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20.11.13

अपरिग्रह - अध्यात्म विधा

अपरिग्रह का व्यवहारिक पक्ष सबको ज्ञात है। आवश्यकतानुसार उपयोग न केवल संसाधन की उपलब्धता बनाने में सहायक रहता है, वरन स्वयं को भी अनावश्यक संग्रह और आसक्ति से दूर रखता है। इसके अतिरिक्त अपरिग्रह का क्या कोई और पक्ष है?

मूलभूत सिद्धान्तों का एक गुण होता है, आप जहाँ पर भी उन्हें प्रयुक्त करें, निष्कर्षों में भेद नहीं रहता है। अपरिग्रह भी ऐसे ही सिद्धान्तों में से एक है। आप जहाँ पर भी इसे प्रयुक्त करेंगे, जितने समय के लिये प्रयुक्त करेंगे, उसी अनुपात में आपको संतुष्टि और आनन्द मिलेगा। अपरिग्रह का सौन्दर्य यह भी है कि मूलरूप से यह एक आध्यात्मिक सिद्धान्त है और उसका भौतिक जगत में प्रक्षेपण इतना उपयोगी है कि हम उसी में संतुष्ट हो लेते हैं, उसे उसके मौलिक स्वरूप में देखने का प्रयत्न नहीं करते हैं।

जैन धर्म के पाँच मूल सिद्धान्तों में एक, अपरिग्रह का सिद्धान्त जैन सन्तों की जीवनशैली में रचा बसा है। उनके जीवन का अवलोकन ही इस सिद्धान्त की महत्कथा कह जाता है। अपने जीवन में जितना संभव हो सका, अपरिग्रह के अनुपालन की संतुष्टि पा रहा हूँ। गहरे उतरने के व्यवहारिक पक्षों की बाधायें सम्मुख हैं। सैद्धान्तिक रूप से अपरिग्रह के बारे में और जानने की इच्छा उन सूत्रों तक ले गयी जहाँ पर इन्हें मूलतः परिभाषित किया गया है।

आश्चर्यचकित रह गया जब पतंजलि योग सूत्र के साधनपाद में यम नियम के बारे में पढ़ते समय अपरिग्रह का महत्व सूत्रबद्ध दिखा। सहसा लगा कि अपरिग्रह का सिद्धान्त एक गूढ़ अध्यात्म विधा है। सूत्र २.३९ इस प्रकार है। अपरिग्रह स्थैर्ये जन्मकथन्ता सम्बोधः - अपरिग्रह की स्थिरता में जन्म के कैसेपन का साक्षात होता है। अर्थात अपरिग्रह के अभ्यास से आप अपने भूत, वर्तमान और भविष्य के जन्मों को देख सकते हैं, संभावित अस्तित्वों को समझ सकते हैं।

वैसे तो यह सच है कि सिद्धान्त समझने और विकसित होने में समय भी लगता है और समझ भी, पर अपरिग्रह का यह अर्थ न कभी समझा था और न ही कभी सुना था। आवश्यकतानुसार ही उपयोग करने का मन्त्र कैसे ऐसी अलौकिक दृष्टि दे देगा कि आप अपने भूत और भविष्य में झाँक पायेंगे। यदि पंतजलि योगसूत्र पढ़ने का प्रारम्भिक समय होता तो संभवतः इस सूत्र को रहस्यवाद मान कर आगे बढ़ गया होता, पर जिस गूढ़ता से पतंजलि ने सूत्र गढ़ने की कला प्रदर्शित की है, इस रहस्य पर विचार न करना अपनी मूढ़ता का ही परिचायक होता। पतंजलि ने निश्चय ही कोई न कोई गूढ़ सिद्धांत इस सूत्र के माध्यम से व्यक्त किया है।

इस सूत्र पर केन्द्रित कई व्याख्यानों को सुना, कई अध्यायों को पढ़ा, तब कहीं जाकर इस सिद्धान्त की परिधि पर पहुँच पाया। जितना सुना, जितना पढ़ा, उतना ही रोचक होता गया अपरिग्रह का सिद्धान्त।

क्या परिग्रह है, उसे निर्धारित करने के लिये परिधि को समझना होगा। परिधि को समझने के लिये केन्द्र को जानना होगा। केन्द्र के चारो ओर जो भी हो, उसे परिधि से परिभाषित किया जा सकता है। जब तक मैं केन्द्र में शरीर को मानकर विषय को समझ रहा था, अपरिग्रह के व्यावहारिक पक्ष तक ही सीमित था, कपड़े और अन्य वस्तुओं तक ही। पतंजलि के इस सूत्र की व्याख्या सुनी तो समझ गया कि मुझे इस विषय के तल में जाने के लिये अपना केन्द्र पुनर्परिभाषित करना होगा, यदि ऐसा न करता तो सूत्र की पूरी व्याख्या नहीं जान पाता।

भारतीय दर्शन के संदर्भों में, वासांसि जीर्णानि यथा विहाय के संदर्भों में, शरीर भी परिधि ही है। परिवर्तनशील शरीर को केन्द्र कभी नहीं माना गया, जिस तरह हम कपड़े बदलते हैं, उसी प्रकार आत्मा भी शरीर बदलती है। केन्द्र में सदा ही आत्मा रही है, न मन, न बुद्धि, न शरीर।

अपरिग्रह के सिद्धान्त की गहराई केन्द्र निर्धारित करते ही दृष्टिगत होने लगती है। आत्म के अतिरिक्त शेष को अपना न मानने का भाव ही अपरिग्रह का आध्यात्मिक पक्ष है। स्वयं को शरीर या मन मानने के क्रम में हम स्वयं को परिधि में परिधि में स्थापित कर लेते हैं और जब कालचक्र चलता है तो हम परिधि पर आने वाले बलाक्षेप से जूझने में लगे रहते हैं, संभवतः इसी संघर्ष को मर्मज्ञ कालचक्र के गतिमय प्रवाह से परिभाषित करते हैं। प्रकृति के कालचक्र से बचना है तो केन्द्र की ओर बढ़ते रहना ही श्रेयस्कर है क्योंकि केन्द्र में ही बल का प्रक्षेप शून्य होता है।

शरीर नहीं त्यागना होता है, मन भी नहीं त्यागना होता है, यदि अपरिग्रह के हेतु कुछ त्यागना होता है तो वह है स्वयं के शरीर या मन होने के भाव का। शरीर, मन, स्मृतियाँ, भय, सब के सब मिलकर एक ऐसा विश्व निर्मित कर देते हैं कि हम उसमें उलझे रहते हैं, उसके पार कुछ भी नहीं देख पाते हैं, कुछ भी नहीं समझ पाते हैं। जब यह सब भाव छटता है, जन्म और उसके कारण, भूत-भविष्य और उसके विस्तार, सब के सब स्वतः ही समझ आने लगते हैं। निश्चय ही पतंजलि के लिये अपरिग्रह की यही अवधारणा रही होगी।

अपरिग्रह का प्रारम्भ उस बिन्दु से होता है जब हम सोचते हैं कि कोई वस्तु या व्यक्ति हमें सुख दे सकता है। किन्तु जब अन्यथा निष्कर्ष देखने को मिलता है तो धीरे धीरे हम अपनी खोखली आश्रयता को तिलांजलि देने लगते हैं। आनन्द की सततता जब फिर भी सुनिश्चित नहीं होती है, तो हम सिद्धान्त की सीमायें बनाने लगते हैं और उससे परे दूसरे सिद्धान्त सोचने लगते हैं, वर्तमान सिद्धान्त पर संशय करने लगते हैं। पतंजलि का यह सूत्र अपरिग्रह के सिद्धान्त को उसके उत्कर्ष पर न केवल स्थापित करता है, वरन उसे अध्यात्म का मूलमन्त्र भी बना देता है।

अपरिग्रह का सिद्धान्त पतंजलि से अच्छा न कोई समझ सकता है, न कोई समझा सकता है। वर्णित सूत्र स्वयं में ही अपरिग्रह के जीवन्त उदाहरण हैं। ज्ञान के विस्तार को इस तरह से प्रस्तुत करना कि कोई भी शब्द अनावश्यक न हो और कोई भी अर्थ छूटा न हो। योगसूत्र की रचना अपरिग्रह के सिद्धान्त का ही मूर्त स्वरूप है, आकार में भी, विषय में भी। अपरिग्रह की यह अध्यात्म विधा, इस सिद्धान्त को मानव अस्तित्व के मौलिकतम सिद्धान्तों में स्थापित करती है।

2.3.13

टा डा डा डिग्डिगा

जब टीवी पर किसी कार्यक्रम की भड़भड़ से मन भागता है, प्रचारों की विचाररहित, भावनात्मक और बहुधा ललचाने वाली अभिव्यक्तियों से मन खीझता है तो इच्छा होती है कि तुरन्त ही चैनल बदल कर उस कार्यक्रम को दण्ड दिया जाये। जब अगला कार्यक्रम भी बिना किसी कार्य और क्रम के हो तो बस यही लगता है कि कहीं तो एक ढंग का चैनल तो हो जिस पर बैठ कर एक आधा घंटा बिताया जा सकता सके। जब पीड़ा ऐसे घनीभूत होती है तो ईश्वर भी सुन लेता है। डीडी भारती के रूप में एक चैनल है जिसमें संगीत और संस्कृति को प्राथमिकता दी जाती है और बिना अधिक लाग लपेट के कार्यक्रमों का निर्माण और प्रस्तुतीकरण होता है। अधिकांश कार्यक्रम बहुत पहले से रिकॉर्डेड होते हैं पर देखने में पर्याप्त संतुष्टि मिलती है। प्रचारों के कोलाहल की अनुपस्थिति इस चैनल को और भी आकर्षक बना देती है।

ऐसे ही एक दिन डीडी भारती में उस्ताद आमिर खान की गायकी के बारे में एक कार्यक्रम आ रहा था। इन्दौर घराने से प्रारम्भ उनकी गायकी में ध्रुपद, खयाल, तराना, विलम्बित ताल, मेरुखंड, तान, राग आदि विषयों के बारे में बताया जा रहा था। कई बिन्दु समझ में न आने पर भी एक आनन्द आ रहा था, एक क्षण के लिये भी सामने से हट नहीं पाया। ऐसा लग रहा था कि कोई मेरुदण्ड सीधा कर बैठा योगी ध्यानस्थ हो, अध्यात्म में डुबकी लगा अपने ईश से संवाद स्थापित कर रहा हो। संगीत का ऐसा उद्दात्त और गहन स्वरूप देख कर रोमांचित होने के अतिरिक्त मन को कुछ सूझता ही नहीं था। अभी जब यह आलेख लिख रहा हूँ, पार्श्व में राग बसन्त बहार चल रही है, लगता है कोई आपके हृदय के गहन तलों से सीधा संबंध सजा रहा हो।

अध्यात्म आधारित संगीत वही प्रभाव उत्पन्न कर रहा था जहाँ से उसके मूल जुड़े हुये थे। स्वर शब्दों से बँधे नहीं थे या कहें कि शब्द थे ही नहीं, मात्र ध्वनियाँ, अक्षरों के आस पास, लहराती हुयी। ईश्वर से संवाद की भाषा में कोई शब्द मिला ही नहीं। शब्द रहते तो कोई आकार उभरता, वह आकार हमें भौतिक जगत की किसी वस्तु से जोड़ देता, हमें तब अध्यात्म के स्वर समझने के लिये निम्नतर आधार लेना होता, संवाद अपना मान खो बैठता। शब्दों से कोई बैर नहीं है संगीत का, पर शब्दों की सीमायें हैं। सीमायें शब्द भी नहीं वरन उसके अर्थ हैं जो हम सबके मन में भिन्न प्रभाव उपजाते हैं। अर्थ हमें सीमित कर देते हैं। संगीत यदि ईश्वर से जुड़ने का मार्ग है तो शब्दों की बाध्यता वह मार्ग बाधित नहीं कर सकती।

संगीत और अध्यात्म का विषय तो बहुत पहुँचे लोगों का विषय हो जाता है, पर ध्वनियाँ से हमारा संबंध जन्म से ही है। प्रथम स्वर शब्द नहीं होते हैं, वह तो मूल ध्वनियाँ होती हैं जो दो जगत को जोड़ती हैं। धीरे धीरे हम शब्द सीखते जाते हैं, जगत से जुड़ते जाते हैं, सीमित होते जाते हैं और स्वयं से बहुत दूर भी। शब्द विज्ञानी कहते हैं कि शब्दों का उद्भव भी ध्वनियों से ही हुआ है। धातु का जुड़ाव ध्वनियों से ही है। मूल धातु से और शब्द निकले और भाषा बनकर पसर गये, पर जड़ों में वहीं ध्वनियाँ हैं जो वह भाव आने पर पहली बार प्रकट हुयी होंगी। यदि भाषा और शब्दों का मूल हमारे अन्दर है तो मन के अनजाने भावों को व्यक्त करने में स्थापित शब्दों का सहारा क्यों? अपने जीवन में ऐसी ही दसियों ध्वनियाँ याद आ जायेंगी जिनका कोई शाब्दिक अर्थ नहीं पर वे भावों के अध्याय व्यक्त करने में सक्षम होती हैं।

ऐसा ही एक ध्वनि स्वरूप याद आता है, बचपन का। हम सब लोग मिलकर खेलते थे, जीतने के बाद गाते थे, टा डा डा डिग्डिगा। बचपन की यादें जुड़ी हैं इससे। कोई पूछे कि इसका शाब्दिक अर्थ क्या होता है तो बताना कठिन होगा पर इसका क्रियात्मक अर्थ है, हर्ष, उल्लास और मदमस्त होकर किया गया विजय नृत्य। ये शब्द विजय नृत्य के समय तब तक गाये जाते हैं, जब तक आप थक न जायें और हारने वाले आपसे पक न जायें।

पता नहीं कब और कैसे यह प्रारम्भ हुआ था पर मोहल्ले के लड़के इसी तरह से विजयोत्सव मनाते थे। गिल्ली डंडा हो, कंचा हो, गोल दौड़ हो, लूडो हो, शतरंज हो, ताश हो, हर प्रकार के छोटे बड़े खेलों में जीता हुआ दल इन शब्दों का उद्घोष करता था। आदत ऐसी उतर गयी है मन में कि अभी भी जब बच्चों को किसी खेल में हराते हैं, हम उसी तरह से गाने और नाचने लगते हैं। बच्चों को अटपटा लगता है क्योंकि इस तरह का कभी देखा नहीं, बच्चों को रोचक भी लगता है क्योंकि इसमें भाव पूरी तरह से उतर भी आते हैं। शब्दों का कोई अर्थ नहीं पर प्रभाव पूर्ण।

कहते हैं कि खेल में हार जीत तो होती रहती है, उसे खेल की तरह से लेना चाहिये, उसे सुख दुख से नहीं जोड़ना चाहिये। हम भी सहमत हैं, हार के समय सुखी नहीं होते हैं और जीत के समय दुखी नहीं होते हैं। पर ऐसी जीत का क्या लाभ जिसमें जीतने वाला उत्सव न मनाये और हारने वाला झेंपे नहीं। विजयनृत्य होता था हम लोगों का और दस पन्द्रह मिनट तक चलता था। पार्श में रहता था, टा डा डा डिग्डिगा। विजेता का हारने वाले से पूर्ण संवाद स्थापित हो जाता था, बिना एक भी सीखा हुआ शब्द उच्चारित करे हुये, बिना अर्थयुक्त शब्द उच्चारित किये हुये। आनन्द का इससे विशुद्ध, मूल और प्राकृतिक स्वरूप किसी और ध्वनि में नहीं मिला आज तक।

धीरे धीरे बड़े होते जा रहे हैं हम लोग और जीवन से टा डा डा डिग्डिगा लुप्त होता जा रहा है। हम शब्दों और उनके परिचित अर्थों में स्वयं को सीमित किये बैठे हैं। आज ऊब से बचने के प्रयास में संगीत और अध्यात्म के उस संवाद से परिचय और प्रगाढ़ हुआ जहाँ शब्दों का कोई कार्य नहीं। अम्मा शब्द से प्रारम्भ जीवन, टा डा डा डिग्डिगा में बीता लड़कपन और अब ख़याल के ध्वन्यात्मक संसार में डूब कर विश्वास हो चला है कि जीवन के न जाने कितने मौलिक स्वर अभी भी हृदय में बंद हैं, बाहर आने को आतुर हैं। आपका भी कोई टा डा डा डिग्डिगा है जीवन में?