Showing posts with label डिजिटल. Show all posts
Showing posts with label डिजिटल. Show all posts

27.10.12

डिजिटल जीवनशैली

उपकरण का शाब्दिक अर्थ है, जिसके माध्यम से आपको कार्यों में सहायता मिले। जितनी अधिक सहायता करे, उतना अधिक उपयोगी है उपकरण। आपके डिजिटल जीवन ने आपके लिये एक नया विश्व निर्मित कर दिया है, उस जीवन से जुड़ने के लिये आपको डिजिटल उपकरणों की आवश्यकता होती है। यह एक अलग विषय है कि जीवन का कितना भाग डिजिटल जीवन हो, कई लोग इसे अपनी वर्तमान जीवनशैली और निजता पर एक अनावश्यक हस्तक्षेप मानते हैं, कई लोग इससे एक पल के लिये भी अलग नहीं होना चाहते हैं। यह हो सकता है कि घर आकर मोबाइल बन्द कर देना आपके पारिवारिक जीवन के लिये एक ऊर्जा देने वाला कार्य हो और यह भी संभव है आपके घर से बाहर होने पर वही मोबाइल आपके परिवार के सम्पर्क में सहायक हो, आप निश्चिन्तता से कार्य कर सकें।

जितना भी हो, जिस रूप में भी हो, डिजिटल जीवन का एक निश्चित स्वरूप होता है हर एक के लिये। जब यह प्रारम्भ होता है तब एक दौड़ सी होती है, अधिकाधिक अपना लेने की। धीरे धीरे यह परिवर्धित होता है, परिमार्जित होता, गुणवत्ता पाता है, सीमायें निर्धारित करता है और अन्ततः जीवन का एक अभिन्न अंग बन जाता है। डिजिटल जीवन के जो आधारभूत निर्णय लेने थे, वह ले चुका हूँ, उसे जिस स्वरूप में पहुँचाना था, वहाँ पहुँचा चुका हूँ। अब कोई क्रान्तिकारी आविष्कार जिसकी कल्पना नहीं की है, बस वही कोई परिवर्तन लेकर आयेगा, मेरे डिजिटल जीवन में। इस लेख का आधार मुख्यतः व्यक्तिगत अनुभव है और साथ में वे चर्चायें हैं जो इस विषय में मित्रों और जानकारों के साथ हुयी हैं।

पहले तो यह निश्चित करिये कि जीवन के कौन से पक्ष डिजिटल जीवन को सौंपने हैं, किस मात्रा में और किस गति से। तब यह निश्चित कीजिये कि कम से कम किन उपकरणों से वह संभव है। यदि आपका गाना सुनने की इच्छा है तो देखिये घर में कितने विकल्प उपस्थित हैं। जितने अधिक विकल्प आपने सजा कर रख लिये हैं, डिजिटल जीवन के बारे में आपकी समझ उतनी ही कम है या व्यर्थ करने के लिये उतना ही पैसा अधिक है। हो सकता है कि कई उपकरणों में गाने सुनने की सुविधा हों। यदि ऐसा है तो वह आपकी प्राथमिक आवश्यकता नहीं। इस तरह प्राथमिक उपयोग के उपकरणों के निर्धारण के बाद जो सुविधायें आपको मिलती जायें, उन्हें भी अपनी सूची से हटाते जायें। यह प्रक्रिया कई बार करने से आपके पास कम से कम उपकरण होंगे, सब के सब अधिक महत्वपूर्ण और आपके डिजिटल जीवन को अधिक गुणवत्ता देने में सक्षम।

हिचकिचाहट इस बात की भी हो सकती है कि कौन सा पक्ष डिजिटल जीवन को सौपें, कौन सा नहीं? लगता है कि सहसा सब सौंप दें तो कहीं अव्यवस्था न हो जाये, वहीं दूसरी ओर सावधानी से चलने में मितव्ययता करने में पूरी सुविधायें न मिल पायें और अन्ततः उसी कार्य के लिये एक और उपकरण लेना पड़े। यही वह दुविधा है जहाँ डिजिटल जीवन की समझ बहुत काम आती है, यही वह बिन्दु है जिसे समझने के लिये हमें डिजिटल क्षेत्र में हो रहे बदलाव जानना आवश्यक है। अपनी आवश्यकता और उपकरण की क्षमता का साम्य बिठाना डिजिटल जीवन का आधारभूत नियम है।

कुछ दिन पहले एप्पल के शोरूम में एक जानकार युवा से बात कर रहा था। मेरा प्रश्न बड़ा ही साधारण था। मैं एक ऐसा उपकरण ढूढ़ रहा था, जिसमें लगभग १-२ टेराबाइट की हार्डडिस्क हो, वाईफाई हो, लैन व ब्रॉडबैण्ड से अबाधित सम्पर्क रख सके, टीवी सहित सारे उपकरणों में एक साथ फाइल व मीडिया स्ट्रीमिंग कर सके, लोकल वॉयस मेल रिकॉर्ड करे, टीवी के नियत कार्यक्रम रिकार्ड कर सके और मेरे सारे उपकरणों का बैकअप भी करे। अब बताइये, क्या अधिक मांग कर रहा था, सारी की सारी क्षमतायें तकनीक के पास हैं। हर उपकरण में कुछ न कुछ विशेषता है पर सब का सब बिखरा है और अव्यवस्थित है। हर घर को इस तरह के सर्वर की आवश्यकता है। अभी कोई एक गाना सुनना होता है तो एक अलग रखी हार्डडिस्क की खोज करने लगते हैं, पता लगता है कि पृथु उसमें कोई फिल्म देख रहे हैं। ऐसा सर्वर होने पर जो भी उपकरण आपके हाथ में होगा, उसके माध्यम से आप सारे कार्य कर सकते हैं। जब कभी बाहर जाना हो तो संबंधित फाइलें आदि अपने उपकरण में स्थानान्तरित कर सकते हैं।

इस विषय में मेरी समझ स्पष्ट है, एप्पल ने भी इस तरह का कोई सर्वर विकसित नहीं किया है, पर उस दिन की चर्चा के बाद संभवतः उन्हें उपभोक्ताओं की स्पष्ट समझ के बारे में पता चलेगा। मैं कोई निम्नतर सर्वर खरीद कर अपना धन बर्बाद नहीं करूँगा, प्रतीक्षा करूँगा कि इस तरह का कोई सर्वर बाजार में आये। घर के अन्दर के सारे उपकरण एक विश्व में जियें, आपस में बातचीत करें, एक ही स्रोत से इण्टरनेट लें और एक ही स्थान पर अपने संग्रह रखें। हर व्यक्ति के लिये कम से कम दो उपकरण और चार पाँच सामूहिक उपयोग के उपकरण, लगभग १०-१२ उपकरण अलग अलग दिशाओं में नहीं हाँके जा सकते, उन्हें एक विश्व के अन्दर लाकर व्यवस्थित करना डिजिटल जीवन की आवश्यकता है। ऐसा करने से न केवल उपकरणों की संख्या कम हो जायेगी, वरन उपकरण सरल और सस्ते भी हो जायेंगे।

अपना उदाहरण देने का मन्तव्य आपको भ्रमित करने का नहीं, वरन आपको आपकी आवश्यकतायें इस प्रारूप में सोचने के लिये विवश करने का था। तकनीक आपके वर्तमान कार्यों को किस प्रकार सरल करने में सक्षम है और उसे पाने के लिये कौन सा उपकरण आपके लिये सर्वोत्तम है, यह प्रश्न कठिन नहीं है। फोटो, वीडियो, संगीत, फिल्में, टीवी कार्यक्रम, ये सब मीडिया के अन्तर्गत आते हैं, ये बहुत मेमोरी लेते हैं और मुख्यतः घर पर ही उपयोग में लाये जाते हैं। इन सबको हर जगह ले जाने की आवश्यकता भी नहीं, इनमें से कुछ ही ऐसे होते हैं जो हमें अत्यन्त प्रिय होते हैं और जिन्हे हम खाली समय होने पर सुनना या देखना चाहते हैं। ऐसे मीडिया को हम अपने उपकरणों में रख सकते हैं और समय समय पर उसे बदल भी सकते हैं। उन्हें इण्टरनेट पर रखने का कोई औचित्य नहीं है, क्योंकि समय आने पर यदि डाउनलोड करना पड़ा तो समय बहुत अधिक लगेगा।

मीडिया फाइलों के अतिरिक्त आपके पास जितना भी डिजिटल संग्रह है, वह सब मिलाकर ८-१० जीबी से अधिक नहीं होगा। सारे प्रपत्र, आलेख, टेबल्स, प्रस्तुतियाँ, लेख, कार्यसूची, संपर्क, तिथियाँ, कार्यवृत्त, सब का सब किसी भी उपकरण में आ जायेगा, साथ ही साथ इण्टरनेट पर भी रहेगा, किसी क्लाउड सेवा के माध्यम से। पर ये सब जितने भी उपकरणों में हो, परस्पर सामञ्जस्य बनाये रखें। ऐसा नहीं होने पर अधिक उपकरण आपका बोझ ही बढ़ायेंगे, कम करने की बात तो बहुत दूर की होगी। इन दो प्रकार के पक्षों में डिजिटल जीवन को विभक्त कर उनमें किस प्रकार के उपकरणों को लाना है और उनसे किस प्रकार पूरा कार्य लेना है, यह आपके डिजिटल जीवन की सफलता है।

उपकरण का पूरा उपयोग ही उसका मूल्य है, यदि वह नहीं हो पाया तो आपका डिजिटल जीवन या तो तरंग में जी नहीं पा रहा है या बहुत अधिक खर्च करके पछता रहा है। आपकी डिजिटल जीवनशैली क्या कहती है?

17.10.12

लैपटॉप या टैबलेट - निर्णय प्रक्रिया

इस प्रश्न से होकर निकला हूँ और निर्णय के बाद एक वर्ष का समय मिला है यह समझने के लिये कि जो निर्णय लिया, वह अपनी अपेक्षाओं पर खरा उतरा कि नहीं? प्रश्न बस यही था कि लैपटॉप लें या टैबलेट या दोनों? अनुभव के आधार पर इसका उत्तर समझने के लिये इसमें एक विमा और जोड़ देते हैं, मोबाइल की, क्योंकि बिना उसको परिधि में लिये उत्तर पूरा नहीं होगा। पर उस निर्णय के पहले अनुभव और समझ के क्या आधार निर्मित हुये हैं, यह समझना और उसे व्यक्त करना मेरे लिये आवश्यक हो चला है।

बड़ी लम्बी डिजिटल यात्रा रही है, अब तक की, १९८५ में कम्प्यूटर, १९९५ में डेस्कटॉप, २००३ में मोबाइल, २००७ में लैपटॉप। यदि किसी विषय में मन स्थायी लगा रहा तो यही एक डिजिटल व्यसन रहा है। जी भर के प्रयोग किये हैं, जी भर के धन खर्च किया, जी भर कर समय न्योछावर किया और यदि माताजी के शब्दों में कहूँ तो, 'वैसे तो लड़का शान्त रहता है पर इलेक्ट्रॉनिक सामान देख कर पगला जाता है।' व्यसन होते ही ऐसे हैं जो न तो समझे जा सकते हैं और न ही समझाये जा सकते हैं, पर तकनीक के अग्रतम द्वार पर बैठकर विश्व को देखना सदा ही मन को लुभाता रहा है। संग्रह जुटाते समय बस यही दर्शन रहा है कि जीवन में वस्तुयें कम से कम हों पर जो भी हों, अपनी श्रेणी में श्रेष्ठतम हों।

सलाह भी सदा यही देता हूँ। आवश्यकता के अनुसार यदि कोई निम्नतर वस्तु लेंगे तो तकनीक का अधिकतम लाभ नहीं ले पायेंगे। तकनीक न केवल आपके वर्तमान कार्यों को सरल करने के लिये है, वरन उन कार्यों को नये ढंग से करने के लिये भी है। यदि आवश्यकता के अनुसार मोबाइल का उपयोग करते तो उससे अभी तक फोन ही कर रहे होते। किसी भी उपकरण का उपयोग उसकी क्षमतानुसार करना चाहिये। देशी भाषा में कहा जाये तो अभी तक जितने भी उपकरण लिये हैं, उनसे पूरा पैसा वसूल लिया है, पूरा रगड़ कर उपयोग किया है। उपकरणों का आग्रह मेरे लिये न केवल रोचकता का आश्रय रहा है, वरन उपयोगिता के दर्शन का जीवन में प्रक्षेपण भी।

बिना इन उपकरणों के जीवन चल ही रहा था, न उतना गतिमय, न उतना विस्तारित, पर फिर भी चल ही रहा था। लोगों से बात होती थी, फिल्में देखने सिनेमाहॉल जाते थे, रामलीला देखने को मिलती थी, गाने भी सुनने को मिलते थे, पुस्तकें अल्मारियों में थीं, मोहल्ले भर में संवाद होता था, गर्मी की छुट्टियों में संबंधियों के घर आना जाना होता था। तकनीक ने सहसा हमें सुझाया कि अपने भौतिक परिवेश के परे भी सतत संवाद संभव है। हमने स्वीकार कर लिया और गढ़ने लगे एक ऐसा विश्व जिसमें सब कुछ तरंगों पर चलता था, सब कुछ कहीं भी रखा जा सकता था, कोई सीमा नहीं, कोई बंधन नहीं।

उत्साह संक्रामक होता है, सब कुछ इस नवनिर्मित विश्व में समेट लेने का उत्साह सर चढ़ बोला, धीरे धीरे माध्यम बदलने लगे, हर संभव वस्तु नये विश्व पहुँचने लगी। पत्र, पुस्तक, ज्ञान, संगीत, फिल्म आदि अपना रूप बदलने लगे, सिकुड़कर नये विश्व पहुँच गये। माध्यम बदलने से व्यवसायों का स्वरूप बदलने लगा। सब अधिक गतिमय हो गया। गतिमयता अधिकता का आधार लायी, हर क्षेत्र में अधिक लोगों की उपस्थिति ने गतिमयता को और ऊर्जामय कर दिया। अब स्थिति यह है कि सीमायें नगण्य हैं, संभावनायें असीमित हैं, नियन्त्रण सिमट कर आपके सामने रखी स्क्रीन तक आ गया है।

इस परिप्रेक्ष्य में देखें तो आधुनिक मनुष्य अपनी बाध्यताओं से परे जीना चाहता है, कोई बंधन नहीं। हम भी कुछ ऐसा ही स्वप्न देखना चाहते हैं। मेरे लिये इस नये विश्व के दो ही आधारभूत बिन्दु हैं। पहला, प्रयासों की सततता बनी रहे। अर्थ यह कि हाथ में जो भी उपकरण रहे उसके माध्यम से मैं अपना कोई भी कार्य कर सकूँ और यदि कहीं पहुँच कर उपकरण बदले तो थोड़ी देर पहले किये प्रयास व्यर्थ न जायें या उन प्रयासों को उपकरणों के बीच स्थानान्तरित करने में समय व्यर्थ न हो। दूसरा, किसी भी स्थान विशेष का बन्धन न हो, हर स्थान से कार्य करने की सहजता हो। एक लेखक के रूप में देखूँ तो कहीं भी लिख सकूँ, किसी पुराने लेख को संपादित कर सकूँ, कहीं भी कुछ पढ़ सकूँ और किसी भी उपकरण में ये उपरोक्त काम कर सकूँ। एक प्रशासक के रूप में तन्त्र की स्थिति पर दृष्टि, उससे संबंधित विषयों को पढ़ सकने या पुराने संदर्भों को टटोल सकने की सुविधा और अन्ततः निर्णय लेने और उसे प्रेषित करने की सुविधा। उससे भी अधिक महत्वपूर्ण है कि एक लेखक से प्रशासक और प्रशासक से लेखक के बीच अपने को त्वरित स्थापित कर लेने की सुविधा, कहीं पर भी, कभी भी।

ऐसा लग सकता है कि कुछ अधिक ही माँग रहा हूँ तकनीक से। तकनीक यदि सक्षम नहीं होती तो संभवतः यह अपेक्षायें रखता ही नहीं। हमारी अपेक्षायें ही तकनीक की दिशा निर्धारित करती हैं, नये उत्पाद को बनाने वालों के मन में यही आधार रहता होगा कि किस तरह चाँद लाकर धरती पर रख दिया जाये। इसीलिये सबको सलाह भी देता हूँ कि उपकरण की क्षमता पहचान कर अपने काम करने की विधि में बदलाव लाओ, प्रयोग करो, सफल न हो तो प्रयोग परिमार्जित करो, फिर भी असफलता लगे तो उससे कुछ सीख कर नये प्रयोगों में लग जाओ।

जब इस समग्रता से उपकरणों को देखा जायेगा, तब ही उनकी उपयोगिता आपके जीवन को सार्थकता से प्रभावित करेगी। तकनीक को जीवन के कई पक्षों में समाहित करने का ही उत्साह है जिसे माताजी हमारे पगलाने का कारण मान लेती हैं। तकनीक का समावेश जीवन में अधिकतम हो, इसके लिये अपने लिये कई कठिन नियम नियत कर लिये थे और उनका अब तक यथासंभव अनुपालन भी कर रहा हूँ।

कागज में कुछ भी नहीं लिखता हूँ, सुबह परिचालन संबंधी तथ्य लिखने हों, बैठक के समय निर्देश लिखने हों, कार्यों की समीक्षा करनी हो, लेखन करना हो, कोई पंक्ति लिखनी हो, कोई कार्य याद रखना हो, सब का सब सीधा मोबाइल या लेपटॉप पर। २००३ के पहले का समय कागज से भरा पूरा था, कोई कार्य न जाने कितने कागजों में झलकता था, संपादित करने में न जाने कितने कागज शहीद हो जाते थे। धीरे धीरे यह लगा कि तकनीक कागज को पूर्णतया बचाने में सक्षम है, विधियाँ विकसित होती गयीं और अब सब सहज हो गया है। निरीक्षण रिपोर्ट मोबाइल पर ही टाइप हो जाती है और ईमेल से प्रेषित भी। दूसरा छोर भी विकसित होने पर अनुपालन रिपोर्ट भी डिजिटल माध्यम से आने लगेगी। मुझे यह भी याद नहीं आता है कि तीन वर्ष की ब्लॉग यात्रा में कभी कागज में कुछ लिखा हो, सब का सब मोबाइल पर या लैपटॉप पर।

बहुत प्रयोग हो चुके हैं, बहुत होने शेष हैं, पर ध्येय पूर्णतया स्पष्ट है। तकनीक के श्रेष्ठतम पक्षों का उपयोग करना है, न केवल वर्तमान कार्यों को सरलता से करने के लिये, वरन नयी विधियों से करने के लिये भी। दिशा उलझाने वाली नहीं, सुलझाने वाली होगी। उपकरण एक भार नहीं, हल्कापन लाने के लिये होंगे। जीवन में जटिलता नहीं, सरलता स्थापित करनी है।

लैपटॉप या टैबलेट के निर्णय में यह सारे पक्ष अपना अपना महत्व रखेंगे, वह अगली पोस्ट में।

(इस विषय के उत्प्रेरक ईपंडित श्रीश बेंजवाल शर्माजी रहे हैं। तकनीक संबंधी विषयों को स्पष्ट कर, सबको समझाने में उनके अथक प्रयास ब्लॉग के इतिहास में अपना स्थायी स्थान बनायेंगे।)