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15.7.21

सात चक्र - सरलीकरण

 

योग शब्द युज् धातु से आया है। युज् घातु तीन अर्थों में प्रयुक्त होती है। संस्कृत व्याकरण में लगभग २००० धातुयें हैं जो १० गणों में विभक्त हैं। हर गण का एक विकिरण प्रत्यय होता है जिससे उसके रूप भिन्न होते हैं। युज् धातु भी तीन गणों में है और हर गण में उसका भिन्न अर्थ है। रोचक यह भी है कि सारी धातुयें किसी क्रिया को ही बताती हैं। धातुओं से ही सारे शब्द उत्पत्ति पाते हैं अतः यह तथ्य शब्द के उत्पत्ति के क्रियात्मक मूल को सिद्ध करता है। शब्दों के मूल में जाने से उसमें निहित क्रियायें और सन्निहित गुण पता चलते हैं। उदाहरण के लिये राम शब्द रम् धातु से आया है, अर्थ है रमना, क्रीडा करना, प्रसन्न होना। राम का शाब्दिक अर्थ है, जो हर्षदायक हो। इसी प्रकार जल या अग्नि के लिये प्रयुक्त भिन्न शब्द उनके भिन्न गुणों को व्यक्त करते हैं।


युज् धातु के तीन अर्थ इस प्रकार हैं।

  1. युज् समाधौ (४.७४) - चित्त स्थिर करना, बराबर स्थित होना, समत्व में होना। समाधि (सम आ धा), धा धारणे।
  2. युज् योगे (७.७) - जुड़ना, मिलना, एकत्र करना।
  3. युज् संयमने (१०.३३८) - संयत करना, बाँधना, वश में रखना। संयम (सम् यम), यम उपरमे।

उपरोक्त तीनों ही अर्थ योग प्रक्रिया को समझने में सहायक हैं। ये अर्थ पिछले ब्लाग में वर्णित योगसूत्र और गीता के तीन कथनों को और भी स्पष्ट करते हैं। पहले और दूसरे अर्थ स्थितिबोधक हैं, तीसरा अर्थ प्रक्रियाबोधक हैं। शब्द का अर्थ या अर्थ का मन्तव्य समझने में यदि कोई संशय रहता है तो उसकी धातु का विश्लेषण कर हम तात्पर्य समझ सकते हैं। 


योग के अर्थ, सिद्धान्त और व्यवहार को तो क्रमशः व्याकरण, योगसूत्र और गीता के माध्यम से समझा जा सकता है पर उनको जीवन में प्रयुक्त करने में सतत प्रयत्न करना पड़ता है। अष्टाङ्गयोग की प्रक्रिया और योगेश्वर की व्याख्या अन्ततः उस वर्तमान पर आकर ठहरती है जिसे हमें निभाना होता है। वही हाथ में रहता भी है और कुछ नियन्त्रण में भी। सारे के सारे उपाय, ज्ञान, उपक्रम उसी एक क्षण को निभाने के लिये आपको तैयार करते हैं, जिसे वर्तमान कहा जाता है। जो हो रहा है, यत वर्तते, वह वर्तमान। आने के पहले वह भविष्य था, बीतते ही वह भूत हो जाता है, एक क्षण ही है वर्तमान। विस्तार करना चाहें तो जीवन कम पड़ जायेंगे और संक्षिप्त करें तो एक क्षण में सिमट जाता है सब कुछ। अनुभव अन्ततः यही सिखाता है कि वर्तमान को कैसे निभायें। 


काल बड़ा निर्दयी होता है। वर्तमान के उसी एक क्षण में ही हमें संकुचित कर देता है, न एक क्षण उधर, न एक क्षण इधर। यदि उस क्षण पर भी हमारा नियन्त्रण न रहा तो कुछ भी नियन्त्रण में नहीं रहेगा। यदि कर्तव्य के उस क्षण में हम भूत या भविष्य के विकल्प में उलझे रहे तो कुछ भी नहीं मिलेगा। जो भी हमें तैयारी करनी है, जो भी हमें संस्कार डालने हैं, उसी एक क्षण को निभाने के लिये, जो वर्तमान है। गीता(४.६) में कृष्ण कहते हैं कि मृत्यु के क्षण हमारी मनोदशा हमारा नया जन्म निश्चित कर देती है, अतः अन्तकाल में कृष्ण का स्मरण करना चाहिये। साधकों के सारे जीवन बस इसी तैयारी में निकल जाते हैं कि मृत्यु के क्षण में वह शक्ति और सामर्थ्य रहे कि ईश्वर का स्मरण मन में रह सके।


मृत्यु का क्षण दो जन्मों को विभक्त करता है अतः उस पर प्रयुक्त मनःस्थिति महत्वपूर्ण दिखती है। वर्तमान के क्षण को भी इसी परिप्रेक्ष्य में देखें तो वह भी महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि अगले ही क्षण मन की एक नयी स्थिति होती है, एक नया जन्म होता है। अनुभव के आधार पर वर्तमान के उसी क्षण को निभाने के सरल से कुछ प्रयास करता हूँ। समर्थ नहीं हूँ, बहुधा काल के द्वारा ढकेल दिया जाता हूँ। मानसिक दुर्बलतायें प्रबल हो जाती हैं, जो चाहता हूँ, जो सोचता हूँ, वह नहीं कर पाता हूँ। फिर भी सभी प्रयासों को कोटिबद्ध कर व्यक्त कर रहा हूँ। 


  1. स्मृतियों को निष्कर्ष दें। राग, द्वेष से उन्हें मुक्त करें। अस्मिता (यह मैंने किया है) से बचें। टालना उचित नहीं हैं, यदि ऐसा किया तो वे पुनः लौटकर आयेंगी। यथासंभव उनकी तीक्ष्णता मन्द करें।
  2. कल्पना सृजनशीलता के लिये तो अच्छी है पर कब वह चिंता के ग्रास में चली जाती है, पता ही नहीं चलता है। कार्यविशेष से ही भविष्य में विचरण करें और शीघ्र ही वर्तमान में लौट आयें। बीच में अपने से प्रश्न अवश्य पूछें कि यह चिंता किस चिन्तन की भटकन है?
  3. कुछ ज्ञान प्राप्त कर रहे हैं, कुछ पढ़ रहे हैं, सुन रहे हैं या देख रहे हैं तो उस समय और किसी विचार को न आने दें, सप्रयास। मन उकता जाता है, भागता है। ध्यान का तनिक अभ्यास इसमें सहायक होता है। बीच बात में बोलने के क्रम पर संयम रखे। यह इसलिये होता है कि हम सुनते समय सीखने के स्थान पर सोचने लगते हैं और स्वयं को व्यक्त करना चाहते हैं।
  4. किसी कर्म में लगे हो तो तन्मय होकर करें, शत प्रतिशत। एक साथ कई कार्य करने से दोनों से ही न्याय नहीं होता है और मन भटकता है सो अलग। एकाग्रता से समय, ऊर्जा की बचत तो होती ही है, साथ में कार्य की गुणवत्ता भी स्तरीय होती है। सम्यक रूप से निष्पादित कर्म तृप्ति की अनुभूति कराता है, अपने निष्कर्ष को पा जाता है, अन्यथा स्मृतियों में नहीं आता है।
  5. जब विश्राम करने जायें, इतना क्लान्त हो जायें कि मन को भ्रमण करने के लिये कुछ अवसर ही न मिले। निद्रा के हर क्षण में शरीर स्वयं को ऊर्जा से पुनः पूर्ण भरता रहे, प्रतिदिन। दिनभर के अतृप्त क्षण, अतृप्त निष्कर्ष रात्रि में आपको असहाय पा हाहाकार न मचाने पायें, इसके लिये आवश्यक है कि उनको यथासंभव, यथाप्रयास और यथासमय निष्कर्ष पर पहुँचाया जाये।  
  6. जब कुछ करने को न हो, कुछ जानने को न हो, स्मृति और कल्पना में मन आड़ोलित न हो, मन चैतन्य हो, तब शान्त बैठकर स्वयं को ही निहारें। प्रश्नों को पूछें, उत्तरों को ढूढ़ें। यह एकान्त अन्वेषण कई उलझनों को सुलझा देता है। एकान्त न सह पाने की प्रवृत्ति तभी आती है जब हम प्रश्नों से भागना चाहते हैं। हमें यह भय रहता है कि संभावित उत्तर हमको उद्वेलित कर जायेंगे, हमारे तथाकथित स्थिर जीवन को अस्थिर कर जायेंगे। मुझे तो लगता है कि जीवन के सर्वाधिक उत्पादक क्षण वे थे जब हाथ में कुछ करने को नहीं था, मन में कुछ सोचने को नहीं था।


प्रयास करता हूँ कि वर्तमान में जी सकूँ। बहुधा भटकता हूँ पर यथासम्भव वापस लौटने का प्रयत्न करता हूँ।

3.12.14

क्या जो मैनें पा लिया

और कहने को बहुत कुछ, जो था मैने पा लिया,
किन्तु पहचानों की गहरी छाँह में छिपता गया ।।१।।

कभी उड़ता था हवा में, धरा पर जब आ गया,
पंख थकने के सभी आरोप मैं सहता गया ।।२।।

और कर्तव्यों के ढाँचे में, सहज जीवन फँसा कर,
कष्ट का अभिशाप बनकर अश्रु जब बहता गया ।।३।।

मुझे आरोपी बनाकर, स्वयं ही निर्णय दिये थे,
नहीं कुछ उत्तर दिये, बस सजायें सहता गया ।।४।।

है यह माना, जीवनी, कुछ ज्वलित है, कुछ पददलित है,
किन्तु कूड़े ढेर जिसको जो मिला, कहता गया ।।५।।

सत्य कहता हूँ, हृदय से क्षीण हूँ, यह समय भीषण,
इसलिये ही स्वयं-निर्मित यज्ञ में जलता गया ।।६।।

जानता हूँ, इस जगत में, प्रश्न तो अस्तित्व का है,
कापुरुष तो बह गये, निज पंथ मैं बढ़ता गया ।।७।। 

4.9.13

पर्यटन - आनन्द का कार्य

हमारी श्रीमतीजी को पर्यटन संबंधी पुस्तकें और आलेख पढ़ने में रुचि है। बड़े ही संक्षिप्त अन्तरालों में उनकी रुचि, रह रहकर अनुभव में बदल जाना चाहती है। न जाने कितने स्थानों के बारे में हम से कह चुकी हैं और हम हैं कि एक को भी मना नहीं किया है। वर्तमान में देखा जाये तो हमारे अगले दो वर्षों के सप्ताहान्त, छुट्टियाँ आदि सब आरक्षित हैं। यदि इतनी छुट्टी मिल सकती और व्यवस्था बन सकती तो, उनकी सारी आशायें पूरी कर देता। फिर भी हार नहीं मानता हूँ, सरकारी नौकरी में पूरा देश घूम चुका हूँ, ईश्वर की ऐसी ही कृपा रही तो श्रीमतीजी की घूमने जाने वाले स्थानों पर भी देश की सेवा का अवसर मिलेगा। नौकरी और पर्यटन साथ साथ चलते रहेंगे, न श्रीमती जी रूठेंगी, न हम व्यथित होंगे, पता नहीं कौन सा वादा कब पूरा हो जाये।

आप ऐसी दार्शनिकता झाड़ कर कुछ सप्ताहान्त तो टाल सकते हैं, सारे सप्ताहान्त उदरस्थ नहीं कर सकते, सो घूमने जाना पड़ जाता है। पहले तो वरिष्ठों से छुट्टी माँगने के लिये कुछ विशेष कार्य करना पड़ जाता है, योग्यता सिद्ध करनी पड़ जाती है। कई बार तो अन्य अवसरों पर इसीलिये शब्द नहीं फूटते हैं कि कहीं छुट्टी के लिये मना न हो जाये। जिस दिन छुट्टी स्वीकृत हो जाती है, उस दिन मन मुदित हो नाचने का करता है, जैसे अपनी श्रीमतीजी के लिये कोई हीरे का हार ले आये हों। उसके बाद की तैयारी और भी श्रमसाध्य रहती है। बच्चों को समझाना पड़ता है कि कैसे किसी विशेष स्थान पर जाना वीडियो गेम खेलने से कहीं अच्छा है। पिछली यात्रा में की गयी भूलों को न दुहराने का वचन देना पड़ता है। साथ ही साथ रेलवे की सीटों पर उन्हें नीचे सोने देने का आश्वासन भी देना पड़ता है।

यदि पर्यटन स्थान पर रेलवे की व्यवस्था है तो ठहरना रेलवे के ठिकानों पर ही होता है। अपने विभाग की कृपा से आने जाने का आरक्षण मिल ही जाता है। वहाँ पर स्थानीय साधनों की व्यवस्था और अन्य स्थानों पर ठहरने की व्यवस्था में संपर्क सूत्र खड़खड़ाने पड़ते हैं। ७ राज्यों पर रह चुकने के कारण यह प्रसाद बहुधा मिल जाता है। कई बार व्यवस्थायें बहुत अच्छी मिलती हैं, तो कई बार काम चल जाता है। उसके बाद गूगल महाराज की कृपा से मानचित्र आदि समझे जाते हैं, स्थानीय भ्रमण की योजना का सूत्र रखा जाता है, मित्रों से बातचीत होती है, यात्रा संबंधी ब्लॉग पढ़े जाते हैं, तब कहीं जाकर पर्यटन की अस्पष्ट ही सही, एक छवि बन जाती है।

एक बात बीच में स्पष्ट कर दूँ कि इस श्रंखला में नीरज का परिप्रेक्ष्य अविवाहित घुमक्कड़ी का है, मेरे पीछे एक पूरी श्रीमतीजी और दो प्यारे पर जिज्ञासु बच्चे हैं। मेरा परिप्रेक्ष्य निश्चय ही भिन्न होगा, क्योंकि मेरे लिये व्यवस्थाओं का न हो पाना विवशताओं को जन्म देने जैसा हो सकता है। मेरा अनुभव पर्यटन के पक्ष को उतना न कह पायेगा जितना मेरा पर्यटन अनुभव पक्ष को कह जायेगा। सच कहूँ तो इच्छा मेरी भी करती है कि मैं भी अपने पर्यटन के वृत्तान्त लिखूँ और आप सबको बताऊँ, पर उनका स्वरूप उतना गहरापन लिये हुये नहीं होगा जितना नीरज का होता है। मेरे यात्रावृत्तान्तों की कहानी बहुत कुछ सब चैनल के धारावाहिक जैसी ही हो जायेगी, चलना कम होगा, हँसी अधिक आयेगी।

रेलवे स्टेशन के निकट घर होने के कारण, पर्यटन यात्रायें रेलवे स्टेशन से ही प्रारम्भ होती हैं। मेरे साथ बच्चों को भी रेलवे बहुत भाता है। पृथु को ट्रेन में पुस्तक पढ़ना और वीडियो गेम खेलना अच्छा लगता है तो देवला को बतियाना और पहेली आदि से खेल खेलना। श्रीमतीजी को बच्चों से जूझने से बचने और आगामी यात्रा के लिये ऊर्जा संचयन की दृष्टि से सोना अच्छा लगता है और मुझे सबकी बातें मानना। रात आने पर समान के निकट रहने के कारण मुझे नीचे की सीट मिल जाती है पर इस विशेष लाभ के लिये मुझे सबके बिस्तर भी लगाने पड़ते हैं। जो भी गणित लगता हो, जो भी सन्धि प्रस्ताव पारित होते हों, पर शेष तीन सीटों के लिये कभी किसी को विशेष श्रम नहीं करना पड़ता है।

रेलवे में समान्यतः नींद अच्छी आती है, साथ ही साथ भूख भी खुलकर लगती है। हो भी क्यों न, कोई इतनी देर डुलायेगा तो लोरी जैसा लगेगा, नींद आ जायेगी। साथ ही लगातार हिलते डुलते रहने से खाना भी पच जाता है, इसीलिये भूख भी खुलकर लगती है। बच्चों को भी अपनी पसन्द का चटपटा खाने का अवसर मिल जाता है। पर्यटन में बहुधा खानपान में नियन्त्रण नहीं रह पाता है, पर मैं नियमतः कम ही खाता हूँ, अधिक खाने से पर्यटन का उत्साह कम पड़ने लगता है और सोने की इच्छा प्रबल हो जाती है। हाँ, यदि गोवा जैसे किसी स्थान में शारीरिक और मानसिक विश्राम के लिये जाते हैं तो दोपहर में पर्याप्त भोजन कर सोने में बहुत आनन्द आता है।

श्रीमतीजी को पर्यटन में प्राकृतिक दृश्य भाते हैं, मुझे ऐतिहासिक पक्ष और अनुभव और बच्चों को वहाँ की कहानियाँ। इन तीनों में संतुलन बिठाने के लिये पहले तो श्रीमतीजी के साथ प्राकृतिक दृश्यों की फोटो उतारना पड़ती है फिर वहाँ के बारे में पहले से पढ़कर कहानी सुनाना पड़ती है। इन दोनों में मुझे ऐतिहासिक पक्ष का और सौन्दर्यपक्ष का समुचित अनुभव हो जाता है। बस यही ध्यान देना पड़ता है कि एक को साधने के कार्य में दूसरा क्रोधित न हो जाये। ऐसा नहीं कि मैं सदा उन तीनों पर व्यस्त रहता हूँ, जब कभी वे आपस में व्यस्त होते हैं मैं शान्ति से पर्यटन का आनन्द ले लेता हूँ।

कपड़े थोड़े अधिक लेकर चलते हैं कि बीच यात्रा में धोने नहीं पड़ें। यही कारण रहता है कि सामान अधिक हो जाता है। बच्चे समझदार हो गये हैं, सामान उठाने और ले जाने में हाथ बँटाते हैं और यदि ट्रेन देर रात में हो, तो जगकर चल भी लेते हैं। उनके बचपन में यह सारा कार्य मुझे ही करना पड़ता था। हाँ, मेरी तरह उन्हें भी प्रतीक्षा करना बहुत अखरता है।

परिवार के साथ बहुत अधिक दिन बाहर रहना संभव नहीं होता है। स्थान परिवर्तन का अनुभव पूर्ण होते ही मानसिक थकान घिरने लगती है और अपना घर याद आने लगता है। अधिक दिनों के पर्यटनीय अनुभव के लिये, रोचकता के विशिष्ट प्रयास करने पड़ते हैं। विकल्प उपस्थित होने की स्थिति में कई बार परिवार से पूछ पूछ ही आगे बढ़ना अच्छा होता है। तब लगता है कि पर्यटन यात्रा की बागडोर उन्हें सौंप दी गयी है और पर्यटन में रुचि बनाये रखना उनका उत्तरदायित्व है।

हमारे लिये पर्यटन एक विशुद्ध पर्यटनीय अनुभव न होकर प्रबन्धन का व्यक्तिगत अनुभव जैसा हो जाता है। नीरज के ब्लॉग पढ़ने के बाद लगता है कि हम तो कुछ घूम ही नहीं पाये, केवल परिवार को घुमाने में लगे रहे। अकेले होने पर कितना घूम पाता, कहना बहुत कठिन है। विवाह के पहले भी अकेले घूमना कभी हुआ ही नहीं, मित्रगण न केवल कार्यक्रम बनाते रहे वरन उसे साधते भी रहे। तब भी मिलजुल कर घूमे, आज भी मिलजुल कर ही घूम रहे हैं, तब निश्चिन्त होकर, अब परिवार को निश्चिन्त कर के।

जो भी हो, घर वापस आने में एक उपलब्धि की अनुभूति होती है, आनन्द के कार्य की।

20.2.13

शरीर से मिली शिक्षा

बसन्त बाबा के त्योहार पर सब मदनोत्सव में डूबे थे, कुछ पक्ष में, कुछ विपक्ष में और कुछ निष्पक्ष ही डूबे थे। बसन्त के आगमन ने एक खुमारी चढ़ा दी, सब आनन्द में थे। हमने भी शरीर से तनिक हिलने को कहा तो एक टका सा उत्तर मिल गया, श्रीमानजी बिस्तर पर ही पड़े रहिये, आपका खुमार यदि न उतरा हो तो सुन लीजिये कि आप बुखार में हैं। अब जब बिना हिले डुले ही शरीर गरमाया हुआ था तो व्यर्थ का श्रम कौन करे। हम पड़े रहे, छत की सफेदी निहारते रहे और परिवेश से आ रही बहुधा न सुनी जाने वाली ध्वनियों को सुनते रहे।

एक दिन पहले निरीक्षण से वापस आते ही शरीर ने हल्की सी कँपकपी के साथ यह संकेत दे दिया था कि किसी वायरस महोदय ने किला भेद दिया है, बुखार आने वाला है। रात अनिद्रा में बीती। अगले दिन एक महत्वपूर्ण बैठक में भाग लेने के लिये कार्यालय निकल तो गये पर अपराह्न लौटने पर शरीर ने झटका दे बिस्तर पर गिरा दिया। सब मदन के खुमार में और हम बदन के बुखार में, सब मस्त और हम पस्त।

दवाई दी गयी, वायरस से लड़ने के लिये एक एण्टीबायोटिक, बुखार कम करने के लिये पैरासीटामाल, एक एलर्जी कम करने की और एक एसिडिटी कम करने की। एण्टीबायोटिक प्राथमिक दवा और शेष सहयोगी। डॉक्टर साहब ने कहा कि तीन दिन तो लग ही जायेंगे, अच्छा है उसमें दो दिन सप्ताहान्त के हैं, कार्य की अधिक हानि नहीं होगी। हमने कहा हमारा तो परिचालन का कार्य है, सातों दिन चलता है, हाँ ये बात है कि सप्ताहान्त में घर से ही चल जाता है, वह अवश्य बन्द हो जायेगा। पता नहीं, वायरसों को सप्ताहान्त की कुछ कम समझ है या सरकारी अधिकारियों से कुछ अधिक शत्रुता। अब ले देकर वही दो दिन मिलते हैं जब घर के सभी सदस्य सूची बनाये बैठे होते हैं और आपको सुपरमैन बन सब कार्य निपटाने होते हैं।

सबने भरपूर सहयोग किया, कनिष्ठों ने सारा कार्यभार अपने ऊपर ले लिया। तन्त्र का होना और चलना कितना भला लगता है, विशेषकर जब आप स्वयं ही बिस्तर पर पस्त पड़े हों। घर में भी मेज पर एक थर्मामीटर, पानी की बोतल, बॉम और दवाइयाँ सजा दी गयीं। तीन दिन के लिये शरीर तैयार था लड़ने के लिये, वायरस से। हम तैयार थे, उस लड़ाई की पीड़ा झेलने के लिये।

शरीर का तन्त्र अत्यधिक विकसित होता है, उसे ज्ञात रहता है कि कौन उसे हानि पहुँचाता है और कौन उसके लिये लाभकारी है। शरीर स्वयं सक्षम है लड़ने में और शरीर का बढ़ा हुआ तापमान एक लक्षण है इस बात का कि शरीर अपने कार्य में लगा हुआ है। वायरस के प्रारम्भिक हमले में ही कँपकपी के लक्षण होना उस बढ़े तापमान के संकेत होते हैं। यह लड़ाई कोशिकाओं के सूक्ष्म स्तर पर होती है। ऐसा नहीं है कि यह लड़ाई अचानक ही हो जाये और कोई भी कोशिका लड़ने पहुँच जाये। एक विशेष प्रकार की कोशिकायें जिन्हें पॉलीमार्फोन्यूक्लियर ल्यूकोसाइट्स कहते हैं, वे ही सबसे पहले पहुँचती हैं और अधिक मात्रा में ऑक्सीडेशन कर, हाइड्रोजन पराक्साइड और हाइड्रॉक्सिल रेडिकल बनाती हैं और अन्ततः आक्रान्ताओं को मारती हैं। अब किसी भी ऑक्सीडेशन प्रक्रिया में ऊष्मा निकलना स्वाभाविक है, इसीलिये हमें बुखार आता है, हमारा तापमान बढ़ता है।

बात भी सही है, शरीर में कहीं घमासान मचा हो और हमें पता भी न चले, यह तो बहुत अन्याय होता। तापमान को अनदेखा नहीं करना चाहिये। बचपन में बुखार आता था तो कम्बल ओढ़कर लेट जाते थे, थोड़ी देर में पसीना आता था और बुखार उड़नछू। तब समझ नहीं आता था कि पसीना आ जाने से बुखार उतरने का क्या संबंध? अब लगता है, संभवतः अन्दर से लड़ाकू कोशिकाओं की गर्मी और बाहर से कम्बल की गर्मी, इसमें ही आक्रान्ता वायरस अदि के प्राण पखेरू हो जाते होंगे। धीरे धीरे बड़े हुये तो बचपन की विधि को उतना कारगर नहीं पाया, तब किसी ने एण्टीबायोटिक की महिमा बतायी। ये महाशय अच्छे बुरे, सभी प्रकार के बैक्टीरिया को बढ़ने से रोक देते हैं और विकार को सीमित कर देते हैं, जिससे आपकी लड़ाकू कोशिकाओं को अधिक श्रम न करना पड़े। पर देखा जाये तो अन्ततः आपकी अपनी कोशिकायें ही लड़ती हैं, शेष सब सहयोगी की भूमिका में ही रहते हैं।

इन तीन दिनों में कई बार तापमान बढ़ा, यदि नींद में रहे तो कोई बात नहीं पर यदि आँख खुली रही तो थर्मामीटर से तापमान अवश्य माप लेते थे। डॉक्टर की सलाह थी कि जब तापमान अधिक हो तो उसे कम करने के लिये पैरासीटामॉल ली जा सकती है। अब कितने अधिक को अधिक की श्रेणी में रखा जाये, यह समस्या थी। कहते हैं कि १०२ डिग्री के ऊपर का तापमान मस्तिष्क के लिये घातक होता है, उस समय तापमान कम करना अत्यावश्यक हो जाता है। पहले दिन हमारा अधिकतम तापमान १०१.५ डिग्री तक ही गया और मस्तिष्क भी दुरुस्त रहा, लगा कि लड़ाई तगड़ी चल रही है। थोड़ा देखे, फिर पैरासीटामॉल खा कर सो गये, उठे तो तापमान कम था, सोचा लड़ाई का क्या हुआ, ठीक से चल रही है कि मंदी पड़ गयी? उत्तर उस समय तो पता नहीं चला पर छह-सात घंटे बाद पुनः तापमान बढ़ आया, लगभग उतने समय बाद ही, जब तक पैरासीटामॉल का प्रभाव रहा। अगले दो दिनों में तापमान ९९-१०० के बीच में ही रहा, पैरासीटामाल नहीं खायी, बस पानी अधिक पिया और विश्राम किया।

शरीर तो स्थिर हो गया पर एक स्वाभाविक संशय मन में आया कि जब पैरासीटामाल ली थी, क्या उस समय लड़ाकू कोशिकायें युद्धरत थीं या वो भी ठंडी पड़ गयी थीं, जैसे रुस की सर्दियों में जर्मनी की सेनायें। उत्तर के लिये जब संबंधित मेडिकल साहित्य पढ़ा तो तीन प्रमुख बातें पता लगीं। विज्ञ इस पर अधिक प्रकाश डाल पायेंगे पर उल्लेख प्रासंगिक है। पहला, शरीर का बढ़ा तापमान स्वस्थ संकेत हैं और जब तक १०२ के नीचे रहे और अधिक समय के लिये न रहे, पैरासीटामॉल के उपयोग की आवश्यकता नहीं है। दूसरा, पैरासीटामॉल लड़ाकू कोशिकाओं के कार्य को बाधित करता है, बैक्टीरिया को मारने वाले अवयव के उत्पादन की प्रक्रिया क्षीण करता है, या संक्षेप में कहें कि शरीर की प्राकृतिक रक्षा पद्धति में हस्तक्षेप करता है। तीसरा, बढ़ा हुआ तापमान आक्रान्ता की शक्ति को कम करता है, पैरासीटीमॉल से यह तापमान कम होते ही उन्हें और बल मिलता है और बीमारी की अवधि कम होने के स्थान पर बढ़ जाती है।

अब शोधकर्ता और विशेषज्ञ चाहे जो कहें, हमें अधिक तापमान सहन नहीं हो पाता है। हम तो तुरन्त ही पैरासीटामॉल खाकर युद्धविराम का संकेत दे देते हैं, अब इस समय का उपयोग शत्रुपक्ष सशक्त होने में लगाये या उसके लिये हमारा सुरक्षा तन्त्र कितना हल्ला मचाये। ध्यान से देखिये तो न जाने कितने सामाजिक, राष्ट्रीय और वैश्विक संदर्भों में हम यही तो कर रहे हैं, गले के नीचे पैरासीटामॉल उतार लिये हैं और आँख बन्द कर सो गये हैं, उन स्थितियों में भी, जहाँ तापमान सहन करना हमारी क्षमता की सीमाओं में था।

20.10.12

लैपटॉप या टैबलेट - अनुभव पक्ष

पता नहीं जो लोग ढेरों पैसा कमा लेते होंगे, वे अपनी वसीयत कैसे लिखते होंगे, बड़ा ही कठिन कार्य है यह, पहले संग्रहण करो फिर बाँट दो। हम तो एक एक संग्रह में पसीना बहा देते हैं, खरीदने के पहले ही उसके निस्तारण का निर्णय लेना पड़ता है। ऐसा ही कुछ हमारे घर में भी हुआ, बड़ी रोचकता से भरा, संभवतः सबके साथ कुछ ऐसा ही होता होगा।

हम मैकबुक एयर और आईफोन खरीद चुके थे और अपने घर में ही विकसित देशों के नागरिक की तरह रह रहे थे। घर के शेष तीन लोग पुराने उपकरणों के साथ थे और स्वयं को विकासशील देश के नागरिक की तरह समझ रहे थे। वितरण इस प्रकार था, डेस्कटॉप व पुराना आईपॉड बच्चों के हिस्से में, हमारे द्वारा मुक्त किया गया तोशीबा का लैपटॉप व ब्लैकबेरी का मोबाइल श्रीमतीजी के हिस्से में और एप्पल के दो नवीनतम उत्पाद हमारे हिस्से में। वितरण आवश्यक था, नहीं तो सबको एक साथ ही एक उपकरण में कार्य करने की सूझती है।

लगा था कि वितरण बड़े ही न्यायप्रिय दृष्टि से हुआ है, न केवल शान्ति बनी रहेगी वरन प्रसन्नता भी बिखरेगी। ऐसा नहीं हुआ, हमारे घर में ही हमारे विरुद्ध विरोध के स्वर उठने लगे। अपने लिये तो इतना अच्छा ले लिया, हम लोगों के लिये पुराना, यह डेस्कटॉप कितनी आवाज करता है, हमारा सिस्टम कितने धीरे चलता है, आप तो घर में कभी भी बैठ कर काम कर लेते हैं, आदि आदि। हमें लगने लगा कि एक स्थिति बन रही है जिसमें घर का मुखिया अपने लिये सारी सुविधायें रख कर औरों को उनसे वंचित रखता है। हमारा ग्लानि भाव धीरे धीरे बढ़ने लगा, उससे बाहर निकलना आवश्यक था।

विकल्प अधिक नहीं थे। निर्णय लिये जाने आवश्यक थे, पर इस बार ऐसा कोई निर्णय नहीं लेना चाहता था, जिससे असंतुष्टि बनी रहे, निर्णय में सबको सहभागी बनाना आवश्यक था। बहुत सोच विचार कर एक प्रस्ताव हमने परिवार-परिषद में रखा। बहुत कम होता है कि लोकतान्त्रिक व्यवस्था में सब प्रसन्न रहें, किसी एक का हित साधा जाता है तो दूसरा रूठ जाता है। बहुत कम ही ऐसे समाधान होते हैं, जो सबको अपना सा लगे। सीमित संसाधन होते हैं और सबको बांटे भी नहीं जा सकते हैं।

निश्चय किया गया कि एक आईपैड ले लेते हैं और डेस्कटॉप को विदा कर देते हैं। डेस्कटॉप बहुत ऊर्जा खा रहा था, तुलना की जाये तो उसी कार्य के लिये लगभग २० गुना। हम मैकबुक एयर और आईफोन रखे रहेंगे, श्रीमतीजी को आईपैड और ब्लैकबेरी और बच्चों को तोशीबा का लैपटॉप व आईपॉड। यही नहीं, इस बात का भी निर्णय लिया गया कि चार वर्ष बाद जब हमारा मैकबुक एयर और आईफोन पृथु को मिलेंगे, श्रीमतीजी के उपकरण देवला को मिलेंगे, हम लोग तब तकनीक के नये प्रयोग पुनः प्रारम्भ करने के लिये स्वच्छन्द रहेंगे। अगले चार वर्षों में तोशीबा का लैपटॉप ९ वर्ष का जीवन जी लेगा और आईपॉड भी लगभग ७ वर्ष की उपयोगिता निभा जायेगा, उसके बाद दोनों सेवानिवृत्त हो जायेंगे। उत्तराधिकार नियत करने से बच्चों को हमारे उपकरणों से लगाव हो चला है, विरोध के स्वर भी शमित हो गये हैं और भविष्य में और आधुनिक उपकरण लेने के लिये निश्चयात्मकता भी हो गयी है।

मूल प्रश्न अभी भी वहीं टँगा है कि लैपटॉप या टैबलेट। यद्यपि जिस समय मैंने मैकबुक एयर लिया था, उस समय पर्याप्त समय दिया था और विश्लेषण किया था, यह निर्धारित करने के लिये कि लैपटॉप लें या टैबलेट, और वह भी किस कम्पनी का। उस समय शोरूम में ही जाकर दोनों का अनुभव लिया था, तब भार की दृष्टि से, धन की दृष्टि से, सम्हालने की दृष्टि से, कार्य विशेष की दृष्टि से, हर प्रकार से यही निर्णय लिया कि मैकबुक एयर ही लेना है। तब समय भी कम था और विश्लेषण बौद्धिक अधिक था, व्यवहारिक कम। अब जब घोर पारिवारिक कारणों से आईपैड भी घर में आ गया है और लगभग ७ माह का अनुभव दे चुका है, दोनों की तुलना अपना रंग बदल चुकी है, कुछ तथ्य नये आये हैं और कुछ पुराने तथ्य गलत सिद्ध हुये हैं। साथ ही साथ मोबाइल की उपस्थिति ने विश्लेषण को एक नयी गहराई दी है।

लैपट़ॉप, टैबलेट और स्मार्टफोन, तीनों रखने का कोई औचित्य नहीं है, पर केवल दो से भी पूरा कार्य नहीं चल सकता है। यह वाक्य भ्रमित करने वाला लग सकता है, पर इसके पीछे कारण है, एक द्वन्द्व छिपा है, एक दर्शन छिपा है। यदि आप गतिमय रहेंगे तो सारी क्षमतायें ढोकर नहीं चल सकते। मोबाइल फोन गतिमयता का प्रतीक है, लैपटॉप क्षमताओं का। टैबलेट दोनों के बीच का है, इसमें गतिमयता भी है और क्षमता भी, पर समय पड़ने पर दोनों के कई कार्य नहीं कर पाता है।

यदि आपके पास तीनों है तो कुछ न कुछ अतिरिक्त है, लगभग २० प्रतिशत। यदि आपके पास केवल लैपटॉप और मोबाइल है तो आपका कुछ न कुछ छूट रहा है, लगभग २० प्रतिशत। तीनों उपकरण लेकर न केवल आप अधिक धन खर्च करेंगे वरन तीनों के सामञ्जस्य के लिये ढेरों समय भी व्यर्थ करेंगे, भ्रम बना रहेगा और सततता बाधित होगी, वह भी अलग से। लेकिन दो उपकरण होने पर भी आपको २० प्रतिशत उपयोगिता की रिक्तता अपनी ओर से भरनी पड़ती है। यह रिक्तता भी तीन तरह से भरी जा सकती है या तीसरे उपकरण का आंशिक उपयोग करके, या अपनी आदतों में बदलाव लाकर या उन्नत तकनीक अपना कर। तीनों को उदाहरणों से स्पष्ट करना आवश्यक है।

श्रीमतीजी के पास टैबलेट और मोबाइल है, उनका लगभग सारा कार्य गतिमयता से हो जाता है। लगभग २० प्रतिशत कार्य छूटता है, बड़ी फिल्में नहीं देख पाती हैं, फोटो आदि नहीं सहेज पाती है, गाने इत्यादि डाउनलोड नहीं कर पाती हैं, १६ जीबी से अतिरिक्त कुछ सहेजने के लिये उन्हें सोचना पड़ता है, हम पर या बच्चों पर निर्भर रहना पड़ता है। उन्हें संकोच नहीं होता है, हम सब भी उन्हें तकनीक सिखाने को तत्पर रहते हैं, वह तीसरे उपकरण का आंशिक उपयोग करके अपना कार्य चला लेती हैं।

दूसरी श्रेणी में हमारे एक मित्र हैं, घर में एक बड़ा सा लैपटॉप है और हाथ में औसत से अधिक क्षमता का मोबाइल। गतिमयता का पर्याप्त कार्य मोबाइल से कर लेते हैं, ईमेल देख लेते हैं, फेसबुक स्टेटस चेक कर लेते हैं, छोटे मोटे नोट्स भी लिख लेते हैं। घर पहुँचकर ही वे अपने शेष कार्य कर पाते हैं, ब्लॉग पर टिप्पणी करना, लेख लिखना, शोध करना। उन्होंने अपनी आदतों में यह बसा लिया है कि कब क्या करना है? जो २० प्रतिशत की यह रिक्तता है, वह उससे संतुष्ट हैं।

तीसरी श्रेणी में हम जैसे लोग आते हैं। हम न तो किसी पर निर्भर रहना चाहते हैं और न ही अपनी आदतों में ही कोई बदलाव लाना चाहते हैं। हम २० प्रतिशत की रिक्तता तकनीक से भरना चाहते हैं। एक ऐसा लैपटॉप ढूढ़ते हैं जो पूरी क्षमता का हो, हल्का हो और कहीं भी ले जाया जा सके। साथ ही साथ एक ऐसा मोबाइल जो सारे कार्य करने में सक्षम हो, क्षमताओं से भरा हो। हर कम्पनी के नये मॉडल इसी दिशा में आ रहे हैं और अधिक मँहगे भी हैं। धन व्यय करना तभी करना चाहिये जब हम में उन उपकरणों की पूरी क्षमता निचोड़ने की इच्छाशक्ति हो।

तीसरी श्रेणी के समक्ष उपस्थित विकल्पों और तकनीक से जुड़े पहलुओं पर चर्चा अगली पोस्ट में।

9.3.11

देवेन्द्र दत्त मिश्र

पहली बार मिला प्रशासनिक कार्य से, अभिरुचियों की चर्चा हुयी, पता चला साहित्य में रुचि है तो दोनों साथ हो लिये मेरे वाहन में, दो घंटे की यात्रा, संवाद की गूढ़ता में डूबे हम लोगों को ड्राइवर महोदय ने ही बताया कि सर, घर आ गया है। जीवनयात्रा में यात्राओं ने बहुत कुछ दिया है, मिला एक और उपहार, मुझे भी, साहित्य को भी और संभवतः ब्लॉग जगत को भी।

बहुधा ऐसा होता है कि हम अपनी योग्यताओं को अकारण किसी पर थोपते नहीं हैं, एक कारण बहुत ही सौम्य होता है, हमारी विनम्रता, पर उसमें हमें अपनी योग्यताओं का भान सतत रहता है, व्यक्तित्व में गुरुता बनी रहती है। दूसरा कारण प्राकृतिक होता है, फक्कड़ी जैसा, योग्यता गुरुता नहीं लाती व्यक्तित्व में, व्यवहार की सहजता में मात्र प्रसन्नता ही बिखरती है चहुँ ओर, लहरों के उछाल में पता ही नहीं चलता कि सागर कितना गहरा है।

दो घंटों की बातचीत, न जाने कितने पक्ष खोलती गयी, एक के बाद एक, बीज से प्रारम्भ हुआ ज्ञान का वटवृक्ष बन फैलता गया, न जाने कितना क्षेत्रफल समेटे मुठ्ठीभर मस्तिष्क में। मेरा सौभाग्य ही कहेंगे इसे कि मेरे सम्मुख वह खुलते गये।

अनुभव की व्यापकता मशीनी मानव से भिन्न व्यक्तित्व निर्मित करती है, एक विशेष, विशद, समग्र दृष्टिकोण लिये। न जाने कौन सा अनुभव कब काम आ जाये, किस नये क्षेत्र में उसका उपयोग एक क्रान्ति का प्रादुर्भाव कर बैठे, इतिहास भरा पड़ा है ऐसे उदाहरणों से। सामाजिक व व्यवहारिक रूपों में उन अनुभवों का समन्वय जो निष्कर्ष लेकर आता है, उसकी प्रतीक्षा में ही सकल विश्व बाट जोहता बैठा रहता है, हर प्रभात के साथ। मैं मैराथन में अनुभव किये सत्य जब परिवार में लगाता हूँ तो धैर्य जैसे गुणों को सम्मानित स्थान मिल जाता है। लेन्ज का नियम पुत्र के तेवर बताने लगता है। गणित का सवाल हल कर लेने का उत्साह छोटी छोटी बातों में प्रसन्न हो जाना सिखा देता है। अंतरिक्ष की विशालता में स्वयं का स्थान जीवन से गुरुता निकाल फेंकती है। विभिन्न क्षेत्रों के अनुभवजन्य सत्य जीवन का अस्तित्व सुखद करने में लगे हुये हैं।

एक इलेक्ट्रिकल इन्जीनियर, आई आई एम बंगलोर से प्रबन्धन के परास्नातक, मेट्रो प्रोजेक्ट के 6 वर्ष के अग्रिम अनुभव में पके, विदेश में कार्यसंस्कृति के प्रशिक्षण में पगे, अध्यात्म के संदर्भों के जानकार, साहित्य में प्रबल हस्तक्षेप रखने वाले, कवि हृदय, सहजता के सुरवेत्ता और अपने सब गुणों को अपनी फक्कड़ी के भीतर छिपाये देवेन्द्र दत्त मिश्र से जब आप मिलेंगे तो उनकी मुस्कराहटपूर्ण आत्मीयता आपको उनके साथ और संवाद करने को विवश कर देगी।

मेरा स्वार्थ बड़ा साधारण सा था, उन्हे कुछ लिखने के लिये प्रेरित करना। पर मेरा विश्वास उतना साधारण नहीं है, जो यह माने बैठा है कि उनके अनुभव के छन्नों से छनकर जो सृजन उतरेगा, वह साहित्य व ब्लॉग जगत के लिये संग्रहणीय होगा। मेरे कई बार उलाहना देने पर उन्होने अपना ब्लॉग प्रारम्भ कर दिया है और सम्प्रति प्रबन्धन जैसे गूढ़ विषय को हिन्दी में लाने का महत प्रयास भी कर रहे हैं। उन्होने इन्फोसिस के प्रबन्धन पर लिखी पुस्तक को आधारस्वरूप लिया है, इस कार्य के लिये। दर्शन का संपुट, कविता का संप्रेषण, प्रबन्धन की गूढ़ता, सब एक में समाहित।

एक और विमा, साहित्य के घेरे में, संवर्धन की प्रक्रिया कई विषयों के लिये। स्वागत कर लें उनका, उत्साह बढ़ा दें उनका और आशा करें कि क्षमतानुसार और समयानुसार जितना भी लिख पायें वे, लिखते रहें।

इतना ही स्वार्थ हो हम सबका भी।