Showing posts with label आरोप. Show all posts
Showing posts with label आरोप. Show all posts

2.6.12

क्यों दूँ दोष विधाता को?

आँख खुली हो, फिर भी पथ पर, समुचित चलना न आया,
दीप, शिखा और तेलयुक्त हो, तब भी जलना न आया,
मन भी रह रह अकुलाता हो बँधा व्यथा के छोरों में,
आन्दोलित हो, अवसानों का कारण ढूढ़े औरों में,

पर अनुभव के सोपानों में जितना चढ़ता, बढ़ता हूँ,
अपने मन से निष्कर्षों पर प्रतिपल प्रतिक्षण लड़ता हूँ,
अपना जीवन, लेखक बनकर लिखता हूँ निज गाथा को,
काँटे पग में, पीड़ा अपनी, क्यों दूँ दोष विधाता को?