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8.5.13

लहरें

तकते हैं,
लहरें आती और जाती हैं।

लखते हैं,
कुछ लाती, कुछ ले जाती हैं।

छकते हैं,
इठलाती, हमें खिलाती हैं।

इनके जैसे ही सतत रहें,
हर पल उद्भव का राग यहाँ,
नत हो जाना, फिर फिर आना,
आरोहण का अनुनाद यहाँ।

हो मत्त, व्यग्र, चंचल, चपला,
दौड़ी आती विरही कल कल,
जड़ रूप मूक सागर तट पर,
आलिंगन का आग्रह निश्छल।

यह प्रेम नहीं, मद आकुल है,
जीवट मन है, कब से ठहरा,
यह विष फेनों का नर्तन भी,
आक्रोश व्यक्त होता गहरा।

एक द्वन्द्व मूर्त, स्तब्ध विश्व,
आकाश चेत, सो जाता है,
सागर धरती नित लीलामय,
इतिहास रेत हो जाता है।

इनकी गतियों सा बने रहें,
यदि शेष समय जो मिला क्षणिक,
संग जीवन हम भी बह जायें,
जब समय शेष न रहे तनिक।