29.6.13

महीने भर का ऱाशन या महीने भर का लेखन

सप्ताहान्त के दो दिन यदि न होते तो संभवतः सृष्टि अब तक विद्रोह कर चुकी होती, या सृष्टि तब तक ही चल पाती, जब तक चलने दी जाती। वे सारे कार्य जो आदेश रूप में आपको मिलते रहते हैं, अपना ठौर ढूढ़ने तब भला कहाँ जाते? अच्छा हुआ कि सप्ताहान्त का स्वरूप बनाया गया, और भी अच्छा हुआ कि उसे एक दिन से बढ़ा कर दो दिन कर दिया गया। अब न जाने कितने छोटे मोटे कार्य तो अपने आप ही हो जाते हैं, इसलिये कि कहीं दो दिनों में उनको ढंग से निचोड़ न डाले हम। बड़े बड़े कार्य, जैसे कहीं दूर देश घूमकर आना, ये सारे कार्य भी वरिष्ठों की कृपा की जुगत से हो ही जाते है। जहाँ तक उत्पादकता के प्रश्न हैं, तो देश हर दिन प्रगतिमान है। पहले ६ दिनों में जो निष्क्रिय काल होता था, उसे एक दिन के अवकाश में बदलने के बाद भी शेष पाँच दिनों में लोगों के पास इतना समय रहता है कि अपना कार्य करने के अतिरिक्त बहुत लोग विदेश के आर्थिक संस्थानों की रोजी रोटी चलाते रहते हैं। राज्य सरकारों में कार्यरत बान्धव इससे तनिक ईर्ष्यालु हो उठेंगे, उन्हें अभी भी ६ दिन खटना होता है, पर हर दिन एक डेढ़ घंटा कम।

जब दृष्टि फैलती है तब दृश्य विस्तारित हो जाता है, जब सृष्टि फैलती है तब व्यवस्था विस्तारित हो जाती है, पर जब से सप्ताहान्त फैला है तब से हमें मिलने वाला समय और कम हो चला है। कहते हैं कि जब धन कम रहता है तो व्यक्ति सोच समझ कर व्यय करता है, पर अधिक धन में व्यय भी अधिक होने लगता है और बहुधा व्यर्थ ही हो जाता है। अब घर में सबको कम से कम इतना तो ज्ञात है कि सप्ताहान्त के दो दिन हम सबकी सेवा में लगे रहेंगे। कभी कभी आवश्यक प्रशासनिक कार्य निकल आते हैं, पर प्रशासकों को भी घरेलू कार्य पकड़ाने वालों की कृपा से कनिष्ठगण बचे रहते हैं, कृतज्ञ बने रहते हैं।

मुख्यतः तीन कार्य रहते हैं, बच्चों को कहीं घुमाना, घर का राशन आदि लाना और लेखन कर्म करना। तीन कार्य होने से कई बार व्यस्तता बनी रहती है और विश्राम का समय नहीं मिल पाता है। कई बार सोचा कि इन्हें किस प्रकार सुव्यस्थित करें कि सबके लिये समुचित समय मिल जाये।

बच्चों का कार्य तो अत्यावश्यक है और किसी प्रकार भी टाला नहीं जा सकता है, उसको टालने का सोचते ही दो ओर से ऊष्मा आने लगती है, बच्चे और बच्चों की माँ एक ओर हो जाते हैं। एक सप्ताह में किसी एक स्थान पर ले जाने से ही कार्य चल जाता है, कभी कभी जब व्यस्तता अधिक होती है तो उनको भी हम पर दया आ जाती है और मॉल आदि घूमने से ही कार्य चल जाता है। इस कार्य से हमें सर्वाधिक विश्राम तब मिलता है जब उनके विद्यालयों में सप्ताहान्त के लिये ढेर सारा कार्य पकड़ा दिया जाता है, उस गृहकार्य के लिये विषय सामग्री जुटाने में ही उनका सारा समय निकल जाता है और कहीं घूमने जाने की सुध भी नहीं रहती है उन्हें। उन्हें कार्य के बोझ में डूबा देख अच्छा तो नहीं लगता है, पर क्या करें, समय मिल जाता है अपने लिये तो वह दुख कम भी हो जाता है। पिछले कुछ माह से लग रहा है कि उनके विद्यालय के शिक्षकगण दयालु प्रकृतिमना हो चले हैं अतः अधिक कार्य नहीं दे रहे हैं, फलस्वरूप हर सप्ताह कहीं न कहीं घूमना हुआ जा रहा है।

घर का राशन लाना भी प्रमुखतम कार्यों में एक है, यदि वह नहीं किया गया तो उपवास की स्थिति आ सकती है। न केवल वह कर्म प्राथमिकता से करना होता है, वरन मन लगा कर भी करना होता है। जल्दी जल्दी करने के प्रयास में जितना समय बचता है, उससे दस गुना अधिक समय घर में न जाने कितने ताने सुनने में चला जाता है, हर प्रकार के और हर प्रकार से। जो सूची हाथ में आती है उसका अनुपालन अनुशासनात्मक आदेश की तरह निर्वाह किया जाता है। हर बार बस यही प्रयास कि पिछली बार से अच्छा सामान लाकर अधिक अंक बटोर लिये जायें।

इन दो महाकर्मों के बाद रहा सहा जो समय शेष बचता है, वह सप्ताह में लिखे जाने वाली दो पोस्टों को सोचने और लिखने में निकल जाता है। अब उस समय लिखने का वातावरण हो न हो, मन में विचार श्रंखला निर्मित हो न हो, निर्बाध समय मिले न मिले, कई अन्य कारक रहते हैं जिन पर सीमित लेखन की आस टिकी रहती है। कई बार तो ऐसा भी होता है कि कोई पोस्ट आधी ही लिखी जा पाती है और अपने अधपके रूप में छपने के एक दिन पूर्व तक गले में अटकी रहती है। बहुधा व्यग्रता का स्तर ख़तरे के निशान के ऊपर बना रहता है।

सप्ताहान्त के आकारों और प्रारूपों पर ढेर सा चिन्तन मनन करने के पश्चात हम श्रीमती जी से बोले कि क्या ऐसा नहीं हो सकता कि आप महीने भर का राशन एक बार ही बता दें, एक बार में ही जाकर सारी आवश्यकतायें पूरी कर ली जायें। शेष सप्ताहान्तों का उपयोग हम लेखन के लिये करें। प्रस्ताव सशक्त था, यदि महीने भर में एक ही बार जाना हो तो शेष तीन सप्ताहान्तों का उपयोग निर्बाध लेखन के लिये किया जा सकता है। प्रस्ताव उन्होंने कुछ पल के लिये और हमारे सामने एक प्रति प्रस्ताव रख दिया। क्यों न हम ऐसा करें कि महीने भर का लेखन एक सप्ताहान्त में बैठकर कर लें और शेष समय घर के कार्यों में लगाया जाये?

कभी कभी जब चलाया हुआ तीर या कहा हुआ शब्द घूमकर वापस आ जाता है तो उत्तर देते नहीं बनता है। इसमें दो संकेत स्पष्ट थे। पहला हमारा लेखनकर्म घर के कार्यों में सम्मिलित नहीं था, वह प्रवासी के रूप में पिछले ४-५ वर्षों से इस घर में रह रहा था और घर के सामान्य कार्यों को बाधित कर रहा था दूसरा यह कि यह एक पूर्ण रूप से भौतिक व श्रममार्गी कार्य था। यदि एक लेख ३ घंटे में लिखा जा सकता है तो महीने भर में छपने वाले ८-९ लेखों के लिये २४-२५ घंटे पर्याप्त हैं। उन्हें एक के बाद एक, बिना मानसिक या शारीरिक विश्राम के लिखा जा सकता है।

हम कल्पना में डूब गये कि यदि सच में ऐसा होगा तो क्या होगा? कल्पना कठिन नहीं है, तीन चार लेख पूरे होते होते शब्द घूमने लगेंगे, विचार छिटकने लगेंगे, भ्रम गहराने लगेगा और अन्ततः कपाल निचुड़ने की स्थिति में पहुँच जायेगा। हमें लगा कि प्रति प्रस्ताव हमारे लेखन को पूर्णरूपेण धूलधूसरित करने के लिये रखा गया है। हमने समझाने का प्रयास किया कि माह भर का राशन तो एक साथ आ सकता है पर माह भर का लेखन एक साथ बाहर नहीं आ सकता। सृजन कर्म की गति मध्यम होती है, जबकि पाँच किलो की बोरी के स्थान पर दस किलो की बोरी आ सकती है।

अब हमारे चिन्तन के स्थान पर प्रति चिन्तन प्रारम्भ हो गया, उत्तर आया कि महीने भर क्या क्या बनाना है, यह एक बार में कैसे निर्धारित किया जा सकता है? मान लिया हम लोग अपने लिये कोई भोजनचर्या नियत भी कर लें, पर तब क्या होगा जब कोई अतिथि आयेगा, तब क्या होगा जब कोई बच्चा हठ करेगा, तब क्या होगा जब आपको सहसा कुछ विशेष खाने का मन करने लगेगा? जीवन इस प्रकार से एकरूपा चलाने से उसमें घोर नीरसता आ जायेगी।

हम दोनों अपने तर्कों पर अड़े हैं और जहाँ पर खड़े थे, बस वहीं पर ही खड़े हैं। क्या माह में एक बार के स्थान पर माह में दो बार का प्रस्ताव धरा जाये? माह में तीन बार के स्थान पर दो बार लेखन करने से लेखन की गुणवत्ता तो प्रभावित होगी पर घर के खान पान आदि में विविधता बढ़ जायेगी। सुधीजनों का और अनुभव के पुरोधाओं का क्या मत है?

26.6.13

बोझ प्रधान देश का बचपन

मुझे लगता है कि बोझ का जितना स्तर अपने देश में है, उतना विश्व के किसी देश में नहीं है। कोई ऐसे तथ्य तो नहीं हैं जिनके आधार पर मैं यह सिद्ध कर पाऊँ, पर लगता है कि यह ही सत्य हैं।

वैसे कहने को तो सारे तथ्य होने के पश्चात भी लोग सत्य स्थापित नहीं कर पाते हैं, तर्क होने के बाद भी कुछ सिद्ध नहीं कर पाते हैं, सिद्ध करने के बाद उसे क्रियान्वित नहीं कर पाते हैं। जिनके पास कुछ भी नहीं होता, उनके पास बस सत्य होता है, वे कह देते हैं और सब मान भी जाते हैं। जब तक गुणीजन उसे असिद्ध कर सकते हैं, वह सत्य बना रहता है। कभी कभी ऐसे सत्य राजनैतिक गरिमा के लिये तो कभी अपने को समझाने के लिये टपकाये जाते हैं।

हम भी इसी तरह का सत्य टपका रहे हैं, कि भारत के बच्चे सर्वाधिक दबे हैं, हर तरह के बोझ से, जीवन के बोझ से। तर्क को उल्टे सिरे से पकड़ते हैं और इसे असिद्ध करने का प्रयास करते हैं। यदि असिद्ध न कर पाये तो तर्क सिद्ध माना जायेगा, स्थापित सत्यों की तरह। जैसा लगता है कि जितनी हमारी सामर्थ्य है, हम असिद्ध करने को बड़ा कठिन मानते हैं और वहाँ तक नहीं पहुँच पाते हैं। चलिये कठिन ही सही, असिद्ध करने का प्रयास करते हैं।

असिद्ध करने का पहला स्तर है, स्वयं का, विशेषकर स्वयं के अनुभव का। यदि हमारा बचपन आनन्द में बीता हो, पढ़ाई का तनिक भी बोझ न पड़ा हो, तो प्रस्तुत सत्य असत्य माना जायेे। बचपन में एक तथ्य बड़ी स्पष्टता से समझ आ गया था कि यदि भविष्य आर्थिक रूप से सुरक्षित चाहिये तो पढ़ते रहना पड़ेगा, न केवल पढ़ना पड़ेगा, वरन अपनी कक्षा की ऊपरी बौद्धिक सतह में टिके रहना पड़ेगा। मन्त्र न केवल समझाया गया वरन पड़ेसियों के कई उदाहरणों के द्वारा सिद्ध भी किया गया। देखो उनको, बचपन में पढ़ने की जगह खेलते रहे, अब जीवन के दुख भोग रहे हैं।

कभी कभी कुछ भय अकारण ही दिखाये जाते हैं, पर यह भय सच था। थोड़ा बड़ा होने पर पता लग गया कि प्रतियोगी परीक्षाओं में सफल प्रतियोगियों का प्रतिशत प्रयासरत प्रतियोगियों का पाँच प्रतिशत भी नहीं। प्रथम पाँच में रहना है तो, पुस्तकों को सर पर धरे चलना ही होगा, जागते समय भी, सोते समय भी। भारत में मध्यमवर्ग की बहुलता है और उनकी आर्थिक बचत एक पीढ़ी के परे जा भी नहीं पाती है। यदि कोई नौकरी नहीं मिली तो अगली पीढ़ी निम्न मध्यमवर्ग और उसकी अगली पीढी सीधे गरीबी रेखा के नीचे।

स्थापित व्यवसाय और परम्परागत आर्थिक आधार टूटने के कारण सारे बच्चों को नौकरी के राह पर जूझना स्वाभाविक है। नौकरियों का आश्रय केवल उन्हें ही मिल पाता है जो पढ़ने में और उसे परीक्षाओं में उगल देने में अच्छे होते हैं। शेष जूझते हैं, शेष जीवन। बोझ का बोध रहता ही है, जीवन के पूर्वार्ध में या जीवन के उत्तरार्ध में।

कभी सोचा कि कितना अच्छा होता कि हमारा देश भी विकसित होता, हर गाँव में एक तेल का कुँआ होता, एक सोनी के सामानों की फैक्टरी होती। रुचि और आवश्यकता अनुसार ज्ञान प्राप्तकर हम भी कहीं लग जाते। दुर्भाग्य ही है हमारे देश का कि हम जनसंख्या और भ्रष्टाचार में तो अग्रणी हैं, पर औद्योगिक विकास और अनुशासन में पिछड़े हुये हैं।

विदेशों में बच्चे राज्य के अनमोल उपहार माने जाते हैं, उन पर किसी प्रकार का अत्याचार अपराध की श्रेणी में आता है। स्वास्थ्य और शिक्षा राज्य का कर्तव्य होता है और बड़े होने पर उन्हें अपना व्यवसाय स्थापित करने के लिये पर्याप्त आर्थिक सहायता मिलती है। हमारे यहाँ जिन बच्चों को शिक्षा का आग्रही बोझ नहीं मिल पाता है, हमारा आर्थिक तन्त्र उन्हें और उनके बचपन को बालश्रम के माध्यम से सोख लेता है।

कहते हैं कि संघर्ष व्यर्थ नहीं जाता है, जितना जूझेंगे उतना निखरेंगे। जिन उन्नत क्षेत्रों के लिये हमें अपनी जुझारू क्षमता बचाकर रखनी थी, उनके स्थान पर हम सारी ऊर्जा प्रतियोगी परीक्षाओं की उन पुस्तकों को रटने में और हल करने में लगा देते हैं जिनकी उत्पादकता केवल प्रतियोगी परीक्षाओं को उत्तीर्ण करने तक ही सीमित रहती है। नौकरी मिल जाने के बाद उनकी उपयोगिता शून्य हो जाती है। हमने ज्ञान के पहाड़ पढ़ डाले, उनका उपयोग अब कुछ भी नहीं, छूछे कीर्तमान स्थापित कर डाले, उनका उपयोग अब कुछ भी नहीं। बौद्धिक उत्कृष्टता के आधार पर तकनीक के जिन क्षेत्रों में हमें आगे होना था, वे हमारे ध्येय में रहे ही नहीं। संभवतः जिस दिन प्रतियोगी परीक्षाओं के बोझ से हमें मुक्ति मिलेगी, उस दिन हम अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर अपना हित अहित समझ पायेंगे।

जिस भय को हमने जिया है, जिस तन्त्र का गरल हमने पिया है, उसी में अपने बच्चों को जाते देख मन पीड़ा से कराह उठता है। हृदय कहता है कि उन्हें अपना बचपन सिद्ध करने दो, उड़ना सीख गये तो आकाश से अपना लक्ष्य साझ ही लेगे। बुद्धि कहती है कि इस देश में कहाँ से उड़ पायेगा बच्चा।, उसे अपने कंधों पर आर्थिक सुनिश्चितता और सामाजिक आकांक्षाओं का बोझ जो उठाना है।

उपरोक्त कहे सत्य को असिद्ध करने के जितने भी तर्क एकत्र करता हूँ, मन उतना ही भारी हो जाता है। काश मेरा कथन असिद्ध हो जाये, आज नहीं तो कल, देश के बच्चे भी शिक्षा और आर्थिक तन्त्र के बीच बैल की तरह जुते न दिखायी दें। 

22.6.13

औरों को हम

आदर्शों की छोटी चादर,
चलो ढकेंगे,
औरों को हम।

आंकाक्षा मन पूर्ण उजागर,
चलो छलेंगे,
औरों को हम।

इसकी उससे तुलना करना,
चलो नाप लें,
औरों को हम।

निर्णायक बन व्यस्त विचरना,
चलो ताप लें,
औरों को हम।

हमने ज्ञान निकाला, पेरा,
चलो पिलायें,
औरों को हम।

बिन हम जग में व्याप्त अँधेरा,
चलो जलायें,
औरों को हम।

पूर्ण नियन्त्रण, ध्येय महत्तम,
चलो बतायें,
औरों को हम।

फिर क्यों उछलें, अत्तम-बत्तम,
चलों सतायें,
औरों को हम।

काँटे जन जन, पुष्प मधुर हम,
चलो सजा दें, 
औरों को हम।

सुप्त प्राण, हो गुञ्जित मधुबन,
चलो बजा दें,
औरों को हम।

जब हम जागे,
तभी सभी का उदित सबेरा,
जब हम आगे,
तब विकास पथ रत्न बिखेरा,

हम तो हम हैं,
तुम हो, तम है,
हम साधेंगे, सारी रचना,
हम ढोते हैं, जग संरचना,
धर्म हमारा, कर्म हमारा,
न समझो तुम मर्म हमारा,

औरों के हम, समझे जन जन,
यही सिखाते, औरों को हम।

19.6.13

जो है, सो है

अपने मित्र आलोक की फेसबुक पर बदले चित्र पर ध्यान गया, उसमें कुछ लिखा हुआ था। आलोक प्रमुखतः चित्रकार हैं और उसके सारे चित्रों में कुछ न कुछ गूढ़ता छिपी होती है, अर्थभरी कलात्मकता छिपी रहती है। आलोक बहुत अच्छे फोटोग्राफर भी हैं और उनकी मूक फोटो बहुत कुछ कहती हैं। आलोक को पढ़ते पढ़ते दार्शनिकता में डुबकी लगाने में भी रुचि है, उनसे किसी भी विषय पर बात करना एक अनुभव है, हर बार कुछ न कुछ सीखने को मिल जाता है।

चित्र में उनके रेत पर चलते हुये पैर का धुँधला दृश्य था, उनके ही पैर का होगा क्योंकि आलोक गोवा में रहते हैं। उस पर लिखा था, Whatever is could not be otherwise - Eckhart Tolle. अर्थ है, जो है, वह उससे इतर संभव नहीं था। या कहें कि जो है, वह उसके अतिरिक्त कुछ और हो भी नहीं सकता था। पर इसे पढ़ते ही मेरे मन मे जो शब्द आये, वे थे, 'जो है, सो है'।

जो है, सो है। बड़े दार्शनिक शब्द हैं ये। समय, व्यक्ति और स्थान की तुलनात्मक जकड़न से सहसा मुक्त करते शब्द हैं ये। न पहले सा समय आ सकता है, न हम औरों से ही बन सकते हैं और न ही हम किसी समय किसी और स्थान पर ही हो सकते हैं। यदि ऐसा होता तो वैसा हो जाता, यदि ऐसा न होता तो वैसा न हो पाता। ऐसे ही न जाने कितने मानसिक व्यायाम करते रहते हैं, हम सभी। ऐसा लगता है कि औरों की तुलना में सदा ही स्वयं को स्थापित करने के आधार ढूढ़ते रहते हैं हम। न जाने कितना समय व्यर्थ होता है इसमें, न जाने कितनी ऊर्जा बह जाती है इस चिंतन में। उस सभी विवशताओं से मुक्ति देता है, यह वाक्य। जो है, सो है।

एक्हार्ट टॉल के लेखन में आध्यात्मिकता की पर्याप्त उपस्थिति रहती है। उनकी लिखी पॉवर ऑफ नाउ नामक पुस्तक आप में से कइयों ने पढ़ी भी होगी। वर्तमान में जीने की चाह का ही रूपान्तरण है, उनकी यह पुस्तक। मन में एकत्र स्मृतियों और आगत के भय में झूलते वर्तमान को मुक्त कराते हैं, इस पुस्तक के चिन्तन पथ। अभी के मूलमन्त्र में जीवन जी लेने का भाव सहसा हर क्षण को उपयोगी बना देता है, जैसा उस क्षण का अस्तित्व है।

मन बड़ा कचोटता है, असंतुष्ट रहता है। कोई कारण नहीं, फिर भी अशान्त और व्यग्र सा घूमता है। कोई कारण पूछे तो बस तुलना भरे तर्क बतलाने लगता है। समय, व्यक्ति और स्थान की तुलना के तर्क। ऐसे तर्क जो कभी रहे ही नहीं। ऐसे जीवन से तुलना, जो हम कभी जिये ही नहीं। क्योंकि हम तो सदा वही रहे, एक अनोखे, जो हैं, सो हैं।

हम पहले जैसे प्रसन्न नहीं हैं, या भविष्य में अभी जैसे दुखी नहीं रहना चाहते हैं, यही तुलना हमें ले डूबती है। क्या लाभ उस समय को सोचने का जिसे हम भूतकाल कहते हैं और जिसे हम बदल नहीं सकते हैं। क्या लाभ उस समय को सोचने का जो आया ही नहीं और जिसकी चिन्ता में हम भयनिमग्न रहते हैं। मन हमें सदा ही तुलना को बाध्य करता रहता है और हम हैं कि उन्हीं मायावी तरंगों में आड़ोलित होते रहते हैं, अस्थिर से, आधारहीन से। वर्तमान ही है जिसे जीना प्रस्तुत कर्म है और हम इसी से ही भागते रहते हैं।

मन हमें या तो भूतकाल में या भविष्य में रखता है, वर्तमान में रहना उसके बस का नहीं। यदि मन वर्तमान में रहना सीख जायेगा तो वह स्थिर हो जायेगा, उसकी गति कम हो जायेगी, उसका आयाम कम हो जायेगा। किसी चंचल व्यक्तित्व को भला यह कैसे स्वीकार होगा कि उसकी गति कम हो जाये या उसके आयाम सिकुड़ जायें।

जब समय की विमा से हम बाहर आते हैं और वर्तमान में रुकते हैं, तब भी मन नहीं मानता है। किसी और स्थान से तुलना करना प्रारम्भ कर देता है, सोचने लगता है कि संभवतः किसी और स्थान में हमारा सुख छिपा है, यहाँ की तुलना में अच्छा विस्तार छिपा है। हमारा मन तब यहाँ न होकर वहाँ पहुँच जाता है और तुलना करने के अपने कर्म में जुट जाता है। यदि उस स्थान से किसी तरह सप्रयास आप वापस आ जायें, तो तुलना अन्य व्यक्तियों से प्रारम्भ हो जाती है।

मन अपनी उथल पुथल छोड़ नहीं सकता है, उसे साथी चाहिये अपने आनन्द में, हमें भी साथ ले डूबता है। मन को उछलना कूदना तो आता है, पीड़ा झेलना उसने कभी सीखा ही नहीं। मन छोटी से भी छोटी पीड़ा हम लोगों को सौंप देता है और चुपचाप खिसक लेता है।

पता नहीं, आलोक की तर्करेखा भी मेरी तर्करेखा से मिलती है या नहीं, कभी पूछा भी नहीं। पर एक स्थान से चले यात्री कुछ समय पश्चात पुनः एक स्थान पर आकर मिल जायें तो पथ का प्रश्न गौड़ हो जाता है। चित्र में एक पथ दिख रहा है, एक पग दिख रहा है, वर्तमान की दिशा का निर्देशित वाक्य दिख रहा है, यह सब देख मुझे तो यही लगता है कि आलोक मेरे पथ पर ही है। वह तनिक आगे होगा, मैं तनिक पीछे। वह तनिक गतिशील होगा, मैं तनिक मंथर।

यह चित्र एक और बात स्पष्ट रूप से बता रहा है, इसमें न पथ का भविष्य दिख रहा है, न पथ का भूतकाल, बस पथ दिख रहा है, बस पग दिख रहा है। सब के सब वर्तमान की ओर इंगित करते हुये। आप भी बस अभी की सोचिये, यहीं की सोचिये, अपने बारे में सोचिये। मैं तो कहूँगा कि सोचिये ही नहीं, सोचना आपको बहा कर ले जायेगा, आगे या पीछे। आप बस रहिये, वर्तमान में, जो है, सो है।

15.6.13

मैकबुक मिनी

नहीं, एप्पल ने किसी नये उत्पाद की घोषणा नहीं की है, यह मेरे नये प्रयोग का नाम है। इसके पीछे एक रोचक कहानी है, एक परिवर्धित सततता है, एक सुनिश्चित योजना है और उत्पादकतापूर्ण उत्साहवर्धन भी।

जिन्होंने मैकबुक एयर को देखा और परखा है, उन्हें यह ज्ञात होगा कि यह सबसे हल्का लैपटॉप है, ११.६ इंच स्क्रीन और भार मात्र एक किलो। उठाने में सुविधाजनक, रखने में सुरक्षित और कम्प्यूटर के मानकों में आधुनिकतम। यही नहीं, बैटरी भी पर्याप्त रहती है, लगभग ६ घंटे। दो वर्ष पहले लिया था और आज भी नया सा ही लगता है। उपयोग भी सघन है, परिचालन, प्रशासनिक, लेखन और ब्लॉग संबंधी सारे कार्य उसी लैपटॉप में ही होते हैं। कुल मिलाकर मेरे द्वारा ६ घंटे औऱ बच्चों द्वारा २ घंटे उपयोग में आता है। लगभग ८ घंटे के उपयोग में दो बार बैटरी चार्ज करनी पड़ जाती है। उपयोगिता की दृष्टि से देखा जाये तो सामान्य से कहीं अधिक मूल्य देने के बाद भी कहीं अधिक संतुष्ट और प्रसन्न हूँ।

कुछ दिन पहले बिटिया का जन्मदिन था। पढ़ाई में पिछले वर्षों की अपेक्षा बहुत अच्छा प्रदर्शन करने के कारण मन प्रसन्न था और उसे कुछ अच्छा उपहार देने का मन बना लिया था, ऐसा उपहार जो आगे भी उसके काम आ सके। सोचा, विचारा और जाकर एप्पल का आईपैड मिनी ले आया। पता नहीं, आप लोग क्या कहेंगे? आप कह सकते हैं कि दस वर्ष की बिटिया को इतना बहुमूल्य उपहार देना एक मूर्खता है। सबने यही कहा कि ऐसे तो आप बच्चों को बिगाड़ देंगे। क्या करें, मुझे लगा कि अभी थोड़ा बहुत गेम खेलेगी, थोड़े बहुत गाने सुनेगी, वीडियो देख लेगी, पर धीरे धीरे पढ़ने और अन्य सार्थक उपयोग में लाने लगेगी। जो भी हो, बिटिया बड़ी प्रसन्न है, सहेलियों के बीच सगर्व लिये घूमती भी है।

आईपैड मिनी मात्र ३०० ग्राम का है, अत्यन्त हल्का, ८ इंच की स्क्रीन और कार्य करने में अत्यधिक सुविधाजनक। छोटी सी बिटिया के हाथ में छोटा सा आईपैड मिनी, उपयुक्त और मेल खाता। रोचकता में ही सही, वह उस पर बहुत कुछ करना सीख गयी। फिर भी तकनीकी रूप से उसमें कुछ भी करने का उत्तरदायित्व मेरा ही था, मैं उसका तकनीकी सलाहकार जो था। इसी बहाने कई बार उसे देखने, समझने और उस पर कार्य करने का अवसर भी मिला। अब बिटिया जब स्कूल जाती थी, उसका लाभ उठा कर उसे कई बार कार्यालय भी ले गया। उसमें कार्य कर बड़ा आनन्द आया। मैकबुक एयर पर किये जाने वाले सारे कार्य बड़ी सरलता से उसमें भी कर सका। धीरे धीरे नशा बढ़ता गया, कार्यालय में आईपैड मिनी अपना अधिकार बढ़ाने लगा, साथ ही लम्बे निरीक्षणों में और वाहन में भी उसका उपयोग करने लगा।

एक बात जो सर्वाधिक प्रभावित कर गयी, वह थी लगभग तीन गुनी बैटरी, बिना एक बार भी चार्ज किये हुये लगभग १५ घंटे। साथ में चार्जर ले जाने की आवश्यकता समाप्त हो गयी। अब एक तिहाई से भी कम भार में तीन गुनी से भी बैटरी, धीरे धीरे उस पर मन डोलने लगा। बहुधा घर में भी उसे उपयोग में लाने लगा, कहीं कोने में चुपचाप, बिटिया से आँँख बचा कर, घंटे भर के लिये।

बस दो समस्यायें हैं, एक तो स्क्रीन पर टाइप करने से टाइपिंग की गति बहुत कम होने लगती है, उतनी नहीं रहती है जितनी एक भौतिक कीबोर्ड में। जब सोच समझ कर लिखना हो तो वह गति अधिक महत्व नहीं रखती, पर जब विचारों का प्रवाह गतिमय हो तो ऊँगलियों को भी और अधिक थिरकना पड़ता है। उसे एक हाथ से पकड़कर दूसरे हाथ से टाइप करने में बायाँ हाथ थोड़ा थकने लगता है और केवल एक हाथ के प्रयोग से टाइपिंग की गति आधी हो जाती है। दूसरा यह कि कीबोर्ड स्क्रीन पर आ जाने से कार्य करने के लिये क्षेत्रफल कम मिलता है और देखने में थोड़ी असुविधा होने लगती है। संभवतः यही दो बिन्दु प्रमुख थे जब टैबलेट के ऊपर वरीयता देकर मैकबुक एयर को खरीदा था।

थोड़ी सुविधा और थोड़ी असुविधा के साथ आईपैड के प्रयोग में मिलाजुला अनुभव हो रहा था। जब तनिक सुविधाभोगी प्रयोग हो तो आईपैड मिनी, जब तनिक गतिमय लेखन हो तो मैकबुक एयर। मेरे इस व्यवहार से सर्वाधिक अड़चन बिटिया को होने लगी। यद्यपि मैकबुक एयर का प्रयोग करते हुये उसे भी कई गेम उस पर अच्छे लगने लगे थे, पर मेरा यह व्यवहार देखकर उसे लगा कि उसके हाथ से कहीं दोनों ही न निकल जायें, जब नहीं तब पिताजी किसी पर भी कार्य करने लगते हैं। एक दिन हमें चेतावनी मिल गयी कि आप किसी एक का ही उपयोग करने का निश्चित कर लें, दूसरा पूरी तरह उसके लिये छोड़ दें।

किसी पुराने नशेड़ी की तरह मुझे भी आईपैड मिनी के प्रयोग में आनन्द आने लगा था। इस चेतावनी के बाद कोई न कोई उपाय ढूढ़ना आवश्यक हो चला था। एक दिन बंगलोर में भ्रमण करते समय लॉजीटेक कम्पनी की नयी खुली दुकान में जाना हुआ। आईपैड मिनी के लिये एक ब्लूटूथ कीबोर्ड देखा, बहुत छोटा और कई प्रकार से उपयोगी। लगा कि इसे लेने से उपरिलिखित दो समस्यायें सुलझ जायेंगी और आईपैड मिनी के सशक्त पक्ष भी बने रहेंगे। एक दिन बिटिया के साथ गये और जाकर वह कीबोर्ड ले आये। तब तक अनुभव नहीं था कि वह उपयोग में कैसा रहेगा? दो लाभ स्पष्ट थे, पहला वह कीबोर्ड एक कवर का भी कार्य करने लगा, उसकी बनावट बिल्कुल आईपैड मिनी से मेल खाती थी। दूसरा वह एक आधार के रूप में भी कार्य करने लगा, लम्बा और चौ़ड़ा, दोनों ही प्रकार से। अब लिखने, पढ़ने, वीडियो देखने और अन्य कार्य करने में सुविधापूर्ण आनन्द आने लगा है। आप दोनों का अन्तर चित्र में देखिये।

यह कीबोर्ड परम्परागत कीबोर्डों के आधे आकार का है। एक संशय हो सकता है कि आकार आधा होने पर टाइप करने में कठिनाई हो सकती है। हाँ, यदि आप दसों ऊँगलियों से टाइप करते हैं तो संभव है कि कई बार आपसे भूल हो जाये और आपकी ऊँगलियाँ कुछ और टाइप कर जायें। पर यदि आप मेरी तरह हैं और दो ऊँगलियों से ही देख देख कर टाइप करते हैं तो आपकी गति पहले से और अधिक हो जायेगी, क्योंकि इसमें आपको अन्य कीबोर्डों की तुलना में हाथ बहुत कम हिलाना पड़ेगा।

अभ्यास लय पकड़ चुका है और टाईपिंग की गति पहले से बीस प्रतिशत अधिक हो गयी है। बैटरी तीन गुनी और कीबोर्ड को मिलाकर भी भार मैकबुक एयर का आधा रह गया है। यदि मूल्य भी देखा जाये तो वह भी मैकबुक एयर का आधा ही है। अन्य कार्यों के बारे में तो नहीं कह सकता पर लेखन, कार्यालय, अध्ययन समेत मेरे सारे कार्यों के लिये यह पर्याप्त है। जब से इस प्रयोग में लगा हूँ, लेखन बहुत अधिक बढ़ गया है। इसका नामकरण मैंने 'मैकबुक मिनी' किया है। अब बिटिया मेरे 'मैकबुक एयर' में प्रसन्न है और मैं उसके 'मैकबुक मिनी' में।

12.6.13

खिड़की पर गिलहरी

घर की जिस मेज पर बैठ कर लेखन आदि कार्य करता हूँ, उसके दूसरी ओर एक खिड़की है। उसमें दो पल्ले हैं, बाहर की ओर काँच का, अन्दर की ओर जाली का, दोनों के बीच में लोहे की ग्रिल लगी है। दोनों पल्लों के बीच लगभग ४ इंच का स्थान है। जब कभी भी ऊपर की खिड़की खुली रहती है, नीचे के दोनों पल्लों के बीच आने जाने का रास्ता निकल आता है। बहुधा ऊपर की खिड़की खुली रहती है, हवा और प्रकाश दोनों ही आते रहते हैं। पिछले कुछ दिनों से बंगलोर में अत्यधिक वर्षा होने से ठंडक बढ़ गयी, तब खिड़की बन्द न कर, उस पर केवल एक पर्दा लगा दिया गया।

आज जब वह पर्दा ८-१० दिन बाद खोला तो उसमें एक गिलहरी के रहने का स्थान बन चुका था। पता नहीं इसके पहले वह कहाँ रह रही थी? संभवतः किसी पेड़ पर या किसी छत में निचले हिस्से में। वर्षा ने उस स्थान को गीला कर दिया होगा। बिल्ली आदि शत्रुओं से बचने के लिये वह क्या करे, तो उन दो पल्लों के बीच उसने अपना अस्थायी घर बना लिया। सूखी घास-फूस के कई टुकड़े लाकर उन्हें वृत्ताकार बिस्तर के रूप में सजा दिया है, एक रस्सी के रेशों को अपने छोटे छोटे दाँतों से निकाल कर एक हल्का गद्देदार आकार दे दिया है। एक बड़ा ही सुरक्षित, व्यवस्थित और विश्रामयुक्त स्थान का निर्माण कर दिया।

अब दुविधा मेरी थी। सर्वप्रथम आश्चर्य इस बात पर हो रहा था कि इतनी छोटी सी गिलहरी और इतनी व्यवस्थित बुद्धि, प्रयासरत श्रम और सार्थक निष्कर्ष। वह आधा घर बना चुकी थी और शेष के लिये दौड़ भाग कर रही थी। मैं सहसा सामने खड़ा था। एक मनुष्य की दो आँखें उसे देख रही थीं। ऐसा नहीं हैं कि मनुष्य से उसका व्यवहार सर्वथा नया है, उसके अनुभव और उसके पूर्वजों द्वारा सुनायी हुयी कहानियों में मनुष्य की छवि बहुत अच्छी तो नहीं होगी। वह स्तब्ध सी मुझे देख रही थी, हम दोनों के बीच में एक काँच का अन्तर था। दूसरी ओर से जाली से छनती हवा गिलहरी के रोयें हिला रही थी। एक अजब सा संवाद था, निर्दयी मनुष्य के हाथ और उसके घर के बीच एक चटखनी का अन्तर था। बेघर और अर्धनिर्मित घर के बीच १० दिन का श्रम था। सहृदय मनुष्य और गिलहरी के सुरक्षित भविष्य के बीच खिड़की पर खटकने वाला एक घोंसला था।

अब किस अन्तर को मनुष्य हटायेगा। देखा जाये तो वह स्थान मेरा था, प्रभात में जब प्रथम किरण आती है, जब भी सुवासित पवन बहती है, वह खिड़की ही प्रकृति से मेरा सम्पर्क स्थापित करती है। एक छोटा सा घोंसला, आपको खटक सकता है। मैं उस खिड़की पर अपना अधिकार माने बैठा था। दस दिन से वह स्थान उपयोग में न आने से गिलहरी उसे सुरक्षित मान बैठी थी और वहाँ अपना घर बनाने लगी थी।

दुविधा गहरी थी और निपटानी आवश्यक थी। आप कह सकते हैं कि मैंने दस दिन की ढील क्यों दे दी, यही कारण रहा कि गिलहरी ने अपना घर बना डाला। यदि मैं नियमित रूप से खिड़की खोलता रहता तो संभवतः यह स्थिति उत्पन्न न होती। मेरी ढील मेरा दोष है, गिलहरी का अज्ञान उसका दोष है। किसका दोष गाढ़ा है, कौन निर्णय करेगा? इस समस्या का क्या हल निकलेगा, किन सिद्धान्तों के आधार पर निकलेगा?

प्रमुख सिद्धान्त प्रकृति का आधार लिये है। मैं और गिलहरी, दोनों ही प्रकृति के अंग हैं। मेरे लिये मैं महत्वपूर्ण हूँ, गिलहरी के लिये वह स्वयं। इस विषय में गिलहरी के पूरे अस्तित्व पर प्रश्नचिन्ह लगा हुआ था और मेरे लिये प्रभात में खटकने वाली दृष्टि। गिलहरी को होनी वाली हानि मुझे होने वाली हानि से बहुत अधिक थी।

उस स्थान पर किसका न्यायपूर्ण अधिकार है या हम दोनों का सहअस्तित्व संभव है। यदि ऐसा है तो हम दोनों में किसे क्या स्वीकार करना होगा? यह हम दोनों पर छोड़ देना चाहिये या शक्तिशाली मनुष्य को दोनों के बारे में निर्णय लेना चाहिये? न्याय के किन पक्षों को किस प्रकार समझना है, यह चिन्तन की कई परतों को उद्वेलित कर जाता है।

यदि मैं चिन्तनहीन होता तो उसी समय शक्ति प्रदर्शन कर त्वरित निर्णय दे देता, घोंसला उठा कर फेंक देता, गिलहरी उसे समेट कर कहीं और नया घोंसला बना लेती। पर वह मुझसे न हुआ, मैं सोच में पड़ गया। अब निर्णय नहीं कर पा रहा हूँ कि क्या किया जाये?

विश्व की सारी समस्याओं को देखें तो हर स्थिति में गिलहरी और मनुष्य की ही कहानी दिखती है, मेरी कहानी से पूरी तरह मिलती जुलती। शक्ति के उपासक अपना न्याय और निर्णय गिलहरी पर थोप देते हैं। उनके विरोधी गिलहरी का सहारा लेकर अपना स्वार्थ साधते हैं। गिलहरी माध्यम बन जाती है, घर से बेघर हो जाती है, शेष लड़ाई चलती रहती है।

नक्सल समस्या भी कुछ अलग नहीं है। गिलहरी के तथाकथित संरक्षक कहे जाने वाले पक्ष लड़ रहे हैं और गिलहरी अपने अस्तित्व के लिये निहार रही है, सहमी सी।

अब मैं क्या करूँ? मैं तो उसे नहीं हटा पाऊँगा। प्रभात की किरण और शीतल पवन के साथ गिलहरी की गतिविधि भी देखता रहूँगा। हो सकता है कि लेखन धर्म में थोड़ा व्यवधान पड़ जाये, स्वीकार है, पर उसे हटाने का साहस मेरे अन्दर तो नहीं है। आप ही बतायें कि गिलहरी के संग सहअस्तित्व के इस नये अध्याय को और कैसे सुमधुर बनाया जा सकता है?

8.6.13

टावर किचेन से ब्लॉगिंग

इस बार इंडीब्लॉगर के मिलने का स्थान था, यूबी सिटी। यह स्थान विजय माल्या जी का है, जी हाँ किंगफिशर वाले और यहीं पर ही उनका मुख्यालय भी है। मेरे घर से लगभग ३ किमी दूर और विस्तृत और सुन्दर कब्बन पार्क के समीप। रविवार का समय था, अघटित सा, सदा की तरह शान्त और रिक्त, यह आयोजन रोचक लगा तो नहा धोकर वहाँ पहुँच गये।

यूबी सिटी के १६वें तल में टावर किचेन नामक यह स्थान निश्चय ही रात्रिकालीन पार्टियों में चहल पहल से भरा पूरा रहता होगा, क्योंकि अपराह्न के समय ही बार आदि की तैयारियाँ विधिवत चल रही थीं। उन सब विषयों पर ध्यान नहीं जाना चाहिये था, आयोजन का विषय कुछ और था, पर एक ब्लॉगर होने के नाते पत्रकारिता के गुणों के छींटे बिना आप पर पड़े रह भी कहाँ सकते हैं। हम भी अवलोकन का धर्म निभा उस ओर बढ़ गये जहाँ से चहल पहल की टहल चल रही थी।

इस बार कुछ अधिक ही भीड़ थी, ब्लॉगरों के अतिरिक्त माइक्रोसॉफ्ट के चाहने वालों की भी भीड़ थी वहाँ पर। विषय और आयोजन ही कुछ ऐसा था। यह आयोजन माइकोसॉफ्ट और इंडीब्लॉगर ने मिलकर किया था और शीर्षक था, 'क्लॉउड ब्लॉगॉथन'। देखिये एक ही शब्द में कितने पक्ष साध लिये। क्लॉउड से तकनीकी पक्ष, ब्लॉग से लेखकीय पक्ष और ऑथन से कुछ कुछ मैराथन जैसा लम्बा चलने वाला। तीनों ही विषय, तकनीक, लेखन और अस्तित्व, मेरे प्रिय विषय हैं। बस यही कारण था अत्यधिक भीड़ का, त्रिवेणी के संगम में तीनों मतावलम्बियों की भीड़ थी, हम थे जो तीनों के संश्लेषित रूप लिये पहुँचे थे।

आशायें बहुत प्रबल थीं और लग रहा था कि चर्चा गहरी होगी। पहली आशा कि लेखन की तकनीक पर चर्चा होगी, ढह गयी। दूसरी आशा कि तकनीकी लेखन पर चर्चा होगी, ढह गयी। तीसरी आशा कि तकनीक या लेखन में से किसी के भविष्य पर चर्चा होगी, वह भी ढह गयी। अन्ततः मन्तव्य समझ आया कि यह माइक्रोसॉफ्ट के उत्पादों को ब्लॉगिंग के माध्यम से प्रचारित करने के लिये आयोजित कार्यक्रम था। क्योंकि क्लॉउड इण्टरनेट का भविष्य है, माइक्रोसॉफ्ट के क्लॉउड प्रधान उत्पाद ऑफिस ३६५ ही चर्चा के केन्द्रबिन्दु में था।

जब पहले से कार्यक्रम के आकार और आसार के बारे में कुछ ज्ञात नहीं हो तो समझने में थोड़ा समय चला जाता है। इस स्थिति में एक कोने में सुविधाजनक शैली में बैठकर सुनने से अच्छा कुछ नहीं है। अपनी उपस्थिति को अपने तक ही सीमित रखने से संवाद का बहुत अधिक प्रवाह आपकी ओर बहता है। जब बोलने की इच्छा न हो तो, समझने में बहुत अधिक आनन्द आता है। मेरे जैसे १५-२० लोग स्थान की परिधि निर्मित किये हुये थे, उसके अन्दर नये और उत्साही प्रतिभागी अपनी उपस्थिति का नगाड़ा बजा रहे थे।

तभी माइक्रोसॉफ्ट के भारतीय परिक्षेत्र के एक बड़े अधिकारी आते हैं, पहले कम्प्यूटर, फिर माइक्रोसॉफ्ट और फिर क्लॉउड की महत्ता पर एक सारगर्भित और स्तरीय व्याख्यान देते हैं। सब कुछ इतने संक्षिप्त में सुनकर अच्छा लगा और साथ ही साथ अनुभव का संस्पर्श देख रुचि और बढ़ी। पर ब्लॉग को किसलिये शीर्षक सें सम्मिलित किया गया है, उसे सुनने की प्रतीक्षा बनी रही। जब व्याख्यान अपने अंतिम चरण पर पहुँचा, तब कहीं जाकर पता चला कि ब्लॉग को उनके उत्पादों के प्रचार तक ही महत्व प्राप्त है। ब्लॉगरों को प्रचार माध्यम का एक अंग मानकर दिया गया था वह व्याख्यान। थोड़ा छली गयी सी प्रतीत हुयी अपनी उपस्थिति, वहाँ पर।

तीन तरह की प्रतिक्रियायें स्पष्ट दिख रही थीं। पहली उनकी थी जो विशुद्ध तकनीकी थे, वे सबसे आगे खड़े थे, अधिकारी को लगभग पूरी तरह घेरे, कुछ ज्ञान की उत्सुकतावश और कुछ संभावित नौकरी के लिये स्वयं को प्रदर्शित करने हेतु। उनके तुरन्त बाहर विशुद्ध ब्लॉगरों की प्रतिक्रिया थी, उनका तकनीक के बारे में ज्ञान लगभग शून्य था और वे मुँह बाये सब सुन रहे थे, सब समझने का प्रयास कर रहे थे। उनमें भी तनिक विकसित प्रतिक्रियायें उन ब्लॉगरों की थीं जिन्होने तकनीक के प्रभाव को समाज में समाते हुये देखा है, उन्हें तकनीक का ब्लॉग समाज के पास आकर प्रचार का आधार माँगना रुचिकर लग रहा था।

चौथी प्रतिक्रिया विहीन उपस्थिति हम जैसे कुछ लोगों की थी, जो शान्त बैठे इस गति को समझने का प्रयास कर रहे थे। मैं संक्षिप्त में बताने का प्रयास करूँगा कि उसकी दिशा क्या थी।

क्लॉउड इण्टरनेट के भविष्य की दिशा निर्धारित कर रहा है। प्रोग्रामों के बदलते संस्करण, फाइलों के ढेरों संस्करणों में होता विचरण, कई लोगों के सहयोग के सामंजस्य में आती अड़चन, कई स्थानों पर रखे और संरक्षित डिजटलीय सूचनाओं के सम्यक रख रखाव ने क्लॉउड को जन्म दिया है। न केवल आवश्यकता इस बात की है कि सूचनाओं का रखरखाव क्लॉउड में हो, वरन उनमें आये बदलाव और उन्हें त्वरित कार्य में लाने की एक ऐसी प्रणाली बने, जिसें श्रम, समय और साधनों की न्यूनतम हानि हो और साथ ही साथ उत्पादकता भी बढ़े।

जब दिशा ज्ञात है तो वहाँ पहुँचने की होड़ भी मची है। व्यवसाय भी उसी दिशा में जाता है जहाँ वह औरों को अपना मूल्य दे पाता है, अपनी उपस्थिति जताने के लिये उसे भी प्रचार की आवश्यकता होती है। हम ब्लॉगरों पर भी तकनीक के ढेरों उपकार हैं, बिना तकनीक तो हम व्यक्त भी नहीं थे। तकनीक जितनी व्यवधान रहित होगी, अभिव्यक्ति की पहुँच भी उतनी ही विस्तृत होगी। ब्लॉग न केवल तकनीकी, वरन सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक संवादों में अपनी उपस्थिति बनाने लगा है। जो यात्रा एक प्रयोग के माध्यम से प्रारम्भ हुयी थी, उसे आज एक पूर्णकालिक माध्यम की पहचान मिल चुकी है।

यह आयोजन भले ही किसी के द्वारा अपनी बात कहने का व्यावसायिक प्रयास हो, पर एक संकेत स्पष्ट रूप से देता है कि ब्लॉगिंग को एक माध्यम के रूप में स्वीकार और उसका आधार निर्माण करने का समय आ गया है। जहाँ यह हम सबके लिये प्रसन्नता का विषय है कि हमें भी अभिव्यक्ति का श्रेय मिलना प्रारम्भ हो चुका है, साथ ही साथ यह हमारे ऊपर एक उत्तरदायित्व का बोध भी है जो हमें इस माध्यम की गुणवत्ता बढ़ाने की ओर प्रेरित करता है।

भविष्य का निश्चित स्वरूप क्या होगा, किसे पता? हमें तो राह का आनन्द ही भाता है, हमें बस चलना ही तो आता है।

5.6.13

वाकू डोकी

कुछ दिन पहले टोयोटा से दो अधिकारी मिलने आये थे, टोयोटा की एक फ़ैक्टरी बंगलोर के पास में ही है। आपसी हित के विषय पर बातचीत थी। जब विषय पर चर्चा समाप्त हो गयी और दोनों अधिकारी चले गये तो उनके विज़िटिंग कार्ड पर ध्यान गया। अंग्रेज़ी में लिखा था 'वाकू डोकी'। उत्सुकता तो उस समय जगी पर व्यस्तता के कारण उन शब्दों का अर्थ नहीं पता लग पाया। जब समय मिला तो गूगल किया, अर्थ था, रोमांच की संभावना में सिहरना और हृदय गति बढ़ जाना।

टोयोटा एक जापानी कम्पनी है और 'वाकू डोकी' एक जापानी शब्द। वाकू डोकी के माध्यम से टोयोटा का प्रयास यह प्रचारित करना है कि उनके उत्पादों में भी यही गुण उपस्थित है। अर्थ यह कि टोयाटो के उत्पादों को उपयोग करते समय आपको सिहरन होगी और हृदय की धड़कन अव्यवस्थित हो जायेगी। जापानी कारें बहुत अच्छी होती हैं और उन्होंने अमेरिका के बड़े कार निर्माताओं को विस्थापित कर, जापान का आर्थिक वर्चस्व सुनिश्चित किया है। यह भी एक सत्य है कि कार के दीवानों की दीवानगी अवर्णनीय होती है। संभव है कि अच्छी कारों और दीवानों का संगम वाकू डोकी का अनुभव कराता हो, पर यह अभी तक मुझे अनुभव नहीं हुआ, न मेरे पास जापानी कार है और न मैं कार का दीवाना हूँ।

तब इस शब्द को कैसे अनुभव किया जाये। कोई आसपास का अनुभव ढूँढा जाये। नये मोबाइल में, नई पुस्तक में, नये नगर में, हाँ एक उत्सुकता अवश्य रहती तो है पर वाकू डोकी जैसी नहीं। लक्ष्यों की पूर्ति में, किसी पुराने परिचित से मिलने में, नवोदित प्रेम में या विवाह की प्रतीक्षा में, हाँ वाकू डोकी सा कुछ कुछ तो रहता है, पर वह भी बहुत अधिक स्थायी नहीं रहता है। वाकू डोकी घटना होने के बाद उस परिमाण में नहीं रहता है जैसा घटना के पहले रहता है। अब जो अनुभव उत्पाद के पहले ही हो और उत्पाद के उपयोग के साथ धीरे धीरे ढल जाये, उस पर अपनी कम्पनी की मूल अवधारणा बनाना विक्रय विभाग का ध्येय तो हो सकता है पर वैसा ही वाकू डोकी सदा ही बना रहेगा, यह कहना बड़ा कठिन है।

वैसे देखा जाये तो कुछ खरीदने के पहले थोड़ा बहुत वाकू डोकी तो होता ही है। एक झोंका सा रहता है जो हमें कोई भी उत्पाद खरीदने के समय होता ही है। यदि मूल्य कम रहे तो कम होता है, यदि मूल्य अधिक रहा तो अधिक होता है। कार तो बहुत अधिक मूल्य की होती है अतः उसमें हुये वाकू डोकी की मात्रा और अन्तराल बहुत अधिक होता है।

किसी भी कम्पनी के विक्रय विभाग का यह लक्ष्य रहता है कि किस तरह से अपनी बिक्री बढ़ायी जाये। उसके लिये वह कुछ भी कर सकती है। मनोवैज्ञानिक प्रक्रिया का उपयोग किस तरह से प्रचार बनाने में किया जाता है, यह नित प्रचार देखने वालों को सहज ही समझ आ जाता है। प्रचार आदि पर काम करने वाली कम्पनियाँ इस तथ्य को विधिवत समझती हैं कि किस प्रकार मन के भावों को धीरे धीरे उभारते रहने से उस उत्पाद के प्रति वाकू डोकी के भाव निर्मित होते रहते हैं? यही कारण रहता है कि मनोवैज्ञानिक रूप से पहले से ही इतना ऊर्जामग्न होने के कारण, उस उत्पाद के प्रति वाकू डोकी के गहरे और गाढ़े भाव हमारे मन में जाग जाते हैं।

ऐसा नहीं है कि केवल आर्थिक लक्ष्यों की अनुप्राप्ति में हमें वाकू डोकी की अनुभूति होती है। जब भी कोई बड़ा स्वप्न और घटना साकार होने के निकट होती है, हमें वाकू डोकी के अनुभव होते हैं। कोई बड़ा परीक्षाफल निकलने वाला हो, किसी बड़े व्यक्ति से हाथ मिलाने का क्षण हो, कोई बड़ा पुरस्कार मिलने वाला हो, वाकू डोकी के लक्षण हमारे शरीर से टपकने लगते हैं। व्यक्तिगत ही नहीं, समाज और देशगत विषयों में भी यही भाव छिपे रहते हैं।

देखा जाये तो शरीर का क्या दोष? शरीर में त्वचा है तो कंप होगा ही, हृदय है तो धड़केगा ही। शारीरिक रूप से तो वाकू डोकी का मंच तैयार है। यह तो मन है जो इन दोनों को गति देने को तैयार बैठा रहता है। यदि तनिक और सूक्ष्मता से देखा जाये तो मनुष्य के जीवन में यही वाकू डोकी के लघु लक्ष्यों का एक पंथ निर्मित है, एक के आने की प्रतीक्षा में हम श्रमरत रहते हैं और एक के जाने के बाद दूसरे की प्रतीक्षा में लग जाते हैं। यदि वाकू डोकी के क्षण जीवन में न रहें तो जीवन कितना नीरस हो जाये।

जब हम छोटे होते हैं तो छोटी छोटी बातों में हमें वाकू डोकी हो जाता है, थोड़ा बड़ा होने में अनुप्राप्ति के लक्ष्य और बड़े होते जाते हैं। धीरे धीरे श्रम और समय की मात्रा बढ़ती जाती है। जब हमें लगने लगता है कि अगले लक्ष्य के लिये हम अधिक श्रम नहीं कर सकते तो उसे मन से त्याग कर वर्तमान में स्थिर होने लगते हैं, पर औरों को देखकर वाकू डोकी की आस बनी रहती है। जो परमहंस होते हैं, उन्हें इन सांसारिक लक्ष्यों से कोई सारोकार नहीं रहता है, वे शान्त सागर से हो जाते हैं, हलचल भले ही किनारों पर बनी रहे, मन स्थिर हो जाता है, हर प्रकार के वाकू डोकी से।

अहा, अब याद आ रहा है कि कहीं इस तरह से मिलते जुलते भाव पढ़े हैं। साहित्य में कहीं निकटतम पहुँचने का बोध होता है, तो वह इस भजन का एक भाग है जिसमें कहते हैं, रोमांच कंपाश्रु तरंग भाजो, वन्दे गुरो श्री चरणारविन्दमं। रोमांच, कंप और तरंग जैसे शब्द एक साथ पहली बार आते हुये दिखते हैं, इस भजन में। देखा जाये तो भक्तिमार्ग में भी वाकू डोकी की खोज होती है, लोग कहते हैं कि शाश्वत वाकू डोकी की। भक्ति, साधना आदि के भावमयी प्रवाह में वाकू डोकी की मात्रा सांसारिक पक्षों की तुलना में कहीं अधिक होती है। कहते हैं कि सांसारिक वाकू डोकी कृत्रिम और संक्षिप्त है जबकि भक्तिजनित वाकू डोकी स्वस्फूर्त व सतत है।

आपको किससे सर्वाधिक वाकू डोकी होता है, टोयोटा ने कहा है कि उनकी कारों को ख़रीदने से यह भाव सहज आता है। देखते हैं, कब तक आयेगी वह कार और कब होगा वाकू डोकी। कोई और कम्पनी है, कहीं की भी हो, थोड़ी देर के लिये वाकू डोकी दे जाये। कुछ कुछ उस गीत की तरह, पल भर के लिये कोई हमें प्यार कर ले, झूठा ही सही।

1.6.13

विश्व जियेगा

विश्व जियेगा और गर्भरण जीते बिटिया,
प्रथम युद्ध यह और जीतना होगा उसको,
संततियों का मोह, नहीं यदि गर्भधारिणी,
सह ले सृष्टि बिछोह, कौन ढूढ़ेगा किसको,

विश्व जियेगा और पढ़ेगी अपनी बिटिया,
आधा तम भर, आधा ठहरा, कौन बढ़ा है,
फिर भी शिक्षा रहती बाधित, सीमित, सिमटी,
बर्बरता की पुनर्कल्पना, जग सिकुड़ा है।

विश्व जियेगा और सुरक्षित होगी बिटिया,
आधा तज कर, बोलो अब तक कौन जिया है,
मुखर नहीं यदि हो पाता है फिर भी आग्रह,
विध्वंसों से पूर्व सृष्टि ने मौन पिया है। 

विश्व जियेगा, परिवारों को साधे बिटिया,
अस्त व्यस्त जग का हो पालन, तन्त्र वही है,
प्रेम तन्तु में गुँथे रहेंगे घर में जन जन,
विस्तृत हृद, धारण करती सब, मन्त्र मही है,

विश्व जियेगा, अधिकारों से प्लावित बिटिया,
घर, बाहर उसके हों निर्णय, नेह भरे जो,
लड़ लड़कर हम व्यर्थ कर चुके अपनी ऊर्जा,
जुड़ने का भी एक सुअवसर इस जग को हो,

विश्व जियेगा, करे साम्य स्थापित बिटिया,
समय संधि का, नहीं छिटक कर हट जाने का,
गर्व हमारा, शक्ति हमारी, क्यों खण्डित हो,
समय अभी है, बस मिल जुल कर, डट जाने का,

विश्व जियेगा और जियेगी सबकी आशा,
तत्व प्रकृति दो, संचालित हो, स्थिर, गतिमय,
यह विशिष्टता, द्वन्द्व हमारा, न हो घर्षण,
एक पुष्प, एक वात प्रवाहित, जगत सुरभिमय।

29.5.13

मानसिक विलास

एक मित्र महोदय से कहा कि इस नगर में कोई ऐसा स्थान बतायें जहाँ चार पाँच घंटे शान्तिपूर्वक मिल सकें, पूर्ण निश्चिन्तता में। मित्र महोदय संशय से देखने लगते हैं, आँखों में एक विनोदपूर्ण मुस्कान छा जाती है उनके। इस नगर में एकान्त की खोज के अर्थ बहुत अच्छे नहीं माने जाते हैं, कई युगल बाग़ों, बगीचों, मॉलों और त्यक्त राहों में एकान्त की खोज करने में प्रयत्नशील दिख जाते हैं। भविष्य के रोमांचित और प्रेमपूर्ण स्वप्नों का सृजन भीड़भाड़ वाले स्थानों पर हो भी नहीं सकता है, उसके लिये एक दूसरे पर एकांगी ध्यान देना होता है, हावों भावों को पढ़ना पड़ता है, कुछ न कुछ बनाते हुये बताना पड़ता है।

उनका अर्थ समझ कर कुछ बता पाता, उसके पहले उन्होंने मेरे बारे में पूरी फ़िल्म तैयार कर डाली। जैसा हमारी फ़िल्मों में होता है कि सोच कर कुछ और जाओ, निकलता कुछ और है, वही उनके साथ भी हुआ। हमने कहा कि यह समय लिखने के लिये चाहिये, एक सप्ताह में चार पाँच घंटे ऐसे मिल जायें तो न केवल साहित्यिक प्रतिबद्धताएँ पूरी होती रहेंगी वरन भविष्य के मार्ग भी दिखने लगेंगे। एकान्त में चिन्तनशीलता गहरे निष्कर्ष लेकर आती है, विषय स्पष्ट हो जाते हैं। व्यवधान से न केवल समय का आभाव हो जाता है वरन लेखन का तारतम्य भी टूट जाता है।

अब मित्र महोदय के मुख पर चिन्ता की रेखायें थीं, उन्हें लगा कि क्या घर में लेखन को लेकर कोई विरोध है, लेखन में वांछित सहयोग मिल पा रहा है या नहीं? बताया कि लिखने से श्रीमतीजी कभी नहीं रोकती हैं, न कभी कोई कटाक्ष भी करती हैं, प्रार्थना करने से चाय आदि बना कर मेज़ पर ही दे जाती हैं। बच्चे भी लेखन निमग्न पिता को छोटी छोटी बात के लिये नहीं टोकते हैं, समस्या गम्भीर होने तक की प्रतीक्षा कर लेते हैं। पड़ोसी भी अच्छे हैं, कभी ऊँचे स्वर में संगीत आदि नहीं बजाते हैं। हाँ, घर से थोड़ी दूर पर एक व्यस्त नगरमार्ग अवश्य है, जिसमें वाहनों के चलने की ध्वनियाँ घर में घुस आती हैं, पर वे ध्वनियाँ भी पंखे आदि उपकरणों के पार्श्व में छिप जाती हैं।

तब क्या समस्या है श्रीमानजी, आप तो बड़े सौभाग्यशाली हैं। इतिहास साक्षी है कि लेखकों ने सारे विरोधों के होते हुये भी इतना उत्कृष्ट लेखन किया है, पारिवारिक और सामाजिक अपेक्षाएँ को निभाते हुये भी रत्न प्रस्तुत किये हैं। क्या कारण है कि आप लेखन को लेकर इतने सुविधाभोगी हुये जा रहे हैं? कल कहेंगे कि एकान्त भी आपकी लेखकीय क्षमता नहीं उभार पा रहा है, आपको पहाड़ चाहिये, नदी चाहिये, सागर चाहिये। बंगलोर में झील और बाग़ तो मिल जायेंगे, पहाड़, नदी, सागर आदि कहाँ से लायेंगे? लेखकीय एकान्त में कल्पनालोक की बातें तो बतिया लेंगे, पर जीवन के सच अपना आधार खोने लगेंगे वहाँ। व्यस्त समाज में रह कर स्वस्थ लेखन कीजिये। क्या साहित्यिक रोगी की तरह एकान्त में स्वास्थ्य लाभ करने जाना चाहते हैं?

कितने निर्मल भावों से एकान्त की अभिलाषा जतलाई थी, अपने लेखकीय उद्यम के लिये, पर न जाने हमारे ऊपर कितनी विकृतियों का दोषारोपण कर दिया गया। कहीं कोई ऐसी अनूठी बात तो हमने की नहीं, सारे गम्भीर लेखक विषय पर स्वयं को केन्द्रित करने में एकान्त का सहारा लेते हैं, प्रकृति के विस्तारित सौन्दर्य का सहारा लेते हैं। एक बड़े लेखक के बारे में कहीं पढ़ रहा था कि उनके सुबह के तीन चार घंटे विशुद्ध चिन्तन और लेखन में बीतते हैं, मन का ध्यान और घनीभूत हो, इसलिये वे तीरंदाज़ी का भी अभ्यास करते हैं। हमने भी अपने खेल सचिव को तीरंदाज़ी की किट लेने के लिये कहा है, आशा है उससे लेखकीय उद्यम तनिक और गुणवत्ता भरा हो जायेगा।

उत्तम विचार बड़ा मानमनौव्वल करवाते हैं, उन्हें एकांगी ध्यान देकर मनाना पड़ता है, भीड़ भाड़ देखकर तो वे आते ही नहीं हैं। उन्हें अवतरित होने के लिये उपयुक्त वातावरण चाहिये। यद्यपि स्रोत ज्ञात नहीं होता है विचारों का, पर यह अनुभव अवश्य है कि जब मन की स्थिति अच्छी होती है तो भावों को शब्द मिलने लगते हैं। प्राचीन काल में ऋषि मुनि भी प्रणायाम और ध्यान से सशक्त हुये मन में विचारों को आमन्त्रित करते थे और सूक्तों की रचना करते थे। उनके विचारों की उत्कृष्टता भले ही न हमें लब्ध हो पर एकान्त में बैठ कर विचारों के आवागमन को समझने का प्रयास तो कर ही सकते हैं।

सूत्रबीज कई स्थान से प्राप्त हो जाते हैं, सर्वाधिक उपयुक्त स्थान चर्चायें हैं, सुधीजनों के संग। बात कोई स्वरूप लिये प्रारम्भ नहीं होती है, किसी छोटी से बात से गहरे विचारों में उतर जाती है। उनमें से कुछ बीज सूत्र बन चिन्तन में बस जाते हैं और एकान्त पा धीरे से निकलते हैं, विस्तारित होते हैं, कई शाखायें, कई संबंध, कई निष्कर्ष और कई उद्घाटन, न जाने किन किन रूपों में वे सूत्रबीज बिखर जाते हैं। सूत्रबीज फिर भी नष्ट नहीं होते हैं, भविष्य के लिये सुरक्षित हो जाते हैं, आगामी सूत्रबीजों के साथ इन्द्रधनुष सा फैल जाते हैं, विचारों के विस्तृत वितानों में।

सूत्रबीज अनुभव से मिलते हैं, बच्चों के निर्मल व्यवहार से मिलते हैं, प्रकृति के विस्तार से मिलते हैं, और भी न जाने कितने स्रोत हैं उनके। उस समय हम बस ग्रहण करते हैं, कुछ भी अभिव्यक्त नहीं कर पाते हैं। उन सबको समाहित करने और संश्लेषित कर व्यक्त करने के लिये एकान्त चाहिये। विचारों को मथना पड़ता है, संभावनायें पाने तक थकना पड़ता है।

थोड़ी और बात करने पर मित्र महोदय ने बताया कि उनका पर्याप्त लेखन एक होटल की खुली छत पर हुआ है। सायं समय मिलने पर वहाँ चले जाते थे, अधिक लोग वहाँ नहीं आते थे, आसपास गमले में लगे पेड़ पौधे, शीतल मंद पवन, वाहनों का स्वर ६ तल नीचे छूटता हुआ और ऊपर खुला विस्तृत आकाश। एक पूरा वातावरण मिलता था वहाँ, एकान्त और प्रवाह प्रधान। एक चाय, वेटर भी आपको समय और स्वतन्त्रता देते हुये, तब दो घंटे के बाद सृजित साहित्य के सहस्र शब्द। मुझे कल्पना भर कर लेने से ही एक प्रतियोगितात्मक ईर्ष्या हो आयी, काश मुझे भी कोई ऐसा स्थान मिल गया होता। एक दो बार कॉफ़ी डे में ध्यानस्थ होने का निष्फल प्रयास कर चुका हूँ, युगलों की व्यस्तताओं और व्यग्रताओं ने हर बार ध्यान भंग कर दिया।

आप अपने मानसिक विलास के लिये कौन सा स्थान ढूंढ़ते हैं, अपने घर में क्या उतना फैल कर लेखन कर पाते हैं? यदि हाँ, तो ज्ञान की कुछ फुहारें हम पर भी बरसा दीजिये।

25.5.13

अच्छा लगता है, जब बच्चे सिखाते हैं

बच्चे, पता ही नहीं चलता है, कब बड़े हो जाते हैं? कल तक लगता था कि इन्हें अभी कितना कुछ सीखना है, साथ ही साथ हम यही सोच कर दुबले हुये जा रहे थे कि कैसे ये इतना ज्ञान समझ पायेंगे? अभी तक उनकी गतिविधियों को उत्सुकता में डूबा हुआ स्वस्थ मनोरंजन समझते रहे, सोचते रहे कि गंभीरता आने में समय लगेगा।

बच्चों की शिक्षा में हम सहयोगी होते हैं, बहुधा प्रश्न हमसे ही पूछे जाते हैं। उत्सुकता एक वाहक रहती है, हम सहायक बने रहते हैं उसे जीवन्त रखने में। जैसा हमने चीज़ों को समझा, वैसा हम समझाते भी जाते हैं। बस यही लगता है कि बच्चे आगे आगे बढ़ रहे हैं और हम उनकी सहायता कर रहे हैं।

यहाँ तक तो सब सहमत होंगे, सब यही करते भी होंगे। जो सीखा है, उसे अपने बच्चों को सिखा जाना, सबके लिये आवश्यक भी है और आनन्दमयी भी। यहाँ तक तो ठीक भी है, पर यदि आपको लगता है कि आप उनकी उत्सुकता के घेरे में नहीं हैं, तो पुनर्विचार कर लीजिये। यदि आपको लगता उनकी उत्सुकता आपको नहीं भेदती है तो आप पुनर्चिन्तन कर लीजिये।

प्रश्न करना तो ठीक है, पर आपके बच्चे आपके व्यवहार पर सार्थक टिप्पणी करने लगें तो समझ लीजिये कि घर का वातावरण अपने संक्रमण काल में पहुँच गया है। टिप्पणी का अधिकार बड़ों को ही रहता है, अनुभव से भी और आयु से भी। श्रीमतीजी की टिप्पणियों में एक व्यंग रहता है और एक आग्रह भी। बच्चों की टिप्पणी यदि आपको प्राप्त होने लगे तो समझ लीजिये कि वे समझदार भी हो गये और आप पर अधिकार भी समझने लगे। उनकी टिप्पणी में क्या रहता है, उदाहरण आप स्वयं देख लीजिये।

बिटिया कहती हैं कि आप पृथु भैया को को ठीक से डाँटते नहीं हैं। जब समझाना होता है, तब कुछ नहीं बोलते हो। जब डाँटना होता है, तब समझाने लगते हो। जब ढंग से डाँटना होता है, तब हल्के से डाँटते हो और जब पिटाई करनी होती है तो डाँटते हो। ऐसे करते रहेंगे तो वह और बिगड़ जायेगा। हे भगवान, दस साल की बिटिया और दादी अम्मा सा अवलोकन। क्या करें, कुछ नहीं बोल पाये, सोचने लगे कि सच ही तो बोल रही है बिटिया। अब उसे कैसे बतायें कि हम ऐसा क्यों करते हैं? अभी तो प्रश्न पर ही अचम्भित हैं, थोड़ी और बड़ी होगी तो समझाया जायेगा, विस्तार से। उसके अवलोकन और सलाह को सर हिला कर स्वीकार कर लेते हैं।

पृथु कहते हैं कि आप इतना लिखते क्यों हो, इतना समय ब्लॉगिंग में क्यों देते हो? आपको लगता नहीं कि आप समय व्यर्थ कर रहे हो, इससे आपको क्या मिलता है? थोड़ा और खेला कीजिये, नहीं तो बैठे बैठे मोटे हो जायेंगे। चेहरे पर मुस्कान भी आती है और मन में अभिमान भी। मुस्कान इसलिये कि इतना सपाट प्रश्न तो मैं स्वयं से भी कभी नहीं पूछ पाया और अभिमान इसलिये कि अधिकारपूर्ण अभिव्यक्ति का लक्ष्य आपका स्वास्थ्य ही है और वह आपका पुत्र बोल रहा है।

ऐसा कदापि नहीं है कि यह एक अवलोकन मात्र है। यदि उन्हे मेरी ब्लॉगिंग के ऊपर दस मिनट बोलने को कहा जाये तो वह उतने समय में सारे भेद खोल देंगे। पोस्ट छपने के एक दिन पहले तक यदि पोस्ट नहीं लिख पाया हूँ तो वह उन्हें पता चल जाता है। यदि अधिक व्यग्रता और व्यस्तता दिखती है तो कोई पुरानी कविता पोस्ट कर देने की सलाह भी दे देते हैं, पृथुजी। लगता है कि कहीं भविष्य में मेरे लेखन की विवेचना और समीक्षा न करने लगें श्रीमानजी।

आजकल हम पर ध्यान थोड़ा कम है, माताजी और पिताजी घर आये हैं, दोनों की उत्सुकता के घेरे में इस समय दादा दादी हैं। न केवल उनसे उनके बारे में जाना जा रहा है, वरन हमारे बचपन के भी कच्चे चिट्ठे उगलवाये जा रहे हैं। कौन अधिक खेलता था, कौन अधिक पढ़ता था, कौन किससे लड़ता था, आदि आदि। मुझे ज्ञात है कि इन दो पीढ़ियों का बतियाना किसी दिन मुझे भारी पड़ने वाला है। माताजी और पिताजी भले ही बचपन में मुझे डाँटने आदि से बचते रहे, पर मेरे व्यवहार रहस्य बच्चों को बता कर कुछ न कुछ भविष्य के लिये अवश्य ही छोड़े जा रहे हैं।

कई बच्चे अपने माता पिता को अपना आदर्श मानते हैं, उनकी तरह बनना चाहते हैं। पर जब उनके अन्दर यह भाव आ जाये कि उन्हे थोड़ा और सुधारा जा सकता है, थोड़ा और सिखाया जा सकता है तो वे अपने आदर्शों को परिवर्धित करने की स्थिति में पहुँच गये हैं। उनके अन्दर वह क्षमता व बोध आ गया है जो वातावरण को अपने अनुसार ढालने में सक्षम है। समय आ गया है कि उन्होंने अपनी राहों की प्रारम्भिक रूपरेखा रचने का कार्य भलीभाँति समझ लिया है।

पता नहीं कि हम कितना और सुधरेंगे या सँवरेंगे, पर जब बच्चे सिखाते हैं तब बहुत अच्छा लगता है।

22.5.13

स्वयं से भागते, हम लोग

कभी सोचा है कि व्यक्ति को सबसे अधिक भड़भड़ाहट कब होती है, सर्वाधिक मन कब ऊबता है, कौन सा समय वह शीघ्रातिशीघ्र बिता देना चाहता है? उत्तर अधिक कठिन नहीं होगा, यदि जीवन के भारी कष्टों को सूची से हटा दिया जाये तो सबसे अधिक कष्ट में व्यक्ति तब होता है जब वह एकान्त में होता है, शारीरिक रूप से, मानसिक रूप से।

कभी सोचा है कि व्यक्ति स्वयं से इतना क्यों भागता है? एकान्त काटने को दौड़ता है। कुछ तो कारण होगा कि हम स्वयं को ही नहीं झेल पाते हैं।

कहीं पढ़ भी रहा था कि जेल में यदि किसी व्यक्ति को कठिनतम दण्ड दिया जाता है तो उसे एकान्त में रख देते हैं, तनहाई कही जाती है वह। वह एकान्त ऐसा होता है जहाँ बन्दी का मानसिक संतुलन तक बिगड़ जाता है। क्या एकान्त में रहना हमारी प्रकृति के विरुद्ध है? व्यक्ति को स्वयं से भय क्यों?

ये सारे प्रश्न ऐसे हैं जो उठते तो हर एक के मन में हैं, पर उनका उत्तर पाना उतना ही कष्टकर होता है जितना एकान्त में समय बिताना। कोई इसे मन का खेल मानता है, कोई सामाजिकता को दोष देता है, कोई इस पर कुछ कहना ही नहीं चाहता है। एकान्त सदा ही दोषपूर्ण माना जाता है, जो लोग किसी और से घुलते मिलते नहीं, उन्हें संशय और विस्मय की दृष्टि से देखा जाता है, विचित्र प्राणी की तरह।

माना कि एकान्त भयावह है, माना कि एकान्त असामाजिक है, पर अपने से पूर्णतया विमुख हो जाता कहाँ से आ गया हमारे अन्दर? अपने से भागने का गुण कहाँ से आ गया हमारे अन्दर? आश्रयों के हटते ही भरभरा कर ढहने लगता है हमारा जीवन। माना कि सहजीवन ही हमारी राह है, पर स्वयं को समझने और समझाने से क्यों विमुख हो जाते हैं हम? एकान्त को भयानक मानने वाली यह मानसिकता इतने गहरे धँसी है हम सबके अन्दर कि हम स्वयं से ही भागने लगे हैं।

यही प्रश्न संस्कृतियों के बीच की दीवार भी है, यही प्रश्न संस्कृतियों के बीच की सुलझन का प्रारम्भ भी है। पूर्व की संस्कृति में यह प्रश्न सदा से ही पूछा जाता रहा है, पश्चिम में यह प्रश्न सदा ही प्यासा रहा है। हमारा जीवनक्रम स्वयं को समझने से प्रारम्भ होता है और सहजीवन तक जाता है, पाश्चात्य सहजीवन को प्रमुखता से रख इस प्रश्न पर ठंडी राख उड़ेल देता है। जीवन दोनों संस्कृतियों में पल रहे हैं, एक पद्धति में अन्त तक स्पष्ट दिशा दिखती है, दूसरी पद्धति पगडंडियों के समाप्त होते ही भ्रमित हो जाती है। मैं जितना एकान्त में डूबता हूँ, उतना ही प्राच्य हो जाता हूँ, जितना सबके संग जीने लगता हूँ उतना ही पाश्चात्य का रंग धारण कर लेता हूँ। मैं बहुधा मुहाने पर खड़ा रहता हूँ, इस प्रश्न के कुछ इस पार, इस प्रश्न से कुछ उस पार।

स्वयं को जानना है तो स्वयं से जूझना भी पड़ेगा। कोई इसे भले ही अध्यात्म मान कर बुढ़ापे के लिये छोड़ दे, पर यह प्रश्न मुँह बाये एक न एक दिन खड़ा अवश्य हो जायेगा। कह देने भर से कि इन सबके बिना भी काम चल जायेगा, ये प्रश्न टलने वाले नहीं, उत्तर तो पाना ही पड़ेगा।

एक दूसरे को देखकर तो सब ही जीवन पार कर लेते हैं, पर क्या दूसरे का जीवन ही हमारा भी मानक हो जाये? क्या वे पद्धतियाँ जो किसी एक के लिये सुन्दर ढंग से चलती हैं, क्या दूसरे के ऊपर भी उतना ही प्रभावी हो सकती हैं? ऐसा नहीं है कि सारे लोग भेड़चाल में ही चलते हैं, कुछ अपनी राह स्थापित करते हैं, अपने मानक स्वयं स्थापित करते हैं। भौतिक सफलतायें अपना स्थान बनाती हैं, विकास होता रहता है, पर स्वयं को समझने का प्रश्न कार्य और उद्देश्यों की भीड़ में खोया ही सा रहता है।

अपने हृदय पर हाथ रखिये और पूछिये कि स्वयं से पहली बार वार्तालाप कब किया था, तब पता चलेगा कि तीन या चार दशक तो इस प्रश्न को पहली बार आने में ही निकल जाते हैं। जब तक प्रश्नोत्तरी तनिक रोचक होती है, आधा जीवन बीता हुआ सा लगता है। लगता है कि हम सदा ही स्वयं से भागते रहे, स्वयं का सामना करने से कतराते रहे।

एक परम स्नेही मित्र ने दर्शननिमग्न वार्तालाप के बीच एक दिन बड़े ही दुर्लभ वाक्य कहे, उनका कहना था कि जीवन में यदि किसी एक चीज को जानना आवश्यक है, तो वह स्वयं को। स्वयं को जानने के लिये मन को जानना आवश्यक है, आत्म मन से ही व्यक्त होता है।

बात सच भी है, हम सुख को ढूढ़ते रहते हैं। कहते हैं जो मन के अनुकूल है, वही सुख है। यदि हम मन को नहीं समझ पाये तब सुख को क्या समझ पायेंगे? बिना मन को जाने सुख की परिभाषायें बनाते रहते हैं, उस पर प्रयोग करते रहते हैं। मन को नयापन चाहिये तो उसे नयापन ला लाकर देते रहते हैं, पर बात तो मन के माध्यम से स्वयं को समझने की थी।

जो भी कारण हो, जो भी निदान हो, हम स्वयं से भागे लोग हैं, सदा ही बाहर अपना ठिकाना ढूढ़ते रहते हैं, व्यग्र हो। स्वयं में स्थिर होना सीख लें, तो जहाँ ठहर जायें, गाँव वहीं बन जाये हमारा, जहाँ रम जायें, वहीं राम हो जायें। यदि कहीं टिकना सीखना हो मुझे, तो स्वयं में ही, वर्तमान में ही, तात्कालिक परिवेश में ही।

18.5.13

नदी का सागर से मिलन

पहली बार देख रहा था, एक नदी का सागर से मिलना। स्थान कारवार, नदी काली और अरब सागर। दोपहर के समय ऊपर से पड़ने वाली सूरज की किरणें पसरी नीली परत पर चाँदी की रेखा सी झिलमिला रही थीं। पीछे जंगल, बगल में रेत, हवा में एक मध्यम ठंडक और सामने दिख रहा था नदी और सागर का मिलन। मैं लगभग वहीं खड़ा था जहाँ से कभी कविवर रवीन्द्रनाथ टैगोर ने खड़े होकर सागर और नदी का मिलन देखा था। अन्तर बस इतना था कि उन्होंने काली नदी में प्रवाह के साथ कई किलोमीटर यात्रा करने के पश्चात यह दृश्य देखा था, जबकि मुझे यह दृश्य सहसा ही देखने को मिल रहा था।

काली नदी अपने उद्गम से बस १८४ किमी बाद ही समुद्र में मिल जाती है, यह संभवतः एक ही ऐसी नदी होगी जो पूरी की पूरी एक ही जिले, उत्तर कन्नड में बहती है। पश्चिमी घाट से सागर की इतनी कम दूरी ने न जाने कितने सुन्दर और ऊँचे प्रपातों को जन्म दिया है, छोटी छोटी नदियों के जाल से बुना हुआ कोकण क्षेत्र अपने आप में एक अनूठा दृश्य रचता है, पहाड़, जंगल, प्रपात, नदियाँ, सागर, सब एक दूसरे पर अधारित और आरोपित। लगभग चार लाख लोगों की जीवन रेखा यह नदी, सागर तक आते आते निश्चिन्त हो जाती है, अपना संक्षिप्त पर सम्पूर्ण कर्म करने के पश्चात।

आज खड़ा मैं उसी नदी का अन्तिम बिन्दु निहार रहा था। देख रहा था कि कहीं कोई भौतिक रेखा है जिसके एक ओर को समुद्र कहा जा सके और दूसरी ओर को नदी। सहसा एक सहयात्री ने इंगित किया, थोड़ी दूरी पर स्पष्ट दिख रहा था, सागर का स्तर नीचे था, उस समय भाटा था। नदी का पानी उस स्थान पर सहसा गिरता हुआ सा दिख रहा था, बहुत सुन्दर दृश्य था। नदी की दिशा में देखा, छोटी छोटी लहरें भागी चली आ रही हैं, अपने सागर से मिलने, अपना जलचक्र पूरा करने।

रात के समय चाँद पृथ्वी के निकट होता है। अब अपना आकर्षण किस तरह व्यक्त करे? पृथ्वी को अपनी ओर खींचना चाहता है, पृथ्वी ठहरी भारी, न वह हिलती है और न ही हिलते हैं उसके पहाड़। ले दे कर एक ही तरल व्यक्तित्व है सागर का, जिस पर चाँद का जोर चल पाता है, उसे ही अपनी ओर खींच लेता है चाँद, उस स्थिति को ज्वार कहते हैं। तब सागर का जल स्तर नदी से ऊपर हो जाता है। नदी ठहर सी जाती है, उसे कुछ सूझता नहीं है, उसे दिशाभ्रम हो जाता है कि जाना किधर है। आगे बढ़ते बढ़ते सहसा उसकी गति स्थिर हो जाती है, वह वापस लौटने लगती है। और जब दोपहर में चाँद पृश्वी से दूर हो जाता है, सागर पुनः नीचे चला जाता है, नदी के स्तर से कहीं नीचे, तब नदी का जल सरपट दौड़ लगाता है।

जल का यह आड़ोलन, कभी सागर से नदी की ओर तो कभी नदी से सागर की ओर, उस सीमा को कभी एक स्थान पर स्थिर ही नहीं देता, जिसे हम नदी और सागर का मिलना कहते हैं। कैसे ढूढ़ पायेंगे आप कोई एक बिन्दु, कैसे निर्धारित कर पायेगें उन दो व्यक्तित्वों की सीमायें, जिन्हें चाँद एक दूसरे में डोलने को विवश कर देता हो। चाँद मन की गति का प्रतीक माना जाता है, सागर खारा है, नदी मीठी है, यह मिलन संबंधों को इंगित करता है। यह आड़ोलन उन अठखेलियों को भी समझने में सहायक है जो संबंधों के बीच आती जाती रहती हैं। सागर स्थिर है, नदी गतिशील है, पर वे चाहकर भी अपनी प्रकृति बचाकर नहीं रख पाते। रात को चाँद निकलता है और सागर गतिशील हो जाता है अपनी सीमायें तोड़ने लगता है, नदी सहम सी जाती है, ठिठक जाती है। सागर का खारापन मीलों अन्दर चला जाता है, लगता है कि कहीं सागर स्रोत को भी न खारा कर बैठे। एक स्थान पर, जहाँ सागर की उग्रता और नदी का प्रवाह समान हो जाता है, खारापन वहीं रुक जाता है, वहीं साम्य आ जाता है।

दिन धीरे धीरे बढ़ता है, नदी उसी साम्य को खींचते खींचते वापस सागर तट तक ले आती है और साथ ही ले आती है वह खारापन जिसे रात में सागर उसे सौंप गया था। साथ में सौंप जाती है जल के उस भाव को जो रात भर ठहरा रहा, सहमा सा। यह क्रम चलता रहता है, हर दिन, हर रात। नदी सागर हो जाती है और पुनः नदी के अतिक्रमण में लग जाती है। सागर को वर्ष भर लगता है, वाष्पित होकर बरसने में, पहाड़ों के बीच अपना स्थान ढूढ़ने में, छोटी धार से हो नदी बनने में और पुनः सागर में मिल जाने में।

नदी और सागर के रूप में प्रकृति की ये अठखेलियाँ हमें भले ही खेल सी लगती हों पर इनमें ही प्रकृति का मन्तव्य छिपा हुआ है। सागर और नदी को लगता है कि हम दोनों का संबंध नियत है, एक को जाकर दूसरे में मिल जाना है। उन्हें लगता है कि वे दो अकेले हैं जगत में। उन्हें लगता है कि उनके बीच एक साम्य है, संतुलन है, जो स्थिर है एक स्थान पर। उन्हें लगता है कि सागर और नदी का जो संबंध होना चाहिये, उसमें किसी और को क्या आपत्ति हो सकती है। नदी और सागर पर यह भूल जाते हैं कि प्रकृति कहाँ स्थितियों को स्थिर रहने देती हैं, उसने दोनों का जीवन उथल पुथलमय बनाये रखने के लिये चाँद बनाया, हर दिन उसके कारण ही ऐसा लगता है कि नदी और सागर एक दूसरे की सीमाओं का अतिक्रमण कर रहे हैं। यही नहीं, प्रकृति ने सूरज भी बनाया, केवल इसलिये कि सागर अपने मद में, खारेपन में मत्त न बना रहे, वाष्पित होकर बरसे, नदी बने।

प्रकृति के सिखाने के ढंग बड़े सरल हैं, समझना हम लोगों को ही है कि हम कितना समझ पाते हैं। प्रकृति हमें स्थिर न रहने देगी, कितना भी चाह लें हम, चाँद से संचालित मन कोई न कोई उथल पुथल मचाता ही रहेगा। यह भी सच है कि प्रकृति हमें अपनी सीमायें अतिक्रमण भी न करने देगी, कितने भी भाग्यशाली या शक्तिशाली अनुभव करें हम। आदेश कहने वाला कभी आदेश सहने की स्थिति में भी आयेगा, प्रकृति के पास पाँसा पलटने के सारे गुर हैं। सागर से धरती का मिलन होता है तो रेत के किनारे निर्मित हो जाते हैं, सारे पाथर चकनाचूर हो जाते हैं। सागर का अपनी सहधर्मी नदी से मिलन होता है तो सीमाओं का खेल चलता रहता है। सागर का आकाश से मिलन होता है तो अनन्त निर्मित हो जाता है।

प्रकृति को किसी भौतिक नियम से संचालित मानने वाले प्रकृति की विशालता को न समझ पाते हैं और न ही उसे स्वीकार कर पाते हैं। प्रकृति में सौन्दर्य है, गति है, अनुशासन है और क्रोध भी। हम तो हर रूप में जाकर हर बार खो जाते हैं। देखते देखते सागर और धरती का मिलन सागर की ओर आगे बढ़ जाता है। दोनों अपनी अठखेलियों में मगन हैं, प्रकृति भी दूर खड़ी मुस्करा रही है। हम सब यह देख कभी विस्मित होते हैं, कभी प्रसन्नचित्त। बस नदी की तरह प्रकृति में झूम जाने का मन करता है, आनन्दमय प्रकृति में।

15.5.13

दुआ सबकी मिल गयी, अच्छा हुआ

एक माह पहले जन्मदिन पर ढेरों बधाइयाँ आयी थीं, मन सुख से प्लावित हो गया था। आँखें बन्द की तो बस यही शब्द बह चले। यद्यपि फेसबुक पर इसे डाल चुका था, पर बिना ब्लॉग में स्थान पाये, बिना सुधीजनों का स्नेह पाये, रचना अपनी पूर्णता नहीं पा पाती है।

दुआ सबकी मिल गयी, अच्छा हुआ,
चिहुँकता हर बार मन, बच्चा हुआ,
कुछ सफेदी उम्र तो ले आयी है,
हाल फिर भी जो हुआ, सच्चा हुआ।

दिन वही है, बस बरसता प्यार है,
इन्द्रधनुषी सा लगे संसार है,
मूक बहता, छद्म, दुविधा से परे,
उमड़ता है, नेह का व्यापार है।

लाज आती, कोई आँखों पर धरे,
शब्द मधुरिम कर्णछिद्रों में ढरे,
कुटिल मन की गाँठ, दुखती क्षुद्रता, 
कोई तत्पर, विहँस बाँहों में भरे। 

नित्य निद्रा में अकेला, किन्तु अब,
स्वप्न में भी संग चले आयेंगे सब,
आज होगा एक जलसा देखना,
छन्द छलकें, हृदय मिल जायेंगे जब।

मैॆ रखूँगा साथ, इस विश्वास को,
प्रेमपोषित इस अनूठी प्यास को,
कल सबेरा पूर्णतः उन्नत खिले,
साध लूँगा प्रकृति की हर साँस को।

11.5.13

ब्लॉग व्यवस्था, तृप्त अवस्था

गूगल रीडर में बढ़ते बढ़ते ब्लॉगों की संख्या ६५० के पार पहुँच गयी। तकनीक और न्यूनतम जीवन शैली विषयक लगभग ५० ब्लॉग निकाल दें, तब भी हिन्दी से जुड़े लगभग ६०० ब्लॉगों की बड़ी सूची का होना यदि कुछ इंगित करता है, तो वह अन्तर जिसे हर दिन पूरा करने के लिये कुछ न कुछ नया पढ़ते रहना आवश्यक हो जाता है। पढ़ने वाले ब्लॉगों की संख्या चाह कर भी कम नहीं कर पा रहा हूँ, यह भी इंगित करता है कि अच्छे बुरे ब्लॉगों में अन्तर की समझ भी विकसित होना शेष है, मेरे साहित्यिक पथ में। पिछले ४ वर्षों में जो भी रोचक लगता गया, सूची में स्थान पाता गया। कई और श्रेष्ठ ब्लॉगों को सूची में होना था, पर दुर्भाग्य ही कहा जायेगा मेरा कि उनसे परिचय न हो सका अब तक। संचित और अपेक्षित के बीच का अन्तर इस क्रम में तीसरा है, जो इतने ब्लॉग होने के बाद भी सूची को अपूर्ण ही रखे हुये है।

कई नवागंतुक बहुत अच्छा लिखते हैं। कई उदाहरण देखे हैं जिसमें प्रारम्भिक किरणों की झिलमिलाहट एक आशा के सूर्य का आभास देती है। उनको पढ़ना इसलिये अच्छा लगता है कि उनके लेखन की चमक में कभी अपना अँधेरा भी दिख जाता है। उनका लेखन पथ निश्चय ही हिन्दी साहित्य का राजमार्ग बनने की क्षमता रखता है और बनेगा भी, पर यदि थकान, निराशा और उपेक्षा उन्हें उनके पथ से डिगने न दे। उनके लेखन पर उत्साह के दो शब्द कहने वाला सदा कोई न कोई रहे अवश्य, विशेषकर तब, जब रात हो, एकान्त हो और विचारों का अँधेरा घुप्प हो। इसके अतिरिक्त बहुत से ऐसे लेखक और कवि हैं, जिन्हें परिचय के चौराहे मिले ही नहीं, जिन्हें कोई स्थापित ठिकाना दिखा नहीं। उन्होंने लिखा, पर समुचित मान न पाकर उनका उत्साह हिन्दी साहित्य में स्थिर न रह पाया और उन्होने अपनी ऊर्जा के लिये कोई और अभिरुचि खोज ली। अपनी आलोचनात्मक तीक्ष्णता के बाद भी हमारी उन तक न पहुँच पाने की असमर्थता एक और अन्तर प्रस्थापित कर देती है, जिसके उस पार हमारा उत्थान सुनिश्चित है।

किसी मित्र को अंग्रेजी में लिखते हुये पाता हूँ तो उन्हें हिन्दी में लिखने का आग्रह करने से नहीं चूकता हूँ। लगता है कि यही विचार, यही चिन्तनशीलता यदि हिन्दी को अपना माध्यम बना लेगी ,तो मेरे जैसे न जाने कितने हिन्दीभाषी जो अच्छे लेखन की राह तकते हैं, तृप्त हो जायेंगे। उन्हें भी लगता होगा कि हिन्दी का विस्तार क्षेत्र उतना वृहद नहीं, आर्थिक संभावनायें उतनी सुदृढ़ नहीं, जो उत्साह बनाये रखने में समर्थ हों, क्षमतायें दोहित करने में समर्थ हों। उल्टा जब मुझे वे लोग अंग्रेजी में लिखने को प्रेरित करते हैं तो बस मुस्करा कर रह जाता हूँ। दासता की खनक और ममता का आग्रह, यह अन्तर उन्हें समझा पाने में लगने वाले प्रयास को एक मुस्कराहट से ही व्यक्त कर देता हूँ।

निश्चय ही अभी जो स्थिति है उसमें जितने लोग इण्टरनेट पर पढ़ते हैं, उसमें अंग्रेजी जानने वालों की संख्या बहुत अधिक है। यही कारण हो सकता है कि अंग्रेजी में लिखना अधिक आकर्षक लगे, अधिक प्रभावित करे। जिस गति से इण्टरनेट का विस्तार हो रहा है, आने वाले दिनों में हिन्दी पाठकों की इतनी संख्या तैयार हो जायेगी कि लेखकों को पर्याप्त रूप से पढ़े जाने का बोध होने लगेगा। हर एक नये लेखक के रूप में एक नया पाठक मिल रहा है ब्लॉग जगत को, अतः नये लेखकों का स्वागत उन्मुक्त रूप से किया जाना चाहिये।

गूगल रीडर बन्द होने की सूचना के बाद से ही मन में भय बैठ गया है कि एक अच्छे मेले के आभाव में लेखकों और पाठकों का संपर्क और कम हो जायेगा। १ जुलाई के बाद क्या सारी फीड वैसे ही सुरक्षित रह पायेगी जैसी अभी तक है। कई अन्य सेवाप्रदाताओं ने यह आश्वासन तो दिया है कि सब कुछ पहले जैसा ही रहेगा, पर तकनीक से अपरिचित न जाने कितने लेखक और पाठक अपना संपर्क खो देंगे, यह भय अभी भी है। मन में विचार आया कि कम से कम उन श्रेष्ठ ब्लॉगों को चिन्हित तो कर लूँ जिन्हें नियमित पढ़ते रहना हुआ है और यदि आवश्यकता पड़ी तो उन्हें पुनः एक एक करके अपनी नयी सूची में डाल लूँगा। इस कार्य को करने में तीन चार दिन अवश्य लग गये पर उस अनुभव में जो तथ्य सामने आये, उन्होंने मुझे एक पाठक के रूप में अन्दर तक हिला कर रख दिया है।

६०० की सूची में लगभग १२५ ब्लॉग ऐसे मिले जिसमें पिछले एक वर्ष से कुछ भी नहीं लिखा गया है। उनमें लगभग २५ ऐसे थे जो नये डोमेन में चले गये और लेखन की सततता बनाये हुये हैं। १०० ब्लॉग या कहें कि लगभग २० प्रतिशत ब्लॉग ऐसे थे जो निष्क्रिय हो चले। उनमें कई नाम ऐसे थे जो यदि बने रहते तो निश्चय ही साहित्य को लाभान्वित करते। उन्होने क्यों लिखना बन्द किया, उसके क्या विस्तृत कारण थे, इसके मूल में जाना कई चर्चाओं को जन्म दे देगा, पर यह तथ्य गहरे भेदता है कि ३ वर्ष में यदि स्थापित २० प्रतिशत ब्लॉग निष्क्रिय हो जायेंगे तो इस क्षेत्र में स्थापित लेखन का क्षरण लगभग ७ प्रतिशत प्रतिवर्ष हो जायेगा। मैं उन ब्लॉगों की बात ही नहीं कर रहा हूँ जो प्रारम्भिक वर्ष में ही अस्त हो जाते हैं, उनका प्रतिशत तो कहीं अधिक होगा। संभव है कि आधे से अधिक लोग प्रथम वर्ष में ही ब्लॉग छोड़कर चल देते हों।

फिर भी पिछले दो माह में न जाने कितने ब्लॉगों को उनके तीन-चार वर्ष पूरे होने की बधाई दे चुका हूँ, वे सारे ब्लॉग के प्रकाशित स्तम्भ हैं। जो उससे भी अधिक समय से लिख रहे हैं और अब तक नीरसता और एंकातता को प्राप्त नहीं हुये हैं, उनके हाथ में ही साहित्य का भविष्य सुरक्षित है, वही लोग हैं जो ब्लॉग को साहित्य से जोड़ देंगे। तब संभवतः साहित्यकार का बनना ब्लॉग जैसे व्यापक और सूक्ष्म स्तर से भी हो सकेगा। जहाँ इतने प्रवाह किसी धारा के लिये सुरक्षित रहेंगे, वह प्रवाहमयी धार दर्शनीय होगी।

इस प्रवाहमयी तन्त्र में जो ब्लॉग अपने आप को बचाये रहना चाहते हैं, उन्हें धैर्यपूर्वक लिखते रहना पड़ेगा, पहले तीन वर्ष, फिर पाँच वर्ष, फिर न जाने कितना और। हर सप्ताह दो पोस्ट, यदि दो संभव न हो तो कम से कम एक तो निश्चय ही। तब सूची से जो १२५ ब्लॉग अपना लेखन खो चुके हैं, वैसा पुनः नहीं होगा। संभव है कि तीन वर्षों बाद जब मैं पुनः समीक्षा करने बैठूँ तो सभी अच्छे ब्लॉग नियमित मिलें।

मुझे न जाने कितने अन्तर पाटने हैं, पर यदि अन्तर पाटने के पहले से दूसरा किनारा साथ छोड़कर चला जायेगा तो वह अन्तर कभी नहीं पट पायेगा, प्यास बढ़ती ही जायेगी। नये लेखक एक ओर से किनारा भरेंगे, पुराने लेखक दूसरे छोर को स्थापित रखेंगे, उसके बाद जो समतल तैयार होगा, उसमें सबके लिये स्थान होगा। मैं सारे निष्क्रिय ब्लॉगों को एक फोल्डर में एकत्र करके रख रहा हूँ, आशा है कि उसमें से कुछ दिनों के बाद नयी पोस्टें आनी प्रारम्भ हो जायेगीं। इन १२५ ब्लॉगों की कमी नये लेखक पूरी करेंगे अतः आने वाले दिनों में कई ब्लॉग संकलकों को मथ कर पढ़ने का प्रयास करूँगा।

पता नहीं यह क्रम कब तक चलेगा? ब्लॉग से मन भरने का प्रश्न ही नहीं, यह एक तृप्त व्यवस्था है, बस चलते रहें प्रवाह के साथ, जहाँ तक संभव हो सके।

8.5.13

लहरें

तकते हैं,
लहरें आती और जाती हैं।

लखते हैं,
कुछ लाती, कुछ ले जाती हैं।

छकते हैं,
इठलाती, हमें खिलाती हैं।

इनके जैसे ही सतत रहें,
हर पल उद्भव का राग यहाँ,
नत हो जाना, फिर फिर आना,
आरोहण का अनुनाद यहाँ।

हो मत्त, व्यग्र, चंचल, चपला,
दौड़ी आती विरही कल कल,
जड़ रूप मूक सागर तट पर,
आलिंगन का आग्रह निश्छल।

यह प्रेम नहीं, मद आकुल है,
जीवट मन है, कब से ठहरा,
यह विष फेनों का नर्तन भी,
आक्रोश व्यक्त होता गहरा।

एक द्वन्द्व मूर्त, स्तब्ध विश्व,
आकाश चेत, सो जाता है,
सागर धरती नित लीलामय,
इतिहास रेत हो जाता है।

इनकी गतियों सा बने रहें,
यदि शेष समय जो मिला क्षणिक,
संग जीवन हम भी बह जायें,
जब समय शेष न रहे तनिक।

4.5.13

अनमोल जीवन

विश्व वंचित कर रहा है,
है सकल संवाद स्थिर,
दृष्टि में दिखती उपेक्षा,
भाव तम एकांत में घिर।

मान लो संकेत है यह,
कर्म एकल, श्वेत है यह,
आत्म की राहें प्रतीक्षित,
रत्नपूरित खेत है यह।

एक क्षण भी नहीं रोना,
हृदय की ऊर्जा पिरोना,
मिल गया अवसर अनूठा,
एक क्षण भी नहीं खोना।

आत्म है अनमोल जीवन,
उस विरह को खोल जीवन,
देख ले क्या क्या छिपा है,
जान ले क्या मोल जीवन।