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12.6.21

मिल के साथ आयें हम


मिल के साथ आयें हम,

देश को बचायें हम ।

खो गये जो लब्ध शब्द,

पुनः ढूढ़ लायें हम । 

 

केश हैं खुले हुये, द्रौपदी के आज फिर,

पापियों के वक्ष से रक्त सोख लायें हम ।

मिल के साथ आयें हम ।।१।।

 

जंगलों में घूमती, क्यों रहे जनक-सुता,

लांछन लगा रही जो जीभ काट लायें हम ।

मिल के साथ आयें हम ।।२।।

 

प्रेम का स्वरूप क्यों, यूँ छिपा छिपा रहे,

ढूढ़ कर स्वयं उसे, हृदय में बसायें हम ।

मिल के साथ आयें हम ।।३।।

 

मातृ के स्वरूप को, देख कर हर एक में,

गिर रहे चरित्र-मूल्य, उन्हें फिर उठायें हम ।

मिल के साथ आयें हम ।।४।।

 

लाज का जो आवरण, गिर रहा है शीश से,

खुद उठायें, स्वयं ही, हाथ से सजायें हम ।

मिल के साथ आयें हम ।।५।।

 

पीछे पीछे रह गयीं, आज सारी नारियाँ,

मार्ग मे हर एक पग, साथ ही बढ़ायें हम ।

मिल के साथ आयें हम ।।६।।


रही व्यक्त देवियाँ, शूरता में, ज्ञान में,

हर दिवस यही निनाद जागरण बनायें हम।

मिल के साथ आयें हम ।।७।।

 

पुरुष की है पूर्णता, प्रकृति के उछाह पर,

उठें अर्धविश्व को प्रसन्नतम बनायें हम ।

मिल के साथ आयें हम ।।८।।


7.9.13

अगला एप्पल कैसा हो

जब कभी भी एप्पल का नया उत्पाद आने वाला होता है, अपेक्षाओं की एक लम्बी सूची बन जाती है। हो भी क्यों न, किसी भी क्षेत्र में नायकों से यह आशा अवश्य रहती है कि तकनीक के अग्रतम शोधों के निष्कर्ष हमारे हाथों में होंगे। हर बार बात घूम फिर के तीन चार मानकों पर ठहर जाती है। उन्हीं के आधार पर बहसें होती हैं, बहसें क्या विधिवत युद्ध होते हैं, दो तीन मुख्य पाले रहते हैं। अब १० सितम्बर को निष्कर्ष चाहे जो निकले, पर उत्पाद आने के एक माह पहले से ज्ञानचक्षु इतने खुलने लगते हैं कि मन करता है कि एक शोधपत्र ही लिख डालें। शोधपत्र तो नहीं पर उन मानकों की चर्चा अवश्य होनी चाहिये, जो हम सबको समझ में आते हैं और हमारे उपयोग को प्रभावित भी करते हैं।

डेक्सटॉप, लैपटॉप, टैबलेट और मोबाइल, यही चार प्रमुख श्रेणियाँ हैं। डेक्सटॉप अब बीते समय की चीज़ होने वाली है और उसका उपयोग सीमित और विशिष्ट रह गया है। उसमें तकनीकी विकास तो हो रहा है पर वह चर्चा का विशेष बिन्दु नहीं। लैपटॉप में मैकबुक एयर ने पहले ही हल्केपन और बैटरी समय के सशक्त मानक स्थापित कर दिये है और शेष लैपटॉप निर्माता उसी का अनुसरण कर रहे हैं। दो साल पहले एक किलो का मैकबुक एयर लिया था, अभी तक उस मूल्य में उतना हल्का और उतनी अधिक बैटरी समय का कोई और लैपटॉप नहीं दिखा है।

संघर्ष केवल दो श्रेणियों में रह जाता है, टैबलेट और मोबाइल। अपेक्षाओं के बादल इन्हीं दो के ऊपर सर्वाधिक मँडराते हैं। आईपैड मिनी आने के बाद आईपैड पर उत्सुकता कम हो चली है। बहस आईपैड मिनी और आईफ़ोन के नये मॉडलों पर केन्द्रित हो चुकी है। तकनीक की श्रेष्ठता वैसे भी छोटे आकार में अधिक क्षमता भरने की होती है। इस पोस्ट में उन क्षमताओं और उनके तकनीकी पक्ष पर ही चर्चा सीमित रहेगी।

एप्पल के उत्पाद गुणवत्ता के साथ ही साथ अपने अधिक मूल्य के लिये भी जाने जाते हैं, लोग चाहकर भी उन्हें नहीं ख़रीद पाते हैं, यही उसकी आलोचना और प्रतियोगी उत्पादों की ओर मुड़ जाने का प्राथमिक आधार है। खोजीं पत्रकार बताते हैं कि एप्पल इस बार आईफ़ोन ५सी के नाम से नया मॉडल लाने वाला है जिसकी काया प्लास्टिक की होगी। एप्पल अपनी गुणवत्ता की छवि को कितना खोयेगा, क़ीमत कितनी कम करेगा और किन किन मानकों पर समझौता करेगा, इस बारे में ढेरों संभावनायें व्यक्त की जा रही हैं। आईफ़ोन इस क़दम से कितनी पहुँच बढ़ा पायेगा, यह १० सितम्बर को ही पता चलेगा, पर श्रेष्ठता के अन्य मानकों पर एप्पल अपने आप को कितना सिद्ध करता है यह उसकी विशिष्ट तकनीकी क्षमताओं को प्रदर्शित करेगा। पहले आईफ़ोन और फिर आईपैड मिनी का विश्लेषण करते हैं।

४ इंच की स्क्रीन, ११२ ग्राम भार, ३२६ पीपीआई की स्क्रीन स्पष्टता और लगभग ८ घंटे की बैटरी पर पहुँचने के बाद आईफ़ोन ५ के मॉडल में कुछ अधिक जोड़ पाने की संभावना नहीं दिखती है। प्रतियोगिता में सैमसंग का गैलैक्सी एस४ (५ इंच की स्क्रीन, १३० ग्राम भार, ४४१ पीपीआई और १६ घंटे की बैटरी) है और एचटीसी वन(४.७ इंच की स्क्रीन, १४३ ग्राम भार, ४६९ पीपीआई और १२ घंटे की बैटरी) है। जहाँ दोनो प्रतियोगी स्क्रीन की आकार, स्पष्टता और बैटरी में श्रेष्ठ हैं, वहीं उनका आकार और भार भी बढ़ा हुआ है। प्रश्न यह है कि एप्पल को अपने प्रतियोगियों की नक़ल करनी चाहिये या अपने मानक स्वयं नियत करने चाहिये, विशेषकर उन क्षेत्रों में जिसमें वह सशक्त है।

यदि स्क्रीन का आकार बड़ा होगा तो अधिक बैटरी खायेगी, यदि स्पष्टता अधिक होगी तब भी अधिक बैटरी का उपयोग होगा। अधिक बैटरी के लिये न केवल भार बढ़ेगा वरन आकार भी बढ़ेगा। यदि स्क्रीन का आकार और पीपीआई आवश्यकतानुसार निर्धारित कर दें तो मोबाइल का भार न्यूनतम किया जा सकता है। तीनों फ़ोन उठाकर देखे हैं, उपयोग की सहजता में आईफ़ोन५ का कोई प्रतियोगी नहीं। उसे एक हाथ से न केवल पकड़ सकते हैं वरन अँगूठे से टाइप भी कर सकते हैं। साथ ही वह पतला इतना है कि कहीं पर भी सरलता से समा जाता है।

मुझे नहीं लगता है कि एप्पल अपने प्रतियोगियों की नक़ल करने में अपने इस सशक्त पक्ष को खोना चाहेगी। स्क्रीन के आकार में ४ इंच के ऊपर जाने में कोई विशेष लाभ नहीं दिखता है, बड़े आकार के फ़ोन न केवल भद्दे लगते हैं वरन अनुभव में भी कुछ लाभ नहीं देते हैं। फ़ोन के प्राथमिक कार्यों के अतिरिक्त वेब के पेज बड़े देखने में, गेम खेलने में और वीडियो देखने में ही बड़ी स्क्रीन का उपयोग है। शेष सारे कार्य ४ इंच की स्क्रीन से भलीभाँति सम्पादित होते हैं। २८७ पीपीआई की स्पष्टता जिसे रेटिना डिस्प्ले भी कहते हैं, उसके ऊपर की स्पष्टता को आँख अन्तर नहीं कर पाती है। मुझे नहीं लगता है कि आईफ़ोन को वर्तमान ३२६ पीपीआई से ऊपर ले जाने का कोई भी प्रयास होगा।

अब शेष रहे भार और बैटरी, एप्पल अपनी तकनीकी शोधों और श्रेष्ठता का उपयोग या तो आईफ़ोन का भार कम करने में या बैटरी बढ़ाने में करेगा। वह जो भी करेगा और जितना करेगा, अपने प्रतियोगियों से उतनी बढ़त बना लेगा।

चार क्षेत्र हैं, जिनमें किये गये तकनीकी शोध एप्पल को लाभ पहुँचा सकते हैं। पहला है स्क्रीन की मोटाई और कम करना, दूसरा है नये तरह की बैटरी की तकनीक लेकर आना, तीसरा है प्रोसेसर और रेडियो एन्टेना की ऊर्जा की खपत कम करना और चौथा है सॉफ़्टवेयर को सरलीकृत कर व्यर्थ होने वाला समय और ऊर्जा बचाना। चारों का उपयोग कर भार कम किया जा सकता है और बैटरी का समय बढ़ाया जा सकता है। इन शोधों से न केवल आईफ़ोन लाभान्वित होगा वरन आईपैड मिनी भी अपने प्रतियोगियों से आगे निकलेगा।

आईपैड मिनी का प्रमुख प्रतियोगी नेक्सस७ है। ७.९ इंच की स्क्रीन, ३०८ ग्राम भार, १६५ पीपीआई और १२ घंटे की बैटरी पर आईपैड मिनी के पास अपनी स्क्रीन की स्पष्टता बढ़ाने का अवसर भी है। मुझे डर है कि कहीं पीपीआई बढ़ाने के व्यग्रता में एप्पल अपने तकनीकी लाभ न गँवा बैठे। बड़े आकार की स्क्रीनों में स्पष्टता अधिक महत्व नहीं रखती है और एप्पल को सारा तकनीकी लाभ इसी पर न्योछावर नहीं कर देना चाहिये। मैं पिछले आठ माह से आईपैडमिनी उपयोग में ला रहा हूँ, सारा कार्य इसी में करता हूँ, पर कभी ऐसा लगा नहीं कि इसमें स्पष्टता बढ़ाने की कोई आवश्यकता है। यहाँ पर भी एप्पल का प्रयास भार कम करने का और बैटरी समय बढ़ाने का होना चाहिये।

१० सितम्बर पर न केवल मेरी वरन एप्पल के प्रतियोगियों की पूर्ण दृष्टि रहेगी। जो भी निष्कर्ष हों, लाभ उपभोक्ता का होगा। मानकों की एक स्वस्थ प्रतियोगिता में, तकनीक का विकास ही होता है, नहीं तो किसने सोचा था कि अपने प्रथम कम्प्यूटर पूर्वज से लाख गुना छोटा और लाख गुना अधिक शक्तिशाली मोबाइल हमारी पीढ़ी को देखने को मिलेगा। आइये १० सितम्बर की प्रतीक्षा करते है।

6.10.12

बच्चों की संस्कृति

अपनी संस्कृति पर गर्व होना स्वाभाविक है, पर सारा जीवन अपनी संस्कृति के एकान्त में नहीं जिया जा सकता है, अन्य संस्कृतियाँ प्रभावित करती हैं। पहले का समय था, संस्कृतियों के बीच का संवाद सीमित था, परस्पर प्रभाव सीमित था, जो बाहर जाते थे वे ही बाहर की संस्कृति के कुछ अंश ले आते थे, पर दूसरी संस्कृति में जीवन निभा पाने के समुचित श्रम के पश्चात। आज न जाने कितनी फुहारें बरसती हैं, बड़ा ही कठिन होता है, भीग न पाना। हर संस्कृति की एक जीवनशैली है, अपने सिद्धान्त हैं और उसमें पगी दिनचर्या। औरों की संस्कृति पहले तो रोचक लगती है, पर धीरे धीरे रोचकता हृदय बसने लगती है, हम औरों की संस्कृति के पक्ष अपना लेते हैं, अपनी सुविधानुसार, अपनी इच्छानुसार।

मुझे भी अपनी संस्कृति पर गर्व है, खोल पर नहीं, उसकी आत्मा पर है। कई कारण हैं उसके, वर्षों की समझ के बाद निर्मित हुये हैं वे कारण। बहुत कारण ऐसे हैं, जो सिद्ध न कर पाऊँ, समझा न पाऊँ, भावानात्मक हैं, बौद्धिक हैं, आध्यात्मिक हैं। आवश्यकता भी नहीं है कि उनके लिये तर्कों से श्रेष्ठता के महल निर्माण करूँ, अनुभवजन्य तथ्य तर्कों की वैशाखियाँ पर निर्भर भी नहीं रहते हैं। यह भी नहीं है कि मुझे अन्य संस्कृतियों से कोई अरुचि हो, जब खोल अनावश्यक हो जाते हैं तो तुलना करने के लिये बहुत कम बिन्दु ही रह जाते हैं। सिद्धान्तों की मौलिकता में किसी भी संस्कृति को समझना कितना सरल हो जाता है, कम समझना होता है तब, गहरा समझना होता है तब। कबिरा की 'मरम न कोउ जाना', यही पंक्ति पथप्रदर्शन करने लगती है। किसी संस्कृति का श्रेष्ठ स्वीकार करना ही उस संस्कृति का समुचित आदर है। खोल का ढोल पीटने वाले, न अपनी संस्कृति को समझ पाते हैं, न औरों की।

आज आधुनिक एक आभूषण बन गया है, पुरातन एक अभिशाप। भविष्य सदा ही अधिक संभावनायें लिये होता है, भूतकाल से कहीं अधिक मात्रा में, कहीं अधिक स्पष्टता में। पुरातन को अपने दोषों का कारण मान, सब कुछ उसी पर मढ़ हम हल्के हो लेते हैं, कोई भार नहीं, कोई अनुशासन नहीं, कोई नियम नहीं, उन्मुक्त पंछी से। यदि यही आधुनिकता के रूप में परिभाषित होना है, तब तो हम स्वयं को संस्कृति के परिप्रेक्ष्य में कभी समझे ही नहीं। आधुनिकता और खुले विचार वालों ने अपनी स्वच्छन्दता के सीमित आकाश में संस्कृति की उस असीमित आकाशगंगा को तज दिया है, जिसमें हम सब सदियों से निर्बाध और आनन्दित हो विचरण करते रहे हैं।

संस्कृति की हमारी संकर समझ उस समय उभर कर सामने आ जाती है, जब हम चाहते हैं कि हमारे बच्चे पाश्चात्य संस्कृति सीखें, उनकी तरह विकसित हों, उनकी तरह आत्मविश्वास से पूर्ण दिखें, पर घर की मान्यताओं, परम्पराओं और संस्कारों को अक्षुण्ण रखे। जो भी कारण रहा हो, भारतीय संस्कृति शापित रही हो या शासित रही हो, आधुनिक परिवेश में श्रमशीलता, अनुशासन और कर्मप्रवृत्तता भारतीय संस्कृति के अनुपस्थित शब्द रहे हैं। वानप्रस्थ और सन्यास वर्षों में अध्यात्म का संतोष और जीवन समेटने की चेष्टाओं को ब्रह्मचर्य और गृहस्थ में ही स्वीकार कर लेने से जो अकर्मण्यता हमारी जीवनशैली में समा गयी है, उसकी भी उत्तरदायी है संस्कृति के बारे में हमारी संकर समझ।

क्या करें, संस्कृति का सही अर्थ बच्चों को समझाने बैठें या उन्हें स्वयं ही समझने दें? कपाट बन्द करने से उसके कूप मण्डूक हो जाने का भय है, कपाट खोल देने से वाह्य संस्कृतियों के दुर्गुण स्वीकारने का भय? जब हमें चकाचौंध भाती है तो उन्हें भला क्यों न अच्छी लगेगी, क्या तब बच्चे लोभ संवरण कर पायेंगे? बहुत से ऐसे ही प्रश्न उठ खड़े होते हैं जब बच्चों का परिचय हम अन्य संस्कृतियों से करवाते हैं। क्या उपाय है, संस्कृति की आत्मा सिखायें, या खोल चढ़ा दें, या उसे स्वयं ही समझने दें? उत्तर तो पाने ही हैं, अनभिज्ञता हर दृष्टि से घातक है। बहुत बार बस यही लगता है कि जो भी सिखाना हो, जो भी श्रेष्ठ हो, उसे स्वयं के जीवन में उतार लीजिये, बच्चे समझदार होते हैं, सब देख देखकर ही समझ लेते हैं।

एक मित्र के बारे में कहना चाहूँगा, वह पूर्ण नास्तिक, कारण बड़ा रोचक है पर। बचपन में अपने पिता को देखता था, बहुत अधिक पूजा पाठ करते थे, धार्मिक थे। भ्रष्टाचार का धन और परिवारजनों, विशेषकर पत्नी के प्रति अप्रिय व्यवहार। यह विरोधाभास उसको कभी समझ न आया, उसे लगा कि इस विरोधाभास का स्रोत धर्म ही हो, किसी से कभी कुछ नहीं कहा, बस वह ईश्वर से रूठ गया, जीवन भर के लिये नास्तिक हो गया। देखा जाये तो हमारा जीवन ही बच्चों के लिये हमारी संस्कृति का जीवन्त उदाहरण है, वही पर्याप्त होता है बस, प्रभावित करने में शब्द आदि निष्प्राण हो जाते हैं, अन्त में व्यवहार ही अनुसरणीय हो जाता है।

पाश्चात्य समाज में बच्चे अधिक स्वतन्त्र होते हैं, विकास के लिये एक आवश्यक गुण है यह। अपने जीवन के दो महत्वपूर्ण निर्णय स्वयं करते हैं वे, जीवन यापन कैसे करना है और जीवन यापन किसके साथ करना है? हम अपनी संस्कृति के परिप्रेक्ष्य में देखेंगे तो संभवतः हजम न कर पायें, पर उनके लिये यह स्वाभाविक व्यवहार है। यदि आप चाहेंगे कि आपके बच्चे भी उनकी तरह स्वतन्त्र बने या स्मार्ट बने, तो उन्हें बचपन से ही अपने निर्णय लेने के लिये उकसाना होगा। तब निर्णयों में मतभेद भी होंगे, कई बार मर्यादा दरकती हुयी सी लगेगी। जो बच्चे आपके निर्णयों से सहमत न हो अपना पंथ सोचने लगते हैं, उन्हें बागियों की उपाधि मिल जाती है। जो बच्चे आपके निर्णयों से असहमत होकर कार्यों में रुचि खो देते हैं और अनमने हो जाते हैं, उन्हें आप नकारा की संज्ञा से सुशोभित कर देते हैं। स्वतन्त्र दोनों ही होते हैं, जीवन अपना दोनों ही जीते हैं, बहुधा अपने कार्य में अत्यधिक सफल भी रहते हैं, पर समाज की दृष्टिकोण से आदर्श बच्चे नहीं कहे जाते हैं।

माना कि पाश्चात्य दृष्टिकोण में बहुत दोष हैं, आध्यात्मिक आधार पर भारतीय संस्कृति कहीं उन्नत है, सामाजिक संरचना और संबंधों के निर्वाह में हमारा समाज अधिक स्थायी है, एक कष्ट पर दसियों हाथ सहायता करने को तत्पर रहते हैं। तो क्या हम भौतिकता की आधारभूत आवश्यकताओं पर भी ध्यान न दें, सन्तोष की चादर ओढ़ अपने सांस्कृतिक वर्चस्व के स्वप्न देखें? पृथु के पास एक मोटी पुस्तक है, टॉप टेन ऑफ ऐवरीथिंग, उसमें वह देखता है कि अपना देश विकास के मानकों के आधार पर पाश्चात्य देशों के सामने कहीं नहीं टिकता है, पूछता है कि हम सबमें पीछे क्यों हैं? क्या उसको यह बताना ठीक रहेगा कि विवाह तक तो यहाँ का युवा अपने हर निर्णय के लिये अपने बड़ों का मुँह ताकता रहता है, यौवन भर औरों के द्वारा प्रायोजित और संरक्षित जीवन जीता है, प्रौढ़ होते ही असहाय हो अन्त ताकने लगता है और आध्यात्मिक हो जाता है। कब उसे समय मिलता है अपने स्वप्न देखने का, उन्हें साकार करने का? संभावित ऊर्जा सदा ही संभावना बनी रहती है, कोई आकार नहीं ले पाती है।

हम इस भय में जीते रहते हैं कि हमें अपने बच्चों और आने वाली पीढ़ी के लिये सुविधामयी जीवन संजो के जाना है, वही भय हमारे बच्चों में मूर्तरूप ले जी रहा है। सब के सब सधे भविष्य की ओर भागे जा रहे हैं, स्थापित तन्त्रों के सेवार्थ, उन तन्त्रों में जुत जाना चाहते हैं जो विश्व में बहुत नीचे हैं। हजारों की एक ऐसी सेना तैयार हो जिनके मन में दिवा स्वप्न हों, श्रेष्ठतम और उत्कृष्टतम पा जाने की उद्दाम ललक हो, हर ऐसे क्षेत्र में देश को स्थापित करने का विश्वास हो जिनके लिये हम जीभ लपलपाते रहते हैं। इस तरह की शक्ति तो एक दिन में चमत्कारस्वरूप मिलने से रही, बच्चे रोजगार ढूढ़ने में लगे रहे तो रोजगार के अतिरिक्त कुछ पा भी नहीं पायेंगे, देश में नहीं मिलेगा तो विदेश सरक जायेंगे।

हमारा देश सर्वाधिक युवा देश है, कारण है कि बच्चे अधिक हैं। अब दो विकल्प हैं, या तो बच्चों को अतिसंरक्षित जीवन जिलाते रहें और भविष्य में जब प्रतियोगिता की मारकाट अपने चरम पर होगी, उन्हें उन पर ही छोड़ दिया जाय, भाग्य के भरोसे। एक पतले रास्ते पर भला कितने लोग चल पायेंगे? दूसरा विकल्प यह है कि अपने बच्चों को दृढ़ और सशक्त बनायें जिससे न केवल वे अपनी राह गढ़ेंगे वरन न जाने कितनों को अपने साथ लेकर चलेंगे।

निर्णय आपको करना है कि बच्चों के निर्णय कौन लेगा? निर्णय आपको करना है कि बच्चों की संस्कृति क्या हो? निर्णय आपको करना है कि संस्कृतियों के बन्द किलों में ही बच्चे रहें या सबके ऊपर उड़ें, आसमान में? निर्णय आपको करना है कि संस्कृति को बचाये रखने वाले बचे रहें और संस्कृति को बचाये रखे या संस्कृति में सिमटे हुये विश्वपटल से अवसान कर जायें? भविष्य के निर्णय तो आज के बच्चे लेंगे, पर उन्हें इस योग्य बनाने के निर्णय आपको लेने हैं, आज ही।

3.9.11

पानीदार कहाँ है पानी?

पानी का साथ बचपन से प्रिय है, तैरने में विशेष रुचि है। कारण कोई विशेष नहीं, बस जहाँ जन्म हुआ और प्रारम्भिक जीवन बीता उस नगर हमीरपुर में दो नदियों का संगम है, यमुना और बेतवा। यमुना, रेतीले तट, गतिमान प्रवाह, पानी का रंग साफ। बेतवा, बालू के तट, मध्यम प्रवाह, पानी का रंग हरा।

तैरने के लिये बेतवा ही उपयुक्त थी, वहीं पर ही तैरना सीखा। गर्मियों की छुट्टियों में नित्य घंटों पानी में पड़े रहना, नदी पार जाकर ककड़ी, तरबूज आदि खाना, दोपहर को जीभर सोना और सायं घर की छत से बेतवा को बहते हुये देखना, सूर्यास्त के समय बेतवा सौन्दर्य का प्रतिमान हो जाती थी। बेतवा के साथ जुड़ी आनन्द की हिलोरें बचपन की मधुरिम स्मृतियाँ हैं। बचपन के घनिष्ठ मित्र सी लगती है बेतवा।

यमुना के रेतीले तटों पर पूर्ण शक्ति लगा सवेग दौड़ लगाना, फिर थक कर किनारे पर डरी डरी सी हल्की सी डुबकी। यमुना के गतिमान प्रवाह और उसकी शास्त्रवर्णित पवित्रता के लिये सदा ही आदर रहा मन में। संगम पर लगने वाले मेलों, धार्मिक स्नानों व अन्य अनुष्ठानों के समय मिला यमुना का मातृवत स्नेह आज भी स्मृतियों की सुरेख खींच जाता है।

मूल यमुना और उसकी पवित्रता तो दिल्लीवाले ही पी जाते हैं। अपने आकार को अपने आँसुओं से सप्रयास बनाये रखती यमुना, कान्हा के साथ बिताये दिनों को याद कर अपने अस्तित्व में और ढह जाती है, ताजमहल से भी आँख बचाकर चुपचाप निकल जाती है। यदि चंबल और बेतवा राह में न मिलती तो जलराशि के अभाव में यमुना प्रयाग में गंगा से भेंट करने की आस कब की छोड़ चुकी होती, त्रिवेणी की दूसरी नदी भी लुप्त हो गयी होती।

कुछ वर्ष पहले तक तो बेतवा का प्रवाह स्थिर था। बालू की खुदाई तटों से ही कर ली जाती थी, बाढ़ आने पर पुनः और बालू आ जाती थी, वर्षों यही क्रम चलता था, नदी का स्वरूप भी बचा रहता था और विकास को अपना अर्घ्य भी मिल जाता था। आज विकास की बाढ़ में बालू का दोहन अपने चरम पर पहुँच गया है, जहाँ पहले मजदूर ही बालू का लदान करते थे, अब बड़ी बड़ी मशीनों से नदी के तट उखाड़े जाने लगे। विकास की प्यास और बढ़ी, मशीनें नदी के भीतर घुस आयीं, जो मिला सब निकाल लिया, बेतवा सहमी सी एक पतली सी धारा बन बहती रही। वेत्रवती(बेतवा) आज असहाय सी बहती है, एक नाले जैसी, देखकर मन क्षुब्ध हो जाता है।

इस विषय पर भावनात्मक हूँ, मेरे बचपन के प्रतीकों का विनाश करने पर तुला है यह विकास। कुछ दिन पहले घर गया था, यमुना तट पर खड़ा खड़ा अपनी आँखों से उसका खारापन बढ़ाता रहा। यमुना, काश वृन्दावन की अन्य जलराशियों की तरह कान्हा ने तुम्हें भी खारा कर दिया होता, स्रोत से ही, कम से कम तुम्हारा स्वरूप तो बचा रहता। बेतवा, काश तुम्हारी बालू में भवनों को स्थायित्व देने वाला लौह-तत्व न होता, तुम्हारी भेंट ही तुम्हारे स्वरूप को ले डूबी।

हमीरपुर बुन्देलखण्ड में है, कहीं पढ़ा था बुन्देलखण्ड के विषय में,

बुन्देलों की सुनो कहानी, बुन्देलों की बानी में,
पानीदार यहाँ का पानी, आग यहाँ के पानी में।

अब न वह कहानी रही, न पानी रहा, न उस पानी में जीवन की आग रही और न ही रही वह पानीदारी।

23.7.11

तोड़ महलिया बना रहे

उन्मादित सब जीव, वृक्ष भी,
अन्तरमन भी और दृश्य भी,
एक व्यवस्था परिचायक है,
अह्लादित हैं ईश, भक्त भी,

रहें विविध सब, पर मिल रहतीं,
भाँति भाँति की संरचनायें,
एक सृष्टि बन उतरी, फैलीं,
परम ईश की विविध विधायें,

नहीं अधिक है, नहीं कहीं कम,
जितनी जीवन को आवश्यक,
सहज रूप में स्वतः प्राप्त सब,
प्रकृति पालती रहे मातृवत,

धरती माँ सी, रहती तत्पर,
वन, नद, खनिज अपार सजी है,
तरह तरह के पशु पक्षी हैं,
पुष्प, वृक्ष, फल, शाक सभी हैं,

महासंतुलन सब अंगों में,
एक दूजे के प्रेरक, पूरक,
रहें परस्पर सुख से बढ़ते,
सब जीते हैं औरों के हित,

मानव ने पर अंधेपन में,
अपनी तृष्णा का घट भरने,
सकल प्रकृति को साधन समझा,
ढाये अत्याचार घिनौने,

संकेतों से प्रकृति बोलती,
समझो और स्वीकार करो,
जितने अंग विदेह किये हैं,
प्रकृति अंक में पुनः भरो,

देखो सब है प्राप्त, पिपासा-फन क्यों फैले?
सम्मिलित सभी सृष्टि में, फिर क्यों दंश विषैले?
किसकी बलि पर किसका बल हम बढ़ा रहे?
एक नगर था, तोड़ महलिया बना रहे ।