Showing posts with label सरलता. Show all posts
Showing posts with label सरलता. Show all posts

28.6.14

व्यर्थ ही

शान्त, तृप्त, कर्मालु, व्यवस्थित,
मन की मृगतृष्णा से दूर ।
ऐसा एक व्यक्तित्व जगा लूँ,
अब तो मेरा ध्येय यही है ।।१।।

व्यर्थ तृषा की बलिवेदी पर,
और समय का अर्पण करना ।
अन्त्य क्षुधा कर ले परिपूरित,
द्विजजन का सिद्धान्त यही है ।।२।।

व्यर्थ शब्द के मकर जाल मे,
जीवन का सारल्य फँसाना ।
शब्द-खोज तज अर्थ समझ ले,
न्यून श्रमेच्छुक मार्ग यही है ।।३।।

व्यर्थ कष्ट की आशंका से,
कर्म-पुण्य क्यों करूँ तिरोहित ।
स्वेद बिन्दु के उजले मोती,
जीवन का श्रृंगार यही है ।।४।।

व्यर्थ सुखों की अभिलाषा में,
अंधकूप में घुसते जाना ।
मदिरा का सुख छोड़ क्षणिक जो,
जीवन जल का पान सही है ।।५।।

19.4.14

जीवनी अलमस्त हो

मगन हो अपने विचारों के किनारों में,
जीवनी अलमस्त हो चुपचाप बहती जा रही थी ।
कहीं पर गाम्भीर्य की गहराइयों का,
और उत्श्रंखल विनोदों का कहीं मिश्रण बनी थी ।
कहीं पर हो संकुचित व्यवधान से,
और समतल में कहीं विस्तार की जननी बनी थी ।
वक्रता के थे किनारे इस जगत में,
काटती रहती उन्हें, उस वक्रता से रहित करती ।
मार्ग के सब अनुभवों का रस समेटे,
हो बड़ी निश्चिन्त वह जीवन समर में जा रही थी ।

किन्तु तब नियमित कलापों से व्यथित हो,
मनदशा रसहीनता को अग्रसर थी ।
इस असत भू के हृदय में सत्य क्या है,
मनस सागर में दबी इच्छा प्रबल थी ।।

व्यक्ति का जीवन विरह है,
इस विरह का सत्य क्या है ?
सतत मानव से विलग उस,
तत्व का अस्तित्व क्या है ?
शान्त सब जीवन बिताते,
किन्तु उसमें सत्व क्या है ?
अन्ध जीवन की दशा पर,
सत्य का वक्तव्य क्या है ?

ज्ञान की हैं कठिन राहें,
तर्क के कंकड़ बिछे हैं,
पथ प्रदर्शक भी नहीं है,
सत्य-चिन्तन चिर असम्भव ।

इन विचारों के प्रचण्डित धुन्ध में,
जीवनी भी पन्थ अपना खो रही है ।
बहु-प्रतीक्षित सत्य भी यदि सरल न हो,
तो मुझे उस सत्य की इच्छा नहीं है ।।

जीवनी अलमस्त हो चुपचाप बहना चाहती है ।
चित्र साभार - freehdw.com

17.10.12

लैपटॉप या टैबलेट - निर्णय प्रक्रिया

इस प्रश्न से होकर निकला हूँ और निर्णय के बाद एक वर्ष का समय मिला है यह समझने के लिये कि जो निर्णय लिया, वह अपनी अपेक्षाओं पर खरा उतरा कि नहीं? प्रश्न बस यही था कि लैपटॉप लें या टैबलेट या दोनों? अनुभव के आधार पर इसका उत्तर समझने के लिये इसमें एक विमा और जोड़ देते हैं, मोबाइल की, क्योंकि बिना उसको परिधि में लिये उत्तर पूरा नहीं होगा। पर उस निर्णय के पहले अनुभव और समझ के क्या आधार निर्मित हुये हैं, यह समझना और उसे व्यक्त करना मेरे लिये आवश्यक हो चला है।

बड़ी लम्बी डिजिटल यात्रा रही है, अब तक की, १९८५ में कम्प्यूटर, १९९५ में डेस्कटॉप, २००३ में मोबाइल, २००७ में लैपटॉप। यदि किसी विषय में मन स्थायी लगा रहा तो यही एक डिजिटल व्यसन रहा है। जी भर के प्रयोग किये हैं, जी भर के धन खर्च किया, जी भर कर समय न्योछावर किया और यदि माताजी के शब्दों में कहूँ तो, 'वैसे तो लड़का शान्त रहता है पर इलेक्ट्रॉनिक सामान देख कर पगला जाता है।' व्यसन होते ही ऐसे हैं जो न तो समझे जा सकते हैं और न ही समझाये जा सकते हैं, पर तकनीक के अग्रतम द्वार पर बैठकर विश्व को देखना सदा ही मन को लुभाता रहा है। संग्रह जुटाते समय बस यही दर्शन रहा है कि जीवन में वस्तुयें कम से कम हों पर जो भी हों, अपनी श्रेणी में श्रेष्ठतम हों।

सलाह भी सदा यही देता हूँ। आवश्यकता के अनुसार यदि कोई निम्नतर वस्तु लेंगे तो तकनीक का अधिकतम लाभ नहीं ले पायेंगे। तकनीक न केवल आपके वर्तमान कार्यों को सरल करने के लिये है, वरन उन कार्यों को नये ढंग से करने के लिये भी है। यदि आवश्यकता के अनुसार मोबाइल का उपयोग करते तो उससे अभी तक फोन ही कर रहे होते। किसी भी उपकरण का उपयोग उसकी क्षमतानुसार करना चाहिये। देशी भाषा में कहा जाये तो अभी तक जितने भी उपकरण लिये हैं, उनसे पूरा पैसा वसूल लिया है, पूरा रगड़ कर उपयोग किया है। उपकरणों का आग्रह मेरे लिये न केवल रोचकता का आश्रय रहा है, वरन उपयोगिता के दर्शन का जीवन में प्रक्षेपण भी।

बिना इन उपकरणों के जीवन चल ही रहा था, न उतना गतिमय, न उतना विस्तारित, पर फिर भी चल ही रहा था। लोगों से बात होती थी, फिल्में देखने सिनेमाहॉल जाते थे, रामलीला देखने को मिलती थी, गाने भी सुनने को मिलते थे, पुस्तकें अल्मारियों में थीं, मोहल्ले भर में संवाद होता था, गर्मी की छुट्टियों में संबंधियों के घर आना जाना होता था। तकनीक ने सहसा हमें सुझाया कि अपने भौतिक परिवेश के परे भी सतत संवाद संभव है। हमने स्वीकार कर लिया और गढ़ने लगे एक ऐसा विश्व जिसमें सब कुछ तरंगों पर चलता था, सब कुछ कहीं भी रखा जा सकता था, कोई सीमा नहीं, कोई बंधन नहीं।

उत्साह संक्रामक होता है, सब कुछ इस नवनिर्मित विश्व में समेट लेने का उत्साह सर चढ़ बोला, धीरे धीरे माध्यम बदलने लगे, हर संभव वस्तु नये विश्व पहुँचने लगी। पत्र, पुस्तक, ज्ञान, संगीत, फिल्म आदि अपना रूप बदलने लगे, सिकुड़कर नये विश्व पहुँच गये। माध्यम बदलने से व्यवसायों का स्वरूप बदलने लगा। सब अधिक गतिमय हो गया। गतिमयता अधिकता का आधार लायी, हर क्षेत्र में अधिक लोगों की उपस्थिति ने गतिमयता को और ऊर्जामय कर दिया। अब स्थिति यह है कि सीमायें नगण्य हैं, संभावनायें असीमित हैं, नियन्त्रण सिमट कर आपके सामने रखी स्क्रीन तक आ गया है।

इस परिप्रेक्ष्य में देखें तो आधुनिक मनुष्य अपनी बाध्यताओं से परे जीना चाहता है, कोई बंधन नहीं। हम भी कुछ ऐसा ही स्वप्न देखना चाहते हैं। मेरे लिये इस नये विश्व के दो ही आधारभूत बिन्दु हैं। पहला, प्रयासों की सततता बनी रहे। अर्थ यह कि हाथ में जो भी उपकरण रहे उसके माध्यम से मैं अपना कोई भी कार्य कर सकूँ और यदि कहीं पहुँच कर उपकरण बदले तो थोड़ी देर पहले किये प्रयास व्यर्थ न जायें या उन प्रयासों को उपकरणों के बीच स्थानान्तरित करने में समय व्यर्थ न हो। दूसरा, किसी भी स्थान विशेष का बन्धन न हो, हर स्थान से कार्य करने की सहजता हो। एक लेखक के रूप में देखूँ तो कहीं भी लिख सकूँ, किसी पुराने लेख को संपादित कर सकूँ, कहीं भी कुछ पढ़ सकूँ और किसी भी उपकरण में ये उपरोक्त काम कर सकूँ। एक प्रशासक के रूप में तन्त्र की स्थिति पर दृष्टि, उससे संबंधित विषयों को पढ़ सकने या पुराने संदर्भों को टटोल सकने की सुविधा और अन्ततः निर्णय लेने और उसे प्रेषित करने की सुविधा। उससे भी अधिक महत्वपूर्ण है कि एक लेखक से प्रशासक और प्रशासक से लेखक के बीच अपने को त्वरित स्थापित कर लेने की सुविधा, कहीं पर भी, कभी भी।

ऐसा लग सकता है कि कुछ अधिक ही माँग रहा हूँ तकनीक से। तकनीक यदि सक्षम नहीं होती तो संभवतः यह अपेक्षायें रखता ही नहीं। हमारी अपेक्षायें ही तकनीक की दिशा निर्धारित करती हैं, नये उत्पाद को बनाने वालों के मन में यही आधार रहता होगा कि किस तरह चाँद लाकर धरती पर रख दिया जाये। इसीलिये सबको सलाह भी देता हूँ कि उपकरण की क्षमता पहचान कर अपने काम करने की विधि में बदलाव लाओ, प्रयोग करो, सफल न हो तो प्रयोग परिमार्जित करो, फिर भी असफलता लगे तो उससे कुछ सीख कर नये प्रयोगों में लग जाओ।

जब इस समग्रता से उपकरणों को देखा जायेगा, तब ही उनकी उपयोगिता आपके जीवन को सार्थकता से प्रभावित करेगी। तकनीक को जीवन के कई पक्षों में समाहित करने का ही उत्साह है जिसे माताजी हमारे पगलाने का कारण मान लेती हैं। तकनीक का समावेश जीवन में अधिकतम हो, इसके लिये अपने लिये कई कठिन नियम नियत कर लिये थे और उनका अब तक यथासंभव अनुपालन भी कर रहा हूँ।

कागज में कुछ भी नहीं लिखता हूँ, सुबह परिचालन संबंधी तथ्य लिखने हों, बैठक के समय निर्देश लिखने हों, कार्यों की समीक्षा करनी हो, लेखन करना हो, कोई पंक्ति लिखनी हो, कोई कार्य याद रखना हो, सब का सब सीधा मोबाइल या लेपटॉप पर। २००३ के पहले का समय कागज से भरा पूरा था, कोई कार्य न जाने कितने कागजों में झलकता था, संपादित करने में न जाने कितने कागज शहीद हो जाते थे। धीरे धीरे यह लगा कि तकनीक कागज को पूर्णतया बचाने में सक्षम है, विधियाँ विकसित होती गयीं और अब सब सहज हो गया है। निरीक्षण रिपोर्ट मोबाइल पर ही टाइप हो जाती है और ईमेल से प्रेषित भी। दूसरा छोर भी विकसित होने पर अनुपालन रिपोर्ट भी डिजिटल माध्यम से आने लगेगी। मुझे यह भी याद नहीं आता है कि तीन वर्ष की ब्लॉग यात्रा में कभी कागज में कुछ लिखा हो, सब का सब मोबाइल पर या लैपटॉप पर।

बहुत प्रयोग हो चुके हैं, बहुत होने शेष हैं, पर ध्येय पूर्णतया स्पष्ट है। तकनीक के श्रेष्ठतम पक्षों का उपयोग करना है, न केवल वर्तमान कार्यों को सरलता से करने के लिये, वरन नयी विधियों से करने के लिये भी। दिशा उलझाने वाली नहीं, सुलझाने वाली होगी। उपकरण एक भार नहीं, हल्कापन लाने के लिये होंगे। जीवन में जटिलता नहीं, सरलता स्थापित करनी है।

लैपटॉप या टैबलेट के निर्णय में यह सारे पक्ष अपना अपना महत्व रखेंगे, वह अगली पोस्ट में।

(इस विषय के उत्प्रेरक ईपंडित श्रीश बेंजवाल शर्माजी रहे हैं। तकनीक संबंधी विषयों को स्पष्ट कर, सबको समझाने में उनके अथक प्रयास ब्लॉग के इतिहास में अपना स्थायी स्थान बनायेंगे।)

7.9.11

हिन्दी उत्थान और सहजता

घर में 'सब' चैनल के कार्यक्रम अधिक चलते हैं, हल्के फुल्के रहते हैं, परिवार के साथ बैठ कर देखे जा सकते हैं, बच्चों को भी सुहाते हैं, भारतीय परिवेश की सामान्य जीवनशैली पर आधारित होते हैं, स्वस्थ मनोरंजन प्रदान करते हैं और कृत्रिमता से कोसों दूर होते हैं। मनोरंजन का अर्थ ही है कि आपके मन के कोमल भावों को गुदगुदाया जाये, कभी किसी परिस्थिति द्वारा, कभी किसी चरित्र के हाव भाव द्वारा, कभी किसी उहापोह से, कभी हास्य से, कभी बलवती आशाओं से, कभी क्षणिक निराशाओं से।

हो सकता है कि कभी हास्य का कोई रूप आपको थोड़ा हीन लगे पर संदर्भों के प्रवाह में वह भी मनोरंजन बनकर बह जाता हो, बिना कोई विशेष क्षोभ उत्पन्न किये हुये। ऐसा ही कुछ मुझे भी खटकता है, सामान्य हास्य नहीं लगता है। कुछ धारावाहिकों में एक ऐसा चरित्र दिखाया जाता है जो बड़ी संस्कृतनिष्ठ हिन्दी बोलता है, छोटी बातों को भारी भरकम शब्दों से व्यक्त करता है, औरों को वह समझ में नहीं आता है, तब कोई समझदार सा लगने वाला चरित्र उसे सरल हिन्दी या अंग्रेजी में बता देता है, अन्य हँस देते हैं। आपके सामने वह हास्य और विनोद समझ कर परोस दिया जाता है।

धीरे धीरे यह धारणा बनायी जा रही है कि हिन्दी एक ऐसी भाषा है जो संवाद और संप्रेषण योग्य नहीं है, जो वैज्ञानिक नहीं है, जो आधुनिक नहीं हैं। किसी तार्किक आधार की अनुपस्थिति में भी यह हल्का सा लगने वाला परिहास ही उस धारणा को स्थायी रूप देने लगता है। 

सरल भव, सहज भव
अति उत्साही हिन्दी-बुद्धिजीवियों को अपने संश्लिष्ट ज्ञान से हिन्दी को पीड़ा पहुँचाते हुये देखता हूँ, सरल से शब्दों को क्लिष्टता के आवरण से ढाँकते हुये देखता हूँ, शब्दों के अन्दर ही क्रियात्मकता और इतिहास ठूँस देने का प्रयास करते हुये देखता हूँ। उपर्युक्त कारणों से जब हिन्दी का मजाक उड़ाया जाता है, तो क्रोध भी आता है और दुख भी होता है। क्रिकेट और रेलगाड़ी जैसे सरल शब्दों पर किये गये अनुप्रयोग इस मूढ़ता के जीवन्त उदाहरण हैं, समझ में नहीं आता है कि वे भाषा का भला कर रहे हैं या उपहास कर रहे हैं। आप ही बताईये कि 'माइक्रोसॉफ्ट' को हिन्दी में 'अतिनरम' क्यों लिखा जाये?

अगली बार इस तरह की मूढ़ता सुने तो विरोध अवश्य करे और प्रयास कर उन्हें सही शब्द भी बतायें। जो अवधारणायें नयी हैं, उनसे सम्बद्ध शब्द अन्य भाषाओं से लेते रहना चाहिये, उन अवधारणाओं के स्थानीय विकास के लिये। अंग्रेजी भी तो न जाने कितनी भाषाओं के शब्दों से भरी पड़ी है। बिना हलचल भाषाओं को भी स्वास्थ्य प्राप्त ही नहीं हो सकता, सजा कर रख दीजिये किसी जीवित प्राणी कोकुछ ही दिनों में कृशकाय हो जायेगा। हम अपनी माँदों से बाहर निकलेंप्रयोगों के खेल खेलेंनये शब्दों के खेल खेलेंसरलता आयेगी भाषा में, जनप्रियता आयेगी भाषा में, संभवतः वही भाषा का स्वास्थ्य भी होगा।

यह भी उचित नहीं होगा कि जिसका जैसा मन हो वह हिन्दी में अनुप्रयोग करे और हिन्दी में जो शब्द प्रचलित है उन्हें भी अन्य भाषाओं से बदल दे। अपनी तिजोरी देखने के पहले औरों से भीख माँगने की आदत, जो कई अन्य क्षेत्रों में है, हिन्दी में न लायी जाये। जिस देश में 12% जन भी अंग्रेजी नहीं समझते हैं, उन्हें नये अंग्रेजी शब्द याद कराने से अधिक सरल होगा उपस्थित हिन्दी शब्दों को अधिक उपयोग में लाना। जब अन्य भारतीय भाषाओं में उन शब्दों का प्रयोग हो रहा हो तो अंग्रेजी शब्द आयातित करना बौद्धिक भ्रष्टाचार सा लगता है। कई तथाकथित प्रबुद्ध हिन्दी समाचार पत्र इस प्रवृत्ति के पोषक बने हुये हैं।

हो सकता है कि हिन्दी उत्थान पर यह पोस्ट आपको उपदेशात्मक लगे, हिन्दी जैसे व्यक्तिगत विषयों पर टीका टिप्पणी करने जैसी लगे, क्रोध भी आये, पर इस पर विचार अवश्य हो कि क्या हिन्दी भाषा इस प्रकार के हास्य का विषय हो सकती है?

चित्र साभार - lalitdotcom.blogspot.com

18.6.11

स्वप्न मेरे

स्वप्न देखने में कोई प्रतिबन्ध नहीं है। वास्तविकता कितना ही द्रवित कर दे, सुधार के उपाय मृगतृष्णावत कितना भी छकाते रहें, पाँच वर्ष पहले किये गये वादों की ठसक भले ही कितनी पोपली हो गयी हो, किलो भर के समाचारपत्र कितना ही अपराधपूरित हो जायें, भविष्य के चमकीले स्वप्न देखने का अधिकार हमसे कोई नहीं छीन सकता है, देखते रहे हैं और देखते रहेंगे। कोई कह सकता है कि संविधान के अनुच्छेद 14 में सबको समानता का अधिकार है और जब कोई भी स्वप्न देखने योग्य बचा ही नहीं तब आप क्यों अपनी नींद में व्यवधान डाल रहे हैं? संविधान का विधान सर माथे, पर क्या करें आँख बन्द होते ही स्वप्न तैरने लगते हैं।

स्वप्न सदा ही बड़े होते हैं, हर अनुपात में। अथाह सम्पदा, पूर्ण सत्ता, राजाओं की भांति, 'यदि होता किन्नर नरेश मैं' कविता जैसा स्वप्न। सामान्य जीवन के सामान्य से विषयों को स्वप्न देखने के लिये चुनना स्वप्नशीलता का अपमान है। राह चलते किसी को प्यार से दो शब्द कह देना स्वप्न का विषय नहीं हो सकता है, पति-पत्नी के प्रेम का स्थायित्व स्वप्न का विषय नहीं हो सकता है, एक सरल या सहज सी जीवनी स्वप्न का विषय नहीं हो सकती है, स्वप्न तो ऐश्वर्य में मदमाये होते हैं, स्वप्न तो प्राप्ति के उद्योग में अकुलाये होते हैं।

मैं अपने स्वप्नों के बारे में सोचता हूँ। पता नहीं, पर मुझे इतने भारी स्वप्न आते ही नहीं हैं? बड़ा प्रयास करता हूँ कि कोई बड़ा सा स्वप्न आये, गहरी साँस भरता हूँ, आकाश की विशालता से एकीकार होता हूँ, पर जब आँख बन्द करता हूँ तो आते हैं वही, हल्के फुल्के से स्वप्न। मेरे स्वप्नों में एक हल्का फुल्का सा प्रफुल्लित बचपन होता है, प्रेमपगा परिवार होता है, कर्मनिरत दिन का उजाला होता है और शान्ति में सकुचायी निश्चिन्त सी रात्रि होती है। इसके बाहर जाने में ऐसा लगता है कि जीवन सीमित सा हो जायेगा।

जटिलताओं का भय मेरे चिन्तन का उत्प्रेरक है, यदि सब सरल व सहज हो जाये तो संभवतः मुझे चिन्तन की आवश्यकता ही न पड़े। प्रक्रियाओं के भारीपन में मुझे न जाने कितने जीवन बलिदान होते से दिखते हैं। व्यवस्था जब सरलता में गरलता घोलने लगती है, मन उखड़ सा जाता है। कभी क्रमों और उपक्रमों से सजी व्यवस्था देखकर हाँफने लगता हूँ, कभी मन ही मन गुनगुनाने लगता हूँ, 'आह भरकर गालियाँ दो, पेट भरकर बददुआ'। उन जटिलताओं का ऑक्टोपस कहीं जकड़ न ले, इसी भय से तुरन्त ही सोचना प्रारम्भ कर देता हूँ। यदि लगता है कि कुछ योगदान कर सकता हूँ तो उस पर और चिन्तन कर लेता हूँ। यही मेरे स्वप्नों की विषयवस्तु हो गयी है, बस प्रक्रियायें सरल हों, राजनीति जन-उत्थान को प्राथमिकता दे, लोक-व्यवहार बिना लाग लपेट के सीधा सा हो, सर्वे भवन्तु सुखिनः वाले स्वप्न।

आप सब भी संभवतः यही चाहते होंगे कि हर जगह पारदर्शिता हो, कहीं शोषण न हो, व्यवस्थायें सरल हों, कोई किसी कार्य को करवाने के लिये पैसा न मांगे। बहुत देशों में जीवन का स्तर इन्हीं छोटी छोटी चीजों से ऊँचा होता गया। हम दुनिया भर की बुद्धि लिये बैठे हैं पर छोटी छोटी चीजों को न अपनाने से विकास-कक्ष के बाहर बैठे अपनी बारी की प्रतीक्षा कर रहे हैं। चाह हम सबकी भी उसी राह की है जो समतल हो। किसी ने कभी उस पर स्वार्थ की कीलें बिखेरी होंगी, एक कील हमें चुभती है और हम क्रोध में आने वालों के लिये कीलें बिखरेना प्रारम्भ कर देते हैं। एक राह जो सुख दे सकती थी, दुखभरी हो जाती है। 

मेरे गहनतम स्वप्नों में मुझे कोई झुका सा दिखता है, उन्हीं समतल राहों में, पास जाकर देखता हूँ चेहरा स्पष्ट नहीं दिखता है, पर उसके हाथ में एक थैला है जिसमें वह राह में पड़ी कीलें समेट रहा है, मैं साथ देने को आगे बढ़ता हूँ, वह कहता है बेटा संभल के, चुभ जायेंगी।

मेरा स्वप्न टूट जाता है।