9.7.14

तुम्हारा परिचय


व्यथा से मुक्ततेज से पूर्ण,
विजय से मुखमंडल उद्दीप्त 
नेत्र में अंधकार असहाय,
निश्चय ज्वाला जले प्रदीप्त ।।१।।

भुजायें महाबली उद्दात्त,
कार्य में सकल ओर विस्तीर्ण 
समय की तालों पर झंकार,
सफलता नाचे सुखद असीम ।।२।।

सदा ही अनुपेक्षित व्यक्तित्व,
विचारों में मेधा का शौर्य 
वाक्‌ में मधुरस के उद्गार,
तर्कों में अकाट्य सिरमौर्य ।।३।।        

तुम्हारी चाल गजों सी मस्त,
शिराओं में सिंहों का वेग 
क्रोध में मेघों का गर्जन,
सदा ही स्थिर रहे विवेक ।।४।।

सदा ही प्रेम सुधा से पूर्ण,
तुम्हारे हृदयों के आगार 
लुटाते रहते सुख की धार,
 जाने क्या होता व्यापार ।।५।।

प्रश्नों का विस्तृत उत्तर,
तुम्हारे जीवन का हर कार्य 
व्यथा के उन मोड़ों का तोड़,
जहाँ पर झुकना है अनिवार्य ।।६।।

16 comments:

  1. आनंद दायक और प्रेरक कविता।

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  2. तुम्हारी चाल गजों सी मस्त,
    शिराओं में सिंहों का वेग ।
    क्रोध में मेघों का गर्जन,
    सदा ही स्थिर रहे विवेक ...

    बहुत उत्तम ... इतना कुछ हो तो ऐसे में विवेक तो रहना ही चाहिए ...

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  3. मुझे समझ में नहीं आया ।

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  4. बहुत सुन्दर प्रस्तुति..

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  5. कौन है इतने सारे गुणों को समेटे हुए.

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  6. बहुत उत्तम ...

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  7. bahut khoob :) ati uttam

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  8. कोई निकट का ही है...

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  9. मुझे टिप्पणी करने के लिए सच में कोई शब्द नहीं मिलते। बहुत खूब

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  10. बे -हद सशक्त ओजपूर्ण रचना शब्द चयन झंकार लिए है टंकार लिए है। आनंद लिए है रसधार लिए है।

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  11. लगता है जैसे प्रसाद जी की कविता पढ़ रही हूँ ....ओजपूर्ण ,संस्कृतनिष्ठ और प्रवाहमयी ।

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  12. वाह, बहुत ही सुंदर भावाभिव्यक्ति।

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  13. लयबद्ध ,उत्तम प्रवाह ....!!

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  14. प्रश्नों का विस्तृत उत्तर,
    तुम्हारे जीवन का हर कार्य ।
    व्यथा के उन मोड़ों का तोड़,
    जहाँ पर झुकना है अनिवार्य ।
    उत्‍कृष्‍टता लिये सशक्‍त प्रस्‍तुति

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  15. इसका शीर्षक " मेरा परिचय" होना चाहिए था.
    यह तो आप ही हैं!!!

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