इस प्रश्न से होकर निकला हूँ और निर्णय के बाद एक वर्ष का समय मिला है यह समझने के लिये कि जो निर्णय लिया, वह अपनी अपेक्षाओं पर खरा उतरा कि नहीं? प्रश्न बस यही था कि लैपटॉप लें या टैबलेट या दोनों? अनुभव के आधार पर इसका उत्तर समझने के लिये इसमें एक विमा और जोड़ देते हैं, मोबाइल की, क्योंकि बिना उसको परिधि में लिये उत्तर पूरा नहीं होगा। पर उस निर्णय के पहले अनुभव और समझ के क्या आधार निर्मित हुये हैं, यह समझना और उसे व्यक्त करना मेरे लिये आवश्यक हो चला है।
बड़ी लम्बी डिजिटल यात्रा रही है, अब तक की, १९८५ में कम्प्यूटर, १९९५ में डेस्कटॉप, २००३ में मोबाइल, २००७ में लैपटॉप। यदि किसी विषय में मन स्थायी लगा रहा तो यही एक डिजिटल व्यसन रहा है। जी भर के प्रयोग किये हैं, जी भर के धन खर्च किया, जी भर कर समय न्योछावर किया और यदि माताजी के शब्दों में कहूँ तो, 'वैसे तो लड़का शान्त रहता है पर इलेक्ट्रॉनिक सामान देख कर पगला जाता है।' व्यसन होते ही ऐसे हैं जो न तो समझे जा सकते हैं और न ही समझाये जा सकते हैं, पर तकनीक के अग्रतम द्वार पर बैठकर विश्व को देखना सदा ही मन को लुभाता रहा है। संग्रह जुटाते समय बस यही दर्शन रहा है कि जीवन में वस्तुयें कम से कम हों पर जो भी हों, अपनी श्रेणी में श्रेष्ठतम हों।
सलाह भी सदा यही देता हूँ। आवश्यकता के अनुसार यदि कोई निम्नतर वस्तु लेंगे तो तकनीक का अधिकतम लाभ नहीं ले पायेंगे। तकनीक न केवल आपके वर्तमान कार्यों को सरल करने के लिये है, वरन उन कार्यों को नये ढंग से करने के लिये भी है। यदि आवश्यकता के अनुसार मोबाइल का उपयोग करते तो उससे अभी तक फोन ही कर रहे होते। किसी भी उपकरण का उपयोग उसकी क्षमतानुसार करना चाहिये। देशी भाषा में कहा जाये तो अभी तक जितने भी उपकरण लिये हैं, उनसे पूरा पैसा वसूल लिया है, पूरा रगड़ कर उपयोग किया है। उपकरणों का आग्रह मेरे लिये न केवल रोचकता का आश्रय रहा है, वरन उपयोगिता के दर्शन का जीवन में प्रक्षेपण भी।
बिना इन उपकरणों के जीवन चल ही रहा था, न उतना गतिमय, न उतना विस्तारित, पर फिर भी चल ही रहा था। लोगों से बात होती थी, फिल्में देखने सिनेमाहॉल जाते थे, रामलीला देखने को मिलती थी, गाने भी सुनने को मिलते थे, पुस्तकें अल्मारियों में थीं, मोहल्ले भर में संवाद होता था, गर्मी की छुट्टियों में संबंधियों के घर आना जाना होता था। तकनीक ने सहसा हमें सुझाया कि अपने भौतिक परिवेश के परे भी सतत संवाद संभव है। हमने स्वीकार कर लिया और गढ़ने लगे एक ऐसा विश्व जिसमें सब कुछ तरंगों पर चलता था, सब कुछ कहीं भी रखा जा सकता था, कोई सीमा नहीं, कोई बंधन नहीं।
उत्साह संक्रामक होता है, सब कुछ इस नवनिर्मित विश्व में समेट लेने का उत्साह सर चढ़ बोला, धीरे धीरे माध्यम बदलने लगे, हर संभव वस्तु नये विश्व पहुँचने लगी। पत्र, पुस्तक, ज्ञान, संगीत, फिल्म आदि अपना रूप बदलने लगे, सिकुड़कर नये विश्व पहुँच गये। माध्यम बदलने से व्यवसायों का स्वरूप बदलने लगा। सब अधिक गतिमय हो गया। गतिमयता अधिकता का आधार लायी, हर क्षेत्र में अधिक लोगों की उपस्थिति ने गतिमयता को और ऊर्जामय कर दिया। अब स्थिति यह है कि सीमायें नगण्य हैं, संभावनायें असीमित हैं, नियन्त्रण सिमट कर आपके सामने रखी स्क्रीन तक आ गया है।
इस परिप्रेक्ष्य में देखें तो आधुनिक मनुष्य अपनी बाध्यताओं से परे जीना चाहता है, कोई बंधन नहीं। हम भी कुछ ऐसा ही स्वप्न देखना चाहते हैं। मेरे लिये इस नये विश्व के दो ही आधारभूत बिन्दु हैं। पहला, प्रयासों की सततता बनी रहे। अर्थ यह कि हाथ में जो भी उपकरण रहे उसके माध्यम से मैं अपना कोई भी कार्य कर सकूँ और यदि कहीं पहुँच कर उपकरण बदले तो थोड़ी देर पहले किये प्रयास व्यर्थ न जायें या उन प्रयासों को उपकरणों के बीच स्थानान्तरित करने में समय व्यर्थ न हो। दूसरा, किसी भी स्थान विशेष का बन्धन न हो, हर स्थान से कार्य करने की सहजता हो। एक लेखक के रूप में देखूँ तो कहीं भी लिख सकूँ, किसी पुराने लेख को संपादित कर सकूँ, कहीं भी कुछ पढ़ सकूँ और किसी भी उपकरण में ये उपरोक्त काम कर सकूँ। एक प्रशासक के रूप में तन्त्र की स्थिति पर दृष्टि, उससे संबंधित विषयों को पढ़ सकने या पुराने संदर्भों को टटोल सकने की सुविधा और अन्ततः निर्णय लेने और उसे प्रेषित करने की सुविधा। उससे भी अधिक महत्वपूर्ण है कि एक लेखक से प्रशासक और प्रशासक से लेखक के बीच अपने को त्वरित स्थापित कर लेने की सुविधा, कहीं पर भी, कभी भी।
ऐसा लग सकता है कि कुछ अधिक ही माँग रहा हूँ तकनीक से। तकनीक यदि सक्षम नहीं होती तो संभवतः यह अपेक्षायें रखता ही नहीं। हमारी अपेक्षायें ही तकनीक की दिशा निर्धारित करती हैं, नये उत्पाद को बनाने वालों के मन में यही आधार रहता होगा कि किस तरह चाँद लाकर धरती पर रख दिया जाये। इसीलिये सबको सलाह भी देता हूँ कि उपकरण की क्षमता पहचान कर अपने काम करने की विधि में बदलाव लाओ, प्रयोग करो, सफल न हो तो प्रयोग परिमार्जित करो, फिर भी असफलता लगे तो उससे कुछ सीख कर नये प्रयोगों में लग जाओ।
जब इस समग्रता से उपकरणों को देखा जायेगा, तब ही उनकी उपयोगिता आपके जीवन को सार्थकता से प्रभावित करेगी। तकनीक को जीवन के कई पक्षों में समाहित करने का ही उत्साह है जिसे माताजी हमारे पगलाने का कारण मान लेती हैं। तकनीक का समावेश जीवन में अधिकतम हो, इसके लिये अपने लिये कई कठिन नियम नियत कर लिये थे और उनका अब तक यथासंभव अनुपालन भी कर रहा हूँ।
कागज में कुछ भी नहीं लिखता हूँ, सुबह परिचालन संबंधी तथ्य लिखने हों, बैठक के समय निर्देश लिखने हों, कार्यों की समीक्षा करनी हो, लेखन करना हो, कोई पंक्ति लिखनी हो, कोई कार्य याद रखना हो, सब का सब सीधा मोबाइल या लेपटॉप पर। २००३ के पहले का समय कागज से भरा पूरा था, कोई कार्य न जाने कितने कागजों में झलकता था, संपादित करने में न जाने कितने कागज शहीद हो जाते थे। धीरे धीरे यह लगा कि तकनीक कागज को पूर्णतया बचाने में सक्षम है, विधियाँ विकसित होती गयीं और अब सब सहज हो गया है। निरीक्षण रिपोर्ट मोबाइल पर ही टाइप हो जाती है और ईमेल से प्रेषित भी। दूसरा छोर भी विकसित होने पर अनुपालन रिपोर्ट भी डिजिटल माध्यम से आने लगेगी। मुझे यह भी याद नहीं आता है कि तीन वर्ष की ब्लॉग यात्रा में कभी कागज में कुछ लिखा हो, सब का सब मोबाइल पर या लैपटॉप पर।
बहुत प्रयोग हो चुके हैं, बहुत होने शेष हैं, पर ध्येय पूर्णतया स्पष्ट है। तकनीक के श्रेष्ठतम पक्षों का उपयोग करना है, न केवल वर्तमान कार्यों को सरलता से करने के लिये, वरन नयी विधियों से करने के लिये भी। दिशा उलझाने वाली नहीं, सुलझाने वाली होगी। उपकरण एक भार नहीं, हल्कापन लाने के लिये होंगे। जीवन में जटिलता नहीं, सरलता स्थापित करनी है।
लैपटॉप या टैबलेट के निर्णय में यह सारे पक्ष अपना अपना महत्व रखेंगे, वह अगली पोस्ट में।
(इस विषय के उत्प्रेरक ईपंडित श्रीश बेंजवाल शर्माजी रहे हैं। तकनीक संबंधी विषयों को स्पष्ट कर, सबको समझाने में उनके अथक प्रयास ब्लॉग के इतिहास में अपना स्थायी स्थान बनायेंगे।)