30.11.13

क्या बोलूँ मैं

मैं,
बैठकर आनन्द से,
वाद के विवाद से,
उमड़ते अनुनाद से,
ज्ञान को सुलझा रहा हूँ,

सीखता हूँ,
सीखने की लालसा है,
व्यस्तता है इसी की,
और कारण भी यही,
कुछ बोल नहीं पा रहा हूँ । 

27.11.13

मेरे विचार

बहुधा विचार टकरा जाते हैं,
मनस पटल पर आ जाते हैं ।
नहीं जानता किन स्रोतों से,
किस प्रकार के अनुरोधों से,
आवश्यक वे हो जाते हैं,
अवलोकन का प्रश्न उठाते,
चिन्तन पथ पर बढ़ जाते हैं ।।१।।

कभी कभी उद्वेलित करते,
उत्साहों से प्रेरित करते ।
कुछ झिंझोड़ते, मन निचोड़ते,
और कभी मन बहलाते हैं ।
अपनी अपनी छाप छोड़ सब,
आते और चले जाते हैं ।।२।।

शायद मेरा सार छुपा था,
जीवन का आकार छुपा था ।
अभी कहीं वे जीवित होंगे,
अनुपस्थित जो हो जाते हैं ।
आने के अनुकूल समय में,
आयेंगे जो अति भाते हैं ।।३।।

दुख में घावों को सहलाने,
मन का सारा क्लेष मिटाने ।
लाकर अद्भुत शान्ति हृदय को,
चुपके से पहुँचा जाते हैं ।
सुन्दरता से तार छेड़ने,
बिन बुलाये ही आ जाते हैं ।।४।।

23.11.13

अपरिग्रह - जन्मों का

आपने अनावश्यक वस्तुओं का त्याग कर दिया। आप उससे एक स्तर और ऊपर चले गये, आपके अस्तित्व ने अपना केन्द्र अपनी आत्मा तक सीमित कर लिया। किन्तु क्या ऐसा करने से आपका अपरिग्रह पूर्ण हो गया, क्या सिद्धान्त वहीं पर रुक जाता है, क्या वहीं पर अध्यात्म अपने निष्कर्ष पा गया?

पूर्णतः नहीं। शरीर तो रहेगा, मन भी रहेगा। शरीर की आवश्यकतायें आप चिन्तनपूर्ण जीवनशैली के माध्यम से कम कर सकते हैं, पर मन का क्या? पतंजलि योगसूत्र का दूसरा सूत्र ही कहता है, योगः चित्तवृत्ति निरोधः, योग चित्त की वृत्ति का निरोध है। मन को कैसे सम्हालें, अर्जुन तक को मन चंचल लगा, जो बलपूर्वक खींच कर बहा ले जाता है। अब कौन याद दिलाये कि मन भटक रहा है, क्योंकि याद दिलाने का ऊपर उत्तरदायित्व तो मन ने ही उठा रखा था। अब वही घूमने चला गया तो कौन याद दिलायेगा?

मन जिस समय जो सोचता है, हम उस समय वही हो जाते हैं। शरीर भले ही किसी बैठक में हो, पर मन किसी दूसरे ही उपक्रम में लगा रहता है। यदि सड़क में चलता व्यक्ति मन में घर के बारे में सोच रहा होता है, तो वह मानसिक रूप से घर में ही होता है। इस तरह देखा जाये तो मन के माध्यम से न जाने हम कितने जन्म जी लेते हैं, वर्तमान में ही रहते हुये ही भूत में घूम आते हैं, भविष्य में घूम आते हैं।

विवाह किये हुये लोगों में एक भयमिश्रित उत्सुकता रहती है कि सात जन्म साथ रहने वाला सत्य क्या है? क्या प्रेम की प्रासंगिकता सात जन्म तक ही सीमित रहती है? क्या सात जन्मों के बाद पुनर्विचार याचिका स्वीकार की जा सकती है? ऐसे ही न जाने कितने प्रश्न उमड़ते है, प्रसन्न व्यक्ति को लगता है कि सात जन्म भी कम हैं, दुखी मानुषों को लगता है कि ईश्वर करे, यही सातवाँ जन्म हो जाये।

देखा जाये तो जन्म का अर्थ है अस्तित्व, अपने मन की भ्रमणशील प्रकृति के कारण हम एक शरीर में रहते हुये भी भिन्न भिन्न अस्तित्वों में जीते हैं। रोचक तथ्य यह है कि ये अस्तित्व भी सात ही होते हैं। इन अस्तित्वों को समझ लेने से विवाह के सात जन्मों की उत्कण्ठा शमित हो जायेगी, अपरिग्रह की जन्म आधारित विमा भी समझ आ जायेगी, कर्म और कर्मफल का रहस्य स्पष्ट होगा और साथ ही प्राप्त होगा वर्तमान में पूर्णता से जीने के आनन्द का रहस्य।

ये सात जन्म है, विशु्द्ध भूत, विशुद्ध भविष्य, भूत आरोपित भविष्य, भविष्य आरोपित भूत, भूत और भविष्य उद्वेलित वर्तमान, विशु्द्ध वर्तमान, विशुद्ध अस्तित्व।

विगत स्मृतियों में डूबना विशुद्ध भूत है, आगत की मानसिक संरचना विशुद्ध भविष्य है। भूत में प्राप्त अनुभवों के आधार पर भविष्य का निर्धारण भूत आरोपित भविष्य है। इसमें हम सुखों की परिभाषायें बनाते हैं और भविष्य को उसी राह में देखते हैं। अनुभव जैसे जैसे बढ़ते जाते हैं, भविष्य की संरचना परिवर्तित होती जाती है। भविष्य की छवि के आधार पर भूत का पुनर्मूल्यांकन भविष्य आरोपित भूत है। हो सकता है कि बचपन में हमें खिलौने, पुस्तक और मिठाई एक जैसे ही अच्छे लगते हों, पर यदि भविष्य में हमने स्वयं को महाविद्वान के रूप में देखते हैं तो भूत में प्राप्त अनुभवों को उसी अनुसार वरीयता देते हैं। तब हम बचपन में पढ़ी पुस्तकों को अधिक वरीयता देकर अपने भूत को पुनर्परिभाषित करने लगेंगे।

हो सकता है कि मन वर्तमान में हो, पर भूत में प्राप्त अनुभवों को जीना चाहता है या भविष्य की आकांक्षाओं में लगना चाहता हो, तो वह भूत और भविष्य आरोपित वर्तमान कहलायेगा। इस स्थिति में हम वर्तमान को अपूर्ण मानते रहते हैं और भूत या भविष्य से प्रभावित बने रहते हैं। विशुद्ध वर्तमान के अस्तित्व में हम परिवेश में घटने वाली घटनाओं से परिचित रहते हैं और उन पर ध्यान देते हैं। विशुद्ध अस्तित्व में हम वर्तमान के भाग न बनकर अपने भिन्न अस्तित्व का अनुभव करते हैं, वर्तमान में अपना अस्तित्व देखते हैं। विशुद्ध अस्तित्व पूर्णतः आध्यात्मिक अवस्था है।

कभी किसी का ध्यान न लग रहा हो तो उससे पूछिये कि क्या सोच रहे थे, इससे आपको ज्ञात हो जायेगा कि वह किस जन्म में जी रहा है। हम नब्बे प्रतिशत अधिक समय तो वर्तमान में रहते ही नहीं है, या भूत आरोपित रहते हैं, या भविष्य आरोपित रहते हैं। मन को भटकना अच्छा लगता है, सो भटकते रहते हैं।

वर्तमान में न जीने से हम न जाने कितना आनन्द खो देते हैं। हमारे सामने हमारे बच्चा कुछ प्यारी सी बात बता रहा है और हम मन में किसी से हुये मन मुटाव के बारे में सोच रहे हैं और उद्वेलित हैं। वर्तमान में होते हुये भी हम न जाने किसी और स्थान पर रहते हैं, विचारों के बवंडर से घिरे रहते हैं। अपरिग्रह का पक्ष यह भी है कि अन्य जन्मों का त्याग कर वर्तमान में ही जिया जाये, वर्तमान का आनन्द लिया जाये, अस्तित्व के हल्केपन में उड़ा जाये। शेष जन्मों को लादे रहने का क्या लाभ। भूत और भविष्य पर चिन्तन आवश्यक है, भूत से सीखने के लिये, भविष्य गढ़ने के लिये, पर वर्तमान को तज कर नहीं और न ही आवश्यकता से अधिक।

वर्तमान को जीना ही होता है, हम उससे भाग नहीं सकते हैं। वर्तमान का जो क्षण हमारे सामने उपस्थित है, उसे हमें पूर्ण करना है, उसका पालन करना है। ऐसा नहीं करने से वह हमारे ऊपर ऋण सा बना रहेगा, कल कभी न कभी हमें उसे जीना ही होगा, स्मृति के रूप में, समस्या के रूप में, विकृति के रूप में, और तब हम उस समय के वर्तमान को नहीं जी रहे होंगे। वर्तमान को वर्तमान में न जीने के इस व्यवहार के कारण हम जन्मों का बोझ उठाये फिरते रहते हैं, अतृप्त, अपूर्ण, उलझे।

मेरे लिये यही सात जन्मों का सिद्धान्त है, यही कर्मफल का सिद्धान्त है, यही अपरिग्रह के सिद्धान्त की पूर्णता है, यही आनन्द और मुक्त भाव से जीने का सिद्ध मार्ग है। चलिये वर्तमान में ही जीते हैं, पूर्णता से जीते हैं।

20.11.13

अपरिग्रह - अध्यात्म विधा

अपरिग्रह का व्यवहारिक पक्ष सबको ज्ञात है। आवश्यकतानुसार उपयोग न केवल संसाधन की उपलब्धता बनाने में सहायक रहता है, वरन स्वयं को भी अनावश्यक संग्रह और आसक्ति से दूर रखता है। इसके अतिरिक्त अपरिग्रह का क्या कोई और पक्ष है?

मूलभूत सिद्धान्तों का एक गुण होता है, आप जहाँ पर भी उन्हें प्रयुक्त करें, निष्कर्षों में भेद नहीं रहता है। अपरिग्रह भी ऐसे ही सिद्धान्तों में से एक है। आप जहाँ पर भी इसे प्रयुक्त करेंगे, जितने समय के लिये प्रयुक्त करेंगे, उसी अनुपात में आपको संतुष्टि और आनन्द मिलेगा। अपरिग्रह का सौन्दर्य यह भी है कि मूलरूप से यह एक आध्यात्मिक सिद्धान्त है और उसका भौतिक जगत में प्रक्षेपण इतना उपयोगी है कि हम उसी में संतुष्ट हो लेते हैं, उसे उसके मौलिक स्वरूप में देखने का प्रयत्न नहीं करते हैं।

जैन धर्म के पाँच मूल सिद्धान्तों में एक, अपरिग्रह का सिद्धान्त जैन सन्तों की जीवनशैली में रचा बसा है। उनके जीवन का अवलोकन ही इस सिद्धान्त की महत्कथा कह जाता है। अपने जीवन में जितना संभव हो सका, अपरिग्रह के अनुपालन की संतुष्टि पा रहा हूँ। गहरे उतरने के व्यवहारिक पक्षों की बाधायें सम्मुख हैं। सैद्धान्तिक रूप से अपरिग्रह के बारे में और जानने की इच्छा उन सूत्रों तक ले गयी जहाँ पर इन्हें मूलतः परिभाषित किया गया है।

आश्चर्यचकित रह गया जब पतंजलि योग सूत्र के साधनपाद में यम नियम के बारे में पढ़ते समय अपरिग्रह का महत्व सूत्रबद्ध दिखा। सहसा लगा कि अपरिग्रह का सिद्धान्त एक गूढ़ अध्यात्म विधा है। सूत्र २.३९ इस प्रकार है। अपरिग्रह स्थैर्ये जन्मकथन्ता सम्बोधः - अपरिग्रह की स्थिरता में जन्म के कैसेपन का साक्षात होता है। अर्थात अपरिग्रह के अभ्यास से आप अपने भूत, वर्तमान और भविष्य के जन्मों को देख सकते हैं, संभावित अस्तित्वों को समझ सकते हैं।

वैसे तो यह सच है कि सिद्धान्त समझने और विकसित होने में समय भी लगता है और समझ भी, पर अपरिग्रह का यह अर्थ न कभी समझा था और न ही कभी सुना था। आवश्यकतानुसार ही उपयोग करने का मन्त्र कैसे ऐसी अलौकिक दृष्टि दे देगा कि आप अपने भूत और भविष्य में झाँक पायेंगे। यदि पंतजलि योगसूत्र पढ़ने का प्रारम्भिक समय होता तो संभवतः इस सूत्र को रहस्यवाद मान कर आगे बढ़ गया होता, पर जिस गूढ़ता से पतंजलि ने सूत्र गढ़ने की कला प्रदर्शित की है, इस रहस्य पर विचार न करना अपनी मूढ़ता का ही परिचायक होता। पतंजलि ने निश्चय ही कोई न कोई गूढ़ सिद्धांत इस सूत्र के माध्यम से व्यक्त किया है।

इस सूत्र पर केन्द्रित कई व्याख्यानों को सुना, कई अध्यायों को पढ़ा, तब कहीं जाकर इस सिद्धान्त की परिधि पर पहुँच पाया। जितना सुना, जितना पढ़ा, उतना ही रोचक होता गया अपरिग्रह का सिद्धान्त।

क्या परिग्रह है, उसे निर्धारित करने के लिये परिधि को समझना होगा। परिधि को समझने के लिये केन्द्र को जानना होगा। केन्द्र के चारो ओर जो भी हो, उसे परिधि से परिभाषित किया जा सकता है। जब तक मैं केन्द्र में शरीर को मानकर विषय को समझ रहा था, अपरिग्रह के व्यावहारिक पक्ष तक ही सीमित था, कपड़े और अन्य वस्तुओं तक ही। पतंजलि के इस सूत्र की व्याख्या सुनी तो समझ गया कि मुझे इस विषय के तल में जाने के लिये अपना केन्द्र पुनर्परिभाषित करना होगा, यदि ऐसा न करता तो सूत्र की पूरी व्याख्या नहीं जान पाता।

भारतीय दर्शन के संदर्भों में, वासांसि जीर्णानि यथा विहाय के संदर्भों में, शरीर भी परिधि ही है। परिवर्तनशील शरीर को केन्द्र कभी नहीं माना गया, जिस तरह हम कपड़े बदलते हैं, उसी प्रकार आत्मा भी शरीर बदलती है। केन्द्र में सदा ही आत्मा रही है, न मन, न बुद्धि, न शरीर।

अपरिग्रह के सिद्धान्त की गहराई केन्द्र निर्धारित करते ही दृष्टिगत होने लगती है। आत्म के अतिरिक्त शेष को अपना न मानने का भाव ही अपरिग्रह का आध्यात्मिक पक्ष है। स्वयं को शरीर या मन मानने के क्रम में हम स्वयं को परिधि में परिधि में स्थापित कर लेते हैं और जब कालचक्र चलता है तो हम परिधि पर आने वाले बलाक्षेप से जूझने में लगे रहते हैं, संभवतः इसी संघर्ष को मर्मज्ञ कालचक्र के गतिमय प्रवाह से परिभाषित करते हैं। प्रकृति के कालचक्र से बचना है तो केन्द्र की ओर बढ़ते रहना ही श्रेयस्कर है क्योंकि केन्द्र में ही बल का प्रक्षेप शून्य होता है।

शरीर नहीं त्यागना होता है, मन भी नहीं त्यागना होता है, यदि अपरिग्रह के हेतु कुछ त्यागना होता है तो वह है स्वयं के शरीर या मन होने के भाव का। शरीर, मन, स्मृतियाँ, भय, सब के सब मिलकर एक ऐसा विश्व निर्मित कर देते हैं कि हम उसमें उलझे रहते हैं, उसके पार कुछ भी नहीं देख पाते हैं, कुछ भी नहीं समझ पाते हैं। जब यह सब भाव छटता है, जन्म और उसके कारण, भूत-भविष्य और उसके विस्तार, सब के सब स्वतः ही समझ आने लगते हैं। निश्चय ही पतंजलि के लिये अपरिग्रह की यही अवधारणा रही होगी।

अपरिग्रह का प्रारम्भ उस बिन्दु से होता है जब हम सोचते हैं कि कोई वस्तु या व्यक्ति हमें सुख दे सकता है। किन्तु जब अन्यथा निष्कर्ष देखने को मिलता है तो धीरे धीरे हम अपनी खोखली आश्रयता को तिलांजलि देने लगते हैं। आनन्द की सततता जब फिर भी सुनिश्चित नहीं होती है, तो हम सिद्धान्त की सीमायें बनाने लगते हैं और उससे परे दूसरे सिद्धान्त सोचने लगते हैं, वर्तमान सिद्धान्त पर संशय करने लगते हैं। पतंजलि का यह सूत्र अपरिग्रह के सिद्धान्त को उसके उत्कर्ष पर न केवल स्थापित करता है, वरन उसे अध्यात्म का मूलमन्त्र भी बना देता है।

अपरिग्रह का सिद्धान्त पतंजलि से अच्छा न कोई समझ सकता है, न कोई समझा सकता है। वर्णित सूत्र स्वयं में ही अपरिग्रह के जीवन्त उदाहरण हैं। ज्ञान के विस्तार को इस तरह से प्रस्तुत करना कि कोई भी शब्द अनावश्यक न हो और कोई भी अर्थ छूटा न हो। योगसूत्र की रचना अपरिग्रह के सिद्धान्त का ही मूर्त स्वरूप है, आकार में भी, विषय में भी। अपरिग्रह की यह अध्यात्म विधा, इस सिद्धान्त को मानव अस्तित्व के मौलिकतम सिद्धान्तों में स्थापित करती है।

16.11.13

अपरिग्रह - अधिकार क्षेत्र

महेन्द्र से हुयी कपड़ों के बारे में चर्चा विचारों के गहरे बीजरूप लिये थी। धीरे धीरे संबंधित सारे उदाहरण, उपदेश, आदेश, सलाह, अनुभव आदि सब एक सहज रूप में संघनित होने लगे। कहते हैं, जब वातावरण उपयुक्त होता है, विश्वभर से एकत्र हुआ बादलों का जल एक साथ ही बरस जाता है।

अपरिग्रह का यह आचरण हमारी संस्कृति की विचार तन्तुओं में गुणसूत्र बन कर विद्यमान है। साधु सन्तों की सारे देश में मुक्तहस्त विचरण करने की पद्धति में अपरिग्रह पर उनका विश्वास अनन्त है, उनका विश्वास कि जहाँ वे जायेंगे, प्रकृति उनका ध्यान रखेगी, जितना प्रकृति या समाज उन्हें पोषित करेगा, उतने में वे प्रसन्न रह लेंगे। उनके ज्ञानभरे उपदेशों ने जहाँ एक ओर गृहस्थों को अभिसिंचित किया होगा, वहीं दूसरी ओर उनके आनन्द भरे भावों से गृहस्थ सशंकित भी हुये होंगे, कहीं ऐसा न हो कि उनके पुत्र इस अपरिग्रह से प्रभावित हो, घर छोड़ सन्यासी न बन जायें।

निश्चय ही अभी निर्धनता हमारे देश की मूल पीड़ा है, लोग संख्याओं और आश्वासनों से उसे पुष्ट करने में लगे हैं, उपचार के नित नये साधन खोजे जा रहे हैं। उन पर अपरिग्रह एक विकल्प नहीं, वरन जकड़ी हुयी विवशता है। जहाँ जीने के संसाधन ही न हों, वहाँ कोई कैसे विचारों की सूक्ष्मता को पल्लवित कर सकेगा। पर जब स्थितियाँ अच्छी थी, जब देश में कोई भिखारी नहीं था, जब देश में आर्थिक संपन्नता थी, तब भी अपरिग्रह समाज में एक सम्माननीय गुण था, लोग स्वेच्छा से अपनी आवश्यकताओं को कम करके जीने में सुख और गर्व का अनुभव करते थे। समाज का स्वरूप क्षतिग्रस्त हुआ है पर अपरिग्रह उसके मूल में बना हुआ है।

ऐसा भी नहीं है कि केवल भारतीय जनमानस इस गुण को स्वीकारता हो, अपरिग्रह पतंजलि योग सूत्र में यम के रूप में है, जैन के पाँच सिद्धान्तों में एक है, बौद्ध में जेन के रूप में विद्यमान है। पाश्चात्य समाज इसके विविध रूपों से प्रभावित भी है और उसे अन्य रूपों में अपनाता भी है।

पश्चिमी जगत में संसाधनों की अधिकता से वहाँ के विचारशील युवाओं का मोहभंग हुआ है। वस्तुओं में सुख ढूढ़ने की मानसिकता ने घरों को संग्रहालय बना दिया है, इतना अधिक संग्रह कि घरों का आकार भी बढ़ने लगा। आकार व विस्तार बढ़ने पर भी वांछित सुख अनुपस्थित रहा और विडम्बना यह रही कि वस्तुओं की अधिकता दुखमयी प्रभाव लेकर आयी। इस तथ्य को समझने की क्षमता रखने वाले विवेकशील युवाओं ने मिनिमिलस्टिक लाइफ स्टाइल के नाम से जीवनशैली विकसित की। केवल उतनी ही वस्तुयें रखना जितनी नितान्त आवश्यक हों। वैज्ञानिक प्रगति और केन्द्रित दृष्टिकोण ने कई ऐसे उपाय निकाले कि बिना कार्यशैली व कार्यक्षमता प्रभावित किये एक ऐसी जीवनशैली निर्मित हुयी जिसमें अपरिग्रह केन्द्र में रहा। प्रत्येक संचय पर प्रश्न और कुछ भी नया जुटाने के पहले निर्मम प्रश्नावली, यह उनकी प्रमुख क्रियान्वयन विधि है।

जब परिवेश में सब संचयी मानसिकता से ग्रस्त हों तो आपकी अपरिग्रही मानसिकता पर असामान्य होने के आक्षेप लगेंगे, स्वाभाविक भी है। वस्तुयें कम करने को जीवन को बाधित स्वरूप में जीने से देखा जाने लगता है, कहा जाता है कि आप कृपणता से भरे हैं। यह सब आक्षेप सहने के बाद भी उनका उत्साह कम नहीं हुआ है। अपरिग्रह के बाद उनके जीवन में आये आनन्दमयी बदलाव ने उन्हें अन्यथा आक्षेप झेलने की सहनशीलता दी।

अपरिग्रह और कृपणता में कोई संबंध नहीं, कृपण मन से वस्तुओं और साधनों के प्रति आसक्ति बनाये रखता है, पर संचित धन को ही संचित सुख मानकर उसे वैसे ही धरे रहने की प्रवृत्ति उस धन को व्यय नहीं होने देती है। अपरिग्रह में व्यक्ति अपनी आवश्यकतायें के अनुरूप साधन तो जुटाकर रखता है पर धीरे धीरे अपनी आवश्यकतायें समझता और सीमित करता भी चलता है।

तब क्या अपरिग्रही अपनी आवश्यकता कम करने के प्रयास में अपने जीवन की गुणवत्ता से समझौता कर बैठता है? यह भी एक आक्षेप है जो बहुधा लगता रहता है। इसका उत्तर भी नकारात्मक है और इसे आधुनिक परिप्रेक्ष्य में सरल उदाहरण से समझा जा सकता है। पहले हमें घड़ी, रेडियो, कैमरा आदि वस्तुओं की आवश्यकता होती थी पर अब मोबाइल आ जाने से उनकी आवश्यकता नहीं रह गयी हैं। अपरिग्रही का आधुनिकता और तकनीक से भी कोई विरोध नहीं हैं, ये सब तो वाह्य साधन हैं, जीवन को क्या चाहिये, उसे समझने में और उसे कम से कम रखने में तकनीक सहयोगी होती है तो वह भी स्वीकार्य और स्वागतयोग्य हो। अपरिग्रह का अर्थ विकास के पथ पर पिछड़ जाना नहीं है। कई उदाहरण हैं, जिसमें तकनीक का उपयोग कर कई वस्तुओं के स्थान पर एक वस्तु से ही कार्य चलाया जा सकता है। क्यों न हम उनका उपयोग कर पुरातन विचार धारा को आधुनिकतम स्वरूप दें, क्यों न हम तकनीक के सन्त बनें।

न वाह्य कारकों से विरोध हो, न ही विकास के मानकों से विरोध हो, न ही तकनीक से, न ही व्यापार से, न ही बाजार से, न किसी वाद से, न किसी संवाद से, जीवन में अपरिग्रह का प्रारम्भ तो स्वयं से साम्य स्थापित करने में हो जाता है। यदि स्वयं पर अधिक ध्यान देंगे, स्वयं को अधिक समझेंगे तो यह भी जानने का प्रयास करेंगे कि आत्म को क्या भाता है, वह क्या है जो सुख दे जाता है। अपरिग्रह न तो निर्धनता है, अपरिग्रह न तो कृपणता है, अपरिग्रह स्वयं को प्रकृति से जोड़े रखने का आश्वासन है, अपरिग्रह न्यूनतम आश्रय और अधिकतम आनन्द की राह है।

अपरिग्रह के अधिकार क्षेत्र में हम सभी बिराजे हैं, कितना कुछ लिपटाये और लटकाये बैठे हैं, कहीं भार बढ़ा तो टपक जायेंगे, समय के पहले, अपने विश्व से कहीं दूर, भीड़ भाड़ में, थके थके।

13.11.13

कपड़ों से ढका एक गुण

मेरे एक मित्र हैं, विद्यालय में सहपाठी रहे हैं, छात्रावास के साथी हैं, बहुत घनिष्ठ हैं, जैन मतावलम्बी हैं, कपड़ा व्यापारी हैं और मेरे वर्तमान के निवास से बहुत पास भी रहते हैं। मैं बंगलोर में और वे कोयम्बटूर में, वर्ष में कई बार मिलना भी होता है। बड़े मृदुभाषी हैं और मन में कुछ भी छिपा कर नहीं रखते हैं। लोकधारणा यह हो सकती है कि व्यापारी के लिये हृदय खोल कर रख देना, व्यवसाय के लिये एक सहायक गुण नहीं हो सकता है, पर वे इसके भी अपवाद हैं। पारदर्शिता और गुणवत्ता के सिद्धान्तों पर व्यापार करने से उनके साथ काम करने वालों को अपार भरोसा है उन पर। यही कारण रहा होगा कि जब भी उनसे कुछ भी बातचीत होती है, मन में एक स्वाभाविक स्नेह जग आता है। यही कारण रहा होगा कि उनसे मित्रता इतनी प्रगाढ़ है।

चरित्र चित्रण पर विशेष रूप से अधिक समय इसलिये दे रहा हूँ, जिससे हम दोनों के बीच हुये संवाद की सहजता और गूढ़ता समझने में सहायता हो पाठकों को। पार्श्व में क्या है, जीवन में किन बातों का महत्व है, व्यक्तित्व के ये पक्ष ज्ञात होने पर बहुधा संवादों को अन्यथा विकिरण से बचाया जा सकता है। संवादों को अर्थों की बहुलता के कोलाहल से बाहर लाकर स्पष्ट समझा जा सकता है। यही कारण रहा जिसने मित्र के बारे में इतना कुछ बताने पर विवश कर दिया।

प्रस्तुत विषयवस्तु के लिये इतना विस्तृत परिचय आवश्यक नहीं था, केवल नाम बता कर भी कार्य चल सकता था, यह बता कर कि उनका नाम महेन्द्र जैन है, विषय पर आया जा सकता था। महेन्द्र मेरे अत्यन्त प्रिय हैं, सहज हैं, अतः इतना परिचय स्वतः ही बह निकला।

घर पर बात चल रही थी, बात जीवन के कई सामान्य पथों से होते हुये इस बात पर आ गयी कि जीवन में आनन्दमय होकर जीने के लिये कितनी वस्तुओं की आवश्यकता है। बहुधा हम कुछ अधिक ही साधन जुटा लेते हैं, आवश्यकता से कहीं अधिक। सदा ही लगता है कि हम इतना कुछ जोड़ लेते हैं कि उपयोग में ही नहीं ला पाते हैं। यदि हमारी संग्रहण की यह प्रवृत्ति संयमित और नियमित हो जाये तो किसी भी संसाधन की कमी नहीं रहेगी, मानवमात्र के लिये।

आवश्यकता से अधिक न रखने को अपरिग्रह कहा जाता है। पर हम जिस स्तर पर बात कर रहे थे, वह उसका भौतिक प्रक्षेपण ही था। अपरिग्रह का आध्यात्मिक पक्ष बहुत ही गहरा है। उस विमा में तब तक अनावश्यक तजा जाता है, जब तक हम स्वयं ही रह जाये, अपने शुद्ध चिरंतन स्वरूप में।

मैंने कहा, देखो कैसा संयोग है कि तुम्हारा व्यवसाय कपड़े का है और मेरे लिये अपरिग्रह का प्रारम्भ कपड़े से ही होता है। पिताजी से सीखा एक गुण है, जब तक पुराना कपड़ा कई वर्ष चल न जाये, नया कपड़ा सिलवाते नहीं थे। एक वर्ष में एक भी कपड़ा नया आ जाये तो वह पर्याप्त रहता है, जीवनशैली में सहज लयमय हो जाता है। यद्यपि मेरे पास इतना धन तो है कि कई प्रकार के कपड़े सिलवा सकता हूँ, पर संस्कार में सीखा अपरिग्रह मन में स्थायी बस गया है। सीधा सरल पहनावा अच्छा लगता है, कोई ऐसा कपड़ा रखा ही नहीं जो वर्ष में एक या दो बार पहनने के लिये हो। हाँ, विवाह और प्रशिक्षण के समय दो सूट सिलवा दिये गये थे, उनमें से एक तो किसी को भेंट कर दिया और दूसरा अभी तक भारसम संचयों में जड़ा हुआ है।

तब क्या प्रशासनिक कार्यों में उससे असहजता नहीं आती है? महेन्द्र का प्रश्न सहज था। सरकारी तन्त्र के बारे में अधिक न जानने वालों के लिये यह प्रश्न स्वाभाविक भी है। हो सकता है कि कुछ लोग कार्य से अधिक कपड़े पर ध्यान देते हों, हो सकता है कि कुछ लोगों ने यह तथ्य जान लिया हो कि ५ शर्ट और दो तरह के पैन्ट पहन कर ही हम आते हैं, हो सकता है कि कार्यालय में मेरे नीरस ड्रेसिंग सेन्स पर चर्चा भी होती हों, पर आज तक किसी वरिष्ठ ने या अधीनस्थ ने इस बारे में टोका ही नहीं और न ही स्वयं मैने किसी के कपड़ों पर कभी ध्यान दिया। कभी ऐसा लगा ही नहीं कि मुझे तनिक और विविधता से भरे कपड़े पहन कर कार्यालय में जाना चाहिये। कपड़े स्वच्छ रहें, अपने रंग रूप के कारण किसी की आँखों न खटकें, उनके बारे में इससे अधिक विचार मन में आया ही नहीं।

घर में श्रीमतीजी भी जान चुकी हैं कि कपड़ों के संबंध में ये सुधरने वाले नहीं हैं, अधिक कपड़े भी लेंगे नहीं, अतः कपड़े जिस दिन भी गन्दे हों, उसके अगले दिन धुलवा कर और प्रेस करवा कर रखवा देती हैं। नया कपड़ा घर में तभी आता है, जब कोई पुराना कपड़ा किसी को दे देता हूँ।

समझ नहीं आ रहा था, पर सब महेन्द्र को बताये जा रहा था, मन में कोई बात रही होगी कि मेरी जीवनशैली महेन्द्र के व्यवसाय को पोषित नहीं करती है। आधुनिक व्यापार में तो माँग ही सब सुखों का प्रारम्भ बिन्दु है, बिना माँग के बाजार की प्रक्रिया आगे बढ़ती ही नहीं है। यदि यही उदाहरण रहा तो कपड़े की माँग कम हो जायेगी और उसका व्यापार प्रभावित भी होगा। यह मित्र के व्यवसाय और स्वयं के जीवनधारा में एक द्वन्द्व दृष्टिगत था। जब मन में कोई संघर्ष होता है तो शब्दों का रक्त अधिक बहता है, मैं बोले जा रहा था।

ऐसा नहीं हैं कि घर में सब लोग मेरी ही विचारधारा के हैं, पृथु निकटस्थ अनुगामी है और श्रीमतीजी प्रबल प्रतिद्वन्दी, देवला उन दोनों के बीच में आती है। नारियों को रंग भाते हैं, प्रकृति में जितने रंग हैं, सब के सब भाते हैं, नारी प्रकृति के निकटस्थ जो है। हर अवसर के लिये, हर स्थान के लिये उनके पास कपड़े हैं। संभवतः कपड़ों के प्रति उनके अगाध प्रेम ने मुझमें इतना वैराग्य उत्पन्न कर दिया हो। कम से कम देश के औसत से कहीं अधिक कपड़े मेरे घर में न आ जायें। यह हर घर में बहस का विषय हो सकता है कि कितने कपड़े पर्याप्त हों, विचार भिन्न भिन्न हो सकते हैं। श्रीमतीजी कहती हैं कि मेरे पास अधिक कपड़े नहीं हैं क्योंकि मुझे कपड़ों से प्रेम नहीं है। मेरा तर्क थोड़ा कटु हो सकता है, पर उनके लिये किसी कपड़े को वर्ष में एक बार पहनना, यदि प्रेम प्रदर्शन का मानक है तो मेरा मेरे कपड़ों के प्रति प्रेम ५० गुना अधिक है।

महेन्द्र ने बताया कि अपरिग्रह तो जैन धर्मों के पाँच मूल सिद्धान्तों में आता है। सत्य, अहिंसा, अस्तेय, अपरिग्रह और ब्रह्मचर्य। व्यक्तिगत जीवन में यदि अपरिग्रह न अपनाया जायेगा तो समाज संसाधनयुक्त नहीं रह पायेगा। संसाधन यदि उपयोग में न आयेगा तब तो वह व्यर्थ ही माना जायेगा। संग्रहण की प्रवत्ति तो न स्वयं के लिये लाभदायी है और न ही समाज के लिये।

रात्रि अधिक हो चली थी, कल कपड़े के व्यापार कर्म के लिये महेन्द्र को सुबह बाजार के लिये निकलना था, अतः चर्चा वहीं विराम पा गयी। जीवन में कपड़ों के माध्यम से ही सही, पर मेरे मन में अपरिग्रह संबंधी प्रश्न हिलोरें ले रहे थे, उन्हें अपने निष्कर्ष तो ढूढ़ने ही थे।

9.11.13

किस तरह गणना करें

कभी लगता, आज बढ़कर सिद्ध कर दूँ योग्यता,
कभी लगता, व्यग्र क्यों मन, है ठहर जाना उचित,
कभी लगता, व्यर्थ क्षमता, क्यों रहे यह विवशता,
कभी लगता, करूँ संचित, और ऊर्जा, कुछ समय,

यूँ तो यह विश्राम का क्षण, किन्तु मन छिटका पृथक,
तन रहा स्थिर जहाँ भी, मन सतत, भटका अथक,
ढूढ़ता है, समय सीमित, कहीं कुछ अवसर मिले,
लक्ष्य हो, संधान का सुख, रिक्त कर को शर मिले,

पर न जानूँ, क्या अपेक्षित, क्या जगत की योजना,
नहीं दिखता, काल क्रम क्या, क्या भविष्यत भोगना,
एक संरचना व्यवस्थित, व्यर्थ क्यों विकृत करूँ,
रिक्तता आकाश का गुण या क्षितिज विस्तृत भरूँ,

सोचता हूँ, क्या है जीवन, जीव का उद्योग क्या,
है यहाँ किस हेतु आना, विश्व रत, उपयोग क्या,
बूँद से हम, विश्व सागर, दे सकें क्या ले सकें,
खेलने का समय पाकर ठेलते रहते थकें,

या प्रकृति को मूल्य देना, जन्म जो पाया यहाँ,
अर्ध्य अर्पित ऊर्जा का, कर्म गहराया यहाँ,
मौन धारण, जड़ प्रकृति यह, बोलती कुछ क्यों नहीं,
चाहती क्या, मर्म अपने, खोलती कुछ क्यों नहीं,

काश, थोड़े ही सही, संकेत कुछ जीवन गहे,
दौड़ना कब, कब ठहरना, एक समुचित क्रम रहे,
विश्व सबका व्यक्त एकल या सभी का मेल है,
यह अथक प्रतियोगिता है या परस्पर खेल है,

जब नहीं कुछ ज्ञात, पथ पर कौन से हम पग धरें,
चाल मध्यम, गतिमयी या शून्यवत ठहरे रहें,
कर्म क्या, किस पर नियन्त्रण या स्वयं की मुक्ति का,
किस तरह गणना करें, अनुमान इस आसक्ति का।

6.11.13

खोया चन्द्रगुप्त

एक वर्ष पहले तक मुझे भी यह तथ्य पता नहीं था, हो सकता है आप में से बहुतों को भी यह तथ्य पता न हो। कारण हमारी जिज्ञासा में नहीं होगा, कारण इतिहास के प्रारूप में है। इतिहास सम्राटों के उत्कर्ष तो बताता है, उनका संक्रमण काल भी लिख देता है, हो सके तो स्थायित्व काल में हुये सांस्कृतिक और सामाजिक उन्नति को स्थान भी दे देता है, पर शिखर पर बैठे व्यक्तित्व के मन में क्या चल रहा है इतिहास कहाँ जान पाता है उस बारे में? इतिहास तथ्यों और तिथियों में इतना उलझ जाता है कि उसे सम्राटों के निर्णयों के अतिरिक्त कुछ सोचने की सुध ही नहीं रहती है। उन निर्णयों के पीछे क्या चिन्तन प्रक्रिया रही होगी, क्या मानसिकता रही होगी, इसका पता इतिहास के अध्ययनकर्ताओं को नहीं चल पाता है।

ऐसा ही एक अनुभव मुझे एक वर्ष पहले हुआ, जब मैं श्रवणबेलागोला गया। श्रवणबेलागोला गोमतेश्वर की विशाल प्रतिमा के लिये प्रसिद्ध है और जैन मतावलम्बियों के लिये अत्यन्त पवित्र तीर्थ स्थान है। बंगलोर से लगभग डेढ़ सौ किलोमीटर स्थित यह स्थान अपने अन्दर इतिहास का एक और तथ्य छिपाये है जो गोमतेश्वर के सामने वाली पहाड़ी पर स्थित है। यहाँ पर चन्द्रगुप्त मौर्य ने अपने प्राण त्यागे थे।

सम्राटों की मृत्यु उनकी सन्ततियों के लिये राज्यारोहण का समय होता है। अतः स्वाभाविक ही है कि उस समय इतिहास का सारा ध्यान नये राजाओं पर ही रहता है। मृत्यु वैसे भी इतिहास के लिये महत्वपूर्ण या आकर्षक घटना नहीं होती है, यदि वह अत्यन्त अस्वाभाविक न हो। चन्द्रगुप्त की मृत्यु भी इतिहास का ऐसा ही बिसराया अध्याय है। संभवतः मेरे लिये भी सामान्य ज्ञान बन कर रह जाता, इतिहास का यह बिसराया तथ्य यदि उसमें तीन रोचक विमायें न जुड़ी होतीं।

पहली, चन्द्रगुप्त की मृत्यु मात्र ४२ वर्ष में हुयी। दूसरी, मृत्यु के समय वह एक जैन सन्त हो चुके थे। तीसरी, उनकी मृत्यु स्वैच्छिक थी और आहार त्याग देने के कारण हुयी थी।

सम्राट चन्द्रगुप्त
ये तथ्य जितने रोचक हैं, उससे भी अधिक आश्चर्य उत्पन्न करने वाले भी। ये तथ्य जब चन्द्रगुप्त के शेष जीवन से जुड़ जाते हैं तो चन्द्रगुप्त के जीवन में कुछ भी सामान्य शेष रहता ही नहीं है। बचपन में चरवाहा, यौवन में सम्राट और मृत्यु जैन सन्तों सी। जन्म पाटलिपुत्र में, अध्ययन व कार्यक्षेत्र गान्धार में, सम्राट देश भर के और मृत्यु कर्नाटक के श्रवणबेलागोला में। चन्द्रगुप्त का आरोह, विस्तार और अवरोह, सभी आश्चर्य के विषय हैं। यह सत्य है कि उन्हें गढ़ने में चाणक्य का वृहद योगदान रहा, पर उस उत्तरदायित्व का निर्वहन कभी भी सामान्य नहीं रहा होगा।

जब मैं सामने की पहाड़ी में चन्द्रगुप्त के समाधिस्थल को देख रहा था, मेरे मन में तिथियों की गणना चल रही थी। चन्द्रगुप्त २० वर्ष की आयु में भारत का सम्राट बन गया था, २२ वर्षों के शासनकाल में प्रारम्भिक ५ वर्ष विस्तार और स्थायित्व के प्रयासों में बीते होंगे। १५-१६ वर्ष का ही स्थिर शासन रहा होगा। तब क्या हुआ होगा कि चन्द्रगुप्त सारा राज्य अपने पुत्र बिन्दुसार को सौंप कर ४२ वर्ष की आयु में न केवल जैन सन्त बन गये वरन निराहार कर स्वैच्छिक मृत्यु का वरण कर लिये। इतिहास के अध्याय इस विषय पर मुख्यतः मौन ही दिखे। जिसने सारा जीवन संघर्षों में काटा हो, जो उत्कर्षों को उसके निष्कर्षों तक छूकर आया हो, जिसने विस्तारों को उनकी सीमाओं तक पहुँचा कर आया हो, उसका असमय अवसान इतिहास की उत्सुकता का विषय ही नहीं?

मैं भी अगले वर्ष ४२ का हो जाऊँगा। एक ४२ वर्ष के वयस्क के रूप में चन्द्रगुप्त को स्वेच्छा से मृत्यु वरण करते देखता हूँ तो चिन्तनमग्न हो जाता हूँ। चिन्तन इस बात का नहीं था कि चन्द्रगुप्त कि मृत्यु किस प्रकार हुयी, चिन्तन इस बात का था कि ४२ वर्ष की आयु में ऐसा क्या हो गया कि चन्द्रगुप्त जैसा सम्राट अवसानोन्मुख हो गया। न कोई नैराश्य था, न पुत्रों में शासन पाने की व्यग्रता, न कहीं गृहयुद्ध, न कहीं कोई व्यवधान, तब क्या कारण रहा इस निर्णय का? आजकल की राजनीति देखता हूँ तो ४२ वर्ष तो प्रारम्भ की आयु मानी जाती है। ५० वर्ष के पहले तो वानप्रस्थ आश्रम का भी प्रावधान नहीं रहा है, उसके बाद सन्यास आश्रम, तब कहीं जाकर मृत्यु और वह भी स्वाभाविक।

शान्तचित्त वह चन्द्रगिरि में
इतिहासविदों ने भले ही चन्द्रगुप्त पर कितना ही लिखा हो पर इन तथ्यों पर जैसे ही विचार करना प्रारम्भ करता हूँ, चन्द्रगुप्त कहीं खोया हुआ सा लगता है। ऐसा लगता ही नहीं कि हम चन्द्रगुप्त के सारे पक्षों को समझ पाये हैं, ऐसा लगता ही नहीं कि सम्राट के मन में चल रहे विचारक्रम को हम समझ पाये हैं, ऐसा लगता ही नहीं कि हम इतिहास के इस महत्वपूर्ण कालखण्ड को समझ पाये। इतिहास तो सदा ही हड़बड़ी में रहता है, उसे न जाने कितने और कालखण्ड समेटने होते हैं, पर चन्द्रगुप्त हमारे गौरव का प्रतीक रहा है, हमें यह अधिकार है कि हम उसके बारे में और अधिक जाने।

चन्द्रगुप्त के व्यक्तित्व ने सदा मुझे व्यक्तिगत रूप से प्रभावित किया है। जीवन यात्रा कितनी उपलब्धिपूर्ण हो सकती है, कितनी सार्थक हो सकती है, कितने आयाम माप सकती है, यह चन्द्रगुप्त का जीवन बता जाता है। श्रवणबेलागोला में शिला सा शान्त बैठा चन्द्रगुप्त पर मेरी समझ को भ्रमित कर देता है। वहाँ से आये लगभग एक वर्ष हो गया, मेरे प्रश्न को न ही कोई ऐतिहासिक उत्तर मिल पाया है और न ही कोई आध्यात्मिक उत्तर मिल पाया है। ४२ वर्ष की आयु में भला जीवन का कितना गाढ़ापन जी लिया कि चन्द्रगुप्त विरक्तिमना हो गये।

जहाँ कुछ राजकुलों का जीवन लोभ और लोलुपता से सना दिखता है, भाईयों के रक्त से सना दिखता है, पिताओं के अपमान से दग्ध दिखता है, चन्द्रगुप्त का न केवल जीवन अभिभूत करता है, वरन उसकी मृत्यु भी आश्चर्यकृत कर जाती है।

मेरे प्रश्न आज भी अनुत्तरित हैं, मुझे प्रभावित करने वाले व्यक्तित्व का जीवनक्रम आज भी मेरी बुद्धि के क्षमताओं की परिधि तोड़कर गोमतेश्वर की महान प्रतिमा के सम्मुख शिला रूप धर शान्त बैठा है। वह अब कुछ भी बताने से रहा। मैं भी ४२ वर्ष का हो जाऊँगा, मुझे भी अनुभवजन्य उत्तर नहीं सूझते हैं। मेरा आदर्श मुझे अपने हाथ से छूटता हुआ सा प्रतीत होता है, चन्द्रगुप्त इतिहास के पन्नों से सरकता हुआ सा लगता है, सम्राट की व्यक्तिगत चिन्तन प्रक्रिया खोयी सी लगती है।

मुझे मेरा खोया चन्द्रगुप्त चाहिये।

2.11.13

भाषायी संबंध

न जाने कितना कुछ कहती यह भाषा
भाषा संबंधी अध्ययन के समय में एक विशेष प्रश्न आया था, कि किस प्रकार भाषा संस्कृतियों के पक्षों को अपने में समा कर रखती है और किस प्रकार वह चिन्तन को प्रभावित करती है। छोटा सा एक तुलनात्मक उदाहरण लें, वैज्ञानिक भाषा का और आदिवासी क्षेत्र में बोली जाने वाली भाषाओं का। वैज्ञानिक भाषा में प्रयुक्त शब्द जैसे एन्ट्रॉपी अपने आप में न जाने कितने सिद्धान्त समाहित किये बैठा है। जब भी वह बोला जायेगा, ऊष्मागतिकी के द्वितीय सिद्धांत तक प्रयुक्त सारा ज्ञान उस शब्द में व्याख्या सहित समाया मिलेगा। इसी प्रकार आदिवासीय क्षेत्र में बोली जाने वाली भाषा में प्रकृति की उपासना की प्रमुखता होगी, उन्नत शब्द प्रकृति की किसी शक्ति का वर्णन करते हुये ही दिखेंगे। ज्ञान के विकास में शब्द सामर्थ्यशाली होते चले जाते हैं और आने वाली पीढ़ियों की चिन्तन प्रक्रिया को सुदृढ़ बनाते रहते हैं।

गहरे सिद्धान्तों को वहन कर सकने के लिये भाषा का स्वरूप और बनावट भी गहरी होनी चाहिये। रोमन अंक किसी भी स्थिति में गणित के अग्रतम सिद्धान्तों को व्यक्त नहीं कर पायेंगे। कल्पना कीजिये कि यदि रोमन अंकों में आपको गुणा करने का भी कार्य दिया जाता तो गणित के प्रति आपका क्या रुझान होता? इसी प्रकार देखिये तो कम्प्यूटर को अंग्रेजी सीधे समझ नहीं आती, अतः उससे कार्य निकालने के लिये जावा या सी प्लस आदि कम्प्यूटर भाषाओं का उपयोग किया जा रहा है। एस क्यू एल(Structured Query Language, SQL) के नाम से नयी कम्प्यूटर भाषा विकसित हो रही है, जिसमें एक व्यवस्थित क्रम हो और कम्प्यूटर को उस भाषा को समझने में कोई भी भ्रम न रहे, हर बार शब्द और निर्देश वही अर्थ बता सकें।

जहाँ तक देखा गया है, कोई एक संस्कृति या तन्त्र एक दिशा में बहुत आगे तक चली जाती है और उस संस्कृति को व्यक्त करने वाली भाषा संस्कृति के सशक्त पक्षों को अपने में समेट लेती है। कल्पना कीजिये कि भाषा की विकास प्रक्रिया तब कैसी होती होगी, जब किसी संस्कृति में दो पक्ष सशक्त होते होंगे। भाषा का आकार और शब्दकोश तब कैसे विकसित होता होगा? क्या होता होगा, जब संस्कृति का भौतिक पक्ष, मानसिक पक्ष, बौद्धिक पक्ष या आध्यात्मिक पक्ष संतुलित रहता होगा, भाषा तब कैसे अपना मार्ग ढूंढ़ती होगी, कैसे अपना समन्वय बिठाती होगी?

भाषा के शब्दों में कितना अर्थ छिपा है और वे एक वाक्य के रूप में कितना भ्रमरहित संप्रेषण करते हैं, यह किसी भी भाषा के सामर्थ्य को दिखाते हैं। यहाँ पर एक बात समझनी आवश्यक हो जाती है जो भाषा के अनुवादकों के कठिन श्रम को समझने में सहायक है। किसी एक भाषा से दूसरी भाषा में अनुवाद की प्रक्रिया केवल दोनों भाषाओं के शब्दकोश से होकर नहीं जाती है, वरन अनुवाद से न्याय करने के लिये शब्दों द्वारा व्यक्त संास्कृतिक अनुगूँज और उस भाषा में छिपे व्याकरणीय भ्रमतन्तु समझने आवश्यक हैं। सफल अनुवाद इन दोनों को पूरी तरह से समझे बिना संभव ही नहीं है। अनुवादकों का कार्य सृजनशीलता में लेखकों से भले ही कम हो, पर संप्रेषण में लगे श्रम और समझ की दृष्टि से बहुत अधिक है, दो भाषाओं की संस्कृति और भाषायी शैली समझने की दृष्टि से बहुत अधिक है।

अनुवादकों का कार्य तब कठिन हो जाता है जब संस्कृतियाँ सर्वथा भिन्न हो। गणित और विज्ञान ने पूरे विश्व में अपनी भाषा एक सी बना ली है अतः एक देश में हुये विकास को दूसरे देश में सरलता से पढ़ा जा सकता है, बिना अनुवादकों की सहायता के। वहीं दूसरी ओर एक संस्कृति में ही पोषित दो पड़ोसी भाषाओं के बीच भी अनुवाद बड़ी समस्या नहीं है। कई शब्दों की समानता और व्याकरण की समरूपता इस कार्य को उतना कठिन नहीं रहने देती है। भिन्न संस्कृतियों की भाषा के बीच सेतु का कार्य करने के लिये मन में SQL जैसी ही किसी भाषा का निर्माण करना पड़ता है, या कहें सेतुबन्ध बनाने के लिये अनुवादक को अलिखित तीसरी भाषा गढ़नी पड़ती है।

जब दो भाषायें संपर्क में आती हैं, उन दोनों के बीच शब्दों और सिद्धान्तों के बीच सांस्कृतिक आदान प्रदान की प्रक्रिया चलती है। जानकर कोई आश्चर्य नहीं होगा कि जहाँ वैज्ञानिक शब्दकोश अंग्रेजी से भारतीय भाषाओं में आया है, भारतीय भाषाओं के आध्यात्मिक शब्दकोश से अंग्रेजी सम्पन्न हुयी है। कारण स्पष्ट है जब सारी वैज्ञानिक प्रगति अंग्रेजी में हो रही थी, भारतीय भाषाओं के अधिनायक अपनी स्वतन्त्रता के संघर्ष में डूबे थे। इसी प्रकार जब भारत में मनीषी अध्यात्म के उन्नत ग्रन्थ लिख रहे थे, यूरोप व अरब के देश अपने अंधे युग में थे।

हमको अपने सूत्र साधने
भारतीय भाषाओं में उपस्थित समानता और व्याकरण भारतीय भाषाओं के एक स्रोत की ओर इंगित करता है। यदि संस्कृत को केन्द्र में रखकर देखें तो तमिल को छोड़कर शेष सभी भारतीय भाषाओं की समरूपता का प्रतिशत ६५ से ऊपर है, कुछ में यह प्रतिशत ८५ तक भी पहुँच जाता है। व्याकरण और वर्णमाला के अतिरिक्त संस्कृति की समानता इसका प्रमुख कारण है। तमिल के साथ जहाँ सांस्कृतिक समैक्य है, व्याकरण और वर्णमाला थोड़ी भिन्न होने पर भी समानता का प्रतिशत ४५ के आसपास आता है। भाषाओं में बटे भारत में इस प्रकार की समानता ढूँढ निकालने का कार्य गम्भीरता से नहीं लिया गया है, एक भाषा को थोपे जाने के भावनात्मक भय ने एकता पाने की संभावनाओं पर भी कुठाराघात किया है। ६५ प्रतिशत की शाब्दिक समानता क्या पर्याप्त नहीं थी, हम लोगों को एक दूसरे के हृदय में पहुँच पाने के लिये?

देश के भाषायी प्रश्न को भावनात्मकता से विलग कर तथ्यात्मक आधार पर देखा जाये तो भाषायें न केवल एक दूसरे पर अपना प्रभाव डालती रहती हैं, वरन औरों के प्रभाव से स्वयं को बचाती रहती हैं। दूसरी भाषा के शब्दों को अपनी भाषा में लेने से भाषा के समृद्धिकरण के लाभ भी हैं और स्वयं के निगले जाने का भय भी। दो भाषाओं के जन के बीच संपर्क किसी एक भाषा में ही होता है। आवश्यकतानुसार लोग एक दूसरे की भाषा बोल भी लेते हैं, पर यह बात मानकर चलिये कि आवश्यकता कितनी भी गहरी हो, अपनी भाषा के मोहतन्तु इतनी सरलता से जाते नहीं हैं। बाह्य परिवेश में विवशतावश कोई भी भाषा बोले, पर घर आकर लोग अपनी मातृभाषा ही बोलते हैं। अपनी भाषा को, अपनी संस्कृति को बचाये रखने का मोह सबको होता है।

कभी सोचा है कि किसी एक बांग्लाभाषी का बंगलोर में क्या भाषायी आधार रहता होगा? मैं बताता हूँ क्योंकि मैं ऐसे कई परिवारों को जानता हूँ। घर में बांग्ला, बाहर कन्नड़, कार्यालय में अंग्रेजी और मेरे साथ हिन्दी। प्रश्न और जटिल कर देते हैं, पति पत्नी दोनों ही अलग भाषा बोलते हैं, बच्चा कौन सी भाषा सीखेगा? अंग्रेजी विश्व से जुड़ने की भाषा है, परिवेश की भाषा कुछ और हो सकती है? ऐसी भाषायी संबंधों में वह क्या ग्रहण करता होगा, किस भाषा में कितनी गहराई तक जा पाता होगा? या भ्रम में कुछ भी नहीं सीख पाता होगा? एक से अधिक भाषा जानने के लिये तब अधिक समस्या नहीं रहती होगी जब दोनों भाषाओं में सांस्कृतिक समानता हो। तब संभव है कि शब्द भी उभयनिष्ठ हों। समस्या तब आती है जब भाषाओं से संबद्ध संस्कृतियाँ भिन्न होती हैं, उनके भौतिक, मानसिक, बौद्धिक और आध्यात्मिक विमायें भिन्न होती हैं। अनुवादक का कार्य भी इसी आधार पर अपनी सरलता या जटिलता ढूँढता होगा।

जिस तरह से विश्व में भौगोलिकता के पार पारस्परिक संपर्कबिन्दु बढ़ रहे हैं, जिस तरह भाषाओं का आवागमन हो रहा है, जिस प्रकार बहुभाषी जन तैयार हो रहे हैं, उससे यह तो निश्चित है कि सभी भाषाओं में सतत परिवर्धन होगा। संस्कृतियों के इस वृहद मेले में भाषायें किस तरह प्रभावित होगीं, उनके आपसी संबंध किस तरह के होंगे, उनके संमिश्रण से शब्दकोश क्या आकार धरेंगे, यह शोध का विषय है। अंग्रेजी संस्कृति हर ओर फैली और निष्कर्ष स्वरूप शब्दकोश का आकार ३ हजार शब्दों से ३ लाख शब्दों तक हो गया है। अन्य भाषायें अंग्रेजी के इस ऐश्वर्य से प्रभावित होंगी कि अपनी राह स्वयं गढ़ेंगी? भारतीय भाषायें किस ओर बढ़ेंगी?

भाषाओं का प्रश्न जितना सरल लोग बनाने का प्रयास करते हैं, उतना सरल वह होता नहीं। मानव संबंधों से भी अधिक दुलार पाती हैं भाषाओं की भावनायें। जो हमको हमारे भाव समझाने का प्रयत्न अपने हर शब्द से करती हैं, हम भी उसके भाव समझ सकें, हम भी नित एक होते विश्व में भाषायी संबंध समझ सकें।

30.10.13

टाटा स्काई प्लस एचडी

कुछ दिन पहले टाटा स्काई के कुछ चैनलों का प्रसारण बाधित होने लगा। पहले तो लगा कि अधिक वर्षा इसका कारण रहा होगा। किन्तु जब धूप छिटक आयी और फिर भी चैनल बाधित रहे तो टाटा स्काई वालों को फ़ोन किया गया। फ़ोन पर समस्या बताने पर उनके प्रतिनिधि ने बताया कि वे प्रसारण की अधिक उन्नत तकनीक की ओर जा रहे हैं, सेट टॉप बॉक्स बदलने से सारे चैनल पूर्ववत आने लगेंगे। यदि आप अभी बदलवाना चाहें तो तीन घंटे के अन्दर हमारे कार्यकर्ता आकर बदल देंगे। साथ ही साथ उन्होंने मुझे दो और सेट टॉप बाक्सों का प्रस्ताव भी दिया। पहला टाटा स्काई एचडी का और दूसरा टाटा स्काई प्लस एचडी का। एचडी में कुछ चैनल अधिक स्पष्टता में आयेंगे, प्लस में आपके पास कार्यक्रमों को रिकार्ड करने की व्यवस्था रहेगी जिससे वे बाद में सुविधानुसार देखें जा सकें। मात्र एचडी में हज़ार रुपये लग रहे थे, प्लस में पाँच हज़ार।

हाई डेफिनिशन, गजब की क्वालिटी
कार्यक्रमों को अधिक स्पष्टता से देखने का अधिक मोह नहीं रहा है, पर अपने एक मित्र के यहाँ पर एचडी चैनल देखकर प्रभावित अवश्य हुआ था। एक क्रिकेट मैच चल रहा था और लग रहा था कि मैदान के अन्दर खड़े होकर मैच देख रहे हैं। यद्यपि हमें तीसरे अम्पायर का कार्य नहीं करना था पर क्रिकेट का आनन्द एचडी में और बढ़ जाता है। साथ ही साथ एचडी फ़िल्मों में भी डायरेक्टर द्वारा छिटकाये रंगों को आप मल्टीप्लेक्स के समकक्ष स्पष्टता में देख पाते हैं। डिस्कवरी और हिस्ट्री आदि चैनल जो हमें अत्यन्त भाते है, वे भी एचडी में ही अपने पूरे रंग में आते हैं। उत्सुकता मन में थी ही, प्रस्ताव आते ही मन के अनुकूल हो गया, हज़ार रुपये जेब से निकल भागने को तत्पर हो गये।

तभी मन ने कहा, जब चिन्तन द्वार खोले ही हैं तो प्लस के प्रस्ताव पर भी विचार कर लो। कार्यक्रम को रिकार्ड कर बाद में देखने की व्यवस्था में टीवी अधिक देखे जाने की संभावना दिख रही थी और प्रथम दृष्ट्या प्लस घर के लिये उपयोगी नहीं लग रहा था। यही नहीं, उसमें एक हज़ार के स्थान पर पाँच हज़ार रुपये लग रहे थे। पर पता नहीं क्या हुआ, पूरे टीवी प्रकरण को समग्रता से सोचने लगा, निर्णय प्रक्रिया में श्रीमतीजी और बच्चों की सहमति लेने का मन बन आया।

प्लस में रिकार्डिंग की व्यवस्था
बच्चे सदा से ही प्लस से अभिभूत रहे हैं, कॉलोनी में एक दो घरों में होने के कारण पुराने छूट गये कार्यक्रमों को मित्रों के साथ निपटा आने की कला में सिद्धहस्त रहे हैं दोनों बच्चे। इस सुविधा के लिये वे कुछ भी करने को तैयार थे, अधिक टीवी न देखने के लिये तो तुरन्त ही तैयार हो गये दोनों। मेरी एक और समस्या थी उनसे, रात में टीवी देखने की। रात में सबकी पसन्द के कार्यक्रम देखने के क्रम में सोने में देर हो जाती थी, सो सुबह उठने में कठिनाई। रात भर के कार्यक्रमों का प्रभाव यह होता था कि सुबह सब कुछ आपाधापी में होता था। दोपहर में बच्चे इसलिये नहीं पढ़ते हैं कि विद्यालय से पढ़कर आये हैं, रात में इसलिये नहीं पढ़ते हैं कि उनके पसन्द के कार्यक्रम आ रहे होते हैं। बीच के समय में सायं आती है, तो उसमें किसी का इतना साहस कि उन्हें खेलने से मना कर दे। पढ़ाई समयाभाव में तरसती रहती है। पढ़ाई कभी आधे घंटे के लिये, कभी डाँट से, कभी चिरौरी कर के, घर में सबसे बेचारी सी। उनकी उत्सुकता देख कर मेरे अन्दर का स्नेहिल और अनुशासनात्मक पिता एक साथ जाग उठा। संतुलन की संभावना देखकर एक व्यापारी की तरह बोला, ठीक है, रात के कार्यक्रम रिकार्ड कर दोपहर में देखना होगा, खेलने के बाद पढ़ाई और समय से सुलाई। हाँ, सहर्ष मान गये दोनों बच्चे, वचन दे बैठे। वैसे रात में टीवी देखना तो मुझे भी अच्छा नहीं लगता है, न ढंग से लेखन हो पाता है और न ढंग से नींद आ पाती है। अच्छा हुआ एक तीर में दोनों ध्येय सध गये।

पिछली गर्मी की छुट्टी में एक और समस्या हुयी थी। मेरे पिताजी को समाचार आदि देखने में रुचि रहती है और बच्चों को कार्टून आदि में। एक टीवी रहने पर दोनों पीढ़ियों के बीच घर्षण बना रहता था। हम और हमारी श्रीमतीजी के द्वारा टीवी से वनवास लेने के बाद भी बहुधा समस्या उलझ जाती थी। या तो बच्चे क्रोधित हो जाते या पिताजी बच्चों को बिगाड़ने के दोष मढ़ने लगते। अनुशासन व प्यार के द्वन्द्व में मस्तिष्क पूरी तरह घनघना गया था। दूसरा टीवी और दूसरा कनेक्शन लेना तो पूरी तरह व्यर्थ था, वांछित शान्ति तब आयी जब पिताजी को अपने मित्रों की याद आने लगी। लगा कि प्लस लेने से यह समस्या भी सुलझ जायेगी। जिसको देखना होगा, देखेगा, दूसरे का कार्यक्रम रिकार्ड हो जायेगा, बाद में देखने के लिये।

मेरी पसन्द के कई कार्यक्रम या तो ऑफ़िस के समय में आते हैं या तो सोने के समय में। डीडी भारती, डिस्कवरी, हिस्ट्री आदि के कई कार्यक्रम ऐसे होते हैं जो बार बार देखने का मन करता है। न रात में जगना हो पाता है और न ही उसके पुनर्प्रसारण की प्रतीक्षा करना। सायं और रात को जो समय मिलता, उसमें टीवी या तो बच्चे हथियाये रहते या तो श्रीमतीजी। हमें भी लगने लगा कि हमें भी इस डब्बे से अपनी पसन्द के गुणवत्ता भरे कार्यक्रम देखने को मिल जायेंगे। साथ ही साथ कई नई फ़िल्में भी टीवी पर आती रहती हैं, एचडी में उन्हें घर में ही देख लेने से मल्टीप्लेक्स जाने का व्यय भी कम होने की संभावना भी दिखने लगी।

श्रीमतीजी घर का सारा काम करने के बाद घर में भी खाली रहती हैं, उनसे भी कहा कि यदि हम प्लस लेते हैं तो आप भी अपने कार्यक्रम दोपहर में देख लिया करें और सायं का समय परिवार के साथ और रात का भोजन टीवी के बिना, गुणवत्ता भरा। एक तरह से घर के सारे लोगों के लिये लाभकारी होने वाली थी, प्लस की यह अवधारणा।

एक और लाभ होता है रिकॉर्डेड कार्यक्रम देखने का, बीच में आये प्रचारों को आप बढ़ा सकते हैं। यदि गणना की जाये तो हर कार्यक्रम में लगभग ३० प्रतिशत समय उन प्रचारों से भरा रहता है जिन्हें हम देखना ही नहीं चाहते हैं। इस प्रकार हमारे समय की बहुत बचत हो सकती है। यदि आप एक दिन में एक घंटे भी टीवी देखें तो पूरे वर्ष में लगभग १०० घंटे की बचत निश्चित है। पूरे परिवार के लिये एक वर्ष में ४०० घंटे की बचत के लिये एक बार दिये अतिरिक्त ४००० रुपये अधिक नहीं हैं।

इन लाभों को देखते हुये सामूहिक और पारिवारिक निर्णय यह लिया गया कि टाटा स्काई प्लस एचडी लिया जाये और परिवार की जीवनशैली को एक नया रूप दिया जाये। एक ऐसा स्वरूप जिसमें टीवी कार्यक्रम का समय हमें आदेश न दे, बच्चों को पढ़ाई के लम्बे कालखण्ड मिले, घर को लम्बी शान्तिकाल मिले, ठूँसे गये कार्यक्रम के स्थान पर गुणवत्ता भरे कार्यक्रम मिलें, कार्यक्रमों के दृश्य अधिक स्पष्ट दिखें, सप्ताहन्त में साथ बैठ कोई फ़िल्म देखी जाये, साथ बैठ बिना टीवी के व्यवधान के रात में खाना खाया जाये, और ऐसे न जाने सुधरते जीवन के कितने आकार गढ़ें।

मेरे दो ऐसे मित्र हैं जिन्होंने अपने घर में टीवी को धँसने नहीं दिया है। हम उनके दृढ़ निश्चय से प्रभावित तो रहे हैं पर उन जैसा साहस नहीं कर पाये हैं। टीवी से होने वाले लाभों को अधिकतम उपयोग कर सके और साथ ही होने वाली हानियों को न्यूनतम कर सके, यही बस प्रयास रहा है।

टाटा स्काई के प्रतिनिधि को फ़ोन करके हमने अपना निर्णय बता दिया। उनकी त्वरित सेवा देख कर मैं दंग रह गया, तीन घंटे के अन्दर हम एक एचडी चैनल देख रहे थे और दूसरे को रिकॉर्ड कर रहे थे। श्रीमतीजी बड़ी प्रसन्न थीं, करवा चौथ वाले दिन उन्हें रंगभरा उपहार मिल गया था। उन्होंने अपने उपहार का त्याग कर परिवार के लिये टाटा स्काई प्लस एचडी को वरीयता दी है। परिवार का वातावरण और भी रंग बिरंगा हो गया है।

26.10.13

बचपन, भाषा, देश

जीवन के प्रथम दशक में हमारी भाषा, परिवेश का ज्ञान, विचारों की श्रंखलायें आदि अपना आकार ग्रहण करते हैं। यह प्रक्रिया बड़ी ही स्पष्ट है, आकृतियाँ, ध्वनि और संबद्ध वस्तुयें मन में एक के बाद एक सजती जाती हैं। इन वर्षों में हमारी समझ जितनी गहरी होती, ज्ञान का आधार उतना ही सुदृढ़ बनता है। कभी सोचा है कि जब हम बच्चे को एक के स्थान पर दो भाषायें सिखाने लगते हैं, ज्ञान की नींव पर उसका क्या प्रभाव पढ़ता होगा?

किस भाषा को किधर रखूँ मैं
यदि बचपन में हम एक भाषा के स्थान पर दो भाषाओं से लाद देते हैं तो जो ज्ञानार्जन करने में जो समय व मस्तिष्क लगना चाहिये वह अनुवाद करने में निकल जाता है। जब शब्द और उससे संबद्ध अर्थ सीखने का समय होता है तब मस्तिष्क आनुवादिक भ्रम में रहता है कि ज्ञान को किस प्रकार से ग्रहण किया जाये, हिन्दी में या अंग्रेजी में। ज्ञान के प्रवाह में एक स्तर और बढ़ जाने से श्रम बढ़ने लगता है और याद रखने की क्षमता भी आधी रह जाती है। जिस समय एक वस्तु के लिये एक शब्द होना था, एक शब्द सीखने के बाद शब्दों को संकलित कर वाक्य बनाने का समय था, उस समय हम अपना कार्य बढ़ाकर दूसरी भाषा में उसको अनुवाद करवा रहे होते हैं।

पता नहीं इस पर कभी कुछ विचार हुआ है कि नहीं कि नयी भाषा सीखने की सबसे उचित आयु कौन सी है। जब उसकी आवश्यकता पड़ती है तब तो लोग भाषा सीख ही लेते हैं और बहुत ही अच्छी सीखते हैं। यदि विज्ञान आदि पढ़ने के लिये अंग्रेजी सीखनी आवश्यक ही हो चले तो किस अवस्था में अंग्रेजी सीखनी प्रारम्भ करनी चाहिये? विकास की दौड़ में कोई भी पिछड़ना नहीं चाहता है, सबको लगता है अंग्रेजी बचपन से मस्तिष्क मे ठूँस देने से बच्चा सीधे ही अंग्रेजी बोलने लगेगा और कालान्तर में लॉट साहब बन जायेगा। लॉट साहब तो २०-२५ साल में ही बनते हैं, नौकरी भी उसी के बाद ही मिलती है। यह भी एक तथ्य है कि विकसित मस्तिष्क को अंग्रेजी सीखने में ३-४ वर्ष से अधिक समय नहीं लगता है। पर प्रारम्भ के तीन वर्ष जो जगत की समझ विकसित होती है, उसमें दूसरी भाषा ठूँस कर हम क्यों उसके भाषायी मानसिक आकारों को गुड़गोबर करने पर तुले हैं, किस आभासी लाभ के लिये यह व्यग्रता, क्यों यह मूढ़ता?

निम्हान्स के शोधकर्ताओं का भी मत है कि अधिक भाषायें सीखने से मस्तिष्क के सिकुड़ने का भय बना रहता है। हो सकता है कि अधिक भाषायें जान लेने से हम अधिक लोगों को जान पायें, भिन्न संस्कृतियों के विविध पर समझ पायें, पर गहराई में नीचे उतरने के लिये अपनी ही भाषा काम में आती है, शेष भाषा सामाजिकता की सतही आवश्यकतायें पूरी करती हुयी ही दिखती हैं, समझ विस्तारित तो होती है, गहरे उतरने से रह जाती है।

वहीं दूसरी ओर एक भाषा के माध्यम से देश की एकता की परिकल्पना करना भी भारत की विविधता को रास नहीं आया। भाषायी एकीकरण करने के लिये एक भाषा को अन्य पर थोपने के निष्कर्ष बड़े ही दुखमय रहे हैं, सबका अपनी भाषाओं के प्रति लगाव बढ़ा ही है, कम नहीं हुआ। अपितु थोपी जाने वाली भाषा के प्रति दुर्भाव बढ़ा ही है। राज्यों की सीमाओं को भाषायी आधार पर नियत होने में यह भी एक कारण रहा होगा। भाषायें अलगाव का प्रतीक बन गयीं, सबके अपने अस्तित्व का प्रमाण बन गयीं।

होना यह चाहिये था कि भाषाओं के बीच सेतुबन्ध निर्मित होने थे। भारत में एक ऐसा महाविद्यालय होता जहाँ पर सभी भारतीय भाषाओं के साहित्य को संरक्षित और पल्लवित करने का अवसर मिलता। सभी भाषाओं के भाषाविद बैठकर अपनी भाषा के प्रभावी पक्षों को उजागर करते, साथ ही साथ अन्य भाषाओं के सुन्दर पक्षों को अपनी भाषा में लेकर आते। अनुवाद का कार्य होता वहाँ पर, संस्कृतियों में एकरूपता आती वहाँ पर। वहाँ पर एक भाषा से दूसरी भाषाओं में अनुवाद की सैद्धान्तिक रूपरेखा बनायी जाती, और यही नहीं, भारतीय भाषाओं को विश्व की अन्य भाषाओं से जोड़ने का कार्य होता।

होना यह चाहिये था कि हर भाषा का एक विश्वविद्यालय उस भाषा बोलने वाले राज्य की राजधानी में रहता, उस भाषा को केन्द्र में रखकर अन्य भाषाभाषियों को उस भाषा का कार्यकारी ज्ञान देने की प्रक्रियायें और पाठ्यक्रम निर्धारित किये जाते।

विश्व से जुड़ना भी हो
होना यह चाहिये था कि हर उस नगर में जहाँ पर बाहर के लोग कार्य करने आते हैं, एक भाषा विद्यालय होता जहाँ पर उन्हें वहाँ की स्थानीय भाषा आवश्यकतानुसार सिखायी जाती। जिनको समय हो उन्हें दिन में और जिनको समय न हो, उन्हें सायं या रात को। जब आसाम का कोई व्यक्ति कर्नाटक में आईएएस में चयनित होकर आता है, उसे कन्नड़ का पूरा ज्ञान दिया जाता है। उसे यह ज्ञान बहुत गहरा इसलिये दिया जाता है क्योंकि उसे राज्य के अन्दर तक जाकर स्थानीय लोगों की भाषा का निवारण करना पड़ता है। सबकी आवश्यकता इतनी वृहद नहीं हो सकती और उनका पाठ्यक्रम उसी के अनुसार कम या अधिक किया जा सकता है।

जहाँ हमारे संपर्क बिन्दु दो परस्पर भाषायें होनी थीं, किसी व्यवस्थित भाषायी प्रारूप के आभार में वह सिकुड़ कर अंग्रेजी मान्य होते जा रहे हैं। अब कितने प्रतिशत व्यक्ति जाकर विदेशों में कार्य करेंगे, जो करेंगे तो वे सीख भी लेंगे और वे सीखते भी हैं। अंग्रेजी ही क्यों आवश्यक हुआ तो चाइनीज़ या मंगोलियन भी सीख लेंगे। पर अंग्रेजी पर आवश्यक महत्व बढ़ाकर हम न केवल अपने नौनिहालों के मानसिक विकास में बाधा बने जा रहे हैं वरन अपनी भारतीय भाषाओं को भूलते जा रहे हैं। जहाँ भी किसी से संवाद की आवश्यकता होती है, लपक कर अंग्रेजी की वैशाखियों पर सवार हो लेते हैं।

जहाँ पर हमें भारतीय भाषाओं के मध्य सेतुबन्ध स्थापित करने थे और अपने देश में करने थे, उनका निर्माण करने के स्थान पर हम अपनी राह इंग्लैण्ड और अमेरिका जाकर बनाने लगते हैं। जहाँ बचपन में एक ही भाषा सिखानी चाहिये, दो दो भाषायें सिखाने लगते हैं। देश में एकता के सूत्र स्थापित करने के लिये एक भाषा थोपने की योजना बनाने लगते हैं।

भारतीय भाषायें यहाँ के जनमानस से सतही रूप से नहीं चिपकी हुयी हैं वरन उसकी जड़ें सांस्कृतिक और धार्मिक पक्षों को छूती हैं। उसे भूल जाने को कहना या उसका प्रयत्न भी करना दुखदायी रहा है, ऐसे ही असफल रहेगा और कटुता भी उत्पन्न करेगा। आपस में बात करने के लिये यदि हमें अंग्रेजी जैसी किसी मध्यस्थ भाषा की सहायता लेनी पड़े तब भी यह हमारे लिये लज्जा का विषय है। सब भाषाओं के प्रति पारस्परिक सम्मान का भाव व तदानुसार सेतुबन्ध बनाने के प्रयास ही भारत का भविष्य है। सेतुबन्ध न केवल हम सबको जोड़कर रखेगा वरन एक मार्ग भी बतायेगा जिससे नदी के दोनों ओर रहने वाले जन उसी एक जल से अपनी आर्थिक़, मानसिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक समरसता सींच सकें।

23.10.13

हल्की साइकिलें

मुझे साइकिल के आविष्कार ने विशेष प्रभावित किया है। सरल सा यन्त्र, आपके प्रयास का पूरा मोल देता है आपको, आपकी ऊर्जा पूरी तरह से गति में बदलता हुआ, बिना कुछ भी व्यर्थ किये। दक्षता की दृष्टि से देखा जाये तो यह सर्वोत्तम यन्त्र है। घर्षण में थोड़ी बहुत ऊर्जा जाती है, पर वह भी न के बराबर। कुल मिला कर चार स्थान ऐसे होते हैं जहाँ घर्षण हो सकता है, दो पहिये के संपर्क बिन्दु और दो चेन के धुरे। दक्षता प्रतिशत में नापी जाती है, जितना निष्कर्ष निकला, उसे लगे हुये प्रयास से भाग देकर सौ से गुणा कर दीजिये। जब व्यर्थ हुयी ऊर्जा न्यूनतम होती है तो दक्षता अधिकतम होती है। साइकिल के लिये यह लगभग ९८% तक होती है। एक नियत दूरी तय करने में, यातायात के अन्य साधनों में भी लगी ऊर्जा साइकिल की तुलना में कहीं अधिक होती है। यहाँ तक कि पैदल चलने में भी साइकिल से अधिक ऊर्जा लगती है।

पिछले सौ वर्षों में साइकिल की मौलिक डिज़ाइन में कोई परिवर्तन नहीं हुआ है। जो भी विकास हुआ है, वह नयी और हल्की धातुओं से उसका ढाँचा बनाने में और गियर बॉक्स परिवर्धित करने में हुआ है। मैं कल ही बंगलौर में देख रहा था, पहाड़ों पर चलाने वाली २४ गियर की साइकिल का भार मात्र १२ किलो था। पहाड़ो पर चलने वाली सबसे हल्की साइकिल ६.४ किलो की है। सामान्य श्रेणी में सबसे हल्साइकिल २.७ किलो की है जो आपका छोटा सा बच्चा भी उठा लेगा।

पर्यटन की दृष्टि से देखा जाये तो इस प्रकार की हल्की साइकिलें साथ में ले जाने में असुविधाजनक है, कारण उनका बड़ा आकार है। यदि ऐसी साइकिलों को ट्रेन के सामान डब्बे में रखने और उतारने की सुविधा रहे तो ही लम्बी यात्राओं में इनका उपयोग किया जा सकता है। यदि ऐसी व्यवस्था नहीं हो पाती है तो उस स्थिति में ऐसी साइकिल हो जो सहजता से मोड़ कर सीट के नीचे रखा जा सके। इस दृष्टि से बिना उपयोगिता प्रभावित किये हुये, साइकिलों का ढाँचा बदल कर, उनका भार १० किलो तक लाया जा चुका है। घुमक्कड़ों के लिये ऐसी मोड़ कर रखी जा सकने वाली साइकिलें भविष्य में बहुत उपयोगी सिद्ध होने वाली हैं।

हल्की साइकिलें, सहयोगी
इण्टरनेट देखें तो साइकिल के गुणगान से अध्याय भरे पड़े हैं, हर दृष्टि में साइकिल धुँये उगलते राक्षसों से श्रेष्ठ है। यदि आस पास दृष्टि उठाकर देखें तो परिस्थितियाँ सर्वथा पलट हैं, सड़कों पर एक साइकिल नहीं दिखती है। हाँ, कॉलोनी या मुहल्लों में साइकिल दिखती है पर वह विशुद्ध मनोरंजन और खेलकूद के प्रायोजन से। बंगलोर को पिछले ४ वर्षों से देख रहा हूँ, दो समस्यायें नित ही दिखायी पड़ती हैं। एक तो सड़कें वाहनों से भरी पड़ी हैं और उसमें बैठे लोग अति बेडौल होते जा रहे हैं। यह विडम्बना ही कही जायेगी कि यहाँ पर वाहनों की औसत चाल १०-१५ किमी प्रतिघंटे से अधिक नहीं है। यातायात का बोझ यहाँ की सड़कें उठाने में अक्षम हैं और अपना बोझ उठाने में यहाँ के सुविधाभोगी नागरिक। काश ऐसा होता कि १० किमी के तक के कार्य स्थलों के लिये साइकिल अनिवार्य हो जाती, उसके अनुसार सुरक्षित मार्ग बन जाते, तो यहाँ का पर्यावरण, सड़कें और नागरिक सौन्दर्य, व्यवस्था और स्वास्थ्य से लहलहा उठते।

आइये देखते हैं कि किस तरह से साइकिल अन्य माध्यमों से अधिक उन्नत है। यहाँ के यातायात की स्थिति लें तो एक साइकिल की तुलना में कार से जाने में ८० गुना अधिक ऊर्जा लगती है, जबकि इसमें ट्रैफिक सिग्नल में व्यर्थ किया गया तेल जोड़ा नहीं गया है। साइकिल की औसत गति १५ किमी प्रतिघंटा तक होती है, जबकि यातायात वाहनों को १५ किमी प्रतिघंटों से अधिक चलने नहीं देता है। यदि सड़कों पर वाहनों से चलने वाला यातायात साइकिल पर स्थानान्तरित कर दिया जाये तो सड़कें एक दो तिहाई स्थान रिक्त हो जायेगा। ८० गुना अधिक ऊर्जा व्यर्थ करने का दुख तो फिर भी सहा जा सकता है, पर उससे उत्पन्न प्रदूषण का क्या करें जो हमें कहीं अधिक हानि पहुँचा जाता है।

नगर अपने यातायात का चरित्र और स्वरूप जब बदलें, तब बदलें, पर पर्यटन की दृष्टि से हल्की और मोड़ कर रख सकी जाने वाली साइकिलों का महत्व अभी भी है। यह आपको दूरियों नापने में आत्मनिर्भर बनाती है। हो सकता है कि नगर के बाहर के क्षेत्रों में अन्य वाहनों की औसत गति साइकिल से अधिक हो, पर उस साधन की प्रतीक्षा करने में लगा समय यदि बचा लिया जाये तो संभव है कि साइकिल की उपयोगिता नगर के बाहर भी उतनी ही होगी जितनी किसी नगर के अन्दर।

साइकिल की उपयोगिता ऊर्जा, गति, भार, धन और समय की दृष्टि से यातायात के अन्य साधनों की तुलना में कहीं अधिक है। साइकिल के लिये भारी आधारभूत ढाँचे की आवश्यकता नहीं, एक पतली सी पगडंडी में भी साइकिल बिना किसी समस्या के चलायी जा सकती है। भारी वाहनों के लिये बनायी गयी सड़कों में लगे धन का एक चौथाई भी लगाया जाये तो साइकिल के लिये एक अलग गलियारा तैयार किया जा सकता है। यही नहीं भूमि का अधिग्रहण भी उसी अनुपात में कम किया जा सकता है, खेती योग्य भूमि बचायी जा सकती है।

इन सब गुणों के अतिरिक्त साइकिल की बनावट और परिवर्धन में विशेष रुचि भी रही है। आईआईटी में तृतीय वर्ष के ग्रीष्मावकाश में वहीं पर रह गया था। एक प्रोफ़ेसर उस समय साइकिल की नयी बनावटों पर कुछ शोध कर रहे थे। उनके सान्निध्य में रहकर साइकिल की यान्त्रिकी कार्यपद्धति के बारे में बहुत कुछ जाना। यही नहीं, किस तरह से नयी धातुओं या कार्बन फ़ाइबर का उपयोग कर भार कम किया जा सकता है, किस तरह उसके बल संचरण को बनावट में परिवर्तन कर साधा जा सकता है, किस तरह चेन के स्थान पर सीधे ही पहियों में ही पैडल लगाया जा सकता। इसी तरह के भिन्न प्रश्नों ने पहली बार साइकिल जैसी साधारण लगने वाले यन्त्रों में संभावनाओं की खिड़की खोली थी। सच मानिये ग्रीष्म की गर्मी और तीन माह के समय का पता ही नहीं चला था उस रोचकता में।

मोड़े जाने योग्य साइकिलों की बनावट अपने आप में एक पूर्ण विधा है। आप इण्टरनेट पर खोजना प्रारम्भ कीजिये, न जाने कितने प्रकार की तकनीक आपको दिख जायेंगी, सब की सब एक दूसरे से भिन्न और कई पक्षों में श्रेष्ठ। मुझे फिर भी एक बनावट की खोज है जिसमें एक साइकिल को न केवल मोड़ कर रखा जा सके, खोल कर चलाया जा सके, वरन आवश्यकता पड़ने पर व्हील चेयर के आकार में परिवर्तित कर हाथों से भी चलाया जा सके। इसके पीछे कारण बड़ा ही सरल है, कई बार ऐसा होता है कि लगातार एक दो घंटे तक साइकिल चलाते चलाते आपके पैर थक जायें तब आप बिना यात्रा बाधित करे बैठकर हाथों से साइकिल चलायें और पैरों को विश्राम दें। किसी न किसी साइकिल कम्पनी को यह विचार अवश्य ही भायेगा, तब निष्कर्ष निश्चय ही साइकिल के लिये अधिक उपयोगिता लेकर आयेंगे।

हल्की, उन्नत याइक बाइक
सम्पत्ति में हो रहे शोधों ने यदि किसी ने बहुत प्रभावित किया है तो वह है, याइक बाइक। यद्यपि यह परम्परागत पैडल वाली साइकिल नहीं है और इसमें एक छोटी सी मोटर भी लगी है, पर बनावट के दृष्टि से आधुनिक शोधों के लिये एक दिशा है। एक पहिये में मोटर लगी है जो बिजली से चार्ज हो जाती है और एक चार्ज में १४ किमी की दूरी तय कर लेती है। यही नहीं, ब्रेक लगाने से साइकिल की ऊर्जा वापस बैटरी में चली जाती है। १२ किलो की यह साइकिल बड़ी सुगमता से मोड़ी जा सकती है और नियमित कार्यालय जाने वालों के लिये यह एक वरदान सिद्ध हो सकती है। यद्यपि इसे मानवीय रूप ये चार्ज करने का प्रावधान नहीं है और बैटरी समाप्त होने की स्थिति में पैडल मारने की भी व्यवस्था नहीं है। यदि इन बिन्दुओं पर ध्यान दिया जाये तो यह जनसाधारण और जनपदों के लिये एक वरदान हो सकती है।

साइकिल एक शताब्दी देख चुकी है पर अब भी संघर्षरत है। उसका संघर्ष तेल से है, तेल भरे और धुँआ उगलते राक्षसों से है, उसे निम्न समझने वालों की मानसिकता से है और साथ ही साथ उन सड़कों से भी है जहाँ पर उनको अपनी संरक्षा का भय है। पर्यटन और नगर यातायात में साइकिल के इस संघर्ष को हमें अपनाना होगा और उसे समुचित स्थान दिलाना होगा। यदि ऐसा हम नहीं करते हैं तो संभव है कि कल डॉलर और तेल मिल कर हमारा कॉलर पकड़ें और तेल निकाल दें।

चित्र साभार - singletrackworld.com, Yike Bike

19.10.13

कितनी पहचानें

कुछ दिन पहले एक डाटा कार्ड लिया था। उसके लिये दो प्रमाणपत्रों की आवश्यकता थी, पहचान के लिये और निवास के लिये। यद्यपि मेरे पास कार्यालय द्वारा प्रदत्त पहचान पत्र और निवास प्रमाण पत्र था पर एयरटेल वालों ने दोनों ही मानने से मना कर दिया। समझाया कि यह एक सरकारी प्रपत्र है तो कहने लगे कि कोई भी संस्था अपने कर्मचारियों को इस तरह के काग़ज़ बाँटती रहती है। भंगिमाओं से देखा जाता तो उनका प्रतिनिधि एक न्यायविद की तरह बात कर रहा था और मुझे एक संदिग्ध आतंकवादी की तरह समझ रहा था। विकल्प था अतः पैन कार्ड का प्रस्ताव रखा, उस पर भी मना कर दिया, कहा कि उसमें निवास प्रमाण पत्र नहीं रहता है। चुनाव पहचान पत्र था तो उसमें गृहनगर का पता था, ड्राइविंग लाइसेन्स पर अन्य नगर का पता था। लगा कि, सुरक्षा के नाम पर जितना कवच चढ़ा रखा है, उसके अनुसार तो हमें डाटाकार्ड मिलने से रहा। एयरटेल की फाइलों में संभवतः मेरे केस का निस्तारण मेरे ऊपर प्रतिकूल टिप्पणी करने जैसा हो। मेरे डाटा कार्ड को न देने का कारण संभवतः यह लिख दिया जाये, कि वैध पहचान व निवास प्रमाण पत्र प्रस्तुत करने में असमर्थ, भारतीय नागरिक होने में सन्देह। इतने कड़े नियम बने रहे तो हम जैसे सरकारी नौकर भी बांग्लादेशी घुसपैठिये मान लिये जायेंगे। अपने देश में ही हमारे साथ परायों सा व्यवहार हो रहा है, हम निराशा में डूब गये।

पहचान सिद्ध करने के लिये पहचानें
तब सोचा कि नियम अंधे हो सकते हैं, मानवीय संवेदनायें नहीं। हमने कहा कि हम तो भारत सरकार की कार्यनदी में डूबते उतराते तत्व हैं और हर दो तीन वर्ष में अपना स्थान बदलते रहते हैं। अपने कार्यालय के अतिरिक्त कोई और प्रमाण पत्र तो ला भी नहीं सकते हैं। आप ही अपने आप में संतुष्ट हो लो, दयादृष्टि कर दो। पता नहीं तर्क ने अपना काम किया या उसे सद्बुद्धि आयी या उसका अहं संतुष्ट हुआ, पर वह मान गया। एक दो दिन में घर के पते पर सत्यापन करने आया और अगले दो दिनों में फ़ोन के द्वारा पुनर्सत्यापन कर डाटा कार्ड प्रारम्भ कर दिया।

बैंक वाले भी पहचान पूरी जानने के लिये लालायित रहते हैं, पर उनके लिये पैन कार्ड ही सब कुछ है, संभवतः उन्हें व्यक्ति के आर्थिक पक्ष से ही सारोकार है। पैन कार्ड वाले व्यक्ति के लिये बैंक में कुछ भी करवा पाना कठिन नहीं है। हर छोटी सी चीज़ के लिये एक फोटो माँग लेते हैं और पैन कार्ड की फोटोकापी।

इसी कड़ी में अभी कुछ दिन पहले आधार कार्ड के लिये एक कैम्प रेलवे परिसर में ही लगा। सबने कहा बनवा लीजिये, इतने जटिल अनुभव पाने के बाद अपना आधार स्थापित करना अत्यन्त आवश्यक है। हम भी सहमत हो गये कि चलो, इसी बहाने ठोस सरकारी आधार मिल जायेगा। यहाँ भी डाटाकार्ड की तरह दो प्रमाणपत्र माँगे गये, मैंने तुरन्त ही रेलवे प्रदत्त पहचान और निवास प्रमाणपत्र प्रस्तुत कर दिये। ठेके पर आधारकार्ड बनवाने वाले युवा के चेहरे से लगा कि वह भी एयरटेल के प्रतिनिधि की तरह न्यायविद की कुर्सी पर सत्तासीन है, पर नीचे रेलवे की मुहर देख कर तनिक ठंडा पड़ गया। जिस संस्था की भूमि पर उसे आधार कार्ड बनाने की सुविधा मिली थी, वह उसके मुहर की अवहेलना नहीं कर सकता था। संतुष्टि के भाव आंशिक अवश्य थे पर कोई हठधर्मिता नहीं दिखी। मेरे पूरे हाथ के प्रिण्ट और आँखों की छाप ले ली गयी और प्रक्रिया पूरी होने के बाद एक पावती पकड़ा दी गयी।

जब श्रीमतीजी और बच्चों की बारी आयी तो मेरे प्रमाणपत्रों के आधार पर उनका आधारकार्ड बनाने से वह नियमों के अध्याय पढ़ने लगा। कहा कि पहले तो आप यह सिद्ध कीजिये कि ये वही हैं जो आप कह रहे हैं। साथ ही साथ उनके साथ अपने संबंध का प्रमाणपत्र भी लाइये। हमें लग गया कि इस ठेके के एजेण्ट ने हमारा सर तो किसी विवशतावश निकल जाने दिया पर हमारे धड़ को नियमों के पाश से जकड़ लिया।

श्रीमतीजी के साथ हमारे संबंध का प्रमाण पत्र एक वह फोटो भर थी, जिसमें हम मुस्कुराने का प्रयास करते हुये उनके गले में वरमाला डाल रहे थे। विवाह के पंजीकरण को करोड़ों भारतीयों की तरह अनिवार्य न मानते हुये, उसी फोटो की स्मृतिविधा में जिये जा रहे थे। फोटोशॉप के आगमन के बाद तो ऐसी न जानी कितनी फोटुयें संदेह के घेरे में आ जायें। श्रीमतीजी जिस तरह प्यार से हमें घर में समझाती हैं, उस तरह समझाकर वह अपनी पत्नी होने के संबंध को सिद्ध कर सकती थीं, पर भरी भीड़ में ऐसा करने में वह सकुचा गयी होंगी। श्रीमतीजी ने अपना पैनकार्ड और चुनाव पहचान पत्र तो दिखा दिया, पर वे दोनों ही विवाह के पहले के थे और दोनों में ही उनके पिताजी का नाम अभिभावक के रूप में लिखा था। संबंध सिद्ध करने का फिर भी कोई प्रमाणपत्र नहीं था। यद्यपि वहाँ पर खड़े दो बच्चे हम दोनों को माताजी और पिताजी कह रहे थे और यह तथ्य हमारे पति पत्नी के संबंधों को सिद्ध करता था, पर नियमों के सामने भावनाओं का कोई मोल नहीं।

बच्चों के साथ तो समस्या और गहरी थी। उनके पास न तो पहचान पत्र ही था और न ही संबंध सिद्ध करने का प्रमाणपत्र। यदि संबंध के नाम पर कुछ था तो वह कई वर्ष पहले बनवा लिया जन्म प्रमाण पत्र, जिसमें पिता के रूप में मेरा नाम लिखा था. पर वह यह सुनिश्चित नहीं करता था कि उसमें लिखा पता मेरा ही है, किसी और प्रवीण पाण्डेय का नहीं। साथ ही साथ उसमें लिखा पता मेरा स्थायी पता था, न कि वर्तमान। एक और बात थी कि जन्म प्रमाण पत्र में बच्चों की फोटो नहीं लगी थी, तो यह भी सिद्ध नहीं हो पा रहा था कि जो बच्चे वहाँ पर खड़े हैं, वे उन्हीं के जन्म प्रमाण पत्र है। जन्म प्रमाण पत्र इस प्रकार एक चौथाई भी पहचान सिद्ध नहीं कर पा रहा था। दूसरा था, विद्यालय प्रदत्त पहचान पत्र। विद्यालय पहचान पत्र में फोटो तो लगी थी पर घर का पता नहीं था और साथ ही साथ माता पिता का नाम नहीं था। अत: वह पहचान पत्र भी पूर्ण नहीं माना गया। हाँ, यदि दोनों को मिला कर तार्किक निष्कर्ष निकाले जाते तो पहचान और संबंध पूर्ण सिद्ध हो रहे थे, पर अधिक बुद्धि लगाना ठेके पर आये एजेण्टों के अधिकार क्षेत्र में नहीं था।

अब क्या किया जाये, हमारा आधार बन जाये और यदि औरों का न बने तो घर में विद्रोह निश्चित था। लगा कि नियमों से परे कोई देशी तोड़ निकालना पड़ेगा। थोड़ा और गहराई में उतरा गया तो पता लगा कि कोई सांसद, विधायक या राजपत्रित अधिकारी प्रमाणपत्र दे दे तो वह उन्हे मान्य है। एक राजपत्रित अधिकारी होने को आधार पर जब मैंने सबका प्रमाणपत्र देने को कहा तो मुझको कहा गया कि आप अपने संबंधी के लिये प्रमाणपत्र नहीं दे सकते। मैंने कहा कि आप उन्हें मेरा संबंधी मान ही नहीं रहे हैं तो प्रमाणपत्र देने दीजिये। यह भी तर्क भैंस के सामने बीन बजाने जैसा सिद्ध हुआ।

अब मेरा कार्याल़य मेरी श्रीमतीजी और बच्चों के लिये पहचान पत्र और संबंध प्रमाणपत्र कैसे दे? यह बड़ी समस्या थी और उनके अधिकार क्षेत्र के बाहर भी। कार्यालय तो मेरे लिये तो यह कार्य कर सकता था, बच्चों और श्रीमतीजी का सत्यापन उसकी परिधि के बाहर था। यह दोनों ही विषय राज्य सरकार की अधिकार सूची में थे और हम ठहरे केन्द्र सरकार के नौकर, कोई किसी की सुध क्यों ले। कार्यालय को यह भी भय था कि कहीं हम उन प्रमाण पत्रों को किसी और उपयोग में न ले आयें। अन्ततः एक सरकारी उपाय निकाला गया। हमने अपने वरिष्ठ अधिकारी को लिख कर दिया कि आधार कार्ड बनवाने के लिये मुझे संलग्न प्रमाणपत्रों की आवश्यकता है, जिसके आधार पर हमें केवल इसी हेतु और एक बार उपयोग में लाने के लिये प्रमाणपत्र दे दिया गया। आधारकार्ड वाले भी उन प्रमाण पत्रों को मान गये और श्रीमतीजी और बच्चों के लिये भी आधारकार्ड की प्रक्रिया पूरी हो गयी। अब तीन माह बाद हम सबके आधारकार्ड बनकर मिल जायेंगे।

एक देश में एक ही पहचान हो
अब पता नहीं कि आने वाले समय में आधारकार्ड ही एकमात्र पहचान रहेगी कि अन्य पहचानों का सहारा भी लिया जायेगा? आज आकर मैंने अपने सारे पहचान प्रमाणपत्र व बैंक आदि के कार्ड निकाल कर देखे, छोटे बड़े मिलाकर १०-१२ निकले, सब के सब एक दूसरे से असंबद्ध। हर कार्ड के लिये कोई न कोई पहचान प्रस्तुत की गयी होगी पर किसी में भी कोई संदर्भ नहीं था। क्या आने वाले समय में पहचान के सारे बिखरे तन्तुओं को एक सूत्र में पिरोया जायेगा? क्या निश्चय समयाविधि में आधारकार्ड सबके लिये अनिवार्य होगा और सारे कार्डों में आधारकार्ड का संदर्भ देना आवश्यक किया जायेगा? क्या अमेरिका की तरह कोई एक ही पहचान पत्र को सभी प्रकार के सामाजिक व आर्थिक प्रक्रियाओं के लिये मान्यता दी जायेगी?

मेरे इस जन्म में तो यह सब होता असंभव दिखता है। सुना है कि बांग्लादेशी घुसपैठियों को सहज ही पहचान मिल जाती है और इसी देश में जन्मे और बढ़े हुये न जाने कितनों को अपनी पहचान सिद्ध करने में संशय और संदेह के कितने अपमानों से होकर निकलना पड़ता है। अगले जन्म में यदि पुनः भारत आने का आदेश मिलता है तो ईश्वर से कहूँगा कि कर्ण की तरह ही कवच और कुण्डल चढ़ा कर भेजना। कर्ण की तरह अपमान और तिरस्कार झेलने की शक्ति भी आ जायेगी और कवच और कुण्डल दिखा कर अपनी पहचान भी बताता रहूँगा।

16.10.13

शिक्षा के बिसराये सूत्र

टेड पर सर केन रॉबिन्सन के विचार सुन रहा था, शिक्षा पर। विचार सरल थे, सहज थे और सारगर्भित थे। अनुभव जैसे जैसे गाढ़ा होता जाता है, अभिव्यक्ति तरल होती जाती है, श्री रॉबिन्सन को सुनकर यह सिद्धान्त और भी दृढ़ हो चला। यही नहीं, जब कोई ज्ञान तत्व बिना किसी श्रांगारिक कोलाहल के सुनने को मिलता है, वह ग्रहणीयता के तार झंकृत कर देता है। एक स्थान पर खड़े हुये दिये गये २० मिनट के इस आख्यान में दशकों की अनुभव यात्रा का निचोड़ था।

शिक्षा पर विचारणीय दृष्टि
वार्ता का विषय था कि किस तरह शिक्षा की मृत्युघाटी से बाहर निकलें। वर्तमान शिक्षा पद्धति के लिये इतने कठोर शब्द का उपयोग ही उनके अवलोकनों और विश्लेषणों के निष्कर्ष को व्यक्त करता है। साथ ही साथ उस पीड़ा और छटपटाहट को भी दिखाता है जिससे होकर शिक्षा के प्रति संवेदनशील बौद्धिक समाज जी रहा है। उस मात्रा में भले ही न हो, पर शिक्षा पद्धति के विषय में हम सबके अन्दर भी उसी प्रकार की असंतुष्टि पनप रही है।

श्री रॉबिन्सन के अनुसार मानव की शिक्षा पद्धति मानव के मूलभूत गुणों के अनुरूप होनी चाहिये, पर वर्तमान शिक्षा पद्धति इनकी अनदेखी कर रही है। केवल अनदेखी ही नहीं कर रही है वरन उसके विपरीत जा रही है। यदि यही होता रहा तो मानव धीरे धीरे मशीन होता जायेगा, सभ्यता के विस्तृत प्राचीर में एक ईंट। यन्त्रवत से जीवन हो जायेंगे, तन्त्र मानवीय न रहेंगे।

मानव के तीन मूलभूत गुण हैं। पहला है उनकी भिन्नता और विविधता। दूसरा है उनमें निहित उत्सुकता। तीसरा है उनकी सृजनात्मकता। यही तीन गुण उसे मानसिक और बौद्धिक रूप से पूरी तरह से विकसित करते हैं। बिना इन तीन गुणों के मानव स्वयं को पूर्णता से व्यक्त नहीं कर सकता है। एक भी विमा यदि अनुपस्थिति रही तो विकास आंशिक होगा, सर्वपक्षीय नहीं होगा। आइये देखते हैं कि वर्तमान शिक्षा पद्धति किस प्रकार इन तीनों मूलभूत धारणाओं के विपरीत कार्य कर रही है।

कोई दो बच्चे एक जैसे नहीं होते हैं, जन्म से भी नहीं, परिवेश से भी नहीं, भले ही वे सगे भाई या सगी बहनें ही क्यों न हों? सबकी अपनी क्षमता होती है, सबकी अपनी विशिष्टता होती है। फिर भी हमारी शिक्षा पद्धति ऐसी है कि हम सबको एक जैसा ही बनाना चाहते हैं। प्रारम्भ से एक ही विषय पढ़ाते हैं, एक सा ही समझते हैं, फैक्टरी के उत्पाद जैसा। एक जैसी शिक्षा सबके काम नहीं आती है, कुछ को रुचिकर लगती है, कुछ सामाजिक कारणों से लग कर पढ़ते हैं, कुछ माता पिता को दिखाने के लिये पढ़ते हैं, कुछ का मन तनिक भी नहीं लगता है, कुछ पढ़ाई छोड़ ही देते हैं। हमें लगता रहता है कि बच्चों का मन पढ़ाई में क्यों नहीं लग रहा है? उपाय भी सरल ही है, देखिये कि पढ़ाई छोड़ने के बाद किन किन क्षेत्रों में बच्चों का मन लगता, वे सारे विषय पढ़ाये जाये। हर एक के लिये अपनी रुचि के अनुसार पढ़ने को मिले तो समय के पहले पढ़ाई छोड़ देने वालों की संख्या न्यूनतम हो जायेगी।

क्या शिक्षा में यह उत्सुकता पल्लवित होती है?
बच्चे प्राकृतिक रूप से उत्सुक होते है, जिज्ञासु होते हैं। उनकी उत्सुकता को व्यापक आधार या निष्कर्ष देने के स्थान पर हम उसमें ठंडा जल डाल देते हैं। यदि हम उनको यह बता दें कि क्या पढ़ना है तो वे हमसे अच्छा पढ़ सकते हैं। हमारी शिक्षा पद्धति उन्हें सब कुछ घोंट कर पिला देना चाहती है, वह सब कुछ जिसे जानकर हम स्वयं को विद्वान समझने का भ्रम पाले बैठे हैं। आप उन्हें बताये या न बतायें, उनकी उत्सुकता उन्हें वांछित ज्ञान तक ले आयेगी। कितनी ही ऐसी ज्ञान की बाते होती हैं जो बच्चे स्वयं ही सीख जाते हैं। कभी उनके प्रश्नों की दिशा और सृजनात्मकता पर ध्यान दिया है, आप आश्चर्य करने के अतिरिक्त कुछ और कर भी नहीं सकते हैं। उसकी उत्सुकता के लिये हमें उसे उकसाने की आवश्यकता है, उसे दिशा देने की आवश्यकता है, उसे प्रेरित करने की आवश्यकता है। हमें उसे पढ़ाना नहीं है, उसे सीखने के लिये उद्धत करना है, उत्सुकता का उपयोग करने के लिये तैयार करना है। इसके स्थान पर वर्तमान शिक्षा पद्धति ज्ञान ठूँसने में विश्वास रखती है और यह जानने के लिये परीक्षायें लेती रहती है कि ठूँसे हुये ज्ञान को समुचित उगलने का अभ्यास किया कि नहीं किया बच्चों ने?

सृजनात्मकता हमारा सर्वाधिक सशक्त गुण है। आप एक समस्या दस बच्चों को देकर देखिये, सब के सब अपने सृजनात्मक वैशिष्ट्य के अनुसार उसका समाधान ढूँढ़ लेगे। जीवन की समस्या है, ज्ञान की समस्या हो, विकास के सारे अध्याय इसी गुण ने लिखे हैं। इस गुण को उभारने के स्थान पर वर्तमान शिक्षापद्धति सबको समान रूप से उत्तर देने की अपेक्षा रखती है और जो सबसे भिन्न रहता है, वह दौड़ में पिछड़ जाता है। हम मानकीकरण को अपना मूलमन्त्र बनाये बैठे हैं, सबको एक ही तुला से तौलने चले हैं।

जब तक ये तीनों गुण पोषित रहते हैं, बच्चे को अपना महत्व पता चलता रहता है। उसे लगता है कि वह अपने प्रयास से सीख रहा है, न कि शिक्षा पद्धति से बौद्धिक अनुदान पा रहा है। उसे करने का भाव मिलता है, न कि कुछ पा जाने का। आन्तरिक क्रियाशीलता बच्चे को प्रेरित करती है, उकसाती है। यदि ऐसा नहीं हो पाता है तो वह अपना रुझान खो देता है, ठंडा पड़ जाता है। थोपे हुये तत्व व्यक्तित्व को ठेस पहुँचाते हैं, वह उन्हें स्वीकार नहीं कर पाता है। विविधता बनी रहती है तो कुछ भी थोपा हुआ सा नहीं लगता है, उत्सुकता बनी रहती है तो कुछ थोपा हुआ सा नहीं लगता है, सृजनात्मकता बनी रहती है तो कुछ थोपा हुआ सा नहीं लगता है।

वर्तमान शिक्षा पद्धति को इस दिशा में सोचना होगा। फैक्टरी के स्वरूप में शिक्षा को उत्पाद नहीं बनाया जा सकता। शिक्षक और शिष्य के बीच वैयक्तिक और दीर्घकालिक संबंध और क्रियाशीलता आवश्यक है। एक के बाद एक सारे महान जनों को देख लें, उनके ऊपर किसी शिक्षक की कृपादृष्टि रही है, जिसने ये तीन गुण न केवल समझे, वरन व्यक्तित्व में विकसित कराये। बच्चे को पढ़ाने भर से शिक्षकीय कर्मों की इतिश्री नहीं हो सकती है। एक बच्चे को पढ़ना और तदानुसार गढ़ना, यही एक शिक्षक का मूल कार्य है, यही शिक्षा पद्धति की सार्थकता है। 

12.10.13

कानपुर से बंगलोर

आनन्द के अतिरेक में थकान का पता नहीं चलता है। थकान तब आती है, जब आनन्द अवस्था से आप जीवन के सामान्य पर उतर आते हैं। दिनभर सहपाठियों के साथ भेंट में समय का पता ही नहीं चला। मन तो प्रसन्न ही बना रहा, पर शरीर अपनी सीमाओं से कितना परे जा चुका था, उसका प्रमाण मिलना शेष था। मन अपने सामने किसी की सुनता नहीं है, सबसे मनमाना कार्य लेता है। शेष सबको अपनी सीमाओं से आगे निकलने का पता तब चलता है जब मन तनिक शान्त होता है। मन मित्र बना रहे, सच्चा साथ देता रहे, भरमाये नहीं, उद्विग्न न करें, और भला क्या चाहिये इस चंचल जीव से।

स्टेशन जाते समय थोड़ी देर के लिये अपने मामाजी के यहाँ जाना हुआ। मन का उछाह और तन की थकान मेरे ममेरे भाई को स्पष्ट दिख गयी थी, उसने स्नान करने की भली सलाह दी। स्नान के पश्चात मन स्थिर हुआ, शरीर में शीतलता भी आयी, पर लगा कि थोड़ा विश्राम फिर भी आवश्यक है। अब थोड़ी ही देर में वापसी की यात्रा प्रारम्भ करनी है, सोचा तभी जीभर कर विश्राम हो जायेगा, अभी तन्त्रिका तन्तुओं को सचेत रखते हैं।

नाम में दम
वहाँ से स्टेशन जाते समय एक चाट वाला ठेला दिखायी पड़ा, लिखा था, हाहाकार बतासे, ललकार टिकिया। वाह, सच में महारोचक नाम है यह, बतासे ऐसे कि आप हाहाकार कर उठें और टिकिया आपको खाने के लिये ललकारे, विपणन की भला इससे अधिक प्रभावी तकनीक और क्या हो सकती है? कानपुर में ही एक और प्रसिद्ध दुकान है, ठग्गू के लड्डू और बदनाम क़ुल्फ़ी। आनन्द की बात यह है कि इतने दमदार और दामदार नाम होने के बाद भी यह नगर मँहगा नहीं है। बंगलोर जैसे मँहगे नगर में रहने के बाद कानपुर के बारे में एक बात तो सविश्वास कहीं जा सकती है, नामों में दम पर दामों में कम। पिछली पोस्ट में कानपुर की न सुधरने वाली टिप्पणी कहीं हमारे ससुराल, विद्यालय और आईआईटी का हृदय न तोड़ बैठे, इसलिये कानपुर के कुछ अच्छे पक्ष उजागर करने का नैतिक दायित्व भी हमारा ही बनता है।

इदमपि कानपुरम्
झाँसी इण्टरसिटी प्लेटफ़ार्म नम्बर एक से जानी थी। वहाँ पर पहुँच कर एक दूसरे प्रकार के आनन्द की अनुभूति हुयी। पिछले कई वर्षों से एक नम्बर प्लेटफ़ार्म को देखता आ रहा हूँ, सदा ही ऐसा लगा था कि वहाँ पर स्थान कम है और भीड़ अधिक। इस बार स्थान अधिक लगा और भीड़ कम। पिछले एक दो वर्षों से हुये बदलाव में ट्रेन से २० मीटर तक की दूरी से सारी दुकानें, बेंच और अन्य अवरोध हटा लिये गये हैं। इतना सपाट कि वहाँ पर चार सौ मीटर की दौड़ आयोजित की जा सके। ऐसा करने से यात्रियों के आवागमन में कोई कठिनाई नहीं आती है और सब कुछ बड़ा खुला खुला सा लगता है। यदि प्लेटफ़ार्म बनाये जायें तो ऐसे ही बनाये जायें, परिवर्धन भी इन्हीं सिद्धान्तों पर ही हो। दुकान, बेंच आदि बनाने से हम थोड़ी बहुत सुविधा तो देते हैं पर प्लेटफ़ार्म को उसके प्राथमिक कार्यों से वंचित कर देते हैं। प्लेटफ़ार्म का प्राथमिक कार्य अधिकतम भीड़ को निर्बाध रूप से सम्हालना है। भोजन, विश्राम आदि की व्यवस्था प्लेटफ़ार्म क्षेत्र के बाहर हो, प्लेटफ़ार्म पर केवल यात्री ही जाये, सामान ले जाने के लिये ट्रॉली हों, आने और जाने के लिये भिन्न भिन्न द्वार हों, तभी कहीं जाकर स्टेशनों पर स्वच्छता और व्यवस्था रह पायेगी। अभी तो प्लेटफ़ार्म पूरा मेलाक्षेत्र लगता है, १५-२० मीटर चौड़े और ६०० मीटर लम्बे प्लेटफ़ार्म सदा ही पूरी तरह खचाखच भरे दिखते हैं। ट्रेनों में यात्रियों की पूरी संख्या की दृष्टि से भी यह क्षेत्रफल ४ गुना है, फिर भी पैर रखने का स्थान नहीं मिलता है प्लेटफ़ार्मों पर। बताते चलें कि चीन में केवल यात्री ही प्लेटफ़ार्म पर जा सकते हैं और वह भी ट्रेन आने के मात्र ३० मिनट पहले ही। वहाँ के प्लेटफ़ार्म इतने स्वच्छ और खाली दिखते हैं कि वहाँ फ़ुटबॉल खेली जा सके।

इण्टरसिटी समय से आयी, इस बार पिछले दरवाज़े के पास की सीट मिली थी, सीट पर बैठने के बाद अत्यधिक सफल और सुचारु रूप से संचालित कार्यक्रम के लिये कई मित्रों को धन्यवाद प्रेषित किया और आँख बन्द कर कुछ सोचने लगे। थकान तो पहले से ही थी अतः बैठते ही निढाल हो सीट पर ही लुढ़क गये, कब नींद आ गयी पता ही नहीं चला। अधिक विश्राम हो नहीं पाया और शीघ्र ही नींद उचट गयी। वातानुकूलन होने के बाद भी गर्मी लग रही थी, अर्धचेतना में संशय हुआ कि या तो बुखार आ गया है या वातानुकूलन कार्य नहीं कर रहा है। पूर्णचेतना में आने पर कारण तीसरा ही निकला।

कोच के बाहर खड़ा एक व्यक्ति धीरे से दरवाज़ा धकिया कर वातानुकूलन की शीतल हवा बाहर लिये ले रहा था। उसके ऐसा करने से बार बार गर्म हवा का झोंका लग रहा था और विश्राम में विघ्न पड़ रहा था। उलझन तो हुयी पर मुझे उन महाशय की जुगाड़ प्रवृत्ति पर आश्चर्य भी हुआ और हर्ष भी। तभी विद्युत विभाग के अपने एक सहयोगी अधिकारी की बात याद आयी कि यदि दरवाज़ा खुला रह जाये तो वातानुकूलित संयन्त्र पर बहुत अधिक बोझ पड़ जाता है और संभावना रहती है कि वह शीघ्र ही ढेर न हो जाये। कहीं संयन्त्र बिगड़ न जाये, इस संभावना को न आने देने की कटिबद्धता में मैंने टीटी महोदय को बुला कर वातानुकूलन का यह पक्ष समझाया और उन व्यक्ति को ऐसा न करने की सलाह देने को कहा। मेरे याचना में संभवतः उतना बल न होता जितना टीटी महोदय के एक वाक्य में दिखा। उस व्यक्ति ने मेरी ओर ऐसे देखा, मानो मैंने लोकतन्त्र या धर्मनिरपेक्षता की नयी परिभाषा प्रस्तुत कर दी है। फिर बाहर जाकर टीटी महोदय ने उन महाशय को पता नहीं किन शब्दों में क्या समझाया कि वे नत होकर दृष्टि से ओझल हो लिये।

बाहर से गर्म हवा आनी भले ही बन्द हो गयी हो पर लोगों की बातचीत का उच्च स्वर सुनायी पड़ रहा था। कान लगा कर सुना तो विषय था कि अगला प्रधानमंत्री कौन? चर्चा भले ही चलती ट्रेन में हो रही थी, भले ही वातानुकूलन के बाहर हो रही थी, भले ही खड़े खड़े हो रही थी, पर चर्चा टीवी पर होनी वाली चर्चाओं से कहीं ऊँचे स्तर की और कहीं अधिक विश्लेषणात्मक थी। मुज़फ़्फ़रनगर दंगों के राजनैतिक प्रभाव, दशकों से वोटर की बदलती मानसिकता, राजनैतिक पार्टियों की सूचना संग्रहण प्रक्रिया और निर्णयों को किस समय लेना है, इन जैसे कई विषयों पर जो सुनने को मिला, वैसा आज तक न किसी चैनल में सुना और न किसी समाचार विश्लेषण में पढ़ा। कानपुर के आस पास के जनों की इतनी उच्च राजनैतिक चेतना देख कर मन किया कि अपनी सीट उन्हें देकर उनका त्वरित सम्मान कर दें, पर अपनी थकान का स्वार्थ सर चढ़ कर बोलने लगा और यह सुविचार उतनी ही त्वरित गति से त्याग दिया गया। हाँ यदि टीवी चैनल वालों को अपनी टीआरपी स्तरीय विश्लेषणों से बढ़ाने की इच्छा हो तो उन्हें कानपुर-झाँसी के बीच चलने वाली ट्रेनों में अपना स्थायी प्रतिनिधि नियुक्त कर देना चाहिये।

झाँसी उतर कर ३ घंटे का विश्राम था, पर पूर्व परिचितों के आ जाने और उनके साथ बतियाने में वह समय भी निकल गया। नींद का ब्याज बढ़ता जा रहा था, पर राजधानी ट्रेन का आश्रय था कि उसमें सोकर सारी थकान उतारी जायेगी।

बंगलोर राजधानी झाँसी के प्लेटफ़ार्म नम्बर एक पर ही आयी। कोच पीछे था, वहाँ पहुँचने के क्रम में सारे प्लेटफ़ार्म पर एक विहंगम दृष्टि डाली। कानपुर की तुलना में झाँसी का प्लेटफ़ार्म पूरी तरह से भरा और अव्यवस्थित लग रहा था। अव्यवस्था से अधिक, झाँसी का प्लेटफ़ार्म वहाँ पर व्याप्त घोर निर्धनता को भी अभिव्यक्त कर रहा था। रात को कई ट्रेनें झाँसी से होकर निकलती हैं, कई ट्रेनें सुबह जाती है, लोग सायं से ही आकर स्टेशन पर डेरा डाल लेते हैं। प्लेटफ़ार्म पर ग्रेनाइट या अच्छा पत्थर लगने से लोगों को वहाँ पर सो लेने में कष्ट नहीं होता है। बहुतों के पास चद्दर नहीं थी, कई गत्ते बिछाकर सोये थे, कई नीचे अखबार बिछाये लेटे थे। छोटी छोटी गठरियाँ, मैले कुचैले कपड़े, सोये समाज में श्रमिक वर्ग प्रमुख था। पाँच छह के समूह में एक व्यक्ति आधी आँख खोले सामान की सुरक्षा कर रहा था। जो एकल थे, वे अपना सामान या तो हाथों में बाँधे थे या पैरों से दबाये सो रहे थे। बीस मीटर चौड़े प्लेटफ़ार्म पर दो फ़ुट चौड़ा रास्ता नहीं मिल रहा था चलने को। ऐसा नहीं है कि आवश्यकता पड़ने पर प्लेटफ़ार्म पर सोया नहीं जा सकता, पर यह दृश्य देख कर विवशता शब्द अधिक मुखरित होता है।

राजधानी के अन्दर पहुँच कर लगा कि सहसा विश्व परिवर्तन हो गया। रात्रि का डेढ़ बजा था, झाँसी के प्लेटफ़ार्म नम्बर एक का दृश्य मन को व्यथित अवश्य कर रहा था पर इस बार मन पर शरीर ने सहज अधिकार जमा लिया। थकान और शीतल वायु ने कुछ ही मिनटों में सोने को विवश कर दिया। स्वप्नहीन निशा थी, निश्चिन्त निशा थी, पिछले न जाने कितने दिनों की शारीरिक व मानसिक व्यस्तता के बाद घर वापसी की पूर्वनिशा थी। पता ही नहीं चला कि कब रात निकली, कब दिन चढ़ा, कब नागपुर आया और वर्धा पीछे छूट गया। जब नींद खुली तब अच्छा लग रहा था, थकान जा चुकी थी, परिचारक कई बार अल्पाहार व चाय के बारे में पूछ चुके थे। भोजन में क्या लेना है क्या नहीं, कब लेना है, आदि कई प्रश्नों से अपने ही देश में राजा होने का क्षणिक सुख अवश्य देती है राजधानी ट्रेन।

एक युगल था ऊपर की दो सीटों पर, नया विवाह था और प्रेम विवाह था, अनौपचारिकता और व्यवहारिकता अधिक थी, कोई झिझक व संकोच नहीं। हमारे घर में तो कई दिन इस बात पर चर्चा चली कि हमारी श्रीमतीजी हमें क्या संबोधन करें। हमारी माताजी और पिता जी एक दूसरे को पापा और मम्मी ही कहते हैं। कई लोग माँ और पिता के सम्बोधन को वैश्विक न बना कर बच्चों के नाम भी विशेषण के रूप में जोड़ देते हैं। अन्ततः बात पाण्डेजी पर आकर नियत हुयी, साथ में हमसे श्रद्धा कहने का अधिकार भी नहीं छीना गया, यह बात अलग है कि भरी भीड़ में हम भी सुनोजी जैसे सम्बोधनों पर उतर आते हैं। यह युगल था कि धाँय धाँय एक दूसरे का नाम लिये जा रहा था। कितने ही आधुनिकता में आ गये हों पर सार्वजनिक नाम लेना अब भी अटपटा लगता है। अच्छा ही है, माँ बाप ने इतने प्यार से नाम रखा है, लेने देने में क्या जाता है।

सायं से अगली सुबह तक ट्रेन तेलंगाना और सीमान्ध्र क्षेत्र में थी, पूरे आन्ध्र में आन्दोलन की स्थिति थी, भय इस बात का था कि कहीं रास्ते में रोक न लिया जाये। कहीं कुछ भी व्यवधान नहीं आया और हम ११० घंटे के पश्चात अपने परिवार के साथ सकुशल और प्रसन्न थे।

इति यात्रा।