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27.6.12

सहज मिले सो दूध सम

सुभाषितों में सदियों के अनुभव का निचोड़ छिपा रहता है, पाठ्यक्रम में कुछ सुभाषित थे, अभी तक याद हैं। उन्हें भूलना संभव ही नहीं, कोई न कोई ऐसी परिस्थिति आ ही जाती है जिसमें वे शतप्रतिशत प्रयुक्त होते हैं। पंचतन्त्र, हितोपदेश, गीता, रामचरितमानस, कबीर और न जाने कितने स्रोतों में ज्ञान के ऐसे गूढ़ तत्व छिपे हैं जो कि न केवल पढ़कर याद किये जायें वरन समय आने पर जीवन में उपयोग भी किये जायें। यह अलग विषय है कि आधुनिक शिक्षा पद्धति में इस प्रकार के सहज और ग्राह्य ज्ञान को बेसिरपैर की तुकबंदियों से भी अधिक हीन समझा जाता है। बुद्धिहीनता को रंगहीनता मानकर परोस देने का निष्कर्ष भी रंगहीन रहता है, परीक्षा के बाद उन्हें भूल न जाने का कोई कारण ही नहीं। जिन तुकबंदियों की बस अंक देने की उपादेयता हो, उनसे अधिक अपेक्षा क्यों रखी जाये भला?

ये सुभाषित केवल ज्ञानियों की ही विचारणीय सामग्री नहीं रही है, वह समाज के अशिक्षित व अर्धशिक्षित वर्ग के लिये सहजता से उपलब्ध है। अशिक्षित ग्रामीण भी जब अपने बेटे को अच्छी संगत के बारे में बताना चाहता है, तो वह भी तुलसीदास की वही चौपाई उद्धृत करता होगा, 'सात स्वर्ग अपवर्ग सुख धरिय तुला एक अंग, तूल न ताहि सकल मिलि, जो सुख लव सत्संग'। जब ज्ञान ही गेय हो जाये तो उससे अधिक उपयुक्त क्या हो सकता है, शब्द ज्ञान के लिये।

शिक्षा पद्धति जब जागे, तब जागे, हम बौद्धिक गुणवत्ता के प्रति जगे रहते हैं। ऐसे अमूल्य रत्नों को सुनना, मन में गुनना और फिर जीवन में उतारना, ऐसा लगता है कि किसी ने हाथ में कभी न समाप्त होने वाले रसना का पात्र दे दिया है। जितनी बार पढ़ते जाते हैं, सुनते जाते हैं, अर्थ और स्पष्ट होता जाता है। ज्ञान का अथाह अंबार भरा है सुभाषितों में, जब भी अवसर मिलता है, पढ़ता हूँ।

न्यूनतम-श्रमतन्त्रों से भरे इस विश्व में जब परिश्रम के बारे में स्वयं को आश्वस्त करना होता है तो सहज ही 'उद्यमेन हि सिद्धयन्ति, कार्याणि न मनोरथैः' याद आता है। जहाँ पराक्रम की आवश्यकता दिखती है, वहाँ 'वीरा भोग्या वसुन्धरा' याद आता है। जहाँ परिस्थियाँ अस्थिर करने के प्रयास में रहती हैं, वहाँ 'न दैन्यं न पलायनम्' का उद्घोष उठता है। जब नीरवता छा जाती है, तो 'सुख दुखे समेकृत्वा' का स्मरण हो आता है। ऐसे न जाने कितने ज्ञानसिंधु वाक्य हैं जो अतिसामान्य से अतिविशेष, सभी परिस्थितियों में अपना महत्व स्पष्ट कर जाते हैं।

ऐसा नहीं है कि अपनी संस्कृति में प्रति नैसर्गिक आकर्षण ही इस अनुराग का कारण है। निश्चय ही सत्य की खोज का प्रथम आधार वह होता है, पर अपनी संस्कृति के बाहर भी ज्ञान का आधार स्वीकार है और जितना अधिक अन्य संस्कृतियों और सभ्यताओं को जानता हूँ, अपनी संस्कृति के प्रति निष्ठा और प्रबल होती जाती है। उस पर भी यह ज्ञानमयी आधार प्रेम को सहज स्थायित्व दे जाता है।

कई प्रश्न होते हैं जो उत्तरित होने में समय लेते हैं। धन के प्रति अधिक मोह न पिताजी में देखा और न ही कभी स्वयं को ही मोहिल पाया। ऐसा भी नहीं था कि धन के प्रति कोई वितृष्णा रही हो। अधिक धन के प्रति न कभी जीवन को खपा देने का विचार आया और न ही कभी वैराग्य ले हिमालय प्रस्थान की सोच। जितना है, जो है, सहज है। जहाँ धन की सर्वोच्चता स्वीकार नहीं रही है, वहीं कभी धन के महत्व को नकारा भी नहीं है। यह सोच समाज-मत से भिन्न अवश्य हो सकती है, पर हमारी प्रसन्नता का संसार वहीं बसता है। इस स्वभाव को समझा पाना बहुधा कठिन हो जाता था, बस मन यही कहता था, कि हम ऐसे ही हैं, ईश्वर ने अधिक रुचि लेकर हमें नहीं बनाया।

जब भी कोई दोहा या सुभाषित आपकी विचारशैली से अनुनादित होता हुआ मिलता है तो ऐसा लगता है कि आपकी जैसी मनःस्थिति इस धरा में पहले भी आ चुकी है, आपको सहसा किसी के साथ होने का अनुभव होने लगता है, आपको सहसा सहारा मिल जाता है। ऐसा लगता है किसी ने आपको ही लक्ष्य करके यह लिखा है या लगता है कि बस यही उत्तर है जो प्रश्नभरी आँखों में जाकर झोंक आओ।

बस ऐसे ही विचार तब आये जब कबीर का यह दोहा पढ़ा,

सहज मिले सो दूध सम, मांगा मिले सो पानि
कह कबीर वह रक्त सम, जामें एंचातानि।

आशय स्पष्टतम है, जो सहजता से प्राप्त हो वह दूध जैसा है, जिसके लिये किसी से झुककर माँगना पड़े वह पानी के समान है और जिसके लिये इधर उधर की बुद्धि लगानी पड़े और दन्द-फन्द करना पड़े वह रक्त के समान है। किसी घर में संपत्ति संबंधी छोटी छोटी बातों पर जब झगड़ा होते देखता हूँ तो बस यही दोहा मन ही मन बुदबुदाने की इच्छा होती है। भाईयों का रक्त बहते तक देखा है, यदि न भी बहे तो भी संबंधों का रक्त तो निश्चय ही बह जाता है, संबंध सदा के लिये दुर्बल और रोगग्रस्त हो जाता है।

बहुत लोग ऐसे हैं, जिन्हें छोटी छोटी बातों के लिये झगड़ा करना तो दूर, किसी से कुछ माँगना भी नहीं सुहाता है। ऐसे दुग्धधवल व्यक्तित्वों से ही विश्व की सज्जनता अनुप्राणित है। ईश्वर करे उन्हें उनके कर्मों से सब सहज ही मिलता रहे। ईश्वर करे कि जो ऐसी आदर्श स्थिति में नहीं भी है, उन्हें भी कम से कम वह रक्त तो दिखायी पड़े जो हमारे छलकर्मों से छलक आता है।

मनन कीजिये, मन स्वीकार करे तो भजन कीजिये, कबीर के साथ, 'सहज मिले तो....'

15.9.10

धन घमंड अब गरजत घोरा

मुझे कई दिनों से एक बात कचोट रही थी कि किसी धनवान का धन उसकी सामाजिकता को किस तरह प्रभावित करता है? स्वयं का अनुभव मध्यमवर्गीयता का प्रबल आस्वादन मात्र ही रह पाया। कई धनवान मित्र हैं पर धन को लेकर न मेरी जिज्ञासा रही और न ही उनका खुलापन। किसी धनाढ्य से उसके धन के बारे में पूछना थोड़ा आक्रामक सा प्रतीत होता है और धनाढ्य का स्वयं ही बता देना उस परिश्रम को एक सार्वजनिक स्वरूप दे देना होगा जिससे वह धन अर्जित किया गया है।

धन को साधन के रूप में स्वीकार करने से तो यह लगता है कि धन की मात्रा बढ़ने से सामाजिकता भी बढ़नी चाहिये। कुछ अपवादों को छोड़ दें तो होता विपरीत ही है। धन के द्वारा लोगों का सामाजिक विस्तार सिकुड़ते ही पाया है।

और अधिक धन की आकांक्षा समय की उपलब्धता कम कर देती है जिससे सम्बन्ध सिकुड़ने लगते हैं। अधिक धन का होना व्यक्ति को समाज की एक विशेष श्रेणी में खड़ा कर देता है, जहाँ पर सामाजिकता कम और दिखावा अधिक होता है। धन चले जाने का या माँग लिये जाने का भय भी धनवान को अन्य वर्गों से दूर रखता है। इन तीन संभावित कारणों के बारे में जब किसी उत्तर पर नहीं पहुँच पाया तो निर्मम हो एक से यह प्रश्न पूछ ही बैठा।

"क्या आपको लगता है कि यदि कोई आपसे बात करने आता है तो उसे केवल आपके धन में रुचि है?"  प्रश्न रूक्ष और आहत करने वाला था और मैं उत्तर की अपेक्षा भी नहीं कर रहा था। असहज उत्तर मिला कि नहीं, ऐसा नहीं है। जो भाव शब्द छिपाना चाह रहे थे, मुखमण्डल ने उन्मुक्तता से बिखेर दिये। ऐसा नहीं है कि धनाढ्य के अतिरिक्त, धन का उल्लेख किसी और को विचलित नहीं करता है। मध्यमवर्गीय के मन में यदि धन घुल गया तो उसका, उसके परिवार का और उसके समाज का विस्तार उस धनाक्त मानसिकता में तिरोहित हो जाता है। निर्धन के लिये तो सदैव ही धन एक चाँद सितारे के उपमानों से कम नहीं है जीवन में।

कनक कनक ते सौ गुनी मादकता अधिकाय,
वा खाये बौराय जग, वा पाये बौराय।

जब पहली बार पढ़ा था यह दोहा तो उतना जीवन्त नहीं लगा था यमक अलंकार का यह उदाहरण। अनुभव के मार्गों में पर इस दोहे को नित्य जीवन पाते देखा है। बौराने की स्थिति में सम्बन्धों का भार उठाना बड़े झंझट का कार्य लगता हो संभवतः। बौराने की स्थिति में सामाजिकता के विस्तार की बात तो दूर, समाज पर ही भार बन जाता है व्यक्ति।

स्वयं का अनुभव इस जीवन में मिल पाये, इतनी प्रतीक्षा न कर पाऊँगा, उत्तरों के लिये। किसी लक्ष्मीपति से इस प्रश्न का उत्तर मिले तो अवश्य बताईयेगा। लक्ष्मीवाहनों से इस विषय पर चर्चा कर अब अपना समय व्यर्थ नहीं करूँगा। आपके लिये भी यही सलाह है।