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13.10.12

पुस्तकें बुलाती हैं

पुस्तकों से एक स्वाभाविक लगाव है। किसी की संस्तुति की हुयी पुस्तक घर तो आ जाती है, पर पढ़े जाने के अवसर की प्रतीक्षा करती है। मन में कभी कोई विचार उमड़ता है, प्यास बन बढ़ता है, स्पष्ट नहीं हो पाता है। आधी लगी दौड़ जैसी, जब अभिव्यक्ति ठिठकने लगती है और लिखने के लिये कुछ सूझता नहीं है, तब लगता है कि अन्दर सब खाली हो चुका है, फिर से भर लेने की आवश्यकता है। एक पुस्तक उठा लेता हूँ, पढने के लिये, या कहें कि लेखक से बतियाने लगते हैं। पहले बैक कवर पढ़ते है, फिर प्रस्तावना, फिर विषय सूची, उत्सुकता बनी रही तो कुछ अध्याय भी। धीरे धीरे यही क्रम बन गया है, बहुत कम ही ऐसा हुआ है कि प्रारम्भ में रुचिकर लगी पुस्तक अन्त में बेकार निकली हो।

संस्तुति की गयी सीमित पुस्तकों में यह संभव है। उन पुस्तकों के नाम मोबाइल में रहते हैं, कभी पुस्तकों की दुकान जाना हुआ तो, वहाँ ढूढ़कर पढ़ लेते हैं। बंगलोर में यह बात बहुत ही अच्छी है कि तीन बड़े बुकस्टोर, रिलायंस टाइमआउट, क्रॉसवर्ड और लैण्डमार्क, तीनों में ही बैठकर पढ़ने की सुविधा है, शान्ति भी रहती है और कॉफी भी रहती है, आप अधिक समय तक बैठकर पढ़ सकते हैं, कोई भी आपको जाने को नहीं कहेगा, विशेषकर जब आप बहुधा वहाँ जाते हों। साप्ताहिक खरीददारी करने के क्रम में डिजिटल स्टोर और बुक स्टोर नियमित पड़ाव रहते हैं। समय कम रहा तो संस्तुति की गयी तीन चार पुस्तकें ही पढ़ पाता हूँ, अधिक समय मिलता है तो आठ दस पुस्तकें और पलट लेता हूँ। हाँ, टटोलने का क्रम वही रहता है, बैक कवर से। यह अनुभव बड़ा ही अच्छा लगता है, उन दुकानों की तुलना में, जहाँ एक एक पुस्तक माँगने पर दुकानदार आपको भारस्वरूप देखते हैं और पुस्तकें अनमने भाव से आपके सामने फेंक दी जाती हो। दो तीन से अधिक पुस्तकों के बारे में पूछने लगिये तो आपसे यह प्रश्न पूछ ही लिया जाता है कि खरीदने के लिये पैसे भी हैं जेब में?

जहाँ यह सुविधा होती है, वहाँ उसका पूरा लाभ उठाने वाले कई लोगों को यह लग सकता है, कि जब यहीं आकर पढ़ा जा सकता है, तो पुस्तक खरीदने की क्या आवश्यकता है? विचार आने से रोका नहीं जा सकता है। जब अभी तक पुस्तकों को किसी रत्न या हीरे की तरह किसी पुस्तकालय या दुकान में सजा देखा हो, तो यह विचार आने की संभावना और भी बढ़ जाती है। हमारे साथ भी ऐसा हुआ, जब पहले पहले यह सुविधा मिली तो कुछ पुस्तकों के बीस तीस पन्ने वहीं पर बैठकर पढ़ डाले। लगा कि ढेरों पैसे बचा लिये, दुकान को लूट लिया। अब तीन साल बाद देखता हूँ कि पुस्तकों के संग में रहने का नशा बहुत मादक होता है, एक बार लगता है तो छूटता नहीं है। यदि उन दुकानों में बैठकर पढ़ने का अवसर नहीं पाया होता, तो इतनी पुस्तकें खरीदकर घर में नहीं लाता। लगभग हर बार यही हुआ कि कोई न कोई पुस्तक लेकर घर आ गया। अब लगता है कि इन लोगों ने चखा चखा के हमें ही लूट लिया।

बचपन में विद्यालय से जब घर आता था तो घर में बहुधा कोई नहीं मिलता था, बस समय बहुत मिलता था। भरी दुपहरियाँ, बाहर जाकर खेलना कठिन, बस पुस्तकें ही सहारा बन कर रहती थीं। पुस्तकें पढ़ने का क्रम तभी से चल पड़ा। पहले तो घर में रखी सारी साहित्यिक पुस्तकें पढ़ लीं, कहानी के रूप में लिखे ग्रन्थ पढ़ डाले, सोवियत संघ से आने वाली कई मैगज़ीन पढ़ डालीं और जब धीरे धीरे ये समाप्त हो चलीं तो अपने चाचाजी द्वारा पढ़े गये और सहेजे गये ढेरों जासूसी और चटपटे सामाजिक उपन्यास पढ़ डाले। जीवन में उतना निश्चिंत समय फिर कभी नहीं मिला। दस वर्ष की अवस्था में न यह ज्ञान था कि क्या पठनीय है, भारी भरकम तर्कों का क्या अर्थ है, और किस पुस्तक का क्या महत्व है? बस पढ़ते गये, एक नशा सा समझ कर चढ़ाते गये, एक परमहंसीय मानसिकता से पुस्तकें पढ़ीं तब।

धीरे धीरे अनुभव आया, अच्छी पुस्तकों के बारे में पता चला, किन पुस्तकों को पढ़ना समय व्यर्थ करने सा था, वह भी पता चला। यह भी पता चला कि इतनी पुस्तकें हैं जगत में कि सारी पढ़ी भी नहीं जा सकती हैं। अपनी संस्कृति से परे और भी रंग हैं पुस्तकों के इन्द्रधनुष में। अभिरुचि किसी विषय विशेष के प्रति नहीं, बस पढ़ने के प्रति बनी रही। शिक्षापद्धति के अन्तर्गत पाठ्यक्रम की पुस्तकों ने आकर डेरा जमा लिया, घर के सीमित आकार और दिन के सीमित समय को पूरा घेर लिया। कई वर्ष अपनी रुचि का ठीक से पढ़ ही नहीं पाया। विद्यालय का पुस्तकालय अधिक बड़ा नहीं था और शीघ्र ही सारी पुस्तकें पहचानी सी लगने लगीं। अस्तित्व के लिये संघर्ष ने प्रतियोगी परीक्षाओं से संबधित पुस्तकों के पढ़ने को विवश कर दिया, पढ़ने की प्यास बुझी ही नहीं, मन अतृप्त बना रहा।

आईआईटी कानपुर का पुस्तकालय, जीवन में एक श्रेष्ठ उपहार बनकर आया। इतना बड़ा पुस्तकालय पहले कभी नहीं देखा था। कोई ऐसा विषय नहीं देखा जिससे संबन्धित उत्कृष्ट पुस्तकें वहाँ उपस्थित न हों। हिन्दी, दर्शन, इतिहास, शोध का इतना बड़ा संग्रह एक आश्चर्य था मेरे लिये। विज्ञान और इन्जीनियरिंग से संबन्धित पुस्तकों के बारे में तो कहना ही क्या? बहुधा जब कल पुर्जों और उनकी गतियों से मन ऊबने लगता था तो कोई न कोई रोचक छाँह मिल जाती थी पुस्तकों की। न जाने कितने विषय पर कितनी पुस्तकें पढ़ डाली वहाँ पर। जब किसी एक अभिरुचि में बँधने का नहीं सोचा तो सारी पुस्तकें आकर्षित करती रहीं। भौतिकी से लेकर पराभौतिकी तक, विलास से लेकर अध्यात्म तक, इतिहास से लेकर भविष्य तक और दर्शन के न जाने कितने विचारपुंज, सब आँखों के सामने से निकल गये।

बहुत बार ऐसा होता था कि कोई अच्छा वाक्य पढ़ा तो उसे याद करने का मन हो उठता था। याद करना और समय आने पर उसका उपयोग कर अंक बटोर लेने की आदत वर्तमान शिक्षापद्धति के प्रभाव स्वरूप अब तक स्वभाव से बँधी हुयी थी। ऐसा करने से सदा ही पुस्तक का तारतम्य टूट जाता है। औरों के सजाये शब्द आपके जीवन में वैसे ही उतर आयेंगे, यह बहुत ही कम होता है, एक आकृति सी उभरती है विचारों की, एक बड़ा सा स्वरूप समझ का। धीरे धीरे वाक्यों को याद करने की बाध्यता समाप्त हो गयी और पुस्तकों को आनन्द निर्बाध हो गया। थककर पुस्तकालय में बहुत बार सो भी गया, भारी भारी स्वप्न आये, निश्चय ही वहाँ के वातावरण का प्रभाव व्याप्त होगा स्वप्नलोक में भी।

अब समय अपना है, कोई परीक्षा भी नहीं उत्तीर्ण करनी है, पर जीवन यापन करने में समय की कमी हो चली है। कभी कभी मन को समझाने का प्रयास करता हूँ कि कितना कुछ पढ़ लिया है, एक स्पष्ट समझ विकसित भी हो गयी है, तो और पुस्तकें पढ़ने की क्या आवश्यकता? यह तर्क थोड़े समय के लिये आहत मन को सहला तो देता है पर पुस्तकों की दुकान जाते रहने से रोक नहीं पाता है। कुछ और खरीदने जाता हूँ तो पैर स्वतः ही पुस्तकों की ओर खिंचे चले जाते हैं।

पुस्तकों के बीच पहुँच कर लगता है कि विश्व के श्रेष्ठ मस्तिष्कों के बीच आकर बैठ गया हूँ। वहाँ जाकर यह पता लगता है कि कितना कुछ लिखा जा रहा है, किन विषयों पर लिखा जा रहा है। यह जानना बहुत ही आवश्यक है कि श्रेष्ठ मस्तिष्कों के चिन्तन की दिशा क्या है, किन संस्कृतियों में क्या विषय प्रधान हो चले हैं और किन विषयों को अब अधिक महत्व नहीं दिया जा रहा है। यह समझना और जानना धीरे धीरे एक अभिरुचि के रूप में विकसित होता जा रहा है। बैठे बैठे कइयों पुस्तकें उलट लेता हूँ, सारांश समझ लेता हूँ, अच्छी लग ही जाती हैं, खरीद लेता हूँ। बौद्धिक प्यास बुझाकर वापस आता हूँ, कि थोड़े दिन संतृप्त रहेगा मन। पर क्या करूँ, उनके आसपास से कभी निकलना होता है तो बलात खींच लेता है उनका आकर्ष। खिंचा चला जाता हूँ, जब पुस्तकें बुलाती हैं।

21.9.11

क्या हुआ तेरा वादा ?

पुस्तकें बड़ी प्रिय हैं, जब भी कभी बाहर जाता हूँ दो पुस्तकें अवश्य रख लेता हूँ। पढ़ने का समय हो न हो, यात्रा कितनी भी छोटी हो, एक संबल बना रहता है कि यदि विश्राम के क्षण मिले तो पुस्तक खोल कर पढ़ी जा सकती है। बहुत बार पुस्तक पढ़ने का अवसर मिल जाता है पर शेष समय पुस्तकें ढोकर ही अपना ज्ञान बढ़ाते रहते हैं। पुस्तक साथ रहती है तो एक संतुष्टि बनी रहती है कि सहयात्री यदि मुँह बनाये बैठे रहे तो समय काटना कठिन नहीं होगा, यद्यपि बहुत कम ऐसा हुआ है कि शेष पाँच सहयात्री ठूँठ निकले हों। अन्ततः कुछ ही न पढ़कर पुस्तकें सुरक्षित वापस आ जाती हैं। पुस्तकस्था तु या विद्या का श्लोक पढ़ा था पर सारा ज्ञान पुस्तक में लिये घूमते रहते हैं और ज्ञानी होने का मानसिक अनुभव भी करते हैं।

पहले समय अधिक रहता था, पुस्तके पढ़ने और समाप्त करने का समय मिल जाता था। मुझे अभी भी याद है कि कई पुस्तकें मैने एक बार में ही बैठ कर समाप्त की हैं। जिस लेखक की कोई पुस्तक अच्छी लगती थी, उसकी सारी पुस्तकें पढ़ डालने का उपक्रम अपने निष्कर्ष तक चलता रहता था। कभी भी किसी विषय पर रोचक शैली में लिखा कुछ भी अच्छा लगने लगता है, सब क्षेत्रों में कुछ न कुछ आता है पर किसी क्षेत्र विशेष में शोधार्थ समय बहाने की उत्सुकता संवरण करता रहता हूँ। किसी पुस्तक को मेरे द्वारा पुनः पढ़वा पाने का श्रेय बस कुछ गिने चुने लेखकों को ही जाता है।

उपरिलिखित बाध्यताओं के कारण घर में पुस्तकों का अम्बार सजा है। श्रीमती जी को भी यह अभिरुचि भा गयी है, पर उनके विषय अलग होने के कारण एक नयी अल्मारी लेनी पड़ गयी है। पुस्तकें पढ़ने की गति से पुस्तकें खरीदी भी जानी चाहिये नहीं तो समय में व मस्तिष्क में निर्वात सा उत्पन्न होने लगता है। धीरे धीरे पुस्तकें घर आने लगीं, जब कभी भी मॉल जाना होता था, कुछ भी लाने के लिये, पर वापस आते समय हाथ में एक दो पुस्तकें आ ही जाती हैं। अल्मारी भरने लगती हैं, पढ़ी हुयी पुस्तकें उस पर सजने लगती हैं, आते जाते जब पढ़ी हुयी पुस्तकों पर दृष्टि पड़ती है तो अपने अर्जित ज्ञान पर विश्वास बढ़ने लगता है, किसी ने सच ही कहा है कि जिस घर में पुस्तकें रहती हैं उस घर का आत्मविश्वास बढ़ा रहता है।

आजकल अन्य कार्यों में व्यस्तता बढ़ जाने के कारण पुस्तकें घर तो आ रही हैं, पढ़ी नहीं जा पा रही हैं। अब अल्मारी के पास से निकलते समय कुछ अनपहचाने चेहरे मुलकते हैं तो ठिठक कर वहीं रुक जाता हूँ क्षण भर के लिये। कई बार ऐसे ही हो गया तो अगली बार उनसे मुँह चुराने लगा। घर यदि बड़े नगरों की तरह कई रास्तों का होता तो राह बदल कर निकल जाते, यहाँ तो नित्य भेंट की संभावना बनी रहती है।

जब एक दिन न रहा गया तो लगभग १२ अनपढ़ी पुस्तकों को समेटा, मेज पर सामने रख कर बहुत देर तक देखता रहा, गहरी साँसे ली और निश्चय किया कि आने वाले ६ महीनों में इन्हें पढ़ा जायेगा, अर्थात १५ दिन में एक। स्मृति बनी रहे, अतः १२ पुस्तकों को मेज पर रख दिया गया। जहाँ एक ओर आपकी शिथिलता को तो प्रकृति सहयोग करती है वहीं दूसरी ओर आपके विश्वास को परखने बैठ जाती है। जो नहीं होना था, हो गया, व्यस्तता अधिक बढ़ गयी और शरीर ढीला पड़ कर अपना ही राग अलापने लगा, या तो कार्य होता था या फिर शयन। कोल्हू के बैल सम अनुभव करने लगा।

कई दिन से मेज पर बैठा ही नहीं, कि कहीं पुस्तकें दिख न जायें, सोफे पर ही बैठकर ब्लॉगिंग आदि का कार्य कर लेता था। आज याद नहीं रहा और किसी कार्यवश मेज के पास पहुँच गया। सारी पुस्तकें एक स्वर में बोल उठीं….

 क्या हुआ तेरा वादा ?




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@ संतोष त्रिवेदी, @ डॉ0 ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ , @ Rahul Singh, @ Dr. shyam gupta
संभवतः अनपढ़ी पुस्तकों में हिन्दी की पुस्तक न पाना आप लोगों को निराश कर गया और यह अवधारणा दे गया कि मेरा पुस्तकीय प्रेम अंग्रेजी में ही सिमटा हुआ है। हिन्दी पुस्तकें बहुत पढ़ता हूँ और खरीदने के बाद अतिशीघ्र पढ़ लेता हूँ, इसीलिये कोई हिन्दी पुस्तक बची नहीं थी। यह तथ्य ध्यान दिलाकर आपने मेरा सुख बढ़ाया है।

4.12.10

7 लेखक, 36 पुस्तकें, एक सूत्र

एक लेखक की कई पुस्तकें एक सूत्रीय विचारधारा व्यक्त करती हुयी लग सकती हैं। दो लेखकों की पुस्तकों में भी कुछ न कुछ साम्य निकल ही आता है, तीन लेखकों में यही समानता उत्तरोत्तर कम होती जाती है, पर जब लगातार 7 लेखकों की लगभग 36 पुस्तकों में एक ही सिद्धान्त रह रह कर उभरे तब सन्देह होने लगता है, ईश्वर की योजना पर। वही प्रारूप, वही योजना, वही सन्देश, कहाँ ले जाने का षड़यन्त्र रच रहे हो, हे प्रभु। मान लिया कि पढ़ने में रुचि है, पर उसका यह अर्थ तो नहीं कि अब पुस्तकों के माध्यम से वही बात बार बार संप्रेषित करते रहोगे !

मेरे जीवन की जिज्ञासा आपकी भी बनकर न रह जाये अतः पहले ही आगाह कर देना चाहता हूँ इस पोस्ट के माध्यम से। पहला तो यह कि कितनी भी रोचक हों, इनमें से किसी भी लेखक की सारी पुस्तकें न पढ़ें, यह लेखक के विचारों को आपके मन में सान्ध्र नहीं होने देगा। दूसरा यह कि इन 7 लेखकों में से किन्ही दो या तीन लेखकों को न पढ़ें, यह उस विचार को आपके मन में धधकने से बचा लेगा। पिछले तीन वर्षों में 36 पुस्तकें पढ़, हम यह दोनों भूल कर बैठे हैं, आप न करें अतः शीघ्रातिशीघ्र आगाह कर अपनी आत्मीयता प्रदर्शित कर रहे हैं।

सर्वप्रथम तो सन्दर्भार्थ उन पुस्तकों का विवरण यहाँ पर दे रहा हूँ।
लेखक
पुस्तकें
रॉबिन शर्मा
'द मोन्क व्हू सोल्ड हिज़ फेरारी' से 'द ग्रेटनेस गाइड' तक 9 पुस्तकें
मार्शल गोल्ड स्मिथ
मोज़ो
रहोन्डा बर्न
सीक्रेट
पॉलो कोल्हो
'द एलकेमिस्ट' से 'विनर स्टैंड एलोन' तक 14 पुस्तकें
जेम्स रेडफील्ड
'द सेलेस्टाइन प्रोफेसी' से 'द सीक्रेट ऑफ सम्भाला' तक 4 पुस्तकें
ब्रायन वीज़
'मैनी लाइफ, मैनी मास्टर्स' से 'मेडीटेशन' तक 6 पुस्तकें
वेद व्यास
श्रीमद भगवतगीता

भगवतगीता को छोड़कर सारी पुस्तकें अंग्रेजी में पढ़ीं, अंग्रेजी सीखने में हुये कष्ट का मूल्य अधिभार सहित वसूल जो करना है। साथ ही सारी पुस्तकें मेरे शुभचिन्तकों द्वारा भिन्न भिन्न कालखण्डों में सुझायी गयीं। पढ़ना जिस क्रम में हुआ, उस क्रम में लेखकों को न रख विचार सूत्र के क्रम में व्यवस्थित किया है। सभी पुस्तकें अपने प्रस्तुत पक्ष में पूर्ण हैं और चिन्तन की जो भावी राहें खोल जाती हैं, उसे आगे ले जाने का कार्य अन्य पुस्तकें करती हैं। सभी पुस्तकों का विवरण एक साथ देने का उद्देश्य उस विचार सूत्र को उद्घाटित करना है जो उसे तार्किकता के निष्कर्ष तक ले जाने में सक्षम है। सार यह है।

वैचारिक विश्व भौतिक विश्व से अधिक महत्वपूर्ण है क्योंकि आपकी वैचारिक प्रक्रिया भौतिक जगत बदल देने की क्षमता रखती है। वैचारिक दृढ़निश्चय से आप कुछ भी कर सकने में सक्षम हैं। अतः आपकी मनःस्थिति का उपयोग परिवेश में उत्साह और प्रसन्नता भरने के लिये किया जाना चाहिये, इसके निष्कर्ष आश्चर्यजनक होते हैं। विचारों का एक अपना जगत है, आप जो सोचते हैं वह विचारजगत से अपने जैसे अन्य विचारों को आकर्षित कर लेता है जिससे उस विषय में आपके विचार प्रवाह को बल मिलता है। नकारात्मक विचार अपने जैसा प्रभाव आकर्षित करते हैं। आप यदि भयग्रस्त हैं तो आपके विरोधी को उस विचार से मानसिक बल मिलेगा आपको और सताने का, आपकी आशंकायें इसी कारण से सच होने लगती हैं। नकारात्मक विचारों को सकारात्मकता से पाट दें। आपका दृढ़निश्चय जितना घनीभूत होता जाता है, परिस्थितियाँ उतनी ही अनुकूल होती जाती हैं, कई बार तो आपको विश्वास ही नहीं होता कि सारा विश्व आपके विचारानुसार कार्यप्रवृत्त है। आपका जीवन, आपका विश्व आपके विचारों से ही निर्धारित है, सृजनात्मक शक्तियाँ प्रचुर मात्रा में अपना आशीर्वाद लुटाने को व्यग्र हैं। मृत्यु के समय की यह विचार स्थिति आपका अगला जीवन, आपका परिवेश और यहाँ तक कि आपके सम्बन्धियों का भी निर्धारण करती है। आप माने न माने, आप जिनसे अत्यधिक प्रेम करते हैं या अत्यधिक घृणा करते हैं, वह आपके अगले जीवन में आपके संग उपस्थित रहने वाले हैं। आपके जीवन की अनुत्तरित विशेष घटनायें आपके आगामी जीवन में कुछ न कुछ प्रभाव लिये उपस्थित रहती हैं। अतः विचारों को महत्तम मानें और पूरा ध्यान रखें उनकी गुणवत्ता पर।

इतनी पुस्तकों को कुछ शब्दों में व्यक्त करना कठिन है, पर भारतीय दर्शन के वेत्ताओं को यह विचार सूत्र बहुत ही जाना पहचाना लगता है। भगवतगीता को घर की मुर्गी दाल बराबर समझने की मानसिकता उस समय वाष्पित हो जायेगी जब शेष 35 पुस्तकों के निष्कर्ष आपको भगवतगीता पुनः समझने को उत्प्रेरित करेंगे। इन पुस्तकों को पढ़ने का श्रेष्ठतम लाभ भगवतगीता में मेरी आस्था का पुनः दृढ़ होना है।

आपको पुनः चेतावनी दे रहा हूँ, एक तो इतना व्यस्त रहें कि पुस्तकों की दुकान जाने का समय न मिले। यदि मिले भी तो आप याद कर के इन पुस्तकों को न खरीदे। यदि लोभ संवरण न कर पायें तो घर में लाकर बस सजाने के लिये रख दीजिये। अन्ततः इतने भौतिक प्रपंच पल्लवित कर लीजिये कि पढ़ने का समय न मिले। फिर भी यदि आप नहीं माने और पढ़ ही लिया तो आपके अन्दर आये परिवर्तन का दोष मुझे मत दीजियेगा क्योंकि वह विचार भौतिक जगत से अधिक ठोस होगा।

(निशान्त के द्वारा अंग्रेजी के कई श्रेष्ठ विचारों को हिन्दी में अनुवाद कर प्रस्तुत करने का एक महत कार्य हो रहा है, उन जैसे अन्य प्रयासों को समर्पित है यह पोस्ट।)