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11.8.26

मैं भोग रहा या स्वयं भुक्त


कर्मबन्ध, संस्कार,

चित्तवृत्ति, क्लेश पार,

उस ओर अकेले बैठ गया,

मेरा परिचय ही निर्विकार।


विषय रमण, झंकृत मन,

सुख साधन पर सतत मनन,

किस आगत के असमंजस में,

पथ सृजन शून्य, जग निर्जन वन।


मति विरुद्ध, भाव क्रुद्ध,

बंध जटिल, कंठ रुद्ध,

आलम्बन के एकाग्र क्षितिज, 

द्वन्द्व आलोड़न से विगत बुद्ध।


शब्द पृथक, पृथक ज्ञान,

अर्थ पृथक, अनुभव प्रधान,

सब सम्मिलित होकर हुये एक,

संयम ने साधे समाधान।


विलग पूर्ण, पूर्ण विलय,

बाधित क्रम, अवगुंठित लय,

जगती प्रवाह, पर स्थिर मन,

स्थिर गति, स्थिर हुआ समय।


न मुक्त रहा, न हुआ युक्त,

किस आकर्षण जीवन प्रयुक्त,

कारक, कर्ता, क्रम डोल रहे,

मैं भोग रहा या स्वयं भुक्त। 

15.5.21

मैं उत्कट आशावादी हूँ

मैं उत्कट आशावादी हूँ।

मत छोड़ समस्या बीच बढ़ो,

रुक जाओ तो, थोड़ा ठहरो,

माना प्रयत्न करने पर भी,

श्रम, साधन का निष्कर्ष नहीं,

यदि है कठोर तम, व्याप्त निशा,

कुछ नहीं सूझती पंथ दिशा ।

बन कर अंगद-पद डटा हुआ, मैं सृष्टि-कर्म प्रतिभागी हूँ।

मैं उत्कट आशावादी हूँ।।१।।

 

सूखे राखों के ढेरों से,

पा ऊष्मा और अँधेरों से,

पाता व्यापकता, बढ़ जाता,

दिनकर सम्मुख भी जलने का,

आवेश नहीं छोड़ा मन ने,

आँखों में ध्येय लगा रमने,

है कर्म-आग, फिर कहाँ त्याग, मैं निष्कर्षों का आदी हूँ।

मैं उत्कट आशावादी हूँ।।२।।

 

पत्ते टूटेंगे पेड़ों से,

निश्चय द्रुतवेग थपेड़ों से,

आहत भी आज किनारे हैं,

सब कालचक्र के मारे हैं,

क्यों चित्र यही मन में आता,

जीवन गति को ठहरा जाता,

व्यवधानों में जलता रहता, मैं दिशा-दीप का वादी हूँ।

मैं उत्कट आशावादी हूँ।।३।।

 

कर लो हिसाब अब, इस जग में,

क्या खोया, क्या पाया हमने,

जीवन पाया, संसाधन सब,

जल, खिली धूप, विस्तार वृहद,

यदि खोयी, कुछ मन की तृष्णा,

श्रम, समय और कोई स्वप्न घना,

हर दिन लाये जीवन-अंकुर, मैं नित प्रभात-अनुरागी हूँ।

मैं उत्कट आशावादी हूँ।।४।।

 

भ्रम धीरे-धीरे खा लेगा,

थकता है मन, बहका देगा,

मन-आच्छादित, नैराश्य तजो,

उठ जोर, जरा हुंकार भरो,

धरती, अम्बर के मध्य व्यक्त,

कर गये देव तुझको प्रदत्त,

मैं लगा सदा अपनी धुन में, प्रेरित छन्दों का रागी हूँ।

मैं उत्कट आशावादी हूँ।।५।।

 

जब किया जलधि-मंथन-प्रयत्न,

तब निकले गर्भित सभी रत्न,

हाथों में सुख की खान लिये,

अन्तरतम का सम्मान लिये,

स्वेदयुक्त सुत के आने की,

विजय-माल फिर पहनाने की,

आस मही को, क्यों न हो, मैं शाश्वत कर्म-प्रमादी हूँ।

मैं उत्कट आशावादी हूँ।।६।।

 

जीवन के इस चिन्तन-पथ को,

मत ठहराओ, गति रहने दो,

चलने तो दो, संवाद सतत,

यदि निकले भी निष्कर्ष पृथक,

नित चरैवेति जो कहता है,

अपने ही हृद में रहता है,

वह दीनबन्धु, संग चला झूमता, मैं बहका बैरागी हूँ।

मैं उत्कट आशावादी हूँ।।७।।


(बहुत पहले लिखी थी, मन हो आया पुनः कहने का, मन के विश्वास को पुनः स्थापित करने का)


11.1.15

कुछ पल अपने

दिन तो बीता आपाधापी,
यथारूप हर चिंता व्यापी,
कार्य कुपोषित, व्यस्त अवस्था,
अधिकारों से त्रस्त व्यवस्था,
होड़, दौड़ का ओढ़ चढ़ाये,
अवसादों का कोढ़ छिपाये,
कौन मौन अन्तर्मन साधे,
मन के तथ्यों से घबराते,
लगे सभी जब जीवन जपने,
कुछ पल अपने।१।

हमने तो सोचा था जीवन,
होगा अपना करने का मन,
कहाँ पता था, हर पग पग में,
लौहबन्ध और आतुर दृग में,
अँसुअन का अंबार दृष्टिगत,
अनुमोदित अधिकार हस्तगत,
नींव आपके शतकर्मों की,
स्वेद-सुपोषित सत मर्मों की,
जब उत्साह लगा हो छकने,
कुछ पल अपने।२।

जहाँ विकल्पों की सुविधा हो,
जहाँ श्रेष्ठ में नित दुविधा हो,
कौन बताये, क्या अपनायें,
किन मूल्यों पर मार्ग बितायें,
सबके अपने अपने अनुभव,
आशंकित, यदि पंथ चुने नव,
जीवन का वैशिष्ट्य बचाये,
निर्णय को आधार बनाये,
एक संसार लगा है सजने,
कुछ पल अपने।३।

स्थापित पंथों से घर्षण,
छितरे जग जगमग आकर्षण,
स्थितियों के मेरुदण्ड शत,
विश्वासों को उलझाते मत,
ज्ञात प्रात का अन्त भाप सा,
आशान्वित उत्सव विलाप सा,
आदि, अंत का द्वन्द्वयुद्ध जग,
शंका बरसे, संशोधित नभ,
लगता शोधित पंथ बिलखने,
कुछ पल अपने।४।

हर कपाल, एक विश्व रचित सा,
सम प्रायिकता गुण संचित पा,
सहजीवन निष्कर्ष अनन्ता,
हन्त्य चीखते, गुपचुप हन्ता,
अद्भुत खेला, अद्भुत मेला,
भीड़ भरे तत्वों का रेला,
आत्मा की पहचान बचाये,
भय, संभवतः खो न जाये,
मनवेगों को पुनि पुनि मथने,
कुछ पल अपने।५।

हमने तो शाश्वत जाना है,
पल, दिन, जीवन एक माना है,
एक अस्त, दूजा उद्भवमय,
मध्य अवस्थित लुप्त, मृत्यु भय,
कौन ठौर साधे मध्यम का,
जागृत विश्व रहा प्रियतम सा,
मध्य जगी ऊर्जा आगत की,
प्रचुर व्यवस्था है स्वागत की,
अब निद्रा हो, अब हों सपने,
कुछ पल अपने।६।

6.8.14

भौतिकता अनुकूल नहीं है

उमड़ पड़े अनगिनत प्रश्न,
जब कारण का कारण पूछा 
जगा गये सोती जिज्ञासा,
जीवन के अनसुलझे उत्तर ।।१।।

दर्शन की लम्बी राहों पर,
चलता ज्ञान शिथिल हो बैठा 
नहीं किन्तु सन्तुष्टि मिली,
किस हेतु जी रहे जीवन हम सब ।।२।।

प्रसन्नता की सहज पिपासा,
मनुज सदा मधुरस को आतुर 
सुख के साथ दुखों की लड़ियाँ,
किन्तु कौन यह पिरो रहा है ।।३।।

कृत्रिम सुखों पर ऋण अपार है,
सदा किसी पर ही आधारित 
सुख की किन्तु प्रकृति शाश्वत है,
फिर भी अर्थहीन अवलम्बन ।।४।।

खोज रहा थाखोज रहा हूँ,
छिपा कहाँ है सुख का उद्गम 
जहाँ दुखों की काली छाया,
लेश मात्र स्पर्श नहीं हो ।।५।।

मिला नहीं कोई सुख सुन्दर,
पाया बस शापित विषाक्त रस 
स्वार्थलोभमद में सब डूबे,
मरु में अमिय कहाँ से लाऊँ ।।६।।

चिन्तनमननगहन कर सोचा,
भौतिक मेरी प्रकृति नहीं है 
सच पूछो तो सहज प्रकृति में,
अतुलअसीम आनन्द भरा है ।।७।।

कारण का सब स्रोत वही है,
वह सुख हैदुख है जो नहीं वह 
मात्र वही आस्वादन कर ले,
मरु-मरीचिका सतत व्यर्थ है ।।८।।

आत्मा हैंस्थूल नहीं हैं,
जीवन कोई भूल नहीं है 
चक्रव्यूह से कब निकलोगे,
भौतिकता अनुकूल नहीं है ।।९।।

12.7.14

क्या नियत हो?


ध्येय जीवन का नियत करना स्वयं,
और यह भी नियत करना,
ध्येय में बँध कर रहूँ,
या रहूँ उन्मुक्त सा।

पैर धरती पर बँधे हों,
या गगन को छू सकें, वो पंख हो,
बँधा जीवन आश्रितों की राह में,
या जगत से मौन हो अभिव्यक्तियाँ। 

6.4.13

अँधेरे को बाहर फेंकना है

एक दिन देवेन्द्र जी ने एक कहानी सुनायी जो बचपन में उनके पिताजी ने सुनायी थी। कहानी सुनने के बाद ही उसका आशय स्पष्ट हो पायेगा। आप भी सुनिये और उसमें निहित संकेतों को समझने को प्रयास करिये।

एक नवविवाहिता विवाह के पश्चात अपने गाँव पहुँची। दिन भर सब बहू देखने आये। घर के लोगों में आत्मीयता कूट कूट कर भरी थी, सबने बड़ा प्यार दिया। गाँव के लोग भी बहुत सज्जन थे, सबने बड़ा मान दिया, आशीर्वाद दिया और कहीं कोई भी कमी नहीं होने दी। सायं का समय आया तो सास ने बहू से कहा कि बेटी शीघ्र ही स्नान ध्यान कर भोजन बना ले, सब लोग सूर्यास्त के पहले ही भोजन कर के तैयार हो जाते हैं। बहू ने पहले सोचा कि कोई विशेष परम्परा होगी, जैन मतावलम्बियों की तरह, कि कहीं अँधेरे में कोई जीव भोजन के साथ ही ग्रास न बन जाये। जहाँ तक ज्ञात था तो ऐसी कोई कारण नहीं था। परिवार ही नहीं वरन पूरे गाँव में एक विशेष शीघ्रता दिखायी दी, लगा आज कोई उत्सव होगा रात में, इसीलिये भोजन शीघ्र ही निपटाने का उपक्रम हो रहा है। जब बहू से उत्सुकता न सही गयी तो उसने धीरे से अपने पति को बुलाया और पूछा कि मुझे इतने शीघ्र भोजन करने का औचित्य समझ नहीं आ रहा है।

पति ने पत्नी को तनिक आश्चर्य और करुणा के भाव से देखा, मानो आँखें यह पूछ रही हों कि इतनी सीधी बात से अनभिज्ञ है, उसकी प्यारी पत्नी। जब आँखों ने अधिकार जता लिया तब पति ने बताना प्रारम्भ किया। देखो, अभी थोड़ी देर में अँधेरा भर आयेगा और वह सूरज को ढक लेगा और ढकेगा भी इतना गाढ़ा कि सूरज निराश होकर चला जायेगा। हमारा गाँव इस समस्या से जूझने को सदा ही तत्पर रहता है। हम सब अपना सारा कार्य दिन में ही कर लेते हैं, यही नहीं पर्याप्त विश्राम भी कर लेते हैं। रात आते ही सब तैयार होकर अपने घर पहुँच जाते हैं। जिसकी जितनी सामर्थ्य है वह उसी के अनुसार कोई पात्र उठा लेता है, यहाँ तक कि बच्चे भी छोटी कटोरी लेकर तैयार हो जाते हैं। उसके बाद हम लोग रात भर अँधेरा बाहर निकालते रहते हैं। रात भर श्रम करने के बाद जब सारा अँधेरा बाहर निकल जाता है तब कहीं सूरज लौट कर वापस आता है और तब कहीं जाकर सुबह होती है।

इतना श्रमशील परिवार और गाँव देख कर नवविवाहिता अभिभूत हो गयी, उसकी आँखों में आँसू छलक आये। उसने कहा कि आप लोगों ने अब तक बड़ा श्रम कर लिया है, अब सारा उत्तरदायित्व मेरा है, अब मैं रात भर अँधेरा बाहर फेकूँगी। आप सब सबने बड़ा समझाया कि बिटिया कि तुम अभी बड़ी कोमल हो और यह अँधेरा बड़ा ही उद्दण्ड, रात भर तुम थक भी जाओगी, अँधेरा निकलेगा भी नहीं, सुबह नहीं हो पायेगी। सबने सोचा कि नवविवाहिता ने भावनात्मक होकर यह कार्य ले लिया है, पता नहीं क्या होगा, एक दिन का उत्साह है, अगले दिन से उत्साह ठण्डा पड़ जायेगा, जीवन का क्रम वैसे ही चलने लगेगा। जब बहू ने इतनी आत्मीयता दिखायी है तो उसे अवसर देना तो बनता है।

पहले दिन बहू के सहारे घर को छोड़कर सब सो गये, थोड़ी देर बाद बहू भी सो गयी, सबके पहले उठ भी गयी, सूरज निकल आया, सबको बहू की क्षमता पर विश्वास हो आया। धीरे धीरे रात में अँधेरा फेंकने का उपक्रम बन्द हो गया, रात का समय सोने के लिये उपयोग में आने लगा, दिन में कार्य होने लगा। एक रात बहू ने दिये की बाती बनायी, एक छोटे से दिये में तेल डाला और रात में उसे जला कर घर में सजा दिया, अँधेरा रात में ही भाग गया, घर के बाहर रहा पर घर के अन्दर पुनः नहीं आया।

कहानी बड़ी सरल है, सुनने के बाद हँसी में भी उड़ाया जा सकता है इसे। अपने आप सुबह आने वाली और दिये से अंधकार दूर होने वाली बात इतनी सहज है कि उसे कोई न समझे तो हँसी आने वाली बात लगती है। पर यह केवल एक उदाहरण है, अँधेरे को बाहर फेकने वाली मानसिकता दिखाने का और साथ में यह भी दिखाने का कि किस तरह सूरज की अनुपस्थिति में अंधकार भगाया जा सकता है।

संभवतः देवेन्द्रजी के पिताजी ने यह कहानी श्रम में स्वयं को झोंक देने के पहले पर्याप्त समझ विकसित करने की शिक्षा देने के लिये सुनायी है। सच भी है कि बिना पर्याप्त ज्ञान के और विषयगत समझ के किसी कार्य में स्वयं को झोंक देना तो मूर्खता ही है। यह भी एक स्वीकृत तथ्य है कि कभी कभी अपनी कार्यप्रणाली पर विचार करते करते कई ऐसे माध्यम निकल आते हैं जिससे सब कुछ सरल और सहज हो जाता है। मानवजगत का इतिहास देखें तो पहले मैराथन धावकों से अपने संदेश भेजने वाली मानव सभ्यता आज वीडियो चैटिंग कर लेती है।

मुझे इस कहानी का सर्वाधिक प्रभावित करने वाला पक्ष लगता है, स्वयं के अन्दर उन प्रवृत्तियों को ढूढ़ना जिन्हें हम अँधेरे फेकने की तरह पाते हैं। अपने द्वारा करने वाले हर प्रयास और श्रम को देखें, दो विश्लेषण करें। पहला तो यह देखें कि वह श्रम जिसके लक्ष्य के लिये किया जा रहा है, वह स्वयं तो होने वाला नहीं है, इस कहानी में आने वाली हर सुबह की तरह। बहुधा हम सब स्वतः हो जाने वाले कार्यों में कार्य करते हुये दिखते हैं और जब कार्य हो जाता है तब उसका श्रेय लेने बैठ जाते हैं। यही नहीं कभी कभी आवश्यकता से अधिक लोग कार्य में लगे होते हैं, जहाँ कम से ही कार्य हो जाता है, अधिक लोग या तो कार्य में व्यवधान उत्पन्न करते हैं या अकर्मण्यता का वातावरण बनाते हैं। दूसरा विश्लेषण इस बात का हो, क्या वही कार्य करने की कोई और विधि है जिससे वह कार्य कम श्रम सें हो जाये। न जाने कितने ऐसे कार्य हैं जो हम पुराने घिसे पिटे ढंग से करते रहते हैं, कभी सोचते ही नहीं हैं कि कोई दूसरी विधि अपनायी जा सकती है।

कुछ लोगों को कोई भी कार्य तामझाम से करने में अपार सुख मिलता है, मुझे एक भी अतिरिक्त अंश दंश सा लगता है, हर प्रक्रिया को सपाट और न्यूनतम स्तरों पर ले आने पर ही चैन आता है। प्रक्रिया का आकार न्यूनतम रखने से न केवल उसमें गति आती है वरन पारदर्शिता भी बढ़ती है। आईटी ने एक दिशा दिखायी है पूरे विश्व को सपाट बनाने में, मुझे भी वही दिशा भाती है। उदाहरण उपस्थित हैं यह सिद्ध करने में कि जहाँ पर भी हमने आईटी को अपनाया है, जीवन को और अधिक सुखमय बनाया है।

जीवन के कुछ क्षेत्र ऐसे होते हैं, जहाँ प्रक्रियायें स्वतः होती हैं, उन्हें होने देना चाहिये, वहाँ हमारे होने या न होने से कोई अन्तर नहीं पड़ने वाला। कर्ता होने का भाव पाने से अच्छा है कि रात भर सोयें और सुबह होने दें। सुबह उठें और तब सार्थक कार्यों में ध्यान लगायें। मुझे तो बहू के स्वभाव से भी सीख मिली, अपनी विद्वता का ढोल पीट कर और अपने परिवार के अज्ञान की बधिया उधेड़ कर अपनी बात कहने की अपेक्षा सहज भाव से अपना मन्तव्य साध लिया। विद्वानों और तर्कशास्त्रियों को यह समाजशास्त्र भी सीखना होगा। विद्वता यदि आनन्दमय न रही तो अँधेरा फेंकना का कार्य तो विद्वान भी कर बैठते हैं। आप भी सोचिये और अपने जीवन से अँधेरे फेंकने जैसे कार्यों को निकाल फेंकिये।

3.4.13

त्वम्‌ चरैवेति

विविध विधा के फूल खिले हैं,
आकर्षण के थाल सजे है,
किन्तु शब्द गुञ्जित मन में,
त्वम्‌ चरैवेति, त्वम्‌ चरैवेति ।।१।।

भाव-वृक्ष की सुखद छाँह है,
सम्बन्धों की मधुर बाँह है,
पर बन्धन से मुक्त पथिक,
त्वम्‌ चरैवेति, त्वम्‌ चरैवेति ।।२।।

सुविधाआें से संचित जन हैं,
मुग्ध छटा से सिंचित वन हैं,
पर मन की दुर्बलता तज,
त्वम्‌ चरैवेति, त्वम्‌ चरैवेति ।।३।।

जीवन पथ पर विघ्न बड़े हैं,
अट्टाहस कर आज खड़े हैं,
पर पथ के सब विघ्न तोड़,
त्वम्‌ चरैवेति, त्वम्‌ चरैवेति ।।४।।

यदि विरोध की हवा बही है,
बहुमत तेरी ओर नहीं है,
पर सुलक्ष्य पर दृढ़-प्रतिज्ञ,
त्वम्‌ चरैवेति, त्वम्‌ चरैवेति ।।५।।

कार्य-क्षेत्र यह तन क्षीणित हो,
जीवन-रस से आज रहित हो,
पर अन्तः में शक्ति निहित,
त्वम्‌ चरैवेति, त्वम्‌ चरैवेति ।।६।।