6.8.14

भौतिकता अनुकूल नहीं है

उमड़ पड़े अनगिनत प्रश्न,
जब कारण का कारण पूछा 
जगा गये सोती जिज्ञासा,
जीवन के अनसुलझे उत्तर ।।१।।

दर्शन की लम्बी राहों पर,
चलता ज्ञान शिथिल हो बैठा 
नहीं किन्तु सन्तुष्टि मिली,
किस हेतु जी रहे जीवन हम सब ।।२।।

प्रसन्नता की सहज पिपासा,
मनुज सदा मधुरस को आतुर 
सुख के साथ दुखों की लड़ियाँ,
किन्तु कौन यह पिरो रहा है ।।३।।

कृत्रिम सुखों पर ऋण अपार है,
सदा किसी पर ही आधारित 
सुख की किन्तु प्रकृति शाश्वत है,
फिर भी अर्थहीन अवलम्बन ।।४।।

खोज रहा थाखोज रहा हूँ,
छिपा कहाँ है सुख का उद्गम 
जहाँ दुखों की काली छाया,
लेश मात्र स्पर्श नहीं हो ।।५।।

मिला नहीं कोई सुख सुन्दर,
पाया बस शापित विषाक्त रस 
स्वार्थलोभमद में सब डूबे,
मरु में अमिय कहाँ से लाऊँ ।।६।।

चिन्तनमननगहन कर सोचा,
भौतिक मेरी प्रकृति नहीं है 
सच पूछो तो सहज प्रकृति में,
अतुलअसीम आनन्द भरा है ।।७।।

कारण का सब स्रोत वही है,
वह सुख हैदुख है जो नहीं वह 
मात्र वही आस्वादन कर ले,
मरु-मरीचिका सतत व्यर्थ है ।।८।।

आत्मा हैंस्थूल नहीं हैं,
जीवन कोई भूल नहीं है 
चक्रव्यूह से कब निकलोगे,
भौतिकता अनुकूल नहीं है ।।९।।

2.8.14

अन्तहीन है ज्ञानस्रोत

अगणित रहस्य के अन्धकूप,
इस प्रकृति-तत्व की छाती में ।
है अन्तहीन यह ज्ञानस्रोत,
मानव तू क्या क्या ढूँढ़ेगा ।।

विस्तारों की यह प्रकृति दिशा,
आधारों से यह मुक्त शून्य ।
लाचारी से विह्वल होकर,जीवन अपना ले डूबेगा ।
है अन्तहीन यह ज्ञानस्रोत, मानव तू क्या क्या ढूँढ़ेगा ।।१।।

तू कण कण को क्यों तोड़ रहा,
जाने रहस्य क्या खोज रहा ।
इन छोटे छोटे अदृश कणों में डुबा स्वयं को भूलेगा ।
है अन्तहीन यह ज्ञानस्रोत, मानव तू क्या क्या ढूँढ़ेगा ।।२।।

कारण असंख्य, कर्ता असंख्य,
मानव हन्ता, ये तत्व हन्त्य ।
कब तक जिज्ञासा बाण लिये, इन सबके पीछे दौड़ेगा ।
है अन्तहीन यह ज्ञानस्रोत, मानव तू क्या क्या ढूँढ़ेगा ।।३।।

स्थिर न तुझसे विजित हुआ,
चेतन पर फिर क्यों दृष्टि पड़ी ।
जाने किसका आधार लिये, तू चरम सत्य पर पहुँचेगा ।
है अन्तहीन यह ज्ञानस्रोत, मानव तू क्या क्या ढूँढ़ेगा ।।४।।

अपना प्रवाह न समझ सका,
मन के वेगों में उलझ गया ।
लड़खड़ा रहा तेरा पग पग, बाकी चालें क्या समझेगा ।
है अन्तहीन यह ज्ञानस्रोत, मानव तू क्या क्या ढूँढ़ेगा ।।५।।

अपने घर में बैठे बैठे,
बाहर दिखता जो, देख रहा ।
अन्तर आकर खोलो आँखें, तब अन्तरतम को जानेगा ।
है अन्तहीन यह ज्ञानस्रोत, मानव तू क्या क्या ढूँढ़ेगा ।।६।।

30.7.14

हमको तो तुम भा जाते हो

जीवन-जल को वाष्प बना कर,
बादल बन कर छा जाते हो 
रहो कहीं भी छिपे छिपे से,
हमको तो तुम भा जाते हो ।।

अस्तित्वों के युद्ध कभीनिर्मम होकर हमने जीते थे,
हृदय-कक्ष फिर भी जीवन केआत्म-दग्ध सूनेरीते थे 
सुप्त हृदय मेंसुख तरंग कास्पन्दन तुम दे जाते हो 
रहो कहीं भी छिपे छिपे सेहमको तो तुम भा जाते हो ।।१।।

समय कहाँ थाजीवन का जोलुप्त हुआ सौन्दर्य बढ़ाते,
कैसे शुष्कित सम्बन्धों सेजीवन में सुख लेकर आते 
त्यक्तप्रतीक्षित फुलवारी मेंसुन्दर पुष्प खिला जाते हो 
रहो कहीं भी छिपे छिपे सेहमको तो तुम भा जाते हो ।।२।।

अभी प्राप्त जो धनगरिमा हैकहाँ हमारे साथ रहेगी,
आशाआें की डोर कहाँ तकस्वार्थ-पूर्ति के वार सहेगी 
जहाँ साथ सब छोड़ गयेतुम चित-परिचित से  जाते हो 
रहो कहीं भी छिपे छिपे सेहमको तो तुम भा जाते हो ।।३।।

26.7.14

यादें

हैं अभी तक शेष यादें 

सोचता सब कुछ भुला दूँ,
अग्नि यह भीषण मिटा दूँ 
किन्तु ये जीवित तृषायें,
शान्त जब सारी दिशायें,
रूप दानव सा ग्रहण कर,
चीखतीं अनगिनत यादें ।।

कभी स्थिर हो विचारा,
शमित कर दूँ वेग सारा 
किन्तु जब भी कोशिशें की,
भड़कती हैं और यादें ।।

23.7.14

रंग कहाँ से लाऊँ

तेरे जीवन को बहलाने,
आखिर रंग कहाँ से लाऊँ ?
कैसे तेरा रूप सजाऊँ ?

नहीं सूझते विषय लुप्त हैं,
जागृत थे जो स्वप्नसुप्त हैं,
कैसे मन के भाव जगाऊँ,
आखिर रंग कहाँ से लाऊँ ।।१।।

बिखर गये जो सूत्रबद्ध थे,
अनुपस्थित हो गये शब्द वे,
कैसे तुझ पर छन्द बनाऊँ,
आखिर रंग कहाँ से लाऊँ ।।२।।

अस्थिर है मन भाग रहा है,
तुझ पर जो अनुराग रहा है,
कैसे फिर से उसे जगाऊँ,
आखिर रंग कहाँ से लाऊँ ।।३।।

जीवन में कुछ खुशियाँ लाने,
तुझको अपना हाल बताने,
तेरे पास कहाँ से आऊँ,
आखिर रंग कहाँ से लाऊँ ।।४।।

19.7.14

प्रेम और प्राप्ति

स्वतः तृप्ति हैप्रेम शब्द में प्यास नहीं है,
मात्र कर्म हैफल की कोई आस नहीं है,
प्रेम साम्य हैकभी कोई आराध्य नहीं है,
सदा मुक्त हैअधिकारों को साध्य नहीं है 

यदि कभी भी प्रेम का विन्यास लभ हो जटिलता को,
सत्य मानो प्राप्ति की इच्छा जगी हैअनबुझी है 
प्राप्ति का उद्योग यूँ ही मधुरता को जकड़ता है,
प्रेम तो उन्मुक्तता हैव्यथा शासित तम नहीं है ।।

प्रेम का निष्कर्ष सुख है,
वेदना का विष नहीं है 
अमरता का वर मिला है,
काल से शापित नहीं है ।।

16.7.14

है अभी दिन शेष अर्जुन

है अभी दिन शेष अर्जुन,
लक्ष्य कर संधान अर्जुन 

सूर्य भी डूबा नहीं है,
शत्रु भी तेरा यहीं है,
शौर्य के दीपक जला देविजय की हुंकार भी सुन 
है अभी दिन शेष अर्जुन ।।१।।

सही की चाहे गलत की,
पार्थ तुमने प्रतिज्ञा की,
अगर निश्चय कर लिया तोलक्ष्य का एक मार्ग भी चुन 
है अभी दिन शेष अर्जुन ।।२।।

व्यर्थ का नैराश्य तजकर,
असीमित आवेश भरकर,
करो तर्पित सिन्धु भ्रम केव्यथाआें के तार मत बुन 
है अभी दिन शेष अर्जुन ।।३।।

सूर्य मेघों में छिपा था,
काल तेरे हित रुका था,
जीवनी जब तक रहेगीरहेगा दिन शेष अर्जुन 
है अभी दिन शेष अर्जुन ।।४।।

12.7.14

क्या नियत हो?


ध्येय जीवन का नियत करना स्वयं,
और यह भी नियत करना,
ध्येय में बँध कर रहूँ,
या रहूँ उन्मुक्त सा।

पैर धरती पर बँधे हों,
या गगन को छू सकें, वो पंख हो,
बँधा जीवन आश्रितों की राह में,
या जगत से मौन हो अभिव्यक्तियाँ। 

9.7.14

तुम्हारा परिचय


व्यथा से मुक्ततेज से पूर्ण,
विजय से मुखमंडल उद्दीप्त 
नेत्र में अंधकार असहाय,
निश्चय ज्वाला जले प्रदीप्त ।।१।।

भुजायें महाबली उद्दात्त,
कार्य में सकल ओर विस्तीर्ण 
समय की तालों पर झंकार,
सफलता नाचे सुखद असीम ।।२।।

सदा ही अनुपेक्षित व्यक्तित्व,
विचारों में मेधा का शौर्य 
वाक्‌ में मधुरस के उद्गार,
तर्कों में अकाट्य सिरमौर्य ।।३।।        

तुम्हारी चाल गजों सी मस्त,
शिराओं में सिंहों का वेग 
क्रोध में मेघों का गर्जन,
सदा ही स्थिर रहे विवेक ।।४।।

सदा ही प्रेम सुधा से पूर्ण,
तुम्हारे हृदयों के आगार 
लुटाते रहते सुख की धार,
 जाने क्या होता व्यापार ।।५।।

प्रश्नों का विस्तृत उत्तर,
तुम्हारे जीवन का हर कार्य 
व्यथा के उन मोड़ों का तोड़,
जहाँ पर झुकना है अनिवार्य ।।६।।

5.7.14

आँखों के आँसू


विधि के हाथ रचे जीवन काभार उठाये हाथों में,
आहों का उच्छ्वास रोककरफूलीउखड़ी साँसों में 
कष्ट हृदय-बल तोड़ रहारह शान्त वेदना सहते हैं,
आँखों से पर बह आँसू दोकई और कहानी कहते हैं ।।१।।

है बाढ़मड़ैया डूब रहीपुनिया शंकितचुपचाप खड़ी,
बहता जाता जल वेगवानकंपित मनस्थिर हुये प्राण 
भर आयीं पर आँखें रो रोयाद रहाबस हुये वर्ष दो,
था निगल गया एक चक्रवातमेरे नन्हे से कान्हू को ।।२।।

गंगू के खेतों में सूखाआस वाष्पितजीवन रूखा,
क्षुब्ध हृदयविधि का प्रहारदेखे नभकोसे बार बार 
तब जल आँखों में आयेगाऔर प्रश्न यही कर जायेगा,
कैसे साहू का कर्ज पटाबेटी का ब्याह रचायेगा ।।३।।

पुत्र शहीद हुआ सीमा परदुख में डूबे थे गंगाधर,
पुत्र गया था माता के हितगर्वयुक्त था मन जो आहत 
पर बेटे की सुध धुँधलायेभीगी आँखेंकौन बताये,
कैसे बीते पुत्रवधू काखड़ा शेष जीवन मुँह बाये ।।४।।

राधे तपताजलता ज्वर मेंअकुलाता रह रह अन्तर में,
तन की पीड़ा सब गयी भूलउठता मन में एक प्रश्न-शूल 
दृगजल बहताकह जायेगायदि नहीं दिहाड़ी पायेगा,
कैसे कल चावल-भात बिनाबच्चों की भूख मिटायेगा ।।५।।

2.7.14

कल्पना


उत्कर्षों को छूती इच्छा,
मात्र कल्पना का आच्छादन 
निष्कर्षों से शून्य धरातल,
जाने तुमसे क्या पाना है ?

बन्द नयन में मेरे तेरी,
छिपी हुयी है रूप-धरोहर 
मन में तेरा पूरा चित्रण,
सच में लेकिन क्या जाना है ?

कभी बैठ एकान्त जगह,
तू हँसती हैमैं सुनता हूँ 
इन स्वप्नों के अर्धसत्य को,
कब तक यूँ ही झुठलाना है ?

अथक कल्पनाअतुल समन्वय,
मन भावों की कोमल रचना 
इस प्रतिमा में लेकिन जाने,
कैसा रंग चढ़ाना है ?