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4.1.15

दृश्य-गंगा

रेतगंगा, श्वेतगंगा,
वेगहत, अवशेष गंगा।

रिक्त गंगा, तिक्त गंगा,
उपेक्षायण, क्षिप्त गंगा।

भिन्न गंगा, छिन्न गंगा,
अनुत्साहित, खिन्न गंगा।

प्राण गंगा, त्राण गंगा,
थी कभी, निष्प्राण गंगा।

लुप्त गंगा, भुक्त गंगा,
प्रीतिबद्धा मुक्त गंगा।

महत गंगा, अहत गंगा,
शान्त सरके वृहत गंगा।

पूर्ण गंगा, घूर्ण गंगा,
कालचक्रे चूर्ण गंगा।

12.10.13

कानपुर से बंगलोर

आनन्द के अतिरेक में थकान का पता नहीं चलता है। थकान तब आती है, जब आनन्द अवस्था से आप जीवन के सामान्य पर उतर आते हैं। दिनभर सहपाठियों के साथ भेंट में समय का पता ही नहीं चला। मन तो प्रसन्न ही बना रहा, पर शरीर अपनी सीमाओं से कितना परे जा चुका था, उसका प्रमाण मिलना शेष था। मन अपने सामने किसी की सुनता नहीं है, सबसे मनमाना कार्य लेता है। शेष सबको अपनी सीमाओं से आगे निकलने का पता तब चलता है जब मन तनिक शान्त होता है। मन मित्र बना रहे, सच्चा साथ देता रहे, भरमाये नहीं, उद्विग्न न करें, और भला क्या चाहिये इस चंचल जीव से।

स्टेशन जाते समय थोड़ी देर के लिये अपने मामाजी के यहाँ जाना हुआ। मन का उछाह और तन की थकान मेरे ममेरे भाई को स्पष्ट दिख गयी थी, उसने स्नान करने की भली सलाह दी। स्नान के पश्चात मन स्थिर हुआ, शरीर में शीतलता भी आयी, पर लगा कि थोड़ा विश्राम फिर भी आवश्यक है। अब थोड़ी ही देर में वापसी की यात्रा प्रारम्भ करनी है, सोचा तभी जीभर कर विश्राम हो जायेगा, अभी तन्त्रिका तन्तुओं को सचेत रखते हैं।

नाम में दम
वहाँ से स्टेशन जाते समय एक चाट वाला ठेला दिखायी पड़ा, लिखा था, हाहाकार बतासे, ललकार टिकिया। वाह, सच में महारोचक नाम है यह, बतासे ऐसे कि आप हाहाकार कर उठें और टिकिया आपको खाने के लिये ललकारे, विपणन की भला इससे अधिक प्रभावी तकनीक और क्या हो सकती है? कानपुर में ही एक और प्रसिद्ध दुकान है, ठग्गू के लड्डू और बदनाम क़ुल्फ़ी। आनन्द की बात यह है कि इतने दमदार और दामदार नाम होने के बाद भी यह नगर मँहगा नहीं है। बंगलोर जैसे मँहगे नगर में रहने के बाद कानपुर के बारे में एक बात तो सविश्वास कहीं जा सकती है, नामों में दम पर दामों में कम। पिछली पोस्ट में कानपुर की न सुधरने वाली टिप्पणी कहीं हमारे ससुराल, विद्यालय और आईआईटी का हृदय न तोड़ बैठे, इसलिये कानपुर के कुछ अच्छे पक्ष उजागर करने का नैतिक दायित्व भी हमारा ही बनता है।

इदमपि कानपुरम्
झाँसी इण्टरसिटी प्लेटफ़ार्म नम्बर एक से जानी थी। वहाँ पर पहुँच कर एक दूसरे प्रकार के आनन्द की अनुभूति हुयी। पिछले कई वर्षों से एक नम्बर प्लेटफ़ार्म को देखता आ रहा हूँ, सदा ही ऐसा लगा था कि वहाँ पर स्थान कम है और भीड़ अधिक। इस बार स्थान अधिक लगा और भीड़ कम। पिछले एक दो वर्षों से हुये बदलाव में ट्रेन से २० मीटर तक की दूरी से सारी दुकानें, बेंच और अन्य अवरोध हटा लिये गये हैं। इतना सपाट कि वहाँ पर चार सौ मीटर की दौड़ आयोजित की जा सके। ऐसा करने से यात्रियों के आवागमन में कोई कठिनाई नहीं आती है और सब कुछ बड़ा खुला खुला सा लगता है। यदि प्लेटफ़ार्म बनाये जायें तो ऐसे ही बनाये जायें, परिवर्धन भी इन्हीं सिद्धान्तों पर ही हो। दुकान, बेंच आदि बनाने से हम थोड़ी बहुत सुविधा तो देते हैं पर प्लेटफ़ार्म को उसके प्राथमिक कार्यों से वंचित कर देते हैं। प्लेटफ़ार्म का प्राथमिक कार्य अधिकतम भीड़ को निर्बाध रूप से सम्हालना है। भोजन, विश्राम आदि की व्यवस्था प्लेटफ़ार्म क्षेत्र के बाहर हो, प्लेटफ़ार्म पर केवल यात्री ही जाये, सामान ले जाने के लिये ट्रॉली हों, आने और जाने के लिये भिन्न भिन्न द्वार हों, तभी कहीं जाकर स्टेशनों पर स्वच्छता और व्यवस्था रह पायेगी। अभी तो प्लेटफ़ार्म पूरा मेलाक्षेत्र लगता है, १५-२० मीटर चौड़े और ६०० मीटर लम्बे प्लेटफ़ार्म सदा ही पूरी तरह खचाखच भरे दिखते हैं। ट्रेनों में यात्रियों की पूरी संख्या की दृष्टि से भी यह क्षेत्रफल ४ गुना है, फिर भी पैर रखने का स्थान नहीं मिलता है प्लेटफ़ार्मों पर। बताते चलें कि चीन में केवल यात्री ही प्लेटफ़ार्म पर जा सकते हैं और वह भी ट्रेन आने के मात्र ३० मिनट पहले ही। वहाँ के प्लेटफ़ार्म इतने स्वच्छ और खाली दिखते हैं कि वहाँ फ़ुटबॉल खेली जा सके।

इण्टरसिटी समय से आयी, इस बार पिछले दरवाज़े के पास की सीट मिली थी, सीट पर बैठने के बाद अत्यधिक सफल और सुचारु रूप से संचालित कार्यक्रम के लिये कई मित्रों को धन्यवाद प्रेषित किया और आँख बन्द कर कुछ सोचने लगे। थकान तो पहले से ही थी अतः बैठते ही निढाल हो सीट पर ही लुढ़क गये, कब नींद आ गयी पता ही नहीं चला। अधिक विश्राम हो नहीं पाया और शीघ्र ही नींद उचट गयी। वातानुकूलन होने के बाद भी गर्मी लग रही थी, अर्धचेतना में संशय हुआ कि या तो बुखार आ गया है या वातानुकूलन कार्य नहीं कर रहा है। पूर्णचेतना में आने पर कारण तीसरा ही निकला।

कोच के बाहर खड़ा एक व्यक्ति धीरे से दरवाज़ा धकिया कर वातानुकूलन की शीतल हवा बाहर लिये ले रहा था। उसके ऐसा करने से बार बार गर्म हवा का झोंका लग रहा था और विश्राम में विघ्न पड़ रहा था। उलझन तो हुयी पर मुझे उन महाशय की जुगाड़ प्रवृत्ति पर आश्चर्य भी हुआ और हर्ष भी। तभी विद्युत विभाग के अपने एक सहयोगी अधिकारी की बात याद आयी कि यदि दरवाज़ा खुला रह जाये तो वातानुकूलित संयन्त्र पर बहुत अधिक बोझ पड़ जाता है और संभावना रहती है कि वह शीघ्र ही ढेर न हो जाये। कहीं संयन्त्र बिगड़ न जाये, इस संभावना को न आने देने की कटिबद्धता में मैंने टीटी महोदय को बुला कर वातानुकूलन का यह पक्ष समझाया और उन व्यक्ति को ऐसा न करने की सलाह देने को कहा। मेरे याचना में संभवतः उतना बल न होता जितना टीटी महोदय के एक वाक्य में दिखा। उस व्यक्ति ने मेरी ओर ऐसे देखा, मानो मैंने लोकतन्त्र या धर्मनिरपेक्षता की नयी परिभाषा प्रस्तुत कर दी है। फिर बाहर जाकर टीटी महोदय ने उन महाशय को पता नहीं किन शब्दों में क्या समझाया कि वे नत होकर दृष्टि से ओझल हो लिये।

बाहर से गर्म हवा आनी भले ही बन्द हो गयी हो पर लोगों की बातचीत का उच्च स्वर सुनायी पड़ रहा था। कान लगा कर सुना तो विषय था कि अगला प्रधानमंत्री कौन? चर्चा भले ही चलती ट्रेन में हो रही थी, भले ही वातानुकूलन के बाहर हो रही थी, भले ही खड़े खड़े हो रही थी, पर चर्चा टीवी पर होनी वाली चर्चाओं से कहीं ऊँचे स्तर की और कहीं अधिक विश्लेषणात्मक थी। मुज़फ़्फ़रनगर दंगों के राजनैतिक प्रभाव, दशकों से वोटर की बदलती मानसिकता, राजनैतिक पार्टियों की सूचना संग्रहण प्रक्रिया और निर्णयों को किस समय लेना है, इन जैसे कई विषयों पर जो सुनने को मिला, वैसा आज तक न किसी चैनल में सुना और न किसी समाचार विश्लेषण में पढ़ा। कानपुर के आस पास के जनों की इतनी उच्च राजनैतिक चेतना देख कर मन किया कि अपनी सीट उन्हें देकर उनका त्वरित सम्मान कर दें, पर अपनी थकान का स्वार्थ सर चढ़ कर बोलने लगा और यह सुविचार उतनी ही त्वरित गति से त्याग दिया गया। हाँ यदि टीवी चैनल वालों को अपनी टीआरपी स्तरीय विश्लेषणों से बढ़ाने की इच्छा हो तो उन्हें कानपुर-झाँसी के बीच चलने वाली ट्रेनों में अपना स्थायी प्रतिनिधि नियुक्त कर देना चाहिये।

झाँसी उतर कर ३ घंटे का विश्राम था, पर पूर्व परिचितों के आ जाने और उनके साथ बतियाने में वह समय भी निकल गया। नींद का ब्याज बढ़ता जा रहा था, पर राजधानी ट्रेन का आश्रय था कि उसमें सोकर सारी थकान उतारी जायेगी।

बंगलोर राजधानी झाँसी के प्लेटफ़ार्म नम्बर एक पर ही आयी। कोच पीछे था, वहाँ पहुँचने के क्रम में सारे प्लेटफ़ार्म पर एक विहंगम दृष्टि डाली। कानपुर की तुलना में झाँसी का प्लेटफ़ार्म पूरी तरह से भरा और अव्यवस्थित लग रहा था। अव्यवस्था से अधिक, झाँसी का प्लेटफ़ार्म वहाँ पर व्याप्त घोर निर्धनता को भी अभिव्यक्त कर रहा था। रात को कई ट्रेनें झाँसी से होकर निकलती हैं, कई ट्रेनें सुबह जाती है, लोग सायं से ही आकर स्टेशन पर डेरा डाल लेते हैं। प्लेटफ़ार्म पर ग्रेनाइट या अच्छा पत्थर लगने से लोगों को वहाँ पर सो लेने में कष्ट नहीं होता है। बहुतों के पास चद्दर नहीं थी, कई गत्ते बिछाकर सोये थे, कई नीचे अखबार बिछाये लेटे थे। छोटी छोटी गठरियाँ, मैले कुचैले कपड़े, सोये समाज में श्रमिक वर्ग प्रमुख था। पाँच छह के समूह में एक व्यक्ति आधी आँख खोले सामान की सुरक्षा कर रहा था। जो एकल थे, वे अपना सामान या तो हाथों में बाँधे थे या पैरों से दबाये सो रहे थे। बीस मीटर चौड़े प्लेटफ़ार्म पर दो फ़ुट चौड़ा रास्ता नहीं मिल रहा था चलने को। ऐसा नहीं है कि आवश्यकता पड़ने पर प्लेटफ़ार्म पर सोया नहीं जा सकता, पर यह दृश्य देख कर विवशता शब्द अधिक मुखरित होता है।

राजधानी के अन्दर पहुँच कर लगा कि सहसा विश्व परिवर्तन हो गया। रात्रि का डेढ़ बजा था, झाँसी के प्लेटफ़ार्म नम्बर एक का दृश्य मन को व्यथित अवश्य कर रहा था पर इस बार मन पर शरीर ने सहज अधिकार जमा लिया। थकान और शीतल वायु ने कुछ ही मिनटों में सोने को विवश कर दिया। स्वप्नहीन निशा थी, निश्चिन्त निशा थी, पिछले न जाने कितने दिनों की शारीरिक व मानसिक व्यस्तता के बाद घर वापसी की पूर्वनिशा थी। पता ही नहीं चला कि कब रात निकली, कब दिन चढ़ा, कब नागपुर आया और वर्धा पीछे छूट गया। जब नींद खुली तब अच्छा लग रहा था, थकान जा चुकी थी, परिचारक कई बार अल्पाहार व चाय के बारे में पूछ चुके थे। भोजन में क्या लेना है क्या नहीं, कब लेना है, आदि कई प्रश्नों से अपने ही देश में राजा होने का क्षणिक सुख अवश्य देती है राजधानी ट्रेन।

एक युगल था ऊपर की दो सीटों पर, नया विवाह था और प्रेम विवाह था, अनौपचारिकता और व्यवहारिकता अधिक थी, कोई झिझक व संकोच नहीं। हमारे घर में तो कई दिन इस बात पर चर्चा चली कि हमारी श्रीमतीजी हमें क्या संबोधन करें। हमारी माताजी और पिता जी एक दूसरे को पापा और मम्मी ही कहते हैं। कई लोग माँ और पिता के सम्बोधन को वैश्विक न बना कर बच्चों के नाम भी विशेषण के रूप में जोड़ देते हैं। अन्ततः बात पाण्डेजी पर आकर नियत हुयी, साथ में हमसे श्रद्धा कहने का अधिकार भी नहीं छीना गया, यह बात अलग है कि भरी भीड़ में हम भी सुनोजी जैसे सम्बोधनों पर उतर आते हैं। यह युगल था कि धाँय धाँय एक दूसरे का नाम लिये जा रहा था। कितने ही आधुनिकता में आ गये हों पर सार्वजनिक नाम लेना अब भी अटपटा लगता है। अच्छा ही है, माँ बाप ने इतने प्यार से नाम रखा है, लेने देने में क्या जाता है।

सायं से अगली सुबह तक ट्रेन तेलंगाना और सीमान्ध्र क्षेत्र में थी, पूरे आन्ध्र में आन्दोलन की स्थिति थी, भय इस बात का था कि कहीं रास्ते में रोक न लिया जाये। कहीं कुछ भी व्यवधान नहीं आया और हम ११० घंटे के पश्चात अपने परिवार के साथ सकुशल और प्रसन्न थे।

इति यात्रा।

6.7.13

दृष्टिक्षेत्रे

सायं का समय था, वाहन की अगली सीट से सामने का दृश्य स्पष्ट दिख रहा था। आस पास कई और वाहन थे, लम्बे और मँहगे भी, सामने सिग्नल लाल था। निरीक्षण हेतु घर से बाहर निकले पर्याप्त समय हो गया था, कार्य होने के बाद वापसी की ओर दिशा थी, सारे मैसेज, मेल आदि मोबाइल पर देख चुका था, निरीक्षण रपट के बिन्दु लिख चुका था, ड्राइवरजी को कोई एफएम चैनल लगाने की अनुमति दे दी, संभवतः उन्हें अच्छे से ज्ञात रहता है कि किस समय किस चैनल पर कर्णप्रिय गीत आते हैं। एक नया गाना चल रहा है, तुम ही हो, आशिकी २ फिल्म का, अरिजीत सिंह के मधुर कण्ठ में, हर साँस में नाम तेरा। किसी का गाना इतना प्रभाव उत्पन्न कर रहा है, निश्चय ही मन से गाया होगा।

थोड़ी देर पहले बारिश हुयी थी, पूरा वातावरण नम था, फुटपाथ का रंग पानी में धुलकर और भी गाढ़ा हो चला था। दृश्य अन्य दिनों की तुलना में अधिक स्पष्ट थे। बंगलोर में आसमान कम ही दिखता है, जब सामने भवन घेरे खड़े हों, तो उनसे बचकर दृष्टि भला ऊपर कहाँ जा सकती है? आसमान तो वैसे भी नहीं दिख रहा है, स्याह दिख रहा है फुटपाथ की तरह ही गीला होकर गाढ़ा हो गया है उसका रंग, या कहें कि पानी से बचने के लिये बादलों को ही ओढ़ लिया है उसने, कि कहीं गीले न हो जायें। जब भी इधर पानी फिर बरसेगा, आसमान सूखकर फिर से नीला हो जायेगा, खुला खुला, सूखा सूखा।

सामने एक कार खड़ी है, यह तो कर्नाटक एक्सप्रेस है, नहीं उसकी नम्बर प्लेट पर जो अंक है, वह कर्नाटक एक्सप्रेस का ट्रेन नम्बर है, २६२७। नहीं, नहीं अब तो ट्रेनों के नम्बर पाँच अंकों के हो गये हैं, इसके आगे भी १ लग कर १२६२७ हो गया है। एक साथी के पास वाहन है, उसका नम्बर मुजफ्फरपुर इण्टरसिटी का है, उसके वाहन को देखकर अभी भी हाजीपुर के दिन याद आ जाते हैं। पता नहीं, पर परिचालन के पदों में रहते हुये और ट्रेनों का पीछा करते करते, अब ट्रेनों के नम्बर हमारा पीछा करने लगे हैं। जो भी वाहन दिखता उसकी नम्बर प्लेट में कोई न कोई ट्रेन नम्बर दिख जाता है। पता नहीं कब छूटेगा यह खेल मन से।

पानी बरसने से सारा धुआँ पानी में घुलकर बह गया, वातावरण स्वच्छ सा दिखने लगा, वाहन की खिड़की खोली, थोड़ी शीतल हवा अन्दर आयी, सर्र से, चेहरे पर सलोना सा झोंका पडा, मन आनन्द से भर गया। पानी वायु प्रदूषण तो बहा कर ले गया पर इस ध्वनि प्रदूषण का क्या करें, क्या करें वाहनों के उस कोलाहल का जो गीत सुनने में व्यवधान डाल रहा है। शीतल बयार के साथ कर्कश कोलाहल निशुल्क ले जाइये। खिड़की बन्द करते ही शान्ति सी घिर आयी। अब लगता है कि कार के अन्दर वातानुकूलता के तीन प्रमुख लाभ हैं, तापमान स्थिर रहता है, धूल और धुआँ नहीं आता है और सड़क का कोलाहल कानों को नहीं भेदता है। पता नहीं एसी बनाने वाली कम्पनियाँ कब इन तीनों लाभों को अपने प्रचार मे समाहित कर पायेंगी।

सामने के ट्रैफिक सिग्नल पर उल्टी गिनती चल रही है, १२० से शून्य तक, यहाँ पर दो मिनट का टाइमर नियत है। आप कहीं प्रतीक्षा करते करते ऊब न जायें अतः ट्रैफिक सिग्नलों पर उल्टी गिनती का प्रावधान कर रखा है। कहते हैं किसी भी चीजों को अंकों में बदल लेने से उस पर नियन्त्रण सरल लगता है, समय बिना गिनती के सम्हलता ही नहीं है, कभी सिकुड़ जाता है, कभी फैल जाता है। यहाँ पर १२० तक की गिनती में लगता है कि समय अपनी गति से ही चल रहा है।

पर पता नहीं क्यों, ये लोग उल्टी गिनती गिनते हैं, सीधी भी गिन सकते थे। पर उसमें एक समस्या है, पता नहीं चलता कि कहाँ रुकना है, क्योंकि कई स्थानों पर ६० सेकण्ड की प्रतीक्षा है तो कई स्थानों पर १८० सेकेण्ड की। यदि ऐसा होता और सीधी गिनती गिनते, तो पता चलता कि सहसा सिग्नल हरा हो गया, सब गाड़ी एक साथ चल पड़ीं, एक अनोखा खेल बन जाता, मनोरंजक सा। तब संभवतः प्रतीक्षा रोचक हो जाती, कि पता नहीं कब रास्ता मिल जायेगा। होना तो यह चाहिये कि इस पर शर्त लगाने के लिये इसे अनिश्चित कर देना चाहिये, लोग प्रतीक्षा के समय शर्त लगाया करेंगे, उनका समय भी कट जायेगा और मनोरंजन भी पूर्ण होगा। अभी तो हमें उल्टी गिनती पूरी याद हो गयी है, बचपन में मास्टर साहब ने बहुत पूछा था, उल्टी गिनती, अब पूछते तो सुनाकर प्रथम आ जाते। मैं ही क्यों, पूरा बंगलोर ही प्रथम आ जाता, पूरा समय उल्टी गिनती ही तो गिनने में बीतता है, यहाँ के लोगों का।

सिग्नल महोदय सहसा हरे हो जाते हैं, उनके हरे होने से जितनी प्रसन्नता बरसती है, उतनी संभवतः पेड़ों के हरे होने पर भी नहीं बरसती होगी। हमारा वाहन भी इठलाता हुआ चल देता है, अगले सिग्नल तक तो निश्चिन्त।

जून का माह समाप्त होने को आया है, अब तक तो सबकी ग्रीष्मकालीन छुट्टियाँ समाप्त हो गयी होंगी। यहाँ पर फिर भी कुछ पर्यटक दिख रहे हैं, संभवतः आज या कल तक वापस चले भी जायें। बाजार के आसपास निश्चिन्त टहलते हुआ कोई यहाँ रहने वाला गृहस्थ तो नहीं हो सकता। यहाँ के युवा भी नहीं होंगे, क्योंकि वे बहुधा इतने खुले स्थानों पर नहीं पाये जाते हैं। बाहर से आने वाले ही होंगे, क्योंकि इतने आत्मविश्वास और मंथर गति से चलने वाले, छुट्टियाँ का आनन्द उठाने वालों के अतिरिक्त कोई और हो भी नहीं सकते हैं। बंगलोर आज अपने पूरे सौन्दर्य में हैं, पर्यटकों का पैसा वसूल है आज तो।

घर आ जाता है, अब दृष्टि में परिवार है। आज आने में देर हो गयी। नहीं, थोड़ा ट्रैफिक जाम था, धीरे स्वर में ऐसे बोले कि जैसे दृष्टि भी जाम थी। अब जिनको ट्रैफिक जाम में कष्ट हो, तो हो, हमें तो जीभर कर देखने को मिलता है, जीभर कर समझने को मिलता है। अगली बार कुछ और देखा जायेगा, जितनी अधिक प्रतीक्षा, उतना बड़ा दृष्टिक्षेत्र।