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16.1.21

लक्ष्य और सरलीकरण

निर्णय प्रक्रिया में विकल्पों का चयन और उनका विश्लेषण करने के लिये समय और श्रम की आवश्यकता होती है। अब यह आप पर निर्भर करता है कि आप कितने विकल्पों पर विचार करना चाहते हैं तथा प्रत्येक विकल्प पर कितनी गहराई तक जाना चाहते हैं। अभी तो कार्य प्रारम्भ ही नहीं हुआ है, किस विकल्प के क्रियान्वयन में कितना समय, श्रम, धन, सम्पर्क, जन आदि लगेगा, कितनी हानि या लाभ होगा, इसके विस्तारपूर्ण विश्लेषण हेतु भी समय और श्रम चाहिये।

जब पर्याप्त समय नहीं हो तब यथासंभव श्रम करके तथा संबंधित तथ्य जुटा कर उपलब्ध सूचना के आधार पर निर्णय लेना आवश्यक हो जाता है। तब दो प्रकार से निर्णय को और सुदृढ़ किया जा सकता है या उसकी गुणवत्ता परखी जा सकती है। पहला किसी आप्त के अनुभव का आधार और दूसरा किसी स्वीकार्य सिद्धान्त का आधार। जिन आप्तजनों या सिद्धान्तों को आप मानते हैं, जिनका अनुपालन आपका अभ्यास बन चुका है, उनको हर निर्णय प्रक्रिया में प्रयुक्त करना आपको सहज ही स्वीकार्य होता है। अनुभवी आप्तजन यदि उन परिस्थितियों से परिचित हैं तो वह आपको विश्लेषण में सहयोग कर सकते हैं। अन्ततः निर्णय और उससे उत्पन्न निष्कर्षों का उत्तरदायित्व आपका ही है। पर्याप्त समय होने पर ये ही सहायक तत्व निर्णय प्रक्रिया को भिन्न प्रकार से देखने का अवसर देते हैं पर कम समय होने पर ये दोनों और भी महत्वपूर्ण हो जाते हैं, विश्लेषण के आधार हो जाते हैं।


जब समय पर्याप्त हो तो सब विकल्पों का श्रमपूर्वक विश्लेषण होना चाहिये। प्रक्रिया में अन्त तक जाना एक बड़ा कारण है गुणवत्ताहीन निर्णयों का। यह तीन प्रकार से होता है, पहला विश्लेषण का श्रम करने की प्रवृत्ति, दूसरा अतिआत्मविश्वास और तीसरा निर्णय लेकर फल पा जाने की शीघ्रता। यही सब गड्डमड्ड कर देती है। श्रम करने की प्रवृत्ति हमें या तो सभी संभव विकल्पों को एकत्र करने की प्रेरणा नहीं देती है या किसी एक विकल्प के विश्लेषण में शीघ्र उकता जाने को उकसाती है। अतिआत्मविश्वास से तार्किक प्रक्रिया प्रभावित होती है और बहुधा जो पहला विचार आता है उसे ही मेधा का उपहार मानकर स्वीकार कर लिया जाता है। फल शीघ्र पाने का अधैर्य निर्णय को तात्कालिक कर स्तरहीन कर देता है।


कभी कभी निर्णय प्रक्रिया प्रारम्भ करने के पहले ही एक निर्णयविशेष के प्रति हमारा झुकाव होता है। हो सकता है कि एक निर्णय में आगत फल के प्रति राग हो या दूसरे निर्णय में आगत फल के प्रति द्वेष। दूसरा महत्वपूर्ण कारण है किसी निर्णय के क्रियान्वयन का बड़ा सरल या कठिन लगना।


अब पूर्ण निश्चिन्त होने के लिये निर्णय प्रक्रिया को कितना विलम्बित किया जाये? उत्तर है कि जितना संभव हो सके। इस पर लगभग वर्ष पहले एक लेख लिखा था। काल करे सो आज कर का पूरा विपरीत। इस प्राप्त समय में या तो और विकल्प मिल जाते हैं या विकल्पविशेष के विश्लेषण के लिये अतिरिक्त तथ्य मिल जाते हैं या सभी पक्षों पर समुचित चिन्तन हो जाता है। पूर्वलिखित लेख में लेखक ने विलम्बन को सैद्धान्तिक और वैज्ञानिक रूप से सिद्ध किया था। पर बिना अनुभव के अन्तिमतम समय तक प्रतीक्षा करना बड़ा ही साहसिक होता है, पता नहीं कि कब झपकी, आलस्य या प्रमाद हुआ और निर्णय लेने का समय ही निकल गया। 


फल की अनिश्चितता, फल की कठिनता, निर्णय प्रक्रिया की जटिलता, निर्णय प्रक्रिया में समय का अभाव तथा निर्णय प्रक्रिया के उपरिलिखित अन्य दोष, ये सब मिलकर हमें उस प्रकार का निर्णय लेने को प्रवृत्त करते हैं जो बहुधा सभी विकल्पों में सरलतम होता है। या कहें कि हमारा मन जटिलता, अनिश्चितता और श्रम से भयग्रस्त रहता है और सरलतम चुन बैठता है। अब इसे मन की ही कलात्मकता कहेंगे कि वह सरलतम को ही श्रेष्ठतम सिद्ध कर देने में सक्षम है।


लगभग ऐसा ही कुछ १३वीं शताब्दी के सिद्धान्तओकम रेजरके नाम से प्रसिद्ध है। यह आश्चर्य ही है कि यह सिद्धान्त विज्ञान में मान्य है। ओकम महाशय किसी अद्भुत घटना के दो संभावित व्याख्यों में सरलतम को सही मानते थे। उनकी या विज्ञान की समस्या यह थी कि जटिल व्याख्यों को सिद्ध करना बड़ा कठिन या दुष्कर कार्य है। ठीक उसी प्रकार से जिस तरह हमारे लिये जटिल निर्णय करना।


अगले ब्लाग में एक और वैज्ञानिक सिद्धान्त और उचित निर्णय की आवश्यकता और अनिवार्यता।

19.10.13

कितनी पहचानें

कुछ दिन पहले एक डाटा कार्ड लिया था। उसके लिये दो प्रमाणपत्रों की आवश्यकता थी, पहचान के लिये और निवास के लिये। यद्यपि मेरे पास कार्यालय द्वारा प्रदत्त पहचान पत्र और निवास प्रमाण पत्र था पर एयरटेल वालों ने दोनों ही मानने से मना कर दिया। समझाया कि यह एक सरकारी प्रपत्र है तो कहने लगे कि कोई भी संस्था अपने कर्मचारियों को इस तरह के काग़ज़ बाँटती रहती है। भंगिमाओं से देखा जाता तो उनका प्रतिनिधि एक न्यायविद की तरह बात कर रहा था और मुझे एक संदिग्ध आतंकवादी की तरह समझ रहा था। विकल्प था अतः पैन कार्ड का प्रस्ताव रखा, उस पर भी मना कर दिया, कहा कि उसमें निवास प्रमाण पत्र नहीं रहता है। चुनाव पहचान पत्र था तो उसमें गृहनगर का पता था, ड्राइविंग लाइसेन्स पर अन्य नगर का पता था। लगा कि, सुरक्षा के नाम पर जितना कवच चढ़ा रखा है, उसके अनुसार तो हमें डाटाकार्ड मिलने से रहा। एयरटेल की फाइलों में संभवतः मेरे केस का निस्तारण मेरे ऊपर प्रतिकूल टिप्पणी करने जैसा हो। मेरे डाटा कार्ड को न देने का कारण संभवतः यह लिख दिया जाये, कि वैध पहचान व निवास प्रमाण पत्र प्रस्तुत करने में असमर्थ, भारतीय नागरिक होने में सन्देह। इतने कड़े नियम बने रहे तो हम जैसे सरकारी नौकर भी बांग्लादेशी घुसपैठिये मान लिये जायेंगे। अपने देश में ही हमारे साथ परायों सा व्यवहार हो रहा है, हम निराशा में डूब गये।

पहचान सिद्ध करने के लिये पहचानें
तब सोचा कि नियम अंधे हो सकते हैं, मानवीय संवेदनायें नहीं। हमने कहा कि हम तो भारत सरकार की कार्यनदी में डूबते उतराते तत्व हैं और हर दो तीन वर्ष में अपना स्थान बदलते रहते हैं। अपने कार्यालय के अतिरिक्त कोई और प्रमाण पत्र तो ला भी नहीं सकते हैं। आप ही अपने आप में संतुष्ट हो लो, दयादृष्टि कर दो। पता नहीं तर्क ने अपना काम किया या उसे सद्बुद्धि आयी या उसका अहं संतुष्ट हुआ, पर वह मान गया। एक दो दिन में घर के पते पर सत्यापन करने आया और अगले दो दिनों में फ़ोन के द्वारा पुनर्सत्यापन कर डाटा कार्ड प्रारम्भ कर दिया।

बैंक वाले भी पहचान पूरी जानने के लिये लालायित रहते हैं, पर उनके लिये पैन कार्ड ही सब कुछ है, संभवतः उन्हें व्यक्ति के आर्थिक पक्ष से ही सारोकार है। पैन कार्ड वाले व्यक्ति के लिये बैंक में कुछ भी करवा पाना कठिन नहीं है। हर छोटी सी चीज़ के लिये एक फोटो माँग लेते हैं और पैन कार्ड की फोटोकापी।

इसी कड़ी में अभी कुछ दिन पहले आधार कार्ड के लिये एक कैम्प रेलवे परिसर में ही लगा। सबने कहा बनवा लीजिये, इतने जटिल अनुभव पाने के बाद अपना आधार स्थापित करना अत्यन्त आवश्यक है। हम भी सहमत हो गये कि चलो, इसी बहाने ठोस सरकारी आधार मिल जायेगा। यहाँ भी डाटाकार्ड की तरह दो प्रमाणपत्र माँगे गये, मैंने तुरन्त ही रेलवे प्रदत्त पहचान और निवास प्रमाणपत्र प्रस्तुत कर दिये। ठेके पर आधारकार्ड बनवाने वाले युवा के चेहरे से लगा कि वह भी एयरटेल के प्रतिनिधि की तरह न्यायविद की कुर्सी पर सत्तासीन है, पर नीचे रेलवे की मुहर देख कर तनिक ठंडा पड़ गया। जिस संस्था की भूमि पर उसे आधार कार्ड बनाने की सुविधा मिली थी, वह उसके मुहर की अवहेलना नहीं कर सकता था। संतुष्टि के भाव आंशिक अवश्य थे पर कोई हठधर्मिता नहीं दिखी। मेरे पूरे हाथ के प्रिण्ट और आँखों की छाप ले ली गयी और प्रक्रिया पूरी होने के बाद एक पावती पकड़ा दी गयी।

जब श्रीमतीजी और बच्चों की बारी आयी तो मेरे प्रमाणपत्रों के आधार पर उनका आधारकार्ड बनाने से वह नियमों के अध्याय पढ़ने लगा। कहा कि पहले तो आप यह सिद्ध कीजिये कि ये वही हैं जो आप कह रहे हैं। साथ ही साथ उनके साथ अपने संबंध का प्रमाणपत्र भी लाइये। हमें लग गया कि इस ठेके के एजेण्ट ने हमारा सर तो किसी विवशतावश निकल जाने दिया पर हमारे धड़ को नियमों के पाश से जकड़ लिया।

श्रीमतीजी के साथ हमारे संबंध का प्रमाण पत्र एक वह फोटो भर थी, जिसमें हम मुस्कुराने का प्रयास करते हुये उनके गले में वरमाला डाल रहे थे। विवाह के पंजीकरण को करोड़ों भारतीयों की तरह अनिवार्य न मानते हुये, उसी फोटो की स्मृतिविधा में जिये जा रहे थे। फोटोशॉप के आगमन के बाद तो ऐसी न जानी कितनी फोटुयें संदेह के घेरे में आ जायें। श्रीमतीजी जिस तरह प्यार से हमें घर में समझाती हैं, उस तरह समझाकर वह अपनी पत्नी होने के संबंध को सिद्ध कर सकती थीं, पर भरी भीड़ में ऐसा करने में वह सकुचा गयी होंगी। श्रीमतीजी ने अपना पैनकार्ड और चुनाव पहचान पत्र तो दिखा दिया, पर वे दोनों ही विवाह के पहले के थे और दोनों में ही उनके पिताजी का नाम अभिभावक के रूप में लिखा था। संबंध सिद्ध करने का फिर भी कोई प्रमाणपत्र नहीं था। यद्यपि वहाँ पर खड़े दो बच्चे हम दोनों को माताजी और पिताजी कह रहे थे और यह तथ्य हमारे पति पत्नी के संबंधों को सिद्ध करता था, पर नियमों के सामने भावनाओं का कोई मोल नहीं।

बच्चों के साथ तो समस्या और गहरी थी। उनके पास न तो पहचान पत्र ही था और न ही संबंध सिद्ध करने का प्रमाणपत्र। यदि संबंध के नाम पर कुछ था तो वह कई वर्ष पहले बनवा लिया जन्म प्रमाण पत्र, जिसमें पिता के रूप में मेरा नाम लिखा था. पर वह यह सुनिश्चित नहीं करता था कि उसमें लिखा पता मेरा ही है, किसी और प्रवीण पाण्डेय का नहीं। साथ ही साथ उसमें लिखा पता मेरा स्थायी पता था, न कि वर्तमान। एक और बात थी कि जन्म प्रमाण पत्र में बच्चों की फोटो नहीं लगी थी, तो यह भी सिद्ध नहीं हो पा रहा था कि जो बच्चे वहाँ पर खड़े हैं, वे उन्हीं के जन्म प्रमाण पत्र है। जन्म प्रमाण पत्र इस प्रकार एक चौथाई भी पहचान सिद्ध नहीं कर पा रहा था। दूसरा था, विद्यालय प्रदत्त पहचान पत्र। विद्यालय पहचान पत्र में फोटो तो लगी थी पर घर का पता नहीं था और साथ ही साथ माता पिता का नाम नहीं था। अत: वह पहचान पत्र भी पूर्ण नहीं माना गया। हाँ, यदि दोनों को मिला कर तार्किक निष्कर्ष निकाले जाते तो पहचान और संबंध पूर्ण सिद्ध हो रहे थे, पर अधिक बुद्धि लगाना ठेके पर आये एजेण्टों के अधिकार क्षेत्र में नहीं था।

अब क्या किया जाये, हमारा आधार बन जाये और यदि औरों का न बने तो घर में विद्रोह निश्चित था। लगा कि नियमों से परे कोई देशी तोड़ निकालना पड़ेगा। थोड़ा और गहराई में उतरा गया तो पता लगा कि कोई सांसद, विधायक या राजपत्रित अधिकारी प्रमाणपत्र दे दे तो वह उन्हे मान्य है। एक राजपत्रित अधिकारी होने को आधार पर जब मैंने सबका प्रमाणपत्र देने को कहा तो मुझको कहा गया कि आप अपने संबंधी के लिये प्रमाणपत्र नहीं दे सकते। मैंने कहा कि आप उन्हें मेरा संबंधी मान ही नहीं रहे हैं तो प्रमाणपत्र देने दीजिये। यह भी तर्क भैंस के सामने बीन बजाने जैसा सिद्ध हुआ।

अब मेरा कार्याल़य मेरी श्रीमतीजी और बच्चों के लिये पहचान पत्र और संबंध प्रमाणपत्र कैसे दे? यह बड़ी समस्या थी और उनके अधिकार क्षेत्र के बाहर भी। कार्यालय तो मेरे लिये तो यह कार्य कर सकता था, बच्चों और श्रीमतीजी का सत्यापन उसकी परिधि के बाहर था। यह दोनों ही विषय राज्य सरकार की अधिकार सूची में थे और हम ठहरे केन्द्र सरकार के नौकर, कोई किसी की सुध क्यों ले। कार्यालय को यह भी भय था कि कहीं हम उन प्रमाण पत्रों को किसी और उपयोग में न ले आयें। अन्ततः एक सरकारी उपाय निकाला गया। हमने अपने वरिष्ठ अधिकारी को लिख कर दिया कि आधार कार्ड बनवाने के लिये मुझे संलग्न प्रमाणपत्रों की आवश्यकता है, जिसके आधार पर हमें केवल इसी हेतु और एक बार उपयोग में लाने के लिये प्रमाणपत्र दे दिया गया। आधारकार्ड वाले भी उन प्रमाण पत्रों को मान गये और श्रीमतीजी और बच्चों के लिये भी आधारकार्ड की प्रक्रिया पूरी हो गयी। अब तीन माह बाद हम सबके आधारकार्ड बनकर मिल जायेंगे।

एक देश में एक ही पहचान हो
अब पता नहीं कि आने वाले समय में आधारकार्ड ही एकमात्र पहचान रहेगी कि अन्य पहचानों का सहारा भी लिया जायेगा? आज आकर मैंने अपने सारे पहचान प्रमाणपत्र व बैंक आदि के कार्ड निकाल कर देखे, छोटे बड़े मिलाकर १०-१२ निकले, सब के सब एक दूसरे से असंबद्ध। हर कार्ड के लिये कोई न कोई पहचान प्रस्तुत की गयी होगी पर किसी में भी कोई संदर्भ नहीं था। क्या आने वाले समय में पहचान के सारे बिखरे तन्तुओं को एक सूत्र में पिरोया जायेगा? क्या निश्चय समयाविधि में आधारकार्ड सबके लिये अनिवार्य होगा और सारे कार्डों में आधारकार्ड का संदर्भ देना आवश्यक किया जायेगा? क्या अमेरिका की तरह कोई एक ही पहचान पत्र को सभी प्रकार के सामाजिक व आर्थिक प्रक्रियाओं के लिये मान्यता दी जायेगी?

मेरे इस जन्म में तो यह सब होता असंभव दिखता है। सुना है कि बांग्लादेशी घुसपैठियों को सहज ही पहचान मिल जाती है और इसी देश में जन्मे और बढ़े हुये न जाने कितनों को अपनी पहचान सिद्ध करने में संशय और संदेह के कितने अपमानों से होकर निकलना पड़ता है। अगले जन्म में यदि पुनः भारत आने का आदेश मिलता है तो ईश्वर से कहूँगा कि कर्ण की तरह ही कवच और कुण्डल चढ़ा कर भेजना। कर्ण की तरह अपमान और तिरस्कार झेलने की शक्ति भी आ जायेगी और कवच और कुण्डल दिखा कर अपनी पहचान भी बताता रहूँगा।

9.1.13

दिल छीछालेदर

जब गैंग्स ऑफ वासेपुर देखी थी तो बहुत ही नये तरह के गाने सुनने मिले थे, अन्य फिल्मों से सर्वथा भिन्न। मैं कोई फिल्म समीक्षक नहीं पर तीन विशेषतायें उसके संगीत में दिखी थीं। पहला, संगीत की धुनें स्थानीय थीं। दूसरा, उसमें बोलचाल की भाषा हिन्दी अंग्रेजी की खिचड़ी के रूप में थी। तीसरा, उसका अर्थ फिल्म में व आज के समाज में व्याप्त भावों को बहुत स्पष्ट रूप से चित्रित करता हुआ था। दिल छीछालेदर उसी फिल्म का एक गाना है।

सभ्य समाज की दृष्टि से देखा जाये तो गैंग्स ऑफ वासेपुर अव्यवस्था और असभ्य आचरण की पराकाष्ठा था, उसमें रहने वालों के मन को टटोले तो वह जीवन के संघर्ष का अनियन्त्रित पथ। जब अव्यवस्था हो तो हर वस्तु और हर विचार के लिये संघर्ष होता है। बिना व्यवस्था विकास नहीं, बिना विकास पुनः संघर्ष, वह भी अनियन्त्रित। गैंग ऑफ वासेपुर में, हो सकता है कि घटनाओं को अतिरंजित और महिमामंडित कर के चित्रित किया गया हो, पर किसी भी स्थान के यथार्थ में स्थिति बहुत अधिक दूर नहीं होगी, कालचक्र देर सबेर वहाँ पहुँचा ही देगा।

जो लोग यथार्थ के इस पक्ष से साक्षात्कार करने से वंचित रह गये हों, उन्हें इस फिल्म का भावार्थ बताया जा सकता है। लूट-खसोट की पर्याप्त संभावनाओं में बाहुबलियों का उदय, हत्या आदि से उत्पन्न किये भय के माध्यम से वर्चस्व की होड़, क्षेत्रों के अतिक्रमणों में संघर्ष और अन्त में सर्वनाश। ये चक्र पुनः उदय होते हैं, कभी छोटे, कभी बड़े, भिन्न भिन्न नामों से, भिन्न भिन्न रूपों से। ये छोटे छोटे उन ब्लैक होलों जैसे होते हैं जो आस पास की सभी चीजों को उदरस्थ कर जाते हैं, विकास को, शिक्षा को, नैतिकता को, संस्कृति को, सहजीवन को। यही नहीं, इनके अन्दर जाकर समय भी अपना अस्तित्व खो देता है, अंघायुग भला और क्या होता होगा, जब काल भी अंधकार में डूब जाये।

अभी कुछ दिन पहले सब टीवी में एक धारावाहिक चिड़ियाघर देख रहा था, एक वाक्य बड़ा प्रासंगिक लगा। 'जब विनाश होता है तो बहुत शोर होता है, निर्माण चुपचाप होता रहता है'। सच ही है, पेड़ एक बीज के आकार से महाकाय हो जाता है, बिना हल्ला किये, धीरे धीरे अपने अवयव धरा से और आसमान से ग्रहण करते हुये बढ़ता रहता है। पर जब वही वृक्ष गिरता है तो तुमुल नाद सुनायी पड़ता है, चारों ओर। संस्कार धीरे धीरे व्यक्तित्व बनाते हैं, कई वर्षों तक, पर जब वह चरित्र टूटता है, मन चीत्कार कर उठता है। अब शोर चाहे गैंग्स ऑफ वासेपुर की हिंसा का हो या वर्तमान की घटनाओं से उपजे जनमानस के आक्रोश का, कुछ न कुछ विनाश की ओर अग्रसर है। जो भी टूटेगा, वह कोई एक दिन में तैयार नहीं हुआ होगा, वह कई दिनों से बन रहा होगा, कई दिनों से धीरे धीरे मन में घर कर रहा होगा।

समाज की गति बहुधा दिखती नहीं है, उसकी गति का अनुमान हम लक्षणों से ही लगाते हैं। लक्षण जब घातक होते हैं, हम उपचार का सोचते हैं, हर तरह के संबद्ध और असंबद्ध कारणों पर दोष मढ़ना प्रारम्भ कर देते हैं, हल्ला मचने लगता है। अभी देखें तो हल्ला नहीं, वरन छीछालेदर मची हुयी। मनीषजी के ब्लॉग पर 'दिल छीछीलेदर' गाने को देखा तो सारा घटनाक्रम इस फिल्म से अनुनादित होता हुआ सा लगने लगा।

यह छीछालेदर कहाँ से प्रारम्भ हुयी होगी? बचपन में एक कहानी सुनी थी। एक लड़का कहीं से कुछ चोरी करके लाया, उसकी माँ ने रोका नहीं। धीरे धीरे उसकी हिम्मत और बढ़ गयी, बड़ी बड़ी चोरियाँ करने लग गया, कालान्तर में पूर्ण विकसित डकैत बन गया। पकड़ा गया, फाँसी के पहले अन्तिम इच्छा पूछी गयी तो माँ के कान में कुछ कहना चाहा। कहने के बहाने माँ का कान काट खाया, पूछने पर बताया कि यदि बचपन में माँ ने पहली चोरी पर ही रोक दिया होता तो यह स्थिति न आती। कहीं न कहीं तो आँख मूँदी गयी होंगी, कई बार जानकर भी कुछ नहीं बोला गया होगा, कई बार किसी कठिनाई में पड़ने पर बचाया भी गया होगा। नकारात्मकता एक दिन में तो विकसित नहीं होती है, कई लोगों का हाथ रहा होगा, कई घटनाओं का हाथ रहा होगा।

समाज में परिवर्तन की गति बहुत धीमी होती है, यही कारण है कि छीछालेदर दिखायी नहीं पड़ती है, वीभत्स नहीं लगती है, पर अन्दर ही अन्दर होती रहती है। विरोध तभी होता है जब असहनीय हो जाता है। यदि छोटी छोटी बातों को गम्भीरता से लिया जायेगा तभी यह सम्भव हो सकेगा कि कोई बड़ी छीछालेदर न फैले। निश्चय ही कानून व्यवस्था अपना कार्य करती है, अपवादों को चिन्हित करती है और उन्हे दण्डित करा के एक उदाहरण स्थापित करती है कि भविष्य में यह न फैले। पर अव्यवस्था का परिमाण इतना अधिक हो चुका है कि उसके लिये छीछालेदर से अधिक उपयुक्त कोई शब्द नहीं। कानून और न्याय व्यवस्था निश्चय ही इतना सब समेटने में सक्षम नहीं, उसकी भी अपनी सीमायें हैं, उसमें भी वही लोग हैं जो समाज का ही अंग हैं, उनके अन्दर भी वही गुण दोष हैं जो समाज में व्याप्त हैं, उनके अन्दर भी वही मूल्य हैं जो समाज के सम्मिलित मूल्य हैं।

छीछालेदर पर बहुत तेजी से फैलती है, संक्रमित होती है। इस अवस्था में सर्वाधिक हानि उनकी होती है जो सज्जन होते हैं, उनके अन्दर वह प्रतिरोधक क्षमता नहीं विकसित हो पाती है जिससे वे स्वयं को बचा सकें। अपवाद बनने से अच्छा है कि समाज की धार में बह चलें, एक आध दोष स्वीकार्य होने लगते हैं, एक आध दोष इंगित करने से छोड़ दिये जाते हैं, अपनत्व दोषों से अधिक महत्व पा जाता है, दोष शक्ति का पर्याय बनने लगते हैं, शक्ति दूषित होने लगती है।

संस्कृतियों पर कटाक्ष समाधान नहीं है, समाज एक प्रक्रिया से होकर निकला है, छीछालेदर एक दिन में नहीं फैली है, दशकों ने इसे सहारा दिया है। जब प्रक्रिया से दोष उपजे हैं तो प्रक्रिया से दूर भी होंगे, प्रक्रिया लम्बी होगी, प्रक्रिया पीड़ायुक्त होगी, प्रक्रिया प्रतीक्षा करवायेगी। तीस दिन में अंग्रेजी सिखाने वालों की तरह समाधान देने वालों के वक्तव्य बड़े सीमित दृष्टिकोण के दोष से ग्रसित हैं। तीस दिन सब ठीक हो जाने की आस रखने वाले अतिआशावादी हैं। दिल छीछालेदर है तो आनन्द छीछालेदरी में ही आयेगा। छीछालेदर समेटने में बहुत श्रम लगेगा, साथ ही साथ यह भी तो निश्चित करना होगा कि कोई और कहीं पर भविष्य के लिये छीछालेदर फैला तो नहीं रहा है? समाज का छीछालेदर आज से ही समेटना प्रारम्भ कर दीजिये। हो सकता है कि आज सड़क पर छीछालेदर पड़ा हो, कल हवा चलेगी तो आपके यहाँ भी उड़कर आ जायेगा यह छीछालेदर।

छोड़िये वह सब, आप गैंग्स ऑफ वासेपुर की ही छीछालेदर सुन लीजिये।
चित्र साभार - http://www.ilovephilosophy.com

14.7.12

विचारों के बादल

विचारों का प्रवाह सदा अचम्भित करता है। कुछ लिखने बैठता हूँ, विषय भी स्पष्ट होता है, प्रस्तुति का क्रम भी, यह भी समझ आता है कि पाठकों को क्या संप्रेषित करना चाहता हूँ। एक आकार रहता है, पूरा का पूरा। एक लेखक के रूप में बस उसे शब्दों में ढालना होता है, शब्द तब नियत नहीं होते हैं, उनका भी एक आभास सा ही होता है विचारों में।

शब्द निकलना प्रारम्भ करते हैं, जैसे अभी निकल रहे हैं। प्रक्रिया प्रारम्भ होती है, विचार घुमड़ने लगते हैं, ऐसा लगता है कि मन के अन्दर एक प्रतियोगिता सी चल रही है, एक होड़ सी मची हैं, कई शब्द एक साथ प्रस्तुत हो जाते हैं, आपको चुनना होता है, कई विचार प्रस्तुत हो जाते हैं, आपको चुनना होता है। आपने जो पहले से सोच रखा था, उससे कहीं उन्नत होते हैं, ये विचार, ये शब्द। आप उन विचारों को, उन शब्दों को चुन लेते हैं। उन विचारों, उन शब्दों से संबद्ध विचार और शब्द और घुमड़ने लगते हैं। आप निर्णायक हो जाते हैं, कोई आपको थाली में सब प्रस्तुत करता जाता है, आप चुनते जाते हैं। कोई विचार या शब्द यदि आपको उतना अच्छा नहीं लगता है, या आपका मन और अच्छा करने के प्रयास में रहता है, तो और भी उन्नत विचार संग्रहित होने लगते हैं। प्रक्रिया चलती रहती है, सृजन होता रहता है।

पूरा लेख लिखने के बाद, जब मैं तुलना करने बैठता हूँ कि प्रारम्भ में क्या सोचा था और क्या लिख कर सामने आया है, तो अचम्भित होने के अतिरिक्त कोई और भाव नहीं रहता है। बहुधा सृजनशीलता योग्यता से कहीं अच्छा लिखवा लेती है। बहुत से ऐसे विचार जो कभी भी मन के विचरण में सक्रिय नहीं रहे, सहसा सामने आ जाते हैं, न जाने कहाँ से। एक के बाद एक सब बाहर आने लगते हैं, ऐसा लगता है कि सब बाहर आने की बाट जोह रहे थे, उन्हें बस अवसर की प्रतीक्षा थी। आपका लिखना उनकी मुक्ति का द्वार बन जाता है, आप माध्यम बन जाते हैं।

आपको थोड़ा अटपटा अवश्य लगेगा कि अपने लेखन का श्रेय स्वयं को न देकर प्रक्रिया को दे रहा हूँ, उस प्रक्रिया को दे रहा हूँ जिसके ऊपर कभी नियन्त्रण रहा ही नहीं हमारा। कभी कभी तो कोई विचार ऐसा आ जाता है इस प्रक्रिया में जो भूतकाल में कभी चिन्तन में आया ही नहीं, और अभी सहसा प्रस्तुत हो गया। जब कोई प्रशंसा कर देता है तो पुनः यही सोचने को विवश हो जाता हूँ, कि किसे श्रेय दूँ। श्रेय लेने के लिये यह जानना तो आवश्यक ही है कि श्रेय किस बात का लिया जा रहा है। मुझे तो समझ नहीं आता है, सृजन के चितेरों से सदा ही यह जानने का प्रयास करता रहता हूँ।

सृजन के तीन अंग है, साहित्य, संगीत और कला। साहित्य सर्वाधिक मूर्त और कला सर्वाधिक अमूर्त होता है। शब्द, स्वर और रंग, अभिव्यक्ति गूढ़तम होती जाती है। अभिव्यक्ति के विशेषज्ञ भले ही कुछ और क्रम दें, पर मेरे लिये क्रम सदा ही यही रहा है। बहुत कम लोगों में देखा है कि आसक्ति तीनों के प्रति हो, विरले ही होते हैं ऐसे लोग जो तीनों को साध लेते हैं। बहुत होता है तो लोग दो माध्यमों में सृजनशीलता व्यक्त कर पाते हैं। समझने की समर्थ और व्यक्त करने की क्षमता, दोनों ही विशेष साधना माँगती हैं, कई वर्षों की। गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर को ही देखें, तीनों में सिद्धहस्त, पर सबसे पहले साहित्य लिखा, फिर संगीत साधा और जीवन के अन्तिम वर्षों में रंग उकेरे।

कोई संगीतकार तो नहीं मिला अब तक, पर अपने चित्रकार मित्र से जब यह प्रश्न पूछा कि विचार कैसे उमड़ते हैं, सृजन के पहले की मनस्थिति क्या होती है, सृजन के समय क्या होता है और सृजन होने के बाद कैसा लगता है, क्या सोचा होता है और क्या बन जाता है? सबके लिये इस प्रक्रिया को व्यक्त कर पाना अलग स्वरूप ले सकता है, पर सबका सार लगभग यही रहता है।

किसी विषय के बारे में हमारी समझ विचारों के बादल के रूप मे रहती है। जब भी कुछ पढ़ते हैं, संगीत सुनते हैं, चित्र देखते हैं, तो मन के अन्दर अमूर्त स्वरूप सा बन जाता है, कुछ कुछ बादल सा। यही बादल बनता रहता है, घना होता रहता है, तरह तरह के आकार लेता रहता है। जब यह बादल बूँद बन बरसना चाहते हैं तो आकार ढूढ़ते हैं, किस रूप में बरसें? कुछ लोग शब्द का आधार लेते हैं, शब्द का सहारा सरल होता है, शब्द भौतिक जगत के अधिक निकट हैं, हर वस्तु को शब्द से व्यक्त किया जा सकता है, हमारा भी सहारा शब्द ही है। मन के भाव जैसे जैसे अमूर्त होते हैं, शब्द कम पड़ने लगते हैं, भाव शब्दातीत हो जाते हैं। तब संगीत रिक्तता भर देता है, शब्द से अधिक अमूर्त और रंग से अधिक मूर्त होते हैं स्वर। मन के गहरे भाव शब्द से अधिक संगीत समझता है। कला एक स्तर और ऊपर उठ जाती है, रंगों की छिटकन विचारों के बादल के सर्वाधिक निकटस्थ है। कुशल चित्रकार विचारों के बादल को यथारूप उतार देने में सक्षम होते हैं।

विचारों का बादल सा होता है मन में, हम उसे एक स्थूल रूप दे देते हैं, शब्दों के माध्यम से, संगीत के माध्यम से, कला के माध्यम से। होना तो यही चाहिये था कि उस स्थूल रूप को पुनः ग्रहण करने पर वही भाव मन में आने चाहिये जो उसके सृजन के समय आये थे, होता भी है यदि सृजनकर्ता पुनः अपनी कृति देखता, सुनता या पढ़ता है। मैं तो जितनी बार अपनी कवितायें या लेख पढ़ता हूँ, उसी सुलझन व भावावेश में पहुँच जाता हूँ जिसके निष्कर्ष स्वरूप वह शब्द लिखे गये थे। ऐसे में स्वयं के लिये औषधि का कार्य करती है आपकी कृति, आपके उसी भाव को हर बार घनीभूत कर जाती है आपकी कृति।

सृजन का औषधीय पक्ष तो समझ आता है, पर सृजन कैसे होता है, यह समझ नहीं आता है। बादल कैसे बनते हैं, कैसे आकार लेते हैं, कहाँ से उड़कर आते हैं, कहाँ पर बरस जाते हैं और बरसकर क्या प्रभाव डालते हैं, यह समझ नहीं आता है। आपके विचारों के बादल कैसे बनते और बरसते हैं?