31.10.12

एक बड़ा था पेड़ नीम का

बचपन की सुन्दर सुबहों का भीना झोंका,
आँख खुली, झिलमिल किरणों को छत से देखा,
छन छन कर जब पवन बहे, तन मन को छूती,
शुद्ध, स्वच्छ, मधुरिम बन थिरके प्रकृति समूची,

आज सबेरा झटके से उग आया पूरा,
नही सलोनी सुबह, लगे कुछ दृश्य अधूरा,
आज नहीं वह पेड़, कभी जो वहाँ बड़ा था,
तना नहीं, ईटों का राक्षस तना खड़ा था,

पत्तों की हरियाली हत, अब नील गगन है,
नीम बिना भी पवन मगन है, सूर्य मगन है,
वही सुबह है, विश्व वही, है जीवन बहता,
आज नहीं पर, हृदय बसा जो तरुवर रहता,

खटक रहा अस्तित्व सुबह का, निष्प्रभ सूरज,
आज नहीं है नीम, बड़ा था, चला गया तज,
किस विकास को भेंट, ढह गया किस कारणवश,
किस लालच ने छीना मेरा प्रात-सुखद-रस,

सबने मिल कर काटा उसको,
बढ़ा लिया टुकड़ा जमीन का,
एक बड़ा था पेड़ नीम का।

44 comments:

  1. सुन्दर भावपूर्ण और चित्रमय कविता |

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  2. पर्यावरण घात पर एक यथार्थ अभिव्यक्ति

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  3. भारत के मनुष्य का लोभ उसे बहुत जल्दी ले डूबेगा.

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  4. बहुत अच्छी कविता है ..देवला की आवाज भी बहुत अच्छी है ....:-)

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  5. कमाल की पर्यावरण कविता ...।

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  6. इंसानों की तरह ही वृक्ष भी जीवन का हिस्सा हो जाते हैं .
    पर्यावरण चेतना पर अच्छी कविता !

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  7. नीम गया! समझो सच्चा हकीम गया।

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  8. यही हाल रहा तो जल्दी ही सारे पेड़ खतम हो जाएंगे

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  9. कुछ नीम नीम सी सालती रचना |

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  10. यूँ ज़मीन के टुकडे बढ़ाने को न जाने कितने पेड़ों बलि दे दी हमने .... मर्मस्पर्शी कविता

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  11. बड़ा खाली-खाली लगता होगा-न छाँह, न पक्षियों का कलरव,नीम के फूलों की भीनी गंध वातावरण महका देती है - फिर तो प्रकृति की जगह विकृति ही शेष रह जाती है !

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  12. नीम का पेड़ एक अहसास है, दादा‍ बाबा जैसा। इसके कटने के बाद व्यक्ति अपनी जड़ों से कट जाता है........ सुंदर भाव

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  13. tarakkee sab leel rahi hai...:(

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  14. आज के यथार्थ की पर्यावरण पर बेहतरीन प्रस्तुति,,,,

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  15. न जाने कितने पेड़ों की बाली ले ली है ज़मीन के लिए ... सुंदर प्रस्तुति

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  16. इसी पर आधारित मैने एक लघुकथा लिखी थी "नीम का पेड्"
    आभार्

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  17. भौतिकता के लिए प्राकृतिक बलि

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  18. उम्मीद कर रहा था कि गाँव से लौटने के बाद एक उम्दा, संवेदना से भरपूर रचना पढने को मिलेगी. यह कविता इस उम्मीद पर खरी है.शायद द्वार पर पर कोई नीम का पेड़ रहा होगा, जो विकास क़ी भेंट चढ़ चुका है. आज के इस दौर में जब लोग आदमी क़ी ही परवाह नहीं करते पर्यावरण क़ी फिक्र कौन करे?

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  19. प्रभावित करती अति सुन्दर रचना..

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  20. शायद हम यूँ ही देखते रहेंगे पेड़ो का कटना. क्षोभ सा होने लगा है अब

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  21. बहुत ही सशक्‍त अभिव्‍यक्ति .. आभार

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  22. सर जी सुन्दर कविता | मै शुक्रवार को गरीब रथ लेकर यशवंतपुर आ रहा हूँ | आप का स्वागत है |

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  23. ग़र एक जाये और दस लगायें , तो बात बने.

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  24. सुन्दर कविता. विद्यालय परिसर में खड़ा वो नीम का पेड़ याद आया, जो अब शायद नहीं है.

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  25. बहुत सुन्दर.

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  26. सम मात्रा न होने के बाद भी इस कविता में गायकी प्रचुरता से अनुभव होती है।

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  27. सशक्त अभिव्यक्ति
    जारी है प्रकृति की ह्त्या

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  28. Deeply touched my heart.

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  29. नीम बिना भला पवन कहाँ मगन है, सूर्य कहाँ मगन है,दोनों ही व्यग्र,क्लांत,उदास व क्रुद्ध हैं। किंतु दुर्भाग्य से यही हमारी दुष्कृति और फलस्वरूप यथायोग्य नियति है।

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  30. बहुत सुन्दर रचना !!!
    दो दिन पहले ही हमने भी नीम के पेड़ पर ही कुछ स्मृतियाँ सजाई हैं ,जल्द ही पोस्ट करूंगी....

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  31. Sad! Only redemption is to plant and look after few neem saplings.

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  32. उफ़ ! एक और बलिदान..मानव खुद अपना ही विनाश करने पर तुला है..

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  33. इस देश की भावी संतानें कहीं नीम की छाँव और सुरभित समीर से वंचित न रह जाएँ।।।

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  34. यही स्थिति रही तो ..अभी कितनों की और बली चढ़ेगी..

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  35. बढती जनसँख्या पेड़ों की दुश्मन है. सुंदरता से विषय को उठाया है.

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  36. वाह ...कड़वे नीम की मिठास भरी बातें ..

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  37. एक बड़ा था पेड़ नीम का
    बचपन की सुन्दर सुबहों का भीना झोंका,
    आँख खुली, झिलमिल किरणों को छत से देखा,
    छन छन कर जब पवन बहे, तन मन को छूती,
    शुद्ध, स्वच्छ, मधुरिम बन थिरके प्रकृति समूची,

    आज सबेरा झटके से उग आया पूरा,
    नही सलोनी सुबह, लगे कुछ दृश्य अधूरा,
    आज नहीं वह पेड़, कभी जो वहाँ बड़ा था,
    तना नहीं, ईटों का राक्षस तना खड़ा था,

    पत्तों की हरियाली हत, अब नील गगन है,
    नीम बिना भी पवन मगन है, सूर्य मगन है,
    वही सुबह है, विश्व वही, है जीवन बहता,
    आज नहीं पर, हृदय बसा जो तरुवर रहता,

    खटक रहा अस्तित्व सुबह का, निष्प्रभ सूरज,
    आज नहीं है नीम, बड़ा था, चला गया तज,
    किस विकास को भेंट, ढह गया किस कारणवश,
    किस लालच ने छीना मेरा प्रात-सुखद-रस,


    सबने मिल कर काटा उसको,

    बढ़ा लिया टुकड़ा जमीन का,

    एक बड़ा था पेड़ नीम का।

    आधुनिक रीअल्टर्स ,वाड्राज़ पर करारा व्यंग्य .

    महाकाल के हाथ पे गुल (पुष्प /गुम होना )होतें हैं पेड़ ,

    सुषमा तीनों लोक की कुल होतें हैं पेड़ .

    पेड़ पांडवों पर हुआ ,जब जब अत्याचार ,

    ढांप लिए वट भीष्म ने, तब तब दृग के द्वार .

    महानगर ने फैंक दी ,मौसम की संदूक ,

    पेड़ परिंदों से हुआ ,कितना बुरा सुलूक .

    एक बुजुर्ग (पेड़ )के न होने की पीड़ा से हताहत है कवि इस पोस्ट में .बेहतरीन रचना हमारे समय का विद्रूप पारी

    तंत्रों के साथ भी खुला खेल फर्रुखाबादी .

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  38. एक प्रतिक्रया ब्लॉग पोस्ट :2

    एक बड़ा था पेड़ नीम का
    बचपन की सुन्दर सुबहों का भीना झोंका,
    आँख खुली, झिलमिल किरणों को छत से देखा,
    छन छन कर जब पवन बहे, तन मन को छूती,
    शुद्ध, स्वच्छ, मधुरिम बन थिरके प्रकृति समूची,

    आज सबेरा झटके से उग आया पूरा,
    नही सलोनी सुबह, लगे कुछ दृश्य अधूरा,
    आज नहीं वह पेड़, कभी जो वहाँ बड़ा था,
    तना नहीं, ईटों का राक्षस तना खड़ा था,

    पत्तों की हरियाली हत, अब नील गगन है,
    नीम बिना भी पवन मगन है, सूर्य मगन है,
    वही सुबह है, विश्व वही, है जीवन बहता,
    आज नहीं पर, हृदय बसा जो तरुवर रहता,

    खटक रहा अस्तित्व सुबह का, निष्प्रभ सूरज,
    आज नहीं है नीम, बड़ा था, चला गया तज,
    किस विकास को भेंट, ढह गया किस कारणवश,
    किस लालच ने छीना मेरा प्रात-सुखद-रस,


    सबने मिल कर काटा उसको,

    बढ़ा लिया टुकड़ा जमीन का,

    एक बड़ा था पेड़ नीम का।

    आधुनिक रीअल्टर्स ,वाड्राज़ पर करारा व्यंग्य .

    महाकाल के हाथ पे गुल (पुष्प /गुम होना )होतें हैं पेड़ ,

    सुषमा तीनों लोक की कुल होतें हैं पेड़ .

    पेड़ पांडवों पर हुआ ,जब जब अत्याचार ,

    ढांप लिए वट भीष्म ने, तब तब दृग के द्वार .

    महानगर ने फैंक दी ,मौसम की संदूक ,

    पेड़ परिंदों से हुआ ,कितना बुरा सुलूक .

    एक बुजुर्ग (पेड़ )के न होने की पीड़ा से हताहत है कवि इस पोस्ट में .बेहतरीन रचना हमारे समय का विद्रूप पारि

    तंत्रों के साथ भी खुला खेल फर्रुखाबादी .

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  39. सबने मिल कर काटा उसको,
    बढ़ा लिया टुकड़ा जमीन का,
    एक बड़ा था पेड़ नीम का।

    ...बहुत बढ़िया सार्थक प्रस्तुति ....शुक्र है हमारे बगीचे के नीम के पेड़ को शहर की हवा नहीं लगी है अब तक ..

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  40. किस विकास को भेंट, ढह गया किस कारणवश,
    किस लालच ने छीना मेरा प्रात-सुखद-रस,
    आह ।

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