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28.6.14

व्यर्थ ही

शान्त, तृप्त, कर्मालु, व्यवस्थित,
मन की मृगतृष्णा से दूर ।
ऐसा एक व्यक्तित्व जगा लूँ,
अब तो मेरा ध्येय यही है ।।१।।

व्यर्थ तृषा की बलिवेदी पर,
और समय का अर्पण करना ।
अन्त्य क्षुधा कर ले परिपूरित,
द्विजजन का सिद्धान्त यही है ।।२।।

व्यर्थ शब्द के मकर जाल मे,
जीवन का सारल्य फँसाना ।
शब्द-खोज तज अर्थ समझ ले,
न्यून श्रमेच्छुक मार्ग यही है ।।३।।

व्यर्थ कष्ट की आशंका से,
कर्म-पुण्य क्यों करूँ तिरोहित ।
स्वेद बिन्दु के उजले मोती,
जीवन का श्रृंगार यही है ।।४।।

व्यर्थ सुखों की अभिलाषा में,
अंधकूप में घुसते जाना ।
मदिरा का सुख छोड़ क्षणिक जो,
जीवन जल का पान सही है ।।५।।

5.10.13

बंगलोर से वर्धा

कभी कभी लगता है कि यात्रा के बारे में क्या लिखूँ? यात्रायें सामान्य क्रियाओं की श्रेणी में आ चुकी हैं। सबकी यात्रायें एक जैसी ही होती होंगी, यदि कुछ विशेष रहता होगा तो वह है यात्रा में मिले लोग। यदि आप बातें करने में उत्सुक हैं तो आपकी हर यात्रा रोचक होगी। यदि ऐसा नहीं है और आप पूर्णतया अन्तर्मुखी हैं तो आपकी यात्राओं में कुछ विशेष कहने को नहीं होगा।

पहचानों, हैं कौन मुखी हम
मुझे अब तक समझ नहीं आया है कि मैं बहिर्मुखी हूँ या अन्तर्मुखी। कभी कभी न चाहते हुये भी सामने वाले से इस लिये भी बतिया लेते हैं कि कहीं ऐसा न लगने लगे कि मानसिकता में भी प्रौढ़ता छाने लगी है। पता नहीं युवावस्था किस अवस्था तक मानी जाती है़, पर मन यह मानने को करता ही नहीं कि हम प्रौढ़ता के द्वार खटखटा रहे हैं। जब से लिखना अधिक हो गया, सोचना अधिक हो गया, अब अधिक बतियाने से समय व्यर्थ होने का बोध होता है, लगता है कि इससे अच्छा कुछ लिख लिया होता।

क्या हम यात्राओं में सामने वाले से बस क्या इसीलिये बतियाते हैं कि समय कट जाये, या संभव है कि कुछ नया और रोचक जानने को मिल जाये। २०-३० घंटे के यात्रा में उत्पन्न बौद्धिक व मानसिक संबंधों की इच्छा तब बहुत अधिक नहीं रहती जब आपके पास स्वयं ही करने के लिये पर्याप्त कार्य हों। अपने कार्यों के बन्धनों का बोझ जब अधिक कर लें तो सारी शक्ति उसी को साधने में निकल जाती है, पर सबको लगता है कि हम अन्तर्मुखी हो चले हैं। जब हम सभी बोझों से मुक्त रहते हैं और स्वयं को अनुभव से भरने को प्रस्तुत रहते हैं तब सबको लगता है कि हम बहुर्मुखी हो चले।

मैं भी अन्तर्मुखी और बहुर्मुखी की अवस्थाओं में बहुधा उतराता हूँ, इस यात्रा में पूरी तरह से निर्धारित कर के चला था कि ज्ञान के सागर भरूँगा, इसीलिये टेड की ढेरों वार्तायें अपने आईपैड में भरकर ले गया था। अनुभव भरने को प्रस्तुत था तो बहुर्मुखी होना था, पर अनुभव पूर्वनियोजित था और स्वयं में ही व्यस्त रहना था, अतः व्यवहार अन्तर्मुखी था।

पूर्वनियोजित अन्तर्मुखी बने रहने की सारी योजना तब धूल धूसरित हो गयी जब टेड की वार्ताओं ने बतियाना बन्द कर दिया। अब तो चाह कर भी व्यस्त नहीं लग सकते थे, अतः निश्चय किया कि कृत्रिम आवरण छोड़कर बहुर्मुखी हो जाया जाये।

सामने की सीट में एक वृद्ध महिला को बिठा कर उनके सहायक उतर गये थे। सामने की सीट रिक्त होने के कारण वह वहाँ बैठकर सुस्ता रही थीं। उन्हें यह तो ज्ञात था कि उनकी सीट पक्की है पर कौन सी वह सीट है, इसकी समुचित सूचना नहीं थी उन्हें। संभवतः ट्रेन चलने के तुरन्त पहले ही उनका आना हुआ था और सामने वाला कोच का दरवाज़ा खुला होने के कारण उसमें उन्हें चढ़ा दिया गया था। मुझे भी कुछ कार्य नहीं था अतः उनसे थोड़ी देर बैठ कर बात करता रहा। उनका व्यवहार मातृवत लगा और उनके हर वाक्य में एक बार बेटा अवश्य निकल रहा था। मुझे लगा कि मुझे उनकी सीट ढूँढ़ने में उनकी सहायता करनी चाहिये पर टीटी महोदय के आने तक कुछ कर भी नहीं सकता था।

टीटी महोदय आये और टिकट देख कर बोले कि माताजी आपका तो प्रथम वातानुकूलित कोच में है, आप द्वितीय वातानुकूलित कोच में क्यों बैठी हैं? माताजी के चेहरे पर रेलवे संबंधित इतनी जटिलता न जानने के मन्द भाव उभर आये। टीटी महोदय ने बताया कि उनका कोच दो कोच के बाद है। वे अकेली थीं और एक बड़ा बैग लिये थीं। हमने टीटी महोदय से कहा कि आप जाकर उन्हें बैठा दीजिये, हम पीछे उनका सामान भिजवा देते हैं। यह कह तो दिया था पर भूल गये थे कि हम पूरी तरह से व्यक्तिगत यात्रा पर थे और कोई भी सहायक हमारे साथ नहीं था। जब अगले स्टेशन पर एक और सहयात्री आ गये तो उन्हें अपना सामान देखने को कह कर हम स्वयं ही माताजी का सामान उठाकर उनके कोच में पहुँचा आये। माताजी गदगद हो गयीं, तनिक असहज भी कि क्या बोलें? उन्हें बस इतना ही कहा कि आपने इतनी बार बेटा बोला है तो बेटे को सामान उठाने का अधिकार है।

छोटा ही सही पर एक अच्छा कार्य करके मन प्रसन्न हो गया था। टेड की वार्तायें धुल जाने का दुख पूरी तरह से जा चुका था। अब सामने वाली सीटों पर एक वयोवृद्ध दम्पति थी, जैन मतावलम्बी थे, बंगलोर में किसी धार्मिक आयोजन में भाग लेकर वापस जा रहे थे। पत्नी किसी उपवास में थीं अतः विश्राम कर रही थीं, पतिदेव को दोपहर में नींद नहीं आ रही थी और वे ऊपर की सीट पर बैठकर पुरानी फ़िल्मों के गाने सुन रहे थे। मैनें भी कुछ विशेष न करने का निश्चित किया और आईपैड मिनी पर ही अपने कार्यों को व्यवस्थित करने में लग गया। कुछ पुरानी लेख छिटकनों का संपादन भी करना था, वह भी कार्य में जोड़ लिया। सच में आनन्द आ रहा था, बाहर के सुन्दर दृश्य, ट्रेन के सवेग भागने से उत्पन्न पवन का सुन्दर नाद, पार्श्व में पुराने गीतों का कर्णप्रिय संगीत और व्यस्तताओं के कारण छूटे रह गये कार्य का व्यवस्थित संपादन। सब कुछ लयबद्ध लग रहा था। अब तक टेड वार्तायें बह जाने का दुख पूर्ण रूप से जा चुका था और उसके स्थान पर बहिर्मुखी चेतना आनन्दमयी थी।

दृश्य मगन था
कार्य करने के बाद पुनः बाहर देखने लगा। हरीतिमा से पूरा यात्रा-क्षेत्र लहलहा रहा था। नदी नालों में पानी पूरे वेग में था। पानी का मटमैला रंग इस बात का प्रमाण था कि ग्रीष्म से प्यासी धरती की प्यास बुझाकर आया है वह वर्षा जल। ऊपर हल्के स्याह रंग के बादल से भरा आसमान और नीचे गहरे हरे रंग में लिपटा धरती का विस्तार, निश्चय ही वर्षा बड़ा हो मोहक दृश्य प्रस्तुत कर रही थी।

जैन दम्पति अपने खाने का पूरा सामान लेकर आये थे और घर में बनी चीज़ों को धीरे धीरे और रस लेकर खा रहे थे। सच में देखकर अच्छा लगा कि उनके पास दो बड़े बैगों में एक बैग केवल खाद्य सामग्री से ही भरा था। न बाहर का भोजन और न ही किसी से अधिक बातचीत। प्रारम्भिक परिचय के बाद वे आपस में ही अपने संबंधियों के बारे में कुछ बतियाने लगे। उनकी निजता को सम्मान देने के भाव से मैंने भी कुछ नहीं कहा, अपने लेखन में व्यस्त हो गया। बंगलोर और वर्धा के बीच की ट्रेन यात्रा में मैंने भी बाहर का कुछ नहीं खाया था। श्रीमतीजी ने पराँठे और सब्ज़ी बनाकर दे दी थी, साथ ही साथ १० केले ले लिये थे। उसी में सारा भोजनीय कार्य हो गया।

वर्धा पहुँचने के तीन घंटे पहले, पति ने पत्नी से रुई के बारे में पूछा, पति के नाख़ून में चोट लग गयी थी और हल्का ख़ून निकल रहा था। मेरे पास एक बैण्डेज था, निकालकर दे दिया, उन्हें अच्छा लगा। अगले तीन घंटे हम एक दूसरे को अपने बारे में बताते रहे, दूसरे के बारे में जानते रहे, स्नेहिल भाव से। वर्धा पहुँचने पर हमने उनसे विदा ली और उतर गये।

छोटे छोटे कार्यों की प्रसन्नता में हमारी यात्रा का प्रथम चरण बीत गया। भले ही पूर्वनियोजित यात्रा न हो पायी हो, भले ही अन्तर्मुखी यात्रा न हुयी हो, भले ही पूरी तरह बहिर्मुखी यात्रा भी न हुयी हो, पर यात्रा सरलमुखी थी, सहजमुखी थी।

चित्र साभार - हिन्दू

10.4.13

गोवा, दक्षिण से

जितने लोग भी गोवा आते हैं, अधिकांशतः उत्तर दिशा से अवतरित होते हैं और वहीं से ही घूम कर चले जाते हैं। हम भी कोई अपवाद नहीं, ६ बार जा चुके हैं, या तो उत्तर दिशा से गये या पश्चिम दिशा से। पूर्व से जा नहीं सकते, रह जाता है दक्षिण। जब इतनी तरह से गोवा देख लिया तो इस बार सोचा कि दक्षिण से गोवा देख लिया जाये।

अब तीन प्रश्न स्वाभाविक हैं। पहला कि गोवा में ६ बार देखने के लिये क्या है, दूसरा कि अप्रैल का प्रथम सप्ताह क्या थोड़ा गरम नहीं रहता है और तीसरा कि गोवा तो गोवा है, उत्तर से उतरें या आसमान से, उसमें क्या विशेष है? तीनों प्रश्न ऐसे हैं जिनका उत्तर मुझे एक दिन में नहीं मिला है, पहले प्रश्न के उत्तर में २२ वर्षों का कालखण्ड छिपा है, दूसरे प्रश्न के उत्तर में ३ वर्षों का और तीसरे प्रश्न के उत्तर में ३ दिन का।

पहली बार गोवा गया था तो १८ वर्ष का था, मित्रों के साथ था और उस समय वहाँ की उन्मुक्त संस्कृति देखने की उत्सुकता ही प्रबल थी। मित्रों के वर्णनों ने उसे स्वर्ग से टपका हुआ टुकड़ा सिद्ध कर दिया था। उस बार की यात्रा में तो हम सब बस उसी टुकड़े को ढूढ़ने में हर बीच पर भटके। अतिश्योक्ति को सिद्ध करने में कई दिन लगे पर भटकन के बाद जो थकान हुयी, उसे मिटाने के लिये सागर के अन्दर एक बार जाना ही पर्याप्त था। लहरों पर उतराने में जो आनन्द आया वह बीचों पर ललचायी दृष्टियों के सुख से कहीं अधिक ठोस था। पहले पहल लहरों के थपेड़े ये बताने में प्रयासरत रहे कि मूढ़ कहाँ छिछले में खड़ा है, छिछले में लहरें भी टूटती हैं और आशायें भी। टूटी लहरें भी आपको चोट पहुँचाती हैं और टूटी आशायें भी। लहरों के थपेड़ों ने और अन्दर आने के लिये उकसाया, जहाँ लहरें टूटती नहीं थीं वरन डुलाती थी, ऊपर नीचे, आनन्द में। एक मित्र के साथ अन्दर तक गया, लहरों पर आँख बन्द कर लेटा रहा, कान पानी के अन्दर और कानों में मानों लहरों के स्वर गूँज रहे हों, ऊँची आवृत्ति में सागर के शब्द, स्पष्ट और अद्भुत। आँखों के सामने दिखता सूर्यास्त, लाल आकाश, बादलों पर छिटके लालिमा के छींटे, ध्यानस्थ, जलधिमग्न, निर्विकार, अप्रतिम अनुभव था वह।

मित्रों का स्वर्ग ढूढ़ने आया था और अपना स्वर्ग पा लिया। उसके बाद जब भी कोई आग्रह आया, ठुकरा नहीं पाया, कुछ वर्षों बाद जब भी कुछ समय बिताने का अवसर मिला, गोवा याद आया। अब बीच पर सीमायें तोड़ती संस्कृतियाँ आकृष्ट नहीं करती, अब तो आकृष्ट करती हैं वे सीमायें, जहाँ पर सागर और आकाश आपस में एक दूसरे में विलीन हो जाना चाहते हैं, अनन्त की खोज में। कितना अजब संयोग है, सागरीय और आकाशीय अनंत के एक और मूर्धन्य उपासक को इस बार ही जान पाया, गोवा से मात्र ६० किमी दूर, कारवार में, गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर को। यहीं पर ही उन्हें प्रकृति में कल्पना का अनन्त मिल गया, डूब जाने के लिये, समा जाने के लिये।

धीरे धीरे गोवा-भ्रमण की संख्या बढ़ने लगी। साथ में ही बढ़ने लगा सागर के किनारों पर अन्तहीन और ध्येयहीन भ्रमणों का क्रम। अब किसी से कहेंगे कि अनन्त ढूढ़ने जाते हैं गोवा हर बार, तो कौन आपको गम्भीर समझेगा। धीरे धीरे हमारा कारण गौड़ हो चला है क्योंकि हमारे बच्चों को पानी की लहरों से खेलना भाने लगा है। लहरों का आना, हर बार नये रूप से, हर बार नयी शक्ति से, हर बार नयी ऊँचाई लेकर, यही विविधता बच्चों को भाती है, न केवल भाती है वरन थका भी देती है, पर न बच्चे हारते हैं और न ही लहरें, दोनों के अन्दर अनन्त की शक्ति, दोनों के अन्दर अनन्त का उत्साह। खेल बस अगली बार के लिये टल जाता है, अनिर्णीत। खेलते रहने के लिये और अगली बार आने के लिये एक और गोवा यात्रा।

बच्चों को ही नहीं, लहरों से हमारा भी जुड़ाव विशेष है। लहरों का बनना, सर्प से फँुफकारते बढ़ना, फेन उगलना, किनारों पर नत होकर वापस चले जाना और फिर आना। न जाने पृथ्वी से भावों की क्या तीक्ष्णता है कि जिसका फल किनारों को चूर चूर होकर देना पड़ता है। लगता है पृथ्वी का रूप धर लेना, न सागर को भाया और न ही आकाश को, उसका दण्ड भुगतते हैं किनारे, रेत रेत, चूर चूर। लहरों की जीवटता भाती है, लगातार तब तक आती हैं जब तक आप थक कर चूर न हो जायें। ऊर्जा लेकर वापस आयें तो पुनः उपस्थित, आपको थकाने के लिये। जीभर खेलिये, थकिये, सो जाईये, पुनः आईये, पर निराश मत होईये। आप चाहें न चाहें, जीवन में भी सुख दुख ऐसे ही अनवरत आते रहेंगे, उन्हें स्वीकार कर लीजिये, हर बार और तैयार हो जाईये अगली बार के लिये। दर्शन के ऐसे ही न जाने कितने ही अध्याय दिखते हैं सागर की लहरों में।

सागर के प्रति प्रेम और गोवा के साथ बढ़े परिचय में ही छिपा है दूसरे प्रश्न का उत्तर। भीड़ में अनन्त की उपासना बाधित होने लगती है, सागर का अनन्त मानव-समुद्र के अनन्त से बाधित हो जाता है। कई बार दिसम्बर में गया हूँ, मानवों का आनन्द देखा है वहाँ, सागर का अनन्त भूलने सा लगता है उस कार्निवाल में। दर्शनीय स्थल तो पहली बार में ही देख डाले थे, उनके लिये दिन का वातावरण सुहावना होना अच्छा था। अब तो सागर से साक्षात्कार का समय है, अनन्त की उपासना के लिये सुबह और सायं का वातावरण सागर स्वयं ही सुहावना बना देता है। सुबह और सायं सागर की लहरों पर उच्श्रंखल विनोद, दोपहर और रात को निद्रा निमग्न थकी काया। अब रहा मानसून का समय, उस समय तो सागर अपने ही संवाद में रत रहता है, बूदों की टप टप, टिप टिप और अथाह जलराशि का मिलन। वही समय होता है जब मछलियाँ अपनी जनसंख्या बढ़ाती हैं। उस समय सबकी मनाही होती है, हम भी उस समय कभी नहीं गये। पिछले तीन वर्षों में ही जाना कि मानसून के अतिरिक्त कभी भी गोवा जाया जा सकता है।

इस बार विचार किया कि गोवा को दक्षिण दिशा से देखा जाये, कारण कुछ सहकर्मियों के अनुभव थे, जिन्होने इस यात्रा को बहुत मनोरम बताया था। कार्यक्रम बना कि बंगलोर से मंगलोर होते हुये उडुपी पहुँचा जाये, वहाँ पर श्रीमाधवाचार्य स्थापित श्रीकृष्ण मंदिर में दर्शन, वहाँ से मरवन्थे बीच, मुरुडेश्वर, गोकर्णा और कारवार होते हुये गोवा। सबका अपना समर्थ इतिहास है और जितना पुरातन है उतना रोचक भी है। उन सबके बारे में विस्तृत वर्णन धीरे धीरे शब्द पाता रहेगा, पर एक ओर से सड़क मार्ग और दूसरी ओर से रेलमार्ग में कोंकण की जो झलक मिली है, उससे मन आनन्दित हो गया। कोंकण क्षेत्र मुम्बई के पश्चात थाने से प्रारम्भ होकर मंगलोर तक फैला है, दक्षिण कोंकण देख कर उत्तर कोंकण के सौन्दर्य की कल्पना करना कठिन नहीं है।

तीन दिनों की यात्रा ने इस प्रश्न का उत्तर भी दे दिया कि गोवा के दक्षिण में भी बहुत कुछ देखने को है। अनन्त और असीम का जो आनन्द गोवा के सागर में है, वैसा ही आनन्द गोवा के दक्षिण में स्थित बीचों में भी है, यदि वहाँ नहीं मिलेगी तो चहल पहल और भीड़। निश्चय ही जिन लोगों का सुख भीड़ के साथ परिभाषित होता है, उन्हें वहाँ उतना आनन्द नहीं आयेगा, पर जो एकान्त, अनन्त, प्रकृति के उपासक है, उन्हें ये सारे स्थान बहुत भायेंगे। मुझे आशा है कि आप अगली बार जब भी गोवा आयेंगे, एक पग दक्षिण की ओर भी बढ़ायेंगे।

21.3.12

होली के उन्माद में नाचना

नृत्य और संगीत, कहते हैं कि स्वर्ग की एक भेंट है, हम पृथ्वीवासियों के लिये। स्वर्ग में हर पग नृत्य है और हर बोल संगीत। कई विधायें हैं, संस्कृतियों के प्रभाव हैं, शास्त्रीय, आधुनिक, स्थानीय लोकगीत व लोकनृत्य। हर व्यक्ति किसी न किसी तरह से नृत्य और गीत से जुड़ा हुआ है। गाना अधिक व्यापक है, घर में, स्नान करते समय, टहलते हुये, पूजा करने में, खाना बनाते बनाते, हम सब कुछ न कुछ गा लेते हैं, गुनगुना लेते हैं। नाचना थोड़ा कम हो पाता है, अब आप राह चलते नाच तो नहीं सकते हैं।

जिनके पास समय है, साथ है और धन भी है, वे डिस्को आदि में जाकर अपना नृत्य-कौशल दिखा आते हैं। हम जैसे सामान्य जीवनशैली धारकों के लिये केवल दो ही अवसर आते हैं, नाचने के। एक तो किसी निकटस्थ के विवाह में या होली में। होली वर्ष में एक बार ही आती है और सारे निकटस्थों के विवाह धीरे धीरे होते रहने से नाच पाने का अवसर कम ही मिल पाता है। जहाँ पर लोक संस्कृतियाँ अभी भी जीवित हैं और किसी न किसी नृत्य शैली से संबद्ध हैं, वहाँ पर नाचने को समुचित अवसर मिलता रहता है।

प्रेम के विशेषज्ञों की माने तो, नृत्य हमारे गुणसूत्रों में आदिमकाल से विद्यमान है, एक मानसिक उथलपुथल के रूप में। वह उथलपुथल रह रहकर अपना निरूपण ढूढ़ती है, आन्तरिक विश्रंखलता नृत्य को सर्वश्रेष्ठ माध्यम मानती है। किसी को विवाह में नाचते हुये ध्यान से देखिये, ऐसा लगता है कि ऊर्जा का अस्त व्यस्त उफान एक एक कर सभी अंगों से बाहर आने का प्रयास कर रहा हो। आप अपना वीडियो स्वयं देखिये, लगेगा कोई और व्यक्ति है। नीत्ज़े कहते हैं कि आपको यदि नृत्य में बहुत अच्छा करना है तो मन की उथलपुथल का सहारा लीजिये। हिरोमू आराकावा कहते हैं कि इस अव्यवस्थित और उथलपुथल भरे विश्व में सौन्दर्य बिखरा पड़ा है। संभवतः नृत्य उसका प्राकृतिक निरूपण है।

किसी के नृत्य करने का ढंग उसके व्यक्तित्व के बारे में बहुत कुछ कह जाता है। संगीत की बीट के अनुसार पैर थिरकने चाहिये, वह तो आवश्यक ही है और सबके होते भी हैं, पर बाकी शरीर को किस तरह से संगीत में लहराया जाता है, वह हर एक के लिये अलग अलग होता है। कुछ लोगों को प्रेमासित मध्यम नृत्य भाता है, धीरे धीरे, अपने प्रेमी के साथ, लगता है मन के श्रंगार को सुगढ़ दिशा देने का कोमल प्रयास चल रहा है, ऊर्जा से अधिक स्पर्श को प्राथमिकता देता हुआ, अपने और अपनों में खोया हुआ। कई लोगों को लयात्मक नृत्य भाता है, अंगों को भाव प्रधान संवाद करते हुये, लगता है कोई सोचा हुआ संदेश प्रसारित हो रहा हो। मुझे जब भी नाचने का अवसर मिलता है, मेरे लिये वह एक ऊर्जायुक्त घटना होती है। मुझ जैसे बहुतों के लिये नाचने के लिये जब कम समय मिलता हो, तो उसमें मन की उथलपुथल ही निकलना स्वाभाविक है।

नृत्य दैनिक जीवन का हिस्सा नहीं है, होली जैसे उत्सवों में इस तरह के आनन्ददायक क्षण मिलते हैं, उन्मादित हो नृत्य करने के लिये। रंगों के पीछे हमारी कृत्रिमता छिप जाती है, या कहें कि हमारा आदिम स्वरूप बाहर आ जाता है, उपाधियों के आवरण से परे, अपने मूल स्वरूप में सराबोर, होली के उन्माद में। मित्रों का साथ, बच्चों का उत्साह, ऊर्जा से अभिभूत वातावरण, यदि आप नाच न उठें तो आपको स्वयं से कुछ गहन प्रश्न करने पड़ेंगे। कोई होली ऐसी न बीती होगी, जब जी भर कर नाचे न हों, थककर चूर न हो गये हों, दोपहर में निढाल होकर सोये न हों, शाम के मित्रों के गाना न गाया हो।

जब तक पढ़ते थे, होली का आनन्द परीक्षाओं के पहले मन का गुबार निकालने का साधन रहता था, अब नौकरी में मार्च महीने में लक्ष्य प्राप्ति की सघनता होली में गुबार निकालने का कारण बनती है। आनन्द बटोरने की व्यग्रता होली को उसका स्वच्छंद स्वरूप दे देती है। होली को सदियों से आनन्द का आशीर्वाद मिला है, होली को हमारे आदिम भाव उभारने का आशीर्वाद मिला है, होली को आनन्द में छोटे छोटे मतभेद स्वाहा कर देने का आशीर्वाद मिला हुआ है। यदि आपने जी भर कर होली के आशीर्वाद का लाभ नहीं उठाया तो अगले वर्ष तक पुनः प्रतीक्षा करनी पड़ेगी।

हम तो जी भर कर नाचे, सबके साथ। यदि आप इस वर्ष संकोच में रहे हों तो अगली बार हमारे घर में आकर होली खेलें, जी भर कर नाचेंगे, और चीख कर कहेंगे, होली है।

31.8.11

डैडी दा पैसा, पुतरा मौज कर ले

स्पष्ट रूप से याद है, आईआईटी के प्रारंभिक दिन थे, रैगिंग अपने उफान पर थी, दिन भर बड़ी उलझन रहती थी और सायं होते होते मन में ये विचार घुमड़ने लगते थे कि आज पता नहीं क्या होगा?

दिन भर कक्षाओं में प्रोफेसरों की भारी भारी बातें, नये रंगरूटों को अपने बौद्धिक उत्कर्ष से भेदती उनकी विद्वता, चार वर्षों में आपके भीतर के सामान्य व्यक्तित्व को आइन्स्टीन में बदल देने की उनकी उत्कण्ठा, श्रेष्ठता की उन पुकारों में सीना फुलाने का प्रयास करती आपकी आशंका और उस पर हम जैसे न जाने कितनों के लिये अंग्रेजी में दिये व्याख्यानों को न पचा पाने की गरिष्ठता। ऐसी शैक्षणिक जलवायु में दिन बिताने का भारीपन मन में बड़ी गहरी थकान लेकर आता था।

हम तो सात वर्षों के छात्रावास के अनुभव के साथ वहाँ पहुँचे थे पर कईयों के लिये किसी नये स्थान पर अपरिचितों से पहला संपर्क उस भारीपन को और जड़ कर रहा था। यह भी ज्ञात था कि रात्रि के भोजन के बाद ही रैगिंग के महासत्र प्रारम्भ होते हैं। कई मित्र इन सबसे बचने के लिये 5 किमी दूर स्थित गुरुदेव टाकीज़ में रात्रि का शो देखने निकल जाते थे और वह भी पैदल, न जाने की जल्दी और न ही आने की, बस किसी तरह वह समय निकल जाये। कुछ मित्र स्टेडियम में जाकर रात भर के लिये सो जाते थे, नील गगन और वर्षाकाल के उमड़े बादलों के तले।

तुलसी बाबा के "हुइहे वही जो राम रचि राखा" के उपदेश को मन में बसा कर हम तो अपने कमरे में जाकर सो जाते थे। जब रात में जगाई और रगड़ाई होनी ही है तो कमाण्डो की तरह कहीं भी और कभी भी सोने की आदत डाल लेनी चाहिये। जैसी संभावना थी, रात्रि के द्वितीय प्रहर में सशक्त न्योता आ जाता है, आप भी पिंक फ्लॉयड के "एनादर ब्रिक इन द वाल" की तरह अनुभव करते हुये उस परिचय-प्रवृत्त समाज का अंग बन जाते हैं।

रैगिंग पर विषयगत चर्चा न कर बस इतना कहना है कि उस समय औरों के कष्ट के सामने अपने कष्ट बौने लगने लगते हैं और विरोध न कर चुपचाप अनुशासित बने रहने में आपको रैगिंग करने वालों से भी अधिक आनन्द आने लगता है। परम्पराओं ने हर क्षेत्र में संस्कृति को कितना कुछ दिया है, इसकी पुष्टि घंटों चला धाराप्रवाह अथक कार्यक्रम कर गया।

उस पूरे समय में मेरा ध्यान एक सीनियर पर ही था, एक सरदार जी थे, आनन्दपान में पूर्ण डूबे, वातावरण को अपने जीवन्त व्यक्तित्व से सतत ऊर्जस्वित करते हुये, उनकी भाव-गंगा के प्रवाह में संगीत का सुर मिल रहा था, पीछे एक पंजाबी गाना बज रहा था।

डैडी दा पैसा पुतरा मौज कर ले, तेरा जमाना पुतरा मौज कर ले.....

उनके पास तो प्रोफेसरों के द्वारा सताये दिन को भुलाने का बहाना था, गले के नीचे उतारने को सोम रस था, उड़ाने के लिये डैडी दा पैसा था, आनन्द-उत्सव में सर झुकाये सामने खड़े जूनियरों का समूह था, मित्रों का जमावड़ा था, युवावस्था की ऊर्जा थी। उनकी मौज के सारे कारक उपस्थित थे।

हमारे पास तो कुछ भी नहीं था, पर उस दिन विपरीत परिस्थितियों में भी हमें उन सरदार जी से अधिक आनन्द आया होगा क्योंकि हमें तो उनकी मौज पर भी मौज आ रही थी। अब यदि डैडी के पास उड़ाने वाला पैसा नहीं है तो क्या मौज नहीं कर सकते?

4.9.10

आओ, मैं स्वागत में बैठा हूँ

समय के पीछे भागने का अनुभव हम सबको है। यह लगता है कि हमारी घड़ी बस 10 मिनट आगे होती तो जीवन की कितनी कठिनाईयाँ टाली जा सकती थीं। कितना कुछ है करने को, समय नहीं है। समय कम है, कार्य अधिक है, बमचक भागा दौड़ी मची है।

समय बहुमूल्य है। कारण विशुद्ध माँग और पूर्ति का है। समय के सम्मुख जीवन गौड़ हो गया है। बड़े बड़े लक्ष्य हैं जीवन के सामने। लक्ष्यों की ऊँचाई और वास्तविकता के बीच खिंचा हुआ जीवन। उसके ऊपर समय पेर रहा है जीवन का तत्व, जैसे कि गन्ने को पेर कर मीठा रस निकलता है। मानवता के लिये लोग अपना जीवन पेरे जा रहे हैं, मानवता में अपने व्यक्तित्व की मिठास घोलने को आतुर। कुछ बड़ी बड़ी ज्ञानदायिनी बातें जो कानों में घुसकर सारे व्यक्तित्व को बदलने की क्षमता रखती हैं। उनको सुनने के बाद कहाँ विश्राम, एक जीवन कम लगता है उस पर लुटाने को। समय के साथ लगी हुयी है दौड़। जीवन की थकान को उपलब्धि का लॉलीपॉप। मानसिक सन्तोष कि आप के सामने गाँव की नहरिया नहीं, होटल ललित अशोक का स्वीमिंग पूल है। खाने को दाल रोटी नहीं, वाइन व श्रिम्प है। भूख, गरीबी, बेरोजगारी के मरुस्थल नहीं, विकास व ऐश्वर्य की अट्टालिकायें हैं। आप भाग रहे हैं समय के पीछे।

कभी कभी आनन्द व ध्यान के क्षणों में आपने अनुभव किया होगा कि समय रुका हुआ सा है। आप कुछ नहीं कर रहे होते हैं तो समय रुका हुआ सा लगने लगा। अच्छा लेख, कविता, ब्लॉग व पुस्तक पढ़ना प्रारम्भ करते हैं समय रुका हुआ सा लगता है, पता नहीं चलता कि छोटी सुई कितने चक्कर मार चुकी है। न भूख, न प्यास, न चिन्ता, न ध्येय, न आदर्श, न परिवार, न संसार। आपके लिये सब रुका हुआ। अब इतनी बार समय रोक देंगे तो जीवन को सुस्ताने का लाभ मिल जायेगा। प्रेम में पुँजे युगलों से पूछता हूँ कि क्या भाई ! मोबाइल पर 3 घंटे बतिया कर कान व गला नहीं पिराया? अरे, पता ही नहीं चला। सम्मोहन किसमें है? मोबाइल में है, प्रेमी में है, आप में है या होने वाली बात में है। विवाहित मित्र उचक के उत्तर देंगे, किसी में नहीं। वह समय कुछ और था, रुका हुआ लगता था अब तो लगता है बलात् कढ़ील के लिये जा रहा है।

सम्मोहन तो जीवन का ही है, समय का नहीं। जीवन जीने लगते हैं और समय नेपथ्य में चला जाता है। आकर्षण व्यक्तित्व का होता है, आयु का नहीं। महान कोई एक विचार बना देता है, बेचारी व्यस्तता नहीं।

मैं कल्पना करता हूँ कि मैं बैठा हूँ समय से परे, अपने अस्तित्व के एकान्त में। दरवाजे पर आहट होती है, आँखें उठाता हूँ। भंगिमा प्रश्नवाचक हो उसके पहले ही आगन्तुक बोल उठता है। मैं समय हूँ, आपके साथ रहना चाहता हूँ, आपकी गति से चलना चाहता हूँ, मुझे स्वीकार करें। पुनः माँग हुयी और पूर्ति भी, बस दिशा बदल गयी। जीवन समय से अधिक महत्वपूर्ण हो गया।

काल की अग्नि में सबको तिरोहित होना है। मैं दौड़ लगा कर आत्मदाह नहीं करूँगा। अपना जीवन अपनी गति से जीकर आगन्तुक से कहूँगा।

" आओ, मैं स्वागत में बैठा हूँ "