नास्तिकों का एक बड़ा तर्क है, यदि ईश्वर है तो यह अन्याय और अव्यवस्था क्यों? यदि वह ईश है और दयालु है तो किसी को कोई दुख होना ही नहीं चाहिये। तर्क श्रंखला बढ़ती जाती है और अन्ततः जगत में व्याप्त समस्त दोषों और दुखों के लिये ईश्वर को उत्तरदायी मान लिया जाता है, दोषी मानकर अपराधी घोषित कर दिया जाता है, जीवन के प्रमुखतम तत्वों से निष्कासित कर दिया जाता है। आस्तिकों को सबको सुख न दे पाने वाले का अनुसरण करने के कारण हीन और मूर्ख मान लिया जाता है, अधिक उछलने के लिये प्रतिबंधित कर दिया जाता है।
अव्यवस्था और तज्जनित अन्याय तो फिर भी बना रहता है। अगला दोषी कौन, संस्कृति और उसके संस्कार। व्याप्त दुखों ने फिर दोष सिद्ध किया, संस्कृति और उसके उपासक भी निष्कासित। अगला दोषी कौन, सरकार और उसकी व्यवस्था, दुख हैं तो वह भी अकर्मण्य और अक्षम। व्यवस्था के हर स्तम्भ को ढहाते हैं और बढ़ते जाते हैं, उन्हीं तर्कों से, और अन्ततः पहुँच जाते हैं पूर्ण अव्यवस्था की स्थिति में। कोई व्यवस्था नहीं, सबके अपने अपने विश्व, कोई नियम नहीं, सबके स्वार्थों से संचालित और प्रभावित जीवनक्रम।
जब तर्क सुख और कल्याण के अपेक्षित ध्येय तथा अव्यवस्था की नकारात्मकता पर आधारित हों और स्वयं ही पूर्ण अव्यवस्था की ओर अग्रसर हों तो ऐसे तर्कों को भस्मासुर ही कहा जा सकता है, जिस पर हाथ रखे वही भस्म हो जाये। ऐसे तर्कों से बस यही आग्रह है कि अपने सर पर हाथ रख कर अपना ही विनाश कर लें।
ऐसे भस्मासुरी तर्क रहें न रहें, ईश्वर का अस्तित्व स्थापित हो पाये या न हो पाये, पर पूरे क्रम में एक बात उभर कर सामने आती है और वह है मनुष्य की स्वतन्त्रता। यह मानते हुये कि प्रकृति का सर्वाधिक विकसित मस्तिष्क मनुष्य के पास है, तो जो भी व्यवस्था और अव्यवस्था इस संसार में व्याप्त है, उसके लिये मनुष्य ही उत्तरदायी है।
ऐसा नहीं है कि मनुष्य अव्यवस्थित रहना चाहता है, यदि ऐसा होता तो परिवार, समाज, देश आदि जैसी संस्थायें अस्तित्व में नहीं आतीं। उत्साह इतना अधिक रहा कि जीवन के जिन पक्षों को बाँधने का प्रयास नहीं होना चाहिये था, वह भी होने लगा। चिन्तन और अपना अच्छा बुरा स्वयं समझने का प्राकृतिक अधिकार व्यक्ति के पास होता था, उसे भी बाँधा जाने लगा। अतिव्यवस्था का दंश तो फिर भी सहा जा सकता था पर दूसरों की व्यवस्थाओं में अपनी व्यवस्था का अधिरोपण दुखों की बाढ़ ले आया। युद्धों और सामाजिक समस्याओं का इतिहास अतिव्यवस्था और व्यवस्था अधिरोपण के शब्दों को बार बार अनुनादित करता रहा है।
व्याप्त अव्यवस्था और मनुष्य को मिली स्वतन्त्रता के बीच एक सहज संबंध है, पशुओं को आप नियत व्यवस्था तोड़ते कभी नहीं देखेंगे, एक सधे क्रम में बीतता है उनका जीवन। जब अव्यवस्था हमारे नियन्त्रणमना स्वभाव की उपज है तो उसका दोष ईश्वर को क्यों देना? हमारे तर्क भस्मासुरी न होकर विश्वकर्मा जैसे सृजनात्मक क्यों न हों? अपने दोषों को ईश्वर पर क्यों मढ़ना? यदि हमारा जीवन भी पशुओं जैसा अति नियन्त्रित सा होता तब भी हम दोष ईश्वर को देते, और जब हमें स्वतन्त्रता मिली तो उससे उत्पन्न अव्यवस्था का दोष भी हम ईश्वर पर मढ़ बैठे।
तार्किक दृष्टि से यदि ईश्वर को स्वीकार करते हैं तो उसके द्वारा निर्मित मनुष्य को और उसे प्रदत्त स्वतन्त्रता को भी स्वीकार करना होगा। उस स्थिति में प्रकृति की वृहद व्यवस्था और उसमें उपस्थित मानवकृत अव्यवस्थाओं के समुच्चय को भी स्वीकार करना होगा। धीरे धीरे अव्यवस्थाओं और उनके प्रभावों को सीमित कर के रखने का प्रयास हम सब कर सकते हैं, उन्हें समूल नष्ट करना एक स्वप्न ही होगा।
जिस तर्क श्रंखला का आधार व्यवस्था हो उसके निष्कर्ष भस्मासुरी नहीं हो सकते हैं। व्यवस्था का आधार हो तो अव्यवस्था उपस्थित भले ही रहे पर वह अनियन्त्रित बढ़ नहीं सकती।
ईश्वर बना रहे, मनुष्य बना रहे, बनी रहे मनुष्य की स्वतन्त्रता, बना रहे प्रकृति का व्यवस्थित सृष्टिक्रम और बनी रहे उसमें उपस्थित मानवकृत अव्यवस्था, बने रहें हमारे प्रयास उस अव्यवस्था को सीमित रखने के और बनी रहे विश्व की गति, बस भस्मासुरी तर्कों और उसके उपासकों के हृदय को तनिक शान्ति मिले, यही आस्तिकीय प्रार्थना ईश्वर से है।
जब तर्क सुख और कल्याण के अपेक्षित ध्येय तथा अव्यवस्था की नकारात्मकता पर आधारित हों और स्वयं ही पूर्ण अव्यवस्था की ओर अग्रसर हों तो ऐसे तर्कों को भस्मासुर ही कहा जा सकता है, जिस पर हाथ रखे वही भस्म हो जाये। ऐसे तर्कों से बस यही आग्रह है कि अपने सर पर हाथ रख कर अपना ही विनाश कर लें।
ऐसे भस्मासुरी तर्क रहें न रहें, ईश्वर का अस्तित्व स्थापित हो पाये या न हो पाये, पर पूरे क्रम में एक बात उभर कर सामने आती है और वह है मनुष्य की स्वतन्त्रता। यह मानते हुये कि प्रकृति का सर्वाधिक विकसित मस्तिष्क मनुष्य के पास है, तो जो भी व्यवस्था और अव्यवस्था इस संसार में व्याप्त है, उसके लिये मनुष्य ही उत्तरदायी है।
ऐसा नहीं है कि मनुष्य अव्यवस्थित रहना चाहता है, यदि ऐसा होता तो परिवार, समाज, देश आदि जैसी संस्थायें अस्तित्व में नहीं आतीं। उत्साह इतना अधिक रहा कि जीवन के जिन पक्षों को बाँधने का प्रयास नहीं होना चाहिये था, वह भी होने लगा। चिन्तन और अपना अच्छा बुरा स्वयं समझने का प्राकृतिक अधिकार व्यक्ति के पास होता था, उसे भी बाँधा जाने लगा। अतिव्यवस्था का दंश तो फिर भी सहा जा सकता था पर दूसरों की व्यवस्थाओं में अपनी व्यवस्था का अधिरोपण दुखों की बाढ़ ले आया। युद्धों और सामाजिक समस्याओं का इतिहास अतिव्यवस्था और व्यवस्था अधिरोपण के शब्दों को बार बार अनुनादित करता रहा है।
व्याप्त अव्यवस्था और मनुष्य को मिली स्वतन्त्रता के बीच एक सहज संबंध है, पशुओं को आप नियत व्यवस्था तोड़ते कभी नहीं देखेंगे, एक सधे क्रम में बीतता है उनका जीवन। जब अव्यवस्था हमारे नियन्त्रणमना स्वभाव की उपज है तो उसका दोष ईश्वर को क्यों देना? हमारे तर्क भस्मासुरी न होकर विश्वकर्मा जैसे सृजनात्मक क्यों न हों? अपने दोषों को ईश्वर पर क्यों मढ़ना? यदि हमारा जीवन भी पशुओं जैसा अति नियन्त्रित सा होता तब भी हम दोष ईश्वर को देते, और जब हमें स्वतन्त्रता मिली तो उससे उत्पन्न अव्यवस्था का दोष भी हम ईश्वर पर मढ़ बैठे।
जिस तर्क श्रंखला का आधार व्यवस्था हो उसके निष्कर्ष भस्मासुरी नहीं हो सकते हैं। व्यवस्था का आधार हो तो अव्यवस्था उपस्थित भले ही रहे पर वह अनियन्त्रित बढ़ नहीं सकती।
ईश्वर बना रहे, मनुष्य बना रहे, बनी रहे मनुष्य की स्वतन्त्रता, बना रहे प्रकृति का व्यवस्थित सृष्टिक्रम और बनी रहे उसमें उपस्थित मानवकृत अव्यवस्था, बने रहें हमारे प्रयास उस अव्यवस्था को सीमित रखने के और बनी रहे विश्व की गति, बस भस्मासुरी तर्कों और उसके उपासकों के हृदय को तनिक शान्ति मिले, यही आस्तिकीय प्रार्थना ईश्वर से है।