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31.1.16

आत्म-परिचय

जहाँ पर मन लग गया,
मैं उस जगह का हो गया ।
पर सत्य परिचय खो गया ।।

बाल्यपन में पुत्र बनकर,
लड़कपन में मित्र बनकर,
और 
सम्बन्धों के भारी जाल मैं बुनता गया ।
पर सत्य परिचय खो गया ।।१।।

और विद्यालय में जाकर,
ज्ञान का अंबार पाया ।
किन्तु वह सब व्यर्थ था,
यदि सत्य परिचय नहीं पाया ।।२।।

स्वयं को ज्ञानी भी समझा,
तुच्छ अभिमानी भी समझा ।
किन्तु हृद में प्रश्न था जो,
नहीं फिर भी जान पाया ।।३।।

देश, जाति, घर, धर्म आधारित,
सम्बोधन थे मैने पाये ।
किन्तु कभी भी इन शब्दों में,
परिचय अपना दिख न पाये ।।४।।

किन्तु तभी ही, मेरे प्रेम सरोवर की एक कृपा किरण से,
मैने जाना, सारे परिचय, मेरे तन पर आधारित थे ।
मैं अब तक इस नश्वर तन में, परिचय अपना पाता था,
मैं हूँ एक अविनाशी आत्मा, इसको भूला जाता था ।।

प्रश्न अब यह सुलझता है,
मन खुशी से मचलता है ।


19.10.13

कितनी पहचानें

कुछ दिन पहले एक डाटा कार्ड लिया था। उसके लिये दो प्रमाणपत्रों की आवश्यकता थी, पहचान के लिये और निवास के लिये। यद्यपि मेरे पास कार्यालय द्वारा प्रदत्त पहचान पत्र और निवास प्रमाण पत्र था पर एयरटेल वालों ने दोनों ही मानने से मना कर दिया। समझाया कि यह एक सरकारी प्रपत्र है तो कहने लगे कि कोई भी संस्था अपने कर्मचारियों को इस तरह के काग़ज़ बाँटती रहती है। भंगिमाओं से देखा जाता तो उनका प्रतिनिधि एक न्यायविद की तरह बात कर रहा था और मुझे एक संदिग्ध आतंकवादी की तरह समझ रहा था। विकल्प था अतः पैन कार्ड का प्रस्ताव रखा, उस पर भी मना कर दिया, कहा कि उसमें निवास प्रमाण पत्र नहीं रहता है। चुनाव पहचान पत्र था तो उसमें गृहनगर का पता था, ड्राइविंग लाइसेन्स पर अन्य नगर का पता था। लगा कि, सुरक्षा के नाम पर जितना कवच चढ़ा रखा है, उसके अनुसार तो हमें डाटाकार्ड मिलने से रहा। एयरटेल की फाइलों में संभवतः मेरे केस का निस्तारण मेरे ऊपर प्रतिकूल टिप्पणी करने जैसा हो। मेरे डाटा कार्ड को न देने का कारण संभवतः यह लिख दिया जाये, कि वैध पहचान व निवास प्रमाण पत्र प्रस्तुत करने में असमर्थ, भारतीय नागरिक होने में सन्देह। इतने कड़े नियम बने रहे तो हम जैसे सरकारी नौकर भी बांग्लादेशी घुसपैठिये मान लिये जायेंगे। अपने देश में ही हमारे साथ परायों सा व्यवहार हो रहा है, हम निराशा में डूब गये।

पहचान सिद्ध करने के लिये पहचानें
तब सोचा कि नियम अंधे हो सकते हैं, मानवीय संवेदनायें नहीं। हमने कहा कि हम तो भारत सरकार की कार्यनदी में डूबते उतराते तत्व हैं और हर दो तीन वर्ष में अपना स्थान बदलते रहते हैं। अपने कार्यालय के अतिरिक्त कोई और प्रमाण पत्र तो ला भी नहीं सकते हैं। आप ही अपने आप में संतुष्ट हो लो, दयादृष्टि कर दो। पता नहीं तर्क ने अपना काम किया या उसे सद्बुद्धि आयी या उसका अहं संतुष्ट हुआ, पर वह मान गया। एक दो दिन में घर के पते पर सत्यापन करने आया और अगले दो दिनों में फ़ोन के द्वारा पुनर्सत्यापन कर डाटा कार्ड प्रारम्भ कर दिया।

बैंक वाले भी पहचान पूरी जानने के लिये लालायित रहते हैं, पर उनके लिये पैन कार्ड ही सब कुछ है, संभवतः उन्हें व्यक्ति के आर्थिक पक्ष से ही सारोकार है। पैन कार्ड वाले व्यक्ति के लिये बैंक में कुछ भी करवा पाना कठिन नहीं है। हर छोटी सी चीज़ के लिये एक फोटो माँग लेते हैं और पैन कार्ड की फोटोकापी।

इसी कड़ी में अभी कुछ दिन पहले आधार कार्ड के लिये एक कैम्प रेलवे परिसर में ही लगा। सबने कहा बनवा लीजिये, इतने जटिल अनुभव पाने के बाद अपना आधार स्थापित करना अत्यन्त आवश्यक है। हम भी सहमत हो गये कि चलो, इसी बहाने ठोस सरकारी आधार मिल जायेगा। यहाँ भी डाटाकार्ड की तरह दो प्रमाणपत्र माँगे गये, मैंने तुरन्त ही रेलवे प्रदत्त पहचान और निवास प्रमाणपत्र प्रस्तुत कर दिये। ठेके पर आधारकार्ड बनवाने वाले युवा के चेहरे से लगा कि वह भी एयरटेल के प्रतिनिधि की तरह न्यायविद की कुर्सी पर सत्तासीन है, पर नीचे रेलवे की मुहर देख कर तनिक ठंडा पड़ गया। जिस संस्था की भूमि पर उसे आधार कार्ड बनाने की सुविधा मिली थी, वह उसके मुहर की अवहेलना नहीं कर सकता था। संतुष्टि के भाव आंशिक अवश्य थे पर कोई हठधर्मिता नहीं दिखी। मेरे पूरे हाथ के प्रिण्ट और आँखों की छाप ले ली गयी और प्रक्रिया पूरी होने के बाद एक पावती पकड़ा दी गयी।

जब श्रीमतीजी और बच्चों की बारी आयी तो मेरे प्रमाणपत्रों के आधार पर उनका आधारकार्ड बनाने से वह नियमों के अध्याय पढ़ने लगा। कहा कि पहले तो आप यह सिद्ध कीजिये कि ये वही हैं जो आप कह रहे हैं। साथ ही साथ उनके साथ अपने संबंध का प्रमाणपत्र भी लाइये। हमें लग गया कि इस ठेके के एजेण्ट ने हमारा सर तो किसी विवशतावश निकल जाने दिया पर हमारे धड़ को नियमों के पाश से जकड़ लिया।

श्रीमतीजी के साथ हमारे संबंध का प्रमाण पत्र एक वह फोटो भर थी, जिसमें हम मुस्कुराने का प्रयास करते हुये उनके गले में वरमाला डाल रहे थे। विवाह के पंजीकरण को करोड़ों भारतीयों की तरह अनिवार्य न मानते हुये, उसी फोटो की स्मृतिविधा में जिये जा रहे थे। फोटोशॉप के आगमन के बाद तो ऐसी न जानी कितनी फोटुयें संदेह के घेरे में आ जायें। श्रीमतीजी जिस तरह प्यार से हमें घर में समझाती हैं, उस तरह समझाकर वह अपनी पत्नी होने के संबंध को सिद्ध कर सकती थीं, पर भरी भीड़ में ऐसा करने में वह सकुचा गयी होंगी। श्रीमतीजी ने अपना पैनकार्ड और चुनाव पहचान पत्र तो दिखा दिया, पर वे दोनों ही विवाह के पहले के थे और दोनों में ही उनके पिताजी का नाम अभिभावक के रूप में लिखा था। संबंध सिद्ध करने का फिर भी कोई प्रमाणपत्र नहीं था। यद्यपि वहाँ पर खड़े दो बच्चे हम दोनों को माताजी और पिताजी कह रहे थे और यह तथ्य हमारे पति पत्नी के संबंधों को सिद्ध करता था, पर नियमों के सामने भावनाओं का कोई मोल नहीं।

बच्चों के साथ तो समस्या और गहरी थी। उनके पास न तो पहचान पत्र ही था और न ही संबंध सिद्ध करने का प्रमाणपत्र। यदि संबंध के नाम पर कुछ था तो वह कई वर्ष पहले बनवा लिया जन्म प्रमाण पत्र, जिसमें पिता के रूप में मेरा नाम लिखा था. पर वह यह सुनिश्चित नहीं करता था कि उसमें लिखा पता मेरा ही है, किसी और प्रवीण पाण्डेय का नहीं। साथ ही साथ उसमें लिखा पता मेरा स्थायी पता था, न कि वर्तमान। एक और बात थी कि जन्म प्रमाण पत्र में बच्चों की फोटो नहीं लगी थी, तो यह भी सिद्ध नहीं हो पा रहा था कि जो बच्चे वहाँ पर खड़े हैं, वे उन्हीं के जन्म प्रमाण पत्र है। जन्म प्रमाण पत्र इस प्रकार एक चौथाई भी पहचान सिद्ध नहीं कर पा रहा था। दूसरा था, विद्यालय प्रदत्त पहचान पत्र। विद्यालय पहचान पत्र में फोटो तो लगी थी पर घर का पता नहीं था और साथ ही साथ माता पिता का नाम नहीं था। अत: वह पहचान पत्र भी पूर्ण नहीं माना गया। हाँ, यदि दोनों को मिला कर तार्किक निष्कर्ष निकाले जाते तो पहचान और संबंध पूर्ण सिद्ध हो रहे थे, पर अधिक बुद्धि लगाना ठेके पर आये एजेण्टों के अधिकार क्षेत्र में नहीं था।

अब क्या किया जाये, हमारा आधार बन जाये और यदि औरों का न बने तो घर में विद्रोह निश्चित था। लगा कि नियमों से परे कोई देशी तोड़ निकालना पड़ेगा। थोड़ा और गहराई में उतरा गया तो पता लगा कि कोई सांसद, विधायक या राजपत्रित अधिकारी प्रमाणपत्र दे दे तो वह उन्हे मान्य है। एक राजपत्रित अधिकारी होने को आधार पर जब मैंने सबका प्रमाणपत्र देने को कहा तो मुझको कहा गया कि आप अपने संबंधी के लिये प्रमाणपत्र नहीं दे सकते। मैंने कहा कि आप उन्हें मेरा संबंधी मान ही नहीं रहे हैं तो प्रमाणपत्र देने दीजिये। यह भी तर्क भैंस के सामने बीन बजाने जैसा सिद्ध हुआ।

अब मेरा कार्याल़य मेरी श्रीमतीजी और बच्चों के लिये पहचान पत्र और संबंध प्रमाणपत्र कैसे दे? यह बड़ी समस्या थी और उनके अधिकार क्षेत्र के बाहर भी। कार्यालय तो मेरे लिये तो यह कार्य कर सकता था, बच्चों और श्रीमतीजी का सत्यापन उसकी परिधि के बाहर था। यह दोनों ही विषय राज्य सरकार की अधिकार सूची में थे और हम ठहरे केन्द्र सरकार के नौकर, कोई किसी की सुध क्यों ले। कार्यालय को यह भी भय था कि कहीं हम उन प्रमाण पत्रों को किसी और उपयोग में न ले आयें। अन्ततः एक सरकारी उपाय निकाला गया। हमने अपने वरिष्ठ अधिकारी को लिख कर दिया कि आधार कार्ड बनवाने के लिये मुझे संलग्न प्रमाणपत्रों की आवश्यकता है, जिसके आधार पर हमें केवल इसी हेतु और एक बार उपयोग में लाने के लिये प्रमाणपत्र दे दिया गया। आधारकार्ड वाले भी उन प्रमाण पत्रों को मान गये और श्रीमतीजी और बच्चों के लिये भी आधारकार्ड की प्रक्रिया पूरी हो गयी। अब तीन माह बाद हम सबके आधारकार्ड बनकर मिल जायेंगे।

एक देश में एक ही पहचान हो
अब पता नहीं कि आने वाले समय में आधारकार्ड ही एकमात्र पहचान रहेगी कि अन्य पहचानों का सहारा भी लिया जायेगा? आज आकर मैंने अपने सारे पहचान प्रमाणपत्र व बैंक आदि के कार्ड निकाल कर देखे, छोटे बड़े मिलाकर १०-१२ निकले, सब के सब एक दूसरे से असंबद्ध। हर कार्ड के लिये कोई न कोई पहचान प्रस्तुत की गयी होगी पर किसी में भी कोई संदर्भ नहीं था। क्या आने वाले समय में पहचान के सारे बिखरे तन्तुओं को एक सूत्र में पिरोया जायेगा? क्या निश्चय समयाविधि में आधारकार्ड सबके लिये अनिवार्य होगा और सारे कार्डों में आधारकार्ड का संदर्भ देना आवश्यक किया जायेगा? क्या अमेरिका की तरह कोई एक ही पहचान पत्र को सभी प्रकार के सामाजिक व आर्थिक प्रक्रियाओं के लिये मान्यता दी जायेगी?

मेरे इस जन्म में तो यह सब होता असंभव दिखता है। सुना है कि बांग्लादेशी घुसपैठियों को सहज ही पहचान मिल जाती है और इसी देश में जन्मे और बढ़े हुये न जाने कितनों को अपनी पहचान सिद्ध करने में संशय और संदेह के कितने अपमानों से होकर निकलना पड़ता है। अगले जन्म में यदि पुनः भारत आने का आदेश मिलता है तो ईश्वर से कहूँगा कि कर्ण की तरह ही कवच और कुण्डल चढ़ा कर भेजना। कर्ण की तरह अपमान और तिरस्कार झेलने की शक्ति भी आ जायेगी और कवच और कुण्डल दिखा कर अपनी पहचान भी बताता रहूँगा।