28.11.12

शिक्षा - एक वार्तालाप

यह तब प्रारम्भ हुआ जब दशहरा के तुरन्त बाद बच्चों को अपने गृहकार्य की याद आयी। बच्चे घबराये से कार्य करने बैठ गये। पिछली रात के आनन्दमयी उन्माद में डूबे बच्चों को सहसा इतने मनोयोग से काम करते देखना बड़ा रोचक लग रहा था। फोटो खींच कर उसे फ़ेसबुक में डाल दिया। जो प्रतिक्रियायें आयीं, उसमें सबसे आलोचनात्मक और हृदयस्पर्शी आलोक की थी। वार्तालाप शिक्षा के प्रति समाज के दृष्टिकोण का एक संक्षिप्त रूप है, हिन्दी में अनुवाद भाव संरक्षित रखते हुये किया गया है।(आलोक चित्रकार हैं, मोहित बड़ी कम्पनी में कार्यरत हैं, दीप्ति सियोल में शिक्षण में हैं और प्रवीण रेलवे की सरकारी नौकरी में)

आलोक - मुझे छुट्टी के समय पर बच्चों को गृहकार्य से लादने की बात समझ ही नहीं आती है। क्या विद्यालयों और शिक्षकों को ज्ञात भी है कि छुट्टियों का अर्थ और महत्व क्या होता है? यदि बच्चे छुट्टियों में इस तरह जूझते रहेंगे, तो वे कभी कार्य को उस अवस्था से अलग करके नहीं देख पायेंगे जिसमें वे इस तनाव वाली पढ़ाई से उन्मुक्त होकर प्रकृति देखें, मित्रों और सम्बन्धियों से मिलें और उन सब चीजों को जाने जो इतना गृहकार्य देने वाले विद्यालयों में नहीं पढ़ायी जाती हैं। यह चित्र मुझे बहुत पीड़ा दे रहा है, पुस्तक पर रखा पेपरवेट मानो उनकी उन्मुक्तता पर रखा एक बड़ा सा भार है। यह सब होते हुये भी वे सबकी अपेक्षाओं के प्रति समर्पित हैं।

प्रवीण - मैं पूरी तरह से समहत हूँ, क्या बच्चों को इस तरह तनाव में रखने की आवश्यकता थी? कल रात तक ये धमाचौकड़ी मचा रहे थे। इन्होंने कल रावण बनाया, उसे रंगा, उसमें पटाखे भरे और यह सब मोहल्ले के सब बच्चों के साथ किया। आज सुबह से ये बिल्कुल बदले दिख रहे हैं, इनकी छुट्टियाँ समाप्त होने से पहले ही समाप्त हो गयी हैं।

आलोक - प्रवीण, यह सच में दुख की बात है और मुझे क्रोधित भी करती है। कुछ दिन पहले एक डॉकूमेन्ट्ररी बनाने वाले युगल ने मुझसे पूछा था कि मेरे अनुसार क्रूरतम हिंसा क्या है? "एक बच्चे की बात न सुनना, उसके कुछ बोलने का आदर न करना, यही हिंसा का क्रूरतम स्वरूप है।" मैंने कहा। तब उन्होने मुझसे शिक्षातन्त्र के बारे में पूछा। मेरा उत्तर इस प्रकार था "मुझे यह सोचकर आश्चर्य होता है कि क्या होगा यदि सारे विद्यालय एक वर्ष के लिये बन्द कर दिये जायें। यदि विश्व तब भी यदि चलता रहता है तो हमें विद्यालयों की आवश्यकता ही नहीं है। तब अधिक उन्मुक्त और बुद्धिमान होंगे। बस अभी और आज ही बन्द कर देते हैं सारे विद्यालय, स्थिति भयावह है।"

प्रवीण - सच है, इस शिक्षातन्त्र को नहीं ज्ञात है कि वे कितने स्टीव जाब्स, बिल गेट्स, रामानुजम और आइन्स्टीन का गला बचपन में ही घोंट दे रहे हैं।

दीप्ति - यह चर्चा बहुत अच्छी है पर मैं तनिक अलग सोचती हूँ। कल्पना करें कि यदि आप दोनों ने पढ़ाई नहीं की होती तो आज क्या कर रहे होते? मुझे तो कुछ भी सम्मानजनक व्यवसाय नहीं दिखता है, सिवाय व्यापार के। और व्यापार में भी यदि आप अम्बानी नहीं हैं तो आपको कोई नहीं पूछता है। निश्चय ही हमारे समय में परवरिश के आयाम बदल रहे हैं पर मुझे फिर भी संशय है कि ऐसी परिस्थितियों में भी हम अपने माता पिता से भिन्न कोई निर्णय लेते।

प्रवीण - दीप्ति, यह एक वृहद विषय है और आलोक के कथन को एक बड़े परिप्रेक्ष्य में लेना होगा। बच्चों के लिये सीखना किसी ने मना नहीं किया, श्रेष्ठता प्राप्त करना भी मना नहीं है। सर्वाधिक चिन्ता का विषय है वह पद्धति जिसके माध्यम से शिक्षा दी जाती है। यह प्राकृतिक विकास और सीखना बाधित करती है।

मोहित - मेरा अनुभव दोनों तरह का रहा है, पश्चिमी भी और भारतीय भी। कक्षा ५ तक कान्वेन्ट में पढ़ा हूँ। जिस कक्षा में पढ़ते थे, एक सप्ताह में वहाँ उतने ही घंटों का गृहकार्य दिया जाता था। जैसे कक्षा ४ में केवल ४ घंटा। सप्ताह में ५ दिन पढ़ाई, अर्थात दिन में ४८ मिनट। सप्ताहान्त में कोई गृहकार्य नहीं। ६ से १२ तक स्थानीय विद्यालय में पढ़ा, अंक और स्थान आ जाने से प्रतियोगिता बढ़ गयी, अधिक पढ़ना पड़ा। अब लग रहा है कि प्रतियोगिता प्राइमरी में भी पहुँच गयी है, जिसने बच्चों के ऊपर बोझ बढ़ा दिया है। फिर भी विश्व फलक पर विश्वास से कह सकता हूँ कि हमारे विद्यार्थी कहीं अच्छे हैं।

आलोक - मोहित, तुम्हारे अवलोकनों से मैं पूर्णतया सहमत हूँ। हमें संतुलन बनाना होता है। हम इतनी तेजी से बदल रहे हैं, हमारे बच्चे न जाने कितने स्रोतों से जान रहे हैं, हमसे अच्छा जान रहे हैं। तो क्या हम उस अनुसार पढ़ाने की अपनी पद्धतियाँ बदल रहे हैं या तीन दशक पुराना पाठ्यक्रम पढ़ाकर उसमें ही जूझने को कहते रहते हैं। मुझे पढ़ाने का जितना भी अनुभव मिला, मैनें अभिभावकों से पूछा कि वे किसका स्वप्न जी रहे हैं? बच्चों से भी यही प्रश्न पूछा, पर उत्तर में सदा ही निराशा हाथ लगी। विडम्बना ही है कि जो बच्चे अपना स्वप्न जीना चाहते हैं तो सब उन्हें विद्रोही और नालायक कहने लगते हैं। उससे भी बड़ी बिडम्बना पर यह है कि जब वही बच्चे अच्छा कर स्वयं को स्थापित करते हैं तो सारा श्रेय वही माता पिता ले लेते हैं। यही हमारे जीवनचरित्र को उजागर करता है। बदलाव के साथ बदलते रहना सबको आता भी नहीं है। हो सकता है कि मैं कुछ अधिक कह गया हूँ, पर यह भावावेश व्यक्त करना आवश्यक था।

प्रवीण - हमारे शिक्षातन्त्र में बहुत कुछ करने की आवश्यकता है। मोहित को दोनों पद्धतियों का श्रेष्ठ मिला है, मैं कई उदाहरण जानता हूँ जिनको दोनों पद्धतियों के दोष ही मिले। शिक्षा एक हवाई जहाज की उड़ान जैसी हो, पर्याप्त ईंधन भी रहे ऊँचाई पर जाने के लिये और कोई अतिरिक्त भार भी न रहे ढोने के लिये, उन्मुक्त उड़ाने हों।

यहाँ वार्तालाप भले ही विश्राम पा गया हो पर विचार आयाम में आ गये, प्रवाह बहने लगा। स्वाभाविक भी है, कई प्रवाह मिलेंगे तो कुछ सार्थक धार आयेगी, नदी बनेगी, आने वाली पीढ़ियों रूपी खेतों को लहलहायेगी।

24.11.12

शिक्षा - रिक्त आकाश

आलोक का कहना है कि यदि एक वर्ष के लिये शिक्षा व्यवस्था को विराम दे दिया जाये, सारे विद्यालय बन्द कर दिये जायें तो विश्व के स्वास्थ्य पर कोई अन्तर पड़ने वाला नहीं है, यह भी संभव है कि कुछ उत्साहपूर्ण निष्कर्ष सामने आ जायें। आलोक चित्रकार हैं और सृजन और मुक्ति के मार्ग के उपासक हैं, उनके लिये बच्चों पर कुछ भी थोपना उनके सम्मान और अधिकार पर कैंची चलाने जैसा है। एक सीमा तक मैं भी उनसे सहमत हूँ, अर्थतन्त्र से प्रभावित शिक्षातन्त्र की बाध्यतायें हमारी राह सीमित कर देती हैं, लगता है कि हम हाँके जा रहे हैं, हम उस राह जाना चाहें, न चाहें। यदि किसी बच्चे को अपनी प्रतिभानुसार व्यवसाय या कार्य चुनने और उसके माध्यम से सम्मानित जीवन जीने के अवसर ही न हों तो कहानी वहीं समाप्त हो जाती है। इस अवस्था को परिभाषित करने के लिये बाजार प्रभावित जीवकों को कोई सम्मानपूर्ण शब्द भले ही मिल जाये, पर ठेठ भाषा में उसे हाँकना ही कहा जायेगा।

शिक्षा पद्धति पर आलोक के चरम विचारों का कारण वर्तमान शिक्षा में विद्यमान वे तत्व हैं जो सृजनात्मकता को कुंठित करते हैं और बच्चों को अर्थव्यवस्था में प्रयुक्त ईंधन के रूप में झोंक देने के लिये तत्पर बैठे हैं। निश्चय ही यह व्याप्त निराशा का बड़ा कारण है, पर मेरे लिये और भी कारण हैं जिन पर विशेषकर हमारे देश को ध्यान देने की महत आवश्यकता है। चलिये शिक्षा के तीनों उद्देश्यों की दशा देख लें अपने देश में।

पहले उद्देश्य को ही लें, प्रकृति के रहस्यों को समझना और नये तन्त्रों का सृजन। भारतीयों की गिनती विश्व के सर्वश्रेष्ठ मस्तिष्कों में होती है, अनुसंधान और शोध का एक सुदृढ़ तन्त्र भर स्थापित करना था, प्रतिभा पलायन रुक जाता। जहाँ पर प्रतिभाओं को समुचित सामाजिक और आर्थिक सम्मान नहीं मिलता है, उन्हें रोकना कठिन हो जाता है। यद्यपि कई क्षेत्रों में हमें लाभ मिल रहा है पर तकनीक के वे अग्रतम क्षेत्र जो अर्थतन्त्र को प्रभावित कर रहे हैं, वहाँ हम एक देश के रूप में शून्य हैं। हमने प्रतिभायें तो दे दीं, उनके योग्य वातावरण न बना पाये देश में।

दूसरे उद्देश्य को देखें, स्थापित तन्त्रों को साधना। स्थापित तन्त्रों की बात करें तो स्थिति और भी भयावह है। विकास के आधारभूत अवयव हम तैयार ही नहीं कर पाये, जो तन्त्र हमें साधने थे, उन्हें कैसे क्रियान्वित किया जाये, यह जानने के लिये हम प्रथम अवसर पाते ही विदेशयात्रा कर आते हैं, उनके प्रयोगों की अधकचरी नकल उतारने के लिये। सड़क, बिजली, संचार, न जाने कितने ही क्षेत्र हैं जो, न तो देश के हर भाग में स्थापित कर पाये हैं और न ही समग्र रूप से स्थापित करने की योजना ही है। विकास के मानक बस कुछ गिने चुने नगरों में स्थापित कर हम विजयोत्सव मनाने बैठ गये। शिक्षित जन और शिक्षा की दिशा, उजाड़ हुये शेष देश को क्यों नहीं सुखद स्वरूप दे पा रहे हैं?

तीसरा उद्देश्य है स्वयं को समझना और समाज में सहजीवन और आनन्द को प्रेरित करना। पहले जब शिक्षित लोग कहीं पहुँचते थे तो लगता था कि अब व्यवस्था भी आ जायेगी, बातें समझदारी की होंगी और समस्या को कोई न कोई समाधान मिल जायेगा। पढ़े लिखे का तात्पर्य होता था कि जो सबको साथ लेकर चले, जो सबके अन्दर स्थापित अन्तरों को स्वीकार कर उनमें अन्तर्निहित की समानता को साथ ला सके। जो भी कारण रहा हो, जो भी बाध्यतायें रही हों, शिक्षित का वह स्वरूप नहीं दिखता है। शिक्षित वर्तमान में उस आर्थिक आत्मनिर्भरता का पर्याय बन गया है जिसे समाज में किसी से कोई संवाद स्थापित करने का मन नहीं है, थोड़े ठेठ शब्दों में कहा जाये तो स्वार्थपरक भविष्य का एक माध्यम बन गयी है शिक्षा। यदि यह प्रभाव पड़ रहा है शिक्षा का समाज पर तो शिक्षा निश्चय ही अपनी राह से भटकी है।

अध्यात्म की अपेक्षा करना, कुछ अधिक ही हो जायेगा शिक्षातन्त्र के लिये। निरपेक्ष घोषित हो चुके देश में सांस्कृतिक शिक्षा भी भिन्न भिन्न रंगों में रंगी हैं और पाठ्यक्रम का अंग नहीं है। फिर भी एक ऐसी शिक्षा की आशा करना जिससे समाज सधे और व्यक्ति प्रसन्न रहना सीखे, एक शिक्षातन्त्र के लिये प्रारम्भिक पग है। जब वह भी न मिले और समाज विघटन की ओर अग्रसर हो तो शिक्षातन्त्र पर प्रश्न उठना स्वाभाविक ही है।

मैं यह नहीं कहता कि समाज के सब दोषों के लिये शिक्षातन्त्र ही दोषी है, बहुत कारक हैं, समाज की गतिमयता में आये विकार का ठीकरा शिक्षा पर ही नहीं फोड़ा जा सकता है। जो भी कारण हो, जितने भी कारण हों, सबको शिक्षा के माध्यम से सुधारा अवश्य जा सकता है। इसलिये वर्तमान में यदि स्तर गिरता जा रहा है तो इसका तात्पर्य यह अवश्य है कि कम से कम शिक्षा से सुधार के स्वर नहीं उठ रहे हैं। यह एक निर्विवाद तथ्य है कि कोई भी तन्त्र यदि अपने आप पर छोड़ दिया जाये तो उसमें विकार आने लगते हैं, यही मनुष्यों में भी लागू होती है, यह बस ज्ञान का अंश है जो उसे साधे रहता है। ज्ञान ही वह एकल सूत्र है जो तन्त्रों का क्षय रोकता है।

समाज में भी आत्मसंशोधन के गुण होते हैं, जब कोई विकार समाज में प्रवेश पाता है, कहीं दूसरी और एक संशोधनात्मक प्रक्रिया प्रारम्भ हो जाती है जो अन्ततः उस विकार को ठीक करती है। कभी कभी समाज का सम्मिलित ज्ञान उस विकार को समझ लेता है, कभी उसे स्पष्ट रूप से समझाने के लिये किसी समाज सुधारक या महापुरुष को जन्म लेना पड़ता है। शिक्षित समाजों में यह संशोधन स्वतः होता रहता है। समाज को साधने और पुनः उसे निर्मल रुप में लाने के लिये शिक्षा सदा ही एक आधारभूत उपहार रहा है मानवता के लिये।

कहीं कुछ गहरा रिक्त स्थान है जो भरा जाना शेष है, समझा जाना शेष है। आलोक का प्रस्ताव मुझे मेरे उस डॉक्टर की याद दिलाता है, जिन्होने एक एलर्जी का कारण पता लगाने के लिये न जाने कितने प्रकार के खाने पर रोक लगा दी थी। मेरे प्रकरण में एलर्जी पता चल गयी थी, निदान भी हो गया था। शिक्षा में क्या यह संभव है?

21.11.12

शिक्षा - अर्थ व समाज

औपचारिक व अनौपचारिक शिक्षा का स्वरूप तथा शिक्षा के उद्देश्यों की समझ ही पर्याप्त न होगी यदि हम उसे आधुनिक अर्थतन्त्र और समाज की गतिमयता से न जोड़ें। जो भी संपर्कसूत्र हैं और जिन सिद्धांतों पर शिक्षा, अर्थ और समाज संवाद स्थापित किये हुये हैं, उन पर गहनता से विचार की आवश्यकता है। यदि इन बिन्दुओं का समुचित विश्लेषण किया जा सके तो उन परस्पर प्रभावों को उभारा जा सकता है जो वांछित हैं और उन पर नियन्त्रण गाँठा जा सकता है जो सबके लिये हानिप्रद हैं। विश्लेषण हेतु विषय केवल औपचारिक शिक्षा तक ही सीमित रखा जायेगा।

शिक्षा के तीन उद्देश्य मात्र बौद्धिक कल्पनाशीलता में नहीं जी सकते हैं। उन्हें भौतिक धरातल में लाने के लिये एक तन्त्र स्थापित करना होता है, साधन आवश्यक हैं, समाज को प्रतिभागिता भी आवश्यक है, जिनको लाभ मिल रहा है और जो लाभ पहुँचा रहे हैं, दोनों के लिये। शिक्षा से समाज की अपनी अपेक्षायें हैं, विद्यार्थियों के अपने सपने हैं, शिक्षातन्त्र कहाँ तक इन दोनों को साथ साथ निभा पा रहा है, अर्थतन्त्र का स्वरूप किस तरह इस पूरी रचना को अस्थिर कर रहा है, ये सब बड़े ही रोचक बिन्दु हैं, इन सबको पृथकता से और भलीभाँति समझ कर ही शिक्षा पर कुछ साधिकार कहा जा सकता है।

भले ही विश्व के समस्त तन्त्रों को रचने और चलाने में शिक्षा का सहयोग रहता है, पर शिक्षा के लिये स्थापित तन्त्र में भी तीन प्रमुख विमायें हैं। शिक्षार्थी, शिक्षक और शिक्षा-सामग्री। शिक्षक के लिये शिक्षण एक व्यवसाय है, उसे अपना घर चलाना है, साथ ही साथ उनके ऊपर बच्चों के भविष्य का महत उत्तरदायित्व है। यदि गुणवत्ता न साधी जायेगी तो पूरी की पूरी पीढी हाथ से निकल जाने का भय है। गुणवत्ता साधने के लिये योग्य और कुशल शिक्षकों को लाना होगा, एक विषय जो सीधे सीधे समाज के आर्थिक पक्ष से जुड़ा है।

बच्चे के लिये भविष्य में धन कमाने के अतिरिक्त स्वयं को स्थापित करने की चाह अधिक महत्वपूर्ण है, उसके स्वप्न और अभिरुचि के अनुसार चल सकने की चाह, समाज को सार्थक योगदान दे सकने की चाह। शिक्षा सामग्री जहाँ एक ओर समाज की दिशा निर्धारित करती है वहीं दूसरी ओर शेष विश्व तन्त्रों को भी पोषित करने में सहायक है।

अब अर्थतन्त्र के दृष्टिकोण से देखा जाये तो पूरा विश्व माँग और आपूर्ति के चक्र पर चलता है। जिसकी माँग अधिक उसका मूल्य अधिक, जिसका मूल्य अधिक उस ओर सबका झुकाव अधिक, अधिक झुकाव अधिक आपूर्ति लाता है, अधिक आपूर्ति मूल्य कम कर देती है, तब झुकाव भी कम हो जाता है, तब आपूर्ति कम हो जाती है और माँग बढ़ जाती है। यही चक्र चलता रहता है, अर्थतन्त्र घूमता रहता है। किसी भी व्यवसाय के दो पक्ष शिक्षा से पोषित होते हैं, एक है तकनीक, दूसरे हैं प्रशिक्षित कर्मचारी। जिसकी माँग अधिक होती है, उससे सम्बन्धित तकनीक में अनुसंधान और उसमें शिक्षित युवा, दोनों ही उफान पर पहुँच जाते हैं। उस क्षेत्र में अधिक अवसर और धन, और उसके प्रति समाज का रुझान।जिन क्षेत्रों से माँग नहीं आती है पर संभावनाओं से भरे हुये है, उन क्षेत्रों का कोई नामलेवा भी नहीं है।

शिक्षक क्या गुणवत्ता दे पा रहे हैं, बच्चों की क्या आकाक्षायें हैं, समाज क्या चाहता है और अर्थतन्त्र के वाहक हमें कहाँ लिये जा रहे हैं, इन चारों पाटों में हमारी शिक्षा व्यवस्था पिसी हुयी है। इन चारों की खिचड़ी हमारी शिक्षा सामग्री में दिखायी पड़ती है, कम या अधिक। जब भी बाजार की अर्थव्यवस्था अपना आधिपत्य जमाने लगती है, शिक्षाव्यवस्था धन उत्पन्न करने वाली मशीन का बड़ा अंग बन कर रह जाती है, उसमें पिसते शिक्षार्थी और हताश होते अभिभावक भी उसकी धुरी में घूमने लगते हैं। जब वह क्षेत्र सहसा झटक जाता है, जब उसमें अवसर सिकुड़ जाते है, संसाधन अतिरिक्त हो जाते हैं, तब सब के सब नैराश्य में डुबकी लगाने लगते हैं।

शिक्षातन्त्र की अर्थतन्त्र पर इतनी निर्भरता उचित नहीं है। इसके तीन पक्ष बहुत ही घातक हैं। पहला तो अर्थतन्त्र केवल तकनीकी शिक्षा को सहारा देगा क्योंकि तकनीक अर्थतन्त्र को सहारा देती है। थोड़ी बहुत दिशा प्रबन्धन व वित्तीय शिक्षा को भी मिल जायेगी, पर ये तो उच्च शिक्षा के क्षेत्र हैं, प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा को कौन सहारा देगा तब? दूसरा घातक पक्ष यह होगा कि जब धन लगेगा तो वह फीस के रुप में वसूला भी जायेगा, सक्षम शिक्षा प्राप्त कर लेंगे और निर्धन अक्षम अशिक्षित रह जायेंगे। धन केवल धन को पोषित करेगा, जन को नहीं। तीसरा घातक पक्ष होगा, उन विषयों को लुप्त होना जिनमें किसी भी व्यवसाय में लाभ देने की क्षमता नहीं है, इतिहास, साहित्य आदि जैसे कितने ही विषय अपना अस्तित्व खो बैठेंगे तब।

शिक्षातन्त्र की अर्थतन्त्र पर निर्भरता शून्य भी नहीं की जा सकती है, यदि यह हुआ तो सब कल्पनाशीलता में खो जायेंगे, कर्मशीलता अपवाद हो जायेगी समाज में तब। सम्पर्कसूत्र बनाये रखना आवश्यक है जिससे शिक्षा न केवल अपने उद्देश्यों में सफल होती रहे, वरन शिक्षकों और शिक्षार्थियों के पास पर्याप्त आर्थिक कारण रहें किसी विषय को चुनने के लिये। बाजार आधारित अर्थव्यवस्था का कुप्रभाव कम हो जाता है जब अर्थव्यवस्था का विस्तार बढ़ता है। तब एक क्षेत्र में आयी उठापटक अर्थव्यवस्था, समाज और शिक्षा को अधिक प्रभावित नहीं करती है। शिक्षा का कोई क्षेत्र, कोई भी अभिरुचि ऐसी न रह जाये जिसमें जीवन यापन की संभावना कम हो।

एक बात तो तय है कि सब कुछ बाजार की अर्थव्यवस्था के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता है। शिक्षाव्यवस्था के त्यक्त पक्षों में शक्ति लाने का कार्य सरकार का है। सुदृढ़ और सार्वभौमिक आधारभूत शैक्षणिक सुविधायें, सबको शिक्षा, निशुल्क शिक्षा, योग्य और कर्मठ शिक्षकों का चयन, शिक्षकों को यथानुरूप अच्छा वेतन, अर्थव्यवस्था का शिक्षा के अन्य अंगों में विस्तार, ये सब कार्य ऐसे हैं जो शिक्षा को सशक्त करने में सक्षम हैं। ऊर्जा व्यर्थ न हो, व्यक्ति समर्थ हों, यही तो अर्थ है अच्छे शिक्षातन्त्र का। क्या छूट गया तब और कौन सा आकाश रिक्त रह गया, यह मननीय बिन्दु अगली पोस्ट में।

17.11.12

शिक्षा - क्या और क्यों ?

शिक्षा का नाम सुनते ही उससे संबद्ध न जाने कितने आकार आँखों के सामने घुमड़ने लगते हैं। कुछ को तो लगता होगा कि बिना शिक्षा सब निरर्थक है, कुछ को लगता होगा कि बिना लिखे पढ़े भी जीवन जिया जा सकता है। एक व्यक्ति बिना शिक्षा के भी समाज में बहुत सहज और उपयोगी बनकर रह लेता है, वहीं दूसरी ओर एक शिक्षित व्यक्ति भी अपने कृत्यों से सामाजिक चरित्र को नकारता सा लगता है। एक अजब सा द्वन्द्व है, प्रकृति का मौलिक गुण है यह द्वन्द्व, शिक्षा में भी दिखायी पड़ेगा। जब भी द्वन्द्व गहराता है, उत्तर या तो मूल में मिलता है या निष्कर्षों में। निष्कर्ष भविष्य की विषयवस्तु है और बहुधा ज्ञात नहीं होती है, पर मूल खोजा जा सकता है, मूल से विश्लेषण किया जा सकता है।

हमें प्राप्त ज्ञान के दो स्रोत हैं, पहला अनौपचारिक शिक्षा, दूसरा औपचारिक शिक्षा। अनौपचारिक शिक्षा हमें घर, समाज, मित्रों आदि से मिलती है और इसके लिये विद्यालय जाने की आवश्यकता नहीं है। दादी, नानी की कहानियों में, बड़ों के संवाद में, संस्कृति के अनुकरण में, त्योहारों में, संस्कारों में, मित्रों के साथ, भ्रमण के समय, यात्राओं में, न जाने कितना कुछ सीखते हैं हम सब। हिसाब लगाने बैठे तो लगेगा कि जितना भी ज्ञान हमारे पास है, वह अनौपचारिक शिक्षा की ही देन है। जहाँ के सामाजिक ढाँचे में प्रश्न पूछने को मर्यादा का उल्लंघन नहीं माना जाता है, जहाँ ज्ञान के लिये उन्मुक्त परिवेश है, वहाँ पर सामान्य व्यक्ति के लिये अनौपचारिक ज्ञान का प्रतिशत ९० से भी अधिक होता है। कपड़े पहनना, बाल काढ़ना, फीते बाँधना, चाय बना लेना आदि न जाने कितने ऐसे कार्य हैं जो हम विद्यालय जाकर नहीं सीखते हैं, देखते हैं और सीखते हैं। भाषा का प्राथमिक ज्ञान अनौपचारिक ही होता है, बच्चा देखता रहता है, सीखता रहता है।

जनसंख्या का बड़ा वर्ग ऐसा है जो कि कभी विद्यालय गया ही नहीं। यही अनौपचारिक शिक्षा है जिसके बल पर वह अपना जीवन ससम्मान व्यतीत कर रहा है। हम उन्हें अशिक्षित मानते हैं, पर वे अपना भला बुरा हमसे बेहतर समझते हैं, कहीं बेहतर, निश्चय ही इसी अनौपचारिक शिक्षा का प्रताप है। आज भी गाँव जाना होता है तो वहाँ के बुजुर्ग जिन्होने अपने पूर्वजों से रामचरितमानस सुनी थी, इतना सटीक दोहा उद्धृत कर बैठते हैं जो परिस्थितियों पर शत प्रतिशत सही बैठता है। एक परम्परा है गीता और रामचरितमानस के पाठ की, अनौपचारिक शिक्षा के वाहक हैं ये ग्रन्थ, सदियों से ज्ञान का प्रकाशपुंज वहाँ भी फैलाये हुये हैं, जहाँ पर शिक्षातन्त्र पूर्णतया ध्वस्त है।

औपचारिक शिक्षा फिर भी आवश्यक है। आज जो संस्कृति में सहज प्राप्त है, वह कभी न कभी तो औपचारिक शिक्षा का एक भाग रहा होगा। अनौपचारिक शिक्षा श्रुति के आधार पर चलती है, उसे यदि औपचारिक शिक्षा का सहयोग नहीं मिलेगा तो कालान्तर में वह विकृत होने लगेगी। न जाने कितने ऐसे चिकित्सीय उपाय हैं जो कार्य तो करते हैं पर उनका कारण लुप्त सा हो गया है, औपचारिक शिक्षा के अभाव में।

यदि सुचारु रूप से किसी भी विषय का अध्ययन नहीं किया जायेगा तो उसमें सन्निहित रहस्य खोजे जाने से रहे। विकास का प्रथम चरण है, रहस्यों को समझना। तत्पश्चात उसे ज्ञान के रूप में सहेज कर रखना औपचारिक शिक्षा का कार्य है। क्रमिक विकास के लिये अवलोकनों और निष्कर्षों को लिपिबद्ध करना आवश्यक है, इससे पढने में भी सरलता होती है और उस पर और कार्य करने में भी। किसी भी विषय का विधिवत ज्ञान देने के लिये विद्यालय आवश्यक हैं। कहने को तो मात्र १० प्रतिशत ही ज्ञान शेष रहता है पर इसमें विकास और भविष्य के वो तार जुड़े होते हैं जिन्हें नकारना भविष्य को नकारने जैसा है। औपचारिक शिक्षा भले ही मात्रा में अधिक न हो पर जीवन की गुणवत्ता साधने के लिये अनमोल है। सिद्धान्त समझ में आते ही घटनाओं का समझना और समझाना सरल हो जाता है, कारण और प्रभाव स्पष्ट से दिखने लगते हैं तब।

किसी भी समाज में औपचारिक और अनौपचारिक शिक्षा अलग राह नहीं चलती हैं। औपचारिक शिक्षा में शिक्षित परिवार के बच्चे कितनी ही चीजें अनौपचारिक रूप से सीख जाते हैं, पता ही नहीं चलता है, हर पीढ़ी ज्ञान का सामान्य स्तर बढ़ता रहता है। जिन परिवारों में कोई एक व्यवसाय कई पीढ़ियों से किया जा रहा है, उससे संबद्ध ज्ञान परिवार में इतनी प्रचुर मात्रा में आ जाता है कि उनके सामने औपचारिक शिक्षा में शिक्षित संस्थान भी कान्तिहीन रहते हैं। व्यापारी का पुत्र व्यापारी, राजनेता का पुत्र राजनेता, किसान का पुत्र किसान, यदि कोई अपना पैतृक व्यवसाय अपनाना चाहे तो उसे न जाने कितना ज्ञान अनौपचारिक रूप से मिल जाता है। पढ़ा लिखा समाज बनाने के लिये सदियों का सतत श्रम लगता है।

इस परिप्रेक्ष्य में शिक्षा के उद्देश्यों को शिक्षा के स्वरूप से जोड़कर सही तालमेल बिठा लेना ही अच्छे शिक्षातन्त्र का कार्य है। पद्धतियाँ भिन्न दिशाओं में न भागें, कुछ वर्षों में व्यर्थ न हो जायें, कुछ ऐसा न करें जिसकी आवश्यकता ही न हो और कुछ महत्वपूर्ण छूट भी न जाये। तो एक अच्छे शिक्षातन्त्र का सही आकलन करने के लिये, उन उद्देश्यों को भी समझना होगा, जिनके लिये शिक्षा आवश्यक है।

मुझे तो शिक्षा के बस तीन प्रमुख उद्देश्य समझ आते हैं। पहला तो प्रकृति के रहस्यों को समझना, उसके सिद्धान्तों का विश्लेषण करना और उस पर आधारित विज्ञान के माध्यम से जीवन को और अधिक सुख-सुविधायें प्रदान करना। इस वर्ग में शोध आदि प्रमुख हैं और सदा से होते भी आये हैं। विज्ञान के अविष्कार बहुधा चमत्कृत करने वाले होते हैं, हमारी कल्पनाशक्ति इस उद्देश्य के लिये राह निर्माण करती है, ऐसी राह जिसमें विश्व के प्रखरतम मस्तिष्क चलते हैं, ऐसी राह जो मानवता के लिये बहुत अधिक उपयोगी रही है, ऐसी राह जिससे लगभग सभी लोग लाभान्वित और प्रभावित होते हैं। पर इस राह में अग्रणी चलने वालों की संख्या बहुत कम होती है, लाखों में एक, ये लोग नये तन्त्र रचते हैं।

दूसरा उद्देश्य है विश्व के तन्त्र को साधे रहना। मानव को सहजीवन में बड़ा रस आया है, समाज का स्वरूप भिन्न भिन्न हो सकता है पर हर समाज में सहजीवन ही प्रधान है। प्रकृति ने भी यथासंभव सहयोग किया है, इस मानवीय प्रयास में। जीवन के लिये अन्न, जल आदि, उनका उत्पादन, रखरखाव व वितरण। वस्तुओं का व्यापार, नगरों का निर्माण, संचार के साधन, और जो कुछ भी आवश्यक है साथ रहने के लिये, सुख के साथ। तन्त्र को साधना सरल कार्य नहीं हैं, तकनीक और विशेष ज्ञान की आवश्यकता होती है इसमें, उसके लिये समुचित शिक्षा की। कालान्तर में नयी तकनीक और नये प्रयोगों से तन्त्र परिवर्धित और परिमार्जित होता है, जीवन चलता रहता है। इस वर्ग में कर्मठ व्यक्तित्वों की आवश्यकता होती है। इसमें ही सर्वाधिक लोग लगते हैं। संसाधनों और आय का वितरण किस प्रकार हो, किस व्यवसाय को कितनी प्राथमिकता मिले, यह बहस का विषय हो सकता है। इसमें शिक्षा का स्तर विशेष होता है और ये लोग तन्त्र साधते हैं।

तीसरा उद्देश्य है स्वयं को समझना। स्वयं को समझना सहजीवन के उन पहलुओं को समझने की प्रक्रिया है जो समाज के रूप में सबको जानना आवश्यक है। क्या हमें सुख देता है, क्या हमें दुख, कौन सा सुख शाश्वत है, कौन सा क्षणिक, ऐसे बहुत से प्रश्न हैं, जिसके लिये हमें स्वयं को जानना आवश्यक हो जाता है। आत्म का आकार समझने वाले तो यहाँ तक कहते हैं कि यदि स्वयं को जान लिया तो कुछ जानना शेष नहीं रहता है। साहित्य, संगीत, कला आदि ऐसे क्षेत्र हैं जो मानव को सुख देते हैं, इनका सृजन सुख देता है। इस वर्ग में सब लोग ही आते हैं, बिना इस शिक्षा के शान्ति और समृद्धि संभव नहीं है।

क्या अपेक्षित था, क्या हो रहा है? शिक्षा का स्वरूप और उद्देश्य क्या एक दूसरे को समझ पा रहे हैं? अर्थतन्त्र और शिक्षातन्त्र किस दिशा भाग रहे हैं, एक दूसरे साथ दे पा रहे हैं या नहीं, बहुत समझना शेष है, अगली पोस्ट में।

14.11.12

शिक्षा - आधारभूत निर्णय

भारतीय मानसिकता में शिक्षा सदा ही महत्व का विषय रही है। माता पिता अब भी अपने बच्चों की शिक्षा में किया हुआ निवेश सर्वोत्तम निवेश मानते हैं। कम इच्छाओं में जी लेंगे, भूखे सो लेंगे पर बच्चों को पढ़ायेगे। शिक्षा सर्वोपरि है और सबको लगता भी है कि योग्य होगा तो कुछ न कुछ बन ही जायेगा। निश्चय ही पढ़ाई में अच्छे निकलने वाले कुछ न कुछ बन ही जाते हैं, जो कुछ बन नहीं पाते हैं उनके लिये तो सारी शिक्षापद्धति श्रमसाध्य कार्य सी ही बीतती है।

कितना ही अच्छा होता कि जो भी किसी स्तर तक पढ़ पाता उसे उस स्तर के अनुरूप समुचित व्यवसाय मिल जाता। कितना अच्छा होता कि शिक्षा में पाये अंक आपकी भविष्य की रूपरेखा नियत कर देते। शिक्षा योग्यता का एक मानकीकरण कर देती। शिक्षा एक अलग कार्य है, प्रतियोगिता एक अलग कार्य हैं और धनार्जन और जीवन यापन एक और नितान्त अलग कार्य। इन सबमें उतनी ही सततता और समानता है जितनी किन्ही दो मनुष्यों में स्वभाववश हो सकती है।

जीवन एक मिलता है, उसे कई भागों में पृथक कर जीने में उसकी सततता और आनन्द बाधित होता है। एक भाग में अर्जित लाभ या हानि अगले भाग को जब बहुत अधिक प्रभावित नहीं करते हैं तो लगता है कि वर्तमान में अधिक श्रम क्यों करना, अगले भाग की तैयारी कर लें। वर्तमान को तज भविष्य को साध लेने की जुगत, जीवन बस इसी तैयारी में बीत जाता है। बचपन से ही प्रतियोगिता में आगे निकलने वाले घोड़े बनने तैयार होने लगते हैं, युवावस्था धनोपार्जन के लिये संघर्ष में निकल जाती है, प्रौढ़ावस्था बच्चों के लिये सुरक्षित भविष्य निर्माण करने में। अन्त आते आते बस एक प्रश्न ही मुख्य हो जाता है, क्या अच्छा जीवन जीने के लिये इतना सब पढ़ना, संघर्षों से इतना लड़ना और स्वयं को बैल सा इतने वर्षों तक रगड़ना आवश्यक था?

प्रश्न का उत्तर भिन्न हो सकता है, पर प्रश्न बिना पूछे ही जीवन निकल जाये, यह जीवन का अपमान है। न्यूनतम कितनी शिक्षा आवश्यक हैं, प्रतियोगिताओं में कितना संघर्ष उचित है, प्रतियोगिताओं के लिये किये ज्ञानार्जन का उपयोग जीवन यापन में और तन्त्र के लिये कितना हो रहा है, यह समझना भी आवश्यक है। जिन नौकरियों में कक्षा दस पास से भी अधिक की योग्यता आवश्यक न हो, उनके लिये नियत प्रतियोगिता परीक्षा में यदि परास्नातक कक्षाओं के प्रश्न योग्य प्रतिभागियों का निर्धारण करें तो यह शिक्षा व्यवस्था और प्रतियोगी परीक्षाओं पर बहुत बड़े प्रश्न उठाते हैं। साथ ही साथ हमको यह सोचने पर विवश करते हैं कि कोई भी शिक्षा और सामाजिक जीवन के संबंध और उपयोगिता को समझ भी पा रहा है?

जब मस्तिष्क पर अधिक जोर डालने की इच्छा नहीं होती है तो सब बाजार की अर्थव्यवस्था के मत्थे मढ़ दिया जाता है, जब निर्णयों में नियन्त्रण का साहस नहीं होता है तो बाजार के उत्पात को मौन रह स्वीकार कर लिया जाता है। समग्र दृष्टिकोण की अनुपस्थिति, जीवन के हर चरण को पृथकता से देखने की सुविधा, यही प्रश्न हैं जो मूल-शूल हैं। इनको बिना निकाले शिक्षा में कोई विकास संभव नहीं है। जीवन संघर्ष, अनुशासन और संकीर्ण कठिन राहों में चलने का पर्याय बन जायेगा, जीवन जीना क्या होता है, बस मृत्यु के कुछ दिन पहले ही समझ आ पायेगा।

शिक्षाविद इस प्रश्न को बड़े ही मर्यादित ढंग से उठाते हैं, मैं तनिक ठेठ शैली में पूछ लेता हूँ। जब घर से कहीं जाने के लिये निकलते हैं तो उसी के अनुसार मार्ग नियत करते हैं, ऐसा तो नहीं करते हैं कि किसी भी दिशा में निकल लें और आगे जाने के बाद जहाँ भी पहुँचे उसे अपना ध्येय-स्थान मानकर वहीं जीने लगें। हो सकता है कि पढ़ने में अटपटा लगे पर वर्तमान शिक्षा व्यवस्था कुछ यही स्वरूप ले चुकी है। सबको एक बड़े मैदान तक हाँक कर पहुँचा दिया जाता है, आगे लड़ लो, जो आगे निकल सके तो निकल ले, डार्विन को एक प्रयोगक्षेत्र बना कर दे दिया है, अपने न सिद्ध होने वाले सिद्धान्त सिद्ध करने के लिये।

यदि संघर्ष और शक्ति ही श्रेष्ठता के मानक होते तो अभी भी हम घोड़े की पीठ पर बैठ कर तलवारों से युद्धकर रहे होते। सहजीवन और विकास के प्रति हमारी स्वाभाविक ललक हमें डार्विन के सिद्धान्त की दूसरी दिशा में ले जाती है। प्रचुर संसाधन की मानसिकता और धरती में जीने वालों को डार्विन का सिद्धान्त एक मज़ाक़ सा लगता है। जब सबके लिये जीवन यापन का मूलभूत सिद्धान्त ले हम सहजीवन की दिशा उद्धत हुये हैं तो ऊर्जा और जीवन का इस तरह पृथक पृथक हो व्यर्थ हो जाना हमें किस तरह स्वीकार हो सकता है?

जीवन को एकल और समग्र रूप देने के बाद, उसमें शिक्षा, योग्यता, जीवन यापन के साधन और सुखमय जीवन, सब के एक पंक्ति में खड़े हो जाते हैं, एक दूसरे से पोषित और संबद्ध, जिसमें न एक दिन व्यर्थ हो, न एक कर्म। जिसमें यह ध्येय छिपा हो, कि जीवन को किस तरह श्रेष्ठता के मानकों पर खरा उतारना है। हमारा यही आधारभूत निर्णय हो कि जीवन का समग्र स्वरूप क्या हो, शेष सब स्वतः स्थापित हो जायेगा जीवन में। जीवन को और समाज को इस स्वरूप में समझने के बाद शिक्षा के स्पष्ट उद्देश्य क्या हों, वह अगली पोस्ट में।

10.11.12

शिक्षा - व्यर्थ संभावनायें

जिस समय सिविल सेवा परीक्षा की तैयारी कर रहे थे, एक आशंका सी रहती थी कि होगा कि नहीं, यदि होगा तो कितने वर्षों में। तैयारी करने वाले प्रतिभागियों में जिससे भी मिलते थे, एक उत्सुकता रहती थी, यह जानने की कि कौन कितने वर्षों से तैयारी कर रहा है? तैयारी का कुछ भाग दिल्ली में और कुछ इलाहाबाद में किया था, आपको यह तथ्य जानकर आश्चर्य होगा कि कुछ लोग १० वर्षों से तैयारी कर रहे थे। एक अजब सी आशावादिता व्याप्त थी वातावरण में कि आने वाला वर्ष सुखद निष्कर्ष लेकर आयेगा, पिछले वर्षों के श्रम में बस कुछ और जोड़ दें इस बार, थोड़ा भाग्य साथ दे दे इस बार, कुछ पढ़ा हुआ आ जाये इस बार।

एक नशे की गोली ही है कि ८-१० साल तक कुछ सूझता नहीं है। कई लोग इस तथ्य को शीघ्र समझ लेते हैं और कोई अन्य मार्ग ढूढ़ने लगते हैं, पर देश की शीर्षस्थ सेवाओं में पहुँचने का स्वप्न ऐसा है कि प्रतियोगी १० वर्ष स्वप्न में ही बिता डालते हैं। लाखों लोग परीक्षा देते हैं और उसमें से चार पाँच सौ ही लिये जाते हैं। जिनके चार प्रयास हो जाते हैं, वे प्रादेशिक सेवाओं की तैयारी में लग जाते हैं क्योंकि उसमें प्रयास अधिक मिलते हैं, उसके बाद कुछ और सीमित विकल्प, अन्त में सब तरह के ज्ञान में संतृप्त युवक अपनी प्रौढ़ता के प्रवेश होते होते कोई अध्यापन का कार्य कर लेते हैं और अपनी आर्थिक स्थिति गृहस्थी चलाने योग्य बना लेते हैं।

मेरा उद्देश्य न तो सिविल सेवाओं की महत्ता को दर्शाना है, न ही कोई करुण कथा सुना संवेदनायें विकसित करनी है और न ही लाखों युवाओं के व्यर्थ हुये वर्षों के बारे में कोई आँकड़े रखने है। सक्षम और मेधायुक्त युवाशक्ति का इस तरह व्यर्थ हो जाना करोड़ों करोड़ के घोटाले से कम नहीं और जिसका पूरा ठीकरा नौकरीपरक शिक्षा व्यवस्था पर ही फूटता है। किसी एक पर दोष नहीं मढ़ा जा सकता है और देखा जाये तो सब के सब दोषी। १० वर्षों के संघर्ष में लुप्त हुयी संभावनायें, इसकी तैयारी के प्रति उद्दात्त आकर्षण, अन्य क्षेत्रों में विकास न हो पाना, अपने उद्यम लगाने वालों की कमी और न जाने कितने ऐसे प्रश्न हैं जिनके उत्तर सबको ढूढ़ने हैं।

संघर्ष आवश्यक है, उतना जिससे क्षमतायें विकसित हों, उतना जिससे विकास हो, स्वस्थ प्रतियोगिता हो। संघर्ष इतना अधिक भी न हो जितना मुगलिया सल्तनत में था, पुत्रों में जो जीता वह राजा, जो हारा वह या तो कालकोठरी में या ईश्वर के पास। संघर्ष इतना कम भी न हो कि सब सुविधा बैठे बैठे ही मिल जाये, धनाड्य परिवारों की नकारा संततियों की तरह।

यह तो अच्छा हुआ कि सिविल सेवाओं के समकक्ष और कई क्षेत्र खुल गये, जैसे आईटी और प्रबन्धन, डॉक्टर और इन्जीनियर पहले से ही थे, जिन्हें देश में स्थिरता और मान नहीं मिला वे विदेश चले गये। अब संभवतः लोग दस वर्ष प्रतीक्षा नहीं करते होंगे, सिविल सेवाओं के लिये और यह भी संभव है कि बहुत लोग वैकल्पिक व्यवस्था करके ही सिविल सेवाओं की तैयारी करते होंगे। विकल्पों के विस्तार से व्यर्थ हुयी ऊर्जा निश्चय ही कम हुयी होगी पर अभी भी लाखों वर्ष जो हर वर्ष व्यर्थ होते हैं, उसका निदान नहीं हैं।

कहते हैं कि कोई प्रयास व्यर्थ नहीं जाता है, हर प्रयास में मनुष्य कुछ न कुछ सीखता ही है। सीखने के स्तर तक तो संघर्ष करके पढ़ना अच्छा है पर ८-१० वर्ष तक वही पाठ्यक्रम इस आस में पढ़ते रहना कि अगली बार भाग्य साथ देगा, समय को व्यर्थ करने से अधिक कुछ भी नहीं।

बिन्दु स्पष्ट है। एक ओर संभावनाओं का जल स्थिर है, अपने बहे जाने की राह देख रहा है, वहीं दूसरी ओर मैदानों में सूखा पड़ा है। कितने ही क्षेत्र ऐसे हैं जिनमें आवश्यकता है ऊर्जावान युवाओं की, जो आकर कुछ नया कर जायें, संभावनाओं का जल वहाँ पहुँचे तो वहाँ भी ऐश्वर्य लहलहा उठे। कितने ही क्षेत्र ऐसे हैं जहाँ गुणवत्ता शापित है, अन्य देश लाभान्वित हो रहे हैं, हमारे देश के बाजार पर अधिकार करते जा रहे हैं, वहाँ हमारी युवा ऊर्जा क्यों नहीं पहुँच पाती है। शिक्षा का ही क्षेत्र ले लीजिये जहाँ स्तरीय अध्यापकों की नितान्त आवश्यकता है, पर वहाँ पर भी इतना कम पैसा मिलता है कि व्यक्ति एक सम्मानित जीवन यापन के बारे में सोच ही नहीं सकता है। नवीन उद्यम, नवीन तकनीक, सब के सब क्षेत्र ऐसे हैं जिनमें हम अपने पैर पसार ही नहीं पा रहे हैं, ललचाये से शेष विश्व की ओर निहारने में लगे रहते हैं।

दूसरी ओर संभावनाओं को जल बस उन्हीं क्षेत्रों में बहना चाहता है जो पहले से ही सिंचित हैं। असिंचित क्षेत्रों में जाने से जल का अस्तित्व मिट जाने का भय होता है। भले ही कितना ही जल अपनी लम्बी यात्रा के पश्चात खारे सागर में जाकर समा जाये पर उसका उपयोग हम शेष धरा को सिंचित करने में नहीं कर पाते हैं।

दोष किस पर मढ़ें, अभिभावकों को भी दोष नहीं दे सकते, जो मार्ग कभी बने ही नहीं उन पर वे अपने बच्चों को चलने के लिये कैसे कह दें? कुछ तो हो आश्वस्त होने के लिये। शिक्षा पद्धति भी क्या करे, उसका ध्यान ज्ञान से अधिक इस बात पर लगा रहता है कि प्रतियोगी परीक्षाओं के योग्य बच्चे कैसे बने? रट रटकर प्रतियोगी परीक्षाओं में उगल देने वाले युवाओं से भी क्या आशा करें कि वे नव-उद्यम का मोल समझें, उस नव-उद्यम का जिसके बारे में उन्हें कभी तैयार ही नहीं किया गया है।

एक ओर सारे जगत की चमक है और शेष जगत अँधियारा। क्या कोई उपाय है जिसमें कुछ भी प्रयास व्यर्थ न जायें, प्राप्त शिक्षा व्यर्थ न जाये, झूठी आशा में निकल गये इतने वर्ष व्यर्थ न जायें? क्या आधारभूत ढांचा निर्माण हो जिसमें देश की युवा ऊर्जा सहज बहे और समुचित बहे, सारे असिंचित क्षेत्र सिंचित हों। व्यर्थ संभावनायें, बाढ़ के जल के समान अस्थिरता ला सकती हैं और यह मूल्य उन प्रयासों में लगे मूल्य से कहीं अधिक होगा जो जो इन व्यर्थ हो रही संभावनाओं को एक स्थायी दिशा देने में लगेगा।

7.11.12

बंगलोर, मेट्रो और साइकिल

अभी कुछ दिन पहले एक समाचार पढ़ा कि बंगलोर मेट्रो अपने प्रमुख स्टेशनों पर साइकिलें रखेगी। इन साइकिलों का उपयोग मेट्रो में यात्रा करने वाले लोग अपने स्थान से मेट्रो स्टेशन आने जाने में कर सकेंगे। इनका रख रखाव व उपयोग पूरी तरह से इलेक्ट्रॉनिक माध्यम पर आधारित होगा। यह सेवा सशुल्क होगी और उपयोगकर्ता प्रति घंटे से लेकर वार्षिक मूल्य तक एक बार में चुका सकते है। यह सेवा मेट्रो के लिये लाभदायक होगी, बंगलोर नगर के लिये लाभदायक होगी और यदि सब कुछ ठीक चलता रहता तो यह सेवा बंगलोर की सड़कों से बड़े वाहनों और यातायात के अवरोध को कम कर देगी। इस सेवा को लागू करने के ठेके दिये जा चुके हैं और इससे होने वाली आय में मेट्रो का भी भाग होगा।

पढ़कर बहुत अच्छा लगा। जो कार्य विकसित देशों के बड़े नगरों में हुआ हो और सकुशल चल रहा हो, वह यदि बंगलोर में भी चलने लगे तो प्रसन्नता स्वाभाविक ही है। न केवल चलने लगे, वरन अपने उद्देश्यों को पा भी ले, पर्यावरण की मार्मिक स्थिति को सुधार दे, धुँयें से भरी सड़कों पर शीतल स्वच्छ बयार बहा दे और यातायात अवरोध में घंटों व्यर्थ हुये समय को यथासंभव कम कर दे। मुझे इस प्रयास में जितनी अधिक रुचि है, इसकी सफलता में उतना ही अधिक संशय। मैं इसलिये प्रश्न नहीं खड़े करने जा रहा हूँ कि यह एक दोषपूर्ण अवधारणा है। मैं इसका विश्लेषण इसलिये करना चाहता हूँ क्योंकि समुचित और समग्र योजना के अभाव में इतने क्रान्तिकारी विचार को निष्फल होते नहीं देखना चाहता हूँ।

निश्चय ही दिल्ली मेट्रो ने यह सिद्ध किया है कि न केवल मेट्रो महत्वपूर्ण है वरन उस मेट्रो की फीडर सेवायें भी उतनी ही आवश्यक हैं। यातायात एक समग्र उत्पाद है और इसके कई अंग हैं। नगरीय सेवाओं का स्वरूप देखें तो दैनिक यात्री कुछ पैदल चलते हैं, कुछ फीडर सेवाओं से और शेष नगरीय बसों या मेट्रो से। यदि सेवायें इस दिशा में हों तो दैनिक यात्री को थोड़ा बहुत पैदल चलना अखरता नहीं है। फीडर सेवायें मेट्रो का प्राकृतिक विस्तार है, जनसंख्या या नगर में जितना गहरे तक जायेंगी, मेट्रो उतना ही सफल होगी, लोग अपने वाहन की सुविधा उतना ही तजकर और कुछ सौ मीटर पैदल चल कर मेट्रो का उपयोग करने लगेंगे।

नगर के अन्दर साइकिलों का उपयोग एक भिन्न प्रयोग है। साइकिल बहुत अधिक दूरी के लिये उपयोग में नहीं लाई जा सकती हैं, पर ६-७ किमी की दूरी के लिये सर्वोत्तम साधन है। २० मिनट में दूरी तय हो जाती है, हल्का व्यायाम हो जाता है और थकान भी नहीं होती है। हमारे गाँवों और छोटे नगरों में स्कूटर आदि आने के पहले तक साइकिल ही प्रमुख माध्यम होता था, छोटी दूरियाँ तय करने के लिये। नगरीय परिवेश में हर स्थान पर बस सेवायें नहीं जा सकतीं। नगर के प्रमुख केन्द्र से आसपास के व्यावसायिक और शैक्षणिक स्थानों पर जाने के लिये ऑटो या रिक्शा सबके लिये आर्थिक रूप से साध्य नहीं है। इस अन्तर को भरने का कार्य साइकिल से अच्छा कोई नहीं कर सकता है। पर्यटन स्थलों में जहाँ कई स्थान कुछ किलोमीटर की दूरी पर ही होते हैं, साइकिल के द्वारा सरलता से पहुँचे जा सकते हैं।

पेरिस, मॉन्ट्रियल, कोपेनहेगन, ब्रिसबेन आदि नगरों में साइकिलों को बढ़ावा दिया गया है, बिना किसी व्यावसायिक उद्देश्य के, विशुद्ध पर्यावरणीय कारणों से, दैनिक यात्रियों और पर्यटकों की सुविधा के लिये। यदि एक यात्री भी अपना वाहन छोड़कर साइकिल की सुविधा अपना लेता है तो, साइकिल का मूल्य तो निकल ही आयेगा, उसके अतिरिक्त भी कितने लाभ होंगे, उसकी गणना विकास की अवरुद्ध राहें खोलने में सक्षम होगी। यदि इन सेवाओं को लागू करना हो तो उसमें उपयोगकर्ताओं से धन उगाहने का आग्रह तो बिल्कुल ही न हो, वरन उपयोगकर्ताओं को प्रोत्साहित करने के प्रयास हों।

जब यह सुविधा सर्वहितकारी है तो ऐसे क्या कारण हैं जो इसे लागू करने में कठिनाई उत्पन्न कर सकते हैं? दो प्रमुख आवश्यकतायें हैं और दोनों का ही निदान नगरीय प्रशासन के हाथों में है।

पहला तो साइकिल अन्य वाहनों के साथ नहीं चल सकती हैं। लहराते और मदमाते वाहनों से भरी सड़कों पर कोई भी इतना साहस नहीं कर पायेगा कि निशंक हो चल सके। वैसे अभी भी कई साहसी युवकों को देखता हूँ जो सर पर हेलमेट बाँधे तेज भागती गाड़ियों के बीच जूझते रहते हैं। पर रोमांच के लिये साइकिल चलाने और दैनिक जीवन में अपनाने में अन्तर है। यदि नगर में इसे लागू करना है तो पतला सा ही सही पर एक आरक्षित मार्ग सुनिश्चित करना होगा और वह भी हर स्थान पर पहुँचने के लिये। समस्या यहीं पर आ जाती है, जिस नगर में सारा यातायात रेंग रेंग कर चलता हो, वहाँ की सड़कें और पतली कर उसमें साइकिल मार्ग निकालने का प्रयास करेंगे तो समस्या सुलझने के पहले ही उलझ जायेगी। इसका समाधान निकालना ही होगा, आंशिक नहीं, वरन पूरा। एक कार के स्थान पर ४-६ साइकिलें आराम से चल सकती हैं, इस दृष्टि से अन्ततः समस्या सुलझनी ही है, पर इसे समुचित रूप से प्रारम्भ करने की कार्ययोजना बड़ी कठिन होगी और साथ ही साथ कई कड़े निर्णयों से भरी पूरी भी।

दूसरी कठिनाई होगी, स्थापित यातायात के साधनों का विरोध। वर्तमान में छोटी दूरी की आवश्यकताओं के फलस्वरूप करोड़ों की अर्थव्यवस्था चल रही है। बंगलोर में ही ७० हज़ार से अधिक ऑटो अधिकांशतः इसी आवश्यकता से पोषित होते हैं, साथ ही साथ टैक्सी सेवायें आदि भी इसी आवश्यकता से अपना व्यवसाय चला रही हैं। इनके विरोध और कार्य-विकल्प का समुचित प्रबन्ध करना पड़ेगा।

ऐसा नहीं है कि नगर का यातायात नहीं चल रहा है। आप एक से दूसरे स्थान पर पहुँच ही जाते हैं। बस समय अधिक लगता है, धन अधिक लगता है, असुविधा अधिक होती है और प्रदूषण अधिक होता है। मेट्रो, बस और साइकिल आदि इस दिशा में ही हैं जिससे सारे व्यर्थ हो रहे संसाधनों की बचत हो सके। तन्त्र में असीमित सुधार की संभावना़यें भी हैं, उपाय भी। प्रशासन में बैठे लोग संवेदनशील हैं और नागरिक जागरूक, समस्याओं को निदान मिलना ही है और निदान को दिशा भी। एक भविष्य का स्पष्ट खाका खींचिये और वहाँ तक पहुँचने के साधन और योजना जुटाइये, इसी में सर्वहित छिपा है।

बंगलोर मेट्रो का यह प्रयास निश्चय ही सराहनीय है कि उन्होंने दो प्रयोगों को एक में ही समाहित करके एक नया तन्त्र बनाने का यत्न किया है। दोनों प्रयोग भिन्न हैं, दोनों की ही उपयोगिता है नगर के यातायात को सुधारने के लिये, पर इस तरह का बिन विचार किये हुये घालमेल करने से उसकी सफलता संशयपूर्ण लगती है। जिन दो तीन स्थानों पर मेट्रो स्टेशन देखना हुआ है, वहाँ की सड़कों पर साइकिलों को कैसे स्थान मिलेगा, यह एक यक्ष प्रश्न है।

3.11.12

चलो अपनी कुटिया जगमगायें

सतर्कता सप्ताह चल रहा था, समापन के समय विशिष्ट अतिथि बुलाये जाते हैं जो अधिकारियों और कर्मचारियों की बड़ी बैठक को सम्बोधित करते हैं, सब ध्यानमग्न हो सुनते हैं। यथासंभव उस बैठक में उपस्थित रहना होता है, कि कहीं ऐसा न हो कि अनुपस्थिति का अर्थ सतर्कता की अवहेलना के रूप में ले लिया जाये। मुख्यतः दो विशिष्ट अतिथि बुलाये जाते हैं। एक जो स्वयं सरकारी सेवाओं के उच्चपदों में रहे हों और अपने सेवाकाल में अपनी निष्कलंक छवि को बचाये रखे हों, संभवतः इस बात का विश्वास देने के लिये कि यह आचरण सर्वथा असंभव सा नहीं हैं और उदाहरण साक्षात उपस्थित हैं। दूसरे जो आध्यात्मिक क्षेत्र से संबंध रखते हों, संभवतः इस बात को समझाने के लिये कि सदाचरण और अच्छा जीवन सामाजिक जीवन के साथ साथ आध्यात्मिक जीवन की भी आवश्यकता है और अपनी आवश्यकतायें कम करके भी इस जगत में रहा जा सकता है।

पिछली चार वर्षों की बैठकों में आठ विशिष्ट अतिथियों के विचार सुन चुका हूँ। हर बार बहुत अच्छा लगता है सुनकर, सबको ही अच्छा लगता होगा। कई बार बड़ी बड़ी बातें होती हैं, प्रभाव कितना पड़ता होगा लोगों पर, ज्ञात नहीं। कभी कोई बहुत छोटी सी बात कहता है जा मन में आकर लग जाती है, एक विशिष्ट प्रभाव छोड़ जाती है। बहुत कुछ निर्भर करता होगा मनःस्थिति पर और उतना ही प्रभाव पड़ता होगा वातावरण का भी। इस बार वातावरण पिछले वर्षों से कहीं अधिक ऊष्मा लिये हुये था। जितना तापमान हमारे टीवी का हो जाता होगा, उससे कहीं अधिक आँखें और मस्तिष्क का हो जाता है हर बार घटनाक्रम को देखकर। इस बार वातावरण पिछले वर्षों की तुलना में अधिक उत्सुकता भरा था, वहाँ बैठे श्रोताओं के चेहरे से वह स्पष्ट था।

पता नहीं क्यों पर जब आप यह सोचकर बैठे हों कि आपकी एकाग्रता में विघ्न न पड़े, उसी समय सारी दुनिया को सूझती है आप तक पहुँचने के लिये। विशिष्ट अतिथियों का सम्बोधन चल रहा था और मैं बार बार अपने मोबाइल के काँपने से व्यथित था। हर बार कम से कम यह देखना तो आवश्यक हो जाता था कि फोन किसका है, आवश्यक हो तो धीरे से फुसफुसा कर बतिया लें, नहीं तो बैठक में व्यस्त होने का छोटा सा संदेश भेज कर काम चला लें। इन्हीं दो क्रियाओं में पूरा ध्यान बटा हुआ था, शेष जो भी बीच बीच में शेष बच रहा था, विशिष्ट अतिथियों के सम्बोधन को सुनने के प्रयास में लगा हुआ था।

बड़ी समस्या है, जब भी किसी एक वस्तु में एकाग्रता स्थापित करता हूँ, दूसरी उसमें बाधा डाल देती है। मैे सुनना चाह रहा हूँ कि कैसे धन के प्रभाव से शापित वातावरण में भी सीमित धन और संसाधनों के साथ और अधिक प्रसन्न रह सकते हैं? सुनना चाह रहा हूँ कि कैसे सरकारी धन का सदुपयोग सुनिश्चित कर देश को विकास के अग्रतम मानकों तक ले जाया जा सकता है? कहाँ एक ओर इतना बड़ा ध्येय और कहाँ बार बार मोबाइल का काँप उठना, मोबाइल पर बतियाना भी आवश्यक है, भविष्य के महत लक्ष्यों के लिये वर्तमान को भी चुप नहीं कराया जा सकता है। मन की ईश्वर ने सुन ली, अगले २० मिनट तक कोई फोन नहीं आया, ध्यान सुनने में लगा दिया।

रामकृष्णमिशन के स्वामीजी थे, वयोवृद्ध थे और चर्चा का आध्यात्मिक पक्ष रख रहे थे। नाम ढंग से याद नहीं आ रहा है, आप समझ सकते हैं कि आधुनिक जीवनशैली ने मानसिक रूप से हम सबको कितना क्षीण बना दिया है, पाँच मिनट पहले जिनका परिचय दिया गया, वह भी याद नहीं रहा। मोबाइल में हजारों से अधिक नाम संचित पर जिन्हें वर्तमान में सुन रहा, उनका नाम ही ध्यान से उतर गया। मन पर अधिक दवाब नहीं डाला और सम्बोधन सुनने में लग गया।(नाम स्वामी हर्षानंदजी है, आभार देवेन्द्रदत्तजी)

रवीन्द्रनाथ टैगोर की किसी कविता का संदर्भ था। भावार्थ कुछ इस प्रकार था।

सूरज अस्त हो रहा है, क्षुब्ध है, दिन भर स्वयं दहक कर सारे विश्व को प्रकाश देने का महत कार्य किया था। अस्त होने में बस कुछ ही समय शेष है, सोच रहा है कि उसके जाने के बाद क्या होगा? क्या होगा उन स्थानों का, जो अभी तक स्पष्ट दिखायी देते हैं। किसी को संशय नहीं उनके बारे में, क्योंकि वे साक्षात दिखायी पड़ते हैं। सूरज नहीं रहेगा तो उनके अस्तित्व के बारे में संशय हो जायेगा। अँधेरे में उन्हें असहजता लगती है, जो पारदर्शिता के, जो स्पष्टता के आराधक हैं। सबको सब दिखायी पड़े, सबको सबका सुख दिखे, सबको सबका दुख दिखे, सबको सबके कर्म दिखें, सबको सबके दुष्कर्म दिखें। आज वही सूरज अस्त हो रहा है, आज प्रकाश का स्रोत अस्त हो रहा है। विश्व को नहीं ज्ञात कि क्या होने वाला है, पर जिसने प्रकाश फैलाया है, वह बस इस चिन्ता में घुला जा रहा है कि उसके जाने के बाद विश्व का क्या होगा?

उस उत्तराधिकारी को ढूढ़ रही थी सूरज की आँखें जो उसके अस्त होने के बाद भी वैसा ही प्रकाश फैला सके। सूरज को जब निराशा सी लगने लगी, डूबने में बस कुछ क्षण ही बचे तब एक छोटे से दिये ने बोलना प्रारम्भ किया।

मुझे ज्ञात है कि मैं बहुत छोटा हूँ, मुझमें इतनी सामर्थ्य भी नहीं कि आपके सम्मुख खड़ा होकर कुछ कह पाऊँ, आपके महत कार्य को समझ तक पाऊँ। पर हे सूरज,मैं आपको बस इतना विश्वास दिला सकता हूँ, कि आज रात के लिये और इस छोटी कुटिया के भीतर मैं अँधेरा नहीं होने दूँगा। कल मेरा अस्तित्व रहे न रहे, कल मेरी लौ जीवित रहे न रहे, कल मुझे ऊर्जा मिले न मिले, बस इतना विश्वास दिलाता हूँ कि कम से कम इस जगह पर मैं रात भर मोर्चा सम्हाले रहूँगा।

बात बहुत छोटी की दिये ने, अपने आकार के अनुपात में, पर उसका विस्तार वृहद था, उसका उत्तर सूरज का सन्तोष था, इस बात का सन्तोष कि जब वह कल वापस आयेगा तो उसे कम से कम इस कुटिया में अपना कोई जाना पहचाना सा दिखेगा। कोई दिखेगा जो उसके आदर्शों को जीवित रखेगा, स्वयं जलकर भी, स्वयं दहक कर भी।

तभी किसी विशेष कार्य के कारण नियन्त्रण कक्ष जाना पड़ गया, और अधिक सम्बोधन न सुन पाया, पर स्वामीजी के वे शब्द मन में अनुनादित होते रहे, कि हे सूरज, आप दिन सम्हालो, आप विश्व सम्हालो। रात हम हाथ से निकलने नहीं देंगे, हम इस कुटिया को जगमगायेंगे और प्रतीक्षा करेंगे उस सुबह की जब सूरज पुनः क्षितिज पर जगमगाने लगेगा।

31.10.12

एक बड़ा था पेड़ नीम का

बचपन की सुन्दर सुबहों का भीना झोंका,
आँख खुली, झिलमिल किरणों को छत से देखा,
छन छन कर जब पवन बहे, तन मन को छूती,
शुद्ध, स्वच्छ, मधुरिम बन थिरके प्रकृति समूची,

आज सबेरा झटके से उग आया पूरा,
नही सलोनी सुबह, लगे कुछ दृश्य अधूरा,
आज नहीं वह पेड़, कभी जो वहाँ बड़ा था,
तना नहीं, ईटों का राक्षस तना खड़ा था,

पत्तों की हरियाली हत, अब नील गगन है,
नीम बिना भी पवन मगन है, सूर्य मगन है,
वही सुबह है, विश्व वही, है जीवन बहता,
आज नहीं पर, हृदय बसा जो तरुवर रहता,

खटक रहा अस्तित्व सुबह का, निष्प्रभ सूरज,
आज नहीं है नीम, बड़ा था, चला गया तज,
किस विकास को भेंट, ढह गया किस कारणवश,
किस लालच ने छीना मेरा प्रात-सुखद-रस,

सबने मिल कर काटा उसको,
बढ़ा लिया टुकड़ा जमीन का,
एक बड़ा था पेड़ नीम का।

27.10.12

डिजिटल जीवनशैली

उपकरण का शाब्दिक अर्थ है, जिसके माध्यम से आपको कार्यों में सहायता मिले। जितनी अधिक सहायता करे, उतना अधिक उपयोगी है उपकरण। आपके डिजिटल जीवन ने आपके लिये एक नया विश्व निर्मित कर दिया है, उस जीवन से जुड़ने के लिये आपको डिजिटल उपकरणों की आवश्यकता होती है। यह एक अलग विषय है कि जीवन का कितना भाग डिजिटल जीवन हो, कई लोग इसे अपनी वर्तमान जीवनशैली और निजता पर एक अनावश्यक हस्तक्षेप मानते हैं, कई लोग इससे एक पल के लिये भी अलग नहीं होना चाहते हैं। यह हो सकता है कि घर आकर मोबाइल बन्द कर देना आपके पारिवारिक जीवन के लिये एक ऊर्जा देने वाला कार्य हो और यह भी संभव है आपके घर से बाहर होने पर वही मोबाइल आपके परिवार के सम्पर्क में सहायक हो, आप निश्चिन्तता से कार्य कर सकें।

जितना भी हो, जिस रूप में भी हो, डिजिटल जीवन का एक निश्चित स्वरूप होता है हर एक के लिये। जब यह प्रारम्भ होता है तब एक दौड़ सी होती है, अधिकाधिक अपना लेने की। धीरे धीरे यह परिवर्धित होता है, परिमार्जित होता, गुणवत्ता पाता है, सीमायें निर्धारित करता है और अन्ततः जीवन का एक अभिन्न अंग बन जाता है। डिजिटल जीवन के जो आधारभूत निर्णय लेने थे, वह ले चुका हूँ, उसे जिस स्वरूप में पहुँचाना था, वहाँ पहुँचा चुका हूँ। अब कोई क्रान्तिकारी आविष्कार जिसकी कल्पना नहीं की है, बस वही कोई परिवर्तन लेकर आयेगा, मेरे डिजिटल जीवन में। इस लेख का आधार मुख्यतः व्यक्तिगत अनुभव है और साथ में वे चर्चायें हैं जो इस विषय में मित्रों और जानकारों के साथ हुयी हैं।

पहले तो यह निश्चित करिये कि जीवन के कौन से पक्ष डिजिटल जीवन को सौंपने हैं, किस मात्रा में और किस गति से। तब यह निश्चित कीजिये कि कम से कम किन उपकरणों से वह संभव है। यदि आपका गाना सुनने की इच्छा है तो देखिये घर में कितने विकल्प उपस्थित हैं। जितने अधिक विकल्प आपने सजा कर रख लिये हैं, डिजिटल जीवन के बारे में आपकी समझ उतनी ही कम है या व्यर्थ करने के लिये उतना ही पैसा अधिक है। हो सकता है कि कई उपकरणों में गाने सुनने की सुविधा हों। यदि ऐसा है तो वह आपकी प्राथमिक आवश्यकता नहीं। इस तरह प्राथमिक उपयोग के उपकरणों के निर्धारण के बाद जो सुविधायें आपको मिलती जायें, उन्हें भी अपनी सूची से हटाते जायें। यह प्रक्रिया कई बार करने से आपके पास कम से कम उपकरण होंगे, सब के सब अधिक महत्वपूर्ण और आपके डिजिटल जीवन को अधिक गुणवत्ता देने में सक्षम।

हिचकिचाहट इस बात की भी हो सकती है कि कौन सा पक्ष डिजिटल जीवन को सौपें, कौन सा नहीं? लगता है कि सहसा सब सौंप दें तो कहीं अव्यवस्था न हो जाये, वहीं दूसरी ओर सावधानी से चलने में मितव्ययता करने में पूरी सुविधायें न मिल पायें और अन्ततः उसी कार्य के लिये एक और उपकरण लेना पड़े। यही वह दुविधा है जहाँ डिजिटल जीवन की समझ बहुत काम आती है, यही वह बिन्दु है जिसे समझने के लिये हमें डिजिटल क्षेत्र में हो रहे बदलाव जानना आवश्यक है। अपनी आवश्यकता और उपकरण की क्षमता का साम्य बिठाना डिजिटल जीवन का आधारभूत नियम है।

कुछ दिन पहले एप्पल के शोरूम में एक जानकार युवा से बात कर रहा था। मेरा प्रश्न बड़ा ही साधारण था। मैं एक ऐसा उपकरण ढूढ़ रहा था, जिसमें लगभग १-२ टेराबाइट की हार्डडिस्क हो, वाईफाई हो, लैन व ब्रॉडबैण्ड से अबाधित सम्पर्क रख सके, टीवी सहित सारे उपकरणों में एक साथ फाइल व मीडिया स्ट्रीमिंग कर सके, लोकल वॉयस मेल रिकॉर्ड करे, टीवी के नियत कार्यक्रम रिकार्ड कर सके और मेरे सारे उपकरणों का बैकअप भी करे। अब बताइये, क्या अधिक मांग कर रहा था, सारी की सारी क्षमतायें तकनीक के पास हैं। हर उपकरण में कुछ न कुछ विशेषता है पर सब का सब बिखरा है और अव्यवस्थित है। हर घर को इस तरह के सर्वर की आवश्यकता है। अभी कोई एक गाना सुनना होता है तो एक अलग रखी हार्डडिस्क की खोज करने लगते हैं, पता लगता है कि पृथु उसमें कोई फिल्म देख रहे हैं। ऐसा सर्वर होने पर जो भी उपकरण आपके हाथ में होगा, उसके माध्यम से आप सारे कार्य कर सकते हैं। जब कभी बाहर जाना हो तो संबंधित फाइलें आदि अपने उपकरण में स्थानान्तरित कर सकते हैं।

इस विषय में मेरी समझ स्पष्ट है, एप्पल ने भी इस तरह का कोई सर्वर विकसित नहीं किया है, पर उस दिन की चर्चा के बाद संभवतः उन्हें उपभोक्ताओं की स्पष्ट समझ के बारे में पता चलेगा। मैं कोई निम्नतर सर्वर खरीद कर अपना धन बर्बाद नहीं करूँगा, प्रतीक्षा करूँगा कि इस तरह का कोई सर्वर बाजार में आये। घर के अन्दर के सारे उपकरण एक विश्व में जियें, आपस में बातचीत करें, एक ही स्रोत से इण्टरनेट लें और एक ही स्थान पर अपने संग्रह रखें। हर व्यक्ति के लिये कम से कम दो उपकरण और चार पाँच सामूहिक उपयोग के उपकरण, लगभग १०-१२ उपकरण अलग अलग दिशाओं में नहीं हाँके जा सकते, उन्हें एक विश्व के अन्दर लाकर व्यवस्थित करना डिजिटल जीवन की आवश्यकता है। ऐसा करने से न केवल उपकरणों की संख्या कम हो जायेगी, वरन उपकरण सरल और सस्ते भी हो जायेंगे।

अपना उदाहरण देने का मन्तव्य आपको भ्रमित करने का नहीं, वरन आपको आपकी आवश्यकतायें इस प्रारूप में सोचने के लिये विवश करने का था। तकनीक आपके वर्तमान कार्यों को किस प्रकार सरल करने में सक्षम है और उसे पाने के लिये कौन सा उपकरण आपके लिये सर्वोत्तम है, यह प्रश्न कठिन नहीं है। फोटो, वीडियो, संगीत, फिल्में, टीवी कार्यक्रम, ये सब मीडिया के अन्तर्गत आते हैं, ये बहुत मेमोरी लेते हैं और मुख्यतः घर पर ही उपयोग में लाये जाते हैं। इन सबको हर जगह ले जाने की आवश्यकता भी नहीं, इनमें से कुछ ही ऐसे होते हैं जो हमें अत्यन्त प्रिय होते हैं और जिन्हे हम खाली समय होने पर सुनना या देखना चाहते हैं। ऐसे मीडिया को हम अपने उपकरणों में रख सकते हैं और समय समय पर उसे बदल भी सकते हैं। उन्हें इण्टरनेट पर रखने का कोई औचित्य नहीं है, क्योंकि समय आने पर यदि डाउनलोड करना पड़ा तो समय बहुत अधिक लगेगा।

मीडिया फाइलों के अतिरिक्त आपके पास जितना भी डिजिटल संग्रह है, वह सब मिलाकर ८-१० जीबी से अधिक नहीं होगा। सारे प्रपत्र, आलेख, टेबल्स, प्रस्तुतियाँ, लेख, कार्यसूची, संपर्क, तिथियाँ, कार्यवृत्त, सब का सब किसी भी उपकरण में आ जायेगा, साथ ही साथ इण्टरनेट पर भी रहेगा, किसी क्लाउड सेवा के माध्यम से। पर ये सब जितने भी उपकरणों में हो, परस्पर सामञ्जस्य बनाये रखें। ऐसा नहीं होने पर अधिक उपकरण आपका बोझ ही बढ़ायेंगे, कम करने की बात तो बहुत दूर की होगी। इन दो प्रकार के पक्षों में डिजिटल जीवन को विभक्त कर उनमें किस प्रकार के उपकरणों को लाना है और उनसे किस प्रकार पूरा कार्य लेना है, यह आपके डिजिटल जीवन की सफलता है।

उपकरण का पूरा उपयोग ही उसका मूल्य है, यदि वह नहीं हो पाया तो आपका डिजिटल जीवन या तो तरंग में जी नहीं पा रहा है या बहुत अधिक खर्च करके पछता रहा है। आपकी डिजिटल जीवनशैली क्या कहती है?

24.10.12

लैपटॉप या टैबलेट - तकनीकी पक्ष

जीवन में लैपटॉप की आवश्यकता सबसे पहले तब लगी थी, जब कार्यालय और घर के डेस्कटॉपों पर पेनड्राइव के माध्यम से डाटा स्थानान्तरित करते करते पक गया था। लैपटॉप आने से दोनों डेस्कटॉप मेरे लिये अतिरिक्त हो गये। लैपटॉप की और छोटे होने की चाह बनती ही रही, कारण रहा, उस १५.६ इंच के लैपटॉप को ट्रेन यात्रा और कार यात्रा के समय अधिकतम उपयोग न कर पाने की विवशता। १२ सेल की बैटरी के साथ लगभग ४ किलो का उपकरण सहजता से यात्रा में उपयोगी नहीं हो सकता था। बैठकों में भी १५.६ इंच का लैपटॉप अपने सामने रखना अटपटा सा लगता था, लगता था कि कोई और व्यक्ति सामने आकर बैठ गया हो। अन्ततः वह लैपटॉप दो डेस्कटॉपों के स्थानापन्न के रूप में बना रहा।

मेरी यह चाह संभवतः तकनीक की भी राह रही, बहुतों को यही समस्या रही होगी, बहुत लोग लैपटॉप का उपयोग और अधिक स्थानों पर करना चाहते होंगे। १० इंच की छोटी स्क्रीन की ढेरों नेटबुक बाजार में आयीं, पर बाधित और सीमित क्षमता के कारण अपना समुचित स्थान नहीं बना पायीं। लैपटॉप की क्षमता एक मानक बन चुकी थी और कोई उससे कम पर सहमत भी नहीं था। १३ इंच के कई लैपट़ॉप बड़ी संभावना लेकर आये, पर उसमें भी भार अधिक कम नहीं हुआ, हाँ छोटी स्क्रीन पर अधिक न समेट पाने के कारण कार्य करने पर आँखों को बड़ा कष्ट सा होता रहा। जूम करना, विण्डो बदलना आदि ढेर सारे कार्य करने के लिये माउस से हैण्डल ढूढ़ना बड़ा कष्टकर कार्य हो जाता था।

तकनीक अपने रास्ते ढूढ़ ही लेती है। हार्डड्राइव, बैटरी, चिप, स्क्रीन आदि क्षेत्रों में गजब का विकास हुआ और जो उत्पाद सामने आया, उनका नामकरण अल्ट्राबुक्स हुआ। मैकबुक एयर की डिजायन एक मानक बन गयी, जिस पर अन्य मॉडल आधारित होने लगे। ११.६ और १३ इंच की स्क्रीन, वजन १.० और १.३ किलो। इससे हल्के लैपटॉप पहले कभी नहीं बने थे। उन्हे तो चलते चलते भी उपयोग में लाया जा सकता है, एक हाथ से उठा कर दूसरे हाथ से टाइप किया जा सकता है।

लैपटॉप में टचपैड ने माउस का प्रयोग लगभग समाप्त ही कर दिया था, पर उपयोग की दृष्टि से टचपैड का स्क्रीन पर पूर्ण नियन्त्रण उसके बड़े होने और बहुआयामी कार्य करने से आया। पिंच जूम, सरकाना, पलटना, पिछले पृष्ठ पर जाना, नयी विण्डो खोलना आदि टचपैड से होने लगा, स्क्रीन का सारा नियन्त्रण विधिवत रूप से ऊँगलियों से ही होने लगा। इसका सीधा प्रभाव यह पड़ा कि ११.६ इंच की छोटी स्क्रीन भी गतिशील और बड़ी लगने लगी।

स्क्रीन को छोटा और भार को कम करने में भौतिक कीबोर्ड एक बाधा था, जगह घेरता था और भारी होता था। उन्हे हटा कर स्क्रीन में ही छूकर कार्य करने की तकनीक ने टैबलेट को जन्म दिया। १० इंच का टैबलेट पर्याप्त लगा, सारे कार्य निपटाने में। इस प्रयास में भार और आकार तो कम हो गया पर दो विकार अनचाहे ही आ गये। एक तो ओएस अपनी पूर्ण क्षमता से रहित हो गया और दूसरा स्क्रीन का आकार कीपैड के कारण और सीमित हो गया। १० इंच का टैबलेट ६०० ग्राम के आसपास सिमट आया, कहीं भी ले जाने के लिये सुविधाजनक।

श्रीमतीजी के आईपैड में कई बार प्रयास किया कि कम से कम एक पोस्ट के बराबर लेखन करें। कीपैड के माध्यम से टाइप करने से न तो वह गति आयी और न ही वह सहजता जो मेकबुक एयर के चिकलेट कीबोर्ड से मिलती है। संभवतः ऊँगलियाँ इस तरह टाइप करने की अभ्यस्त ही नहीं हैं। एक अलग भौतिक कीबोर्ड लेने से और टैबलेट की स्क्रीन को बचाने का कवर लेने से, टैबलेट का भार और आकार लगभग मैकबुक एयर के बराबर ही हो जाता है, सम्हालने में मैकबुक एयर से कहीं अधिक कठिनाई के साथ। मैकबुक एयर बन्द करते ही पूरी तरह सुरक्षित हो जाती है।

यही कारण रहे कि हमने मैकबुक एयर को आईपैड के ऊपर चुना, पूरी क्षमता और सबसे हल्का। चर्चा में है कि बाजार में विण्डोज ८ पर आधारित टैबलेट आने वाला है, उसमें लैपटॉप की क्षमता रहेगी। ऐसे टैबलेट का भार और आकार निश्चय ही उत्सुकता का विषय रहेगा। बहुत लोग जो अधिक लेखन आदि नहीं करते हैं, उनके लिये हल्के टैबलेट बड़े लाभदायक हो सकते हैं, पर मेरे लिये लैपटॉप से अधिक उपयोगी कुछ भी नहीं है। मैकबुक एयर के रूप में सर्वश्रेष्ठ लैपटॉप का अनुभव अत्यन्त संतुष्टिपूर्ण रहा है। श्रीमतीजी अपने आईपैड से अत्यन्त प्रसन्न हैं, उनकी आवश्यकता के लिये टैबलेट ही सर्वोत्तम है।

यदि टैबलेट के विषय में कोई एक पक्ष है जो सर्वाधिक सशक्त लगता है, तो वह है इसकी बैटरी। लगभग दुगना समय टैबलेट चलता है। अधिक क्षमता के यन्त्र अधिक ऊर्जा लेते हैं, यही कारण है कि हमें अधिक ऊर्जा खपानी पड़ती है। लैपटॉप आधारित उपकरणों पर जीवन बीतने से टैबलेट थोड़ा सकुचाया सा दिखता है, पर कुछ एक कार्यों को छोड़ दें तो टैबलेट लैपटॉप के सारे कार्य कर सकता है। घर में यदि एक लैपटॉप है तो अन्य लोग टैबलेट से काम चला सकते हैं। टैबलेट लैपटॉप की तुलना में अधिक सस्ता भी होता है। यदि एक घर के सारे उपकरणों को एक पारितन्त्र के रूप में कार्य करते हुये समझें तो, एक लैपटॉप का पहले से होना टैबलेट के लिये मार्ग प्रशस्त करता है।

मोबाइल के दृष्टिकोण से भी देखा जाये तो अधिक शक्तिशाली मोबाइल टैबलेट के ढेरों कार्य कर सकता है, पर आकार छोटा होने के कारण वही कार्य करने में उतनी सहजता नहीं आ पाती है। कार में जाते समय या रसहीन बैठकों में बैठे हुये मोबाइल से न जाने कितने कार्य हो जाते हैं। यह मानकर चलता हूँ कि कोई याद आयी पंक्ति या विचार छूट न जाये और एक भी पल व्यर्थ न जाये, मोबाइल इन दोनों स्थितियों में उत्पादकता बनाये रखता है। आईक्लाउड के माध्यम से प्रयासों में सततता भी बनी रहती है।

अनुभव और तकनीक के आधार पर मैकबुक एयर और आईफोन की जोड़ी मेरे लिये पर्याप्त है और उत्कृष्ट प्रदर्शन कर रही है। अब इन दो उपकरणों के आधार पर कार्यशैली और जीवनशैली किस प्रकार विकसित हो रही, यह अगली पोस्ट का विषय रहेगा। 

20.10.12

लैपटॉप या टैबलेट - अनुभव पक्ष

पता नहीं जो लोग ढेरों पैसा कमा लेते होंगे, वे अपनी वसीयत कैसे लिखते होंगे, बड़ा ही कठिन कार्य है यह, पहले संग्रहण करो फिर बाँट दो। हम तो एक एक संग्रह में पसीना बहा देते हैं, खरीदने के पहले ही उसके निस्तारण का निर्णय लेना पड़ता है। ऐसा ही कुछ हमारे घर में भी हुआ, बड़ी रोचकता से भरा, संभवतः सबके साथ कुछ ऐसा ही होता होगा।

हम मैकबुक एयर और आईफोन खरीद चुके थे और अपने घर में ही विकसित देशों के नागरिक की तरह रह रहे थे। घर के शेष तीन लोग पुराने उपकरणों के साथ थे और स्वयं को विकासशील देश के नागरिक की तरह समझ रहे थे। वितरण इस प्रकार था, डेस्कटॉप व पुराना आईपॉड बच्चों के हिस्से में, हमारे द्वारा मुक्त किया गया तोशीबा का लैपटॉप व ब्लैकबेरी का मोबाइल श्रीमतीजी के हिस्से में और एप्पल के दो नवीनतम उत्पाद हमारे हिस्से में। वितरण आवश्यक था, नहीं तो सबको एक साथ ही एक उपकरण में कार्य करने की सूझती है।

लगा था कि वितरण बड़े ही न्यायप्रिय दृष्टि से हुआ है, न केवल शान्ति बनी रहेगी वरन प्रसन्नता भी बिखरेगी। ऐसा नहीं हुआ, हमारे घर में ही हमारे विरुद्ध विरोध के स्वर उठने लगे। अपने लिये तो इतना अच्छा ले लिया, हम लोगों के लिये पुराना, यह डेस्कटॉप कितनी आवाज करता है, हमारा सिस्टम कितने धीरे चलता है, आप तो घर में कभी भी बैठ कर काम कर लेते हैं, आदि आदि। हमें लगने लगा कि एक स्थिति बन रही है जिसमें घर का मुखिया अपने लिये सारी सुविधायें रख कर औरों को उनसे वंचित रखता है। हमारा ग्लानि भाव धीरे धीरे बढ़ने लगा, उससे बाहर निकलना आवश्यक था।

विकल्प अधिक नहीं थे। निर्णय लिये जाने आवश्यक थे, पर इस बार ऐसा कोई निर्णय नहीं लेना चाहता था, जिससे असंतुष्टि बनी रहे, निर्णय में सबको सहभागी बनाना आवश्यक था। बहुत सोच विचार कर एक प्रस्ताव हमने परिवार-परिषद में रखा। बहुत कम होता है कि लोकतान्त्रिक व्यवस्था में सब प्रसन्न रहें, किसी एक का हित साधा जाता है तो दूसरा रूठ जाता है। बहुत कम ही ऐसे समाधान होते हैं, जो सबको अपना सा लगे। सीमित संसाधन होते हैं और सबको बांटे भी नहीं जा सकते हैं।

निश्चय किया गया कि एक आईपैड ले लेते हैं और डेस्कटॉप को विदा कर देते हैं। डेस्कटॉप बहुत ऊर्जा खा रहा था, तुलना की जाये तो उसी कार्य के लिये लगभग २० गुना। हम मैकबुक एयर और आईफोन रखे रहेंगे, श्रीमतीजी को आईपैड और ब्लैकबेरी और बच्चों को तोशीबा का लैपटॉप व आईपॉड। यही नहीं, इस बात का भी निर्णय लिया गया कि चार वर्ष बाद जब हमारा मैकबुक एयर और आईफोन पृथु को मिलेंगे, श्रीमतीजी के उपकरण देवला को मिलेंगे, हम लोग तब तकनीक के नये प्रयोग पुनः प्रारम्भ करने के लिये स्वच्छन्द रहेंगे। अगले चार वर्षों में तोशीबा का लैपटॉप ९ वर्ष का जीवन जी लेगा और आईपॉड भी लगभग ७ वर्ष की उपयोगिता निभा जायेगा, उसके बाद दोनों सेवानिवृत्त हो जायेंगे। उत्तराधिकार नियत करने से बच्चों को हमारे उपकरणों से लगाव हो चला है, विरोध के स्वर भी शमित हो गये हैं और भविष्य में और आधुनिक उपकरण लेने के लिये निश्चयात्मकता भी हो गयी है।

मूल प्रश्न अभी भी वहीं टँगा है कि लैपटॉप या टैबलेट। यद्यपि जिस समय मैंने मैकबुक एयर लिया था, उस समय पर्याप्त समय दिया था और विश्लेषण किया था, यह निर्धारित करने के लिये कि लैपटॉप लें या टैबलेट, और वह भी किस कम्पनी का। उस समय शोरूम में ही जाकर दोनों का अनुभव लिया था, तब भार की दृष्टि से, धन की दृष्टि से, सम्हालने की दृष्टि से, कार्य विशेष की दृष्टि से, हर प्रकार से यही निर्णय लिया कि मैकबुक एयर ही लेना है। तब समय भी कम था और विश्लेषण बौद्धिक अधिक था, व्यवहारिक कम। अब जब घोर पारिवारिक कारणों से आईपैड भी घर में आ गया है और लगभग ७ माह का अनुभव दे चुका है, दोनों की तुलना अपना रंग बदल चुकी है, कुछ तथ्य नये आये हैं और कुछ पुराने तथ्य गलत सिद्ध हुये हैं। साथ ही साथ मोबाइल की उपस्थिति ने विश्लेषण को एक नयी गहराई दी है।

लैपट़ॉप, टैबलेट और स्मार्टफोन, तीनों रखने का कोई औचित्य नहीं है, पर केवल दो से भी पूरा कार्य नहीं चल सकता है। यह वाक्य भ्रमित करने वाला लग सकता है, पर इसके पीछे कारण है, एक द्वन्द्व छिपा है, एक दर्शन छिपा है। यदि आप गतिमय रहेंगे तो सारी क्षमतायें ढोकर नहीं चल सकते। मोबाइल फोन गतिमयता का प्रतीक है, लैपटॉप क्षमताओं का। टैबलेट दोनों के बीच का है, इसमें गतिमयता भी है और क्षमता भी, पर समय पड़ने पर दोनों के कई कार्य नहीं कर पाता है।

यदि आपके पास तीनों है तो कुछ न कुछ अतिरिक्त है, लगभग २० प्रतिशत। यदि आपके पास केवल लैपटॉप और मोबाइल है तो आपका कुछ न कुछ छूट रहा है, लगभग २० प्रतिशत। तीनों उपकरण लेकर न केवल आप अधिक धन खर्च करेंगे वरन तीनों के सामञ्जस्य के लिये ढेरों समय भी व्यर्थ करेंगे, भ्रम बना रहेगा और सततता बाधित होगी, वह भी अलग से। लेकिन दो उपकरण होने पर भी आपको २० प्रतिशत उपयोगिता की रिक्तता अपनी ओर से भरनी पड़ती है। यह रिक्तता भी तीन तरह से भरी जा सकती है या तीसरे उपकरण का आंशिक उपयोग करके, या अपनी आदतों में बदलाव लाकर या उन्नत तकनीक अपना कर। तीनों को उदाहरणों से स्पष्ट करना आवश्यक है।

श्रीमतीजी के पास टैबलेट और मोबाइल है, उनका लगभग सारा कार्य गतिमयता से हो जाता है। लगभग २० प्रतिशत कार्य छूटता है, बड़ी फिल्में नहीं देख पाती हैं, फोटो आदि नहीं सहेज पाती है, गाने इत्यादि डाउनलोड नहीं कर पाती हैं, १६ जीबी से अतिरिक्त कुछ सहेजने के लिये उन्हें सोचना पड़ता है, हम पर या बच्चों पर निर्भर रहना पड़ता है। उन्हें संकोच नहीं होता है, हम सब भी उन्हें तकनीक सिखाने को तत्पर रहते हैं, वह तीसरे उपकरण का आंशिक उपयोग करके अपना कार्य चला लेती हैं।

दूसरी श्रेणी में हमारे एक मित्र हैं, घर में एक बड़ा सा लैपटॉप है और हाथ में औसत से अधिक क्षमता का मोबाइल। गतिमयता का पर्याप्त कार्य मोबाइल से कर लेते हैं, ईमेल देख लेते हैं, फेसबुक स्टेटस चेक कर लेते हैं, छोटे मोटे नोट्स भी लिख लेते हैं। घर पहुँचकर ही वे अपने शेष कार्य कर पाते हैं, ब्लॉग पर टिप्पणी करना, लेख लिखना, शोध करना। उन्होंने अपनी आदतों में यह बसा लिया है कि कब क्या करना है? जो २० प्रतिशत की यह रिक्तता है, वह उससे संतुष्ट हैं।

तीसरी श्रेणी में हम जैसे लोग आते हैं। हम न तो किसी पर निर्भर रहना चाहते हैं और न ही अपनी आदतों में ही कोई बदलाव लाना चाहते हैं। हम २० प्रतिशत की रिक्तता तकनीक से भरना चाहते हैं। एक ऐसा लैपटॉप ढूढ़ते हैं जो पूरी क्षमता का हो, हल्का हो और कहीं भी ले जाया जा सके। साथ ही साथ एक ऐसा मोबाइल जो सारे कार्य करने में सक्षम हो, क्षमताओं से भरा हो। हर कम्पनी के नये मॉडल इसी दिशा में आ रहे हैं और अधिक मँहगे भी हैं। धन व्यय करना तभी करना चाहिये जब हम में उन उपकरणों की पूरी क्षमता निचोड़ने की इच्छाशक्ति हो।

तीसरी श्रेणी के समक्ष उपस्थित विकल्पों और तकनीक से जुड़े पहलुओं पर चर्चा अगली पोस्ट में।

17.10.12

लैपटॉप या टैबलेट - निर्णय प्रक्रिया

इस प्रश्न से होकर निकला हूँ और निर्णय के बाद एक वर्ष का समय मिला है यह समझने के लिये कि जो निर्णय लिया, वह अपनी अपेक्षाओं पर खरा उतरा कि नहीं? प्रश्न बस यही था कि लैपटॉप लें या टैबलेट या दोनों? अनुभव के आधार पर इसका उत्तर समझने के लिये इसमें एक विमा और जोड़ देते हैं, मोबाइल की, क्योंकि बिना उसको परिधि में लिये उत्तर पूरा नहीं होगा। पर उस निर्णय के पहले अनुभव और समझ के क्या आधार निर्मित हुये हैं, यह समझना और उसे व्यक्त करना मेरे लिये आवश्यक हो चला है।

बड़ी लम्बी डिजिटल यात्रा रही है, अब तक की, १९८५ में कम्प्यूटर, १९९५ में डेस्कटॉप, २००३ में मोबाइल, २००७ में लैपटॉप। यदि किसी विषय में मन स्थायी लगा रहा तो यही एक डिजिटल व्यसन रहा है। जी भर के प्रयोग किये हैं, जी भर के धन खर्च किया, जी भर कर समय न्योछावर किया और यदि माताजी के शब्दों में कहूँ तो, 'वैसे तो लड़का शान्त रहता है पर इलेक्ट्रॉनिक सामान देख कर पगला जाता है।' व्यसन होते ही ऐसे हैं जो न तो समझे जा सकते हैं और न ही समझाये जा सकते हैं, पर तकनीक के अग्रतम द्वार पर बैठकर विश्व को देखना सदा ही मन को लुभाता रहा है। संग्रह जुटाते समय बस यही दर्शन रहा है कि जीवन में वस्तुयें कम से कम हों पर जो भी हों, अपनी श्रेणी में श्रेष्ठतम हों।

सलाह भी सदा यही देता हूँ। आवश्यकता के अनुसार यदि कोई निम्नतर वस्तु लेंगे तो तकनीक का अधिकतम लाभ नहीं ले पायेंगे। तकनीक न केवल आपके वर्तमान कार्यों को सरल करने के लिये है, वरन उन कार्यों को नये ढंग से करने के लिये भी है। यदि आवश्यकता के अनुसार मोबाइल का उपयोग करते तो उससे अभी तक फोन ही कर रहे होते। किसी भी उपकरण का उपयोग उसकी क्षमतानुसार करना चाहिये। देशी भाषा में कहा जाये तो अभी तक जितने भी उपकरण लिये हैं, उनसे पूरा पैसा वसूल लिया है, पूरा रगड़ कर उपयोग किया है। उपकरणों का आग्रह मेरे लिये न केवल रोचकता का आश्रय रहा है, वरन उपयोगिता के दर्शन का जीवन में प्रक्षेपण भी।

बिना इन उपकरणों के जीवन चल ही रहा था, न उतना गतिमय, न उतना विस्तारित, पर फिर भी चल ही रहा था। लोगों से बात होती थी, फिल्में देखने सिनेमाहॉल जाते थे, रामलीला देखने को मिलती थी, गाने भी सुनने को मिलते थे, पुस्तकें अल्मारियों में थीं, मोहल्ले भर में संवाद होता था, गर्मी की छुट्टियों में संबंधियों के घर आना जाना होता था। तकनीक ने सहसा हमें सुझाया कि अपने भौतिक परिवेश के परे भी सतत संवाद संभव है। हमने स्वीकार कर लिया और गढ़ने लगे एक ऐसा विश्व जिसमें सब कुछ तरंगों पर चलता था, सब कुछ कहीं भी रखा जा सकता था, कोई सीमा नहीं, कोई बंधन नहीं।

उत्साह संक्रामक होता है, सब कुछ इस नवनिर्मित विश्व में समेट लेने का उत्साह सर चढ़ बोला, धीरे धीरे माध्यम बदलने लगे, हर संभव वस्तु नये विश्व पहुँचने लगी। पत्र, पुस्तक, ज्ञान, संगीत, फिल्म आदि अपना रूप बदलने लगे, सिकुड़कर नये विश्व पहुँच गये। माध्यम बदलने से व्यवसायों का स्वरूप बदलने लगा। सब अधिक गतिमय हो गया। गतिमयता अधिकता का आधार लायी, हर क्षेत्र में अधिक लोगों की उपस्थिति ने गतिमयता को और ऊर्जामय कर दिया। अब स्थिति यह है कि सीमायें नगण्य हैं, संभावनायें असीमित हैं, नियन्त्रण सिमट कर आपके सामने रखी स्क्रीन तक आ गया है।

इस परिप्रेक्ष्य में देखें तो आधुनिक मनुष्य अपनी बाध्यताओं से परे जीना चाहता है, कोई बंधन नहीं। हम भी कुछ ऐसा ही स्वप्न देखना चाहते हैं। मेरे लिये इस नये विश्व के दो ही आधारभूत बिन्दु हैं। पहला, प्रयासों की सततता बनी रहे। अर्थ यह कि हाथ में जो भी उपकरण रहे उसके माध्यम से मैं अपना कोई भी कार्य कर सकूँ और यदि कहीं पहुँच कर उपकरण बदले तो थोड़ी देर पहले किये प्रयास व्यर्थ न जायें या उन प्रयासों को उपकरणों के बीच स्थानान्तरित करने में समय व्यर्थ न हो। दूसरा, किसी भी स्थान विशेष का बन्धन न हो, हर स्थान से कार्य करने की सहजता हो। एक लेखक के रूप में देखूँ तो कहीं भी लिख सकूँ, किसी पुराने लेख को संपादित कर सकूँ, कहीं भी कुछ पढ़ सकूँ और किसी भी उपकरण में ये उपरोक्त काम कर सकूँ। एक प्रशासक के रूप में तन्त्र की स्थिति पर दृष्टि, उससे संबंधित विषयों को पढ़ सकने या पुराने संदर्भों को टटोल सकने की सुविधा और अन्ततः निर्णय लेने और उसे प्रेषित करने की सुविधा। उससे भी अधिक महत्वपूर्ण है कि एक लेखक से प्रशासक और प्रशासक से लेखक के बीच अपने को त्वरित स्थापित कर लेने की सुविधा, कहीं पर भी, कभी भी।

ऐसा लग सकता है कि कुछ अधिक ही माँग रहा हूँ तकनीक से। तकनीक यदि सक्षम नहीं होती तो संभवतः यह अपेक्षायें रखता ही नहीं। हमारी अपेक्षायें ही तकनीक की दिशा निर्धारित करती हैं, नये उत्पाद को बनाने वालों के मन में यही आधार रहता होगा कि किस तरह चाँद लाकर धरती पर रख दिया जाये। इसीलिये सबको सलाह भी देता हूँ कि उपकरण की क्षमता पहचान कर अपने काम करने की विधि में बदलाव लाओ, प्रयोग करो, सफल न हो तो प्रयोग परिमार्जित करो, फिर भी असफलता लगे तो उससे कुछ सीख कर नये प्रयोगों में लग जाओ।

जब इस समग्रता से उपकरणों को देखा जायेगा, तब ही उनकी उपयोगिता आपके जीवन को सार्थकता से प्रभावित करेगी। तकनीक को जीवन के कई पक्षों में समाहित करने का ही उत्साह है जिसे माताजी हमारे पगलाने का कारण मान लेती हैं। तकनीक का समावेश जीवन में अधिकतम हो, इसके लिये अपने लिये कई कठिन नियम नियत कर लिये थे और उनका अब तक यथासंभव अनुपालन भी कर रहा हूँ।

कागज में कुछ भी नहीं लिखता हूँ, सुबह परिचालन संबंधी तथ्य लिखने हों, बैठक के समय निर्देश लिखने हों, कार्यों की समीक्षा करनी हो, लेखन करना हो, कोई पंक्ति लिखनी हो, कोई कार्य याद रखना हो, सब का सब सीधा मोबाइल या लेपटॉप पर। २००३ के पहले का समय कागज से भरा पूरा था, कोई कार्य न जाने कितने कागजों में झलकता था, संपादित करने में न जाने कितने कागज शहीद हो जाते थे। धीरे धीरे यह लगा कि तकनीक कागज को पूर्णतया बचाने में सक्षम है, विधियाँ विकसित होती गयीं और अब सब सहज हो गया है। निरीक्षण रिपोर्ट मोबाइल पर ही टाइप हो जाती है और ईमेल से प्रेषित भी। दूसरा छोर भी विकसित होने पर अनुपालन रिपोर्ट भी डिजिटल माध्यम से आने लगेगी। मुझे यह भी याद नहीं आता है कि तीन वर्ष की ब्लॉग यात्रा में कभी कागज में कुछ लिखा हो, सब का सब मोबाइल पर या लैपटॉप पर।

बहुत प्रयोग हो चुके हैं, बहुत होने शेष हैं, पर ध्येय पूर्णतया स्पष्ट है। तकनीक के श्रेष्ठतम पक्षों का उपयोग करना है, न केवल वर्तमान कार्यों को सरलता से करने के लिये, वरन नयी विधियों से करने के लिये भी। दिशा उलझाने वाली नहीं, सुलझाने वाली होगी। उपकरण एक भार नहीं, हल्कापन लाने के लिये होंगे। जीवन में जटिलता नहीं, सरलता स्थापित करनी है।

लैपटॉप या टैबलेट के निर्णय में यह सारे पक्ष अपना अपना महत्व रखेंगे, वह अगली पोस्ट में।

(इस विषय के उत्प्रेरक ईपंडित श्रीश बेंजवाल शर्माजी रहे हैं। तकनीक संबंधी विषयों को स्पष्ट कर, सबको समझाने में उनके अथक प्रयास ब्लॉग के इतिहास में अपना स्थायी स्थान बनायेंगे।)

13.10.12

पुस्तकें बुलाती हैं

पुस्तकों से एक स्वाभाविक लगाव है। किसी की संस्तुति की हुयी पुस्तक घर तो आ जाती है, पर पढ़े जाने के अवसर की प्रतीक्षा करती है। मन में कभी कोई विचार उमड़ता है, प्यास बन बढ़ता है, स्पष्ट नहीं हो पाता है। आधी लगी दौड़ जैसी, जब अभिव्यक्ति ठिठकने लगती है और लिखने के लिये कुछ सूझता नहीं है, तब लगता है कि अन्दर सब खाली हो चुका है, फिर से भर लेने की आवश्यकता है। एक पुस्तक उठा लेता हूँ, पढने के लिये, या कहें कि लेखक से बतियाने लगते हैं। पहले बैक कवर पढ़ते है, फिर प्रस्तावना, फिर विषय सूची, उत्सुकता बनी रही तो कुछ अध्याय भी। धीरे धीरे यही क्रम बन गया है, बहुत कम ही ऐसा हुआ है कि प्रारम्भ में रुचिकर लगी पुस्तक अन्त में बेकार निकली हो।

संस्तुति की गयी सीमित पुस्तकों में यह संभव है। उन पुस्तकों के नाम मोबाइल में रहते हैं, कभी पुस्तकों की दुकान जाना हुआ तो, वहाँ ढूढ़कर पढ़ लेते हैं। बंगलोर में यह बात बहुत ही अच्छी है कि तीन बड़े बुकस्टोर, रिलायंस टाइमआउट, क्रॉसवर्ड और लैण्डमार्क, तीनों में ही बैठकर पढ़ने की सुविधा है, शान्ति भी रहती है और कॉफी भी रहती है, आप अधिक समय तक बैठकर पढ़ सकते हैं, कोई भी आपको जाने को नहीं कहेगा, विशेषकर जब आप बहुधा वहाँ जाते हों। साप्ताहिक खरीददारी करने के क्रम में डिजिटल स्टोर और बुक स्टोर नियमित पड़ाव रहते हैं। समय कम रहा तो संस्तुति की गयी तीन चार पुस्तकें ही पढ़ पाता हूँ, अधिक समय मिलता है तो आठ दस पुस्तकें और पलट लेता हूँ। हाँ, टटोलने का क्रम वही रहता है, बैक कवर से। यह अनुभव बड़ा ही अच्छा लगता है, उन दुकानों की तुलना में, जहाँ एक एक पुस्तक माँगने पर दुकानदार आपको भारस्वरूप देखते हैं और पुस्तकें अनमने भाव से आपके सामने फेंक दी जाती हो। दो तीन से अधिक पुस्तकों के बारे में पूछने लगिये तो आपसे यह प्रश्न पूछ ही लिया जाता है कि खरीदने के लिये पैसे भी हैं जेब में?

जहाँ यह सुविधा होती है, वहाँ उसका पूरा लाभ उठाने वाले कई लोगों को यह लग सकता है, कि जब यहीं आकर पढ़ा जा सकता है, तो पुस्तक खरीदने की क्या आवश्यकता है? विचार आने से रोका नहीं जा सकता है। जब अभी तक पुस्तकों को किसी रत्न या हीरे की तरह किसी पुस्तकालय या दुकान में सजा देखा हो, तो यह विचार आने की संभावना और भी बढ़ जाती है। हमारे साथ भी ऐसा हुआ, जब पहले पहले यह सुविधा मिली तो कुछ पुस्तकों के बीस तीस पन्ने वहीं पर बैठकर पढ़ डाले। लगा कि ढेरों पैसे बचा लिये, दुकान को लूट लिया। अब तीन साल बाद देखता हूँ कि पुस्तकों के संग में रहने का नशा बहुत मादक होता है, एक बार लगता है तो छूटता नहीं है। यदि उन दुकानों में बैठकर पढ़ने का अवसर नहीं पाया होता, तो इतनी पुस्तकें खरीदकर घर में नहीं लाता। लगभग हर बार यही हुआ कि कोई न कोई पुस्तक लेकर घर आ गया। अब लगता है कि इन लोगों ने चखा चखा के हमें ही लूट लिया।

बचपन में विद्यालय से जब घर आता था तो घर में बहुधा कोई नहीं मिलता था, बस समय बहुत मिलता था। भरी दुपहरियाँ, बाहर जाकर खेलना कठिन, बस पुस्तकें ही सहारा बन कर रहती थीं। पुस्तकें पढ़ने का क्रम तभी से चल पड़ा। पहले तो घर में रखी सारी साहित्यिक पुस्तकें पढ़ लीं, कहानी के रूप में लिखे ग्रन्थ पढ़ डाले, सोवियत संघ से आने वाली कई मैगज़ीन पढ़ डालीं और जब धीरे धीरे ये समाप्त हो चलीं तो अपने चाचाजी द्वारा पढ़े गये और सहेजे गये ढेरों जासूसी और चटपटे सामाजिक उपन्यास पढ़ डाले। जीवन में उतना निश्चिंत समय फिर कभी नहीं मिला। दस वर्ष की अवस्था में न यह ज्ञान था कि क्या पठनीय है, भारी भरकम तर्कों का क्या अर्थ है, और किस पुस्तक का क्या महत्व है? बस पढ़ते गये, एक नशा सा समझ कर चढ़ाते गये, एक परमहंसीय मानसिकता से पुस्तकें पढ़ीं तब।

धीरे धीरे अनुभव आया, अच्छी पुस्तकों के बारे में पता चला, किन पुस्तकों को पढ़ना समय व्यर्थ करने सा था, वह भी पता चला। यह भी पता चला कि इतनी पुस्तकें हैं जगत में कि सारी पढ़ी भी नहीं जा सकती हैं। अपनी संस्कृति से परे और भी रंग हैं पुस्तकों के इन्द्रधनुष में। अभिरुचि किसी विषय विशेष के प्रति नहीं, बस पढ़ने के प्रति बनी रही। शिक्षापद्धति के अन्तर्गत पाठ्यक्रम की पुस्तकों ने आकर डेरा जमा लिया, घर के सीमित आकार और दिन के सीमित समय को पूरा घेर लिया। कई वर्ष अपनी रुचि का ठीक से पढ़ ही नहीं पाया। विद्यालय का पुस्तकालय अधिक बड़ा नहीं था और शीघ्र ही सारी पुस्तकें पहचानी सी लगने लगीं। अस्तित्व के लिये संघर्ष ने प्रतियोगी परीक्षाओं से संबधित पुस्तकों के पढ़ने को विवश कर दिया, पढ़ने की प्यास बुझी ही नहीं, मन अतृप्त बना रहा।

आईआईटी कानपुर का पुस्तकालय, जीवन में एक श्रेष्ठ उपहार बनकर आया। इतना बड़ा पुस्तकालय पहले कभी नहीं देखा था। कोई ऐसा विषय नहीं देखा जिससे संबन्धित उत्कृष्ट पुस्तकें वहाँ उपस्थित न हों। हिन्दी, दर्शन, इतिहास, शोध का इतना बड़ा संग्रह एक आश्चर्य था मेरे लिये। विज्ञान और इन्जीनियरिंग से संबन्धित पुस्तकों के बारे में तो कहना ही क्या? बहुधा जब कल पुर्जों और उनकी गतियों से मन ऊबने लगता था तो कोई न कोई रोचक छाँह मिल जाती थी पुस्तकों की। न जाने कितने विषय पर कितनी पुस्तकें पढ़ डाली वहाँ पर। जब किसी एक अभिरुचि में बँधने का नहीं सोचा तो सारी पुस्तकें आकर्षित करती रहीं। भौतिकी से लेकर पराभौतिकी तक, विलास से लेकर अध्यात्म तक, इतिहास से लेकर भविष्य तक और दर्शन के न जाने कितने विचारपुंज, सब आँखों के सामने से निकल गये।

बहुत बार ऐसा होता था कि कोई अच्छा वाक्य पढ़ा तो उसे याद करने का मन हो उठता था। याद करना और समय आने पर उसका उपयोग कर अंक बटोर लेने की आदत वर्तमान शिक्षापद्धति के प्रभाव स्वरूप अब तक स्वभाव से बँधी हुयी थी। ऐसा करने से सदा ही पुस्तक का तारतम्य टूट जाता है। औरों के सजाये शब्द आपके जीवन में वैसे ही उतर आयेंगे, यह बहुत ही कम होता है, एक आकृति सी उभरती है विचारों की, एक बड़ा सा स्वरूप समझ का। धीरे धीरे वाक्यों को याद करने की बाध्यता समाप्त हो गयी और पुस्तकों को आनन्द निर्बाध हो गया। थककर पुस्तकालय में बहुत बार सो भी गया, भारी भारी स्वप्न आये, निश्चय ही वहाँ के वातावरण का प्रभाव व्याप्त होगा स्वप्नलोक में भी।

अब समय अपना है, कोई परीक्षा भी नहीं उत्तीर्ण करनी है, पर जीवन यापन करने में समय की कमी हो चली है। कभी कभी मन को समझाने का प्रयास करता हूँ कि कितना कुछ पढ़ लिया है, एक स्पष्ट समझ विकसित भी हो गयी है, तो और पुस्तकें पढ़ने की क्या आवश्यकता? यह तर्क थोड़े समय के लिये आहत मन को सहला तो देता है पर पुस्तकों की दुकान जाते रहने से रोक नहीं पाता है। कुछ और खरीदने जाता हूँ तो पैर स्वतः ही पुस्तकों की ओर खिंचे चले जाते हैं।

पुस्तकों के बीच पहुँच कर लगता है कि विश्व के श्रेष्ठ मस्तिष्कों के बीच आकर बैठ गया हूँ। वहाँ जाकर यह पता लगता है कि कितना कुछ लिखा जा रहा है, किन विषयों पर लिखा जा रहा है। यह जानना बहुत ही आवश्यक है कि श्रेष्ठ मस्तिष्कों के चिन्तन की दिशा क्या है, किन संस्कृतियों में क्या विषय प्रधान हो चले हैं और किन विषयों को अब अधिक महत्व नहीं दिया जा रहा है। यह समझना और जानना धीरे धीरे एक अभिरुचि के रूप में विकसित होता जा रहा है। बैठे बैठे कइयों पुस्तकें उलट लेता हूँ, सारांश समझ लेता हूँ, अच्छी लग ही जाती हैं, खरीद लेता हूँ। बौद्धिक प्यास बुझाकर वापस आता हूँ, कि थोड़े दिन संतृप्त रहेगा मन। पर क्या करूँ, उनके आसपास से कभी निकलना होता है तो बलात खींच लेता है उनका आकर्ष। खिंचा चला जाता हूँ, जब पुस्तकें बुलाती हैं।

10.10.12

शाम है धुआँ धुआँ

शाम थी, वह भी रविवार की, बैठकर सोच रहा था कि सप्ताहान्त कितना छोटा होता है, केवल दो दिन का। क्या न कर डालें इन दो दिनों में, यह सोचने में और उसके लिये समुचित साँस भरने में एक दिन निकल जाता है। दूसरा दिन पिछले सप्ताह की थकान मिटाने में और आने वाले सप्ताह के लिये ऊर्जा संचित करने में ढल जाता है।

इस बार पक्का था कि शनिवार श्रीमतीजी फिल्म दिखाने के लिये घेरने वाली हैं, मन मार के मन भी बना लिया था कि दिखा देंगे। यहाँ एक फिल्म में लगभग दो हजार शहीद हो जाते हैं, ढाई सौ से कम तो कोई भी टिकट नहीं। अब फिल्म भी सूखी नहीं दिखायी जा सकती है, बिना पॉपकार्न, नैचो और पेप्सी के बच्चों को फिल्म समझ भी नहीं आती है, इन तत्वों के बिना फिल्म अनाकर्षक लगती है। ऐसा नहीं है कि हम अपनी तरफ से कोई तैयारी नहीं करते हैं, दोपहर को समुचित भोजन करा के चलते हैं जिससे फिल्म के पहले ही भूख न लग जाये, पर मध्यान्तर होते होते सब कुछ हजम हो जाता है। बच्चों और श्रीमतीजी के सामने हमारी चालाकी आज तक नहीं चल पायी है। यदि कभी ना नुकुर की तो श्रीमतीजी बच्चों की हितैषी बन बैठती हैं, कृपणमना होने के ढेरों आक्षेप लगने लगते हैं। अब बच्चों को और उनकी माताजी को कैसे समझाया जाये कि हम तो तीस-चालीस रुपये में फिल्म देख आते थे। चार लोगों के टिकट के लिये १६० रुपये और मध्यान्तर में ४० रुपये के समोसे और कोल्डड्रिंक्स, कुल मिलाकर २०० रु।

कितनी भी जीडीपी बढ़ जाये, कितनी भी मँहगाई बढ़ जाये, २०० रु की जगह २००० रु जाते हैं, तो अटपटा लगता है, हृदय बैठने लगता है। फिल्में वही हैं, अभिनेता वही हैं, सिनेमा हॉल के स्थान पर मल्टीप्लेक्स आ जाने से फिल्म देखने में १८०० अतिरिक्त लगने लगे हैं। देश की अर्थव्यवस्था भले ही सुधर गयी हो, हमारी तो हर बार इसी तरह भड़भड़ा जाती है। कई लोग कह सकते हैं कि फिल्म देखना तो उपभोग की श्रेणी में आता है, न कि आवश्यकता की श्रेणी में। उनको बस यही कहा जा सकता है कि यह हमारे लिये विवशता की श्रेणी में आता है। मल्टीप्लेक्स आ जाने से सिनेमा हॉल में फिल्में देखना कृपणता के कार्यों में गिना जाने लगा है। यहाँ पर जितने भी सिनेमा हॉल होते थे, सब के सब ढहाये जा रहे हैं और उनके स्थान पर मॉल और मल्टीप्लेक्स तैयार हो रहे हैं। जब हर परिवार में मल्टीप्लेक्स में फिल्म देखने के दीवाने बढ़ने लगें, तो सबकी आशायें बढ़ने लगती हैं। पहले जो काम २०० में होता था, उसके लिये २००० मिलने की संभावनायें बन जायें, तो अर्थव्यवस्था में उभार आना ही है, जीडीपी बढ़नी ही है, देश का विकास होना ही है।

पर इस बार भाग्य ने हमारे पक्ष में पलटा खाया, शनिवार को ही पूरे कर्नाटक बन्द की घोषणा हो गयी। विषय अत्यधिक संवेदनशील था, कावेरी के जल के बटवारे ने स्थिति गम्भीर कर दी थी, पूरा बंगलोर लगा कि जगा ही नहीं। कई स्थानों पर ट्रेनें रोक दी गयी थीं। लम्बी दूरी की ट्रेनों सहित कई ट्रेनें निरस्त भी करनी पड़ीं। पहले तो इस व्यस्तता में दिन निकल गया और सायं भी मॉल बन्द होने के कारण फिल्म देखने का कार्यक्रम पूरी तरह टल गया। अगले दिन समाचार पत्रों में पढ़ा कि उस दिन देश की अर्थव्यवस्था को कई करोड़ का घाटा हुआ। सोचने लगे कि उस घाटे में क्या स्वरूप रहा होगा, बहुत कुछ तो समझ नहीं आया, बस इतना निश्चित था कि उसमें हमारे न खर्च होने वाले दो हजार रुपये भी हैं। इस सप्ताह तो बच गये, पर पता नहीं कि आने वाले सप्ताह में ईश्वर कैसे सहायता करेगा? यदि ईश्वर ने सहायता नहीं की तो देश की अर्थव्यवस्था में हम भी २००० रु की आहुति चढ़ा देंगे। कावेरी जल विवाद में यहाँ की अर्थव्यवस्था अभी और कितनी प्यासी रह जायेगी, कहना कठिन है। यहाँ का वातावरण देख कर लगता है, या तो जल में प्रवाह रहेगा या अर्थव्यवस्था में।

रविवार का दिन हमें पूरी तरह से मुक्त रखा जाता है, इसी दिन का प्रताप है कि सप्ताह भर के लिये दो पोस्टों का लेखन हो पा रहा है। कोई निश्चित कार्यक्रम नहीं, अपनी ओर से भेंट के लिये कोई पहल नहीं, बस अपने साथ, अपने परिवार के साथ। कहने को तो यह सूर्यदेव का दिन होता है, प्रखर चमकने के लिये पर हम स्वयं में खोये रहते हैं,स्वयं में सोये रहते हैं। सायं विश्वकप का मैच देखना था, अपने पड़ोसी के घर में, भोजन के साथ, अतः दोपहर को भोजन के बाद झपकी मार ली। सुबह से टीवी पर दोषारोपणों का इतना विषवमन हो चुका था कि लग रहा था कि टीवी देखना बन्द नहीं किया तो देश की स्थिति की तरह हम भी पाताल पहुँच जायेंगे। टीवी बन्द करने से सहसा अच्छा लगने लगा, लगा कि देश की समस्यायें थोड़ी कम हो चली हैं। इतनी मानसिक थकान हो चली थी कि आँख बन्द कर सोचने में ही नींद आ गयी।

ऐसी ही एक निश्चिन्त नींद और आगामी भोज के आनन्द के बीच का समय था, शाम थी वह रविवार की। कुछ न होने और कुछ न खोने की बीच की स्थिति में बैठे थे। श्रीमतीजी सायं के पंचायत-कम-टहलने में व्यस्त थीं, बच्चे आने वाले पाँच दिनों का खेलने का कोटा आज ही पूरा कर लेने में श्रमनिरत थे। मन में कोहरे जैसा आनन्द आ रहा था, न कुछ दिख रहा था, न कुछ देखने की इच्छा ही थी।

पर आनन्द की इस स्थिति में बाधा पड़ गयी, घर के पीछे से हल्का हल्का धुआँ आ रहा था। लगा कहीं कोई कूड़ा तो नहीं जला रहा है, संभावना बहुत कम थी, क्योंकि श्रीमतीजी सारे कूड़े से खाद बनवा देती हैं, जलाने के लिये कुछ बचता ही नहीं है। पता किया गया, आउटहाउस में कोई चूल्हा जलाये हुये था, वहीं से धुआँ घर के अन्दर घुस रहा था। बंगलोर की हल्की ठंडी और मदिर हवा में यदि धुआँ मिल जाये तो रस का सारा तारतम्य चौपट हो जाता है। जहाँ तक मुझे याद था कि बहुत कम ही ऐसा हुआ था जब पीछे से धुआँ आया हो, उनके घर में गैस थी और खाना उसी पर बनता है। यद्यपि यहाँ पर पेड़ बहुत हैं और उनकी सूखी टहनियाँ गिरती रहती हैं, पर भोजन बनाने के लिये रसोईगैस का ही प्रयोग होता है। यहाँ जाड़ा भी नहीं पड़ता है, लकड़ी जलाकर सेंकने का भी कोई प्रश्न नहीं उठता है।

धीरे धीरे जब भेद खुला, तब देश में हो रहे आर्थिक सुधारों के प्रभाव और गति का पता चला। एक सप्ताह पहले जो निर्णय टीवी पर बहसों का अंग था, वह अपने निष्कर्ष पा रहा था, हमारे घर के पीछे। जो तथ्य सामने आये, बड़े रोचक थे। यद्यपि उस घर में रसोई चूल्हा था, पर आने वाले ६ महीनों में मात्र ३ गैस सिलिण्डर मिलने के कारण प्रत्येक सिलिण्डर को २ माह चलाने की विवशता थी। जहाँ पर माह में एक सिलिण्डर की आवश्यकता हो, वहाँ उसे दो महीने खींचने के लिये हर दूसरे दिन चूल्हे पर खाना बनाना पड़ेगा। ईश्वर की कृपा से यहाँ पर पेड़ पर्याप्त हैं, सूखी टहनियों की कमी नहीं है, कुछ नहीं तो हर दूसरे दिन तो चूल्हा जलाया ही जा सकता है। आउटहाउस वाला आकर बोला 'क्या करेगा साहब, आप तो सब जानते ही हैं।' हम भी अपने कल्पना लोक से धीरे से उतर आये, धुआँ अब तक मन में उतर गया था।

फिल्म हो, बंद हो या धुआँ हो, देश की अर्थव्यवस्था हर पर सीधा प्रभाव डालती है। एक सप्ताहान्त के दो दिनों में जब इतना मिल गया तो पूरे सप्ताह में क्या हाल होगा, राम जाने। अब तो हर शाम धुँआ धुँआ हो, तो कोई आश्चर्य नहीं, इसकी आदत डालनी होगी। संभवतः कुछ दिनों में धुयें के सौन्दर्यपक्ष को कविता में सहेजने की दृष्टि विकसित हो जाये।

6.10.12

बच्चों की संस्कृति

अपनी संस्कृति पर गर्व होना स्वाभाविक है, पर सारा जीवन अपनी संस्कृति के एकान्त में नहीं जिया जा सकता है, अन्य संस्कृतियाँ प्रभावित करती हैं। पहले का समय था, संस्कृतियों के बीच का संवाद सीमित था, परस्पर प्रभाव सीमित था, जो बाहर जाते थे वे ही बाहर की संस्कृति के कुछ अंश ले आते थे, पर दूसरी संस्कृति में जीवन निभा पाने के समुचित श्रम के पश्चात। आज न जाने कितनी फुहारें बरसती हैं, बड़ा ही कठिन होता है, भीग न पाना। हर संस्कृति की एक जीवनशैली है, अपने सिद्धान्त हैं और उसमें पगी दिनचर्या। औरों की संस्कृति पहले तो रोचक लगती है, पर धीरे धीरे रोचकता हृदय बसने लगती है, हम औरों की संस्कृति के पक्ष अपना लेते हैं, अपनी सुविधानुसार, अपनी इच्छानुसार।

मुझे भी अपनी संस्कृति पर गर्व है, खोल पर नहीं, उसकी आत्मा पर है। कई कारण हैं उसके, वर्षों की समझ के बाद निर्मित हुये हैं वे कारण। बहुत कारण ऐसे हैं, जो सिद्ध न कर पाऊँ, समझा न पाऊँ, भावानात्मक हैं, बौद्धिक हैं, आध्यात्मिक हैं। आवश्यकता भी नहीं है कि उनके लिये तर्कों से श्रेष्ठता के महल निर्माण करूँ, अनुभवजन्य तथ्य तर्कों की वैशाखियाँ पर निर्भर भी नहीं रहते हैं। यह भी नहीं है कि मुझे अन्य संस्कृतियों से कोई अरुचि हो, जब खोल अनावश्यक हो जाते हैं तो तुलना करने के लिये बहुत कम बिन्दु ही रह जाते हैं। सिद्धान्तों की मौलिकता में किसी भी संस्कृति को समझना कितना सरल हो जाता है, कम समझना होता है तब, गहरा समझना होता है तब। कबिरा की 'मरम न कोउ जाना', यही पंक्ति पथप्रदर्शन करने लगती है। किसी संस्कृति का श्रेष्ठ स्वीकार करना ही उस संस्कृति का समुचित आदर है। खोल का ढोल पीटने वाले, न अपनी संस्कृति को समझ पाते हैं, न औरों की।

आज आधुनिक एक आभूषण बन गया है, पुरातन एक अभिशाप। भविष्य सदा ही अधिक संभावनायें लिये होता है, भूतकाल से कहीं अधिक मात्रा में, कहीं अधिक स्पष्टता में। पुरातन को अपने दोषों का कारण मान, सब कुछ उसी पर मढ़ हम हल्के हो लेते हैं, कोई भार नहीं, कोई अनुशासन नहीं, कोई नियम नहीं, उन्मुक्त पंछी से। यदि यही आधुनिकता के रूप में परिभाषित होना है, तब तो हम स्वयं को संस्कृति के परिप्रेक्ष्य में कभी समझे ही नहीं। आधुनिकता और खुले विचार वालों ने अपनी स्वच्छन्दता के सीमित आकाश में संस्कृति की उस असीमित आकाशगंगा को तज दिया है, जिसमें हम सब सदियों से निर्बाध और आनन्दित हो विचरण करते रहे हैं।

संस्कृति की हमारी संकर समझ उस समय उभर कर सामने आ जाती है, जब हम चाहते हैं कि हमारे बच्चे पाश्चात्य संस्कृति सीखें, उनकी तरह विकसित हों, उनकी तरह आत्मविश्वास से पूर्ण दिखें, पर घर की मान्यताओं, परम्पराओं और संस्कारों को अक्षुण्ण रखे। जो भी कारण रहा हो, भारतीय संस्कृति शापित रही हो या शासित रही हो, आधुनिक परिवेश में श्रमशीलता, अनुशासन और कर्मप्रवृत्तता भारतीय संस्कृति के अनुपस्थित शब्द रहे हैं। वानप्रस्थ और सन्यास वर्षों में अध्यात्म का संतोष और जीवन समेटने की चेष्टाओं को ब्रह्मचर्य और गृहस्थ में ही स्वीकार कर लेने से जो अकर्मण्यता हमारी जीवनशैली में समा गयी है, उसकी भी उत्तरदायी है संस्कृति के बारे में हमारी संकर समझ।

क्या करें, संस्कृति का सही अर्थ बच्चों को समझाने बैठें या उन्हें स्वयं ही समझने दें? कपाट बन्द करने से उसके कूप मण्डूक हो जाने का भय है, कपाट खोल देने से वाह्य संस्कृतियों के दुर्गुण स्वीकारने का भय? जब हमें चकाचौंध भाती है तो उन्हें भला क्यों न अच्छी लगेगी, क्या तब बच्चे लोभ संवरण कर पायेंगे? बहुत से ऐसे ही प्रश्न उठ खड़े होते हैं जब बच्चों का परिचय हम अन्य संस्कृतियों से करवाते हैं। क्या उपाय है, संस्कृति की आत्मा सिखायें, या खोल चढ़ा दें, या उसे स्वयं ही समझने दें? उत्तर तो पाने ही हैं, अनभिज्ञता हर दृष्टि से घातक है। बहुत बार बस यही लगता है कि जो भी सिखाना हो, जो भी श्रेष्ठ हो, उसे स्वयं के जीवन में उतार लीजिये, बच्चे समझदार होते हैं, सब देख देखकर ही समझ लेते हैं।

एक मित्र के बारे में कहना चाहूँगा, वह पूर्ण नास्तिक, कारण बड़ा रोचक है पर। बचपन में अपने पिता को देखता था, बहुत अधिक पूजा पाठ करते थे, धार्मिक थे। भ्रष्टाचार का धन और परिवारजनों, विशेषकर पत्नी के प्रति अप्रिय व्यवहार। यह विरोधाभास उसको कभी समझ न आया, उसे लगा कि इस विरोधाभास का स्रोत धर्म ही हो, किसी से कभी कुछ नहीं कहा, बस वह ईश्वर से रूठ गया, जीवन भर के लिये नास्तिक हो गया। देखा जाये तो हमारा जीवन ही बच्चों के लिये हमारी संस्कृति का जीवन्त उदाहरण है, वही पर्याप्त होता है बस, प्रभावित करने में शब्द आदि निष्प्राण हो जाते हैं, अन्त में व्यवहार ही अनुसरणीय हो जाता है।

पाश्चात्य समाज में बच्चे अधिक स्वतन्त्र होते हैं, विकास के लिये एक आवश्यक गुण है यह। अपने जीवन के दो महत्वपूर्ण निर्णय स्वयं करते हैं वे, जीवन यापन कैसे करना है और जीवन यापन किसके साथ करना है? हम अपनी संस्कृति के परिप्रेक्ष्य में देखेंगे तो संभवतः हजम न कर पायें, पर उनके लिये यह स्वाभाविक व्यवहार है। यदि आप चाहेंगे कि आपके बच्चे भी उनकी तरह स्वतन्त्र बने या स्मार्ट बने, तो उन्हें बचपन से ही अपने निर्णय लेने के लिये उकसाना होगा। तब निर्णयों में मतभेद भी होंगे, कई बार मर्यादा दरकती हुयी सी लगेगी। जो बच्चे आपके निर्णयों से सहमत न हो अपना पंथ सोचने लगते हैं, उन्हें बागियों की उपाधि मिल जाती है। जो बच्चे आपके निर्णयों से असहमत होकर कार्यों में रुचि खो देते हैं और अनमने हो जाते हैं, उन्हें आप नकारा की संज्ञा से सुशोभित कर देते हैं। स्वतन्त्र दोनों ही होते हैं, जीवन अपना दोनों ही जीते हैं, बहुधा अपने कार्य में अत्यधिक सफल भी रहते हैं, पर समाज की दृष्टिकोण से आदर्श बच्चे नहीं कहे जाते हैं।

माना कि पाश्चात्य दृष्टिकोण में बहुत दोष हैं, आध्यात्मिक आधार पर भारतीय संस्कृति कहीं उन्नत है, सामाजिक संरचना और संबंधों के निर्वाह में हमारा समाज अधिक स्थायी है, एक कष्ट पर दसियों हाथ सहायता करने को तत्पर रहते हैं। तो क्या हम भौतिकता की आधारभूत आवश्यकताओं पर भी ध्यान न दें, सन्तोष की चादर ओढ़ अपने सांस्कृतिक वर्चस्व के स्वप्न देखें? पृथु के पास एक मोटी पुस्तक है, टॉप टेन ऑफ ऐवरीथिंग, उसमें वह देखता है कि अपना देश विकास के मानकों के आधार पर पाश्चात्य देशों के सामने कहीं नहीं टिकता है, पूछता है कि हम सबमें पीछे क्यों हैं? क्या उसको यह बताना ठीक रहेगा कि विवाह तक तो यहाँ का युवा अपने हर निर्णय के लिये अपने बड़ों का मुँह ताकता रहता है, यौवन भर औरों के द्वारा प्रायोजित और संरक्षित जीवन जीता है, प्रौढ़ होते ही असहाय हो अन्त ताकने लगता है और आध्यात्मिक हो जाता है। कब उसे समय मिलता है अपने स्वप्न देखने का, उन्हें साकार करने का? संभावित ऊर्जा सदा ही संभावना बनी रहती है, कोई आकार नहीं ले पाती है।

हम इस भय में जीते रहते हैं कि हमें अपने बच्चों और आने वाली पीढ़ी के लिये सुविधामयी जीवन संजो के जाना है, वही भय हमारे बच्चों में मूर्तरूप ले जी रहा है। सब के सब सधे भविष्य की ओर भागे जा रहे हैं, स्थापित तन्त्रों के सेवार्थ, उन तन्त्रों में जुत जाना चाहते हैं जो विश्व में बहुत नीचे हैं। हजारों की एक ऐसी सेना तैयार हो जिनके मन में दिवा स्वप्न हों, श्रेष्ठतम और उत्कृष्टतम पा जाने की उद्दाम ललक हो, हर ऐसे क्षेत्र में देश को स्थापित करने का विश्वास हो जिनके लिये हम जीभ लपलपाते रहते हैं। इस तरह की शक्ति तो एक दिन में चमत्कारस्वरूप मिलने से रही, बच्चे रोजगार ढूढ़ने में लगे रहे तो रोजगार के अतिरिक्त कुछ पा भी नहीं पायेंगे, देश में नहीं मिलेगा तो विदेश सरक जायेंगे।

हमारा देश सर्वाधिक युवा देश है, कारण है कि बच्चे अधिक हैं। अब दो विकल्प हैं, या तो बच्चों को अतिसंरक्षित जीवन जिलाते रहें और भविष्य में जब प्रतियोगिता की मारकाट अपने चरम पर होगी, उन्हें उन पर ही छोड़ दिया जाय, भाग्य के भरोसे। एक पतले रास्ते पर भला कितने लोग चल पायेंगे? दूसरा विकल्प यह है कि अपने बच्चों को दृढ़ और सशक्त बनायें जिससे न केवल वे अपनी राह गढ़ेंगे वरन न जाने कितनों को अपने साथ लेकर चलेंगे।

निर्णय आपको करना है कि बच्चों के निर्णय कौन लेगा? निर्णय आपको करना है कि बच्चों की संस्कृति क्या हो? निर्णय आपको करना है कि संस्कृतियों के बन्द किलों में ही बच्चे रहें या सबके ऊपर उड़ें, आसमान में? निर्णय आपको करना है कि संस्कृति को बचाये रखने वाले बचे रहें और संस्कृति को बचाये रखे या संस्कृति में सिमटे हुये विश्वपटल से अवसान कर जायें? भविष्य के निर्णय तो आज के बच्चे लेंगे, पर उन्हें इस योग्य बनाने के निर्णय आपको लेने हैं, आज ही।

3.10.12

मैं समय की भँवर में हूँ

परिस्थितियों में बँधा मैं, राह मेरी बनी कारा,
श्रव्य केवल प्रतिध्वनियाँ, यदि किसी को भी पुकारा,
देखना है, और कब तक, स्वयं तक फिर पहुँचता हूँ?
मैं समय की भँवर में हूँ ।।१।।

और देखो, जीवनी-क्रम, स्वतः घटता जा रहा है,
उदित सूरज जो अभी था, अस्त होता जा रहा है,
रात-दिन के बीच सारा, बचा जो जीवन लुटा दूँ?
मैं समय की भँवर में हूँ ।।२।।

कभी मन में हूक उठती, ध्येय का दीपक कहाँ है,
जो विचारों से बनाया, मार्ग अभिलाषित कहाँ है,
काल सागर के थपेड़े, स्वयं को निष्क्रिय, भुला दूँ?
मैं समय की भँवर में हूँ ।।३।।

और यूँ बहती नदी में, स्वयं को यदि छोड़ दूँगा,
क्या रहे पहचान मेरी, और क्या परिचय कहूँगा,
धिक है यौवन, काल संग ना, हाथ दो दो आज कर लूँ।
मैं समय की भँवर में हूँ ।।४।।