4.2.12

पहले तीन में आओ, आईपैड मिल जायेगा

एप्पल ने शिक्षा के क्षेत्र में पहल करते हुये आईबुक ऑथर के नाम से एक सुविधा प्रारम्भ की है। इस एप्लीकेशन के माध्यम से आप कोई पुस्तक बड़ी आसानी से लिख सकते हैं और आईट्यून के माध्यम से ईबुक के रूप में बेचकर धन भी कमा सकते हैं। उपन्यास, कविता इत्यादि के अतिरिक्त गणित, विज्ञान जैसे विषयों पर पाठ्य पुस्तक लिखने के लिये कई प्रारूप दिये गये हैं इस सुविधा में। किसी भी अध्याय में लेखन और चित्रों के अतिरिक्त वीडियो, त्रिविमीय दृश्य, पॉवर प्वाइण्ट प्रस्तुति, एक्सेलशीट गणनायें आदि के होने से पढ़ने का अनुभव अलग ही होने वाला है। पुस्तक आप मैकबुक में लिख सकते हैं पर समुचित पढ़ने के लिये आईपैड का विकल्प ही रहेगा। इस माध्यम से एप्पल का प्रयास आईपैड को शिक्षा के आवश्यक अंग के रूप में स्थापित करने का रहेगा।

मेरे अग्रज नीरजजी ने अपने पुत्र को हाईस्कूल के समय नियमित पढ़ाया है और वह प्रचलित कई पाठ्य पुस्तकों की गुणवत्ता से संतुष्ट नहीं हैं, उनका कहना है कि पाठ्यपुस्तकों को और अधिक प्रभावी ढंग से लिखा जा सकता है और रोचक बनाया जा सकता है। आईबुक ऑथर के रूप में नीरजजी को रोचक ढंग से पुस्तक लिखने के लिये एक उपहार मिल गया है। यदि वह कोई पुस्तक इसपर लिखेंगे तो वह कैसी लगेगी? इसी उत्सुकता में एक अध्याय लिखकर देखा, वह आईपैड पर कैसा लगेगा यह देखने के लिये एप्पल के स्टोर इमैजिन में गया। खड़ा हुआ आईपैड में वह अध्याय देख रहा था, बगल में एक १४-१५ साल की लड़की अपने माता पिता के साथ आईपैड देख रही थी, उनके बीच की बातचीत, न चाहते हुये भी सुनायी पड़ रही थी।

लड़की किसी तरह यह सिद्ध करने में प्रयासरत थी कि वह आईपैड एक खिलौने के रूप में नहीं लेना चाहती, वरन उसका उपयोग अपनी पढ़ाई में कर अच्छा भविष्य बना सकती है। मैं थोड़ा प्रभावित हुआ, मुझे भारत का भविष्य आशावान लगने लगा। मुझे भारतीय मेधा पर कभी संशय नहीं रहा है, पर अपनी बात खुलकर कह पाने का गुण भारतीय बच्चों में न पाकर निराशा अवश्य होती है, कुछ संकोच के कारण नहीं बोलते हैं, कुछ मर्यादा के लबादे में दबे रहते हैं। वह लड़की जब बोल रही थी, जिज्ञासावश मैं अपना कार्य छोड़ तन्मयता से बस सुने जा रहा था। भारत अपने महत भविष्य में दौड़ लगाने जा रहा था, तभी पिता का एक आश्वासन सुनकर ठिठक गया। पिता बोले, बेटी परीक्षा में पहले तीन में आओ, आईपैड मिल जायेगा।

कुछ जाना पहचाना सा लगता है यह आश्वासन, सबके साथ हुआ होगा जीवन में, बस इस वाक्य में तीन के स्थान पर कोई और संख्या व आईपैड के स्थान पर कोई और वस्तु बदल जाती होगी। आपके साथ बचपन में हुआ होगा और संभव है कि आप अपने बच्चों को यही सूत्र पिला रहे हों, पतिगण अपनी पत्नियों से कुछ ऐसा ही मीठा संवाद बोलते होंगे, पत्नियाँ भी ऐसे गुड़भरे संवादों को सूद समेत चुकाती होंगी, ध्यान से देखें तो हर जगह यही सिद्धान्त पल्लवित हो रहा है। बड़ी गहरी पैठ बना चुका है यह अन्तर्पाश, हर परिवार में।

बचपन से अब तक की दो ही घटनायें याद आती हैं, इस प्रकार के अन्तर्पाश की, क्रिकेट बैट पाने के लिये गणित की किसी परीक्षा में पूरे अंक लाने का लक्ष्य और घड़ी पाने के लिये हाईस्कूल में ससम्मान उत्तीर्ण होने का लक्ष्य। दोनों ही लक्ष्य प्राप्त हुये थे और पिताजी ने दोनों ही वचन पूरे किये, पर उसके बाद से मैं अपने कर्म करता रहा, पिताजी स्वतः ही कुछ न कुछ फल देते रहे, किसी फल विशेष के लिये किसी कर्म विशेष को विवश नहीं किया गया, कोई अन्तर्पाश नहीं रहा।

कर्मफल का सिद्धान्त है, कर्म करने से फल मिलता है, पर जगतीय कर्मफल के सिद्धान्त से थोड़ा अलग है पारिवारिक कर्मफल का सिद्धान्त। जगतीय कर्मफल में सफलता और सफलता की प्रसन्नता अपने आप में फल होता है। पारिवारिक कर्मफल में किसी कार्य की सफलता ही कर्म है, फल पूर्णतया असम्बद्ध होता है। आशाओं और आकांक्षाओं का आदान प्रदान होता है पारिवारिक परिप्रेक्ष्य में।

खैर, लड़की के पास दो माह का समय है, प्रथम तीन में आकर आईपैड पाने के लिये। भगवान करे, उसका दृढ़निश्चय उसे सफलता दिलाये। इसी बीच मैं नीरजजी को भी बोलता हूँ कि एक स्तरीय पुस्तक लिखना प्रारम्भ कर दें, आने वाली पीढियाँ ढर्रे वाली पुस्तकों के अतिरिक्त अच्छे लेखकों की पुस्तकें पढ़ने को तैयार बैठी हैं। टिम कुक जी का ईमेल लेकर उन्हे भी सूचना देता हूँ कि आप जो शिक्षा को भी संगीत, फोन और लैपटॉप की तरह एक नया स्वरूप दे रहे हैं, उसमें सप्रयास लगे रहिये। भारत में बच्चों की मेधा प्रखर है और उसे स्तरीय पोषण की आवश्यकता है, घिसे घिसाये तरीकों से कहीं अलग। भारत में हर बच्चे के पास होगा आईपैड, क्योंकि अपनी मेधा के बल पर भारत ही प्रथम तीन में सदा बना रहेगा।

58 comments:

  1. आपकी किसी नयी -पुरानी पोस्ट की हल चल शनिवार .. 04-02 -20 12 को यहाँ भी है
    ...नयी पुरानी हलचलपर ..... .
    कृपया पधारें ...आभार .

    ReplyDelete
  2. भारत में बच्चों की मेधा प्रखर है और उसे स्तरीय पोषण की आवश्यकता है, घिसे घिसाये तरीकों से कहीं अलग। भारत में हर बच्चे के पास होगा आईपैड, क्योंकि अपनी मेधा के बल पर भारत ही प्रथम तीन में सदा बना रहेगा।

    न जाने क्यों हमेशा यही सोचती हूँ, अपने बलबूते कुछ पाने और जूझने की ललक जो हमारे यहाँ है मन में कहीं गहरे उतरती है ..... बस थोड़ा सकारात्मक बदलाव और हम जग जीत सकते हैं

    ReplyDelete
  3. शुरुआती दिनों में खिलौना लगने वाली ऐसी चीजें जल्‍द ही अनिवार्य हो जाती हैं.

    ReplyDelete
  4. आजकल इसी पर जुटे हैं सुबह शाम....अभी तो किताब पढ़ी जा रही है आई पैड पर...शान्ताराम..मस्त पुस्तक है..पढ़ना हो तो बताना!!

    ReplyDelete
  5. बहुत ही अच्छी पोस्ट /ज्ञानवर्धक जानकारी /बालमन की जिज्ञासा कुछ नया देखने और कर गुजरने की प्रबल इक्षा |सबकुछ समेटे एक यादगार पोस्ट |सर आपके लिखने का अंदाज भी निराला होता है जो पूरी पोस्ट को एक रीडिंग में पढ़ने को विवश कर देता है |नमस्कार |

    ReplyDelete
  6. मैंने भी अपने बेटे से जो प्रथम में पढ़ रहा है को ऐसा ही आश्वासन दिया हुआ है क्रिकेट किट दिलाने को लेकर..

    ReplyDelete
  7. हमारी सबकी ओर से शुभकामनाये !

    ReplyDelete
  8. हम कोई आश्वासन नहीं देते, अगर लगता है कि काम की चीज है तो ले लेते हैं।

    ReplyDelete
  9. Filhaal to main khud ise lene kii soch raha hun...sach much Steve Jobs ne duniya ko badal diya hai.

    ReplyDelete
  10. bahut achchi jankari bahuton ko labhanvit karegi.

    ReplyDelete
  11. भारत में बच्चों की मेधा प्रखर है और उसे स्तरीय पोषण की आवश्यकता है, घिसे घिसाये तरीकों से कहीं अलग।

    बहुत सही कहा है .. उस बच्ची के लिए शुभकामनायें ..

    ReplyDelete
  12. ऐसा हर सुलझे अभिवावक करते हैं , एक आकर्षण बच्चों में और उत्साह दे जाता है .

    ReplyDelete
  13. नई तकनीक के प्रति आकर्षण और फिर उसका आवश्यक आवश्यकता बन जाना.. अच्छी और उपयोगी जानकारी!!

    ReplyDelete
  14. बहुत अच्छी जानकारी दी है सर!


    सादर

    ReplyDelete
  15. आजकल बच्चो की सोच और नजरिया दोनो ही बदलले लगे है..टैक्नोलोजी का जमाना है.पूरी तो करनी ही पड़ेगी..चाहे कोई भी शर्त रखो......

    ReplyDelete
  16. बहुत बढिया और रोचक जानकारी से लबरेज़ पोस्ट ।

    ReplyDelete
  17. mano vaigyanikata ka put de ham apani manovriti ko thopane ka sabal va lavnya prayas karate hain ,jab ki bal man ki swikarokti apane aamod may vicharanurup hi hoti hai ,saddshil pravriti bhavanaurup prerana bane shubh va safalata kavaran karati hai ,varana hatasa va kunthha men badal jati hai . chinanshil aalekh .

    ReplyDelete
  18. कैरट आर पनिशमेंट 'का ही रूप है यह प्रलोभन .
    लेकिन बच्चा कमसे कम इतना बड़ा तो हो की इस प्रलोभन का अर्थ बूझ सके .आजकल कम उम्र से ही बच्चों को हांकना शुरू कर दिया जाता है .प्रवीण जी हमेशा ही नवीनतर लातें हैं अनुभव सिद्ध ,भोगा हुआ ,हासिल किया हुआ .

    ReplyDelete
  19. 'भारत में बच्चों की मेधा प्रखर है और उसे स्तरीय पोषण की आवश्यकता है, घिसे घिसाये तरीकों से कहीं अलग।'-- आपका कथन सौ पैसे सत्य है.मर्यादा की सीमाओं में, स्वतंत्र सोच इस कदर जकड़ जाता है कि उसे,शुरू से ही दबाव झेलने पड़ते हैं-लड़कियों को और भी अधिक.एक सीमा आर्थिक स्थिति की भी है .
    पश्चिमी देशों में मुझे यह बात बहुत अच्छी लगी कि बच्चे भी खुल कर अपनी बात बोलते हैं.

    ReplyDelete
  20. भारत में बच्चों की मेधा प्रखर है और उसे स्तरीय पोषण की आवश्यकता है, घिसे घिसाये तरीकों से कहीं अलग।

    .....बहुत सही आंकलन.

    ReplyDelete
  21. मनोरंजन के साधन बदल रहे हैं

    ReplyDelete
  22. hame to sirf paas hone par hi sab uplabdh ho jaata tha . kyoki hamara paas hona hi bahut badi uplabdhi thaa

    ReplyDelete
  23. मेरे साथ कभी भी ऐसा नहीं हुआ न ही कभी मैंने अपने बेटे के साथ ऐसी बात कही। यह कुछ लेन-देन (शायद यह शब्द ठीक न हो) सी बात लगती है। इसे न तो मेरी मां ने ठीक माना न मैंने। हमें वह सब मिला जो हमें मिलना चाहिये था और हमने अपने बेटे के साथ भी ऐसा किया।

    मेरा बेटा हमेशा स्कूल साइकिल से गया और आई आई टी कानपुर में साइकिल ही रखता था। हमारे विचार से यही सही था। हांलकि हम उसे दो पहिया या चार पहिया का वाहन आसानी से दे सकते थे। यह भी सच है कि उसने कभी इसकी मांग भी नहीं की - हांलाकि उसके कई मित्र के पास दो पहिया का वाहन था।

    मैं स्वयं खेल का प्रेमी हूं। खेल के लिये या पढ़ाई के लिये शायद हम उसे ज्यादा देने को तत्पर रहते थे जितना वह चाहता था :-)

    ReplyDelete
  24. बढिया और रोचक जानकारी..

    ReplyDelete
  25. अनजाने में ही हम बच्चों के लक्ष्य निर्धारित कर देते हैं या बदल देते हैं....स्वस्थ परंपरा नहीं है यह !

    ReplyDelete
  26. विष्णु बैरागी जी की ईमेल से प्राप्त टिप्पणी....

    किताब लिखने से शुरु होकर कर्मफल पर समाप्‍त हुई इस पोस्‍ट का निष्‍कर्ष, इस पोस्‍ट की इन पंक्तियों में अनुभव हुआ - जगतीय कर्मफल में सफलता और सफलता की प्रसन्नता अपने आप में फल होता है। पारिवारिक कर्मफल में किसी कार्य की सफलता ही कर्म है, फल पूर्णतया असम्बद्ध होता है।

    ReplyDelete
  27. लड़की को शुभकामनाओं के साथ यह भी कहना है कि ई-पुस्तकें कागज़ी पुस्तकों का स्थान शायद ही ले पाए :)

    ReplyDelete
  28. हमेशा की तरह और ज्ञान वृद्धि हुई है ...
    आभार आपका !

    ReplyDelete
  29. अच्छी जानकारी..... कुछ पाने की लालसा लगन तो पैदा करती ही है.

    ReplyDelete
  30. बड़ा लक्ष्य रखो बड़ा खाब देखो जनप्रिय सर्व प्रिय ए. पी. जे . कलाम साहब भी यही कहते हैं .

    ReplyDelete
  31. Pandey ji I pad bhavishy me nischay hi pustkon ka sthan le lega...... aur desh nishchay hi unnati ke shikhar pr hoga hamari subhkamnayen sweekar karen

    ReplyDelete
  32. रोचक वर्णन. दुआ है कि बच्ची की हसरत पूरी हो.

    ReplyDelete
  33. बहुत ही उपयोगी जानकारी।
    भारतीय मेधा के प्रति सकारात्मक नजरिया बहुत आश्वस्त करता है।

    ReplyDelete
  34. भारतीय मेधा के विषय में अब कोई शक नहीं किया जाता. यह भी सही है कि हम सब इस तरह की शर्तों को बच्चों के समक्ष अच्छे परिणाम की अपेक्षा में रखते रहे है. लेकिन मूल बात है कि जिन वस्तुओं को अभी भी हम वैभव की वस्तुएँ मान रहे हैं उनका उपयोग रोजाना जिंदगी में भी बहुत ज्यादा है.

    ReplyDelete
  35. हमेशा की तरह नवीन और ज्ञानवर्द्धक जानकारी प्राप्त हुई.

    ReplyDelete
  36. रास्ता खोज ही लेती है जब लक्ष्य सुनिश्चित हो वैसे तकनीक के दुरूपयोग को सब जानते ही हैं..आज के बच्चे तो उस्ताद हैं हमारे..

    ReplyDelete
  37. बिलकुल आपकी बात से सहमत हूँ भारत में टेलेंट हर गांव और नुक्कड़ बस्ती शहर के बच्चों में मिल जाएगा पर .. पर जाहिर कर पाने में शंका है....पर समाधान आई पैड बहुत बढ़िया ....

    ReplyDelete
  38. रोचक जानकारी ... आभार है आपका ...

    ReplyDelete
  39. भारत में बच्चों की मेधा प्रखर है और उसे स्तरीय पोषण की आवश्यकता है, घिसे घिसाये तरीकों से कहीं अलग बिलकुल ठीक कहा आपने किन्तु पूरने तरीके भी कुछ हद तक आज भी कारगर साबित होते हैं :) कुछ पाने की चाह मेन बच्चों को उस काम के प्रति उत्साह बढ़ ही जाता है। सार्थक आलेख

    ReplyDelete
  40. 'ज्ञान वर्धक,उपयोगी व सार्थक जानकारी. आभार.

    ReplyDelete
  41. अभिभावक जब अपने छोटे बच्चों से ऐसा कहते हैं तब सम्भवत: उनका मन्तव्य उनको प्रेरित करना होता है ..

    ReplyDelete
  42. I Pad ka evaluation kar rah a Hun. Isliye Hindi mein likh Nahin pa raha hun. Aadat daalni padegi. Abhi Kuch kathin sa lag raha hai. Apple apni keemat kam kare to bachhon ko sulabh karwaana aasaan ho jaayega.

    ReplyDelete
  43. Pandey ji,
    Technology and temptation both have changed with the passage of time, but the initial nature and mentality of man have not changed. you reminded many people of their childhood. A useful article!
    It's better if you mail your No on my email, I would like to talk to you.
    email- hsrarhi@gmail.com

    ReplyDelete
  44. अब तो पहले तीन से भी काम नहीं चलने वाला,एकदम अव्वल रहना पडेगा ..A-1,percentile- 99.99

    ReplyDelete
  45. :) sach hai sabke sath kabhi na kabhi hua hoga ye

    ReplyDelete
  46. नयी तकनीकी जानकारी पुनःप्राप्त हुई आपसे .

    ReplyDelete
  47. Bahut badiya upyogi jaankari....dhanyavad1

    ReplyDelete
  48. नई टेक्नोलोजी की संभावनावों का आकाश बहुत ऊँचा है !
    आभार !

    ReplyDelete
  49. मैं तो बचपन में वह आकर्षक कपड़ा भी न ले पाया जो मैं चाहता था ...मगर बाद में लगा उसकी जरुरत ही नहीं थी ...आज मेरे मन में विलासिता के प्रति विरक्ति मेरे गहरे संस्कारों की ही बदौलत है ...और यह विषमताओं और अभावों वाले देश में जरुरी भी है ..पता नहीं मेरे मित्र यह जानते हैं या नहीं मैं नए नए सामानों ,गैजेट्स ,नयी कारों आदि आदि वैभव की झलक की और तनिक भी खिंचता नहीं ...अम्बेसडर और आरम्भिक मारुति,बोलेरो ,टाटा सुमो के अलावा कोई कार पहचान नहीं पहचान पाता....साधारणता और सादगी के इस जीवन दर्शन के लिए मैं अपने पितामह और पिता जी का आभारी हूँ....पाता नहीं बच्चे तक यदि यह संस्कार मैं नहीं प्रवाहित कर पाता तो यह कहीं मेरी ही कमी है ......
    हाँ ईबुक लेखन की यथोक्त तकनीक युगांतरकारी होने वाली है ....इस जानकारी के लिए बहुत आभार!

    ReplyDelete
  50. अरविन्द जी का कहा लागू हम पे भी होता नही .हमने बच्चों को कभी पढने के लिए दवाब नहीं डाला .हाँ माहौल दिया पढने लिखने का ,संवरने का .

    ReplyDelete
  51. हूँ.....
    बच्ची ने आईपैड का सही इस्तेमाल किया या नहीं इसका इन्तजार रहेगा ...................

    ReplyDelete
  52. लेकिन मुकाबला बदला है अब वक्त और है दंगल अकादमिक ज़बर्जस्त है .था तब भी लेकिन नज़रिया और था इसके प्रति .अब तो एक प्रकार का पैनिक है हिरस है .स्कूल पद प्रतिष्ठा के सवाल बन रहें हैं .

    ReplyDelete
  53. बेशक मुकाबला दिनानुदिन क्लिष्ट होता गया है स्कूल बड़ी चीज़ हो गई है और इम्तिहानी लाल हरेक का होना लाजिमी हो गया है .१००%अंक लाओ .यही एक्सट्रीम एब्नोर्मेलिती की दायरे में आ जाती है .

    ReplyDelete
  54. प्रेरणा एक बात है और प्रलोभन दूसरी । आप बच्चे को अच्छा करने के लिये प्रेरित कीजिये पर उन्हें घूस ना दें ।
    उदाहरण के लिये आप कह सकते हैं कि यदि आप अच्छा अभ्यास करें तो आपको इस अभ्यास को सुगम करने के लिये अगली बार आयपैड दिला देंगे ।
    आपकी अंतिम बात बहुत ही अच्छी लगी ।
    भारत में बच्चों की मेधा प्रखर है और उसे स्तरीय पोषण की आवश्यकता है, घिसे घिसाये तरीकों से कहीं अलग। भारत में हर बच्चे के पास होगा आईपैड, क्योंकि अपनी मेधा के बल पर भारत ही प्रथम तीन में सदा बना रहेगा।

    ReplyDelete
  55. बहुत ही अच्‍छी ज्ञानवर्धक एवं उपयोगी जानकारी भी शामिल है साथ में ... आभार ।

    ReplyDelete
  56. vilasita se awashyakata ki or kadam ipod ke

    ReplyDelete