27.6.12

सहज मिले सो दूध सम

सुभाषितों में सदियों के अनुभव का निचोड़ छिपा रहता है, पाठ्यक्रम में कुछ सुभाषित थे, अभी तक याद हैं। उन्हें भूलना संभव ही नहीं, कोई न कोई ऐसी परिस्थिति आ ही जाती है जिसमें वे शतप्रतिशत प्रयुक्त होते हैं। पंचतन्त्र, हितोपदेश, गीता, रामचरितमानस, कबीर और न जाने कितने स्रोतों में ज्ञान के ऐसे गूढ़ तत्व छिपे हैं जो कि न केवल पढ़कर याद किये जायें वरन समय आने पर जीवन में उपयोग भी किये जायें। यह अलग विषय है कि आधुनिक शिक्षा पद्धति में इस प्रकार के सहज और ग्राह्य ज्ञान को बेसिरपैर की तुकबंदियों से भी अधिक हीन समझा जाता है। बुद्धिहीनता को रंगहीनता मानकर परोस देने का निष्कर्ष भी रंगहीन रहता है, परीक्षा के बाद उन्हें भूल न जाने का कोई कारण ही नहीं। जिन तुकबंदियों की बस अंक देने की उपादेयता हो, उनसे अधिक अपेक्षा क्यों रखी जाये भला?

ये सुभाषित केवल ज्ञानियों की ही विचारणीय सामग्री नहीं रही है, वह समाज के अशिक्षित व अर्धशिक्षित वर्ग के लिये सहजता से उपलब्ध है। अशिक्षित ग्रामीण भी जब अपने बेटे को अच्छी संगत के बारे में बताना चाहता है, तो वह भी तुलसीदास की वही चौपाई उद्धृत करता होगा, 'सात स्वर्ग अपवर्ग सुख धरिय तुला एक अंग, तूल न ताहि सकल मिलि, जो सुख लव सत्संग'। जब ज्ञान ही गेय हो जाये तो उससे अधिक उपयुक्त क्या हो सकता है, शब्द ज्ञान के लिये।

शिक्षा पद्धति जब जागे, तब जागे, हम बौद्धिक गुणवत्ता के प्रति जगे रहते हैं। ऐसे अमूल्य रत्नों को सुनना, मन में गुनना और फिर जीवन में उतारना, ऐसा लगता है कि किसी ने हाथ में कभी न समाप्त होने वाले रसना का पात्र दे दिया है। जितनी बार पढ़ते जाते हैं, सुनते जाते हैं, अर्थ और स्पष्ट होता जाता है। ज्ञान का अथाह अंबार भरा है सुभाषितों में, जब भी अवसर मिलता है, पढ़ता हूँ।

न्यूनतम-श्रमतन्त्रों से भरे इस विश्व में जब परिश्रम के बारे में स्वयं को आश्वस्त करना होता है तो सहज ही 'उद्यमेन हि सिद्धयन्ति, कार्याणि न मनोरथैः' याद आता है। जहाँ पराक्रम की आवश्यकता दिखती है, वहाँ 'वीरा भोग्या वसुन्धरा' याद आता है। जहाँ परिस्थियाँ अस्थिर करने के प्रयास में रहती हैं, वहाँ 'न दैन्यं न पलायनम्' का उद्घोष उठता है। जब नीरवता छा जाती है, तो 'सुख दुखे समेकृत्वा' का स्मरण हो आता है। ऐसे न जाने कितने ज्ञानसिंधु वाक्य हैं जो अतिसामान्य से अतिविशेष, सभी परिस्थितियों में अपना महत्व स्पष्ट कर जाते हैं।

ऐसा नहीं है कि अपनी संस्कृति में प्रति नैसर्गिक आकर्षण ही इस अनुराग का कारण है। निश्चय ही सत्य की खोज का प्रथम आधार वह होता है, पर अपनी संस्कृति के बाहर भी ज्ञान का आधार स्वीकार है और जितना अधिक अन्य संस्कृतियों और सभ्यताओं को जानता हूँ, अपनी संस्कृति के प्रति निष्ठा और प्रबल होती जाती है। उस पर भी यह ज्ञानमयी आधार प्रेम को सहज स्थायित्व दे जाता है।

कई प्रश्न होते हैं जो उत्तरित होने में समय लेते हैं। धन के प्रति अधिक मोह न पिताजी में देखा और न ही कभी स्वयं को ही मोहिल पाया। ऐसा भी नहीं था कि धन के प्रति कोई वितृष्णा रही हो। अधिक धन के प्रति न कभी जीवन को खपा देने का विचार आया और न ही कभी वैराग्य ले हिमालय प्रस्थान की सोच। जितना है, जो है, सहज है। जहाँ धन की सर्वोच्चता स्वीकार नहीं रही है, वहीं कभी धन के महत्व को नकारा भी नहीं है। यह सोच समाज-मत से भिन्न अवश्य हो सकती है, पर हमारी प्रसन्नता का संसार वहीं बसता है। इस स्वभाव को समझा पाना बहुधा कठिन हो जाता था, बस मन यही कहता था, कि हम ऐसे ही हैं, ईश्वर ने अधिक रुचि लेकर हमें नहीं बनाया।

जब भी कोई दोहा या सुभाषित आपकी विचारशैली से अनुनादित होता हुआ मिलता है तो ऐसा लगता है कि आपकी जैसी मनःस्थिति इस धरा में पहले भी आ चुकी है, आपको सहसा किसी के साथ होने का अनुभव होने लगता है, आपको सहसा सहारा मिल जाता है। ऐसा लगता है किसी ने आपको ही लक्ष्य करके यह लिखा है या लगता है कि बस यही उत्तर है जो प्रश्नभरी आँखों में जाकर झोंक आओ।

बस ऐसे ही विचार तब आये जब कबीर का यह दोहा पढ़ा,

सहज मिले सो दूध सम, मांगा मिले सो पानि
कह कबीर वह रक्त सम, जामें एंचातानि।

आशय स्पष्टतम है, जो सहजता से प्राप्त हो वह दूध जैसा है, जिसके लिये किसी से झुककर माँगना पड़े वह पानी के समान है और जिसके लिये इधर उधर की बुद्धि लगानी पड़े और दन्द-फन्द करना पड़े वह रक्त के समान है। किसी घर में संपत्ति संबंधी छोटी छोटी बातों पर जब झगड़ा होते देखता हूँ तो बस यही दोहा मन ही मन बुदबुदाने की इच्छा होती है। भाईयों का रक्त बहते तक देखा है, यदि न भी बहे तो भी संबंधों का रक्त तो निश्चय ही बह जाता है, संबंध सदा के लिये दुर्बल और रोगग्रस्त हो जाता है।

बहुत लोग ऐसे हैं, जिन्हें छोटी छोटी बातों के लिये झगड़ा करना तो दूर, किसी से कुछ माँगना भी नहीं सुहाता है। ऐसे दुग्धधवल व्यक्तित्वों से ही विश्व की सज्जनता अनुप्राणित है। ईश्वर करे उन्हें उनके कर्मों से सब सहज ही मिलता रहे। ईश्वर करे कि जो ऐसी आदर्श स्थिति में नहीं भी है, उन्हें भी कम से कम वह रक्त तो दिखायी पड़े जो हमारे छलकर्मों से छलक आता है।

मनन कीजिये, मन स्वीकार करे तो भजन कीजिये, कबीर के साथ, 'सहज मिले तो....'

23.6.12

अच्छा होने की कठिनाईयाँ

पहले यह स्पष्ट कर दूँ कि इस विषय में लिखने की योग्यता और अधिकार, दोनों ही मेरे पास नहीं है, योग्यता इसलिये क्योंकि इस विषय पर अब भी मैं भ्रम लिये जीता हूँ, अधिकार इसलिये क्योंकि मैं इतना अच्छा भी नहीं हूँ कि अच्छाई पर साधिकार लिख सकूँ। मेरे पास भी मेरे हिस्से की बुराईयाँ हैं, सहेजे हूँ, चुप रहता हूँ, उनसे लड़ता नहीं हूँ, संभवतः उतनी शक्ति नहीं है या संभवतः उतनी ऊर्जा नहीं है जो उन पर व्यर्थ की जा सके। कुछ तो इस उपेक्षा से दुखी होकर चली गयी हैं, कुछ धीरे धीरे चली जायेंगी। जो रहेंगी, वो रहें, पर उन्हें अपने पूरे जीवन पर अधिकार नहीं करने दूँगा।

प्रश्न पर स्वाभाविक है, क्या अच्छा होने से कठिनाईयाँ कम हो जाती है, क्या है जो आपको अच्छा होने पर मिल जाता है, क्या अच्छा होना सच में इतना आवश्यक है? जब हम प्रश्नों का उत्तर स्वयं से नहीं पाते हैं तो उसका उत्तर बाहर ढूढ़ते हैं, वर्तमान में, भूतकाल में, घटनाओं में, ग्रन्थों में। भले ही ऐसे प्रश्न जीवन भर अनुत्तरित रहें पर अतार्किक और भ्रामक उत्तरों से संतुष्ट न हो बैठें।

इन प्रश्नों को समझने और उसका उत्तर ढूढ़ने में गुरचरनदास ने महाभारत का आधार लिया है। बड़े ही चिन्तनशील लेखक हैं, उन्होंने महाभारत का न केवल विधिवत अध्ययन किया है वरन उसके पहले के ३० वर्षों में अपने कार्यक्षेत्र में उस महाभारत को जिया है। व्यावसायिक युद्ध में निरत किसी बहुराष्ट्रीय कंपनी के शीर्ष तक पहुँचने के क्रम में ये प्रश्न नित ही आते होंगे। उन्होंने महाभारत क्यों चुनी, इसका स्पष्ट उत्तर उन्होंने अपनी पुस्तक 'द डिफ्कल्टी ऑफ बीईंग गुड' में नहीं दिया है, पर महाभारत में ऐसे उदाहरणों की बहुतायत है जिससे यह द्वन्द्व गहनता से समझा जा सकता है। पोस्ट का शीर्षक उनकी पुस्तक के नाम का हिन्दी अनुवाद भर है।

बड़ा ही मूल प्रश्न है, सबको दिखता भी है, कि जहाँ एक ओर बुरे लोग आनन्द में रहते हैं अच्छे लोगों को सारी कठिनाईयाँ झेलनी पड़ती हैं। तिकड़मियों का गुणवानों की तुलना में विश्व पर अधिक अधिकार है, अनुपात से बहुत अधिक। ऐसा नहीं कि यह स्थिति आज ही उत्पन्न हो गयी, महाभारत के समय भी दुर्योधन और शकुनि अपनी धूर्तता से सारे राज्य पर अधिकार किये बैठे थे। अच्छों के किये कार्यों का फल जब निठल्ले उठाते हैं तो कोफ्त होना स्वाभाविक है। अच्छे लोगों का व्यवस्था से विश्वास संभवतः यही देख कर डगमगाता होगा, उनकी तटस्थता का यही एकमेव कारण होगा।

कई वर्ष पहले 'ऐन रैण्ड' नामक लेखिका की बहुचर्चित पुस्तक पढ़ी थी, 'द एटलस श्रग्ड'। उसकी भी मूल की अवधारणा में यही बात थी कि किस तरह अच्छे कर्मों के फल को असहाय रिसने से रोका जा सके, किस तरह एक अलग विश्व बनाया जा सके जिसमें अच्छे लोगों को अपने श्रम और बुद्धि के अनुसार मान मिल सके, सुविधायें मिल सकें, धन मिल सके। मानवता और समाज के नाम पर लगा ब्याज अच्छे लोगों से उनका मूल भी छीन लेता है, कठिनाई में जीते हैं अच्छे लोग। वहीं बुरे लोग संसाधनों के बँटवारे में सदा विजयी होते हैं।

कहने को तो अन्ततः महाभारत में भी पाण्डवों की विजय हुयी, धर्म की विजय हुयी, सत्यमेव जयते। पर क्या वह सत्य जीत पाता यदि कृष्ण पाण्डवों का साथ न देते? क्या युधिष्ठिर की नीतिप्रियता और धर्मनिष्ठता अपने आप में पर्याप्त थी, महाभारत का युद्ध जीतने के लिये? संभवतः नहीं, कौरवों को जिताने के लिये भीष्म स्वयं ही पर्याप्त थे, यदि वह एक या दो दिन और जीवित रहते। कृष्ण ने युद्ध जीतने को जिन उपायों का सहारा लिया, उसे धर्मयुद्ध से अधिक छलयुद्ध की संज्ञा दी जा सकती है। भीष्म, द्रोण, कर्ण और अन्ततः दुर्योधन, सबका अन्त छल से ही किया गया।

अच्छाई धारण करने के लिये अत्यधिक सहन शक्ति चाहिये, जो अच्छे लोगों में होती भी है, युधिष्ठिर में थी। जब यही सहनशक्ति अन्याय सहन करने में लगायी जाती है, तो अच्छाई की मात्रा हर ओर से सिकुड़ने लगती है, बुराई अनियन्त्रित सी फैल जाती है, दुर्योधन की तरह। कोई कृष्ण तब बताता है कि क्या किया जाये और कैसे किया जाये, जिससे अच्छाई बची रहे।

सत्य अपने आप अधिक समय तक सुरक्षित नहीं रहता है, कोई सत्यमेव जयते का उद्घोष करने वाला होना चाहिये। तभी वह बचा रहता है और अन्ततः जीतता भी है। अच्छाई की कठिनाईयों को समझने के लिये महाभारत की समझ हो और साथ ही हो समझ कृष्ण-प्रदत्त-हल की जिसके कारण सत्य टिक सका। जीवन भी किसी महाभारत से कम नहीं है, पर यह निश्चय भी नहीं कि हर महाभारत में धर्म और सत्य की विजय ही हो।

20.6.12

संबंधों की एकात्म उपासना है 'मेरे गीत'

रात आठ बजे राजधानी से निकलना था, एक सप्ताह के प्रशिक्षण के लिये, लम्बी ट्रेन यात्रा प्रतीक्षा में थी। सायं जमकर फुहारें बरसी थीं, सारी प्रकृति द्रवित थी, पानी के छोटे छोटे कण हवा का सोंधापन परिष्कृत कर रहे हैं। मन अनमना सा था। पिताजी पास के पार्क में टहलने गये थे, बेटा फुटबाल खेलने गया था, श्रीमतीजी बिटिया को ड्रॉइंग क्लास से लाने के लिये गयी थीं। घर में माँ कोई पुस्तक पलट रही थी, माँ को कहा कि चलो बाहर टहलने चलते हैं, आधे घंटे तक हम साथ साथ टहलते रहे। मन में परिवार से एक सप्ताह तक दूर रहने का सूनापन कचोट रहा था, अपनों से दूर रहने का भाव एक विशेष नीरवता ले आता है, वातावरण में।

यात्रा के लिये पुस्तकें रख रहा था, उर्वशी रखी, रानी नागफनी की कहानी रखी, तभी बेटा एक पैकेट लाता है और कहता है कि कुरियर से आया है। लिफाफा खोला तो अन्दर से सतीश सक्सेनाजी का स्नेह पुस्तक का रूप धरे निकला, 'मेरे गीत' की एक प्रति मेरे हाथों में थी। संयोग देखिये कि जिस समय उस पुस्तक की मुझे सर्वाधिक आवश्यकता थी, वह उसी समय मेरे हाथों में थी। संबंधों के एकात्म उपासक ने अपने उपासना मंत्रों को शब्दों में सजाकर मुझे भेज दिया था।

जब ईश्वर को प्रयोग की सूझती है तो आगे आगे संयोग भेज देता है। ट्रेन में एक कूपे मिला और अगले १२ घंटों तक कोई सहयात्री नहीं। एकात्म उपासना के गीतों को पढ़ने के लिये इससे अधिक उपयुक्त वातावरण असंभव था।

माँ की ममता को व्यक्त कर पाना कठिन कार्य है। जो माँ नहीं है, उसके लिये इसका अनुमान लगाना और भी कठिन है। जब धूप से ही सब तृप्ति और पोषण मिल जाये तो सूर्य के गर्भ की ऊष्मा कोई कैसे मापे भला? संयोगी वात्सल्य की तुलना में वियोगी वात्सल्य कितना तीक्ष्ण हो सकता है, इसका अनुमान 'मेरे गीत' के उन गीतों से मिलता है जिनमें सतीश सक्सेना जी ने माँ से बिछोह की पीड़ा को कागज में उड़ेल दिया है।

बचपन के अनुभवों ने सतीश सक्सेना जी को भावों का वह असीम अंबार दे दिया जिसमें संबंधों का मर्म छलकता है। हर संबंध में उन्हें एक अधिनायक की तरह स्थापित करती हैं उनकी कवितायें। जिस स्थिति को हम आदर्श मान कर छोड़ बैठते हैं, उस सत्य को जीने की आत्मकथा है 'मेरे गीत'। विशेषकर पुत्रवधुओं के प्रति उनका स्नेहिल आलोड़न उन्हें एक आदर्श श्वसुर के रूप में संस्थापित करता है, हर बेटी का पिता संभवतः ऐसा ही घर चाहता है अपनी लाड़ली बिटिया के लिये।

पुत्र, भाई, पति और पिता के हर रूप में एक स्पष्ट चिन्तन शैली प्रतिपादित होती है उनकी कविताओं में। समर्पण और निष्ठा का भाव, हर किसी के लिये कुछ कर गुजरने का भाव, परिवार के स्थायी आधार-स्तम्भ बने रहने का भाव। सहज संबंधों का स्नेहमयी इन्द्रधनुष सामाजिक सहजीवन को भी सौन्दर्यमयी कर जाता है, आत्म का सरल और सहज प्रक्षेपण। सतीश सक्सेना जी के गीत बड़े बड़े विवादों को बड़ी सरलता से समाधान की ओर खींचते हुये दिखते हैं।

दर्शन, जागरण, अध्यात्म, हास्य, जीवन उद्देश्य आदि विषयों की छिटकन संबंधों के गीत को सुर देती है। सुर जो गीतों को और भी रोचक और गेय बनाते हैं। 'मेरे गीत' जीवन अनुभवों का संक्षिप्त पर पूर्ण लेखा जोखा है।

जब सारी की सारी जिम्मेदारी शब्दों पर ही छोड़ दी गयी है, और जब शब्दों ने उस अर्थ को सशक्त भाव से संप्रेषित भी किया है, तब किसी कविता विशेष के बारे में चर्चा करना उन शेष १२१ रत्नों को छोड़ देना होगा जो सतीश सक्सेना जी के हृदय से प्रस्फुरित हुये हैं।

मेरी श्रीमतीजी कोई अवसर नहीं छोड़ती हैं आपका एक गीत उद्धरित करने का, 'हम बात तुम्हारी क्यों माने'। विशेषकर अन्तिम पद हम पतियों का हृदय विदीर्ण करने के लिये पर्याप्त है। यदि कभी भविष्य में नारियों ने पतियों के विरुद्ध सामूहिक अवज्ञा आन्दोलन चलाया तो सारा दोष आपकी इसी कविता को दिया जायेगा। तब आप पोषितों की पंक्ति में और हम शोषितों के समूह में खड़े होंगे।

'मेरे गीत' हम सबके गीत हैं, हम सबके हृदय के उन भावों के स्वर हैं जो प्रकट तो होना चाहते हैं पर जगत को जटिल मानकर सामने आने से हिचकिचाते हैं। संबंधों के तन्तु जितने जटिल दिखते हैं, उतने हैं नहीं। संबंधों को समझना और निभाना आवश्यक है, उनसे मुँह नहीं मोड़ा जा सकता। प्रयास तो करना ही होगा, संबंधों की उपासना के मंत्रों को गुनगुनाना होगा, जीवन में 'मेरे गीत' गाना होगा।

16.6.12

स्वतन्त्र देवता

जीवन की प्राथमिकतायें संस्कृतियों के निर्माण में अहम योगदान देती हैं। जब धन की प्राथमिकता होती है, सारे तन्त्र बाजार का रूप धर लेते हैं, यहाँ तक कि मन्दिर भी बाजार की प्रवृत्ति से प्रभावित दिखते हैं। जब विकास प्राथमिकता होती है, हर घर कारखानों का एक उपभाग सा लगने लगता है, दिनचर्या मशीनों से कदमताल करने लगती है। जब स्वतन्त्रता शापित होती है, हर शब्द क्रांति का स्वर बन जाता है, हर युवा मर मिटने को तैयार घूमता है। और जब देश की पुनर्रचना का समय होता है, हर व्यक्ति मजदूर बन जाता है। हर दिन ईंट, हर रात गारा और निर्मित होती जाती है एक सुदृढ़ और स्थायी संरचना।

संस्कृति का रूप बड़ा ही धीरे प्रभाव डालता है, बहुत समय तो पता ही नहीं चलता है कि क्या परिवर्तन हो रहा है। जब वह प्रभाव स्थूल रूप से परिलक्षित होता है तब तक वह हमारे गुणसूत्रों में आ चुका होता है। तब पीढ़ियों का अन्तर संस्कृतियों के अन्तर में परिलक्षित होने लगता है। एक साथ ही कई पीढ़ियाँ, कई सामाजिक समूह, कई संस्कृतियाँ, हमारे देश में ही साथ साथ बसी हुयी हैं, कभी कभी तो शहर के अन्दर ही आपको इस विविधता के दर्शन हो जाते हैं।

पिछले दो वर्षों में प्राप्त अनुभव के आधार कह सकता हूँ कि एक नया सांस्कृतिक झोंका आ रहा है। जो परिवेश के बदलाव पर सतत ध्यान रखते हैं, उन्हें भी इसकी आहट आने लगी होगी। इस बदलाव में बहुत कुछ न केवल बदला बदला सा दिखने वाला है वरन खटकने भी वाला है, विशेषकर तब तक, जब तक उसके अभ्यस्त न हो जायें हम। जितनी बार भी मॉल जाता हूँ, यह विश्वास और भी दृढ़ होता जाता है। भविष्य का जो खाका समझ में आता है, हर बार की मॉल यात्रा उसी भविष्य-दिशा को स्थापित करती हुयी सी प्रतीत होती है।

जब कभी भी आप मॉल में जाते हैं, धीरे धीरे वहाँ का वातावरण आप पर प्रभाव डालने लगता है, आप शारीरिक रूप से सहज हो जाते हैं, शीतलता अस्तित्व में बसने लगती है। चारों ओर चमकती दुकानों के प्रकाश में आपका चेहरा और दमकने लगता है, लगता है जैसे तेज अन्दर से फूट रहा हो। धीरे धीरे आप भूलने लगते हैं कि आप किस देश में जी रहे हैं, वहाँ की क्या समस्यायें हैं? आपके सामने ऐश्वर्य, प्रसन्नता, उत्सव का वातावरण होता है, सब के सब अपना श्रेष्ठ समय बिताने आये होते हैं वहाँ। आप जिस दुकान में जाते हैं, सारे के सारे सेल्समानव आदर के साथ आपके स्वागत में लग जाते हैं, आपके सारे प्रश्नों के उत्तर देने में तत्पर। आप 'स्वतन्त्र देवता' जैसा अनुभव करने लगते हैं।

आप लोग खाते पीते हैं, खरीददारी करते हैं और फिल्में आदि देखकर वापस आ जाते हैं, एक पिकनिक सा मना कर। बच्चे भी प्रसन्न हो जाते हैं, आपको भी परिवार के मुखिया के रूप में लगता है कि आपने अपना पारिवारिक कर्तव्य अच्छे से निभा दिया। कभी कभी आप मॉल-भ्रमण को एक हथियार के रूप में प्रयोग करते हैं, बच्चों से कोई कार्य करवाने के लिये।

यहाँ तक तो सब कुछ अच्छा लगता है, साथ ही लगता है कि देश बढ़ रहा है, अच्छे परिवेश में सामान को कम मूल्य में उपलब्ध कराने का प्रयास सबको भा भी रहा है। खुदरा व्यापारी और साम्यवादी इसे अर्थव्यवस्था में आ रहा अनचाहा बदलाव भी मानते हैं। संभवतः वे नहीं चाहते कि आप स्वतन्त्र देवता जैसा अनुभव करें। जैसा भी हो, यह उत्तरोत्तर बढ़ता ही जा रहा है, बंगलोर में ही हर वर्ष पाँच-छह बड़े मॉल तैयार हो रहे हैं, लोगों के लिये भी एक अलग और सुखद अनुभव है इस तरह सामान खरीदना, और वह भी लगभग किसी भी खुदरा बाजार के समकक्ष मूल्यों पर।

यहाँ आर्थिक धारायें अपना मार्ग बदल रही हैं, छोटी छोटी नहरों का स्थान एक विशाल नदी ले रही है, जैसे भी हो, जल बह रहा है। पर एक बात है जो हर बार खटकती है, और जो संस्कृति को प्रभावित करने की क्षमता भी रखती है। वह है, इन मॉलों में हो रहे व्यवहार की कृत्रिमता। वहाँ जाकर जो आदर आपको मिलने लगता है, वह बहुत ही कृत्रिम सा लगता है। बाज़ार व्यवस्था का इसमें बहुत बड़ा योगदान है, धन का मान है। कोई गरीब हैं तो उसका अपमान अत्यन्त प्राकृतिक है। किसी के हाथ में पैसा है तो उसका सम्मान कृत्रिम है, उसे समाज में कोई आदर दे न दे, बाज़ार में उसे शत प्रतिशत मान मिलता है।

ध्यान से देखा जाये तो मॉलों में कार्य करने वालों में यह व्यवहार कूट कूट कर भरा जाता है, बस कुछ ही नये कर्मचारियों में एक हिचक दिखायी पड़ जाती है। २०-२१ साल के युवा लड़के जो नयी संस्कृति के प्रभाव में घर में अपने बड़ों का आदर करना भूल गये हैं, उन्हें भी प्रारम्भ में हिचक होती है, कालान्तर में घर के बड़ों का आदर करना आये न आये, मॉल में आये धनाड्य का आदर करना आ ही जाता है। जो लड़के भले और संस्कारी परिवारों से भी आते हैं, उन्हें भी प्रारम्भ में हिचक होती है, उन्हें गुणों को छोड़ धन को आदर देने में हिचक होती है, धीरे धीरे उन्हें भी यह छद्म गुण सीखना पड़ता है। कृत्रिमता का आवरण दोनों को ही खटकता है और खटकता है उन सबको भी, जिनको इस प्रकार की कृत्रिमता में घुटन सी होती है। स्वतन्त्र देवता का भाव स्थायी नहीं है, कुछ ही बार सुहाता है, बाद में आपकी विचारशीलता आपको कचोटने लगती है।

मानसिकता क्या है, यदि सामान की गुणवत्ता अच्छी है तो कृत्रिम आचरण की आवश्यकता कहाँ है? यदि सामान की गुणवत्ता अच्छी नहीं है तो इस तरह का आचरण विश्वास-हरण की श्रेणी में आता है। मुझे लगता है कि यह किसी सत्य पर पर्दा डालने जैसा है, यह संदेश पर कोलाहल डालने है। लगता है कि पहाड़ों को काट कर और गढ्ढों को पाट कर सारे विश्व को समतल बनाने की संस्कृति आ रही है। वह संस्कृति, जहाँ सबको लगता है कि वे स्वतन्त्र देवता हैं, जबकि उसका पूरा आधार धन की दासता का है।

अब तो जब भी मॉल जाता हूँ, थोड़ा सहमा रहता हूँ, कहीं कोई कृत्रिमता प्रभाव न छोड़ जाये मानसिकता पर।

13.6.12

इमामबाड़े से व्यक्तित्व

यह तो सुना था कि भवनों के नाम महापुरुषों के नाम पर रखे जाते हैं। सही भी है, निर्जीव भवनों को इसी बहाने कोई नाम मिल जाता है, महापुरुषों का नाम मिल जाता है, उनका जीवन बस इसी बात से धन्य हो जाता है। पहचान के लिये नाम आवश्यक भी होता है, बिना नाम अनाथ जैसा लगता होगा, निर्जीव भवनों को।

दो उद्देश्य रहते होंगे, नाम रखने के। पहला, यह जताने के लिये कि किसने उसका निर्माण कराया, सम्पन्नता को अनाम रखना सच में कितना कठिन कार्य रहा है, सदियों से। दूसरा, भवन के सहारे ही सही पर स्वयं को अमरत्व प्रदान कराने के लिये भी नामकरण होता होगा, सही भी है क्योंकि भवन मानवों से कहीं अधिक जीते हैं। जब कभी औरों को प्रसन्न करना अधिक आवश्यक होता है तो भवन आदि का नामकरण एक विशेष उद्देश्य सिद्ध करने लगता है। भवन के साथ साथ नगर के मार्ग, चौराहे, उपवन, पुल आदि किसी न किसी का नाम ग्रहण करने को उतावले रहते हैं, सत्तासीनों की सुविधानुसार। बेनामों और बेजानों के नामकरण के बाद उस महापुरुष के गुण उसके निर्जीव वातावरण को जीवन्त कर देते होंगे। तब सड़कों में चलने वालों में और भवनों में रहने वालों में चरित्र उत्थान और व्यक्तित्व निर्माण की पूर्ण संभावनायें बनी रहती होंगी।

संक्षिप्त में कहा जाये तो अभी तक भवनों को औरों से प्रभावित होते ही देखा है, औरों को नाम ग्रहण करते ही सुना है। ऐसा नहीं है कि भवनों में कोई विशेष गुण नहीं होता है, कुछ गिने चुने भवनों में ही वह गुण होता है जो विशेषण के रूप में प्रयुक्त किया जा सके। ताजमहल का सौन्दर्य, पीसा की मीनार का तिरछापन आदि विशेष गुण हो सकते हैं और उनका हम उपयोग भी कर सकते हैं।

सब कह रहे हैं कि अर्थव्यवस्था मन्दिया रही है। लग भी रहा है, डालर फूल रहा है, रुपया सिकुड़ रहा है। अर्थव्यवस्था की जटिलतायें हमको समझ में नहीं आती हैं, जैसा लोग समझाते हैं, हम समझ जाते हैं। सुना था कि बहुत समय पहले जब लखनऊ में अकाल पड़ा था, किसी को कोई काम नहीं था, तब सभ्रांत समाज को रात के समय कार्य करने का अवसर देकर वहाँ के नवाब ने न केवल उनका जीवन बचाया वरन इमामबाड़ा जैसा बड़ा भवन निर्मित करवा दिया।

जिनको ज्ञात न हो, उन्हें बताते चलें कि इमामबाड़ा अपने भूलभुलैया के लिये बहुत प्रसिद्ध है। गलियारों का जाल और ४८९ एक जैसे दरवाजों का होना ही भूलभुलैये का प्रमुख कारण है। न भूलने की ठान ली थी तो उस भवन के निर्माण को समझना आवश्यक हो गया था। भूलभुलैया को उसके निर्माण से पृथक रख कर देखना ही उसमें भटक जाने का प्रमुख कारण है। जो लोग गये होंगे वहाँ, उन्हें यह याद होगा कि भूलभुलैया प्रथम खण्ड में जाकर प्रारम्भ होता है, तीन परतों में ऊपर नीचे गलियारों, सीढ़ियों और दरवाजों की भटकन और सबसे ऊपर एक सपाट छत।

इमामबाड़े का वास्तु और स्थापत्य कौशल तब समझ में आया जब ऊपर से नीचे के विशालकाय हॉल में झाँका। न कोई खम्भा, न कोई बीम, न कोई सरिया, और ऊपर स्थित वृहदतम अर्धबेलनाकार छत, मेहराब शैली का निर्माण। गजब की कलाकारी है, सरल भाषा में समझा जाये तो एक विशाल भवन के ऊपर तीन मंजिला छप्पर। अब छप्पर पूरा ठोस तो बनाया नहीं जा सकता था, उसका भार इतना अधिक हो जाता कि वह स्वयं सहारा देने में विफल हो जाता। संभवतः इसीलिये उसे खोखला बनाया गया होगा, खोखले में गलियारों की दीवारों का प्रयोग नीचे की अर्धबेलनाकार छत और ऊपर की सपाट छत के बीच सततता बनाये रखने के लिये, सीढ़ियों का प्रयोग मेहराब के रूप में, और द्वारों का प्रयोग पूरे आकार को आपस में जोड़ने के लिये किया गया होगा।

इमामबाड़े जैसे भवनों का मर्म कहीं और छिपा है और हम उसके भूलभुलैये में खो जाते हैं। मर्म अन्दर छिपा होता है और हम आवरण में उलझ जाते हैं। जो दीवारें भार सहन करती हैं, उनसे अधिक महत्व भटकाने वाली दीवारों को मिलता है। मेहराबदार स्थापत्य का अद्भुत उदाहरण, रात में अपनी जीविका के लिये कार्य करने वालों की कहानी बन जाता है। यह आपाधापी या व्यर्थ में बहाये हुये श्रम का उदाहरण नहीं, वरन उन्नत योजनानुसार क्रियान्वित भवननिर्माण का उदाहरण है। इसके निर्माण की वैज्ञानिक प्रक्रिया और संबन्धित तथ्य निश्चय ही इतिहास के किसी भूलभुलैया में पड़े अपने बचावदल की राह देख रहे होंगे।

जो बड़े भवनों का सच है, वही सच बड़े महापुरुषों का भी है। उनकी उपाधियों, जीवनी, कार्यों आदि के आवरण के अन्दर छिपे भाव कभी उद्घाटित और स्थापित किये जाने के प्रयास ही नहीं किये जाते। बाहरी भूलभुलैया हमें इतना उलझा देता है कि हम यह भी याद नहीं रख पाते हैं कि मर्म में क्या है, नीचे का बड़ा हॉल जहाँ सबके लिये पर्याप्त स्थान है, समुचित और सुरक्षित स्थान।

शताब्दियाँ बीत गयी हैं, हम महापुरुषों का नाम भवनों को देते आये हैं। आज हम अपनी क्षुद्र समझ से अपने महापुरुषों के व्यक्तित्वों को इमामबाड़ा का स्वरूप देने में लगे हैं, मर्म कम, भूलभुलैया अधिक। गलियारों में भटकते भटकते कभी तो नीचे झाँकना होगा, और समझना होगा कि हम सब एक बड़े आकार के चारों ओर खड़े हैं, एक ही भवन में और एक साथ।

9.6.12

किंकर्तव्यविमूढ़

भगवान ने कोई भी चीज सीधी नहीं बनाई है, मीठे में ढंग से बीमारी तो कड़वे में औषधीय गुण डाल रखे हैं, भोग में दुख तो धैर्य में सुख छिपा रखा है, न्यूनता में दुख है तो अधिकता में भी दुख है। दिन में सम्पन्नता का सुख रात में चिन्ता बन जाती है, नींद न आने का कारण। वहीं दिन की विपन्नता और जी तोड़ श्रम रात का सुख बन जाता है, गाढ़ी नींद का सुख। मूढ़ अपनी मूढ़ता में प्रसन्न रह लेता है, विद्वान छोटा सा विकार देखकर उद्वेलित हो जाता है।

जहाँ पर इस तरह की अनिश्चितता या विरोधाभासी निष्कर्ष हों वहाँ किसी भी प्रकार के नियम बनाना समय व्यर्थ करना होगा। एक घटना, सबके ऊपर अलग अलग प्रभाव। एक परिवेश, सर्वथा अलग अलग व्यक्तित्व। पेड़ के पत्तों सा क्रम दिखता है जगत में। अधिक निकट जाकर देखेंगे, तो कुछ समझ नहीं आयेगा, किसी भी नियम से स्वतन्त्र। थोड़ा अधिक दूर जाकर देखेंगे तो छोटा होता जायेगा, बिन्दु सा, किसी भी नियम में प्रयुक्त।

इस मुक्त व्यवस्था में केवल दो ही निष्कर्ष समझ आते हैं। पहला, नियम के आभाव में सब विशेष हैं, एक के अनुभव दूसरे पर अधिरोपित नहीं किये जा सकते हैं, सबको अलग अलग समझना होगा। दूसरा, किसी को समझने के लिये बहुत अधिक निकट या बहुत अधिक दूर नहीं जाना चाहिये, कहीं मध्य से ही वह पूरा और स्पष्ट समझ में आयेगा।

समाजशास्त्री मेरे कथ्य से सहमत नहीं होंगे क्योंकि किसी भी बड़े समूह को समझने के लिये एक एक अवयव पर ध्यान नहीं दिया जा सकता, समूह का सम्मिलित व्यवहार ही उनके अध्ययन का आधार होता है। समाजशास्त्रियों का यह तर्क स्वीकार्य है पर हमारा अधिकतम व्यवहार समूह पर आधारित नहीं होता है, परिवार, निकटस्थों, मित्रों, वरिष्ठों और अधीनस्थों से हमारा व्यवहार व्यक्तिगत ही होता है। समाज आदि का अध्ययन भी अन्ततः व्यक्ति के व्यवहार-समुच्चय पर ही निर्भर होता है।

जब स्वयं की दृष्टि ही समष्टि समझने का माध्यम है तो स्वयं को समझना जगत को समझने का प्रथम सोपान है। अपना व्यवहार, अपनी अभिरुचियाँ, अपनी चाह, अपनी राह, सब समझ आती है, स्पष्ट होती जाती है धीरे धीरे। समस्या तब आती है जब अपनी समझ से दूसरे व्यक्तित्वों को समझने का प्रयास होता है। अपने जीवन की घटनायें इतनी जानी पहचानी लगती है कि वह नियम जैसी चिपक जाती हैं मानसिकता से। जब उस दृष्टि से दूसरों के जीवन की घटनायें देखी जाती हैं तो एक भ्रम सा लगने लगता है, मानव व्यवहार।

किंकर्तव्यविमूढ़ का अर्थ शब्द में ही छिपा है, किं कर्तव्य विमूढ़, क्या कर्तव्य हो इस बारे में विमूढ़ता। यह स्थिति हर एक के साथ आती है, अधिक इसलिये भी आती है क्योंकि नियमों में प्रकृति को बाँध पाना कठिन होता है, विशेषकर मानव प्रकृति को। आप क्या करते हैं ऐसी स्थिति में?

किंकर्तव्यविमूढ़ होने के गर्भ में या तो कोई व्यक्ति होता है या कोई घटना। कभी भी किंकर्तव्यविमूढ़ सी स्थिति आती है तो अपने नियत दो निष्कर्षों को ही लगाता हूँ। पहला तो उस व्यक्ति या घटना को विशेष मान लेता हूँ, सब नियमों से मुक्त, सब निष्कर्षों से परे, किसी उपाधि के अनुग्रह से निर्बन्ध, बस विशेष। ऐसा करने से संबंध की जड़ता लुप्त हो जाती है, प्राप्त गतिमयता का उपयोग उत्तर ढूढ़ने में प्रयुक्त होता है, एकल संबंध पर विचार होता है, एक ऐसा परिसीमन जहाँ समस्या और उसका उत्तर निश्चय ही विद्यमान होगा।

दूसरा कार्य होता है, मध्य में पहुँच जाना, वहाँ पर जहाँ से सब कुछ स्पष्ट दिखायी दे। यदि आत्मीय अधिक हो तो थोड़ी दूरी, यदि अपरिचित हो तो थोड़ी निकटता। मध्य खड़े होकर समस्या की समझ पूरी होती है। दूरदृष्टि और निकटदृष्टि के बीच कहीं अवस्थित है जीवन का संतुलन। बुद्ध का मध्यमार्ग दर्शन का प्रबल पक्ष हो सकता है पर मेरे लिये विमूढ़ता की स्थिति से बाहर आने का उपाय भर है।

जितनी बार भी किंकर्तव्यविमूढ़ की स्थिति को इन दो निष्कर्षों पर मापा है, एक निश्चित उत्तर पाया है। पता नहीं आप कैसे बाहर आते हैं, इस स्थिति से?

6.6.12

वोडाफोन के वो

यह एक विशुद्ध गंभीर विषय है, हास्य से कोसों दूर। कृपया तेज हँसकर हम गृहस्थों की ध्यानस्थ अवस्था में विघ्न न डालें। हाँ, यदि हँसी न रुके तो मन ही मन हँस लें, क्योंकि मन ही मन हँसने से कभी किसी की भावनायें आहत नहीं होती। जहाँ औरों के ऊपर हँसना आनन्द देता है, अपने ऊपर हँसना परमानन्द। यदि अविवाहित हैं तो विवाहितों में अपना भविष्य देख कर हँसिये, यदि विवाहित हैं तो आपको हर अवस्था में आनन्द मिलेगा, दुख की तलहटी छूने के बाद तो सुख के अतिरिक्त कुछ शेष भी नहीं रहता है।

अमित श्रीवास्तवजी सोच विचार कर और बड़ा ही मौलिक लिखते हैं, उनकी एक पोस्ट से प्रेरणा, ऊर्जा और साहस पा कर हमने भी अपना जीवन अनुभव साझा करने का मन बनाया है। विषय में घुसने के पहले पात्र का परिचय आवश्यक है। 'वोडाफोन के वो' से अमितजी का तात्पर्य उस छोटे और प्यारे कुत्ते से है जो सदा ही अपने मालिक के साथ रहता है। वैसे तो कुत्ता स्वामिभक्त होता है, मेरे पास भी है, जर्मन शेफर्ड, मेरे मन की स्थिति को मुझसे बेहतर न केवल समझता है वरन जताता भी रहता है। हमसे वह भले ही प्रेम से रहे पर कभी कभी घर आने वाले उससे भय खा जाते हैं। पर वोडाफोन के प्रचार में आने वाला छुटकू कुत्ता न केवल स्वामिभक्त है वरन प्यारा भी है, हानिरहित और ग्लानिरहित।

अपने नेटवर्क की तुलना इस प्रकार के जीव के साथ करने का उद्देश्य वोडाफोन के लिये अपने नेटवर्क की पहुँच को प्रचारित करना था, जिसमें वह एक सीमा तक सफल भी रहा, पर यह प्रचार गाहे बगाहे एक ऐसी उपमा भी दे गया जो एक आदर्श पति को परिभाषित करने का समर्थ आधार बन सकती है। अब निवेदिताजी ने इस उपमा का प्रयोग अत्यधिक गर्व और संतुष्टि के साथ ही किया होगा। हम भी इसे उनका व्यक्तिगत मामला मान कर छोड़ दिये होते या भूल गये होते, यदि इस उपमा में हमें सब पतियों की झलक न दिखी होती।

पतियों को इस आधार पर पुरस्कृत भी किया जा सकता है कि उनमें 'वोडाफोन के वो' का भाव कितनी मात्रा में विद्यमान है। वोडाफोन को चाहिये कि वे एक पुरस्कार की घोषणा करें जिसमे 'वोडाफोन के वो' जैसे पतियों को समुचित सम्मान मिल सके। निर्णय के मानक तय करने के लिये एक विशेष समिति बनायी जा सकती है। पाठकगण चाहें तो अपने अंदर उपस्थित उन वांछनीय गुणों को बता भी सकते हैं, जिनको संकलित कर वोडाफोन के लिये एक पूरी प्रोजेक्ट रिपोर्ट तैयार की जा सकती है।

ऐसा नहीं है कि 'वोडाफोन के वो' की विमायें केवल भौतिक ही हों, वह तो है ही, जहाँ जहाँ श्रीमतीजी जायें वहाँ जाना तो आपका कर्तव्य ही है। इसके अतिरिक्त आपके विचारों में, पहनावे में, जीवनशैली में, बैंक के खाते में, घूमने जाने में, बाहर खाने में, फिल्म देखने में, और न जाने कितने प्रभावित क्षेत्रों में 'वोडाफोन के वो' की प्रतिच्छाया दिखायी पड़ती है। हाँ, थोड़ा और जोर डालिये दिमाग पर और आपके व्यक्तिगत जीवन से कई क्षेत्र और संबद्ध उदाहरण निकल ही आयेंगे।

अभी तक तो लगता था कि इस प्रभाव से हम पर्याप्त मात्रा में मुक्त हैं पर आज ही सेपो की यह पोस्ट पढ़ते समय लगा कि ऐसा नहीं है। पोस्ट कपड़ों के ऊपर थी, होनी भी चाहिये, नारियों को कपड़ों से अत्यधिक लगाव जो होता है। मन का उत्साह रंगों से व्यक्त किये जाने की परम्परा रही है, अब बाल और कान तो रंगे नहीं जा सकते, तो सारा रंग कपड़ों में ही उतर आता है। अब उत्साह का रंग रोज एक जैसा तो हो नहीं सकता, कभी लाल होता है तो कभी पीला। उत्साह का आकार भी बदलना आवश्यक है, कभी साड़ी, कभी सूट, कभी लहँगा, कभी जीन्स। अब चाहते, न चाहते, ढेरों कपड़े हो ही जाते हैं, नहीं कुछ खरीद रहें हैं तो कोई संबंधी ही कुछ भेंट कर जाता है, कहाँ तक कोई सबको समझाये?

अब कपड़ों की खपत के क्षेत्र में घर का औसत देश के औसत से बहुत आगे न निकल जाये, इसीलिये हम बहुत कम कपड़े रखते हैं, अपने उपयोग के लिये, या कहें कि औसत बराबर करने में बुद्धत्व को प्राप्त हुये जा रहे हैं। कार्यालयीन उपयोग के कपड़ों के अतिरिक्त जीन्स और टीशर्ट ही पहनते हैं, दो नीली जीन्स और छह रंगों की टीशर्ट, सफेद, काली, स्लेटी, लाल, मैरून और ऑरेन्ज। अकेले कहीं जाने पर तो सफेद टीशर्ट ही चढ़ाते हैं, शेष पाँच रंगों की उपस्थिति श्रीमतीजी के रंग बिरंगे कपड़ों से मैच करने के लिये है।

यही करते हैं कि कनखियों से देख लेते हैं कि श्रीमतीजी की साजसज्जा में निखरा हुआ रंग कौन सा है, उसी रंग से मैच करती टीशर्ट चढ़ा लेते हैं और चुपचाप साथ में चल देते हैं, बिल्कुल 'वोडाफोन के वो' की तरह। कितना भी चाह लें, आप भाग नहीं सकते हैं, स्वीकार कर लीजिये, वोडाफोन जैसी बड़ी कम्पनी के साथ जुड़ने का सौभाग्य मिल रहा है, उसका लाभ उठाईये, जमीनी वास्तविकता तो बदलने से रही, जैसी थी वैसी ही बनी रहेगी। आप समर्थ हो पायें या न हो पायें पर 'वोडाफोन के वो' का भाव पतियों की निष्ठा नापने में एक समर्थ मानक सिद्ध होने वाला है

2.6.12

क्यों दूँ दोष विधाता को?

आँख खुली हो, फिर भी पथ पर, समुचित चलना न आया,
दीप, शिखा और तेलयुक्त हो, तब भी जलना न आया,
मन भी रह रह अकुलाता हो बँधा व्यथा के छोरों में,
आन्दोलित हो, अवसानों का कारण ढूढ़े औरों में,

पर अनुभव के सोपानों में जितना चढ़ता, बढ़ता हूँ,
अपने मन से निष्कर्षों पर प्रतिपल प्रतिक्षण लड़ता हूँ,
अपना जीवन, लेखक बनकर लिखता हूँ निज गाथा को,
काँटे पग में, पीड़ा अपनी, क्यों दूँ दोष विधाता को?

30.5.12

लिखना नहीं, दिखना बन्द हो गया था

फेसबुक से विदा लिये ३ महीने और ट्विटर को देखे ३० महीने हो गये थे, जीवन आनन्द में चल रहा था, लिखने के लिये पर्याप्त समय मिल रहा था, एक सप्ताह की दो पोस्टें के लिये और कितना समय चाहिये भला? हम तो फेसबुक को लगभग भूल ही चुके थे, पर फेसबुक रह रहकर हमें कोंचने की तैयारी में था। यद्यपि फेसबुक बन्द करने के समय के आसपास ही पाठकों की संख्या में थोड़ी कमी आयी थी, पर उसका कारण हम गूगल महाराज के बदलशील व्यवहार को देकर स्वयं मानसिक रूप से हल्के हो लिये थे।

सबसे पहले एक मित्र का फोन आया, कहा कि यार अच्छा लिखते थे, बन्द काहे कर दिया? हम सन्न, हम सोचे बैठे थे कि ईमेल के माध्यम से किये सब्सक्रिप्शन में कुछ गड़बड़ हुयी होगी, उन्हें वह सुधारने की सलाह दे बैठे। बाद में पता लगा कि वे फेसबुक से ही हमें पढ़ लेते थे, ईमेल खोलने में आलस्य लगता था उन्हें। कहीं हम उन्हें तकनीक में अनाड़ी न समझ बैठें, इस डर से ईमेल की सलाह पर हामी तो भर गये पर उस पर अमल नहीं किया।

घर गये तो वहाँ पर भी दो परिचित मिले, घूम फिर कर बात अभिरुचियों की आयी। उन्होने कहा कि लेखन अच्छी अभिरुचि है और उसके बाद दो तीन पुरानी पोस्टों पर चर्चा करने लगे। हमारा माथा ठनका, उसके बाद भी बहुत कुछ लिखा था, उसके विषय क्यों नहीं उठाये, मर्यादावश उनकी पसन्द पर ही चर्चा को सीमित रखा। बाद में ज्ञात हुआ कि उन तक भी फीड फेसबुक से ही पहुँचती थी।

कुछ दिन पहले बंगलोर में रहने वाले और मेरे विद्यालय में पढ़े लगभग ४० लोगों का एक मिलन आयोजित किया था अपने घर में। पता लगा कि उसमें से बहुत से लोग ऐसे थे जो ब्लॉगजगत के सक्रिय पाठक थे, लिखते नहीं थे, टिप्पणी भी नहीं करते थे, पर पोस्टें कोई नहीं छोड़ते थे। उनमें से कुछ आकर कहने लगे कि भैया, जब व्यस्तता थोड़ी कम हो जाये तो लेखन पुनः आरम्भ कर दीजियेगा, आपका लिखा कुछ अपना जैसा लगता है। स्नेहिल प्रशंसा में लजा जाना बनता था, सो लजा गये, पर हमें यह हजम नहीं हुआ कि हमने लेखन बन्द कर दिया है। अतिथियों को यह कहना कि वे गलत हैं, यह तुरन्त खायी हुयी खीर के स्वाद को कसैला करने के लिये पर्याप्त था, अतः उन्हें नहीं टोका।

इन तीन घटनाओं ने यह स्पष्ट कर दिया कि पाठकों का एक वर्ग जो विशुद्ध पाठकीय रस के लिये पढ़ता है, पिछले ३ महीनों से हमें पढ़ नहीं पा रहा है। टिप्पणी करने वाले सुधीजन और ब्लॉगों के मालिक अभी भी जुड़े हुये थे, ईमेल या गूगल रीडर के माध्यम से। शेष लोग फेसबुक में प्राप्त लिंक के सहारे पढ़ते थे, हमारे फेसबुक से मुँह मोड़ लेने के कारण वे न चाहते हुये भी हमसे मुँह मोड़ चुके थे। समझ मे तब स्पष्ट आया कि फेसबुक अकेले ही १०० के लगभग पाठक निगल चुका है।

क्या करें तब, अपने आनन्द में बैठे रहना एक उपाय था। चिन्तन के जिस सुलझे हुये स्वरूप में फेसबुक को छोड़ा था, उसे पुनः स्वीकार करने से अहम पर आँच आने का खतरा था। सहेजे समय को बलिदान कर पुनः पहुँच बढ़ाने के लिये गँवा देना हर दृष्टि से अटपटा था। बहुत से ऐसे प्रश्न थे, जिसके निष्कर्ष हानि और लाभ के रूप में ज्ञात तो थे पर किसी एक ओर बैठ जाने की स्पष्टता का आभाव चिन्तन में छाया हुआ था।

निर्णय इसका करना था कि मेरे हठ की शक्ति अधिक है या मुझ पर पाठकों के अधिकार की तीव्रता। निर्णय इसका करना था कि लेखन जो स्वान्तः सुखाय होता था, वह अपना स्वरूप रख पायेगा या पाठकों के अनुरूप विवश हो जायेगा। निर्णय इसका करना था कि पूर्व निर्णयों का मान रखा जाये या अतिरिक्त तथ्य जान कर निर्णय संशोधित किये जायें। निर्णय इसका करना था कि त्यक्त को पुनः अपनाना था या एकान्त में आत्ममुग्धता की वंशी बजाना था।

क्या कोई और तरीका है, ब्लॉग सब तक पहुँचाने का? क्या ब्लॉग के साथ सारी सामाजिकता पुनः ओढ़नी पड़ेगी? प्रश्न किसी विस्तृत आकाश में न ले जाकर पुनः फेसबुक की ओर वापस लिये जा रहा था। जुकरबर्गजी, आप नजरअन्दाज नहीं किये जा सकते हैं, हमारे परिचित और पाठकगण आपके माध्यम से ही मुझे जानना चाहते हैं। आपके बारे में मेरे पूर्व विचार न भी बदलें पर अपनों के सम्पर्क में बने रहने के लिये मुझे आपकी छत में रहने से कोई परहेज नहीं है।

पर इस बार ट्विटर की चूँ चूँ भी साथ में रहेगी हमारे। जब दिखना है तो ढंग से और हर रंग से दिखा जायेगा।

26.5.12

बहें, नदी सा

बहने को तो हवा भी बहती है पर दिखती नहीं, जल का बहना दिखता है। न जाने कितने विचार मन में बहते हैं पर दिखते नहीं, शब्दों का बहना दिखता है। कल्पना हवा की तरह बहती है, इधर उधर उन्मुक्त। लेखन का प्रवाह नदी सा होता है, लिखने में, पढ़ने में, सहेजने में, छोड़ देने में।

चिन्तन की पृष्ठभूमि में एक प्रश्न कई दिनों से घुमड़ रहा है, बहुत दिनों से। कभी वह प्रश्न व्यस्तता की दिनचर्या में छिप जाता है, पर जैसे ही ब्लॉग के भविष्य से संबंधित कोई पोस्ट पढ़ता हूँ, वह प्रश्न पुनः उठ खड़ा होता है। प्रश्न यह, कि ब्लॉग जिस विधा के रूप में उभरा है, उसे प्रवाहमय बनाये रखने के लिये किस प्रकार का वातावरण और प्रयत्न आवश्यक है। प्रश्न की अग्नि जलती रही, संभावित उत्तरों की आहुति पड़ती रही, शमन दूर बना रहा, ज्वाला रह रह भड़कती रही।

ऐसा नहीं है कि ब्लॉग के प्रारूप को समझने में कोई मौलिक कमी रह गयी हो, या उसमें निहित आकर्षण या विकर्षण का नृत्य न देखा हो, या स्वयं को व्यक्त करने और औरों को समझने के मनोविज्ञान के प्रभाव को न जाना हो। बड़ी पुस्तकों को न लिख पाने का अधैर्य, उन्हें न पढ़ पाने की भूख, समय व श्रम का नितान्त आभाव और अनुभवों के विस्तृत वितान ने सहसा हजारों लेखक और पाठक उत्पन्न कर दिये, और माध्यम रहा ब्लॉग। सब अपनी कहने लगे, सब सबकी सुनने लगे, संवाद बढ़ा और प्रवाह स्थापित हो गया। एक पोस्ट में एक या दो विचार न ही समझने में कठिन लगते हैं और न ही लिखने में, उससे अधिक का कौर ब्लॉगीय मनोविज्ञान के अनुसार पचाने योग्य नहीं होता है।

यह सब ज्ञात होने पर वह निष्कर्ष सत्य अनुपस्थित था, जिसे जान सब स्पष्ट दिख जाता। कुछ प्रश्न उत्तर की प्रतीक्षा तो अधिक कराते हैं पर उत्तर सहसा एक थाली में परोस कर दे देते हैं। कल ही जब यह पोस्ट पढ़ रहा था, मन में उत्तरों की घंटी बजने लगी।

लेखन नदी सा होता है और हमारा योगदान एक धारा। नदी बहती है, समुद्र में मिल जाती है, पानी वाष्पित होता है, बादल बन छा जाता है, बरसता है झमाझम, नदी प्रवाहमयी हो जाती है, वही जल न जाने कितनी बार बरसता है, बहता है, एकत्र होता है, वाष्पित होता है, उमड़ता है और फिर से बरसता है। नदी को प्रवाहमय बने रहने के लिये जल सतत चाहिये। जल के स्रोत ज्ञान के ही स्रोत हैं, कहीं तो सकल जगत सागर से वाष्पित अनुभव, कभी पुस्तकों के रूप में जमे हिमाच्छादित पर्वत।

महान पुस्तकें एक भरी पूरी नदी की तरह होती हैं, गति, लय, गहराई, और प्रवाह बनाये रखने के लिये ज्ञान के अक्षय हिमखण्ड। रामचरितमानस, गीता जैसी, सदियों से प्रवाहमयी, विचारों की न जाने कितनी धारायें उसमें समाहित। हम अपनी पोस्टें में एक या दो विचारों के जल की अंजलि ही तो बना पाते हैं, अपने सीमित अनुभव से उतना ही एकत्र कर पाते हैं, वही बहा देते हैं ब्लॉग की नदी में। बहते जल में अपनी अंजलि को बहते देख उसे बहाव का कारण समझ लेना हमारे बालसुलभ उत्साह का कारण अवश्य हो सकता है, हमारी समझ का निष्कर्ष नहीं। धारा का उपकार मानना होगा कि आपका जल औरों तक पहुँच पा रहा है, आपको उपकार मानना होगा कि आप उस धारा के अंग हैं।

एक अंजलि, एक धारा का कोई मोल नहीं, थोड़ी दूर बहेगी थक जायेगी। यह तो औरों का साथ ही है जो आपको प्रवाह होने का अभिमान देता है। मतभेद हों, उछलकूद मचे, पर ठहराव न हो, बहना बना रहे, प्रवाह बना रहे। जैसे वही पानी बार बार आता है, हर वर्ष और अपना योगदान देता है, उसी प्रकार ज्ञान और अनुभव की अभिव्यक्ति का प्रवाह भी एक निश्चय अंतराल में बार बार आयेगा, हम निमित्त बन जायें और कृतज्ञ बने रहें।

पढ़ने और लिखने में भी वही सम्बन्ध है, यदि आप अधिक पढ़ेंगे तो ही अधिक लिख पायेंगे, अच्छा पढ़ेंगे तो अच्छा लिख पायेंगे, स्तरीय पढ़ेंगे तो स्तरीय लिख पायेंगे, प्रवाह का सिद्धान्त यही कहता है। संग्रहण या नियन्त्रण का मोह छोड़ दें, आँख बन्द कर बस प्रवाह में उतराने का आनन्द लें।

जिस प्रवाह में हैं, आनन्द उठायें, बहते जल का। बहें, नदी सा।

23.5.12

पानी का इतिहास

कहते हैं कि पानी का इतिहास सभ्यताओं का इतिहास है, इस बहते पानी ने कितना कुछ देखा होता है, कितना कुछ सहा होता है। यही कारण रहा होगा कि स्वर्गीय भूपेन हजारिका गंगा को समाज में व्याप्त विद्रूपताओं के लिये उलाहना देते हैं, गंगा बहती हो क्यों? नदियाँ हमारे इतिहास की साक्षी हैं, पर इनका भी अपना कोई इतिहास है, यह एक अत्यन्त रोचक विषय है।

इस विषय पर विद्वानों का ध्यान जाना स्वाभाविक है, यदि नहीं गया तो संभव है कि अगले विश्वयुद्ध की आग पानी से ही निकलेगी। मेरी उत्सुकता इस विषय में व्यक्तिगत है। यमुना नदी मेरे गृहनगर से बहती है। जब से यह ज्ञात हुआ है कि वहाँ बहने वाला पानी हिमालय का है ही नहीं, सारा पानी तो दिल्ली में ही पी लिया जाता है, दिल्ली और इटावा के बीच तो इसमें पानी रहता ही नहीं है, तब से यह चिन्ता लगी है कि भविष्य में कहीं यमुना नदी अपना अस्तित्व न खो बैठे। यह भी संभव है कि दिल्ली और इटावा के बीच इसके पाट में मकान या फार्महाउस आदि बन जायें, यदि ऐसा हुआ तो यमुना नदी इतिहास बन जायेगी। आध्यात्मिक जल के आचमन के स्थान पर विशुद्ध चम्बलीय बीहड़ों का पानी शरीर में जायेगा, प्रार्थना के स्वरों में शान्ति के स्थान पर तब जाने कौन से स्वर निकलेंगे?

आगत भविष्य का दोष दिल्ली को भी कैसे दिया जाये, राजधानी जो ठहरी, विशालतम लोकतन्त्र का केन्द्रबिन्दु, नित नयी आशाओं की कर्मस्थली। अधिक कर्म को अधिक पानी भी चाहिये, जहाँ लंदन और पेरिस प्रतिव्यक्ति प्रतिदिन क्रमशः १६९ और १५५ लीटर पानी उपयोग करते हैं, वहीं दिल्ली में ३०० लीटर की उपलब्धता है। अभी जनसंख्या बढ़ेगी, तब और पानी चाहिये होगा। यह देखकर लगता है कि यमुना का उद्धार अब संभव नहीं है।

पर यमुना के साथ यह पहली बार नहीं होगा कि वह कान्हा के वृन्दावन से होकर नहीं जायेगी। कान्हा के अवतार के पहले भी यमुना वृन्दावन से होकर नहीं बहती थी। पानी का यह सत्यापित इतिहास वैज्ञानिकता के आधार पर ही ज्ञात हुआ है। मानवीय इतिहास शताब्दियों में बदलता है, नदियों के इतिहास सहस्र वर्षों के अन्तराल में स्पष्ट होते हैं।

सरस्वती नदी का विस्तृत विवरण हमारे ग्रन्थों में मिलता है, और यह भी पता लगता है कि कालान्तर में वह नदी विलुप्त हो गयी, कारण अज्ञात। अब छोटी मोटी बावड़ी फाइलों में बन कर खो जायें तो ढूढ़ने में बहुत श्रम लगेगा, इतनी बड़ी नदी का खो जाना आसानी से नहीं पचाया जा सकता है। कहाँ खोयी होगी, ग्रन्थ ही कहते हैं कि वह यमुना और सतलज के बीच में बहती थी, आधुनिक राजस्थान के बीचों बीच। पुरातत्वविदों को उस क्षेत्र में सिन्धु घाटी के ६०० मानवीय निवासों की तुलना में लगभग २००० मानवीय निवास मिले हैं, पर नदी की उपस्थिति का कोई निश्चित सूत्र नहीं मिला।

१९७० में अमेरिका के नासा ने अपने उपग्रहीय चित्रों की सहायता से राजस्थान के थार मरुस्थल में एक लुप्त नदी की उपस्थिति के संकेत दिये थे। उसे दोनों ओर बढ़ाकर देखा गया तो भारत की घग्गर नदी और पाकिस्तान में बहने वाली हाक्रा नदी, सरस्वती नदी के ही अन्तिम छोर हैं, बीच की नदी विलुप्त हो गयी। घग्गर की नदी घाटी एक स्थान पर आकर १०-१२ किमी तक चौड़ी हो जाती है, इससे बस यही अनुमान लगाया जा सकता है कि सरस्वती बहुत ही विशाल नदी रही होगी। तथ्य यह भी बताते हैं कि उस समय सतलज और यमुना दोनों ही सरस्वती में आकर बहती थीं। पृथ्वी की आन्तरिक गतियों के कारण सतलज ने रोपर के पास उल्टा मोड़ लिया और व्यास में मिलती हुयी सिन्धु नदी का अंग बन गयी। वहीं दूसरी ओर यमुना पौन्टा साहब में पूर्व की ओर मुड़ गयी और प्रयाग में आकर गंगा नदी से मिल गयी। दोनों नदियों के दिशा परिवर्तन क्यों हुये, कहना कठिन है, पर यमुना सरस्वती का जल लेकर गंगा से मिलती है इसीलिये प्रयाग की त्रिवेणी में सरस्वती को लुप्त नदी कहा जाता है।

पोखरण परमाणु परीक्षण और उसके बाद का घटनाक्रम सरस्वती के इतिहास को सिद्ध करने में बहुत महत्वपूर्ण रहा है। परीक्षण के बाद जब वैज्ञानिकों ने २५० किमी के क्षेत्र में ८०० कुओं के जल का परीक्षण किया तो उस जल में रेडियोएक्टिव तत्वों की अनुपस्थिति ने परीक्षण की उत्कृष्ट योजना को सिद्ध किया। साथ में जो अन्य निष्कर्ष पाये, वो सरस्वती के अस्तित्व को सिद्ध करने के लिये पर्याप्त थे। पानी मीठा था, ८०००-१४००० साल पुराना था और हिमालय के ग्लेशियरों का था। यही नहीं इस नदी घाटी के किनारे पायी गयी मूर्तियों में आदि बद्री में पाये गये पत्थरों के चूरे के अवशेष मिले हैं। उस क्षेत्र में हिमालय का जल व उद्गमस्थल के पत्थरों का चूरा इतनी अधिक मात्रा में पहुँचने का कोई और कारण नहीं था, सिवाय इसके कि सरस्वती वहाँ बहती थी।

इन खोजों ने सरस्वती के पुराने पाट को पुनः उपयोग में लाकर हिमालय का पानी राजस्थान में लाने का आधार दिया है। सतलज और यमुना के पानी को पहले भूमिगत जल भरने में और उसके बाद सरस्वती को पुनः जीवित करने की विशाल योजना है। राजस्थान की धरती सरस्वती के जल से सरसवती हो पायेगी या नहीं, कच्छ का रन अपने श्वेत विस्तृत क्षेत्र पर हिमालय का जल देख पायेगा या नहीं, सरस्वती के सूखने के बाद दोनों ओर पलायन कर गयी जनसंख्या संस्कृति की सततता उत्पन्न कर पायेगी या नहीं, यह प्रश्न भविष्य बतलायेगा। पर इन खोजों ने एक घृणित असत्य को सहसा आवरणहीन कर दिया है।

अपने आक्रमण और भारतीयों पर की निर्दयता को उचित ठहराने के लिये अंग्रेजों में आर्यों के आक्रमण का विस्तृत इतिहास सृजित किया। भारतीय जनमानस में फूट डालने के लिये आर्य-द्रविड जैसे सिद्धान्तों को पल्लवित किया। योजनानुसार भारतीय संस्कृति के प्रत्येक आधार को नीचा दिखाया। आर्य आक्रमण का एकमेव आधार मोहनजोदड़ो का नष्ट होना १८०० ईपू निर्धारित किया गया है, सरस्वती का लुप्त होना ४०००-८००० ईपू की घटना है। जब वेदों में सरस्वती के बहने और सामने ही लुप्त होने का वर्णन है तो जिस समय मोहनजोदड़ों नष्ट हुआ, उस समय आर्य भारत में ही थे, न कि उनके द्वारा बाहर से आक्रमण किया गया।

पानी इतिहास रचता है और इतिहास की रक्षा भी करता है, सरस्वती की खोजों ने जिस इतिहास को पुनर्जीवित किया है वह हम सबके लिये अमूल्य है। अब चाहे यमुना पुनः अपनी धार पूर्ववत कर सरस्वती से जा मिले, राजस्थान को लहलहाने में कान्हा के वृन्दावन और मेरे गृहनगर को भूल जाये, मेरे हृदय में पानी का इतिहास सदा सम्मान पाता रहेगा।

हमारे इतिहास की साक्षी नदियाँ हमारे भविष्य को रचने में भी सक्षम हैं।

19.5.12

सीट बेल्ट और इंच इंच सरकना

बंगलोर में अभी कुछ दिन पहले सीट बेल्ट बाँधना अनिवार्य कर दिया गया है। इस निर्णय ने मुझे कई कोणों से और बहुत गहरे तक प्रभावित किया है।

संरक्षा को प्राथमिकता मिलनी चाहिये, पर आमजन संरक्षा के प्रति जागरूक नहीं होता है, उसे लगता है कि सीट बेल्ट बाँधने और उतारने में इतना समय लग जाता है कि उतनी देर में वह न जाने कितना शहर नाप आयेगा। समय बचा लेने की इस जुगत में वह तब तक सीट बेल्ट नहीं बाँधता, जब तक यह अनिवार्य न कर दिया जाये। अनिवार्य भी तब तक अनिवार्य नहीं समझा जाता, जब तक उस पर कोई आर्थिक दण्ड न हो। यद्यपि आर्थिक दण्ड लगने के बाद ही धनपुत्रों को नियम तोड़ने का विशेष सुख मिलता है क्योंकि तब अन्य लोग नियम नहीं तोड़ पाते हैं और तब धनपुत्र अपने धन के कारण विशेष हो जाते हैं। भले ही कुछ लोग अपने धन से यह सुख खरीदते रहें पर आमजन संरक्षा के प्रति सचेत से प्रतीत होने लगते हैं। धन और शेष को पृथक रखने के नीरक्षीर विवेक से युक्त दूरगामी निर्णय से किस तरह अनुशासित समाज का निर्माण हो सकता है, यह प्रभावित होने का विषय है।

ऐसे निर्णय हर समय नहीं लिये जा सकते हैं क्योंकि हर निर्णय को लागू करने में बहुत श्रम लगता है। बंगलोर में इतनी गाड़ियाँ हैं कि सबके आगे की सवारियों को देखने में ही सारी ऊर्जा लगा दी तो अन्य नियमों का उल्लंघन देखने का समय ही नहीं मिलेगा। जितना अधिक कार्य यहाँ के ट्रैफिक वाले करते हैं, उतनी लगन मैने अभी तक कहीं और नहीं देखी। यहाँ पर इसे मानवीय कार्यों की श्रेणी में रखकर यथासंभव निभाया जाता है, अन्य नगरों में इसे ईश्वरीय प्रकोप या कृपा मानकर छोड़ दिया जाता है। ऐसी श्रमशील फोर्स को और काम करने के लिये मना लेना सच में सुयोग्य प्रशासन के ही संकेत हो सकते हैं और उससे प्रभावित होना स्वाभाविक भी है।

कार्य केवल उल्लंघन करने वालों का नम्बर नोट कर चालान करने तक सीमित होता तब भी समझा जा सकता था। अधिक दण्ड होने पर कार्यालय में दण्ड भरने वालों की संख्या बहुत बढ़ जाती है। उन्हें सम्हाल पाना एक कठिन कार्य है। कुछ ट्रैफिक वाले कार्यालय में बैठे अपने सहकर्मियों की पीड़ा समझते भी हैं और यथासंभव रसीद या बिना रसीद के दण्ड सड़क पर ही भरवा लेते हैं। एक छोटे निर्णय से सबका काम बहुत बढ़ जायेगा, यह तथ्य ज्ञात होते हुये भी यह निर्णय लागू करा लेना मुझ जैसों को प्रभावित कर लेने के लिये पर्याप्त है।

देश का एक विशेष गुण है, जो भी कोई नयी या खरी बात बोलता है, लोग उन्ही शब्दों से बोलने वाले का जीवन तौल डालते हैं। बहुतों के साथ ऐसा हुआ है और यह तथ्य वर्तमान के कई उदाहरणों के माध्यम से सर्वविदित भी है। हुआ वही, जिसका डर था, आदेश लागू होने के दूसरे दिन ही अखबारों में एक चित्र आ गया कि मुख्यमंत्रीजी की गाड़ी में इस नियम का पालन नहीं हो रहा है। यह सब होने पर भी नियम का पालन यथावत चलता रहा, इस बात ने मुझे पर्याप्त प्रभावित किया।

मुझे गाड़ी में आगे ही बैठना अच्छा लगता है, वहाँ से परिवेश पर पूरी दृष्टि बनी रहती है। पीछे की सीट पर बैठकर केवल अपनी ओर के दृश्य दिखते हैं, केवल एक तिहाई। छोटे से जीवन में दो तिहाई दृश्य छूट जायें, इससे बड़ी हानि संभव भी नहीं है। जब यही सोच कर कार निर्माताओं ने आगे की सीट बनायी तो उसका लाभ उठाने में संकोच कर निर्माताओं की आकांक्षाओं को धूलधूसरित क्यों किया जाये। पीछे बैठकर एक ही ओर देखते रहने से और उत्सुकतावश सहसा अधिक मुड़ जाने से गर्दन में पुनः मोच आ जाने का डर भी है। हाँ, जब अधिक दूर जाना हो या रात्रि निरीक्षण में निकलना हो, तो पीछे की सीट लम्बी करके सो जाता हूँ। आगे बैठने से सीट बेल्ट बाँधना आवश्यक हो गया। कुछ बार तो याद रहा, कुछ बार भूलना भी चाहा पर हमारे ड्राइवर साहब ने भूलने नहीं दिया। एक बार जब उकता गये तो पूछा कि क्या बाँधना हर बार आवश्यक है, ड्राइवर साहब ने कहा कि आवश्यक तो नहीं है बशर्ते जेब में १०० रु का नोट सदा रखा जाये, दण्ड भरने के लिये। ड्राइवर साहब के 'न' नहीं कहने के तरीके ने प्रभावित किया मुझे।

जब कोई उपाय नहीं रहा तो नियमित सीट बेल्ट बाँधना प्रारम्भ कर दिया। सीट बेल्ट के लाभ सुरक्षा के अतिरिक्त और भी पता चले। जब सीट बेल्ट नहीं बँधी होती है तो आपका कोई एक हाथ सदा ही सचेत अवस्था में बना रहता है और झटका लगने की स्थिति में सीट या हैंडल पकड़ लेता है। साथ ही साथ आपकी आँखें भी खुली रहती हैं और कार की गति के प्रति सचेत बनी रहती हैं। सीट बेल्ट बाँधने के बाद हमारे हाथ और आँखें, दोनों ही मुक्त हो लिये, आँख बन्द कर चिन्तन करने के लिये और दोनों हाथों से मोबाइल पर टाइपिंग करने के लिये। पहले जो शरीर पहले एक ही अवस्था में बना रहने से थक जाता था, अब ढीला छोड़ देने से थकता नहीं था। यात्राओं में चिन्तन कर सकना, अधिक टाइपिंग होना और कम थकना, यह तीनों कारण मुझे बहुत गहरे प्रभावित कर गये।

सीट बेल्ट का सिद्धान्त उसके उपयोग के अनुसार ही है। आप उसे धीरे धीरे खींचेगे तो वह कितना भी खिंच आयेगा पर झटके से खींचेगे तो तुरन्त अटक जाता है। सीट बेल्ट के उपयोग करने के पहले तक यह सिद्धान्त ज्ञात नहीं था। पहले विश्वास नहीं था पर जब हाथों से खींच कर प्रयोग किया तब विश्वास आया। एक बार जब कार झटके से रोकनी पड़ी तब सीट बेल्ट ने सहसा अपनी जकड़ में भींच लिया। यही सिद्धान्त जीवन में भी लगता है। ध्यान से देखें तो जो सुरक्षा के संकेत होते हैं, वह आपके अधिक गतिमय होने पर ही प्रकट होते हैं, अन्यथा जीवन अपनी मन्थर गति से चलता रहता है। इस सिद्धान्त ने मुझे अन्दर तक प्रभावित किया।

इतना अधिक मात्रा में प्रभावित होकर हम भारी होकर सो गये होते यदि हमारे ड्राइवर महोदय खिन्न से न लग रहे होते। उन्हे सीट बेल्ट बाँधना झंझट सा लग रहा था। पूछने पर बताया कि जब बंगलोर के ट्रैफिक की औसत चाल पैदल से थोड़ी सी ही अधिक है तब सीट बेल्ट बाँधने का क्या लाभ? ट्रैफिक जाम से बचने के लिये कौन सा नियम बनेगा? सीट बेल्ट के साथ इंच इंच सरकने की व्यथा ने प्रभावित करने की हद ही कर डाली।

16.5.12

मेरे फैन भी मुझसे कोई नहीं छीन सकता है

लगभग ४ वर्ष पहले का समय, ग्वालियर स्टेशन परिसर में, नयी ट्रेन के उद्घाटन के अवसर पर जनप्रतिनिधियों के अभिभाषण चल रहे थे, एक मालगाड़ी १०० किमी प्रति घंटे की गति से पास की लाइन से धड़धड़ाती हुयी निकली, लोहे की गड़गड़ाहट के स्वर ने ३० सेकेण्ड के लिये सबको निशब्द कर दिया। बहुतों के लिये तो यह ३० सेकेण्ड का व्यवधान ही था और जब वातावरण उत्सवीय हो तो कोई भी व्यवधान अखरता भी है। तभी परिचालन के एक वरिष्ठ अधिकारी कनखियों से हमारी ओर देखते हैं, हल्के से मुस्कराते हैं। संवाद स्पष्ट था, उनके लिये यह ३० सेकेण्ड आनन्द से भरे थे, हमें भी वही रस मिला था। जो सुख ३००० टन की मालगाड़ी को गतिमान दौड़ते देखने में था, भरे डब्बों और पटरियों के खनक सुनने में था, उस ३० सेकेण्ड के सुख के आगे शब्दों के नीरस निर्झर का कोई मोल नहीं था।

आवश्यक नहीं कि रेलवे के जिस रूप से हम अभिभूत हों, वही औरों को भी अभिभूत करे। हम रेलकर्मचारियों के लिये यह आनन्द कर्तव्य का एक अंग है और आवश्यकता भी। हमारा कर्तव्य है कि गाड़ियाँ अपनी अधिकतम गति से ही चलें। संभवतः कर्तव्य से आच्छादित अभिरुचि के आनन्द की विशालता को नहीं समझ नहीं पाता यदि रेलवे के और दीवानों से नहीं मिलता। यात्राओं में या कहीं अन्य स्थानों पर हुयी भेटों में रेलवे के कई और पहलुओं के बारे में भी पता लगा, लोग जिससे प्रेम किये बैठे हैं, एक सीमा से भी अधिक दीवाने हैं।

किसी को गति भाती है, किसी को उनकी लम्बाई, किसी को यात्रा का सुख, किसी को रेल का इतिहास। कोई हिन्दी साहित्य में भारतेन्दु हरिश्चन्द्र से लेकर अब तक वर्णित रेलवे के संदर्भों से अभिभूत है तो कोई रेलवे के माध्यम से पूरा देश नापने का उत्सुक है। कभी रेल की पटरियों के किनारे के दृश्य अपने कैमरे में उतारने के लिये रेलवे के दीवाने पैसेन्जर ट्रेनों में घंटों बिता देते हैं, कभी हवाओं के थपेड़ों को अपने चेहरे पर अनुभव करने के लिये दरवाजों से लटके न जाने क्या सोचते रहते हैं। किसी को रेलवे किसी रहस्य से कम नहीं लगता है, किसी को रेलवे के बारे में बतियाने का और अधिकतम तथ्य जानने का नशा है।

बचपन में रेल पटरियों पर दस पैसे का चपटा हो जाना आर्थिक हानि कम, शक्ति का प्रदर्शन अधिक लगता था। गाँवों में जाती हुयी ट्रेन के यात्रियों को हाथ हिला कर बच्चों का उछलना, रेलवे के प्रति उनके प्रेम का प्रथम लक्षण सा दिखता है, यही धीरे धीरे उपरिलिखित अभिरुचियों और गतिविधियों में आकार लेने लगता है।

कई लोगों में उपस्थित इस उन्माद के बारे में तब पता लगा, जब यहाँ पर कई उद्धाटनों में एक समूह को बार बार देखा। नये तरह के कोच आयें या इंजन, किसी ट्रेन की गति के ट्रायल हों या किसी रेललाइन का विद्युतीकरण, रेल से संबन्धित कोई कला प्रदर्शनी हो या रेल परिसर में कोई अन्य आयोजन, उस समूह की उपस्थिति सदा ही बनी रही, उत्साह से परिपूर्ण लोगों का समूह। थोड़ी बातचीत हुयी तो उसमें कोई इन्जीनियर, कोई सॉफ्टवेयर में, कोई विद्यार्थी, बहुतों का रेलवे से कोई पारिवारिक जुड़ाव नहीं। जहाँ तक उनकी अभिरुचि की गहनता का प्रश्न है तो तकनीक, वाणिज्य से लेकर परिचालन और इतिहास के बारे में पूरी सिद्धहस्तता। लगा कि उनके जीवन के हर तीसरे विचार में रेलवे बसी है।

उत्साह संक्रमक होता है। निश्चय ही आप जिस संगठन के माध्यम से अपनी जीविका चला रहे हैं, उसके प्रति आपकी निष्ठा अधिक होती है और समय के साथ बढ़ती भी रहती है, यह स्वाभाविक भी है, पर रेलवे से पूर्णता असंबद्ध समूह का रेलवे से अप्रतिम जुड़ाव देखकर मन आनन्द और गर्व से प्लावित हो गया।

इंडियन रेलवे फैन क्लब नामक यह समूह अपनी गतिविधियों को इण्टरनेट पर सहेज कर अपने उत्साह को सतत बनाये रहता है। कई और भेटों के पश्चात जब इस साइट पर जाना हुआ तो वहाँ पर उपस्थित सामग्री देखकर आँखे खुली की खुली रह गयीं। सैकड़ों चित्र, यात्रा वृत्तान्त, तकनीकी तथ्य और इतिहास के जो क्षण वहाँ दिखे, वो बिना विशेष अध्ययन के संभव भी नहीं थे। यही नहीं, ये दीवाने हर वर्ष इण्टरनेट के बाहर भौतिक रूप से भी मिलते हैं, विषय विशेष पर चर्चा करते हैं, रेलवे के प्रति अपनी अगाध निष्ठा को अभिव्यक्त करते हैं।

हम सबको कभी न कभी रेलवे ने चमत्कृत किया है, न जाने कितने युगलों को जानता हूँ, जिनके वैवाहिक जीवन की नींव रेलयात्राओं में ही पड़ीं। छुक छुक करते हुये खिलौनों से खेलना हो या रेलगाड़ी में बैठ अपने दादा-दादी या नाना-नानी से मिलने जाना हो, सबके मन में रेल कहीं न कहीं घर बनाये हुये है। आपके मन में वह विस्मृत विचार पुनः अँगड़ाई लेना चाहे तो आप इन दीवानों से जुड़ भी सकते हैं। जहाँ एक ओर आपकी अपेक्षाओं के ताल को भरने में रेल कर्मचारी अपने श्रम से योगदान दे ही रहे हैं, वहीं दूसरी ओर आपका हृदयस्थ जुड़ाव ही रेलवे की ऊर्जा को स्रोत भी है।

यह देख रेलवे भी निश्चय ही यही कह उठेगी कि मेरे फैन भी मुझसे कोई नहीं छीन सकता है।

12.5.12

आधारभूत गर्त

जुआ खेलने वाले जानते हैं कि दाँव इतना लगाना चाहिये कि एक बार हारने पर अधिक कष्ट न हो, और दाँव इतनी बार ही लगाना चाहिये कि अन्त में जीने के लिये कुछ बचा रहे। वैसे तो लोग कहते हैं कि जुआ खेलना ही नहीं चाहिये, सहमत हूँ और खेलता भी नहीं हूँ, पर जीवन में इससे बचना संभव नहीं होता है। वृहद परिप्रेक्ष्य में देखा जाये तो ऐसे निर्णय जिनका निष्कर्ष नहीं ज्ञात होता है, एक प्रकार से जुये की श्रेणी में ही आते हैं। ताश आदि के खेलों में अनिश्चितता अधिक होती है, इसीलिये जुआ अधिक बदनाम है, इसे खेलना टाला भी जा सकता है। जीवन के निर्णयों में अनिश्चितता कम होती है, ये आवश्यक होते हैं, लम्बित तो किये जा सकते हैं पर पूरी तरह से टाले नहीं जा सकते हैं।

शेयर खरीदने वाले जानते हैं कि उन कम्पनी के शेयरों पर पैसा लगाना अच्छा है जिनका नाम है, जिनके भविष्य में कुछ निश्चितता है, जिनका प्रबन्धतन्त्र सुदृढ़ हाथों में है। यह विकास का अंग अवश्य है पर उसमें उपस्थित अनिश्चितता इसे भी जुये की श्रेणी में ले आती है। मैं शेयर भी नहीं खरीदता हूँ यद्यपि कई लोग उकसाते रहते हैं, उनके अनुसार हम अपनी बुद्धि और ज्ञान का सही उपयोग नहीं कर रहे हैं क्योंकि बुद्धि और बल का उपयोग धनार्जन में नहीं किया गया तो जीवन व्यर्थ हो गया। यथासंभव इन सबसे बचने के प्रयास के कारण कई बार भीरु और मूढ़ होने के सम्बोधन भी झेल चुका हूँ।

कई लोग हैं मेरे जैसे ही, जो इस अनावश्यक और अनिश्चित के दुहरे पाश से यथासंभव बचे रहना चाहते हैं। बचा भी रहा जा सकता है यदि तन्त्र ठीक चलें, अपने नियत प्रारूप में, व्यवस्थित। बहुत से ऐसे तन्त्र हैं जो अच्छे से चल भी रहे हैं और उन क्षेत्रों में हमारा जीवन स्थिर भी है, यदि स्पष्ट न दिखते हों तो पड़ोसी देशों को निहारा जा सकता है। कई क्षेत्र पर ऐसे हैं जिन्होंने एक पीढ़ी में ही इतना पतन देख लिया है, जो हमारे विश्वास को हिलाने के लिये पर्याप्त है, निश्चित से अनिश्चित तक की पूरी यात्रा। अनिश्चित और अनावश्यक अन्तर्बद्ध हैं, बहुत अन्दर तक, एक दूसरे को सहारा देते रहते हैं और निर्माण करते रहते हैं, एक आधारभूत गर्त।

बहुत क्षेत्र हैं जिसमें बहुत कुछ कहा जा सकता है, पर विषय की एक निश्चयात्मक समझ के लिये बिजली और पानी की स्थिति ले लेते हैं, सबसे जुड़ा और सबका भोगा विषय, हर बार घर की यात्रा में ताजा हो जाता विषय, अपने बचपन से तुलना किया जा सकने वाला विषय, एक पीढ़ी के अन्तर पर खड़ा विषय।

बचपन की स्थिति स्पष्ट याद है। दिन में तीन बार पानी आता था, कुल मिलाकर ६ घंटे, कहते थे उसी समय पंपहाउस का पंप चलता था। साथ ही साथ बिजली भी रहती थी, लगभग १८ घंटे, बिजली कटने के घंटे नियत, कहते थे कि बचे हुये ६ घंटे उद्योगों और खेतों को बिजली दी जाती थी। सुविधा तब जितनी भी थी, निश्चितता थी। यदा कदा यदि किसी कारण से बिजली और पानी नहीं आता था, तो उसका कारण ज्ञात रहता था, साथ ही साथ कब तक स्थिति सामान्य हो जायेगी, यह भी ज्ञात रहता था। पानी नहीं आने पर नदी में नहाने जाते थे और बिजली नहीं आने पर हाथ से पंखा झल लेते थे।

स्थितियाँ बिगड़ी, अनिश्चितता बढ़ी। सबसे पहले वोल्टेज कम होना प्रारम्भ हुआ, अब सब क्या करें? जो सक्षम थे उन्होंने अपने घर में स्टेबलाइज़र लगाना प्रारम्भ किया, जो कभी अनावश्यक समझा जाता था, आवश्यक हो गया। धीरे धीरे बिजली अधिक समय के लिये गायब रहने लगी, उस अन्तराल को भरने के लिये लोगों ने इन्वर्टर ले लिये, धीरे धीरे वह हर घरों में जम गया। जब इन्वर्टर को भी पूरी चार्जिंग का समय नहीं मिला, तो छोटे जेनसेट हर घरों में आ गये। घनाड्य तो बड़े जेनेरेटर लगा कर एसी में रहने का आनन्द उठाते रहे।

पानी जहाँ बिजली पैदा करता है वहीं बिजली से पंप भी किया जाता है। बिजली की अनिश्चितता ने पानी को भी पानी पानी कर दिया। जब लोगों का विश्वास सार्वजनिक सेवाओं से हट गया तो घरों में बोरिंग हुयी, पंप लगे और बड़ी बड़ी टंकियाँ बनायी गयीं।

जहाँ एक ओर तन्त्र अनिश्चित हो रहा था, अनावश्यक यन्त्र आवश्यक हो रहे थे, हमारी सुविधाभोगी जीवनशैली और साधन जुटाने में लगी थी। फ्रिज, वाशिंग मशीन, कूलर, ओवेन, एसी आदि हमारे जीवन में छोटे छोटे स्वप्नों के रूप में जम रहे थे। विश्वास ही नहीं होता है कि तीस वर्ष पहले तक बिना इन यन्त्रों के भी घर का बिजली पानी चल रहा था। सीमित बिजली पानी बड़े नगर सोख ले रहे हैं, इस आधारभूत गर्त में छोटे नगरों का जीवन कठिन हुआ जा रहा है, सारा समय इन्हीं आधारभूत समस्याओं से लड़ने में निकल जाता है।

हम सबने सुविधाओं के नाम पर विकास के जुये में इतना बड़ा दाँव लगा दिया कि हार का कष्ट असहनीय हुआ जा रहा है, इतनी बार दाँव लगाया है कि जीने के लिये कुछ बचा भी नहीं। पुरानी स्थिति में भी नहीं लौटा जा सकता है क्योंकि सुविधाओं ने उस लायक नहीं छोड़ा है कि पुरानी जीवनशैली को पुनः अपनाया जा सके। इस आधारभूत गर्त में एक हारे हुये मूर्ख जुआरी का जीवन जी रहे हैं हम सब।

9.5.12

हैं अशेष इच्छायें मन में

मैने मन की हर इच्छा को माना और स्वीकार किया,
जितना संभव हो पाया था, अनुभव से आकार दिया,
ऊर्जा के संचय संदोहित, प्यासे मन की ज्वाला में,
मानो जीवन नाच रहा हो, झूम समय की हाला में,
हर क्षण को आकण्ठ जिया है, नहीं कहीं कुछ छोड़ सका,
भर डाला जो भर सकता था, मन को मन से तृप्त रखा,
सारा हल्कापन जी डाला, नहीं ठोस उस व्यर्थ व्यसन में,
हैं अशेष इच्छायें मन में।१।

देखो तो चलचित्र जगत का तरह तरह के रंग दिखाता,
सबकी चाह एक जैसी ही, सबको सबके संग दिखाता,
सबको अर्थ वही पाने हैं, प्रश्न पृथक क्यों पूछें हम,
न चाहें, फिर भी भरते घट, कहाँ रह सके छूछे हम,
मीन बने हम विषय ताल में, कितना जल पी डाला है,
जीवन को उतराते पाया, जब से होश सम्हाला है,
हम, तुम, सब मदमस्त नशे में, किसने घोली चरस पवन में,
हैं अशेष इच्छायें मन में।२।

जब भी पीड़ाओं से भागा, राहों में कुछ और खड़ीं,
छोटी को झाँसा दे निकला, भाग्य लिखी थी और बड़ी,
आगत का भय, विगत वेदना, व्यर्थ अवधि क्यों खीचें हम,
दृश्य बदे जो, सब दिखने हैं, आँख रहे क्यों मींचे हम,
जैसा भी है, अपना ही है, उस अनुभव से क्यों च्युत हों,
जब आयेगीं, सह डालेंगे, दुगने मन से प्रस्तुत हों,
सह सह सब रहना सीखा है, दिखता अब सौन्दर्य तपन में,
हैं अशेष इच्छायें मन में।३।

5.5.12

बिग बैंग के प्रश्न

कहते हैं कि उत्तर प्रश्न से उत्पन्न होते हैं, यदि प्रश्न न हों तो उत्तर किसके? किन्तु जब उत्तर ही प्रश्न उत्पन्न करने लगें तो मान लीजिये कि विषय में गजब की ऊँचाई है, गजब की ढलान है, ऐसी ढलान जिसके एक टिके टिकाये उत्तर को हटाने से प्रश्नों का लुढ़कना प्रारम्भ हो जाता है, वह भी अनियन्त्रित, किसी पहाड़ के बड़े बड़े पत्थरों की तरह, भरभरा कर। अनुभवी लोग ऐसे विषयों और उत्तरों को छूते ही नहीं, उसके चारों ओर से घूमकर निकल जाते हैं। हमारा अनुभव इतना परिपक्व नहीं हुआ था कि यह पेंच हम समझ पाते। एक उत्तर देने पर प्रश्नों की ऐसी झमाझम बारिश हो जायेगी, यह देखना शेष था अभी।

बिग बैंग के ठहाके लगाने के बाद, अब बारी थी उसके अर्थ को समझाने की। पूछने वाले पृथु थे जो थोड़ी देर पहले तक उन्हीं ठहाकों में आकण्ठ डूबे थे। प्रश्न बड़ा सरल था कि यह 'बिग बैंग थ्योरी' क्या है?

पहले तो सोचा कि प्रचलित परिभाषायें देकर निकल लिया जाये कि सारा ब्रह्माण्ड पहले एक छोटे से बिन्दु में सिकुड़ा था। वह किसी बम के विस्फोट की तरह फटा और चारों ओर फैलने लगा और अब तक फैलता जा रहा है, विस्फोट के छोटे छोटे टुकड़े भिन्न भिन्न आकाशगंगाओं, तारों और अन्ततः ग्रहों में बट गये। अरबों वर्ष निकल गये, रासायनिक प्रक्रियायें हुयीं, जीवन की उत्पत्ति हुयी, मानव बना, बुद्धि विकसित हुयी, इतनी कि अपनी उत्पत्ति के बारे में सोच सके। जीवन उत्पत्ति का यह घटनाक्रम विज्ञान का एक संस्करण है पर एक असिद्ध कहानी सा। विज्ञान का इस कहानी में विश्वास या अविश्वास उतना ही वैकल्पिक और काल्पनिक है जितना विभिन्न धर्मों द्वारा प्रस्तुत ईश्वर की अवधारणा में।

श्रेयस्कर यह लगा कि पृथु को केवल वह तथ्य बताये जायें जिनके आधार पर वैज्ञानिक बिग बैंग की अवधारणा पर पहुँचे होंगे, साथ में यह भी बताया जाये कि इस सिद्धान्त में कौन से प्रश्न अब तक अनुत्तरित हैं। बिग बैंग के क्षण से जीवन उत्पत्ति की अब तक यात्रा कैसी रही होगी, यह आने वाले समय और मस्तिष्कों के लिये छोड़ दिया जाये, जब भी वे इसके उत्तर ढूढ़ पायें।

शक्तिशाली दूरबीनों से किये गये आकाशीय अवलोकन में यह पाया गया कि जो तारे आपसे जितना अधिक दूर हैं, उनकी गति आपकी तुलना में उतनी ही अधिक है। किन्ही भी दो तारों के बीच की दूरी बढ़ती ही जा रही है, अर्थ यह कि विश्व फैल रहा है। इस स्थिति से जब समय की उल्टी दिशा में चला जाये तो हम एक ऐसे स्थान पर पहुँचेंगे जब ब्रह्माण्ड एक बिन्दु पर केन्द्रित था। इस बिन्दु पर सबकी गति शून्य थी, समय की भी, इस क्षण को ही बिग बैंग के नाम से जाना गया।

प्रश्न यह कि ब्रह्माण्ड एक बिन्दु में समाया कैसे होगा, ठोस द्रव्य में यह संभव ही नहीं है। अथाह ऊर्जा और उच्चतम तापमानों का संयोग ही ऐसी स्थिति उत्पन्न कर सकता है, ऊर्जा जो प्रस्फुटित हुयी, फैलती गयी, धीरे धीरे ठंडी होती ग्रहों में बदलती गयी। इस प्रारम्भिक विशिष्ट स्थिति को परिभाषित करना विज्ञान के लिये एक चुनौती है। यह कार्य कठिन अवश्य है पर इसे समझने के तीन संकेत इस सदी के तीक्ष्णतम मस्तिष्कों ने ही सुलझाये हैं।

पहला संकेत है, ऊर्जा और द्रव्य का पारस्परिक संबंध, किस तरह ऊर्जा द्रव्य में और द्रव्य ऊर्जा में बदलता है, परमाणु बम में उत्पन्न ऊर्जा इस संबंध को सिद्ध भी करती है। दूसरा संकेत है, ब्लैक होल की उपस्थिति, इनमें इतना गुरुत्वाकर्षण होता है कि वह किसी को भी निगल जाते है, प्रकाश को भी, सदा के लिये। किसी वस्तु से प्रकाश न निकल पाने की स्थिति में वह काला ही दिखेगा, यही उनके नामकरण का कारण भी है। यह इतने घने होते हैं कि सुई की नोंक के बराबर ब्लैकहोल का भार चन्द्रमा के भार के बराबर होता है। तीसरा संकेत है, समय का सिकुड़ना और फैलना, समय की सापेक्षता का सिद्धान्त। यदि आपकी गति प्रकाश की गति के समकक्ष है तो आपका एक वर्ष कम गति से चलने वाले के कई वर्षों के बराबर हो सकता है, अर्थात कम गति से चलने वाला अधिक गति से बूढ़ा होगा।

यदि उपर्युक्त अवलोकनों को एक साथ रख कर देखा जाये तो बिगबैंग की स्थिति संभव लगती है। उस स्थिति का कोई गणितीय आकार न बन पाने का कारण है, सूत्रों का शून्य से विभाजित हो जाना, सब अनन्त हो जाता है तब। जैसे ही विज्ञान अनन्त को परिभाषित कर लेगा, बिग बैंग के सारे प्रश्न स्वतः ही सुलझ जायेंगे। कुछ तो कहते हैं कि ब्लैकहोलों की उपस्थिति इस फैलते विश्व को पुनः सिकोड़ देंगीं, एक बिन्दु में, जो अगले बिग बैंग के लिये फिर से तैयार हो जायेगा, अनन्त का अनन्त चक्र।

आप विश्वास माने न माने, पर विश्व और समय के सिकुड़ने और फैलने की रोचकता इतनी अधिक है कि पृथु सब मुँह बाये सुनते रहे, समय की विमा और समय में घूमने के आनन्द की कल्पना अद्भुत है। उनके चेहरे की संतुष्टि देख कर लगा कि इस विषय में हमारी रुचि और श्रम यूँ ही व्यर्थ नहीं गया।

यहाँ तक तो सब ठीक था, जो आता था वह बता भी दिया। अगले प्रश्न के लिये पर मैं भी तैयार नहीं था, क्योंकि इस प्रश्न पर अभी तक निष्कर्ष तो कम, शब्दों की तलवारें अधिक निकली हैं। आप ही जो बतायेंगे, हम वही पृथु को बता देंगे। पर याद रहे, इसका उत्तर उन सब पत्थरों को भरभरा कर गिरा सकता है, जो अभी तक आप और हम बनाते आये हैं, सदियों से।

पृथु पूछते हैं कि बिग बैंग किसने कराया, ईश्वर ने या विज्ञान ने?

2.5.12

बिग बैंग के ठहाके

एक मित्र ने अंग्रेजी का एक धारावाहिक सुझाया था, 'द बिग बैंग थ्योरी'। शीर्षक आधुनिक विज्ञान से संबंधित है पर विषय वस्तु एक विशुद्ध हास्य है। एक कड़ी देखकर ही मन बना लिया था कि जब भी समय मिलेगा, उसे पूरा देखा जायेगा। मित्र ने ही अभी तक के सारे सत्रों की एक सीडी भी दे दी थी, १२७ कड़ियाँ, लगभग ४० घंटे का मनोरंजन, बिना किसी विज्ञापन के।

रेलयात्रा में वह अवसर मिल गया, औरों को विघ्न न हो अतः ईयरफोन लगा कर देखने लगा। मशीन की आवाज तो नियन्त्रित कर सकता था पर जब स्वयं को ही ठहाका मारने का मन हो तब कौन सा साइलेंसर लगाया जाता। कई बार आस पास के यात्रियों को कौतूहलवश अपनी ओर ताकते देखा तो अपने उद्गारों को यथासंभव नियन्त्रित करने लगा। रेलयात्रा के बाद वही ठहाकायुक्त व्यवहार घर में भी चलता रहा, यह देख माँ पिता को अटपटा तो लगा पर देखा कि लड़का प्रसन्न है तो वह भी मन्द मन्द मुस्कराते रहे।

घर में एक व्यक्ति ठहाका मारे तो उसे अपवाद मान कर छोड़ा जा सकता था, पर दूसरे ठहाकों की आवाज ने हमें भी अचम्भे में डाल दिया। प्रतिद्वंदी कहाँ से आ टपका, जाकर दूसरे कमरे में देखा तो पुत्र महोदय पृथु भी वही धारावाहिक देख रहे थे, दूसरे लैपटॉप पर। रेलयात्रा में हमारे ठहाकों ने उनकी उत्सुकता बढ़ा दी थी, समय पाकर उन्होने अपने लैपटॉप पर उसे कॉपी कर लिया और बिना किसी से सलाह लिये और अपने वीडियो गेम छोड़कर उसी में व्यस्त हो लिये। पृथु के ठहाकों में मुझे अपने ठहाके कुछ कुछ उपस्थित लग रहे थे, पता नहीं गुणसूत्रों में थे या पिछले तीन दिन में सीखे थे। सबको अपना स्वभाव और व्यवहार बड़ा ही सामान्य और प्राकृतिक लगता है पर जब वही व्यवहार आपकी सन्ततियों में भी आ जाये तब कहीं जाकर उसके गुण दोष पता चलते हैं।

सभ्य समाज में बिना किसी पूर्वसूचना के प्रसन्नता के उद्गार ठहाके के रूप में व्यक्त करना भले ही असभ्यता की श्रेणी में आता हो, पर न तो कभी हमारे माँ पिता को मेरे ठहाकों पर आपत्ति रही और न ही कभी हम पृथु को इसके लिये कोई सलाह देंगे। सुना है भावों को व्यक्त होने से दबाने में शरीर और मन का अहित हो जाता है। यह अहित न होने पाये, इसके लिये हम अपने मित्रों की 'रावण के अट्टाहस' जैसी टिप्पणियाँ भी स्वीकार कर चुके हैं। विद्यालय में एक बार ठहाकों की आवाज हमारे प्रधानाध्यापक को हमारी कक्षा तक खींच लायी थी। प्रशिक्षण के समय इन्हीं ठहाकों ने भोजनालय में कुछ महिला प्रशिक्षुओं को सहसा भयभीत कर दिया था, शालीनतावश क्षमा माँगने पर उन्हें विश्वास ही नहीं हो रहा था कि यही लड़का इतनी उन्मुक्तता से ठहाका मार रहा था।

अब, न तो इतना उत्साह रहा है और न ही कोई ठोस कारण दिखता है कि इन ठहाकों पर कोई नियन्त्रण रखा जाये। यदि कोई हास्य व्यंग का दृश्य देखता हूँ तो स्वयं को रोक नहीं पाता हूँ। इस धारावाहिक की विषयवस्तु है ही कुछ ऐसी।

चार मित्र हैं, चारों वैज्ञानिक, उनकी बातें और चुहुलबाजी उसी स्तर पर रहती हैं। उनकी आदतें और यहाँ तक कि उनका भोजन भी सप्ताह के दिनों के अनुसार निश्चित हैं। मुख्य नायक शेल्डन की सनक भरी आदतें उसके मित्रों के लिये कठिनाई उत्पन्न कर देती हैं, पर उनकी मित्रता इतनी गहरी है कि वे सब सह लेते हैं। शेल्डन को न बात छिपाना आता है और न बात बनाना, उसका चीजों को सीधे से कह देना बहुधा सबको हास्यास्पद स्थिति में डाल देता है। उनके घर के सामने पेनी नाम की एक लड़की रहने आती है, वह औसत बुद्धि वाली व्यावहारिक लड़की है और एक होटल में सहायिका का कार्य करती है। पेनी, शेल्डन और उसके मित्रों को एक दूसरे के विश्व अचम्भित और आकर्षित करते हैं।

वैसे तो हिन्दी के हास्य धारावाहिकों में भी आनन्द आता है पर इस धारावाहिक में इतना आनन्द आता है कि ठहाका मारने का मन करता है। पात्रों के अभिनय व एक एक संवाद पर किया श्रम इस धारावाहिक की गुणवत्ता व संबद्ध लोकप्रियता से परिलक्षित है, इसे मिले पुरस्कार भी यही बात सिद्ध करते हैं। अंग्रेजी ऐसी है कि समझ में आती है, तभी हमारे पुत्र भी ठहाका मार रहे थे। यदि कठिनता हो तो इसे उपशीर्षकों के साथ भी देखा जा सकता है।

इस धारावाहिक में निहित हास्य इसे जितना रोचक बनाता है, उससे भी अधिक रोचक है 'बिग बैंग थ्योरी'। उस पर ध्यान नहीं जाता यदि पृथु शेल्डन से प्रभावित हो उस विषय के पीछे न पड़ जाते। इस धारावाहिक को देखने में पृथु के ठहाके उतने ही प्राकृतिक थे जितने गम्भीर इस सिद्धान्त के बारे में उसके प्रश्न।

चलिये, इस बार ठहाकों का आनन्द लीजिये, प्रश्न अगली बार।

28.4.12

उन्होनें साथ निभाया

दस दिन की यात्रा थी, पैतृक घर की। बहुत दिन बाद छुट्टी पर गया था अतः अधीनस्थों को भी संकोच था कि जब तक अति आवश्यक न हो, मेरे व्यक्तिगत समय में व्यवधान न डाला जाये। घर में रहने के अतिरिक्त कोई और कार्य नहीं रखा था अतः समय अधिकता में उपलब्ध था। दस में तीन दिन ट्रेन में बीते। वे तीन दिन भी बचाये जा सकते थे यदि श्रीमतीजी की मँहगी सलाह मान हवाई यात्रा की जाती। डॉ विजय माल्या की एयरलाइन सिकुड़ने के कारण अन्य एयरलाइनें सीना चौड़ा कर पैसा कमा रही थीं। उनको और अधिक पैसा दे फार्च्यून कम्पनियों की दौड़ में और तेज दौड़ाया जा सकता था, उससे देश का ही भला होता, हम भले ही गरीबी रेखा के अधिक निकट पहुँच जाते। पर मेरे लिये रेल के प्रति व्यक्तिगत निष्ठा से अधिक महत्वपूर्ण वह अनुभव था जो अपने परिवार के साथ लम्बी ट्रेन यात्राओं में मुझे मिलता है। साथ ही साथ रेल के डब्बे में साथ चलते देश की विविधता और सांस्कृतिक सम्पन्नता का स्वरूप हर बार साधिकार आकर्षित करता है।

हमारी धरती से जुड़े रहने की इच्छा के आगे श्रीमतीजी की हवाई उड़ानें नतमस्तक हुयीं, ३ दिन की रेलयात्रा का अनुभव जीवन में और जुड़ गया। सबने यात्रा का भरपूर आनन्द उठाया, जी भर कर साथ खेले, फिल्में देखी, बातें की। इसके बाद भी पर्याप्त समय था जो कि रेल यात्रा में उपलब्ध था।

जब रेल यात्रा और घर में समय पर्याप्त हो तो लेखन और ब्लॉगजगत में अधिक गतिशीलता स्वाभाविक ही है। बहुत दिनों से समयाभाव में एकत्र होते गये वीडियो आदि के लिंक भी मुँह बाये खड़े हुये थे। ट्रेन में चार्जिंग की ठीक व्यवस्था थी पर नेटवर्क का व्यवधान था, घर में नेटवर्क की क्षीण उपस्थिति थी पर बिजली की अनिश्चितता थी। पिछली यात्राओं में डाटाकार्ड आदि साथ में थे पर अधिक काम में नहीं आये अतः इस बार मोबाइल फोन की जीपीआरएस सेवाओं पर ही निर्भर रहने का मन बनाया गया।

मैकबुकएयर और आईफोन साथ में थे, आईफोन में उपलब्ध इण्टरनेट को हॉटस्पॉट नामक सुविधा से मैकबुकएयर के लिये भी उपयोग में लाया जा सकता था। आईफोन का भारतीय नेटवर्क पकड़ना, उससे इण्टरनेटीय संचार निचोड़ना और उसे हॉटस्पॉट के माध्यम से मैकबुकएयर में पहुँचाना, यह सब प्रक्रियायें देखना शेष थीं। पिछली यात्राओं में जिस तन्त्र का उपयोग किया था उसके परिणाम उत्साहजनक नहीं रहे थे। दोनों ही यन्त्र पहली बार साथ में लम्बी यात्रा में जा रहे थे।

यह तो निश्चय है कि शहरों के पास नेटवर्क अच्छा रहता है और बड़े शहरों के पास गति भी अच्छी मिलती है। अब इसका पता कैसे चले, इसके लिये आईफोन का गूगल मैप सहायक सिद्ध हुआ। यदि सैटलाइट दृश्य न देख कर केवल मैप ही देखा जाये तो नेटवर्क की क्षीण उपलब्धता में भी आईफोन का गूगल मैप आपकी वर्तमान स्थिति और आसपास के शहरों की भौगोलिक स्थिति दे सकता है। उससे पूरी यात्रा में यह निश्चित होता रहा कि किस क्षेत्र में इन्टरनेट का उपयोग करना है और किस क्षेत्र में अन्य लेखन करना है।

जैसे ही इन्टरनेट उपलब्ध होता, गूगल रीडर में अनपढ़े सूत्र खोलते रहते, जब तक इण्टरनेट पुनः लुप्त न हो जाये। नेटवर्क की अनुपलब्धता के क्षेत्र में उन पर टिप्पणी लिखी जाती थी। जिन ब्लॉगों में टिप्पणी के लिये अलग पेज खुलता है, उन्हें भी पहले से खोल कर ही रखा जाता। एक बार सारी टिप्पणियाँ लिख जायें तब पुनः नेटवर्क की प्रतीक्षा रहती, उन्हें एक एक कर पब्लिश करने के लिये। यदि नेटवर्क में और भी देर रही तो समय लेखन में बिताया और भविष्य की रूपरेखा तय की। ३ दिन की यात्रा में कभी ऐसा लगा नहीं कि ब्लॉगजगत से संबंध टूट गया, अपितु इस विधि से यात्रा के समय न केवल अधिक ब्लॉग पढ़ सका और उन पर टिप्पणी भी करता रहा।

घर में नेटवर्क की लुकाछिपी बनी रही, दिन के कुछ समय तो नेटवर्क अनुत्तरित ही बना रहता, फिर भी ट्रेन की तुलना में उसकी उपलब्धता दुगुनी थी। सौभाग्य से बोर्ड की परीक्षा के समय में रात्रि की ३ घंटे की बिजली आपूर्ति राज्य सरकार ने सुनिश्चित की। इसके अतिरिक्त दिन में भी इधर उधर मिलाकर लगभग ४ घंटे बिजली बनी रहती। इतना समय पर्याप्त था दोनों यन्त्रों की पूरा चार्ज रखने का, उनके दिन भर चलते रहने के लिये। मैकबुकएयर की ६ घंटे की व नेटवर्किंग में निरत आईफोन की १६ घंटे की बैटरी पहली बार अपनी पूरी क्षमता प्रदर्शित कर पायीं। लिखने, पढ़ने, ब्लॉगजगत व अन्य क्रम बिना किसी व्यवधान के बने रहे।

बंगलोर में बिजली और हाईस्पीड इण्टरनेट की सतत उपलब्धता ने कभी यह अवसर ही नहीं दिया था कि अपने आईफोन व मैकबुकएयर की सही क्षमताओं को आँक पाता। वाईफाई में आईक्लॉउड के माध्यम से कब दोनों में समन्वय हो जाता था, पता ही नहीं चलता था। दोनों यन्त्रों और आईक्लॉउड के माध्यम से उनके आन्तरिक सुदृढ़ संबंध की परीक्षा ट्रेन यात्राओं में व ऐसे क्षेत्रों में जाने के बाद ही होनी थी जहाँ बिजली, इण्टरनेट और उसकी गति बाधित हो।

थोड़ा स्वयं को अवश्य ढालना पड़ा पर मैकबुकएयर, आईफोन, उनके आन्तरिक समन्वय, देश के नेटवर्क, उसमें उपस्थित इण्टरनेटीय तत्व, बिजली की उपलब्धता, बैटरी की क्षमता, इन सबने मिलकर वह गति बनाये रखी जिससे यात्रा में भी साहित्य कर्म कभी बाधित नहीं रहा। आधारभूत सुविधाओं के गर्त में भी समय निर्बाध बिताकर आये हैं, बस सबका धन्यवाद ही दे सकते हैं कि उन्होंने साथ निभाया।

25.4.12

डोलू कुनिता

स्थान बंगलोर सिटी रेलवे स्टेशन, प्लेटफार्म 8, समय सायं 7:30 बजे, बंगलोर राजधानी के यात्री स्टेशन आने लगे हैं, यद्यपि ट्रेन छूटने में अभी 50 मिनट का समय है। सड़क यातायात में बहुधा जाम लग जाने के कारण यात्री अपने घर से एक घंटे का अतिरिक्त समय लेकर चलते हैं, ट्रेन छूट जाने से श्रेयस्कर है स्टेशन में एक घंटा प्रतीक्षा करना। सायं होते होते बंगलोर की हवाओं में एक अजब सी शीतलता उमड़ आती है, यात्री प्रतीक्षाकक्ष में न बैठकर पेड़ के नीचे लम्बी बनी सीढियों में बैठकर कॉफी पीते हुये बतियाना पसन्द करते हैं। व्यस्तमना युवा अपने लैपटॉप व मोबाइल के माध्यम से समय के सदुपयोग की व्यग्रता व्यक्त करने लगते हैं। बैटरीचलित गोल्फ की गाड़ियों में सजे अल्पाहार के स्टॉल अपनी जगह पर ही खड़े हो ग्राहकों की प्रतीक्षा और सेवा में निरत हैं, मानो अन्य स्टेशनों की तरह चिल्ला चिल्लाकर ग्राहकों का ध्यान आकर्षित करना कभी उन्होंने सीखा ही नहीं। शान्त परिवेश में बहती शीतल बयार का स्वर स्पष्ट सुनायी पड़ता है।

तभी 8-10 ढोलों का समवेत एक स्वर सुनायी पड़ता है, नियमित वातावरण से अलग एक स्वर सुनायी पड़ता है, यात्रियों का ध्यान थोड़ा सा बटता है पर पुनः वे सब अपने पूर्ववत कार्यों में लग जाते हैं। ढोलों की थाप ढलने की जगह धीरे धीरे बढ़ने लगती है और तेज हो जाती है। यात्रियों की उत्सुकता उनके स्वर की दिशा में बढ़ते कदमों से व्यक्त होने लगती है। प्लेटफार्म पर ही एक घिरे हुये स्थान पर 9 नर्तक ढोल और बड़ी झांझ लिये कलात्मकता और ऊर्जा से नृत्य कर रहे थे, 7 के पास ढोल, एक के पास झांझ और एक के पास बड़ा सा झुनझुना था। झांझ की गति ही ढोल और नृत्य की गति निर्धारित कर रही थी। ढोल नर्तकों के शरीर से किसी अंग की तरह चिपके थे क्योंकि नृत्य में जो उछाल थे, वे ढीले बँधे ढोलों से संभव भी न थे।

इसके पहले कि लोगों को इस उत्सवीय नृत्य का कारण समझ में आता, प्लेटफार्म में नयी नवेली की तरह सजी बंगलोर राजधानी ट्रेन लायी जा रही होती है। जो लोग पहले राजधानी में यात्रा कर चुके थे, उनके लिये राजधानी की नयी ट्रेन को देखना एक सुखद आश्चर्य था, मन का उछाह अब ढोल की थापों से अनुनादित होता सा लग रहा था। राजधानी की पुरानी ट्रेन अपनी क्षमता से अधिक बंगलोरवासियों की सेवा करके जा चुकी थी और उसका स्थान लेने आधुनिकतम ट्रेन आज से अपनी सेवायें देने जा रही थी। यह उत्सवीय थाप उस प्रसन्नता को व्यक्त कर रही थी जो हम सबके हृदय में थी और उस नृत्य में लगी ऊर्जा उस प्रयास का प्रतीक थी जो इस आधुनिकतम ट्रेन को बंगलोर लाने में किये गये।

नृत्य का नाम था डोलू कुनिता, शाब्दिक अर्थ ढोल के साथ उछलना। यह नृत्यशैली उत्तर कर्नाटक के चित्रदुर्गा, शिमोगा और बेल्लारी जिलों की कुरुबा नामक चरवाहा जातियों के द्वारा न केवल अस्तित्व में रखी गयी, वरन सदियों से पल्लवित भी की गयी। इस नृत्य और संगीत की लयात्मकता न केवल शारीरिक व्यायाम, मनोरंजन, धार्मिक अनुष्ठानों और सांस्कृतिक प्रयोजनों से सम्बद्ध है वरन उनके अध्यात्म की पवित्रतम अभिव्यक्ति भी है, जो इस नृत्यशैली के माध्यम से अपने आराध्य की ऊर्जस्वित उपासना के रूप में व्यक्त किया जाता है। आजकल तो इस नृत्य का प्रयोग सामाजिक कुरीतियों से लड़ने के लिये भी किया जा रहा है, संदेश को शब्द, संगीत और भावों में ढालते हुये।

इसकी पौराणिक उत्पत्ति जिस कथा से जुड़ी है, वह भी अत्यन्त रोचक है। एक असुर भगवान शिव को प्रसन्न कर लेता है और भगवान शिव से अपने शरीर में आकर रहने का वर माँग लेता है। शिव उसके शरीर में रहने लगते हैं। वह असुर पूरे हिमालय में उत्पात मचाने लगता है, त्रस्त देवता विष्णु के पास पहुँचते हैं और अनुनय विनय करते हैं। विष्णु असुर का सर काट कर शिव को मुक्त करते हैं, पर शिव कुपित हो जाते हैं। शिव को प्रसन्न करने के लिये असुर के धड़ को ढोल बनाकर विष्णु नृत्य करते हैं। वह प्रथम डोलू कुनिता था, तब से शिव उपासक अपने आराध्य को प्रसन्न करने के लिये इस नृत्य को करते आये हैं। संभवतः ढोल का चपटा और छोटा आकार धड़ का ही प्रतीक है। ढोल की बायीं ओर बकरी और दायीं ओर भेड़ की खाल का प्रयोग दोनों थापों की आवृत्तियों में अन्तर रखने के लिये किया जाता है।

जैसे जैसे ट्रेन के जाने का समय आता है, नृत्य और संगीत द्रुतगतिमय हो जाता है, क्रमशः थोड़ा धीमे, फिर थोड़ा तेज, फिर आनन्द की उन्मुक्त स्थिति में सराबोर, थापों के बीच शान्ति के कुछ पल और फिर वही क्रम। मैं खड़ा दर्शकों को देख रहा था, सबकी दृष्टि एकटक स्थिर और पैरों में एक आमन्त्रित सी थिरकन। ढोलों पर चढ़ते हुये तीन मंजिला पिरामिड बनाकर, गतिमय थापों का बजाना हम सबको रोमांचित कर गया।

नृत्य धीरे धीरे समाप्ति की ओर बढ़ रहा था और राजधानी की नयी ट्रेन अपनी नयी यात्रा प्रारम्भ करने को आतुर थी, इंजन की लम्बी सीटी ढोल की थापों को थमने का संदेश देती है, नृत्य में मगन यात्री दौड़कर अपने अपने कोचों में बैठ जाते हैं। महाकाय ट्रेन प्रसन्नमना अपने गंतव्य दिल्ली को ओर बढ़ जाती है, प्रयास रूपी डोलू कुनिता निष्कर्ष रूपी कुपित शिव को पुनः प्रसन्न कर देते हैं, यात्री सुविधा का एक नया अध्याय बंगलोर मंडल में जुड़ जाता है।


21.4.12

एक लड़के की व्यथा

एक लड़का था, बचपन में देखता था कि सबकी माँ तो घर में ही रहती हैं, घर का काम करती हैं, बच्चों को सम्हालती हैं, पर उसकी माँ इन सब कार्यों के अतिरिक्त एक विद्यालय में पढ़ाने भी जाती है। दोपहर में जब सब बच्चे अपने विद्यालयों से घर आते थे, वे सब कितना कुछ बताते थे अपनी माँओं को, आज यह किया, आज वह किया, किसको अध्यापक ने दण्ड दिया, किसे सराहा गया। वह लड़का चुपचाप अकेले घर आता, सोचता काश उसकी भी माँ को पढ़ाने न जाना पड़ता, उसके पास भी अपनी माँ को बताने के लिये कितना कुछ था, विशेषकर उन दिनों में जब उसे किसी विषय में पूरे अंक मिलते थे, विशेषकर उन दिनों में जब अध्यापक सबके सामने उसकी पीठ ठोंक उसकी तरह बनने का उदाहरण औरों को देते थे।

माँ के जिस समय पर उसका अधिकार था, उसको किसी नौकरी में लगता देखता तो उसे लगता कि उसका विश्व कोई छीने ले रहा है। माँ की नौकरी से एक अजब सी स्पर्धा हो गयी थी, उसे पछाड़ने का विचार हर दिन उसे कचोटता। बचपन के अनुभवों से उत्पन्न दृढ़निश्चय बड़ा ही गाढ़ा होता है जो समय के कठिन प्रवाह में भी अपनी सांध्रता नहीं खोता है। निश्चय मन में घर कर गया कि जब वह नौकरी करने लगेगा तो माँ को नौकरी नहीं करने देगा।

समय आगे बढ़ता है, परिवार के जिस भविष्य के लिये माँ ने नौकरी की, उन्हीं उद्देश्यों के लिये उस लड़के को बाहर पढ़ने जाना पड़ता है, छात्रावास में रहना, छठवीं कक्षा से ही। भाग्य न जाने कौन सी परीक्षा लेने पर तुला हुआ था। कहाँ तो उसे दिन में माँ का आठ-दस घंटे नौकरी पर रहना क्षुब्ध करता था, कहाँ महीनों तक घर न जा पाने की असहनीय स्थिति। पहले भाग्य को जिसके लिये कोसता था, वही स्थिति अब घनीभूत होकर उपहार में मिली। दृढ़निश्चय और गहराया और बालमन यह निश्चय कर बैठा कि वह माँ को नौकरी न कर देने के अतिरिक्त उन्हें अपने साथ रख बचपन के अभाव की पूर्ति भी करेगा।

समय और आगे बढ़ता है, उस लड़के की नौकरी लग जाती है। बचपन से ही समय और भाग्य के साथ मची स्पर्धा में लड़के को पहली बार विजय निकट दीखती है, लगता है कि उन दो दृढ़निश्चयों को पूरा करने का समय आ गया है। माँ की १५ वर्ष की नौकरी तब भी शेष होती है। लड़का अपनी माँ से साधिकार कहता है कि अब आप नौकरी छोड़ दीजिये, साथ में रहिये, अब शेष उत्तरदायित्व उसका। शारीरिक सक्षमता और कर्मनिरत रहने का तर्क माँ से सुन लड़का स्तब्ध रह जाता है, कोई विरोध नहीं कर पाता है, विवशता १५ साल और खिंच जाती है। नौकरी, विवाह और परिवार के भरण पोषण का दायित्व समयचक्र गतिशीलता से घुमाने लगता है, पता ही नहीं चलता कि १५ वर्ष कब निकल गये।

सेवानिवृत्ति का समय, माँ से पुनः साथ चलने का आग्रह, पर छोटे भाई के विवाह आदि के उत्तरदायित्व में फँसी माँ की विवशता, दो वर्ष और निकल जाते हैं। पुनः आग्रह, पर माँ को अपना घर छोड़कर और कहीं रहने की इच्छा ही नहीं रही है, उस घर में स्मृतियों के न जाने कितने सुखद क्षण बसे हुये हैं, उस घर में एक आधी सदी बसी हुयी है। जीवन का उत्तरार्ध उस घर से कहीं दूर न बिताने का मन बना चुकी है उस लड़के की माँ।

उस लड़के की व्यग्रता उफान पर आने लगती है, एक पीढ़ी का चक्र पूरा होने को है। जिस उम्र में उसका दृढ़निश्चय हृदय में स्थापित हुआ था, उस उम्र के उसके अपने बच्चे हैं। स्वयं को दोनों के स्थान पर रख वह अपने बचपन का चीत्कार भलीभाँति समझ सकता है, पर वह अब भी क्यों वंचितमना है, इसका उत्तर उसके पास नहीं है। जीवन भागा जा रहा है, ईश्वर निष्ठुर खड़ा न जाने कौन से चक्रव्यूह रचने में व्यस्त है अब तक। ईश्वर संभवतः इस हठ पर अड़ा है कि उस लड़के ने अधिक कैसे माँग लिया, कैसे इतना बड़ा दृढ़संकल्प इतनी छोटी अवस्था में ले लिया। कहाँ तो सागर की अथाह जलराशि में उतराने का स्वप्न था, और कहाँ एक मरुथल में पानी की बूँद बूँद के लिये तरस रहा है उस लड़के का अस्तित्व।

वर्ष में एक माह के लिये माँ पिता उसके घर आते हैं, साथ रहने के लिये। उस लड़के को भी वर्ष में दस दिन का समय मिल पाता है, जब वह सारा काम छोड़ अपने पैतृक घर में अपने माँ पिता के साथ रहने चला जाता है। लड़का और अधिक कर भी क्या सकता है, ईश्वर यदि एक बालमन के दृढ़निश्चय के यही निष्कर्ष देने पर तुला हुआ है तो इसे उस लड़के की व्यथा ही कही जायेगी।

18.4.12

नायक या निर्णायक

नया मार्ग प्रस्तुत करना या निहित दोष बतलाना है,
कर्म-पुञ्ज से पथ प्रशस्त या बुद्धि-विलास सिखाना है,
नूतनता में उद्बोधित या वही पुराना चिंतन हो,
निश्चय कर लो तुम, अमिय मिले या सुरा-कलश का मंथन हो ।।१।।

बढ़कर सूर्य-प्रकाश पकड़ना या निशीथ दोहराना है,
इंगित कर दिशा दिखाना या चुभते आक्षेप लगाना है,
नये राग जीवन भर दें या पूर्व सुरों का वन्दन हो,
हो सुख नवीन, अभिव्यक्ति मिले या वही दुखों का क्रन्दन हो ।।२।।

नव-भविष्य रचते जाना या भूत-महत्ता गाना है,
दर्शन बन राह बताना या फिर तर्कों में जल जाना है,
पा तुम्हे प्रेरणा खिल जाती या पग पग पर भयदायक हो,
यह तुम पर निर्भर करता है, तुम नायक या निर्णायक हो ।।३।।

14.4.12

विधि की व्यवस्था

नास्तिकों का एक बड़ा तर्क है, यदि ईश्वर है तो यह अन्याय और अव्यवस्था क्यों? यदि वह ईश है और दयालु है तो किसी को कोई दुख होना ही नहीं चाहिये। तर्क श्रंखला बढ़ती जाती है और अन्ततः जगत में व्याप्त समस्त दोषों और दुखों के लिये ईश्वर को उत्तरदायी मान लिया जाता है, दोषी मानकर अपराधी घोषित कर दिया जाता है, जीवन के प्रमुखतम तत्वों से निष्कासित कर दिया जाता है। आस्तिकों को सबको सुख न दे पाने वाले का अनुसरण करने के कारण हीन और मूर्ख मान लिया जाता है, अधिक उछलने के लिये प्रतिबंधित कर दिया जाता है।

अव्यवस्था और तज्जनित अन्याय तो फिर भी बना रहता है। अगला दोषी कौन, संस्कृति और उसके संस्कार। व्याप्त दुखों ने फिर दोष सिद्ध किया, संस्कृति और उसके उपासक भी निष्कासित। अगला दोषी कौन, सरकार और उसकी व्यवस्था, दुख हैं तो वह भी अकर्मण्य और अक्षम। व्यवस्था के हर स्तम्भ को ढहाते हैं और बढ़ते जाते हैं, उन्हीं तर्कों से, और अन्ततः पहुँच जाते हैं पूर्ण अव्यवस्था की स्थिति में। कोई व्यवस्था नहीं, सबके अपने अपने विश्व, कोई नियम नहीं, सबके स्वार्थों से संचालित और प्रभावित जीवनक्रम।

जब तर्क सुख और कल्याण के अपेक्षित ध्येय तथा अव्यवस्था की नकारात्मकता पर आधारित हों और स्वयं ही पूर्ण अव्यवस्था की ओर अग्रसर हों तो ऐसे तर्कों को भस्मासुर ही कहा जा सकता है, जिस पर हाथ रखे वही भस्म हो जाये। ऐसे तर्कों से बस यही आग्रह है कि अपने सर पर हाथ रख कर अपना ही विनाश कर लें।

ऐसे भस्मासुरी तर्क रहें न रहें, ईश्वर का अस्तित्व स्थापित हो पाये या न हो पाये, पर पूरे क्रम में एक बात उभर कर सामने आती है और वह है मनुष्य की स्वतन्त्रता। यह मानते हुये कि प्रकृति का सर्वाधिक विकसित मस्तिष्क मनुष्य के पास है, तो जो भी व्यवस्था और अव्यवस्था इस संसार में व्याप्त है, उसके लिये मनुष्य ही उत्तरदायी है।

ऐसा नहीं है कि मनुष्य अव्यवस्थित रहना चाहता है, यदि ऐसा होता तो परिवार, समाज, देश आदि जैसी संस्थायें अस्तित्व में नहीं आतीं। उत्साह इतना अधिक रहा कि जीवन के जिन पक्षों को बाँधने का प्रयास नहीं होना चाहिये था, वह भी होने लगा। चिन्तन और अपना अच्छा बुरा स्वयं समझने का प्राकृतिक अधिकार व्यक्ति के पास होता था, उसे भी बाँधा जाने लगा। अतिव्यवस्था का दंश तो फिर भी सहा जा सकता था पर दूसरों की व्यवस्थाओं में अपनी व्यवस्था का अधिरोपण दुखों की बाढ़ ले आया। युद्धों और सामाजिक समस्याओं का इतिहास अतिव्यवस्था और व्यवस्था अधिरोपण के शब्दों को बार बार अनुनादित करता रहा है।

व्याप्त अव्यवस्था और मनुष्य को मिली स्वतन्त्रता के बीच एक सहज संबंध है, पशुओं को आप नियत व्यवस्था तोड़ते कभी नहीं देखेंगे, एक सधे क्रम में बीतता है उनका जीवन। जब अव्यवस्था हमारे नियन्त्रणमना स्वभाव की उपज है तो उसका दोष ईश्वर को क्यों देना? हमारे तर्क भस्मासुरी न होकर विश्वकर्मा जैसे सृजनात्मक क्यों न हों? अपने दोषों को ईश्वर पर क्यों मढ़ना? यदि हमारा जीवन भी पशुओं जैसा अति नियन्त्रित सा होता तब भी हम दोष ईश्वर को देते, और जब हमें स्वतन्त्रता मिली तो उससे उत्पन्न अव्यवस्था का दोष भी हम ईश्वर पर मढ़ बैठे।

तार्किक दृष्टि से यदि ईश्वर को स्वीकार करते हैं तो उसके द्वारा निर्मित मनुष्य को और उसे प्रदत्त स्वतन्त्रता को भी स्वीकार करना होगा। उस स्थिति में प्रकृति की वृहद व्यवस्था और उसमें उपस्थित मानवकृत अव्यवस्थाओं के समुच्चय को भी स्वीकार करना होगा। धीरे धीरे अव्यवस्थाओं और उनके प्रभावों को सीमित कर के रखने का प्रयास हम सब कर सकते हैं, उन्हें समूल नष्ट करना एक स्वप्न ही होगा।

जिस तर्क श्रंखला का आधार व्यवस्था हो उसके निष्कर्ष भस्मासुरी नहीं हो सकते हैं। व्यवस्था का आधार हो तो अव्यवस्था उपस्थित भले ही रहे पर वह अनियन्त्रित बढ़ नहीं सकती।

ईश्वर बना रहे, मनुष्य बना रहे, बनी रहे मनुष्य की स्वतन्त्रता, बना रहे प्रकृति का व्यवस्थित सृष्टिक्रम और बनी रहे उसमें उपस्थित मानवकृत अव्यवस्था, बने रहें हमारे प्रयास उस अव्यवस्था को सीमित रखने के और बनी रहे विश्व की गति, बस भस्मासुरी तर्कों और उसके उपासकों के हृदय को तनिक शान्ति मिले, यही आस्तिकीय प्रार्थना ईश्वर से है।

11.4.12

कार्यरत इंजन की आवाज

इंजन शक्ति का प्रतीक है, इंजन विकास की अभिव्यक्ति का प्रतीक है, इंजन गतिमयता का स्रोत है, इंजन विज्ञान के दंभ से ओतप्रोत है। इंजन को जब भी देखता हूँ तो अभिभूत हो जाता हूँ कि किस तरह पदार्थों में निहित ऊर्जा का संदोहन किया जाता है और किस प्रकार उसे गति में बदला जाता है। अभियान्त्रिकी का विद्यार्थी होने के कारण इंजनों से एक विशेष संबंध रहा है, रेलवे में आकर इंजनों के बारे में जानने के अवसर अनवरत मिलता रहा है और यह जिज्ञासा विधिवत पल्लवित होती रही है। जब कभी भी निरीक्षणार्थ कहीं जाना होता है, इंजन में बैठने का अवसर छोड़ता नहीं हूँ।

रेलवे में इंजन के प्रयोग के आयाम विस्तृत हैं। दो मानक हैं, शक्ति और गति, इन दोनों का गुणा क्षमता के रूप में जाना जाता है। शक्ति और गति के विभिन्न अनुपातों में अनेकों इंजनों का प्रारूप रचा जाता है। यात्री गाड़ियों में गति अधिक और मालगाड़ियों में शक्ति अधिक आवश्यक है। पहले ऊर्जा को स्रोत कोयला होता था और हम केवल भाप इंजन ही देखते थे, अब डीजल व बिजली के इंजन ही रेलवे के कार्यसंपादक हैं।

परीक्षा के समय में इस विषय पर कोई व्याख्यान देकर परीक्षार्थियों को भ्रमित करना मेरा उद्देश्य नहीं है और न ही इस विषय में मेरी कोई सिद्धहस्तता ही है। जितनी बार भी इंजन में चढ़ा हूँ, उसके व्यवहारिक पक्ष के बारे में कुछ न कुछ जाना ही है। सिद्धान्त और व्यवहार के बीच एक कितना बड़ा क्षेत्र है जो अभी शेष है जानने के लिये। हर यात्रा एक अनुभव है जो एक पुल का कार्य करती है, सिद्धान्त और व्यवहार के बीच। आप सोचिये कि इस बारे में रेल चालकों से अच्छा कौन बता सकता है, उनके पास एक अथाह अनुभव रहता है, कई हजार घंटों का, कई लाख किलोमीटर का, इंजन की आवाज सुनकर एक डॉक्टर की तरह उसकी सेहत जान जाते हैं रेलवे के चालक।

इंजन की आवाज पर हर बार बड़े ध्यान से सुनता हूँ, डीजल इंजन की आवाज थोड़ी अधिक होती है क्योंकि उसी इंजन में डीजल से विद्युत बनाने का संयन्त्र लगा होता है जब कि बिजली के इंजन को तारों के माध्यम से बनी बनायी बिजली मिलती रहती है। आवाज के एक सामान्य स्तर के ऊपर नीचे जाते ही इंजन के व्यवहार में अन्तर समझ में आने लगता है। खड़े इंजन की आवाज, ट्रेन प्रारम्भ करते समय की आवाज, अधिक भार खींचने की आवाज, अधिक गति में चलने की आवाज, ट्रेन रुकने के समय की आवाज, हर समय एक विशेष आवाज निकालता है इंजन।

ट्रेन चलने की परम्परागत आवाज से आपका परिचय कुछ छुक छुक या कुछ घड घड जैसा होगा। पहले के समय में पटरियाँ हर १३ मीटर पर जुड़ी रहती थी, घड घड की आवाज उसी से आती थी। अभियन्ताओं ने सुरक्षा को उन्नत बनाने के लिये पटरियों को स्टेशनों के बीच सतत जोड़कर उस आवाज का आनन्द हमसे छीन लिया। चलती ट्रेन में अब इंजन की आवाज स्पष्टता और प्रमुखता से सुनायी पड़ती है, कभी कभार आकस्मिक ब्रेक लगाने पर एक लम्बी सी चीईंईं की आवाज सुनायी पड़ती है, जो पहिये और पटरियों के बीच के घर्षण से उत्पन्न होती है।

यदि इंजन की आवाज न्यूनतम हो तो मान लीजिये कि इंजन अपनी नियत शक्ति और गति से चलने में व्यस्त है, उस स्थिति में पीछे चलने वाले डब्बों की आवाज अधिक होती है पर सब थक हार कर इंजन के पीछे चुपचाप चलते रहते हैं। यदि इंजन की आवाज सामान्य से बहुत अधिक हो तो समझ लीजिये कि इंजन अपनी क्षमता से बहुत अधिक या बहुत कम भार वहन कर रहा है। ट्रेन प्रारम्भ करते समय और चढ़ाई पर चढ़ते समय भी इंजन अधिक आवाज करता है। यदि किसी स्टेशन पर आँख बंद कर के भी जाती हुयी ट्रेन की आवाज सुनी जाय तो उपरिलिखित तथ्यों के आधार पर उस ट्रेन के बारे में सब कुछ बताया जा सकता है।

यदि यह सिद्धान्त इंजन तक ही सीमित होता तो संभवतः उतनी उत्सुकता व रोचकता न जगाता। मानव शरीर और मन भी इंजन की तरह ही व्यवहार करते हैं। अपने जीवन को ही देख लीजिये, जब भी जीवन अधिक कोलाहल के बिना चलता रहता है तो मान लीजिये कि जीवन अपनी शारीरिक और मानसिक सामर्थ्य के अनुसार चल रहा है। जब करने के लिये कुछ नहीं रहता है या बहुत अधिक रहता है तो दैनिक जीवन में कोलाहल बढ़ने लगता है। यही प्रयोग अपने कर्मचारियों से भी कर के देखा है, अधिक शोर मचाने वाले कर्मचारी के पास या तो सच में अधिक कार्य रहता है या कुछ भी कार्य नहीं रहता है, या तो उसका कार्य बढ़ा देने से या कुछ कम करने से वह आवाज न्यूनतम स्तर पर पहुँच जाती है। एक कर्मचारी जो अपने कार्य को अपनी नियत शक्ति, गति और क्षमता से करता है, उसकी आवाज सदा ही न्यूनतम रहती है, वह चुपचाप अपने कार्य में लगा रहता है।

एक कार्यरत इंजन से बस इतना ही सीख कर यदि जीवन में उतार लिया जाये तो सारा अस्तित्व गतिमय और ऊर्जस्वित हो जायेगा। जब भी आन्तरिक कोलाहल अधिक हो तो मान लीजिये कि आत्मचिंतन का समय आ गया है, या तो ऊर्जा अनावश्यक क्षय हो रही है या कम पड़ रही है। अपने क्रियाकलाप या तो कम कर लीजिये और क्षमता बढ़ाईये, या कुछ ऐसे कार्यों को करने में लग जाईये जो आपकी क्षमता के अनुरूप हों। मन का कोलाहल कार्यरत इंजन की आवाज जैसा ही है।

रेल चालक यह तथ्य भलीभाँति जानते हैं कि यदि इंजन अधिक आवाज करता रहा तो, या तो वह आगे जाकर ठप्प हो जायेगा या अपनी क्षमता व्यर्थ कर देगा।

आप भी तो अपने जीवन के चालक हैं।

7.4.12

नकल का सिद्धांत

नकल एक सार्वभौमिक परिकल्पना है। प्रकृति के हर अंग में कूट कूट कर भरी है यह प्रवृत्ति। सारी संततियाँ आकार प्रकार में अपने पूर्वजों की शतप्रतिशत नकल ही होती हैं। नित नयी मौलिकता कहाँ से लाये प्रकृति, थोड़ा बहुत बदलाव कर कम से कम कामचलाऊ अन्तर तो हो जाता है, लोग पहचान में आ जाते हैं। नकल का गुण तो हमारे गुणसूत्रों में है, वही पीढ़ी दर पीढ़ी हमारी नकल तैयार करते रहते हैं। एक पेड़ की करोड़ो पत्तियाँ, सबका आकार प्रकार एक जैसा, इतने बड़े स्तर में प्रकृति ने व्यवस्था कर रखी है नकल की।

ब्रह्मा को छोड़ दिया जाये तो सबको ज्ञान नकल के माध्यम से ही देने का विधान रखा गया है। औरों को देखिये और सीखिये, अधिक देखिये और अधिक सीखिये। सारी की सारी ज्ञानेन्द्रियाँ मानो नकल में पारंगत होने के लिये ही बनायी गयी हों। यदि नकल करना बन्द कर दिया जाये तो बच्चे का विकास ही बन्द हो जायेगा। जिज्ञासा हमें और जानने को प्रेरित अवश्य करती है पर पुनः किसी और का लिखा पढ़ने के लिये। पुरानी सीख को नये ढंग से प्रस्तुत कर लेने को कोई सृजन मान बैठें तो हमें प्रसन्न हो लेना चाहिये, अन्यथा वह नकल से अधिक कुछ भी तो नहीं।

ऐसा नहीं है कि इस विश्व में कुछ नया नहीं हो रहा है, नित हो रहा है, नये आविष्कार, नयी खोजें, पुरानी चीजों को करने के नये ढंग, उन्नत तकनीक, विश्लेषणात्मक शोध और न जाने कितना कुछ। एक शोध का पूर्ण उपभोग, सम्मिलित उपभोग, बाजार आधारित अर्थव्यवस्था से प्रेरित। उस शोध से जिसको आर्थिक लाभ हुआ, वह किसी दूसरे के शोध से उत्पादित वस्तु का प्रयोग कर रहा है। अन्ततः तो सब प्रकृति का ही उपभोग कर रहे हैं, यत् किञ्चित जगत्यांजगत। वैश्विक अर्थव्यवस्था, साम्यवाद हो या असाम्यवाद हो, सदा ही नकल पर आधारित रही है। दूसरे के शोध का लाभ विश्व ने सम्मिलित उठाया है। तनिक सृजन शेष उपभोग, एक सृष्टा शेष भोक्ता।

बड़ी बड़ी मोबाइल कम्पनियों के बीच चल रहे पैटेन्ट संबंधी मुकदमे एक दूसरे पर लगाये गये नकल के आक्षेप ही तो हैं। एक का ज्ञान दूसरे ने बिना उसका मोल चुकाये उपयोग कर लिया, उसका लाभ उठा लिया, बस बन गया मुकदमा। उपभोक्ता बने रहने में भलाई है, आपको उपयोग की छूट है, आपने उसका मोल जो दिया है। आप लाभ उठाने लगें नकल का, तो आप पर भी ठोंक दिया जायेगा मुकदमा। बौद्धिक सम्पदा के नकल में मोल देकर ही लाभ उठाया जा सकता है। यह एक सर्वथा अलग विषय है कि बौद्धिक सम्पदा का अपहरण और लाभ पदासीन और सत्तासीन जन बहुधा उठाते रहते हैं।

कहीं विकास होता है तो लोग उसे देखने लिये विदेश यात्रायें कर डालते हैं, देख कर और सीखकर आते हैं, अपने यहाँ पर उसे लागू भी करते हैं। कोई नया प्रयोग एक अनुकरणीय उदाहरण बन जाता है, सब उसकी नकल करना प्रारम्भ कर देते हैं। सार्वजनिक हित में इसे बुरा नहीं माना जाता है, विकास के लिये इसे बुरा नहीं माना जाता है। दूसरों की अच्छाईयों को समाज के व्यापक हित में अपनाना एक गर्व का विषय समझा जाता है।

विद्यालय या आईआईटी में जो भी गृहकार्य दिया जाता था, वह बहुत कुछ कहीं न कहीं से देखकर ही पूरा होता था, संभवतः उसका प्रायोजन ही वही रहता होगा, नकल से ही सही पर उसे समझना ही सबका सम्मिलित ध्येय रहता होगा। नकल करके भी जो समझना नहीं चाहते हैं, ज्ञान का न होना उनका दुखद पक्ष होता है। जो नकल करके समझ भी लेते हैं, वहाँ ध्येय मार्ग को पवित्र कर देता है।

जगत में फैले नकल संबंधी उदाहरणों पर विहंगम दृष्टि डालने में मेरा उद्देश्य अपने युवा मित्र को कोई सैद्धांतिक समर्थन देना नहीं है, वरन यह समझने का प्रयास है कि नकल किस बिन्दु तक पहुँचते पहुँचते पवित्र से अपवित्र हो जाती है। यद्यपि मेरे युवा मित्र अपने व्यक्तिगत पक्ष को प्रधान मानकर नकल को न्यायसंगत ठहरा रहे हैं, पर मेरे लिये तो नकल उतनी ही प्राकृतिक है जितना कि हमारा अस्तित्व। नकल से होने वाले हानि लाभ को इन उदाहरणों के परिप्रेक्ष्य में समझना आवश्यक हो जाता है।

व्यक्तिगत विकास, परम्परा निर्वाह, सार्वजनिक हित, सामाजिक विकास, बौद्धिक उत्थान आदि में नकल न केवल बड़ी गुणकारी मानी जाती है वरन अत्यन्त आवश्यक भी है। व्यक्तिगत हित, आर्थिक लाभ, प्रतियोगिता आदि में नकल का नाम लेते ही आदर्शवादियों की भृकुटियाँ तन जाती हैं, ऐसा लगता है कि कोई पापकर्म किया जा रहा हो। वैसे भी अब वो दिन रहे नहीं जब बोर्ड की परीक्षा में अच्छे अंक लाने से कोई ठीक ठाक नौकरी मिल जाती थी, आजकल तो चपरासी की नौकरी के लिये भी स्नातकोत्तर योग्य ज्ञान की प्रतियोगी परीक्षायें देनी पड़ती हैं।

हमारे युवामित्र परीक्षा देकर आ गये हैं, नकल की पुर्चियाँ काम आयी हैं, उत्तीर्ण होने की पूरी संभावना है। इस तथाकथित दुष्कर्म का प्रतियोगिता में या कोई आर्थिक लाभ तो वैसे भी नहीं मिलना था उनके लिये, दो व्यक्तिगत लाभ अवश्य हुये उनको। पहला, उन्हें अब खेती में नहीं खटना होगा। दूसरा, बारहवीं पास होने के कारण पढ़े लिखे का ठप्पा लग जायेगा और पिताजी के प्रयासों से किसी सुन्दर कन्या के साथ गृहस्थी बस जायेगी। इन्जीनियर या डॉक्टर के स्वप्न तो पहले भी नहीं देखे थे, व्यक्तिगत श्रम आधारित छोटा मोटा व्यवसाय ही उनके जीवन का आर्थिक आधार बनेगा।

हमारे युवा मित्र की कहानी तो सुखान्त की ओर बढ़ चली है, नकल की घटना उनके लिये एक विशेष अनुभव रही है। जीवन में कभी चिन्तनशीलता जागी तो वह भी नकल, परीक्षा और शिक्षा के ऊपर अनुभवजन्य दार्शनिक आलेख अवश्य लिखेंगे।

4.4.12

नकल क्षेत्रे

परीक्षा कक्ष से अधिक आंदोलित क्षेत्र मिलना बहुत कठिन है, मन और मस्तिष्क पूर्णतया आंदोलित रहते हैं उन तीन घंटों में। जितनी ऊष्मा भर जाती होगी, जिस व्यग्रता का साक्षी बनता होगा वह कक्ष, उतनी आतुरता संभवतः उस कक्ष में कभी न जगायी गयी होगी। परीक्षार्थियों पर एक विहंगम दृष्टि डालिये तो अति अव्यवस्थित से लेकर अध्यात्म अवस्थित, सभी प्रकार की भावभंगिमायें दिख जायेंगी। पूरे शरीर में आशीर्वादात्मक चिन्ह लिपटे हुये, टीका, अँगूठी, माला, भभूत। बहुतों के बाल बिखरे हुये, कई अपनी लकी शर्ट या पतलून चढ़ाये, कई नहा धो कर अति व्यवस्थित, सब के सब पिछले वर्ष की पढ़ाई को अंकों में बदलने को तैयार।

ऐसे गरमाये वातावरण में कुछ परमहंसीय मुखमंडल दिख जाते हैं, क्योंकि नकल की पुर्ची छिपी है अतः एक आत्मसंतोष सा झलकता है उनके चेहरे से, पर कहीं अति आत्मविश्वास से किसी को संशय न हो जाये अतः सहजता का आवरण ढकने का प्रयास करते हैं नकलपुर्चीधारी। जिस जिस अंग में पुर्ची की छुअन होती है, वहाँ एक शीतलता सी व्याप्त हो जाती है।

नकल संबधी पूरी तैयारी धरी की धरी रह जाती है यदि प्रश्नपत्र परम्परा से हटकर पूछ लिया जाता है। एक बार पूरा प्रश्नपत्र पढ़ने के बाद समझ आ जाता है कि कितना प्रतिशत पुर्चियों में छिपा हुआ है और वह कितनी देर में कर लिया जायेगा। परीक्षा में भी परीक्षा की घड़ी तब आती है जब नकल की पुर्ची अपने स्थान से निकाल कर उत्तरपुस्तिका के पन्नों के बीच रखनी होती है। निरीक्षक के टहलने का प्रारूप, उसके थोड़ा थककर बाहर जाने का अवसर या उसका आपकी ओर पीठ करने का समय, बस वही अन्तराल पर्याप्त होता है। यदि आपको सबसे पीछे की सीट मिल जाये तो नकल पर नियन्त्रण पूर्ण रहता है।

नियम कड़े होते हैं और बहुत स्थानों में पहले एक घंटे शंकाओं के निवारण हेतु बाहर जाने को नहीं मिलता है। बाथरूम ही सबसे सुरक्षित स्थान रहता है, उपयोग कर ली गयी पुर्चियों को फेंकने का और बहुत अन्दर तक छिपी पुर्चियों को सुविधाजनक स्थान में छिपाने का। वहाँ से वापस आकर उनके चेहरे का संतोष मापा नहीं जा सकता है।

जिनका स्थानीय परिवेश में अधिक अधिकार रहता है, वह नकल के पुर्चियों के कठिन प्रबंधन जैसे रास्ते को नहीं अपनाते हैं। इसमें बहुत श्रम है और निष्कर्ष भगवान भरोसे। उनका प्रथम प्रयास रहता है किसी प्रकार प्रश्नपत्र खिड़की के बाहर फेंक देना, बाहर उन पर जान छिड़कने वाला कोई मित्र उसे किसी तरह पूर्वनिश्चित हल करने वाले के पास ले जाता है, उसे घंटे भर में हल करवाता है और वापस आकर खिड़की से पुनः अन्दर पहुँचाता है। अब परीक्षार्थी का कार्य शेष समय में उसे उतार देने का रहता है। इस विधि में वाह्य परिस्थितियों पर बहुत कुछ निर्भर करता है और निष्कर्ष शेयर बाजारों की तरह बहुत ऊपर या बहुत नीचे आते हैं।

नकल के पूर्ण स्थानीय तरीके भी अपनाये जाते हैं यदि आपको विश्वास हो कि उस कक्ष में कोई इतना योग्य है जो नैया पार करा देगा। आगे पीछे वालों का सहयोग और आवश्यकता पड़ने पर लिखी जा चुकी उत्तरपुस्तिकायें भी याचकों का उद्धार करती हैं। इन छोटे संकर तरीकों से कुछ प्रतिशत ही अंक बढ़ाये जा सकते हैं, उत्तीर्ण होने जैसे महत कार्य के लिये प्रथम दो वर्णित विधियों पर पूरा विश्वास जताते रहे हैं भारत के परीक्षार्थी।

अंग्रेजों के आतंक से तो हमारे वीर क्रांतिकारियों ने हमें मुक्त कर दिया, अंग्रेजी का आतंक हमारे ऊपर अब तक व्याप्त है। जितनी नकलचर्या अंग्रेजी के प्रश्नपत्र में होती है उतनी शेष सभी विषयों में मिलाकर भी नहीं होती होगी, पास होने में अंग्रेजी एक महतबाधा रहती है। इसका प्रमुख कारण है कुछ भी समझ न आना। नकल के लिये कम से कम प्रश्न और उत्तर के बीच संबध स्थापित होना चाहिये। एक परीक्षार्थी महोदय जिन्हें अंग्रेजी का हल प्रश्नपत्र खिड़की से भेजा गया था, वे उसे उतार तक न पाये और अन्त में उत्तरपुस्तिका में ही लगा कर चले आये। एक और घटना में एक परीक्षार्थी की वह पुर्ची निरीक्षक के हाथ लग गयी जिसमें उन्होंने लिख रखा था कि किस विषय की नकलपुर्ची शरीर में कहाँ छिपा रखी है।

क्या अब भी पूछना शेष रहा कि नकल क्षेत्रे युयुत्सवः समवेता मम् बान्धवाः किम् अकुर्वत?