23.5.12

पानी का इतिहास

कहते हैं कि पानी का इतिहास सभ्यताओं का इतिहास है, इस बहते पानी ने कितना कुछ देखा होता है, कितना कुछ सहा होता है। यही कारण रहा होगा कि स्वर्गीय भूपेन हजारिका गंगा को समाज में व्याप्त विद्रूपताओं के लिये उलाहना देते हैं, गंगा बहती हो क्यों? नदियाँ हमारे इतिहास की साक्षी हैं, पर इनका भी अपना कोई इतिहास है, यह एक अत्यन्त रोचक विषय है।

इस विषय पर विद्वानों का ध्यान जाना स्वाभाविक है, यदि नहीं गया तो संभव है कि अगले विश्वयुद्ध की आग पानी से ही निकलेगी। मेरी उत्सुकता इस विषय में व्यक्तिगत है। यमुना नदी मेरे गृहनगर से बहती है। जब से यह ज्ञात हुआ है कि वहाँ बहने वाला पानी हिमालय का है ही नहीं, सारा पानी तो दिल्ली में ही पी लिया जाता है, दिल्ली और इटावा के बीच तो इसमें पानी रहता ही नहीं है, तब से यह चिन्ता लगी है कि भविष्य में कहीं यमुना नदी अपना अस्तित्व न खो बैठे। यह भी संभव है कि दिल्ली और इटावा के बीच इसके पाट में मकान या फार्महाउस आदि बन जायें, यदि ऐसा हुआ तो यमुना नदी इतिहास बन जायेगी। आध्यात्मिक जल के आचमन के स्थान पर विशुद्ध चम्बलीय बीहड़ों का पानी शरीर में जायेगा, प्रार्थना के स्वरों में शान्ति के स्थान पर तब जाने कौन से स्वर निकलेंगे?

आगत भविष्य का दोष दिल्ली को भी कैसे दिया जाये, राजधानी जो ठहरी, विशालतम लोकतन्त्र का केन्द्रबिन्दु, नित नयी आशाओं की कर्मस्थली। अधिक कर्म को अधिक पानी भी चाहिये, जहाँ लंदन और पेरिस प्रतिव्यक्ति प्रतिदिन क्रमशः १६९ और १५५ लीटर पानी उपयोग करते हैं, वहीं दिल्ली में ३०० लीटर की उपलब्धता है। अभी जनसंख्या बढ़ेगी, तब और पानी चाहिये होगा। यह देखकर लगता है कि यमुना का उद्धार अब संभव नहीं है।

पर यमुना के साथ यह पहली बार नहीं होगा कि वह कान्हा के वृन्दावन से होकर नहीं जायेगी। कान्हा के अवतार के पहले भी यमुना वृन्दावन से होकर नहीं बहती थी। पानी का यह सत्यापित इतिहास वैज्ञानिकता के आधार पर ही ज्ञात हुआ है। मानवीय इतिहास शताब्दियों में बदलता है, नदियों के इतिहास सहस्र वर्षों के अन्तराल में स्पष्ट होते हैं।

सरस्वती नदी का विस्तृत विवरण हमारे ग्रन्थों में मिलता है, और यह भी पता लगता है कि कालान्तर में वह नदी विलुप्त हो गयी, कारण अज्ञात। अब छोटी मोटी बावड़ी फाइलों में बन कर खो जायें तो ढूढ़ने में बहुत श्रम लगेगा, इतनी बड़ी नदी का खो जाना आसानी से नहीं पचाया जा सकता है। कहाँ खोयी होगी, ग्रन्थ ही कहते हैं कि वह यमुना और सतलज के बीच में बहती थी, आधुनिक राजस्थान के बीचों बीच। पुरातत्वविदों को उस क्षेत्र में सिन्धु घाटी के ६०० मानवीय निवासों की तुलना में लगभग २००० मानवीय निवास मिले हैं, पर नदी की उपस्थिति का कोई निश्चित सूत्र नहीं मिला।

१९७० में अमेरिका के नासा ने अपने उपग्रहीय चित्रों की सहायता से राजस्थान के थार मरुस्थल में एक लुप्त नदी की उपस्थिति के संकेत दिये थे। उसे दोनों ओर बढ़ाकर देखा गया तो भारत की घग्गर नदी और पाकिस्तान में बहने वाली हाक्रा नदी, सरस्वती नदी के ही अन्तिम छोर हैं, बीच की नदी विलुप्त हो गयी। घग्गर की नदी घाटी एक स्थान पर आकर १०-१२ किमी तक चौड़ी हो जाती है, इससे बस यही अनुमान लगाया जा सकता है कि सरस्वती बहुत ही विशाल नदी रही होगी। तथ्य यह भी बताते हैं कि उस समय सतलज और यमुना दोनों ही सरस्वती में आकर बहती थीं। पृथ्वी की आन्तरिक गतियों के कारण सतलज ने रोपर के पास उल्टा मोड़ लिया और व्यास में मिलती हुयी सिन्धु नदी का अंग बन गयी। वहीं दूसरी ओर यमुना पौन्टा साहब में पूर्व की ओर मुड़ गयी और प्रयाग में आकर गंगा नदी से मिल गयी। दोनों नदियों के दिशा परिवर्तन क्यों हुये, कहना कठिन है, पर यमुना सरस्वती का जल लेकर गंगा से मिलती है इसीलिये प्रयाग की त्रिवेणी में सरस्वती को लुप्त नदी कहा जाता है।

पोखरण परमाणु परीक्षण और उसके बाद का घटनाक्रम सरस्वती के इतिहास को सिद्ध करने में बहुत महत्वपूर्ण रहा है। परीक्षण के बाद जब वैज्ञानिकों ने २५० किमी के क्षेत्र में ८०० कुओं के जल का परीक्षण किया तो उस जल में रेडियोएक्टिव तत्वों की अनुपस्थिति ने परीक्षण की उत्कृष्ट योजना को सिद्ध किया। साथ में जो अन्य निष्कर्ष पाये, वो सरस्वती के अस्तित्व को सिद्ध करने के लिये पर्याप्त थे। पानी मीठा था, ८०००-१४००० साल पुराना था और हिमालय के ग्लेशियरों का था। यही नहीं इस नदी घाटी के किनारे पायी गयी मूर्तियों में आदि बद्री में पाये गये पत्थरों के चूरे के अवशेष मिले हैं। उस क्षेत्र में हिमालय का जल व उद्गमस्थल के पत्थरों का चूरा इतनी अधिक मात्रा में पहुँचने का कोई और कारण नहीं था, सिवाय इसके कि सरस्वती वहाँ बहती थी।

इन खोजों ने सरस्वती के पुराने पाट को पुनः उपयोग में लाकर हिमालय का पानी राजस्थान में लाने का आधार दिया है। सतलज और यमुना के पानी को पहले भूमिगत जल भरने में और उसके बाद सरस्वती को पुनः जीवित करने की विशाल योजना है। राजस्थान की धरती सरस्वती के जल से सरसवती हो पायेगी या नहीं, कच्छ का रन अपने श्वेत विस्तृत क्षेत्र पर हिमालय का जल देख पायेगा या नहीं, सरस्वती के सूखने के बाद दोनों ओर पलायन कर गयी जनसंख्या संस्कृति की सततता उत्पन्न कर पायेगी या नहीं, यह प्रश्न भविष्य बतलायेगा। पर इन खोजों ने एक घृणित असत्य को सहसा आवरणहीन कर दिया है।

अपने आक्रमण और भारतीयों पर की निर्दयता को उचित ठहराने के लिये अंग्रेजों में आर्यों के आक्रमण का विस्तृत इतिहास सृजित किया। भारतीय जनमानस में फूट डालने के लिये आर्य-द्रविड जैसे सिद्धान्तों को पल्लवित किया। योजनानुसार भारतीय संस्कृति के प्रत्येक आधार को नीचा दिखाया। आर्य आक्रमण का एकमेव आधार मोहनजोदड़ो का नष्ट होना १८०० ईपू निर्धारित किया गया है, सरस्वती का लुप्त होना ४०००-८००० ईपू की घटना है। जब वेदों में सरस्वती के बहने और सामने ही लुप्त होने का वर्णन है तो जिस समय मोहनजोदड़ों नष्ट हुआ, उस समय आर्य भारत में ही थे, न कि उनके द्वारा बाहर से आक्रमण किया गया।

पानी इतिहास रचता है और इतिहास की रक्षा भी करता है, सरस्वती की खोजों ने जिस इतिहास को पुनर्जीवित किया है वह हम सबके लिये अमूल्य है। अब चाहे यमुना पुनः अपनी धार पूर्ववत कर सरस्वती से जा मिले, राजस्थान को लहलहाने में कान्हा के वृन्दावन और मेरे गृहनगर को भूल जाये, मेरे हृदय में पानी का इतिहास सदा सम्मान पाता रहेगा।

हमारे इतिहास की साक्षी नदियाँ हमारे भविष्य को रचने में भी सक्षम हैं।

71 comments:

  1. समूचे जड़ और जीव-जगत का जीवन पानी से है -जिसकी वाहिकायें नदियाँ हैं - प्राचीन काल से ही यह तथ्य हृदयंगम कराने के लिये प्रातःस्नान के समय गंगा से लेकर कावेरी तक सभी नदियों के जल के सान्निध्य की कामना की जाती है.
    मुझे तो लगता है नदियाँ सूखेंगी तो पशु-पक्षी और वनस्पतियाँ कैसे जीवित रहेंगे, सब-कुछ रेगिस्तान में बदल जायेगा.इंसान की विवेकहीनता सब नष्ट कर डालेगी !

    ReplyDelete
  2. जल की बर्बादी रुके, इतिहास के साथ छेड़छाड़ बन्द हो!

    ReplyDelete
  3. सरस्वती की पुनर्वापसी का स्वागत है.
    ...अभी भी कई नदियाँ लुप्त होने की कगार पर हैं,उन पर पहले ही यदि ध्यान दिया जाय तो कहीं ज़्यादा ठीक रहेगा.जल के बिना हम बचेंगे क्या ?

    ReplyDelete
    Replies
    1. ...और हाँ,मोडरेशन हटाने का भी स्वागत !

      Delete
  4. शनिवार 26/05/2012 को आपकी यह पोस्ट http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर लिंक की जाएगी. आपके सुझावों का स्वागत है .

    धन्यवाद!

    ReplyDelete
  5. हमारे इतिहास की साक्षी नदियाँ हमारे भविष्य को रचने में भी सक्षम हैं। नदियाँ सभ्यताओं के विकास के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है .
    काश कि सरस्वती के पुनर्जीवन की लुभावनी योजना साकार हो जाए !

    ReplyDelete
  6. गज्जब जी गज्जब । बहुत ही आंखें खोलने वाली खोजपरक पोस्ट है पांडे जी । इसे टहलाने आ दोस्तों मित्रों को दिखाने के लिए ले जा रहे हैं अपने साथ , साझा करने के लिए जी ।

    ReplyDelete
  7. ए मर्दे शेयरवा बटन को साटते काहे नय हैं हो कि लप्प से बुट्टम दबाए आ धप्प से शेयर होल्डर हो गए , एकदमे सुर सपाट रखले हैं आप ब्लॉग को आयं ।

    ReplyDelete
  8. पानी की तरह धन बहाना, ना चलेगा यह बहाना |
    धन की तरह पानी बहाना, आया यही अब ज़माना ||

    पानी के बुलबुले सा मिटे, चाहता है क्या नादान-
    बंद कर सूखे में डूब के, पानी में आग लगाना ||

    ReplyDelete
  9. पानी इतिहास रचता है और इतिहास की रक्षा भी करता है, सरस्वती की खोजों ने जिस इतिहास को पुनर्जीवित किया है वह हम सबके लिये अमूल्य है।

    लुप्त होती सभ्यता को बचा पायें ....
    उससे बड़ी बात कोई नहीं .....
    विचार से परिपूर्ण बहुत गहन और सार्थक आलेख ....!!

    ReplyDelete
  10. पानी के इतिहास की जानकारी के लिए बहुत -बहुत धनयवाद
    सार्थक लेख ..

    ReplyDelete
  11. सार्थक लेख प्रवीण भाई.....
    वाकई जल जो न होता तो यह जग जल जाता.... :-)

    ReplyDelete
  12. बहुत ही शानदार... .. हिस्टौरीकली और साईंटीफीकली प्रूवन और नौलेजेबल आर्टिकल.... आजकल थोडा बाहर चल रहा हूँ... इसीलिए आना नहीं हो पा रहा है.. यह पोस्ट बहुत ही शानदार बन पड़ी है... इंटेलेक्चुयलटी ऊज़ेज़ फ्रॉम इच वर्ड... अगर इसे इंग्लिश में भी लिखा जाए.. तो इंटरनैशनली अक्लेम्ड रिकग्निशन मिलने की सेंट परसेंट प्रोबैबिलीटी है...

    ReplyDelete
  13. बहुत ही शानदार... .. हिस्टौरीकली और साईंटीफीकली प्रूवन और नौलेजेबल आर्टिकल.... आजकल थोडा बाहर चल रहा हूँ... इसीलिए आना नहीं हो पा रहा है.. यह पोस्ट बहुत ही शानदार बन पड़ी है... इंटेलेक्चुयलटी ऊज़ेज़ फ्रॉम इच वर्ड... अगर इसे इंग्लिश में भी लिखा जाए.. तो इंटरनैशनली अक्लेम्ड रिकग्निशन मिलने की सेंट परसेंट प्रोबैबिलीटी है...

    ReplyDelete
  14. राजनीति‍ से फ़ुर्सत हो तो कोई पानी की बात करे

    ReplyDelete
  15. बहुत जानकारीप्रद और शोधपरक लेख...

    ReplyDelete
  16. अदभुत तथ्यपरक आलेख!!
    सरस्वति नें लुप्त रहते भी हमारे सांस्कृतिक गौरव और सभ्य इतिहास को पुनः पल्लवित करने की कृपा की है।
    बहुत ही समानता है सरस्वति अर्थात ज्ञानमाता, जब लहलहाती प्रवाहमान थी इस भूमि में ज्ञान अपने शिखर पर था, लुप्त हुई तो ज्ञान में भी अवनति आई, वर्तमान में संकेत मिलते ही एतिहासिक ज्ञान के भ्रमों को नष्ट कर रही है। भारतीय संस्कृति यूं ही नहीं मानती नदियों को माता!!

    ReplyDelete
  17. आपके ज्ञान से मैं लाभान्वित होती हूँ , पर gk प्रश्न की संभावना से डर जाती हूँ

    ReplyDelete
  18. बेहद महत्वपूर्ण जानकारी ....बहुत गहराई से अध्यन किया गया हैं !

    ReplyDelete
  19. आपके इस शोधपूर्ण लेख के लिए बधाई स्वीकारें. हमारे तो ज्ञान में अप्रत्याशित वृद्धि हुई है.

    नीरज

    ReplyDelete
  20. bahut hi sahi jankari di aapane
    main ujjain se hun aur kshirpra nadi ka bhi yahi haal hain
    saaf karne ke liye muhim to kai hui parantu sirf kagazo par
    Thanks
    http://drivingwithpen.blogspot.in/

    ReplyDelete
  21. ज्ञान का अद्भुत संगम लिए हुए यह आलेख ...आभार ।

    ReplyDelete
  22. बढ़िया खोजपरक विवेचन . नदियाँ तो सभ्यता का आधार है , उनके बिना जीवन संभव नहीं . पंडित वीरभद्र मिश्रा जी से मुलाकात की थी जो भागीरथ श्रम कर रहे है गंगा को बचाने को. उनका मत भी आप जैसा ही था.

    ReplyDelete
  23. बिलकुल सच कहा आपने ..हमारा इतिहास तो हमारा है ही नहीं. वो तो विदेशियों ने जैसे चाहा लिख दिया और सबने मान लिया. ये नदियाँ ही हमारा सच्चा इतिहास हैं.
    बेहतरीन खोजपरक आलेख इसे तो बहुत आगे तक पहुंचाना चाहिए.

    ReplyDelete
  24. bahut sundar...jankari bhara rochak lekh..

    ReplyDelete
  25. बहुत रोचक सामग्री!

    ReplyDelete
  26. जल ही जीवन है ,,,,,,
    बहुत रोचक सार्थक लेख ,,,,,प्रवीण भाई.....

    ReplyDelete
  27. सही कहा . यमुना तो अपना अस्तित्त्व दिल्ली में आकर खो चुकी .
    तभी तो मना करने के बावजूद दिल्ली वाले यमुना पर रोज फूल मालाएं चढाते हैं .

    ReplyDelete
  28. अद्भुत और प्रेरक आलेख।

    क्या संयोग है....सुबह से नदियों के बारे में ही पढ़ रहा हूँ और अब आपका लेख....आज का दिन तो वाकई नदीमय हो गया।

    आपने सरस्वती के पुनर्जीवन की जो सुनहरी परिकल्पना की है, उसका साकार करने के लिए एक नए भगीरथ की जरूरत होगी।

    गंगा और यमुना लुप्त होने के कगार पर जा पहुंची हैं, उन्हें बचाने के लिए धनबल और जनबल भी उपलब्ध हैं, पर हमारी भ्रष्ट और स्वार्थी मानसिकता के कारण कोई सकारात्मक परिणाम निकल नहीं पा रहा है।

    गंगा और यमुना को बचाने और सरस्वती को फिर से जीवित करने की जिम्मेदारी हमारी पीढ़ी के भारतीयों की है, और यदि ऐसा न हो सका तो आने वाला इतिहास और हमारी आने वाली पीढ़ियाँ हमें कभी माफ नहीं कर सकेंगी।

    ReplyDelete
  29. बड़िया जानकारी, आभार्। यूँ तो ब्रह्मपुत्र नदी मैं ने देखी भी नहीं है फ़िर भी वो मेरी प्रिय नदी है और मुझे आशंका है कि एक दिन वो नदी भी इतिहास बन जायेगी। ऑलरेडी जो नदी हष्ट पुष्ट पहलवान लगती है अब इतनी मरियल हो रही है कि लगता है कुछ सालों की मेहमान है। जब प्राकृतिक संपदा को टेकन फ़ॉर ग्रांटेड लेगें तो यही होगा।

    ReplyDelete
  30. जल ही जीवन है ,,,विन जल सब सून..रोचक और प्रेरक आलेख...सस्नेह..

    ReplyDelete
  31. आदरणीय पांडे जी ,सारगर्भित विचारपरक लेख के लिए धन्यवाद / पानी का इतिहास ही जीव का इतहास है ,संस्कृति का इतिहास है भारतीय उपमहाद्वीप में ही नहीं अपीतु भूमंडल में नदियाँ ही संस्कृतियों की जननी हैं .....बदलते भौगोलिक परिदृश्यों ने विभिन्न भूखंडों ,सागरों ,नदियों का निर्माण किया ....कितनी धाराएँ विस्थापित हुयीं कितनी तिरोहित हो गयीं ... प्रश्न अब पानी का है / माननीय ए बी बाचापई जी ने कहा है -"अगला विश्व युद्ध पानी के लिए लड़ा जायेगा ," जो सत्य प्रतीत होता है ...... अब तलाश करनी है सोतों की ,सरश्वती की .....कहीं देर न हो जाये ......." रहिमन पानी रखिये ,बिन पानी सब सुन ...... सार्थक ,सरोकारी लेख के लिए साधुवाद जी /

    ReplyDelete
  32. आग (विश्वयुद्ध की) पानी से ही निकलेगी.
    शायद दिन दूर नहीं
    रोचक और जानकारी भरा आलेख

    ReplyDelete
  33. एक एहम शोध पात्र है यह आलेख .संक्षिप्त और सुन्दर .सांस्कृतिक इतिहासिक परिप्रेक्ष्य को समेटे हुए अपने लघु कलेवर में .शुक्रिया आपका इसे सांझा करने के लिए .मुंबई मेरी जान का छटा और अंतिम भाग शीघ्र प्रकाश्य .आभार . भी पधारें -
    ram ram bhai
    मंगलवार, 22 मई 2012
    :रेड मीट और मख्खन डट के खाओ अल्जाइ -मर्स का जोखिम बढ़ाओ
    http://veerubhai1947.blogspot.in/
    और यहाँ भी -
    स्वागत बिधान बरुआ :आमंत्रित करता है लोकमान्य तिलक महापालिका सर्व -साधारण रुग्णालय शीयन ,मुंबई ,बिधान बरुआ साहब को जो अपनी सेक्स चेंज सर्जरी के लिए पैसे की तंगी से जूझ रहें हैं .
    http://kabirakhadabazarmein.blogspot.in/

    ReplyDelete
  34. एक एहम शोध पात्र है यह आलेख .संक्षिप्त और सुन्दर .सांस्कृतिक इतिहासिक परिप्रेक्ष्य को समेटे हुए अपने लघु कलेवर में .शुक्रिया आपका इसे सांझा करने के लिए .मुंबई मेरी जान का छटा और अंतिम भाग शीघ्र प्रकाश्य .आभार . भी पधारें -ये है बोम्बे मेरी जान (अंतिम भाग )

    http://kabirakhadabazarmein.blogspot.in/2012/05/drug-dilemma.html/ram ram bhai
    मंगलवार, 22 मई 2012
    :रेड मीट और मख्खन डट के खाओ अल्जाइ -मर्स का जोखिम बढ़ाओ
    http://veerubhai1947.blogspot.in/
    और यहाँ भी -
    स्वागत बिधान बरुआ :आमंत्रित करता है लोकमान्य तिलक महापालिका सर्व -साधारण रुग्णालय शीयन ,मुंबई ,बिधान बरुआ साहब को जो अपनी सेक्स चेंज सर्जरी के लिए पैसे की तंगी से जूझ रहें हैं .
    http://kabirakhadabazarmein.blogspot.in/

    ReplyDelete
  35. Its an awesome write up..
    history, geography n polity... u included everything.


    Infinite stories are merged in depths of river !!!

    ReplyDelete
  36. सदा नीरा नदियाँ इस देश की सांस्क्रतिक नव्ज़ से जुड़ीं हैं .नदियों को हमने अर्थ तंत्र को हांकने वालों की रखैल बनाके छोड़ दिया है .जन जीवन में व्याप्त मान्यताएं अंध विश्वास एक तरफ और उद्योगिक अपशिष्ट को बिना निथारे बहाना एक तरफ .नदियों की परिशोधन क्षमता कब की चुक चुकी है .गंगा जल में कीड़ें हैं (E-coli ) .नदी नाले न जाओ श्याम पैयां पडूं .गोपियों ने अनागत को बहुत पहले देख लिया था .कृपया यहाँ भी पधारें -
    स्वागत बिधान बरुआ :
    स्वागत बिधान बरुआ :आमंत्रित करता है लोकमान्य तिलक महापालिका सर्व -साधारण रुग्णालय शीयन ,मुंबई ,बिधान बरुआ साहब को जो अपनी सेक्स चेंज सर्जरी के लिए पैसे की तंगी से जूझ रहें हैं .
    http://kabirakhadabazarmein.blogspot.in/और यहाँ भी ज़नाब -
    ये है बोम्बे मेरी जान (अंतिम भाग )
    http://kabirakhadabazarmein.blogspot.in/2012/05/drug-dilemma.html

    मंगलवार, 22 मई 2012
    :रेड मीट और मख्खन डट के खाओ अल्जाइ -मर्स का जोखिम बढ़ाओ
    http://veerubhai1947.blogspot.in/

    ReplyDelete
  37. सार्थक चिंतन, इसी तरह की एक पोस्‍ट पहले भी शायद यहां आ चुकी है.

    ReplyDelete
  38. बेहतरीन और वैज्ञानिक जानकारी शेयर करने के लिए आभार |

    ReplyDelete
  39. मुग्ध भी कर दिया आपके इस आलेख ने और सोचने को विवश भी|

    ReplyDelete
  40. इन खोजों ने सरस्वती के पुराने पाट को पुनः उपयोग में लाकर हिमालय का पानी राजस्थान में लाने का आधार दिया है। सतलज और यमुना के पानी को पहले भूमिगत जल भरने में और उसके बाद सरस्वती को पुनः जीवित करने की विशाल योजना है।

    फिर से सरस्वती नदी राजस्थान में हरियाली लाये .... यही कामना है ... अंग्रेजों ने हमारे इतिहास को अपनी सुविधा के लिए बहुत तोड़ा मरोड़ा है .... बहुत अच्छा लेख जानकारी से भरा हुआ ... आभार

    ReplyDelete
  41. महत्वपूर्ण व तथ्यात्मक लेख।

    ReplyDelete
  42. बेहतरीन लेख ,नदियाँ हमारे इतिहास और भविष्य दोनों से जुड़ी हैं..... इन्हें सहेजने के प्रयास ज़रूरी हैं......

    ReplyDelete
  43. वाह बहुत सारी नई जानकारियाँ पढ़ने को मिली, लगभग अब यही हाल क्षिप्रा नदी का है जो कि उज्जैन में है, क्षिप्रा का अर्थ जो कि पुराणों में उद्घृत है - "ब्रह्मांड में सबसे तेज बहने वाली नदी", परंतु आज यह हालत है कि जब बड़ा नहान होता है तो गंभीर नदी से पानी क्षिप्रा नदी में छोड़ दिया जाता है और क्षिप्रा के घाटों पर छोटे छोटे डेम बनाकर उस पानी को रोका जाता है। यह सब दुर्भाग्य नहीं तो और क्या है।

    ReplyDelete
  44. बहुत उम्दा आलेख,,,

    ReplyDelete
  45. प्रवीण जी वैसे तो आपके सभी आलेख बेहतरीन होते हैं किन्तु इस आलेख ने बहुत ही अधिक प्रभावित किया यह आलेख जो आपकी खोज और मेहनत का नतीजा है बहुत कुछ ज्ञान बाँट रहा है इसके लिए आपको कोटिश आभार

    ReplyDelete
  46. सुनते हैं अगला विश्वयुद्ध पानी पे पीछे ही होने वाला है ...
    पानी शायद साक्षी बन्ने वाला है इस महाविनाश का ...

    ReplyDelete
  47. आप के लेख से बहुत कुछ सीखने ,समझने और जानने को मिलता है ......
    तो लेख पे हम जैसों की टिप्पणी का क्या ??
    शुभकमनाए १

    ReplyDelete
  48. बहुत सारगर्भित और विचारणीय आलेख...

    ReplyDelete
  49. पानी के इतिहास की जानकारी के लिए बहुत -बहुत धनयवाद

    ReplyDelete
  50. बिन पानी सब सून ....तब क्या होगा !
    आज रात को शायद ही नींद आया , आपने क्या क्या याद दिला दिया !

    ReplyDelete
  51. नदियों के किनारे जन्मी सभ्यताएं और मैली होती नदियाँ..

    ReplyDelete
  52. बहुत बढ़िया जानकारी परख आलेख प्रवीण जी आभार...शिखा जी कि बात से सहमत हूँ।

    ReplyDelete
  53. इन खोजों ने सरस्वती के पुराने पाट को पुनः उपयोग में लाकर हिमालय का पानी राजस्थान में लाने का आधार दिया है। सतलज और यमुना के पानी को पहले भूमिगत जल भरने में और उसके बाद सरस्वती को पुनः जीवित करने की विशाल योजना है। राजस्थान की धरती सरस्वती के जल से सरसवती हो पायेगी या नहीं, कच्छ का रन अपने श्वेत विस्तृत क्षेत्र पर हिमालय का जल देख पायेगा या नहीं, सरस्वती के सूखने के बाद दोनों ओर पलायन कर गयी जनसंख्या संस्कृति की सततता उत्पन्न कर पायेगी या नहीं, यह प्रश्न भविष्य बतलायेगा। पर इन खोजों ने एक घृणित असत्य को सहसा आवरणहीन कर दिया है।
    काश ऐसा हो पाए .दिवा स्वप्न न रह जाए .मुझे लगता है पानी इस देश का ही उतर चुका है पेट्रोल से ज्यादा महंगा बिकेगा कल .देख लेना .कृपया यहाँ भी पधारें -
    बेवफाई भी बनती है दिल के दौरों की वजह . http://kabirakhadabazarmein.blogspot.in/

    ReplyDelete
  54. रहिमन पानी राखिए बिन पानी सब सून।
    रोचक व ज्ञानवर्धक जानकारी।

    ReplyDelete
  55. काश सरस्वती पुनः बहने लगे, कहीं भी बहे स्वच्छ जल का एक और स्त्रोत भारतीयों को उपलब्ध हो इससे बडी बात और क्या होगी । अन्यथा तो पानी बिना सब सून हो जायेगा ।

    ReplyDelete
  56. aaj bahut hi vistaar se paani ka sampurn itihaas aapke lekh se mila .kafi rochak v prerak bhi----
    poonam

    ReplyDelete
  57. राजस्थान में सरस्वती नदी के पानी के विशाल भंडार खोजने के बाद भी सरकार उस पानी का दोहन करने के लिए कोई आधारभूत साधन नहीं जुटा पाई|
    जबकि वही पानी आगे पाकिस्तान में जाता है और वहां के उस क्ष्रेत्र में नलकूपों से इस पानी का दोहन कर सिंचाई कर कृषि कार्य किया जा रहा है| जबकि हमारे यहाँ जिस भूगर्भ से होते हुए यह इस नदी की भूगर्भीय धारा बह रही है वहां सिंचाई के लिए बिजली नहीं है यदि सरकार उस क्षेत्र को पर्याप्त बिजली आपूति करदे तो किसान अपने आप नलकूप लगाकर उस पानी के दोहन से कृषि पैदावार बढ़ा कर उसका उपयोग कर सकते है|

    ReplyDelete
  58. नदियाँ हमारी प्राण वाहिनी रही हैं ०सरस्वती का लोप आज भी एक पहेली ही है ...
    विचारपूर्ण विचारोत्तेजक !

    ReplyDelete
  59. बेहतरीन जानकारी सरस्वती नदी के बारे में..
    जल ही जीवन है और नदियाँ हमारे जीवन का भूत, वर्त्तमान और भविष्य!
    बहुत अच्छा लगा यह पोस्ट पढ़ कर..

    ReplyDelete
  60. वर्षा की पहली फुहार की भांति शीतलता का अहसास करा गया आपका यह सारगर्भित आलेख ।

    ReplyDelete
  61. यह तो आशा का समन्‍दर जगा देनेवाला, संग्रहणीय आलेख है। बार-बार पढने लायक। आज की सुबह बहुत ही अच्‍छी हुई।

    ReplyDelete
  62. अत्यंत रोचक! महत्वपूर्ण है नदियों को बचाना वरना काहे की सभ्यता?

    ReplyDelete
  63. जबसे खून पानी की तरह बहने लगा है तो भला इन विलुप्त होती नदियों के बारे में कोई क्यों सोचे ? चाहे सभ्यता या संस्कृति पुन : नष्ट क्यों न हो जाए..

    ReplyDelete
  64. नदियां सदा ही सभ्यताओं की पोषक रही हैं, आज सभ्यताओं पर नदियों के पोषण की ज़िम्मेदारी है...
    बड़ा ही शोधपूर्ण आलेख....
    सादर।

    ReplyDelete
  65. Jal hii jeevan hai, aur nadiya hii jal dene waali hain, isliye nadiya hii jeevan hain. aapne kaafi mehnat kii hai is lekh ke liye.bahut achcha.

    ReplyDelete
  66. खोजपरक लेख है और अपने इतिहास की गौरान्वित गाथा

    ReplyDelete
  67. बेहतरीन पोस्ट।

    नदियाँ लुप्त हो रही हैं, पानी कम होता जा रहा है।

    ReplyDelete