Showing posts with label निर्णायक. Show all posts
Showing posts with label निर्णायक. Show all posts

18.4.12

नायक या निर्णायक

नया मार्ग प्रस्तुत करना या निहित दोष बतलाना है,
कर्म-पुञ्ज से पथ प्रशस्त या बुद्धि-विलास सिखाना है,
नूतनता में उद्बोधित या वही पुराना चिंतन हो,
निश्चय कर लो तुम, अमिय मिले या सुरा-कलश का मंथन हो ।।१।।

बढ़कर सूर्य-प्रकाश पकड़ना या निशीथ दोहराना है,
इंगित कर दिशा दिखाना या चुभते आक्षेप लगाना है,
नये राग जीवन भर दें या पूर्व सुरों का वन्दन हो,
हो सुख नवीन, अभिव्यक्ति मिले या वही दुखों का क्रन्दन हो ।।२।।

नव-भविष्य रचते जाना या भूत-महत्ता गाना है,
दर्शन बन राह बताना या फिर तर्कों में जल जाना है,
पा तुम्हे प्रेरणा खिल जाती या पग पग पर भयदायक हो,
यह तुम पर निर्भर करता है, तुम नायक या निर्णायक हो ।।३।।