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23.10.21

मित्र - ३४(शुक्रवार की फिल्म)

यहाँ पर एक तथ्य स्पष्ट करना आवश्यक है कि सभी छात्रावासी फिल्मों के प्रति इतने उत्साहित नहीं थे। कुछ उस समय का उपयोग अध्ययन में करते थे। कुछ जो देखने को मिल जाये, उसी को देखकर संतुष्ट हो जाते थे, अन्यथा प्रयास नहीं करते थे। कुछ संभावनाओं पर दृष्टि अवश्य रखते थे पर स्वयं कुछ भी साहसिक करने से बचते थे। यदि कोई व्यवस्था ऐसी स्थापित हो जाये जो कि कष्टप्रद न हो और उसमें पकड़े जाने की संभावना भी कम हो तो वे उसमें सम्मिलित हो जाते थे। पूरे छात्रावास में लगभग दस ही ऐसे अग्रणी महारथी थे जो परिधि का विस्तार बढ़ाने के सतत प्रयत्न में लगे रहते थे। संतुष्टि शब्द उनके लिये नहीं था, सीमायें उनके लिये नहीं थी, उनकी आँखों में चमक तब आती थी जब उत्पात का कोई विचार योजना की परिपक्वता के निकट होता था।

ऐसे लोग अप्राप्य को ध्येय बनाये रहते हैं और व्यस्त रहते हैं। टीवी के सारे कार्यक्रमों में बस एक ही अप्राप्य रह गया था, शुक्रवार देर रात की फिल्म। उसको देखने की बात तो दूर, उसकी चर्चा भी चारित्रिक अपयश ला सकती थी। रात ११ बजे प्रारम्भ होने वाली यह फिल्म शयनकाल में पड़ती थी, वयस्कों के लिये थी और किसी प्रकार से उचित नहीं ठहरायी जा सकती थी। फिर भी कुछ साहसी उसे देखने के लिये प्रयत्नशील रहते थे।


रात्रि के कार्यक्रमों में सबसे बड़ी बाधा यह थी कि वे किसी के घर जाकर नहीं देखे जो सकते थे। यह न केवल उनका व्यक्तिगत समय होता है वरन सबके सोने का समय होता है। मुझे स्पष्ट याद है कि जब १९८६ में फुटबाल का वर्ल्डकप आ रहा था तो मैच मध्य रात्रि को आते थे। फुटबाल के प्रति न केवल मुझे प्रेम था वरन पिताजी का भी उत्साह देखते बनता था। हम लोग पशोपेश में थे कि क्या किया जाये? निर्णय यही हुआ कि टीवी लिया जाये। इस प्रकार हमारे घर में प्रथम टीवी आया।


शुक्रवार देर रात्रि के फिल्म के लिये छात्रावास के टीवी पर ही आश्रय था, शेष अन्य टीवी अचिन्त्य थे। एक बार अनुमति के लिये प्रार्थनापत्र लिखा गया। उत्सुकजन सार्वजनिक रूप से जो निर्लज्ज किये गये कि उसके बाद से वैधानिक उपायों से फिल्म देखने का विचार आना भी बन्द हो गया। अब जो भी करना था, गुप्त रूप से करना था।


टीवी कक्ष प्रारम्भिक वर्षों में भोजनालय के साथ वाले कक्ष में था, जो कि आधार तल में था। छात्रावास प्रथम तल में था। जब छात्रावास में संख्या बढ़ी तो टीवी कक्ष भोजनालय में समा गया और टीवी कक्ष प्रथम तल में चला गया। छात्रावास के कुछ और कक्ष भी तब प्रथम तल में आ गये। उस समय छात्रावास के कक्षों के बीच ही टीवी कक्ष था। दोनों ही समय टीवी एक बड़े पल्ले की लकड़ी की अल्मारी में रहता था और उस पर एक ताला लगा रहता था। ताले की चाभी छात्रावास प्रमुख के पास थी। साथ में एक ताला कक्ष में भी लगा दिया जाता था।


प्रथम तल के टीवी कक्ष में दो चाभियों की व्यवस्था करनी होती थी, या तो छात्रावास प्रमुख से माँग कर या पार कर या उसकी प्रतिलिपि बनवा कर। इसमें दूसरा और तीसरा उपाय अधिक उपयोग में आया क्योंकि चाभी देने का पूरा उत्तरदायित्व छात्रावास प्रमुख पर ही आता। जब आधार तल में टीवी कक्ष था तब भोजनालय और टीवी कक्ष के बीच में एक किवाड़ था। भोजनालय में ही ताला बन्द होता था, टीवी कक्ष का कपाट अन्दर से बन्द किया जाता था। भोजन के बाद बर्तनों की सफाई के समय यदि किवाड़ के अन्दर की चिटकनी खोल दी जाती थी तो भोजनालय के ताले की चाभी की आवश्यकता नहीं पड़ती थी।


एक बार जब अल्मारी का ताला बदला पाया गया तो कुण्डी के बोल्ट खोलकर फिल्म देखी गयी। उस समय दो सावधानियाँ रखी जाती थी। पहली सावधानी यह कि जो भी आता था वह अपने बिस्तर पर तकिया के ऊपर चादर चढ़ाकर आता था जिससे यह पता न लगे कि कोई अनुपस्थित है। दूसरी सावधानी में टीवी कक्ष का प्रकाश बन्द रखा जाता था और खिड़की पर चादर लगा कर टीवी से बाहर आ रहे प्रकाश को भी रोक दिया जाता था।


यह बताना कठिन है कि इस प्रकार कितनी बार हमें शुक्रवार की फिल्म देखने में सफलता मिली। सफलता इस बात पर निर्भर करती थी कि उस समय शेष सभी लोग विशेषकर छात्रावास अधीक्षक सो गये हों। हमारे महती प्रयासों की सुन्दर संरचना पर तुषारापात उस समय हुआ जब चादर की झीने प्रकाश के पीछे दीपकजी दिखायी पड़े। उसके बाद से न केवल शुक्रवार हाथ से गया वरन दण्डस्वरूप अन्य फिल्मों से भी हाथ धोना पड़ा।


फिर भी सब कुछ हाथ से नहीं गया था, जानेंगे अगले ब्लाग में।

21.10.21

मित्र - ३३(शनिवार की फिल्म)

छात्रावास परिसर में कुछ ४ टीवी थे। यद्यपि कुछ की पहुँच छात्रावास के बाहर उन घरों में थी जहाँ पर टीवी होते थे, पर ऐसी संख्या बहुत कम थी और उन प्रयासों में दुगुना दुस्साहस था। एक तो बाहर निकल कर जाना, तीन घंटे के लिये और दूरदर्शन पर आने वाली फिल्म देखकर आना। इसमें पकड़े जाने की संभावना बहुत अधिक थी। साथ ही इस बात का भी भय था कि उनका छात्रावास अधीक्षक आचार्यजी से भी परिचय था। इस स्थिति में हमारे प्रयास और भेद कब तक गुप्त रखे जा सकेंगे, इस बात पर भी संशय था। यदि तीन घंटे को बाहर जाने का साहस करने का अवसर ही रहा है, तो टाकीज में जाकर नयी फिल्म देखने का आनन्द क्यों न लिया जाये। संभवतः इन्हीं कारणों से यह प्रवृत्ति छात्रावासियों के मानस में अत्यन्त विरल मात्रा में थी।

एक टीवी छात्रावास में, एक प्रमुख छात्रावास अधीक्षक के घर में, एक छात्रावास अधीक्षक के घर में और एक छात्रावास सहायक के घर में था। यद्यपि बाद में कई अन्य सहायकों के घर में भी टीवी आ गये थे। प्रमुख छात्रावास अधीक्षक गृहस्थ थे अतः उनका टीवी प्रयोग की परिधि से बाहर था। रुचियाँ मिलने के कारण छात्रावास अधीक्षक का टीवी मुख्यतः क्रिकेट के लिये प्रयोग में आता था। छात्रावास का टीवी बिना अनुमति के अपना मुखमंडल नहीं खोलता था। शेष एक टीवी जो सहायक के यहाँ था उसी पर सभी की आशायें टिकी रहती थी।


पता नहीं कैसे प्रारम्भ हुआ पर कुछ अति उत्साही छात्रावासी शनिवार या रविवार की अनुमति न मिलने वाली एक फिल्म को वहाँ देखने जाने लगे। सहायकों का घर छात्रावास अधीक्षकों और प्रधानाचार्य के घरों से विपरीत दिशा में था। वहाँ पहुँचने के लिये छात्रावास के बीच से होकर जाना होता था। वह स्थान स्नानागार के पास भी था। वहाँ पहुँचने के लिये अधिक प्रयत्न की आवश्यकता नहीं थी और साथ ही पकड़े जाने की संभावना भी कम थी। कोई छात्रावास अधीक्षक यदि उस क्षेत्र के आसपास होता था तो वह सूचना त्वरित गति से वहाँ पहुँच जाती थी और सभी छात्रावासी विसर्जित होकर निर्विकार रूप कोई अन्य कार्य करते हुये प्रतीत होते थे।


सहायक नवगृहस्थ थे और टीवी भी उनके यहाँ नया ही आया था, बच्चों को आया देखकर वात्सल्यवश मना नहीं कर पाये होंगे। वैसे भी वह समय ऐसा था कि टीवी देखने आये आगन्तुक को मना नहीं किया जाता था। घर के टीवी को औरों के समक्ष प्रस्तुत करना ऐश्वर्य और औदार्य, दोनों के ही लक्षणों में गिना जाता था। रामायण और महाभारत के आने के बाद आगन्तुकों को बैठाकर टीवी दिखाना एक धार्मिक और पुण्य का कार्य भी समझा जाता था। हरि की अनंत कथा को प्रसारित होने में सहायक होने के कारण भक्त जैसा अनुभव होता था। कई गृहस्थ उस समय बालिका भोज या प्रसाद वितरण कर पुण्य को कई गुना बढ़ा लेते थे।


समस्या यह थी कि वह सहायक प्रधानाचार्यजी के अत्यन्त निकट थे, उनके व्यक्तिगत सहायक के रूप में। इस बात का भय रहना स्वाभाविक ही था कि कहीं उनके माध्यम से बात प्रधानाचार्यजी तक न पहुँच जाये। केवल वात्सल्य भाव ही था या नियम तोड़ने में सहभागिता का दोष या टीवी बन्द हो जाने का भय या कोई अन्य कारण, उन सहायक ने कभी भी यह बात प्रधानाचार्यजी को नहीं बतायी। यह बात अलग थी कि छात्रावास अधीक्षक को यह बात पता लगी पर उसका दण्ड छात्रावासियों की उद्दण्डता को ही मिला, सहायकों को विवशता का लाभ देकर प्रताड़ित नहीं किया गया।


आगे सहायकों के प्रकरण में यह उल्लेख रहेगा कि किस प्रकार सहायकगण हम लोगों की वेदना के प्रति मन ही मन अधिक संवेदी थे। यद्यपि सत्ता के प्रति प्रत्यक्ष रूप से निष्ठावान रहना उनके कर्तव्यों का अभिन्न अंग था पर परोक्ष रूप से और व्यवहारिकता के धरातल पर हमसे उनकी संवेदनायें अनुनादित थीं। हम छात्रावासियों ने सदैव ही सहायकों को अपने अनुकूल ही पाया था और कई स्वप्नों को जीवटता से जीने में अत्यन्त उपयोगी भी। आज भी छात्रावासियों की प्रफुल्लित यादों में सहायकों का आना जाना निर्बाध होता है, एक आवश्यक अंग की तरह।


छात्रावास के टीवी पर चित्रहार, रविवार पूर्वाह्न के कार्यक्रम और एक फिल्म देखते थे। क्रिकेट मैच बहुधा छात्रावास अधीक्षक के घर में देखने को मिल जाता था। छूट गयी दो फिल्मों में एक फिल्म छात्रावास सहायक के घर में देखना हो जाता था। इस सबके बाद भी कुछ छात्रावासियों का मन नहीं भरता था, उन्हें लगता था कि कोई भी मनोरंजन बिना मन को रंजित किये निकल न जाये, व्यर्थ न हो जाये। उनके महास्वप्नों का उत्कर्ष बिन्दु उन प्रयत्नों में परिलक्षित था जो शुक्रवार रात्रि की फिल्म देखने के लिये किये गये।


सब जानेंगे अगले ब्लाग में।

19.10.21

मित्र - ३२ (फिल्म और विकल्प)

मन सदा ही कुछ नया चाहता है, स्वयं को अपने स्वरूप से भिन्न रंगना चाहता है। मन को रंगने का उपक्रम मनोरंजन कहलाता है। मनोरंजन मन को सुख देता है, सुख राग उत्पन्न करता है, राग आकर्षण का हेतु है। टीवी के कार्यक्रम आपके अन्दर के मनोरंजन की थाह मापने लगे। प्रचार माध्यम उस आकर्षण को भुनाने लगे, विज्ञापन आपकी निर्णय प्रक्रिया को प्रभावित करने के उद्देश्य से उन कार्यक्रमों के बीच उपस्थित हो जाते जिन पर आपका मन लगा होता है। विज्ञापन मनोरंजन को प्रायोजित करने लगे, मनोहरण करने के लिये। फिल्में, चित्रहार, कथाश्रृंखलायें आदि मनोरंजन के साथ साथ दूरदर्शन की आय का साधन बनने लगीं। सप्ताह में एक के स्थान पर तीन फिल्में और दो चित्रहार हो गये।

बाहर की फिल्म देखने के असफल प्रयासों के प्रकरणों में दबे और क्षुब्ध छात्रावासी हृदयों को दूरदर्शन का यह विस्तार बड़ा ही आनन्द और उत्साह देने वाला था। सहज आशा के प्रवाह में पर शंकाओं की बाधायें खड़ी थी। एक चित्रहार, एक फिल्म और रविवार पूर्वाह्न के कार्यक्रम लगभग स्थिर हो चुके थे। जहाँ शुक्रवार देर रात को आने वाली फिल्म अपनी अनुमानित और अतिरंजित विषयवस्तु के कारण निषिद्ध थी, शनिवार की फिल्म आशा किरण की बनी हुयी थी। जब छात्रावास अधीक्षक का स्पष्ट निर्णय सुना कि एक सप्ताह में एक ही फिल्म देखने की अनुमति मिलेगी तो दुख भी हुआ और संतोष भी। दुख इस बात का दूरदर्शन के द्वारा प्रदत्त आधा मनोरंजन बिना सुख दिये ही व्यर्थ चला जायेगा। संतोष इस बात का था कि कम से कम एक फिल्म तो देखने को मिलेगी। पहले इस बात की संभावना भी रहती थी कि रविवार को कहीं ऐसी फिल्म न आ जाये जिसके लिये अनुमति न मिले। अब लगता था कि दो में कम से कम एक तो अनुमति योग्य होगी ही।


दैवयोग से यह एक ऐसी परिस्थिति थी जिसमें दोनों ही पक्षों को लगता था कि उनकी जीत हुयी थी। एक ही फिल्म होने से उसकी अनुमति मिलने से हमारी विजय, न मिलने से हमारी हार होती थी। यहाँ तीन फिल्में थी, एक प्रतिबन्धित, एक की अनुमति और एक की अनुमति नहीं। इस प्रकार सबके भाग में कुछ न कुछ था। कभी कभी संसाधन बढ़ा देने से दोनों पक्षों को ही विजय की अनुभूति होने लगती है। मनोवैज्ञानिक दृष्टि से दोनों पक्षों के हाथ में कुछ न कुछ रहने से निष्कर्ष आनन्दमयी और दीर्घकालिक रहते हैं। जब कभी भी किसी विषय पर प्रतिपक्ष से समझौता वार्ता होती है तो आदान प्रदान की स्थितियाँ बनती हैं। आधार सिमटा होने पर या एक ही निश्चित विषय पर कई बार वार्तायें टूट जाने का भय रहता है। जो वस्तु या माँग पानी है, उसके साथ कई और वस्तुओं या माँगों को जोड़ देने से यह संभावना बनी रहती है कि कम से कम मूल माँग तो पूरी हो ही जायेगी। दोनों पक्ष अपनी माँगों पर पीछे जाते हैं, दोनों को एक जीत का भाव रहता है और दोनों को ही संतोष रहता है। आधुनिक प्रबन्धन में वार्तातन्त्र का विकास और क्रियान्वयन एक विशिष्ट विषय है।


समस्या विकल्पों में होती है। विकल्प भ्रमित करते हैं। प्रकृति की जटिलता भी ऐसी है कि हर विकल्प कुछ गुण तो कुछ दोष लिये रहता है। संसाधन इतने नहीं रहते हैं कि सारे विकल्प प्राप्त किये जा सकें। हमारे लिये जब एक ही फिल्म देखने की अनुमति रहती थी तो प्रश्न इस बात का उठता था कि कौन सी फिल्म देखी जाये, शनिवार की या रविवार की? तुलना बड़ी घातक होती है, एक को दूसरे से लड़ाती है। सप्ताहान्त में आने वाली दो फिल्मों ने कभी नहीं सोचा होगा कि छात्रावासी बैठकर उनके गुणदोषों का निर्धारण करेंगे कि कौन सी देखी जाये, कौन सी नहीं? तब कई स्वर बौद्धिक उठते हैं, कई अपने अनुभव से बात करते हैं, कई केवल अभिनेता या अभिनेत्री के नाम पर मुग्ध रहते हैं। कुल मिलाकर एक कार्य मिल जाता है कि क्या देखें और क्या नहीं? कुछ कहते हैं कि शनिवार की ही देख लो, पता नहीं रविवार को बिजली आये न आये? देखा जाये तो यह भी अत्यन्त व्यवहारिक दृष्टिकोण है कि जो हाथ में है, उसे भोग लो।


कभी कभी बच्चे किसी खिलौने आदि की माँग करते हैं तो बुद्धिमान अभिभावक उन्हें दो तीन और विकल्प बताकर चिन्तन में ठेल देते हैं। बच्चों को भी लगता होगा कि उनके अभिभावक उनके बारे में इतना अधिक सोचते हैं। इस प्रकार के भ्रम उत्पन्न कर कभी कभी बच्चों से विकल्पों का खेल खेला जाता है। “पर शर्माजी के बच्चे टिंकू का यही खिलौना तो दो दिन में टूट गया था”, एक और गुगली और निर्णय प्रक्रिया में बच्चा जूझता रहता है। हमें कभी कभी लगता था कि एक फिल्म का विकल्प देकर हमारी सम्मिलित निर्णय प्रक्रिया में विभ्रम उत्पन्न करने का प्रयास किया जा रहा था।


समस्या तब आती है जब आपने विकल्प ठीक से नहीं चुना। प्रश्नपत्र में यदि विकल्प वाले प्रश्न में दुर्भाग्यवश अंक नहीं मिले तो दुख के साथ क्रोध इस बात पर आता है कि दूसरा प्रश्न हल कर लेना चाहिये था। परीक्षाओं में विकल्प को भी एक प्रश्न के रूप में लेना चाहिये। ८ में से ५ प्रश्न करना, यह सुविधा कम, दुविधा अधिक होती है। या तो ३ प्रश्न अत्यन्त कठिन हों तो शेष ५ प्रश्न सरलता से चुने जा सकते हैं। यदि सारे प्रश्न एक ही स्तर के हों तो विकल्प दुविधा बढ़ा जाते हैं। बहुधा ऐसे ५ प्रश्न चुन लिये जाते हैं जो कि अन्ततः हानिप्रद होते हैं।


एक फिल्म चुनने के प्रयास में हमारे साथ कई बार ऐसा हुआ। जिसे अच्छी फिल्म विचार कर देखा उसमें निराशा हुयी। देखा जाये तो यह निराशा भी मायावी थी, मानसिक थी। जब तक दोनों फिल्म नहीं देखी जायें तब तक इस बात का निर्णय कैसे होगा कि कौन सी फिल्म अच्छी है? जिस प्रकार लोग किसी और के सुखों कर देखकर व्यर्थ ही दुखी होते रहते हैं उसी प्रकार हम लोग भी न देखी हुयी फिल्म को देखी हुयी फिल्म से अच्छा मानकर दुखी हो लेते थे। 


फिर भी अनपाये को पाने का प्रयास कुछ छात्रावासियों न कभी छोड़ा ही नहीं। कुछ अनुमति वाली फिल्म तो देखते ही थे। साथ ही साथ जिसकी अनुमति नहीं मिलती थी उसे भी निपटा आते थे। कई बार जब शुक्रवार की फिल्म देखने के प्रयास हुये तब जाकर लगा कि हम सबके अन्दर फिल्म का आनन्द उठाने की इच्छा अदम्य है।


प्रयासों की न समाप्त होने वाली यही उर्ध्वाग्नि अगले ब्लाग में।

4.5.21

मित्र - ३१ (रविवार की फिल्म)

छात्रावास में जिस समय पहुँचे थे, उस समय टीवी नहीं था। अनुराग ने बताया कि हम लोगों के वहाँ पहुँचने के कुछ दिन बाद ही एशियाड हुआ था, उसी समय टीवी छात्रावास में आया था। टीवी भोजनालय के बगल में ही एक कक्ष में रखा गया था, बड़े पल्लों की एक अल्मारी के अन्दर और बाहर से ताला। चाभी या तो छात्रावास प्रमुख के पास रहती थी या छात्रावास अधीक्षक के पास। लिखित अनुमति के बाद ही उस पिटारे का ताला खुलता था।

जिस समय टीवी आया, वह समय दूरदर्शन पर रविवार की एक फिल्म और बुधवार के चित्रहार का होता था। धीरे धीरे वह बढ़ता हुआ सप्ताह में ३ फिल्म और दो चित्रहार का हो गया। फिर समय आया रविवार के पूर्वाह्नों का जिसमें हास्य विनोद के, प्रेरक, ज्ञानवर्धक और सांस्कृतिक पक्ष के रंगोली जैसे कई रोचक कार्यक्रम आते थे। इन तीनों प्रकार के कार्यक्रमों के लिये प्रारम्भिक समय में बनाये गये नियम ही चलते रहे, थोड़े बहुत बदलावों के साथ।


छात्रावास में बुधवार के चित्रहार के लिये तो संघर्ष नहीं करना पड़ता था, बहुधा अनुमति मिल जाती थी। एक तो यह आधे घंटे का होता था और रात्रि के भोजन के पहले ही समाप्त हो जाता था। उस समय तक गानों में फूहड़ता नहीं पिरोयी जाती थी, संगीत और सुरों का प्राधान्य था, श्रृंगार भी प्रतीकात्मकता से प्रदर्शित होता था, गानों के चयन में सभी भावों की समावेशिता रखी जाती थी। जहाँ छात्रावास आने पर रेडियो छूट गया था, हम सबको चित्रहार अत्यन्त सुखद लगता था।


रविवार पूर्वाह्न के कार्यक्रमों में भी विविधता रहती थी। यह संभवतः सबकी रुचियों के अनुसार तैयार किया गया था अतः इसमें कुछ विशेष आपत्तिजनक निकाल पाना कठिन होता था। टीवी के कार्यक्रमों के पहले रविवार पूर्वाह्न का वह समय हमारे लिये मुख्यतः खेलकूद का होता था। कई लोग इस समय का उपयोग अपने कपड़े धोने में, सामान व्यवस्थित करने में, बाल कटवाने में या आवश्यक वस्तुयें खरीदने के लिये हाट जाने में करते थे। उत्साहित पढ़ाकू छात्र इसी समय का उपयोग अध्ययन कर के शेष समाज से आगे निकलने में करते थे। जब व्यस्त दिनचर्या में कोई समय का टुकड़ा दिखता था तो कल्पना मुखर हो जाती है, हम भी बहुधा पूरे न होने वाले स्वप्न देख लिया करते थे। छात्रावास अधीक्षक के लिये समय व्यर्थ होने की दृष्टि से टीवी की अनुमति न देना उतना सशक्त कारण नहीं था। परीक्षा न हो या कोई अन्य आवश्यक कार्यक्रम न हो तो उसकी भी अनुमति मिल जाती थी।


समय व्यर्थ होना और फूहड़ता, ये दोनों कारक रहते थे जब टीवी देखने की अनुमति नहीं मिलती थी। क्रिकेट के मैचों के लिये स्पष्ट मनाही थी। टेस्ट मैच तो वैसे ही ५ दिन खा जाते थे, टी२० का आविर्भाव हुआ नहीं था, कुछ एकदिवसीय में अनुमति मिल जाती थी। क्रिकेट इतना रुचिकर लगता था कि कुछ न कुछ युक्ति लगाकर हम लोग मैच देख लेना चाहते थे। यह हम लोगों का भाग्य ही कहा जायेगा कि छात्रावास अधीक्षक जी को भी क्रिकेट अत्यन्त प्रिय था और अभी भी है। यद्यपि अन्य बातों पर सहमति नहीं हो पाती थी पर क्रिकेट देखने के लिये हम उत्साहीगण छात्रावास अधीक्षक जी के घर ही पहुँच जाते थे। दोपहर में आधे घंटे का मध्यान्तर हो या सायं का खेल समय या रविवार को पूरा दिन, हम लोग चुपचाप बैठकर क्रिकेट देख लेते थे, कुछ भी नहीं कहा जाता था। हाँ, एक अनकही सी सहमति होती थी कि पढ़ाई में कोई ढील नहीं होनी चाहिये।


रविवार की फिल्म के पहले पूरा संघर्ष होता था। फिल्म का नाम तो समाचारपत्र से पता चल जाता था, साथ में उसके अभिनेता, अभिनेत्री आदि की सूचना उपलब्ध रहती थी। न ही वह फिल्म हमने पहले से देखी होती थी और न ही छात्रावास अधीक्षक जी ने। तब अनुमति मिलने के दो प्रमुख तत्व रहते थे। पहला यह सिद्ध करना कि उस फिल्म में कोई फूहड़ता नहीं है और दूसरा कि वह फिल्म हमारे व्यक्तित्व के विकास में सहायक होगी। अनुमति के लिये लिखे प्रार्थनापत्र में इन दोनों तत्वों का समावेश आवश्यक हो जाता था। सारे छात्रावास की आशाओं का केन्द्रबिन्दु वह प्रार्थनापत्र रहता था जिसमें इन दो तत्वों को सशक्त रूप से अभिव्यक्त करना होता था।


अब आप छात्रावास प्रमुख की मनःस्थिति समझ सकते हैं। एक ओर सबकी आकांक्षायें, दूसरी ओर छात्रावास अधीक्षक की अनुमति और बीच में वह प्रार्थनापत्र जिसमें बिना देखी-सुनी फिल्म का चारित्रिक महिमामंडन करना है। उस समय तो गूगल महाराज भी नहीं थे कि सारी फिल्मों के बारे में तथ्य उपस्थित होते। ऐसे में हमारी कल्पनाशीलता ही हमारी सहायता को आती थी। पता नहीं कि अच्छे निबन्धों का अनुभव प्रार्थनापत्र लिखने में काम आया या प्रार्थनापत्रों में छिटकी कल्पनाशीलता ने हमें अच्छे निबन्ध लिखना सिखाया, पर कई बार हमें अनुमति प्राप्त होने में सफलता मिली। 


कुछ संकेत फिल्म के नाम से मिलते थे। फिल्मों के नाम बहुधा अच्छे ही रखे जाते हैं और उनसे कोई न कोई सकारात्मक पक्ष निकाला जा सकता है। किसी नाम को किस प्रकार से व्यक्तित्व विकास के लिये सहायक दिखाना है, यह आयुर्वेद के उसी सिद्धान्त की तरह था जो कहता है कि हर वनस्पति उपयोगी है, किसी न किसी रोग की दवा है। रही सही कमी अभिनेता और अभिनेत्री पूरा कर देते थे। हर अभिनेता की कोई न कोई देशभक्ति या समाजोत्थान की फिल्म वर्तमान फिल्म की सार्थक समीक्षा में सहायक होती थी। हम लोग प्रार्थनापत्र में क्या लिखकर अनुमति पाते थे और फिल्म की वास्तविकता क्या रहती थी, इसका अन्तर बड़े बड़े फिल्म समीक्षक न कर पायेंगे। हाँ यदि एक आध दृश्य तनिक अनुचित हुये तो उसकी सूचना गुप्तचर यथास्थान पहुँचा देते थे और आगामी मंगलवार को हमें अपने चारित्रिक पतन पर एक लंबा प्रवचन सुनना पड़ता था।


सप्ताह में जब तीन फिल्में आने लगीं तो अनुमति की कथा और भी रोचक हो चली। जानेंगे अगले ब्लाग में।

1.5.21

मित्र - ३०(दूरदर्शन)

बच्चों को संभवतः लगता है कि पिता और उनके मित्रों की पीढ़ी फिल्मों के प्रति कुछ आवश्यकता से अधिक ही आकर्षित रही है, जबकि उनके लिये यह एक अत्यन्त सामान्य सा विषय है। हमारी कथायें फिल्म देखने के सफल और असफल प्रयासों के आसपास इस तरह थिरकती हैं कि कभी इस बात पर चर्चा ही नहीं हो पाती है कि कौन सी फिल्म सफल थी? फिर फिल्म से ही इतना लगाव क्यों, और भी तो माध्यम हैं, टीवी, यूट्यूब, सोशल मीडिया, नेटफ्लिक्स आदि। किसी से भी मनोरंजन किया जा सकता है। वहीं दूसरी ओर फिल्में मँहगी होने के कारण अन्य माध्यम अधिक लोकप्रिय हो चले हैं। इस परिप्रेक्ष्य में हमारा फिल्म प्रेम एकपक्षीय और अपूर्ण सा लगता है नयी पीढ़ी को।

पिछली अर्धशताब्दी एक संक्रमणकाल रही है। जिस गति से माध्यम, विषय, उद्गार, अभिव्यक्ति, विचार आदि बदल रहे हैं, लगता है कि कल व्यर्थ ही चला गया और पुनः कल आज को भी व्यर्थ कर देगा। अस्थिरता अपने चरम पर है, अधैर्य व्यापक है। किसी विषय को टिक कर समझने के लिये समय देना और समझते समझते उसकी उपयोगिता न्यून हो जाना आश्चर्य नहीं लाता है। जब काल अपनी गति से निर्मोह हो भागता है तो वैराग्य उत्पन्न हो जाता है। एक साम्य पर टिकना स्थिरता का विषय है, गतिशीलता नित नये साम्य उत्पन्न कर देती है।


फिल्मों के संबंध में दोनों पीढ़ियों के संक्रमणकाल में एक मूलभूत अन्तर है। जहाँ एक ओर हमारा संक्रमणकाल अभाव से भाव का था, वहीं दूसरा संक्रमणकाल भाव से प्रभाव का था। जन्म से देखें तो उस समय रेडियो के अतिरिक्त कुछ भी नहीं था। दिल्ली एशियाड ने टीवी को कई घरों में पहुँचा दिया था। दूरदर्शन का जन्म संभवतः तभी हुआ था। हर मुहल्ले में एक टीवी हुआ करता था, किसी सम्पन्न के घर में। टीवी के स्वामी की हृदय के क्षमता के अनुसार उनके टीवी कक्ष में मुहल्ले वालों की संख्या और समय निर्धारित होता था। ६ बजे चौपाल के पहले दूरदर्शन का प्रारम्भिक संगीत अत्यन्त मादक सा लगता था, जैसे कि रंगशाला खुलने जा रही हो। किसानी तो कभी की नहीं पर टीवी के आकर्षण ने चौपाल के माध्यम से पर्याप्त मात्रा में कृषिविज्ञान सिखा दिया। 


रविवार के दिन फिल्म आती थी, सायं लगभग ६ बजे। सब जुटते थे, एक साथ बैठकर देखने के लिये। बच्चों के लिये सबसे आगे बैठ पाना एक सौभाग्य का विषय होता था। मध्यान्तर के समय हम सब घर भागते थे, भोजन करने के लिये। घर पहुँच कर भोजन की इतनी शीघ्रता रहती थी जैसे आजकल किसी महत्वपूर्ण बैठक के पहले भोजन करते समय रहती है। माँ के आगे लगभग गिड़गिड़ाना पड़ता था कि मध्यान्तर के बाद की फिल्म छूट जायेगी, कृपा करो और शीघ्र ही कुछ खिला दो। कई बार तो आते ही साधिकार कहते थे “लो अभी तक कुछ बना ही नहीं”, जैसे कि विधि ने इस प्रकार का कोई नियम बना कर भेजा हो। या कभी माँ को दुलार में धमकाने के लिये “लगता है कि आज बिना खाये ही जाना पड़ेगा”। ढेरों ऐसी ही न जाने कितनी स्मृतियाँ हैं, सप्ताह में बस एक फिल्म देख लेने की। बिना पैसों की फिल्मों ने टाकीजों को भले ही कितनी हानि पहुँचायी हो पर घर घर मनोरंजन पहुँचा कर बच्चों की कल्पनाओं को एक नया आयाम दे दिया।


सप्ताह में एक दिन चित्रहार आता था, आधे घंटे का। गिनते थे कि ५ गाने आयेंगे कि ६? यदि ६ आ गये तो लगता था कि जैसे कुछ लूट कर ले आये हों। एक बार याद है कि गाना आ रहा था “लाल दुपट्टा मलमल का”, मुख से अनायास ही निकल गया कि यह लाल कहाँ है? इसी बीच मुहल्ले में ऐश्वर्य की स्पर्धा में एक रंगीन टीवी आ गया। बड़े दिन तक मन में पशोपेश रहा कि निष्ठायें गाढ़ी हैं या रंग? अन्ततः रंग ने प्रतियोगिता जीत ली और हम लोग उस घर में जाने लगे। उधर रंग अधिक थे पर औदार्य कम था, वापस लौटकर श्वेत-श्याम पर आ गये। कई बार जब पुराने स्थल पर श्वेत श्याम में ही फिल्म देखते थे तो पूछने पर बहाना बनाना पड़ता था कि रंगीन में अधिक देखने से सर में चक्कर सा आता है और आँखों में जलन सी होती है। शरीर के अंग, उपांग मान बचाने के लिये देखिये कितने काम आते हैं।


इस संबंध में एक बड़ी ही रोचक घटना स्मृति में उभर आती है। एक ओर रविवार की फिल्मों से विशेष भावनात्मक लगाव था वहीं दूसरी ओर आगत सोमवार को गणित की परीक्षा थी। इस आशा में कि सायं फिल्म देखने को मिलेगी, पूरी पाठ्यक्रम घोंट कर बैठे थे, साथ में माताजी को मना लिया था। आशाओं पर तुषारापात तब हुआ जब पिताजी ने स्पष्ट मना कर दिया, “परीक्षा के पहले भला कोई फिल्म देखता है, चुपचाप पढ़ाई करो”। फिल्म प्रारम्भ होने में आधे घंटे शेष थे, दो बार पानी पीने के लिये चौके का चक्कर लगा चुके थे, साथ ही माताजी को अनुनय भरे और प्रश्नवाचक नेत्रों से देख चुके थे। कभी कभी पिताजी टहलने चले जाते थे, यदि पिताजी को न बताया होता तो माताजी से पूछ कर जाया जा सकता था। अब तो सारे द्वार बंद हो चुके थे। बिना बताये भाग कर भी नहीं जा सकते थे, यदि पकड़े जाते तो बहुत ही कुटाई होती जोकि एक दो बार हो भी चुकी थी।


जैसे जैसे फिल्म की घड़ियाँ निकट आयीं, मन में एक उद्विग्नता सी छाने लगी। जब १५ मिनट की फिल्म निकल गयी तो न रहा गया और जाकर माताजी से कहा कि पूरे शरीर में ऐंठन हो रही है, कुछ पढ़ने में मन नहीं लग रहा है। पूरी नाटकीयता और माताजी के तनिक कह देने का प्रभाव यह पड़ा कि थोड़ी देर के लिये फिल्म देखने की अनुमति मिल गयी। अब थोड़ी फिल्म कौन देखता है। फिल्म भी पूरी देखी और अगले दिन परीक्षा में भी पूरे अंक आये।


फिल्मों के प्रति अनुभवों की तीक्ष्णता और भावों का गाढ़ापन भला आजकल के बच्चों की पीढ़ी में कहाँ? कुछ अन्य पहलुओं पर चर्चा अगले ब्लाग में।

30.10.13

टाटा स्काई प्लस एचडी

कुछ दिन पहले टाटा स्काई के कुछ चैनलों का प्रसारण बाधित होने लगा। पहले तो लगा कि अधिक वर्षा इसका कारण रहा होगा। किन्तु जब धूप छिटक आयी और फिर भी चैनल बाधित रहे तो टाटा स्काई वालों को फ़ोन किया गया। फ़ोन पर समस्या बताने पर उनके प्रतिनिधि ने बताया कि वे प्रसारण की अधिक उन्नत तकनीक की ओर जा रहे हैं, सेट टॉप बॉक्स बदलने से सारे चैनल पूर्ववत आने लगेंगे। यदि आप अभी बदलवाना चाहें तो तीन घंटे के अन्दर हमारे कार्यकर्ता आकर बदल देंगे। साथ ही साथ उन्होंने मुझे दो और सेट टॉप बाक्सों का प्रस्ताव भी दिया। पहला टाटा स्काई एचडी का और दूसरा टाटा स्काई प्लस एचडी का। एचडी में कुछ चैनल अधिक स्पष्टता में आयेंगे, प्लस में आपके पास कार्यक्रमों को रिकार्ड करने की व्यवस्था रहेगी जिससे वे बाद में सुविधानुसार देखें जा सकें। मात्र एचडी में हज़ार रुपये लग रहे थे, प्लस में पाँच हज़ार।

हाई डेफिनिशन, गजब की क्वालिटी
कार्यक्रमों को अधिक स्पष्टता से देखने का अधिक मोह नहीं रहा है, पर अपने एक मित्र के यहाँ पर एचडी चैनल देखकर प्रभावित अवश्य हुआ था। एक क्रिकेट मैच चल रहा था और लग रहा था कि मैदान के अन्दर खड़े होकर मैच देख रहे हैं। यद्यपि हमें तीसरे अम्पायर का कार्य नहीं करना था पर क्रिकेट का आनन्द एचडी में और बढ़ जाता है। साथ ही साथ एचडी फ़िल्मों में भी डायरेक्टर द्वारा छिटकाये रंगों को आप मल्टीप्लेक्स के समकक्ष स्पष्टता में देख पाते हैं। डिस्कवरी और हिस्ट्री आदि चैनल जो हमें अत्यन्त भाते है, वे भी एचडी में ही अपने पूरे रंग में आते हैं। उत्सुकता मन में थी ही, प्रस्ताव आते ही मन के अनुकूल हो गया, हज़ार रुपये जेब से निकल भागने को तत्पर हो गये।

तभी मन ने कहा, जब चिन्तन द्वार खोले ही हैं तो प्लस के प्रस्ताव पर भी विचार कर लो। कार्यक्रम को रिकार्ड कर बाद में देखने की व्यवस्था में टीवी अधिक देखे जाने की संभावना दिख रही थी और प्रथम दृष्ट्या प्लस घर के लिये उपयोगी नहीं लग रहा था। यही नहीं, उसमें एक हज़ार के स्थान पर पाँच हज़ार रुपये लग रहे थे। पर पता नहीं क्या हुआ, पूरे टीवी प्रकरण को समग्रता से सोचने लगा, निर्णय प्रक्रिया में श्रीमतीजी और बच्चों की सहमति लेने का मन बन आया।

प्लस में रिकार्डिंग की व्यवस्था
बच्चे सदा से ही प्लस से अभिभूत रहे हैं, कॉलोनी में एक दो घरों में होने के कारण पुराने छूट गये कार्यक्रमों को मित्रों के साथ निपटा आने की कला में सिद्धहस्त रहे हैं दोनों बच्चे। इस सुविधा के लिये वे कुछ भी करने को तैयार थे, अधिक टीवी न देखने के लिये तो तुरन्त ही तैयार हो गये दोनों। मेरी एक और समस्या थी उनसे, रात में टीवी देखने की। रात में सबकी पसन्द के कार्यक्रम देखने के क्रम में सोने में देर हो जाती थी, सो सुबह उठने में कठिनाई। रात भर के कार्यक्रमों का प्रभाव यह होता था कि सुबह सब कुछ आपाधापी में होता था। दोपहर में बच्चे इसलिये नहीं पढ़ते हैं कि विद्यालय से पढ़कर आये हैं, रात में इसलिये नहीं पढ़ते हैं कि उनके पसन्द के कार्यक्रम आ रहे होते हैं। बीच के समय में सायं आती है, तो उसमें किसी का इतना साहस कि उन्हें खेलने से मना कर दे। पढ़ाई समयाभाव में तरसती रहती है। पढ़ाई कभी आधे घंटे के लिये, कभी डाँट से, कभी चिरौरी कर के, घर में सबसे बेचारी सी। उनकी उत्सुकता देख कर मेरे अन्दर का स्नेहिल और अनुशासनात्मक पिता एक साथ जाग उठा। संतुलन की संभावना देखकर एक व्यापारी की तरह बोला, ठीक है, रात के कार्यक्रम रिकार्ड कर दोपहर में देखना होगा, खेलने के बाद पढ़ाई और समय से सुलाई। हाँ, सहर्ष मान गये दोनों बच्चे, वचन दे बैठे। वैसे रात में टीवी देखना तो मुझे भी अच्छा नहीं लगता है, न ढंग से लेखन हो पाता है और न ढंग से नींद आ पाती है। अच्छा हुआ एक तीर में दोनों ध्येय सध गये।

पिछली गर्मी की छुट्टी में एक और समस्या हुयी थी। मेरे पिताजी को समाचार आदि देखने में रुचि रहती है और बच्चों को कार्टून आदि में। एक टीवी रहने पर दोनों पीढ़ियों के बीच घर्षण बना रहता था। हम और हमारी श्रीमतीजी के द्वारा टीवी से वनवास लेने के बाद भी बहुधा समस्या उलझ जाती थी। या तो बच्चे क्रोधित हो जाते या पिताजी बच्चों को बिगाड़ने के दोष मढ़ने लगते। अनुशासन व प्यार के द्वन्द्व में मस्तिष्क पूरी तरह घनघना गया था। दूसरा टीवी और दूसरा कनेक्शन लेना तो पूरी तरह व्यर्थ था, वांछित शान्ति तब आयी जब पिताजी को अपने मित्रों की याद आने लगी। लगा कि प्लस लेने से यह समस्या भी सुलझ जायेगी। जिसको देखना होगा, देखेगा, दूसरे का कार्यक्रम रिकार्ड हो जायेगा, बाद में देखने के लिये।

मेरी पसन्द के कई कार्यक्रम या तो ऑफ़िस के समय में आते हैं या तो सोने के समय में। डीडी भारती, डिस्कवरी, हिस्ट्री आदि के कई कार्यक्रम ऐसे होते हैं जो बार बार देखने का मन करता है। न रात में जगना हो पाता है और न ही उसके पुनर्प्रसारण की प्रतीक्षा करना। सायं और रात को जो समय मिलता, उसमें टीवी या तो बच्चे हथियाये रहते या तो श्रीमतीजी। हमें भी लगने लगा कि हमें भी इस डब्बे से अपनी पसन्द के गुणवत्ता भरे कार्यक्रम देखने को मिल जायेंगे। साथ ही साथ कई नई फ़िल्में भी टीवी पर आती रहती हैं, एचडी में उन्हें घर में ही देख लेने से मल्टीप्लेक्स जाने का व्यय भी कम होने की संभावना भी दिखने लगी।

श्रीमतीजी घर का सारा काम करने के बाद घर में भी खाली रहती हैं, उनसे भी कहा कि यदि हम प्लस लेते हैं तो आप भी अपने कार्यक्रम दोपहर में देख लिया करें और सायं का समय परिवार के साथ और रात का भोजन टीवी के बिना, गुणवत्ता भरा। एक तरह से घर के सारे लोगों के लिये लाभकारी होने वाली थी, प्लस की यह अवधारणा।

एक और लाभ होता है रिकॉर्डेड कार्यक्रम देखने का, बीच में आये प्रचारों को आप बढ़ा सकते हैं। यदि गणना की जाये तो हर कार्यक्रम में लगभग ३० प्रतिशत समय उन प्रचारों से भरा रहता है जिन्हें हम देखना ही नहीं चाहते हैं। इस प्रकार हमारे समय की बहुत बचत हो सकती है। यदि आप एक दिन में एक घंटे भी टीवी देखें तो पूरे वर्ष में लगभग १०० घंटे की बचत निश्चित है। पूरे परिवार के लिये एक वर्ष में ४०० घंटे की बचत के लिये एक बार दिये अतिरिक्त ४००० रुपये अधिक नहीं हैं।

इन लाभों को देखते हुये सामूहिक और पारिवारिक निर्णय यह लिया गया कि टाटा स्काई प्लस एचडी लिया जाये और परिवार की जीवनशैली को एक नया रूप दिया जाये। एक ऐसा स्वरूप जिसमें टीवी कार्यक्रम का समय हमें आदेश न दे, बच्चों को पढ़ाई के लम्बे कालखण्ड मिले, घर को लम्बी शान्तिकाल मिले, ठूँसे गये कार्यक्रम के स्थान पर गुणवत्ता भरे कार्यक्रम मिलें, कार्यक्रमों के दृश्य अधिक स्पष्ट दिखें, सप्ताहन्त में साथ बैठ कोई फ़िल्म देखी जाये, साथ बैठ बिना टीवी के व्यवधान के रात में खाना खाया जाये, और ऐसे न जाने सुधरते जीवन के कितने आकार गढ़ें।

मेरे दो ऐसे मित्र हैं जिन्होंने अपने घर में टीवी को धँसने नहीं दिया है। हम उनके दृढ़ निश्चय से प्रभावित तो रहे हैं पर उन जैसा साहस नहीं कर पाये हैं। टीवी से होने वाले लाभों को अधिकतम उपयोग कर सके और साथ ही होने वाली हानियों को न्यूनतम कर सके, यही बस प्रयास रहा है।

टाटा स्काई के प्रतिनिधि को फ़ोन करके हमने अपना निर्णय बता दिया। उनकी त्वरित सेवा देख कर मैं दंग रह गया, तीन घंटे के अन्दर हम एक एचडी चैनल देख रहे थे और दूसरे को रिकॉर्ड कर रहे थे। श्रीमतीजी बड़ी प्रसन्न थीं, करवा चौथ वाले दिन उन्हें रंगभरा उपहार मिल गया था। उन्होंने अपने उपहार का त्याग कर परिवार के लिये टाटा स्काई प्लस एचडी को वरीयता दी है। परिवार का वातावरण और भी रंग बिरंगा हो गया है।