयास में दोनों हाथ लगाने पड़ते हैं, पर उसमें भी लम्बे समय तक पढ़ भी सकते हैं और पढ़ने के बाद पुस्तक की तरह बन्द भी कर सकते हैं। दूसरा, आईपैड की बैटरी १० घंटे चलती है जबकि लैपटॉप की ७ घंटे, ३ घंटों का अतिरिक्त समय आपको आईपैड बिना चार्जर कहीं भी ले जाने की सुविधा देता है। तीसरा, यदि आप आईपैड का ६४ जीबी व वाई-फाई वाला मॉडल लें तब भी आईपैड लगभग ४६,००० रु का पड़ता है, मैकबुक एयर से २०,००० रु सस्ता।   

हिन्दी के कीबोर्ड की अनुपस्थिति आईपैड का सर्वाधिक निर्बल पक्ष था। यह एक प्रमुख कारण था कि आईपैड के बारे में और अधिक नहीं सोच सका। यद्यपि हिन्दीराइटर सॉफ्टवेयर के माध्यम से हिन्दी फॉनेटिकली टाइप की जा सकती थी पर लम्बे समय के लिये अंग्रेजी की वैशाखियों पर चलना बड़ा ही असहज और कठिन था। मैकबुक एयर में देवनागरी इन्स्क्रिप्ट कीबोर्ड में टाइप करने का आनन्द आईपैड में नहीं है। अब तो आईपैड में हिन्दी कीपैड आ भी  गया है तो भी स्क्रीन पर लम्बे समय के लिये टाइप करना बड़ा ही असुविधाजनक है। लगभग आधा स्क्रीन कीपैड से घिर जाने के बाद एक पूरा पैराग्राफ भी नहीं दिखता है, इससे लेख और विचारों की तारतम्यता बनाये रखना कठिन होता है। आईपैड पर वाह्य कीबोर्ड का भी प्रावधान है, पर  दो भागों को सम्हालने और समेटने का कष्ट देखते हुये मैकबुक एयर आईपैड की तुलना में कहीं अच्छा विकल्प है। यदि वाह्य कीबोर्ड और स्क्रीन कवर के भार व मूल्य को आईपैड में जोड़ दें तो हल्कापन घटकर १०० ग्राम व सस्तापन घटकर १०,००० रु भर रह जाता है। 

आईपैड की स्क्रीन लगभग २ इंच छोटी है। वैसे तो बहुत सारे कार्यों के लिये बड़ी स्क्रीन की आवश्यकता ही नहीं पड़ती है, पर कई कार्यों के लिये स्क्रीन पर अधिक सूचना की उपस्थिति बड़ी उपयोगी होती है। लैपटॉप की निकटता, आँखों पर बनने वाले ठोस कोण, एक दृष्टि में दृष्टिगत पठनीय सामग्री और विशुद्ध लेखकीय बाध्यताओं के कारण १२ इंच की स्क्रीन ही सर्वोत्तम लगी।

आईपैड में बाह्य सम्पर्कों का नितान्त अभाव है, कोई यूएसबी नहीं, बाहर की फाईलों पर बड़ा पहरा है, संगीत आदि भी केवल आईट्यून के माध्यम से। अपनी फाइलों को स्थानान्तरित करने में आपका पसीना निकल आयेगा। वहीं दूसरी ओर मैकबुक एयर एक पूर्ण लैपटॉप होने के कारण पहले दिन से ही एक सुदृढ़ सहयोगी की तरह साथ में लगा है। साथ ही साथ अधिकतम ६४ जीबी के आईपैड में अपनी सारी फाइलें रख पाना संभव नहीं लगा। मैकबुक एयर में १२८ जीबी और यूएसबी के माध्यम से ५०० जीबी का साथ होने से सारी फाइलें एक जगह पर ही रखने का आराम है। यदि प्राथमिक और एकल कम्प्यूटर के लिये चयन करना हो तो आईपैड की तुलना में मैकबुक एयर कोसों आगे है।

आईपैड या कहें कि किसी भी टैबलेट के लिये उसे सम्हालना, सहेजना, रखना और यात्राओं में सुरक्षित रखना थोड़ा कठिन कार्य है, कारण स्क्रीन का खुला हुआ होना। उसके साथ में एक पैडेड बैग रखना अतिआवश्यक है। वहीं दूसरी ओर मैकबुक एयर की एल्यूमिनियम एलॉय काया स्क्रीन को न केवल सुरक्षित रखती है वरन लाने ले जाने भी सुविधाजनक है। चार-पाँच दिन तो एक फोल्डर में रखकर मैकबुक एयर को ऑफिस ले गया था। एक सोफे या कुर्सी पर बैठकर व लैपटॉप को गोद में रखकर घंटों कार्य कर सकने की सहजता आईपैड या किसी अन्य टैबलेट में अनुपस्थित है।

कहने को तो सैमसंग का गैलेक्सी टैब आईपैड से भी १५० ग्राम हल्का है, पर बात जब कार्यगत उपयोगिता की हो मैकबुक एयर बेजोड़ है। लगता है आने वाले मित्रों और उनके संशयों के समक्ष मेरे निर्णय को सुस्थापित रख पायेगा मैकबुक एयर। तीन माह बाद भी पहली नज़र का प्यार अपनी कसक बनाये हुये है।